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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

१२४. सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम स्यादेतत्—स्मृतित्वस्य अन्योन्याभावमादाय याऽतिप्रसक्तिर्दर्शिता सा नोपपद्यते, भेदाभेदवादिमते स्मृतित्वभेदाभेदस्य स्मृत्या सहाभ्युपगमात्। ययोर्भेदा- भेदः, तयोस्तत्रान्योन्याभावानभ्युपगमात् । मैवम् ; कथं ह्यवधार्यं स्मृतित्वस्य भेदाभेदः स्मृत्या, नानुभूत्येति ? अनुभूत्या सह तद्विशिष्टप्रमाया अभावादिति चेन्न । किं सत्याः किमसत्या इत्याद्युक्तविकल्पदोषात् । प्रागभावप्रतियोगिन्या इति चेन्न । अनुभूतौ तादृश्याः स्वीकारेण अनुभूते- स्तथात्वापातात् । समर्थन—स्मृतित्व का अन्योन्याभाव ग्रहणकर स्मृति में अनुभूति-लक्षण की जो अतिव्याप्ति दी गयी है, वह उपपन्न नहीं हो सकती; क्योंकि धर्म का धर्मी के साथ भेदाभेद होता है । स्मृतित्व का स्मृति में भेदाभेद है। जिसमें जिसका भेदाभेद हो, उसका उसमें अन्योन्याभाव नहीं रहता । खंडन—स्मृतित्व का स्मृति के साथ ही भेदाभेद है, अनुभूति से नहीं, यह बात आपने कैसे जान ली ? समर्थन—'स्मृतित्वविशिष्टा अनुभूतिः' इत्याकारक प्रमा नहीं होती, अतः जाना जाता है कि स्मृतित्व का भेदाभेद अनुभूति में नहीं है। खंडन—क्या आप विद्यमान स्मृतित्ववैशिष्ट्य-प्रमा के अभाव से अनुभूति में स्मृतित्व का अभाव सिद्ध करते हैं या अविद्यमान ? यदि कहें कि विद्यमान प्रमा के अभाव से, तो विद्यमान प्रमा के कारणरूप प्रमाण से ही अनुभूति में स्मृतित्व सिद्ध हो जायगा। यदि कहें कि उक्तकारक प्रमा अविद्यमान है, तो प्रतियोगी के असत् होने से उसका अभाव भी असत् होगा, अतः बाधक का अभाव होने से ही अनुभूति में स्मृतित्व सिद्ध हो जायगा । समर्थन—अनुभूति में स्मृतित्ववैशिष्ट्य-प्रमा प्रागभाव की प्रतियोगिनी नहीं होती और स्मृति में होती है । अतः उक्त अभाव से अनुभूति में स्मृतित्वाभाव का निश्चय हो जायगा । खंडन—यदि उक्त वाक्य का यह अर्थ हो कि 'प्रागभावप्रतियोगी जो स्मृतित्व-प्रमा उसका अभाव', तो उक्त प्रमा में प्रागभाव की प्रतियोगिता सिद्ध हुई । फिर 'जो प्रागभाव का प्रतियोगी होता है, वह कदाचित् अवश्य उत्पन्न होता है' इस नियम के अनुसार उक्त प्रमा में सत्त्व होगा, जिससे उसके कारणरूप प्रमाण से ही अनुभूति में स्मृतित्व सिद्ध हो जायगा । यदि उक्त वाक्य का यह अर्थ करें कि 'अनुभूति में स्मृतित्व-प्रमा प्रागभाव की प्रतियोगी नहीं है', तो उक्त प्रमा में प्रागभाव-

परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १२५ स्मृति-स्मृतित्वयोरन्योन्याभावाभावश्च अन्योन्यात्माऽनुभूतावपि तुल्यः । न हि स्मृतित्वान्योन्याभावोऽनुभूतिरित्युक्तमावर्तते । भेद-संसर्गाभावयोर्भेदखण्डनम् अथ मा भूद्भेदाभेदमादाय परिहारः ; तथापि 'इदं तन्न भवति, इह तन्नास्ती'ति प्रतीतिसाक्षिक एवान्योन्याभावसंसर्गाभावयोर्भेद इति चेन्न । प्रतियोगिरूपोपाध्य- प्रतियोगित्व का ही निषेध हुआ, उक्त प्रमा का निषेध तो हुआ नहीं— अनादि उक्त प्रमा ही सिद्ध हुई । अतः उक्त प्रमा के करणरूप प्रमाण से ही अनुभूति में स्मृतित्व सिद्ध हो जायगा । किंच—जैसे स्मृति में स्मृतित्व के अन्योन्याभाव का अभाव ( अन्योन्याभाव ) है और वह अन्योन्यरूप है, वैसे ही अनुभूति में भी स्मृतित्व के अन्योन्याभाव का अभाव ( अन्योन्याभाव ) है और वह अन्योन्यरूप है । अर्थात् अनुभूति और स्मृतित्व उभयरूप है । फिर स्मृतित्व का भेदाभेद स्मृति के तुल्य अनुभूति में क्यों न माना जाय ? समर्थन—स्मृतित्व के अन्योन्याभाव का अत्यन्ताभाव स्मृति में ही है, अनुभूति में नहीं, क्योंकि धर्म का धर्मी में अभेद होने से अन्योन्याभाव नहीं है । फिर, अन्योन्याभाव का अत्यन्ताभाव भेदाभेद का प्रयोजक है, अतः स्मृतित्व का भेदाभेद अनुभूति में नहीं है । खंडन—जैसे स्मृतित्वात्यन्ताभाव को अन्योन्याभाव मानकर प्रथम स्मृति में अति- व्याप्ति हम दे आये हैं, वैसे ही अब भी स्मृति के अन्योन्याभाव के अत्यन्ताभाव को अन्योन्याभाव मानकर अनुभूति में स्मृतित्व का आपादन ( ग्रहण ) कर सकते हैं; क्योंकि अबतक अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव में परस्पर भेद सिद्ध ही नहीं हुआ है। भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन समर्थन—यद्यपि उक्त युक्तियों से स्मृतित्व का भेदाभेद अनुभूति में भी हो सकता है । अतः आप यह तो कह नहीं सकते कि 'जिसका जिसमें भेदाभेद है, उसका उसमें अन्योन्याभाव नहीं रहता।' कारण यदि यह कहें, तो अनुभूति में भी स्मृतित्व का भेदाभेद होने से अन्योन्याभाव का प्रतिपादन नहीं कर सकेंगे । फिर भी 'स्मृतित्व का अन्योन्याभाव भी स्मृतित्वाभाव है और वह स्मृति में है, अतः प्रमा-लक्षण की स्मृति में अतिव्याप्ति है' यह नहीं कह सकते; क्योंकि उस ( प्रमा-लक्षण ) में

