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कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

साधनमाला ४६ है, उसे असीम पुण्य मिलता है और जो भी उसकी मनोकामना हो, वह पूर्ण होती है । सभी संक्रान्ति-पर्वों में १ गौरी-शिव, २ रमा-विष्णु ३ वाणी- ब्रह्मा, ४ शची-इन्द्र, ५ रोहिणी-चन्द्र, ६ स्वाहा-अग्नि, ७ प्रभा-रवि, ८ भद्रकाली-वीरभद्र और ९ भैरवी-भैरव इन नौ युगलों की पूर्वोक्त विधि से पूजा करे । 'ॐ ॐ ॐ गौरीशिवेभ्यः नमः' आदि नाम- मन्त्रों से उक्त मिथुनों का गन्ध-पुष्पादि से पूजन कर उन्हें प्रौढ़ान्तोल्लास से युक्त ध्यान करे । इस प्रकार पूजन करने से ये मिथुनदेवता प्रसन्न होकर साधक के मनोरथ को पूर्ण करते हैं । प्रतिवर्ष जो यह पूजन करता है, वह सभी ऐश्वर्यों से युक्त होकर उक्त मिथुनलोकों में निवास करता है । वैशाख मास की शुक्ल प्रतिपदा के दिन ब्राह्ममुहूर्त में उठकर स्नान-सन्ध्यादि से निवृत्त हो मनोरम एकान्त स्थान में पूर्व की ओर मुख करके बैठे । फिर विधिपूर्वक अपने आपको गन्ध-पुष्पों से अलंकृत कर पूर्वोक्त न्यास कर देवताभाव को प्राप्त करे । सूर्य- मण्डल के कुछ उदित होने पर इष्टदेवता का आवरणों के सहित ध्यान कर षोडशोपचारों से चक्रपूजा-युक्त पूजन करे । इसके बाद कुलदीपों से नीराजन कर गुरुरूप शिव को भक्ष्य-भोज्यादि-सहित अर्घ्य निवेदित करे और उनके प्रसाद को शक्ति के साथ यौवनोल्लास से युक्त होकर निर्विकार चित्त से पान करे । देवी के उक्त मण्डल का ध्यान करते हुए १०८ बार जप करे । फिर जपफल समर्पित कर पूजा और देवता का विसर्जन करे । इस प्रकार शुक्ल प्रति- पदा के शुभ दिन से प्रारम्भ कर कृष्ण चतुर्दशी के दिन तक जप- पूजा करे और अमावास्या के दिन कृपणता छोड़कर यथाशक्ति तीन, पाँच या सात शक्तियों तथा कौलिकों का पूजन करे । एक मास तक जो यह सूर्योदय का अर्चन करता है, उससे देवता फा० ४

५० हिन्दी कुलार्णव सन्तुष्ट होता है और उसके अभीष्ट पद को प्रदान करता है। इसी क्रम से मध्याह्न या सायाह्न में भी पूजा की जा सकती है। उसका भी वही माहात्म्य है। जो साधक तीनों सन्ध्याओं में एक मास तक यह पूजा करता है, वह सिद्ध होकर पृथ्वी पर देववत् विहार करता है। माघ शुक्ल की प्रतिपदा के दिन निराहार रहकर स्नानपूर्वक श्वेत वस्त्र पहन सायं सन्ध्या करे। फिर पूर्वोक्त विधि से सभी द्रव्यों से युक्त होकर चिद्रूपा देवता का ध्यान करते हुए चन्द्रमा के अस्त होने के समय तक एकाग्रचित्त से जप करे। इस प्रकार शुक्ल चतुर्दशी तक प्रतिदिन पूजन करे। पूर्णिमा के दिन यथा- शक्ति शक्तियों और कौलिकों की पूजा करे। भक्तिपूर्वक शुक्लपक्ष का यह पूजन जो साधक करता है, वह सभी ऐश्वर्यों से युक्त होकर सब लोगों से पूजित होता है और शिव-सान्निध्य को प्राप्त करता है। शुक्लपक्ष के ही समान कृष्णपक्ष का पूजन भी वैसा ही फलप्रद है। इस संसार में देववत् सभी सुखों का उपभोग कर वह परमपद को पाता है, इसमें सन्देह नहीं। कार्तिक मास की शुक्ल प्रतिपदा को स्नान-उपासना के द्वारा विशुद्धात्मा हो पूर्वोक्त न्यासों को करे। फिर जीवलोक के सो जाने पर आनन्दपूर्वक महानिशा में पूर्वोक्त विधि से सभी द्रव्यों से युक्त होकर पाँच रङ्गों के चूर्ण से चित्रित अष्टदलकमल बनावे। उस पर कांसे का सुन्दर कलश मधु से भरकर स्थापित करे। कलश पर घृत का दीपक जलाकर स्थापित करे। दीपक की बत्ती अनामिका के समान मोटी हो। उत्तर की ओर मुखकर साधक कलश के सामने बैठे और उक्त दीपक की ज्योति में आवरण- सहित देवी का ध्यान कर विधिवत् उसकी पूजा करे। फिर यौवनोल्लास से युक्त होकर दीपस्थ देवता का स्मरण करते हुए एकाग्र मन से १०८ बार जप करे। इस प्रकार कृष्ण चतुर्दशी