१२६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम वैचित्र्यात्, अभावे जात्यादिभेदानभ्युपगमाच्च तयोर्भेदबुद्धिरेव प्रामाण्यमनश्नुवाना कूटसाक्षिणीति तदनादरणात् । न च स्वप्रतियोगिसमानकालसमानाधिकरणोऽभावोऽन्योन्याभाव , तदन्योन्या- भाववाँश्च तदभावः संसर्गाभावः । यथासम्भवमात्माश्रवाद्यननुभवस्वभेदाननुगम- तत्तदवगमानभ्युपगमानाममुत्तरणीयत्वप्रसङ्गात् । संसर्गाभाव का निवेश है। अर्थात् संसर्गाभाव शब्द 'संसर्गस्य अभावः' इस अर्थ में यौगिक नहीं, किन्तु 'इदमिह नास्ति' इत्याकारक प्रतीति के विषय अभाव- विशेष में रूढ़ है। इसी तरह अन्योन्याभाव शब्द भी 'अन्योन्यस्य अभावः' इस अर्थ में यौगिक नहीं, किन्तु 'इदमिदं न भवति' इस प्रतीति से सिद्ध अभाव- विशेष में रूढ़ है। लक्षण में संसर्गाभाव का ही निवेश है, अतः स्मृतित्व के अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में दोष नहीं है। खंडन—प्रतियोगिभेद अथवा जाति-उपाधिरूप धर्मभेद से दोनों अभावों का भेद हो सकता है, किन्तु वह यहाँ नहीं है। अतः विषय-भेद न होने के के कारण उक्त बुद्धि मिथ्या होने से आदरणीय नहीं। इसलिए उक्त बुद्धि से घटित लक्षण भी असंगत ही है। समर्थन—'स्वप्रतियोगी से समान काल तथा समान अधिकरणवाला अभाव अन्योन्याभाव है और अन्योन्याभाव से भिन्न अभाव अत्यन्ताभाव है' इस तरह दोनों अभावों के स्वरूपों में भेद मान लेने पर भेद-बुद्धि अप्रमा नहीं होगी। खंडन—उक्त लक्षण के घटक अभाव पद का यदि 'भावभिन्नत्व' अर्थ करें, तो अन्योन्याभाव के लक्षण में अन्योन्याभाव का प्रवेश होने से आत्माश्रय हो जायगा। यदि अभाव पद का 'भावत्वात्यन्ताभाववत्त्व' अर्थ करें, तो अन्योन्याश्रय हो जायगा, क्योंकि अन्योन्याभाव से भिन्न अभाव को संसर्गाभाव कहते हैं और संसर्गाभाव-विशेष ही अत्यन्ताभाव है। अतः अत्यन्ताभाव से अन्योन्याभाव का और अन्योन्याभाव से अत्यन्ताभाव का निरूपण करना पड़ता है। साथ ही अन्योन्याभाव का निरूपण अत्यन्ताभाव से, अत्यन्ता- भाव का निरूपण संसर्गाभाव से और संसर्गाभाव का निरूपण अत्यन्ताभाव से होता है, अतः चक्रक दोष भी हो जायगा। किञ्च—इन दोषों से लक्षण नहीं बनेगा और लक्षण न बनने से तदधीन लक्ष्यभूत अन्योन्याभाव तथा अत्यन्ताभाव का ज्ञान भी नहीं होगा। किञ्च—आप अन्योन्याभाव का अन्योन्याभाव मानते हैं या

परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १२७ ननु संसर्गप्रतियोगिको निषेधः संसर्गाभावः, तादात्म्यप्रतियोगिकश्च तादात्म्या- भाव इत्युक्त एव न मिश्रता तयोः । यो हि संसर्गतादात्म्यस्य निषेधः, स संसर्ग- निषेध एव न भवति तादात्म्यप्रतियोगिकत्वादिति । मैवम्; द्रव्यगुणकर्मणां समवायिकारणेषु हि तेषां प्रध्वंसा नैवं संसर्गाभावाः स्युः । संसर्गप्रतियोगित्वे तु संसर्गस्य समवायरूपतया समवायानित्यत्वप्रसङ्गात् । किञ्च—तर्हि संसर्गान्योन्याभावौ द्वावपि न घटादिप्रतियोगिकाविति घटादेः कालादिवन्निरवधित्वापातः । संसर्गतादात्म्ययोश्च अविशेषितयोर्निषेधे सामान्यत एव तयोरुच्छेदः स्यात् । नहीं ? यदि नहीं, तो अन्योन्याभावका भेद कहीं भी न होने से वह सर्वात्मक हो जायगा । यदि मानते हैं, तो उस अन्योन्याभाव का भी अन्य अन्योन्याभाव एवं उत्तरोत्तर अन्योन्याभावों की धारा मानने पर भेद के अननुगम तथा अननुभव का अनुसरण करना पड़ेगा । समर्थन—'जिस अभाव का प्रतियोगी संसर्ग हो, वह अभाव संसर्गाभाव है तथा जिसका प्रतियोगी तादात्म्य हो, वह अभाव अन्योन्याभाव है', ऐसा लक्षण करने पर दोनों अभावों का ऐक्य नहीं होगा; क्योंकि संसर्ग के तादात्म्य का अभाव तादात्म्य- प्रतियोगिक होने से संसर्गाभाव ही नहीं है । अतः स्मृतित्व-संसर्गाभाव शब्द से अन्योन्याभाव का ग्रहण न होने से स्मृति में प्रमालक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—ऐसा लक्षण करने पर द्रव्य-गुण-कर्म के प्रध्वंसाभाव में संसर्गाभाव- लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि प्रध्वंसाभाव का प्रतियोगी ससर्ग नहीं होता । यदि संसर्ग को ध्वंस का प्रतियोगी मान लें, तो द्रव्यादि के समवायिकारण में संसर्ग समवायरूप है । उसका ध्वंस मानने पर वह अनित्य हो जायगा । किन्तु नैयायिक तो समवाय को अनित्य नहीं मानते । किञ्च—यदि संसर्ग तथा तादात्म्य को संसर्गाभाव तथा अन्योन्याभाव का प्रतियोगी मानें, तो वे दोनों अभाव घटादि-प्रतियोगिक नहीं होंगे अतः घटादि का किसी भी काल या देश में निषेध न होने से काल के तुल्य घटादि भी निरवधि अर्थात् नित्य और व्यापक हो जायेंगे । किञ्च—अविशेषित संसर्ग तथा तादात्म्य का निषेध करने पर अर्थात् प्रतियोगिताकोटि में घटादि का निवेश न करने पर सामान्यरूप से ही संसर्ग तथा तादात्म्य का उच्छेद हो जायगा ।

५२८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम एवं यद्यदेव प्रतियोगि वाच्यं तत्तत्स्वरूपत एव न स्यात् । तस्यापि संसर्गे प्रति धावने च तदक्षतम्, संसर्गानवस्था, शेषोच्छेदात् पूर्वपूर्वोच्छेदो वा स्यात् । न प्रतियोग्यनुयोगिनोस्तथात्वं विरोधः, किन्तु सहभावाभावः, अतस्तन्मात्रं न स्यात्, न तु तन्मात्रमेव न स्यादिति चेन्न । अनुयोगिनि प्रतियोग्यापत्तेः । तथा प्रमाभावात् कथं तदास्तामिति चेन्न । तथाप्रमाभावमूलकस्य विरोधस्य सहानवस्थानस्य नियमभङ्गात्, प्रतियोग्यनुयोगिभावादन्यः कस्तयोर्विरोधः स्यात् । इसी तरह जो-जो वस्तुएँ अविशेषित (केवल) ही निषेध की प्रतियोगी होंगी, वे स्वरूप से ही उच्छिन्न हो जायँगी अर्थात् अलीक हो जायँगी । समर्थन—संसर्ग या तादात्म्य के भी संसर्ग का ही निषेध होता है, अतः स्वरूपतः उन दोनों का उच्छेद नहीं होगा । खंडन—यदि संसर्ग के भी संसर्ग का ही निषेध करें, तो अनवस्था हो जायगी । यदि स्वरूप का निषेध करें, तो संसर्ग के संसर्ग का स्वरूप से ही उच्छेद हो जायगा । साथ ही उत्तर संसर्ग का उच्छेद होने से पूर्व-पूर्व का भी उच्छेद होने के कारण फिर भी संसर्ग तथा तादात्म्यमात्र का उच्छेद हो जायगा; क्योंकि संसर्ग का उच्छेद होने पर संसर्गी की स्थिति हो ही नहीं सकती । समर्थन—अविशेषित संसर्ग तथा तादात्म्य का अभाव होने पर स्वरूप से उन दोनों का उच्छेद तब होता, जब प्रतियोगी के साथ अभाव का परस्पर निषेध्य-निषेधभावरूप (प्रतियोगी का निषेध अभावरूप और अभाव का निषेध प्रतियोगीरूप) विरोध होता । किन्तु यहाँ तो सह-अवस्थान का अभाव ही विरोध है । अतः प्रतियोगी और अभाव दोनों का सह-अवस्थानमात्र न होगा, प्रतियोगी के स्वरूपतः उच्छेद का तो कोई प्रश्न ही नहीं । खंडन—यदि सह-अवस्थान का अभाव ही विरोध हो, तो जैसे प्रतियोगी में अभाव का वैशिष्ट्य होता है, वैसे अभाव में अभाव का वैशिष्ट्य नहीं है, क्योंकि स्व में स्व नहीं रहता । एवञ्च अभाव में प्रतियोगी का वैशिष्ट्य भी होने लगेगा, कारण अब तो दोनों का स्वरूपतः विरोध है ही नहीं । समर्थन—अभाव में प्रतियोगी के वैशिष्ट्य की प्रमा नहीं होती, अतः उसमें प्रतियोगी के वैशिष्ट्य का आपादन हो ही नहीं सकता । खंडन—तब तो प्रतियोगी तथा अभाव दोनों के सह-अवस्थान की प्रमा तथा आधाराधेयभाव की प्रमा भी नहीं होती । उनमें सह-अवस्थान की प्रमा का विरह तो सह-अवस्थानरूप विरोध से उपपादित हो सकता है । किन्तु आधाराधेयभाव की प्रमा के विरह के उपपादनार्थ एक अन्य नियम का भी स्वीकार करना पड़ेगा । अतः 'सह-अवस्थान ही विरोध है' यह नियम भग्न हो जायगा । वह नियम प्रतियोगी-अनुयोगिभाव (परस्पर निषेध्य-निषेधकभाव) से अन्य नहीं हो सकता ।