साधनमाला ५१ के दिन तक पूजा करे । अमावास्या के दिन भक्ति-पूर्वक कुलशक्तियों का पूजन करे । ऐसा करने से साधक देवता का प्रीतिपात्र होता है और सब प्रकार के ऐश्वर्य से युक्त होकर सबसे सम्मानित होता है । आगमोक्त विधि से विशेष दिवसों में जो पूजन करता है, वह हम दोनों का प्रियपात्र होता है और सद्गति को प्राप्त करता है । अतः प्रयत्नपूर्वक सब दशाओं में कुलपूजा करनी चाहिये क्योंकि कुलपूजा से अभीष्ट फल मिलता है । विशेष दिवसों में साधकों को देखकर सभी लोग हर्षित होते हैं और सोचते हैं कि क्या ही अच्छा होता, यदि वे स्वयं भी पूजा कर सकते । इसलिये चाहे अपने कल्याण के लिये या दूसरे के हित के लिए पवित्र द्रव्यों से युक्त होकर चक्रपूजा-पूर्वक विशेष दिवसों का अर्चन किया करे । इस प्रकार हे कुलेशानि ! विशेष दिवसों का कुछ अर्चन-विधान मैंने संक्षेप में कहा । अब तुम क्या सुनना चाहती हो ?

ग्यारहवां उल्लास कुलाचार-कथन देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं कुलाचार-क्रम को सुनना चाहती हूँ । कृपया उसे कहिए । ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो। स्नान किये बिना या गन्ध, पुष्प, वस्त्रादि से अलंकृत हुए बिना या शरीर में न्यास किये बिना कुलपूजा नहीं करनी चाहिये । मांस के बिना पूजा, मद्य के बिना तर्पण और शक्ति के बिना जो पान किया जाता है, वह निष्फल होता है । चक्रपूजा अकेले न करे और न एक पात्र में पूजन करे । न एक हाथ से पूजा करे और न एक हाथ से पान करे । पशु के निकट मत्स्य-मांस और आसव के द्वारा पूजन न करे । प्रणाम कर चक्र में प्रवेश करे और प्रणाम करके ही उससे बाहर जाय । हे देवि ! श्रीचक्र का दर्शन करने से नेत्रों के पाप नष्ट होते हैं । कुलाचारी के गृह में पहुँचने पर माँग कर अमृतान्न ग्रहण करे । उसके अभाव में जल पिये । कुलाचारी के द्वारा दिये हुए पात्र को नमस्कार कर ग्रहण करे । यदि गुरुदेव या उनके पुत्र या अपने से ज्येष्ठ कौलिक उसी ग्राम या नगर में निवास करते हैं, जहाँ कि साधक रहता है, तो उनकी अनुमति से ही कुलद्रव्यों का सेवन करना चाहिये । अन्यथा पाप होता है । चक्र के मध्य में शुद्ध होने के विचार से जो हाथ आदि धोता है, वह मूर्ख आपत्ति में पड़ता है। जो इस अवसर पर मल-मूत्र- अधोवायु का विसर्जन करता है, उसे पातक लगता है। चक्र के बीच में घट के टूट जाने या पात्र के गिर जाने या दीपक के बुझ जाने से जो दोष होता है, उसकी शान्ति के लिए पुनः श्रीचक्र-

उल्लास-युक्त होकर कोई कौलिक यदि पशु का साथ करता

साधनमाला ५३ पूजा करनी चाहिये। परिहास, प्रलाप, अति वार्तालाप, उदासीनता, भय, क्रोध आदि से चक्र के समय में बचना चाहिये। हाथ में पात्र लेकर चक्र में घूमना-फिरना नहीं चाहिये। पूर्णपात्र ग्रहण कर अधिक देर तक न बैठे। हाथ में पात्र हो, तो बातचीत न करे। एक हाथ से बिना मुद्रा के पात्र न दे। न उसे स्थान से हटावे और न अन्य पात्रों में उसे मिलने दे। शब्द करते हुए द्रव्य का पान न करे और न ही पात्र को पूर्ण करते समय शब्द करे। एक दूसरे के पात्रों को टकराना नहीं चाहिये। आधार के सहित पात्र को न उठाये और न आधार से वह गिरने पाये। पात्र को सर्वथा खाली न करे। उसे धोकर छिपाकर रखे। उल्लास-युक्त होकर कोई कौलिक यदि पशु का साथ करता है या पश्वाचार-परायण होता है, तो उसके धर्म, अर्थ, आयु, यश, पुण्य, ज्ञान, सुख आदि नष्ट हो जाते हैं। श्रीचक्र-स्थित कुलद्रव्य को जो अपनी इच्छा से या लोभ से या भय से पशुओं को देता है, वह योगिनियों के द्वारा मारा जाता है। चक्र के बीच में शत्रु के भी साथ वाद-विवाद न करे। उसके कठोर वचनों को भी सह ले। अपने कुटुम्बी या प्यारे मित्र को देखकर जैसी प्रसन्नता होती है, वैसी ही प्रसन्नता कौलिक को देखकर जिसे होती है, वह योगिनी का प्रियपात्र होता है। श्री गुरुदेव, कुलशास्त्र और पूज्य स्थानों को भक्तिपूर्वक प्रणाम कर उनका माहात्म्य-वर्णन करना चाहिये। जपकाल को छोड़कर गुरुदेव के नाम का उच्चारण न करे। ‘श्रीनाथदेव स्वामी’ इस नाम से उनका उल्लेख करे। श्रीगुरु- पादुका, मूलमन्त्र और अपनी पादुका शिष्य को छोड़कर अन्य किसी को न बताये। मन्त्रादि गुरुमुख से प्राप्त होने पर ही सफल होते हैं। अपनी पत्नी के समान कुलशास्त्रों का सेवन करे, पशु- शास्त्रों को पराई स्त्री के समान समझे।

५४ हिन्दी कुलार्णव कृष्णांशुका, कृष्णवर्णा, मनोहरा, युवती कुमारी की देवता- रूप में पूजा करे । स्त्रियों का समूह, रक्तवस्त्रा नारी, गुरुदेव की शक्ति, गुरुपुत्र, ज्येष्ठ या कनिष्ठ कौल साधक यदि दिखाई पड़ें, तो उन्हें नमस्कार करे । नग्न या पागल स्त्री का कभी उपहास न करे । अप्रिय और असत्य बात न कहे । दिन में स्त्री-सङ्ग कभी न करे । सौ अपराध करने पर भी स्त्री को पुष्प तक से न मारे । स्त्रियों के दोषों का कभी वर्णन न करे, अपितु उनके गुणों के प्रति ही सदा ध्यान दे । कुलवृक्षों में कुलयोगिनियों का निवास रहता है। अतः उनके पत्तों में विशेषतः अर्कपत्र में भोजन नहीं करना चाहिये । कुलवृक्ष के नीचे न तो सोये और न कोई उपद्रव करे, अपितु उसे देख या सुनकर नमस्कार करे । कभी भी उसे काटे या तोड़े नहीं । श्लेष्मान्तक, करञ्ज, निम्ब, अश्वत्थ, कदम्ब, विल्व, वट, उडुम्बुर- ये कुलवृक्ष माने गये हैं । एकाक्षर के देनेवाले गुरुदेव की जो अवमानना करता है, वह सौ योनियों में घूमता-फिरता हुआ चाण्डाल होता है । श्रीचक्र के वृत्तान्त को, चाहे वह शुभ हो या अशुभ, कभी प्रकट नहीं करना चाहिए । गुरुदेव का नाम तो प्रकट करे किन्तु अपना मन्त्र कभी किसी को न बताना चाहिये । सभी पापों का प्रायश्चित्त श्री गुरुदेव के नाम का जप करने से हो जाता है । हे कुलेश्वरि ! गुरु को तीन बार आचार का वर्णन करना चाहिये । उस पर भी यदि शिष्य उसका पालन नहीं करता, तो गुरु को पाप नहीं होता । इस प्रकार संक्षेप में मैंने कुलाचार की विधि कही । अब तुम क्या सुनना चाहती हो ?

बारहवां उल्लास पादुका-कथन देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं पादुका की भक्ति के लक्षण और उससे सम्बन्धित आचार के विषय में सुनना चाहती हूँ। ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो। असंख्य महादानों, महाव्रतों और महाज्ञानों से अधिक फलदायिका श्रीपादुका है। कोटि मन्त्रजप से, पुण्यतीर्थों के स्नान से और कोटि देवपूजन से बढ़कर पुण्यदा श्रीपादुका है। विषम रोग, विकट उपद्रव, महान् भय और बड़ी से बड़ी आपत्ति में स्मरण करने से श्रीपादुका रक्षा करती है। श्रीनाथ के चरणकमल जिस दिशा में विराजते हों, उस दिशा को प्रतिदिन नमस्कार करे। ध्यान का मूल श्री गुरुदेव का स्वरूप है, पूजा का मूल श्रीगुरुदेव के चरण हैं, मन्त्र का मूल श्रीगुरुदेव के वचन हैं और मोक्ष का मूल श्रीगुरुदेव की कृपा है। हे कुलनायिके ! इस संसार में सभी क्रियाओं के मूलाधार श्रीगुरु- देव ही हैं। अतः उनकी नित्य भक्तिपूर्वक सेवा करे। गुरु को मनुष्य, मन्त्र को अक्षर और प्रतिमा को पत्थर जो समझता है, वह नरक को प्राप्त करता है। गुरु को मरणशील समझनेवाला कभी मन्त्रसाधना या देवार्चन में सफल मनोरथ नहीं हो सकता। जन्म देने के कारण माता-पिता पूज्य होते हैं और श्रीगुरुदेव धर्माधर्म के प्रदर्शक होने से और भी अधिक पूज्य हैं। शिव के रुष्ट होने पर गुरु रक्षा कर सकते हैं किन्तु गुरु