तथा न प्रमीयमाणत्वमेव स इति चेन्न । अतिप्रसङ्गात् । नियमेनेति चेन्न । व्यक्तयोरविरोधापत्तेः । तथा न प्रमातुमनौपाधिकी योग्यतेति चेत् ? सैव मेयगता योग्यता अनुयोगि- प्रतियोगित्वादन्या का समर्थिता स्यात् । स्वरूपमेवेति चेन्न । मिथः सम्भेदाभ्युपगन्त्राऽपि तयोः स्वरूपोपगमात् । समर्थन—प्रतियोगी तथा अभाव का सहभाव का तथा आधाराधेयभाव से अप्रती- यमानत्व ही विरोध है, परस्पर निषेधरूपता विरोध नहीं है । खंडन—कदाचित् पट और महारजन के भी सहभाव या आधाराधेयभाव से अप्रतीयमान होने पर उन दोनों में भी विरोध हो जायगा । समर्थन—जिस जाति से विशिष्ट पदार्थों की प्रतीति नियमतः आधारा- धेयभाव या सहभाव से न हो, उन्हीं दोनों का विरोध होता है। पट तथा महारजन की प्रतीति कदाचित् आधाराधेयभाव से भी होती है। अतः उनमें विरोध नहीं है। खंडन—तब तो नित्यत्व, अनित्यत्व आदि जिन वस्तुओं में जाति नहीं है, उनमें भी विरोध का अभाव होने लगेगा। यदि नियम को देशगर्भ मानें, तो विरुद्ध देश-व्यक्तियों में और यदि कालगर्भ मानें, तो अतीत, अनागत कालों में भी विरोध न होगा। कारण देश में देश नहीं रहता और न काल में काल ही रहता है। अथवा जात्यवच्छेदेन विरोध मानेंगे, तो दो जातियों में ही विरोध होगा, व्यक्तियों में नहीं । समर्थन—सहभाव या आधाराधेयभाव से होनेवाली प्रतीति की अयोग्यता ही विरोध है। भाव और अभाव में तो सहभाव तथा आधाराधेयभाव से प्रतीति-अयोग्यता है, किन्तु पट और महारजन में वैसी प्रतीति-अयोग्यता नहीं है; क्योंकि महारजन में कदाचित् आधाराधेयभाव से भी पट की प्रतीति होती है। खंडन—वह अयोग्यता या योग्यता ज्ञात या ज्ञानगत तो होगी नहीं, किन्तु प्रमेयगत ही हो सकती है और प्रमेय में वह परस्पर निषेध्य-निषेधात्मकता से अन्य कोई नहीं है । समर्थन—प्रतियोगी, अभाव इन दोनों स्वरूप का ही विरोध है, प्रतियोगी-अनु- योगिभाव नहीं। खंडन—जो पदार्थमात्र को सत् और असत् उभयरूप मानते हैं, उनके मत में भाव और अभाव दोनों के स्वरूप होने पर भी एकत्र समावेश होने से विरोध नहीं है। अतः व्यभिचार होने के कारण स्वरूप विरोध नहीं हो सकता । १७

१३० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तथाभूतं स्वरूपमिति चेन्न । तस्यैव निर्वाच्यतापत्तेः । कथं गोत्वाश्वत्वाभ्यां भावाभावयोरेवंविधविरोधे विशेषः स्यात् । सत्याञ्च तयोः साहित्यप्रमायां प्रकारभेदेन व्यवस्थापना किमिति कार्या, प्रमयैवाप्रमानुपगमादिति । अथ घटादिविशेषितयोस्तयोर्निषेधौ तौ, सविशेषणौ च विधिनिषेधौ न कथञ्चिद्विशेषणमनुपसङ्क्रम्य स्यातामिति ब्रूषे; तदपि न । तर्हि विशिष्टस्य निषेधो विशेषणस्यापि भवतीति संसर्गान्योन्यनिषेधोऽपि संसर्गनिषेधः स्यादेवेति पुनः स प्रसङ्गो वज्रलेपायते । अन्योन्याप्रतियोगिकः संसर्गप्रतिषेधस्तथा विवक्षितः, एवमन्योन्यनिषेधोऽपि समर्थन--जिस रूप में भाव तथा अभाव का परस्पर सह-अवस्थान या आधाराधेय- भाव रूप संभेद (सम्बन्ध) नहीं होता, तथाभूत स्वरूप ही विरोध है । खडन---'किं रूप भाव-अभाव का परस्पर सम्भेद नहीं होता' इसका निर्वचन ही नहीं हो सकता । किञ्च--यदि सह-अनवस्थान या सह-अप्रतीयमानता ही विरोध हो, तो गोत्व- अश्वत्व के विरोध से भाव-अभाव के विरोध में भेद ही क्या रहेगा ? तार्किक परस्पर विरुद्ध संयोग और तदभाव का एकत्र समावेश करने के लिए मूल-शाखादि को अवच्छेदक मानते हैं । यदि सह-अनवस्थान या सह-अप्रतीयमानता ही विरोध है, तो संयोग-तदभाव में सह-अवस्थान और सह-प्रतीयमानता होने से विरोध ही नहीं है। फिर विरोध के परिहारार्थ अवच्छेदक-भेद क्यों माना जाय ? समर्थन--घटादिविशेषित संसर्ग का निषेध संसर्गाभाव है और घटादिविशेषित तदात्म्य का निषेध तादात्म्याभाव है । विशिष्ट का निषेध विशेषण के निषेध के बिना हो नहीं सकता, अतः विशिष्ट का निषेध ही विशेषण का भी निषेध है । तथा च, घटादिविशिष्ट संसर्ग या तादात्म्य के निषेध से विशिष्ट संसर्ग या तादात्म्य का ही उच्छेद होगा, सामान्यतः संसर्ग या तादात्म्य का उच्छेद नहीं होगा । खंडन--यदि विशिष्ट का निषेध विशेषण का भी निषेध है, तो संसर्ग के अन्योन्य का निषेध (अन्योन्याभाव) संसर्ग का भी निषेध हो जायगा । एवञ्च स्मृतित्वसंसर्ग के अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में प्रमालक्षण की जो अतिव्याप्ति दी गयी है, वह वज्रलेप के तुल्य, अपरिहार्य हो जायगी । कारण इस तरह तो स्मृतित्वसंसर्गान्योन्याभाव भी स्मृतित्वसंसर्गाभाव ही है । समर्थन-अन्योन्य है प्रतियोगी जिसका, उससे भिन्न संसर्ग-निषेध ही संसर्गाभाव है और संसर्ग है प्रतियोगी जिसका, उससे भिन्न अन्योन्य-निषेध ही अन्योन्याभाव

परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १३१ संसर्गाप्रतियोगित्वेन निर्वाच्य इति चेन्न । एवं हि अन्योन्यसंसर्गाभावः संसर्गा- न्योन्याभावश्च अपरा कोटिः स्यात् । किञ्च—एवं सति संसर्गाभावोऽन्योन्याभावो यो न भवति, स संसर्गाभावतया विवक्षित इत्युक्तं स्यात् । तथा च संसर्गविशेषणं व्यर्थमिति संसर्गाभावमर्थमधिक- माकाङ्क्षता त्वयाऽन्वर्थः संसर्गाभावशब्दोऽपि हारितः स्यात्, [ यतोऽन्यो- न्याभावो यो न भवत्यभावः स संसर्गाभाव इत्युक्तम् ] । किञ्च—अनयाऽपि वाचा अन्योन्याभावनिषेधोऽभिधीयमानोऽन्योन्याभावेऽपि प्रसज्यते । न ह्यन्योन्याभावोऽन्योन्याभावो भवतीति शक्यं प्रमातुम् । सामानाधि- करण्यं हि प्रकारभेदे सति भवति, यथा नीलमुत्पलमित्यादि । ततस्तदभावादेव न तथेत्यतिप्रसङ्गः । है । एवञ्च स्मृतित्वसंसर्गान्योन्याभाव संसर्गाभाव ही नहीं है, क्योंकि वह अन्योन्य- प्रतियोगिक भी हुआ करता है । फिर उक्त अन्योन्याभाव को ग्रहणकर प्रमालक्षण की अतिव्याप्ति कैसे होगी ? खंडन—ऐसा मानें, तो 'अन्योन्यं नास्ति' इत्याकारक प्रतीतिसिद्ध अभाव भी अन्योन्यप्रतियोगिक होने से संसर्गाभाव नहीं कहा जायगा । इसी तरह 'संसर्गो न' इस प्रतीति से सिद्ध अभाव भी संसर्गप्रतियोगिक होने से अन्योन्याभाव नहीं हो सकेगा । तब उक्त अभावद्वय स्वीकृत अभावों में अन्तर्भूत न होने से अन्यकोटिक ही हो जायेंगे । किञ्च—ऐसा होने पर 'अन्योन्यप्रतियोगिक से भिन्न जो संसर्गाभाव है, वही संसर्गा- भाव है' यही उक्त वाक्य का अर्थ होगा । तब तो 'संसर्ग' विशेषण व्यर्थ है, क्योंकि 'अन्योन्यप्रतियोगिक से भिन्न जो अभाव, वह संसर्गाभाव है' ऐसा कहने पर भी कोई दोष नहीं है । यदि संसर्ग का निवेश न करें, तो 'संसर्गाभाव' शब्द की अन्वर्थता का त्याग हो जायगा; क्योंकि तब तो संसर्गाभाव शब्द का अर्थ 'संसर्ग का अभाव' नहीं, किन्तु 'अन्योन्याभाव से भिन्न अभाव' ही है । किञ्च—इस वाक्य-रचना से कथित अन्योन्याभाव का निषेध अन्योन्याभाव में भी प्रसक्त हो जायगा । कारण शब्दसामानाधिकरण्यकृत विशेष्यविशेषणभाव या उद्देश्यविधेयभाव धर्मभेद में होता है; जैसे 'नीलमुत्पलम्' इस स्थल में । अतः 'अन्योन्याभावः, अन्योन्याभावः' यह प्रतीति नहीं हो सकती । एवञ्च जब अन्योन्या- भाव का विधान अन्योन्याभाव में नहीं हुआ, तो अन्योन्याभाव का निषेध अन्योन्याभाव में सिद्ध हो जाता है ।

१३२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अन्यश्चान्योन्याभावेष्वेव तिष्ठन्नेव कः प्रमेयो यद्वति तथा कथ्येत ? अभावमात्रे त्वतिप्रसङ्गात् । व्यक्तिविशेषे च शेषेष्वन्योन्याभावेषु संसर्गाभावत्वापत्तेः । एतच्च सर्वत्र तदन्यत्वेन व्यवच्छिद्यमाने द्रष्टव्यम् । तथा हि— ‘नातत्तन्मन्यसे तावन्न तत्तदपि मंस्यसे । सामानाधिकरण्यं हि रूपभेदमपेक्षते ॥ २९ ॥ रूपान्तरेण निर्दिश्य तच्चेत्तदभिधीयते । ताद्रूप्येण तथाऽपि स्यात् सैव सव्यभिचारिता ॥ ३० ॥’ अपि च—अन्योन्याभावस्य संसर्गाभावोऽप्येवं व्यवच्छिन्नः स्यात्, तस्यापि अन्योन्यप्रतियोगिकत्वात् । समर्थन—अन्योन्याभावमात्र में वृत्ति किसी धर्म को उद्देश्यता का अवच्छेदक मानकर अन्योन्याभावत्व के विधान के तात्पर्य से ‘अन्योन्याभावः अन्योन्याभावः’ यह प्रयोग हो सकता है । खंडन—अन्योन्याभावत्व से अन्य अन्योन्याभावमात्रवृत्ति धर्म में कोई प्रमाण नहीं है । यदि प्रथम अन्योन्याभाव पद का लक्षणा द्वारा अभावत्वबोध के तात्पर्य से प्रयोग करें, तो ‘अन्योन्याभावः अन्योन्याभावः’ इस वाक्य का ‘अभावः अन्योन्याभावः’ इस अर्थ में तात्पर्य होने से संसर्गाभाव भी अन्योन्याभाव हो जायगा । यदि घटान्योन्याभाव के तात्पर्य से प्रयोग हो, तो उक्त वाक्य का ‘घटान्योन्याभाव अन्योन्याभाव है’ यह अर्थ होगा । अतः पटान्योन्याभाव अन्योन्याभाव नहीं हो सकेगा; किन्तु वह संसर्गाभाव ही हो जायगा । जिन-जिन लक्षणों में किसीसे अन्यत्व का निवेश हो, उन सभी लक्षणों में यह दोष जानना चाहिए । देखिये— जैसे उससे भिन्न वह, यह प्रयोग नहिं होत । ऐसे वह वह यह नहीं, कभी प्रयोग भी होत ॥ अन्य धर्म में लक्षणावश से यदि प्रयोग । अतिव्याप्ति अव्याप्ति तब, दोष न होत है योग ॥ किञ्च—यदि संसर्गाभाव के लक्षण में ‘अन्योन्यप्रतियोगित्वे सति’ यह निवेश करें, तो ‘अन्योन्याभावो नास्ति’ इस प्रतीति से सिद्ध संसर्गाभाव में अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि वह भी अन्योन्यप्रतियोगिक ही है, अप्रतियोगिक नहीं ।

परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद खण्डन १२३ अथान्योन्याभावस्य संसर्गाभावो नाम अधिको नोपेयत एव, यमादाय तथा स्यादिति चेन्न । एवं तर्ह्यन्योन्याभावस्य अन्योन्याभावोऽपि नाधिकोऽभ्युपगन्तव्यः स्यादिति अन्योन्याप्रतियोगित्वेन व्यवच्छेदोऽपि संसर्गाभावस्य त्वदभिमतस्य कथं स्यात्, व्यवच्छेदस्य निषेधार्थत्वात् । अथ माभूदधिकोऽसौ, स्वरूपमेव तु तथेष्यत इति तदादायैव व्यवहार एष निर्दोष इति चेत्, तर्ह्यन्योन्याभावसंसर्गव्यतिरेकेऽपि तुल्यमेतत् । अपि च—'अन्योन्यप्रतियोगिको न भवत्यभावो यः स संसर्गाभावः' इति वदता त्वया अन्योन्यप्रतियोगिकेऽभावे निषिध्यमाने अन्योन्यात्मकोऽसौ अभावोऽभ्युपगतः स्यात्, द्वयोर्निषेधयोः सुन्दोपसुन्दतया अन्योन्यस्यैव स्थैर्यापत्तेः । तथा च सत्य- न्योन्यस्मिन् निर्विशेषणे जगदेव प्रविष्टमिति संसर्गाभावत्वेन विवक्षितस्य जगदात्म- समर्थन—अनवस्था तथा अनुभव-दोष से अभाव के अभाव को अतिरिक्त नहीं मानते । एवञ्च अन्योन्याभावप्रतियोगिक ससर्गाभाव के अन्योन्याभाव से अतिरिक्त प्रसिद्ध ही न होने से उसे लेकर अव्याप्ति भी नहीं होगी । खण्डन—यदि अभाव के अभाव को अतिरिक्त नहीं मानेंगे, तो अन्योन्याभाव का अन्योन्याभाव भी नहीं मानेंगे । फिर अन्योन्याप्रतियोगित्व विशेषण देने पर संसर्गाभाव में अन्योन्याभाव से व्यवच्छेद भी कैसे होगा; क्योंकि 'व्यवच्छेद' पदार्थ भी निषेध ( अन्योन्याभाव ) ही है । समर्थन—अन्योन्याभाव का अन्योन्याभाव अतिरिक्त न होने पर भी व्यवच्छेद्यभूत अन्योन्याभावरूप ही वह व्यवच्छेद है ! अतः अन्योन्याप्रतियोगिकत्व विशेषण से अन्योन्याभाव का स्वरूपरूप अन्योन्याभाव मिल जायगा । खण्डन—तब तो 'अन्योन्या- भावो नास्ति' इस प्रतीति से सिद्ध अभाव अतिरिक्त न होने पर भी उसे आप स्वरूपरूप अवश्य मानेंगे । एवञ्च स्वरूपरूप उस अभाव में संसर्गाभाव के लक्षण की अव्याप्ति वैसी ही बनी रही । किञ्च—'जो अभाव अन्योन्यप्रतियोगिक न हो, वह संसर्गाभाव है' ऐसा लक्षण करनेवाले अन्योन्य-प्रतियोगिक अभाव का निषेध होने पर 'संसर्गाभाव अन्योन्यात्मक है' यह अवश्य मानेंगे; क्योंकि दोनों अभावों के परस्पर सुन्द-उपसुन्द के तुल्य निषेधरूप होने से अन्योन्य की ही स्थिति होगी । ऐसा होने पर विशेषणरहित अन्योन्य में जगन्मात्र प्रविष्ट हुआ । अतः जिसे आप संसर्गाभाव कहते हैं, उसके जगद्रूप सिद्ध होने पर वह अन्योन्याभावरूप भी हुआ । अतः अन्योन्याभाव