५६ हिन्दी कुलार्णव के रुष्ट होने पर कोई भी नहीं बचा सकता। अतः मनसा, वाचा, कर्मणा गुरु को जो प्रिय हो, वैसा ही आचरण करना चाहिये। गुरु यदि निकट हों, तो उन्हें मन ही में नमस्कार न करे, अपितु यदि गुरु-शिष्य एक ही स्थान में निवास करते हों, तो शिष्य को तीनों सन्ध्याओं में प्रतिदिन गुरु को प्रणाम करना चाहिये। आधे योजन की दूरी पर रहनेवाला शिष्य पाँचों पर्वों में आकर गुरु को प्रणाम करे। एक योजन से बारह योजन तक की दूरी पर रहनेवाला शिष्य अपनी इच्छानुसार आकर उन्हें प्रणाम करे। खाली हाथ राजा, देवता और गुरु के पास न जाये। यथा- शक्ति फल, फूल, वस्त्रादि से उनका अभिनन्दन करे। गुरुशक्ति, गुरुपुत्र और गुरु के ज्येष्ठभ्राता का गुरुवत् आदर करे। छोटों को अपने पुत्रवत् समझे। इस प्रकार संक्षेप में मैंने तुमसे पादुका-भक्ति के लक्षण और आचार बताये। अब क्या सुनना चाहती हो ?

तेरहवां उल्लास गुरु-शिष्य-लक्षण देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं गुरु-शिष्य दोनों के लक्षण सुनना चाहती हूँ । ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो । परशिष्य, पाखण्डी, घमण्डी, विकृताङ्ग, मलिन, रोगी, आलसी, द्यूतादिव्यसनी, देश- द्रोही, नीरस, धूर्त, छिद्रान्वेषी, कृतघ्न, विश्वासघाती, आततायी, मिथ्यावादी, गँवार, बहुभाषी, कुतर्की, झगड़ालू, मूर्ख, आत्म- प्रशंसक आदि दोषयुक्त व्यक्ति को 'शिष्य' न बनाये । कुलधर्मप्रेमी, कुलार्चनकारी, जपध्यानादिकर्ता और कुलशास्त्र के जिज्ञासु आदि गुणयुक्त व्यक्ति को 'शिष्य' बनाये । शुद्धवेशधारी, मनोहर, आगमज्ञाता, तन्त्रशास्त्रज्ञ, भ्रम- संशयनाशक, अन्तर्मुखी होते हुए भी बहिर्दृष्टि रखनेवाले, सर्वज्ञ, निग्रह-अनुग्रह में समर्थ, शान्तस्वभाववाले, दयालु, जितेन्द्रिय, अग्रगण्य, गम्भीर, सन्तुष्ट, धैर्यवान्, प्रसन्नमुख, नित्य-नैमित्तिक- काम्य कर्मों में तत्पर रहनेवाले, स्त्रीधनादि में अनासक्त आदि गुणयुक्त महानुभाव को 'गुरु' बनाये । घृणा, लज्जा, भय, शोक, जुगुप्सा, कुलशील और जाति— ये आठ पाश कहे गये हैं । इनसे बँधा हुआ व्यक्ति 'पशु' माना जाता है । इन पाशों से छूटकर वह महेश्वरवत् हो जाता है । अतः उक्त पाशों को जो दूर करता है, वही गुरु है । जो सच्चिदानन्द को जानता है और इन्द्रियजन्य सुख से जो छुटकारा दिलाता है, वह गुरु है । ऐसे ही गुरु की शिष्यों को सेवा करनी चाहिये ।