१५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तायां सिद्धयन्त्यामन्योन्याभावात्मताऽपि स्यादिति व्यर्थो विशेषणप्रयासो हास्यायेति, सविशेषणोऽप्यविशेषणवत्प्रसङ्ग इति महत् कौतुकम्। ननु 'घटाभावो न भवति स्तम्भः' इत्युक्ते किं स्तम्भो घटात्मा विहितो भवति, तत्कस्य हेतोः ? तदा हि तथा स्यात्, यदि घटस्तदभावश्चेत्येव जगत् स्यात्। यदा तु स्तम्भादिरप्यपरा कोटिरस्ति, तदा कथं तथा स्यादित्युक्त- प्रसङ्गानवकाश इति। मैवम्; यथा घटतदभावाभ्यामन्या वस्त्रादिकमप्यस्ति कोटिस्तथाऽन्योन्य- तदभावाभ्यां नान्या कोटिः सम्भवति, निर्विशेषणान्योन्यमध्ये जगत एव प्रवेशात्। तदात्मनोऽपि निषिध्यमानत्वे तन्निषेधात्मके तदात्मनि जगत्प्रवेशात्। न हि 'घटः पटात्मे'त्यनेन पटस्वरूपादन्यस्तदात्मा विहितः स्यात्। से व्यवच्छेद के लिए लक्षण में 'अन्योन्याप्रतियोगित्व' विशेषण देने का प्रयास व्यर्थ, अतएव हास्यास्पद होगा। अति-आश्चर्य तो यह है कि विशेषण देने पर भी विशेषणरहित के तुल्य दोष होता है। शंका—'स्तम्भ घटाभाव नहीं है' यह कहने पर क्या स्तम्भ घटरूप सिद्ध होता है ? ऐसा तब होता, यदि जगत् घट तथा घटाभावमात्र होता। जब कि स्तम्भ आदि और भी कोटियाँ (वस्तुएँ) हैं, तब ऐसा कैसे हो सकता है ? इसी तरह अन्योन्याभाव का निषेध होने पर जगत् अन्योन्यरूप कैसे होगा ? उत्तर—जैसे घट और घटाभाव से अन्य स्तम्भादि हैं, वैसे अन्योन्य और अन्योन्याभाव से अन्य कोई वस्तु नहीं है। अतः संसर्गाभाव के विशेषणरहित अन्योन्य में अन्तर्भूत होने से उक्त दोष वैसे ही है। समर्थन—'अन्योन्याभाव'-शब्द तादात्म्यप्रतियोगिक अभाव की संज्ञा है, 'अन्योन्यस्य अभावः' इस अर्थ में यौगिक नहीं। एवञ्च अन्योन्याभाव के निषेध का अन्योन्य में पर्यवसान न होने से पूर्वोक्त दोष नहीं होगा। खण्डन—यदि तादात्म्य के निषेध को अन्योन्याभाव कहें, तो तादात्म्य के निषेध का निषेध भी तादात्म्यरूप में ही पर्यवसित होगा तथा च तदात्मक संसर्गाभाव में जगत् का ही प्रवेश हुआ, क्योंकि 'घटः पटात्मा' यह कहने पर घटरूप से अन्य पटात्मा प्रतीत नहीं होता, किन्तु घटरूप ही पटात्मा प्रतीत होता है

परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १३५ यदि तु तादात्म्यं नामाभेदाख्यो धर्मः कश्चिदिष्यते, स घटपटाद्यधिकरणतया निषिध्यते; तदा संसर्गाभाव एव स स्यात् । तस्मात् निर्विशेषणतादात्म्यान्तर्भूतं जगदिति कोट्यन्तराभाव इति । अपि च एवं तर्हि घटे निषिध्यमाने घटाभावो विधीयते, घटाभावे च निषिध्यमाने घट इत्यपि न स्यात्; तृतीयस्य विद्यमानत्वात् । भवन् वा 'घटा- भावः स्तम्भो न भवती'त्यत्रापि घटाभावत्वाविशेषात् विशेषान्तरानिर्वचनाच्च घटः स्तम्भात्मेत्येवोक्तं स्यादिति त्वत्प्रसङ्गस्त्वयि निपतेत् । संसर्गान्योन्‍याभाव- वैचित्र्यमादाय हि स परिहार्यः, स एव च नाद्यापि व्यवतिष्ठते । अत एव 'प्रतीतिबलादन्यदेव वैधर्म्यमनयोरुपेयमित्यपि निरस्तम् । प्रति- समर्थन—अन्योन्याभाव का तादात्म्य प्रतियोगी है, अतः अन्योन्याभाव का निषेध तादात्म्यरूप होगा । तादात्म्य जगत् का धर्म है, जगद्रूप नहीं । खंडन—यदि तादात्म्य का घट में निषेध करें, तो अन्योन्याभाव का संसर्गाभाव में प्रवेश होने से उसका उच्छेद हो जायगा । तस्मात् निर्विशेषण अन्योन्य अथवा तादात्म्य में जगत् का प्रवेश होने से संसर्गाभाव अन्योन्याभावात्मक हो ही जायगा । किञ्च—यदि अन्योन्याभाव के अन्योन्याभाव को अन्योन्यरूप न मानें, तो घटा- त्यन्ताभाव का अत्यन्ताभाव भी घटरूप न होगा; क्योंकि घट और घटाभाव से अन्य तृतीय कोटि यहाँ भी नहीं है । यदि तृतीय कोटि के रहते भी अभाव के अभाव को प्रतियोगीरूप मानें, तो 'घटाभावात्मा स्तम्भो न भवति' यहां घटान्योन्‍याभाव का अन्यो- न्याभाव भी स्तम्भात्मा हो जायगा; क्योंकि अन्योन्याभाव भी अभाव ही है और आपने अभीतक संसर्गाभाव से अन्योन्याभाव का भेद सिद्ध नहीं किया है । अतः 'अत्यन्ता- भावस्थल में अभावाभाव प्रतियोगीरूप होता है और अन्योन्याभावस्थल में नहीं' यह नियम मानकर भी अतिप्रसङ्ग का निवारण कर सकते हैं । समर्थन—किसी अभाव का अभाव प्रतियोगीरूप प्रतीत होता है, तो किसी का प्रतियोगी से अन्य, अतः यह प्रतीति ही दोनों अभावों के भेद में प्रमाण है । खण्डन—जब तक लक्षण से अर्थ का भेद सिद्ध न हो, तबतक दोनों अभावों की भेदावगाही प्रतीति प्रमा न होकर भ्रमरूप ही रहेगी । अतः इन दोनों अभावों की भेदावगाही प्रतीति भी प्रमा नहीं । समर्थन—'जहां प्रतियोगी और अभाव दोनों में परस्पर विरोध हो, वहां अभाव का निषेध प्रतियोगी की विधि के लिए होता है । अर्थात् अभावाभाव प्रतियोगीरूप होता

१३६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य षेधप्रतिषेद्ध्यविरोघे हि प्रकारविशेषव्यवस्थानिरुक्त्यशक्तेरविशेषेण एकनिषेधे अ- यविधिध्रौव्यं भवदन्योन्याभावनिषेधेऽप्यन्योन्यविधये स्यात् । मम चानिर्वचनीयतैव प्रतीतिव्यवहारव्यवस्थापर्यंनुयोगत्राणवारणाय वज्र- वारवाणायमाना विजयते । मम त्वेवं दर्शनम् —प्रतीतिसिद्धत्वादत्यन्तासद्वि- लक्षणं भवदपि जगत्तथा सत्तोपगमेऽपि बाध्यमानत्वादनिर्वचनीयमिति । अत एव प्रतीयमानत्वाद् वैचित्र्यमनयोर्घुष्यमाणमतिदूरनिरस्तम् । उक्तप्रति- योग्यादिवैचित्र्यानुपपत्तितः प्रतीयमानस्यैव बाध्यताया एव कथनात् । तस्मात्— 'अन्योन्याभावसंसर्गाभावभेदव्यवस्थितौ । सत्यां स्याद्व्यवस्थेति स्वाश्रयं कश्चिकित्सतु ॥ ३१ ॥' है । अन्योन्याभावस्थल में अभाव और प्रतियोगी एक अधिकरण में रहने से उनमें विरोध नहीं है, अतः उस स्थल में अभावाभाव प्रतियोगिरूप नहीं होगा । खंडन— 'अत्यन्ताभावस्थल में अभावाभाव प्रतियोगिरूप होता है, अन्योन्याभावस्थल में नहीं' यह व्यवस्था भी इन अभावों के निर्वचन के बिना हो नहीं सकती । यदि अविशेष रूप से अभावस्थल में उक्त नियम मानेंगे, तो अन्योन्याभाव का अभाव भी अन्योन्यरूप हो जायगा । प्रश्न — लक्षण द्वारा इन दोनों अभावों का भेद करना तो आपका भी कर्तव्य है, अन्यथा आप भी प्रतीति और व्यवहार के वैचित्र्य की व्यवस्था कैसे करेंगे ? खण्डन— मेरे मत में इस प्रश्नरूप बाण के बचाव के लिए अनिर्वचनीयता ही युद्ध-कवच है । अर्थात् जगत् प्रतीतिसिद्ध होने से अत्यन्त असत् नहीं है और निर्वचन योग्य न होने से बाधित प्रतीति का विषय होने के कारण सत् भी नहीं हैं, किन्तु अनिर्वचनीय है । इसलिए मुझसे निर्वचन का प्रश्न हो ही नहीं सकता । प्रतीति के बाधित होने के कारण से ही 'प्रतीति के वैलक्षण्य से दोनों अभावों में वैलक्षण्य है' यह कथन भी खण्डित हो जाता है । उक्त रीति से प्रतियोगी, अधिकरण और लक्षण तीनों में भेद न होने से दोनों अभावों में परस्पर भेद नहीं है । अतः विषय के बाध से प्रतीति बाधित है । तस्मात् अन्योन्याभाव और संसर्गाभाव का भेद सिद्ध होने पर अन्योन्याभाव- भिन्नत्वघटित संसर्गाभाव का लक्षण हो सकेगा और लक्षण होने पर ही अभावों में भेद सिद्ध होगा—इस तरह संसर्गाभाव के लक्षण में संसर्गाभाव का प्रवेश होने से आत्माश्रय हो जायगा। अथवा विषय के वैलक्षण्य से प्रतीति का वैलक्षण्य होता है और प्रतीति के वैलक्षण्य से

परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १३७ अभाव एव यत्रेति सावधारणं वक्तव्यमिति चेन्न । एवकारेण किमधिकमभि- धीयते ? भावो निषिध्यत इति चेन्न । तस्याभावपदेनैव लब्धत्वात्, भावनिषेधो- ऽभाव इत्यनर्थान्तरमिदम् । भावसामानाधिकरण्यनिषेध एवकारार्थ इति चेन्न । उक्तेनैव गतार्थत्वात् । अन्योन्याभावस्य च तस्य स्मृतावपि सम्भवात् । न हि भावसामानाधिकरण्यं स्मृतिः । स्मृतौ च भावमभावं चैकत्र मन्यमानेन विषय का वैलक्षण्य अतः अन्योन्याश्रय हो जायगा । निर्वचन—‘जिस ज्ञान में स्मृतित्व का अभाव ही हो, वह ज्ञान अनुभूति है’ ऐसा लक्षण करने पर स्मृति में अतिव्याप्ति नहीं होगी । प्रश्न—‘एव’ शब्द का अर्थ क्या है ? उत्तर—‘एव’ शब्द से भाव का निषेध होता है । अर्थात् जिस ज्ञान में स्मृतित्व का अभाव हो, वह ‘एव’ शब्द का अर्थ है । खण्डन— ‘अभाव’ शब्द का अर्थ भी ‘न भावः अभावः’ इस व्युत्पत्ति से ‘जो भाव न हो, वही’ हुआ । तब तो पुनरुक्तिदोष हो जायगा । समर्थन – ‘एव’ शब्द का ‘भावाधिकरणत्व’ अर्थ है, अतः पुनरुक्ति नहीं है । खंडन—‘जहाँ अभाव हो’ इस कथन से ही भावसामानाधिकरण्य का भी निषेध हो जायगा, क्योंकि भाव का निषेध होने पर भावाधिकरणत्व का निषेध भी अर्थतः सिद्ध होता है । अतः शब्द-पुनरुक्ति न होने पर भी अर्थ-पुनरुक्ति अवश्य है । किञ्च—स्मृतित्व-सामानाधिकरण्य का अन्योन्याभाव स्मृति में भी है, क्योंकि स्मृतित्व- सामानाधिकरण्य स्मृति नहीं है । अतः ‘जहाँ स्मृतित्वाभाव ही हो, स्मृतित्वसामा- नाधिकरण्य न हो’ ऐसा कहने पर भी स्मृति में अनुभूतिलक्षण की अतिव्याप्ति स्थिर ही है । जब आप एक ही स्मृति में स्मृतित्व और स्मृतित्व का अन्योन्याभाव दोनों मानते हैं, तो स्मृतित्वसामानाधिकरण्य और उसका अन्योन्याभाव भी अवश्य मानेंगे, क्योंकि स्मृतित्वसामानाधिकरण्य का तादात्म्य और उसका अन्योन्याभाव दोनों परस्पर प्रतिक्षेप (निषेध) रूप हैं । अर्थात् जब स्मृति में स्मृतित्वसामानाधिकरण्य का तादात्म्य नहीं है, तो उसका अन्योन्याभाव अवश्य रहेगा । शंका—जब स्मृतित्व का सामानाधिकरण्य है, तो उसके अभाव की स्थिति दुर्घट-सी प्रतीत होती है । खण्डन—जैसे पृथिवी और जल में रूप तथा रस का सामानाधिकरण्य है; किन्तु तेज में रस का अभाव होने से उसके सामानाधिकरण्य का अभाव दुर्घट नहीं १८