५८ हिन्दी कुलार्णव वेद और शास्त्रादि के जाननेवाले गुरु तो बहुत हैं किन्तु परम- तत्त्व के ज्ञाता गुरु कठिनाई से मिलते हैं। निगम और आगम शास्त्रों में कथित मन्त्रों को जो जानते हैं, ऐसे गुरु दुर्लभ हैं। शिष्य से धन लेनेवाले गुरु बहुत मिलते हैं, किन्तु शिष्य के दुःख को दूर करनेवाले गुरु कम मिलते हैं। गुरु वही है, जिसके स्पर्श- मात्र से परम आनन्द की प्राप्ति होती है। ऐसे ही महापुरुष को गुरु बनाना चाहिए। प्रेरक, सूचक, वाचक, दर्शक, शिक्षक और बोधक—ये छहः प्रकार के गुरु कहे गये हैं। इनमें से पाँच तो कार्यभूत होते हैं, छठा 'बोधक' गुरु कारण होता है। जो गुरु पूर्णाभिषेक करता है, उसी की पादुका हे महेशानि ! पूजनीया है। संशय को दूर करने- वाले, ज्ञानदायक सद्गुरु को पाकर दूसरे गुरु का आश्रय नहीं लेना चाहिये। यदि गुरु अनभिज्ञ हो, उसके द्वारा संशय का निरा- करण न होता हो, तो दूसरे गुरु के पास जाने में दोष नहीं है। जिस प्रकार शहद का लोभी भौंरा एक फूल से दूसरे फूल को जाता रहता है, उसी प्रकार ज्ञान के लोभी शिष्य को एक गुरु से दूसरे गुरु के पास जाना चाहिये। इस प्रकार संक्षेप में मैंने तुमसे गुरु-शिष्य के लक्षण कहे। अब हे कुलेशानि ! क्या सुनना चाहती हो ?

चौदहवां उल्लास गुरु-शिष्य-परीक्षा देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं गुरु और शिष्य की परीक्षा के सम्बन्ध में सुनना चाहती हूँ। साथ ही उपदेश का क्रम और दीक्षा के भेद भी बताइये। ईश्वर ने कहा—हे देवि ! शिष्य की विधिवत् परीक्षा लेने के बाद ही गुरु को उसे मन्त्रोपदेश करना चाहिये, अन्यथा वह निष्फल होता है। इसी प्रकार गुरु के सम्बन्ध में समुचित रूप से जानकारी प्राप्त कर जब सन्तुष्ट हो जाय, तभी उनसे शिष्य को मन्त्रोपदेश ग्रहण करना चाहिये। यदि कोई गुरु और शिष्य मोहवश एक दूसरे की परीक्षा किये बिना ही उपदेश देते और लेते हैं, तो वे दोनों ही अनेक वर्षों तक नरक में वास करते हैं। शिष्य के ज्ञान और क्रिया दोनों की परीक्षा एक वर्ष तक या छः मास तक या तीन मास तक लेनी चाहिये। जो आकृष्ट करने से या प्रताड़ित करने से दुःखी न होकर सदा यही सोचे कि यह गुरु की कृपा ही है और श्रीगुरु का स्मरण, कीर्तन, दर्शन, वन्दन, आज्ञापालनादि करने में जिसे आनन्द अनुभव हो, वह शिष्य बनाये जाने योग्य है। जिस विज्ञ पुरुष को जप, स्तोत्र, ध्यान, होमार्चनादि के करने में आनन्द मिलता हो; जो ज्ञानोपदेश करने में निपुण हो और जो मन्त्र में सिद्धिप्राप्त हो—ऐसे महापुरुष को 'उद्बोधक' जानकर गुरुरूप में स्वीकार करे।

६० हिन्दी कुलार्णव कर्मकाण्ड से रहित दीक्षा-विधि तीन प्रकार की कही गई है—१ स्पर्शदीक्षा, २ दृग्दीक्षा, ३ वेधदीक्षा। मोक्षदायिनी दीक्षा के सात प्रकार बताए गये हैं—१ समया, २ साधिका, ३ पुत्रिका, ४ वेधिका, ५ पूर्णा, ६ चर्या, ७ निर्वाण। कलश, मण्डपादि से युक्त क्रियादीक्षा गुरुदेव को बाह्य विधानानुसार करनी चाहिए। यह क्रियादीक्षा आठ प्रकार की मानी गई है। पापहरी वर्णदीक्षा बयालीस, पचास या बासठ अक्षरों के न्यास के भेद से तीन प्रकार की है। इसमें शिष्य के शरीर में वर्णों का न्यास कर उसमें देवत्व का भाव जाग्रत् किया जाता है। कलादीक्षा में पैरों के तलवे से लेकर घुटनों तक निवृत्ति, घुटनों से नाभि तक प्रतिष्ठा, नाभि से कण्ठ तक विद्या, कण्ठ से ललाट तक शान्ति और ललाट से शिर तक शान्त्यतीता इन पाँच कलाओं का, फिर पुनः संहारक्रम से इन्हीं कलाओं का एक स्थान से दूसरे स्थान तक न्यास किया जाता है, जिससे शिष्य को दिव्यभाव प्राप्त होता है। श्रीगुरुदेव अपने हाथ में शिव का ध्यान कर मूल अङ्गमालिनी का जप कर अपने शिष्य को छुयें। इस प्रकार 'स्पर्शदीक्षा' होती है। अपने चित्त को तत्त्व में स्थित कर परतत्त्व से उत्प्रेरित होकर मन्त्रज्ञाता गुरु मन्त्रोपदेश करें। इसे 'वाग्दीक्षा' कहते हैं। आँखों को बन्द कर परतत्त्व का ध्यान करते हुए प्रसन्न-बुद्धि से यदि गुरुदेव शिष्य को देखें, तो इससे 'दृग्दीक्षा' होती है। गुरु के दर्शन, भाषण, स्पर्शमात्र से जब तुरन्त ज्ञान होता है, तो वह 'शाम्भवी' दीक्षा कहलाती है। 'मनोदीक्षा' तीव्रा और तीव्रतमा दो प्रकार की है। शिष्य के देह में छः अध्वानों का स्मरण करते हुए गुरुदेव जब वेध करते हैं, तब शिष्य पापों से मुक्त और छिन्नपाश होकर बाह्य क्रिया-व्यापार से शून्य होकर पृथ्वी पर गिर पड़ता है। दिव्यभाव