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परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १३६ एतेन विलक्षण एवायमभावो भावसहासनाननुवेशी य एवकारसमभिव्या- हारेणोच्यत इति निरस्तम् । तस्यापि वैलक्षण्यं प्रतियोग्याश्रयनिषेधतासाम्येऽपि सामानाधिकरण्यविरहादुन्नेयम्, तच्च तुल्यमभावान्तरेण । सामानाधिकरण्याभावप्रत्ययेनेति चेन्न । प्रत्ययविशेषकस्यार्थस्य स्मृतावपि भावात् । 'अन्योन्याभावव्यतिरिक्तः स्मृतित्वाभावः' इत्युक्तौ च स्मृतिव्यति- रिक्तपक्षोक्त एव दोषः । तदाऽऽस्तां विस्तरः । नापि स्मृतित्वप्रतियोगिकमाश्रयस्य स्वरूपं तद्धीर्वेति पक्षः, अन्योन्याभावेऽपि भवतामभावव्यवस्थायास्तादृशत्वेन उक्तप्रसङ्गस्य समानत्वात् । समर्थन—भाव के साथ एक अधिकरण में न रहनेवाला तथा अन्योन्याभाव से विलक्षण ही यह अत्यन्ताभाव है, जो एवार्थक ‘ही’ शब्द की सन्निधि में प्रतीत होता है । अर्थात् ‘जहाँ स्मृति का अभाव ही हो’ इस वाक्य का यह अर्थ हुआ कि जहाँ स्मृतित्व का अत्यन्ताभाव हो । अतः अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन—अत्यन्ताभाव का अन्योन्याभाव के साथ प्रतियोगिकृत, अधिकरणकृत या स्वरूप- कृत वैलक्षण्य तो है नहीं । फिर यदि केवल प्रतियोगी के साथ असामानाधिकरण्य होने से ही वैलक्षण्य का अनुमान करें, तो वह हो नहीं सकता; क्योंकि अन्योन्याभाव में भी उक्त रीति से असामानाधिकरण्य दिखाया जा चुका है । अर्थात् ‘भावसामानाधिकरण्यं न अन्योन्याभावः’ इस प्रतीति से सिद्ध अन्योन्याभावरूप असामानाधिकरण्य अन्योन्याभाव में भी है। अतः असामानाधिकरण्यमात्र से अभावों में वैलक्षण्य का ज्ञान नहीं हो सकता । समर्थन—अत्यन्ताभाव में प्रतियोगी के साथ असामानाधिकरण्य की प्रतीति होती है, अतः उक्त प्रतीति से ही वैलक्षण्य की अनुमिति क्यों न हो ? खण्डन—‘असामानाधि- करण्य’रूप विषय के वैलक्षण्य से ही उक्त प्रतीति में वैलक्षण्य है और वह असामाना- धिकरण्य अन्योन्याभाव में भी है। अतः प्रतीति से भी दोनों अभावों में भेद न होने से अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है । समर्थन—‘जिस ज्ञान में अन्योन्याभाव से भिन्न स्मृतित्वाभाव रहता हो, वह ज्ञान अनुभूति है’, ऐसा लक्षण करेंगे, तो अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—जबतक दोनों अभावों का भेद सिद्ध न हो, तबतक ऐसा लक्षण करने से कुछ लाभ नहीं । किञ्च—यदि ‘यत्किञ्चित् अन्योन्याभाव से भिन्न’ कहें, तो एक अन्योन्याभाव से भिन्न दूसरा अन्योन्याभाव है, अतः उसे ही ग्रहणकर अतिव्याप्ति हो जायगी। यदि ‘सभी अन्योन्याभावों का भेद’ निवेश करें, तो अन्योन्याभाव लेकर दोष तो होगा नहीं, किन्तु हम लोगों को सभी अन्योन्याभावों का ज्ञान न होने से लक्षण ही असिद्ध हो जायगा, कारण सामान्यलक्षणा का तो पहले ही खण्डन हो चुका है । अतः

१४० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम अथान्यदेव किञ्चित्संसर्गाभावनिर्वचनं क्रियते । तथा हि—स्मृतित्वस्य यत्र संसर्गितया निषेधस्तत्र तदभावस्य संसर्गाभावत्वम् । यत्र तु तदात्मत्वेन, तत्र तद- भावस्य न संसर्गाभावता, किन्तु अन्योन्याभावत्वमेव । स च इह न विवक्षितः , पूर्व एव तु संसर्गाभावो विवक्षित इति । नैतद्विचारसहम् । ‘संसर्गितया निषेधः' इति येयं तृतीया सा लक्षणे वा, सहियोगे वा, कारकभेदे वा करणादौ ? नाद्यः ; संसर्गितया लक्षितस्यैवान्योन्या- भावमादाय प्रसङ्गात् । नापि द्वितीयः ; तत्सहितस्यैवान्योन्यनिषेधस्य प्रत्याख्यातु- मशक्यत्वात् । तृतीयस्तु न सम्भवति ; अत्यन्तनिषेधस्यानुत्पत्तिधर्मकत्वात्, तस्य च प्रकृतोदाहरणत्वात् । प्रकारवाचिनीयं तृतीयेति चेन्न । प्रकारशब्दार्थस्याधिकस्य निर्वक्तव्यत्वापातात् । निखिल अन्योन्याभावों की प्रमिति में अब कोई प्रमाण है ही नहीं । तस्मात् विस्तार से कोई इष्टसिद्धि नहीं, इसलिए अब अधिक विस्तार न किया जाय । समर्थन—जिस अधिकरण में स्मृतित्व के अभाव का ज्ञान होता हो, उस अधि- करण का स्वरूप या ज्ञान ही स्मृतित्वाभाव है। वह अनुभूति में ही है, स्मृति में नहीं; अतः अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—तब तो आप स्मृतित्व के अन्योन्याभाव को भी स्मृतित्व का अभेदज्ञान जिस आश्रय में हो, उस आश्रय का स्वरूप या ज्ञान-स्वरूप ही मानेंगे । अतः इन पक्षों में भी स्मृति में अतिव्याप्ति वैसी ही बनी हुई है । समर्थन—हम संसर्गाभाव का अलग ही निर्वचन करेंगे । सुनिये—जहाँ स्मृतित्व का संसर्गितया निषेध हो, वहाँ स्मृतित्व का संसर्गाभाव है । जहाँ स्मृतित्व का तादात्म्येन निषेध हो, वहाँ स्मृतित्व का संसर्गाभाव नहीं, किन्तु अन्योन्याभाव ही है । उक्त लक्षण में अन्योन्याभाव नहीं, संसर्गाभाव ही विवक्षित है । अतः स्मृति में अति- व्याप्ति नहीं है । खंडन—'संसर्गितया निषेधः' इस पद में तृतीया-विभक्ति का क्या अर्थ है--लक्षण, सहयोग, करण या प्रकार ? इनमें प्रथम और द्वितीय पक्ष उचित नहीं हैं, क्योंकि संस- र्गिता से उपलक्षित या संसर्गिता के साहित्य से युक्त स्मृतित्व के अन्योन्याभाव को ग्रहण- कर पूर्ववत् अतिव्याप्ति हो जायगी । तृतीय कल्प भी युक्त नहीं है; क्योंकि अत्यन्ताभाव के नित्य होने से संसर्गिता उसका करण (कारक) नहीं हो सकता । चतुर्थ पक्ष भी उचित नहीं है; क्योंकि यदि संसर्गिता ही प्रकार है, तो उससे युक्त स्मृतित्व का अन्योन्याभाव ग्रहणकर स्मृति में ही अतिव्याप्ति है । यदि संसर्गिता से अन्य कोई प्रकार हो, तो उसका निर्वचन (लक्षण) कीजिये ।

परिच्छेद ] स्मृति-लक्षण-का खण्डन १४१ प्रकारः प्रकार एवेति चेन्न । अविदितलक्ष्यस्य लक्षणमनभिधाय इतरव्य- वच्छेदेन तस्य दर्शयितुमशक्यत्वात् । अन्यथा सर्वत्र प्रष्टारं प्रति लक्षणानभिधा- नापातात् । ‘को घटः’ इत्यादिपृष्टे ‘घट एव घटः’ इत्याद्येवोत्तरं सङ्गच्छेत । ‘प्रकार एवेति पक्षो नोपपन्नः, सदोषत्वादिति वक्ता ‘को दोषः’ इत्यनुयुक्तः ‘दोष एव दोषः’ इत्यभिधायैव च निर्वृतो भवेदिति । स्मृति-लक्षण खण्डनम् स्मृतित्ववत् ‘स्मृतेर्लक्षणान्तरेण रहितत्वमनुभूतित्वमिति प्रत्युक्तं वेदितव्यम् । ‘गृहीतस्य हि ज्ञानं स्मृतिरिति च स्मृतिलक्षणे धारावाहिकज्ञानेऽतिप्रसक्तिः । समर्थन—‘प्रकार’ शब्द का अर्थ प्रसिद्ध है, अतः उसके निर्वचन की आवश्यकता ही नहीं। किन्तु प्रकार ही प्रकार है। खंडन—जो लोग प्रकाररूप लक्ष्य को ही नहीं जानते, उन्हें आप बिना लक्षण किये इतरव्यावृत्तरूप लक्ष्य का स्वरूप ही दिखा नहीं सकते। यदि आप लक्षण न करके भी लक्ष्य को इतर-व्यावृत्त रूप से दिखा सकें, तो प्रष्टा के बोध के लिए सर्वत्र लक्षण करना व्यर्थ ही हो जायगा । किञ्च—यदि कोई प्रश्न करे कि ‘घट क्या है’, तो इस पर ‘घट एवं घटः’ यह उत्तर ही पूर्ण सङ्गत हो जायगा । किञ्च—‘प्रकार-पक्ष युक्त नहीं है, सदोष होने से’ यह कहनेवाला ‘क्या दोष है’ यह पूछे जाने पर ‘दोष ही ‘दोष है’ यह कहकर ही विजय प्राप्तकर प्रसन्न हो जायगा । स्मृति-लक्षण का खण्डन इसी तरह यदि आप ‘स्मृतिलक्षणरहितत्वे सति ज्ञानत्वमनुभूतित्वम्’ यह अनुभूति का लक्षण करें, तो वह भी नहीं हो सकता । कारण जैसे ऊपर ‘स्मृतिरहितत्वे सति ज्ञानत्वम्’ इस लक्षण में स्मृतित्व का अन्योन्याभाव लेकर स्मृति में अतिव्याप्ति दी गयी है, वैसे ही यहाँ भी स्मृति-लक्षण का अन्योन्याभाव लेकर स्मृति में ही अतिव्याप्ति हो जायगी। किञ्च—स्मृति का लक्षण न होने से ‘स्मृतिलक्षणरहितत्वे सति ज्ञानत्वमनुभूतित्वम्’ यह लक्षण भी अयुक्त है। निर्वचन-कर्ता—गृहीत (ज्ञात) का ज्ञान ही स्मृति है। खंडन—ऐसा लक्षण करने पर धारावाहिक ज्ञान में पूर्व-पूर्व ज्ञान से गृहीत विषय उत्तर-उत्तर ज्ञान का विषय होने से उत्तरज्ञान में अतिव्याप्ति हो जायगी।