साधनमाला ६१ को प्राप्त होकर वह सर्वज्ञ हो जाता है। यही भवबन्धमोचिनी और शिवभावप्रदायिनी तीव्रतरा दीक्षा है। वेध की छः अवस्थायें मानी गई हैं—१ आनन्द, २ कम्प, ३ उद्भव, ४ घूर्णा, ५ निद्रा और ६ मूर्च्छा। वेधदीक्षा होने पर शिष्य में ये छः गुण दिखाई पड़ते हैं। कुलद्रव्यों से सविधि पूजन कर शिष्य को उनका दर्शन कराये, यह 'कौलिकी दीक्षा' है। मुख में पञ्चगव्यामृत से युक्त शिवद्रव्य को भरकर गुरुदेव शिष्य का गण्डूष के द्वारा अभिषेक करें। तब सजीव मीन से युक्त और सुरा अथवा पञ्चामृत से पूर्ण शंख या कलश के द्वारा बाह्य अभिषेक करें। इस प्रकार 'पूर्णाभिषेक' से जो पवित्र होते हैं, वे शिव के सायुज्य को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार दीक्षा के दो मुख्य भेद हैं—१ बाह्य और २ आभ्यन्तर। क्रियादीक्षा बाह्य है और वेध आभ्यन्तरी। शरीर का न तो संस्कार होता है, न उसकी कोई जाति है और न कोई कर्म। 'आत्मा' की ही दीक्षा होती है, जो अनादि कुलकुण्डली है। हे देवि ! मन्त्रौषधि के द्वारा जिस प्रकार विष का प्रभाव नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार मन्त्रज्ञ गुरु दीक्षा के द्वारा शिष्य के पशुपश को छिन्न-भिन्न कर देते हैं। सविधि दीक्षा के होने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और ज्ञान की प्राप्ति होकर शिष्य शिवरूप हो जाता है। दीक्षा होने से आत्मा शिवत्व को प्राप्त करती है। शूद्र की शूद्रता चली जाती है और विप्र की विप्रता। दीक्षा संस्कार से युक्त होने पर जाति की भिन्नता नहीं रह जाती। दीक्षा के बिना जो भी जपपूजादि क्रिया की जाती है, वह निष्फल होती है। अतः प्रयत्न करके गुरु से दीक्षा प्राप्त करे। —:❀:—

पन्द्रहवाँ उल्लास पुरश्चरण-कथन देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं पुरश्चरण के लक्षण सुनना चाहती हूँ । स्थान, आहारादि भेद मुझे बताइए । ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो । जपयज्ञ से बड़ा अन्य कोई यज्ञ नहीं है । इसलिये जप के द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करे । सब धर्मों को छोड़कर बिना किसी प्रमाद के मन्त्रराज का अभ्यास करे । प्रमाद अर्थात् विधि की उपेक्षा करने से हानि होती है । संसार तो दुःख का स्थान है । यदि आत्म- सफलता चाहिये, तो पञ्चाङ्ग उपासना करे, जिससे मन्त्रजप करने- वाला सुखी होता है । तीनों काल की नित्यपूजा, जप, तर्पण, होम और ब्राह्मण- भोजन यही पुरश्चरण कहा जाता है । जो अङ्ग न हो, उसकी संख्या का दुगना मन्त्र जप करे अन्यथा अङ्गहीनता के दोष से अभीष्ट फल की प्राप्ति नहीं होती । चतुर्विध अन्न के पदार्थों से, जो छः रसों से युक्त हों, विप्रों को भोजन कराकर सन्तुष्ट करे, तो सभी कर्म सफल होते हैं । इस पञ्चाङ्ग उपासना से जो एक मन्त्र को सिद्ध कर लेता है, उसे सभी मन्त्र हे कुलेश्र्वरि ! आपकी कृपा से सिद्ध हो जाते हैं । उपदेश के सामर्थ्य, श्रीगुरुदेव की प्रसन्नता और मन्त्र के प्रभाव से मन्त्रसिद्धि होती है । तीर्थस्थान, नदीतट, गुफा, पर्वत-शिखर, नदियों का सङ्गम- स्थल, तपोवन, उद्यान, विल्वमूल, पर्वत-तट, देवमन्दिर, समुद्रतट

साधनमाला ६३ और अपना घर—मन्त्र-साधक के लिये ये स्थान प्रशस्त हैं। अथवा जहाँ प्रसन्नता अनुभव हो, वहीं बैठे। सूर्य, अग्नि, गुरु, चन्द्रमा, दीपक, रथ, गो और कुलवृक्ष के समीप जप करना श्रेयस्कर है। घर में सौ गुना, गोष्ठ में लाख गुना, देवमन्दिर में करोड़ गुना और शिव के निकट जप करने का अनन्त फल होता है। तूल, कम्बल वस्त्र या सिंह-व्याघ्र-मृगचर्म का आसन बनाये, जो सौभाग्य तथा ज्ञान की वृद्धि कराये। पद्म, स्वस्तिक, वीरादि आसनों से बैठकर जपर्चन आदि करे। अन्यथा फल नहीं मिलता। पूरक, कुम्भक और रेचक-युक्त प्राणायामत्रय से मानस, वाचिक और कायिक सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। आग- मोक्त विधि से जो नित्य न्यास करता है, वह देवभाव को पाकर मन्त्रसिद्धि को प्राप्त करता है। न्यास, कवच और छन्द से युक्त मन्त्र का जो जप करता है, उसके सभी विघ्न दूर हो जाते हैं। अक्षमाला दो प्रकार की होती है—कल्पित और अकल्पित। कल्पित अनेक प्रकार की मालाओं से है और अकल्पित मातृकाओं से है। 'अ' से 'क्ष' तक के अक्षरों से निर्मित होने के कारण इसे 'अक्षमाला' कहते हैं। अनुलोम-विलोम से गणना करे। अंगुष्ठ से मोक्ष, तर्जनी से शत्रुनाश, मध्यमा से धनप्राप्ति, अनामिका से शान्तिकर्म, कनिष्ठा से स्तम्भन और अँगुलियों से आकर्षण होता है। 'इतना जप करूँगा' इस प्रकार पहले सङ्कल्प कर स्थिर आसन से बैठकर जपपूर्वक देवी को जल-सहित समर्पण करे। जप तीन प्रकार का है--उच्च स्वर से अधम, उपांशु मध्यम और मानस उत्तम। बहुत धीमे जप करने से रोग होता है और बहुत तेज जप करने से तप का नाश होता है।

६४ हिन्दी कुलार्णव मन में स्तोत्र का स्मरण करना और वाणी से मन्त्र का उच्चारण करना—इन दोनों का कोई फल नहीं होता। जात- सूतक और मृतसूतक—इन दो सूतकों से युक्त मन्त्र से सिद्धि नहीं मिलती। मन्त्रार्थ, मन्त्र चैतन्य और योनिमुद्रा को जो नहीं जानता, वह कितना ही जप क्यों न करे, सफल-मनोरथ नहीं होता। बहुकूटाक्षर, मुग्ध, बद्ध, क्रुद्ध, स्तम्भित, मूर्छित, खण्डित, पराङ्मुख, बधिर, अन्ध, क्षुधित, स्थानदुष्ट, निर्जीव, शप्त आदि अनेक दोष मन्त्र में होते हैं। इन्हें दूर करने के लिए १ जनन, २ जीवन, ३ ताड़न, ४ बोधन, ५ अभिषेक, ६ विमलीकरण, ७ आप्यायन, ८ तर्पण, ६ दीपन और १० गुप्ति ये दस मन्त्र संस्कार बताये गये हैं। इन संस्कारों के करने से मन्त्र स्फूर्तियुक्त हो उठते हैं। पुरश्चरण-काल में हविष्य, विहित शाक और विहित फल खाये। जिसका अन्नादि पुरश्चरणकर्ता खाता है, वह आधे फल का अधिकारी होता है। अतः पुरश्चरण-काल में दूसरे के अन्न को न ग्रहण करे। कहा भी है कि 'दूसरे के अन्न से जिसकी जीभ जली हुई है, दान लेने से जिसके दोनों हाथ जले हुये हैं और पराई स्त्री का चिन्तन करने से जिसका मन जला हुआ है, उसे कार्य में कैसे सफलता मिल सकती है!' मन्त्र के सम्बन्ध में यह विचार पहले कर ले कि वह अरि है या मित्र, ऋणी है या धनी। हाँ, स्त्री के द्वारा प्रदत्त या स्वप्न में प्राप्त मन्त्र के सम्बन्ध में इस विचार के करने की आवश्यकता नहीं है। इसी प्रकार सिद्ध पुरुष के द्वारा उपदिष्ट और माला- मन्त्रों के लिये भी विचार नहीं किया जाता।