१४२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम सापेक्षज्ञानं स्मृतिः, सापेक्षता च स्वविषयनियमे समानविषयज्ञानापेक्षतेति चेन्न । प्रत्यभिज्ञायास्तत्ताभागस्य स्मृतित्वापत्तेः । एवमस्त्विति चेन्न । तर्हि प्रत्य- भिज्ञायां स्मृत्यनुभवभागयोर्भिन्नविषयत्वव्यवस्थितौ तद्भेदः केन गृह्येतेति पूर्व- दोष आवर्तते । संस्कारमात्रजं ज्ञानं स्मृतिरित्यपि न । सामग्रीतः सर्वसम्भवेन लक्षणस्यास- म्भवात् । असाधारणतद्धेतुकधीत्वमिति चेन्न । आत्मप्रत्यभिज्ञानेऽप्यापत्तेः, आत्म- मनोयोगस्य साधारण्यात् । निर्वचन—'स्वविषय के नियम में समानविषयक ज्ञान की अपेक्षा रखनेवाले ज्ञान' को स्मृति कहेंगे। खण्डन—ऐसा लक्षण करने पर 'तद् एव इदम्' इस प्रत्यभिज्ञा में तत्तांश में अतिव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि प्रत्यभिज्ञा भी तत्तांश में समानविषयक अनुभव की अपेक्षा करती है । यदि प्रत्यभिज्ञा को तत्तांश में स्मृति मान लें, तो पूर्वदोष की ही आवृत्ति हो जायगी, अर्थात् 'प्रत्यभिज्ञा को 'तत्ता'-अंश में स्मृति और 'इदम्' अंश में अनुभवरूप भिन्न-भिन्न विषयक मान लेने पर उन दोनों का अभेद रूप अंश किससे गृहीत होगा ? निर्वचन—केवल संस्कारजन्य ज्ञान को ही स्मृति कहेंगे । खंडन—सभी कार्य कारणसामग्री से ही उत्पन्न होते हैं, कोई भी कार्य एक कारण से उत्पन्न नहीं होता । अतः स्मृति भी केवल संस्कार से जन्य न होने से उक्त लक्षण में असम्भव हो जायगा । स्मृति में भी आत्म-मनोयोग आदि अनेक कारण हुआ ही करते हैं । निर्वचन—'संस्कार है असाधारण कारण जिसका, वह ज्ञान स्मृति है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—'सोऽहम्' इस आत्मविषयक प्रत्यभिज्ञा का भी संस्कार ही असाधारण कारण है, अतः प्रत्यभिज्ञा में उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । आत्म-मनःसंयोग ज्ञानमात्र के प्रति कारण होने से वह प्रत्यभिज्ञा का असाधारण कारण नहीं हो सकता । यदि कहें कि संस्कार भी स्मृति का कारण होने से प्रत्यभिज्ञा का असाधारण कारण नहीं है, तो हम भी कह सकेंगे कि संस्कार प्रत्यभिज्ञा का कारण होने से स्मृति का भी असाधारण कारण नहीं है । फलतः लक्षण में असम्भव दोष हो जायगा ।

परिच्छेद ] स्मृति-लक्षण का खंडन १४३ कार्यैक्यानवधारणे च कारणत्वानवधारणात् । तदैक्ये च तदेव लक्षणं स्यात् । येन ज्ञानेनार्थो ज्ञाततात्मकः क्रियते, तदनुभवः । येन तु ज्ञानमेव तथा, तत् स्मरणमिति चेन्न । ज्ञातो ज्ञास्यते चेत्यनुमानादावव्याप्तेः । ततश्च विषयतः स्मृतिविवेचनमन्ततो वाक्येनाप्यनुभाव्यत्वात् कार्यकारणाभ्यां चानुगतरूपस्य प्रागसिद्धेः, जातितश्च सङ्करप्रसङ्गादशक्यमिति । किञ्च—'स्मृतिं प्रति संस्कारः कारणम्' इस कार्य-कारणभाव की सिद्धि के बिना उक्त लक्षण संभव नहीं और उक्त कार्यकारणभाव कार्यता के अवच्छेदक स्मृतित्वजाति की सिद्धि के बिना हो नहीं सकता, कारण प्रत्यभिज्ञा में अनुभवत्व के साथ साङ्कर्य होने से स्मृतित्वजाति अद्यावधि सिद्ध ही नहीं हुई है। कथञ्चित् सिद्ध भी हो जाय, तो लाघव या पूर्व उपस्थित होने से स्मृतित्व ही लक्षण होगा, ‘संस्कारासाधारणकारणकत्व’रूप लक्षण में कोई प्रमाण नहीं है । निर्वचन—'जिस ज्ञान से अर्थ ( विषय ) ज्ञाततारूप धर्म से युक्त किया जाय, वह ज्ञान अनुभूति है' और 'जिसमें ज्ञाततायुक्त ही ज्ञाततायुक्त किया जाय, वह स्मृति है' ऐसे लक्षण करेंगे । खंडन—तब तो ज्ञात ( अतीत ) और ज्ञास्यमान ( अनागत ) विषय की अनुमिति के स्थल में ज्ञातता की उत्पत्ति ही नहीं होगी; क्योंकि वहां विषयरूप अधिकरण उस काल में नहीं है । एवञ्च उक्त लक्षण भूत-भविष्यत् स्थल में न जाने से वहां अव्याप्ति हो जायगी। किञ्च--वर्तमान विषयस्थल में अनुमिति में स्मृतिलक्षण की अतिव्याप्ति भी हो जायगी, क्योंकि अनुमिति ज्ञात को ही विषय करती है, अतः वह ज्ञातताविशिष्ट ही है । तस्मात् ‘ज्ञातो घटः’ इस अनुव्यवसाय-स्थल में ज्ञानसम्बन्ध भासता है, ज्ञाततारूप अपूर्व धर्म नहीं । अन्यथा यदि ज्ञान-स्थल में ज्ञातता की उत्पत्ति मानें, तो तुल्ययुक्ति से इच्छा और कृति में इष्टता और कृतता भी माननी पड़ेगी; पर वैसा न मानते । यद्यपि 'गृहीतविषयकं ज्ञानं स्मृतिः' यह वाक्य लक्षण को प्रतिपादन करता है, तथापि लक्षणघटकतया गृहीत अर्थ को भी प्रतिपादन करता ही है। अतः उस अंश में गृहीतविषयक होने से लक्षणवाक्यजन्य बोध में स्मृतिलक्षण की अतिव्याप्ति होगी, विषयकृत तथा अनुगत स्मृतित्वादिरूप के सिद्ध होने से कार्यकारणभावकृत और साङ्कर्य होने से जातिकृत स्मृति का भी निर्वचन सम्भव नहीं ।