साधनमाला ६५ शान्त, पवित्र, अल्पाहारी, भूमि पर शयन करनेवाला, भक्ति- मान्, अनुशासनपूर्ण, स्थिरचित्त और मौनी होकर जप करे । साथ ही विश्वास, आस्तिकता, करुणा, श्रद्धा, सन्तोषादि गुणों से युक्त रहे । सुगन्धि, पुष्प, आभूषण और वस्त्रों से अपने शरीर को अलंकृत किये रहे । जप करते-करते यदि थकावट प्रतीत हो, तो पुनः ध्यान करे । ध्यान करने से थकावट आने पर पुनः जप करे । इस प्रकार पुरश्चरण करने से निश्चय ही सिद्धि मिलती है । इस प्रकार मैंने पुरश्चरण के कुछ लक्षण संक्षेप में तुमसे कहे । अब हे कुलेशानि ! तुम क्या सुनना चाहती हो ? ५

सोलहवां उल्लास काम्यकर्म का विधान देवी ने कहा—हे दयासागर कुलेश ! मैं काम्य कर्म के विधान को सुनना चाहती हूँ । उसे बताइये । ईश्वर ने कहा—तुम जो पूछती हो, उसे मैं कहूँगा । विशुद्ध हृदय से मन्त्र-साधक श्रीप्रासाद परामन्त्र का पाँच लाख जप करे । जप की दशांश संख्या का हवन करे, दशांश तर्पण करे और उत्तम भोजन, दक्षिणा आदि से यथाशक्ति योगिनियों को सन्तुष्ट करे । इस प्रकार न्यास, जप, ध्यानपूर्वक होमार्चन और तर्पण से मन्त्र- सिद्ध होकर साधक साक्षात् शिवरूप हो जाता है । तब वह अभीष्ट प्रयोगों का साधन करे । मन्त्रसिद्ध साधक के सभी प्रकार के षट्कर्मादि प्रयोग निश्चय ही सफल होते हैं । काम्य प्रयोग करनेवालों का मोक्ष नहीं होता । उन्हें अपने प्रयोगों में सिद्धि मिलती है; यही उनकी सफलता है । एक विधान से दो फल कहीं भी नहीं मिलते । हे देवेशि ! इसी से देवता का यजन निष्काम भाव से करना चाहिए । षट्कर्मों के प्रयाग अपने और दूसरों के लिये किये जाते हैं । प्रयोग के दोषों की शान्ति के लिये और अपनी रक्षा के लिए न्यास- ध्यानपूर्वक एक लाख जप मन्त्र का कर लेना चाहिए । नहीं तो, सफलता के स्थान पर हानि की संभावना रहती है । ऋषि, छन्द, बीज, शक्ति, कीलक, देवता, अङ्गन्यास, ध्यान और पूजाविधि का ज्ञान प्राप्त कर मन्त्रों को साधना करनी

साधनमाला ६७ चाहिए। पञ्चशुद्धि, आसन, प्राणायाम, माला, दोष-संस्कार- शोधनादि का भी ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए ! हे देवि ! किसी मनोहर स्थान में स्थिर मन होकर साधक सुखासन पर बैठे। फिर गुरु-वन्दनापूर्वक अपने मस्तक में स्थित पूर्णचन्द्र के उज्ज्वल मण्डल का ध्यान करे। उस चन्द्रबिम्ब से निकलती हुई सुधा से अपने शरीर को आप्लावित होता हुआ अनुभव करे। साथ ही षोडशस्वर-युक्त श्रीप्रासाद पर बीज का चिन्तन करता रहे। इस प्रकार १०८ बार श्रीप्रासाद परामन्त्र का जप कर तरुणोल्लास के सहित मण्डल-पूजा करे। इस विधान के फलस्वरूप अकाल मृत्यु, महारोग, वृद्धावस्था एवं मृत्यु-जनित भय, ग्रह, अपस्मार, वेताल, भूत, उन्मादादि के संकट दूर होकर आधि- व्याधि से रहित होकर साधक पुत्र-पौत्रादि से सम्पन्न हो सब लोगों से सम्मानित होता हुआ शतंजीवी होता है। ज्वरोन्मादादि रोगों में शिर में चिन्तन करता हुआ जप करे। शूल, वात, व्रत, ग्रन्थि, मूत्रकृच्छादि के होने पर उन-उन स्थानों का स्पर्श कर पूर्ववत् चिन्तन करता हुआ जप करे। महारोगों के उत्पन्न होने पर सभी अंगों में चिन्तन करे। सिद्धमन्त्री के इस प्रकार ध्यानपूर्वक जप करने पर सभी रोग शान्त हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं। शरीर की इन्द्रियों में जो उक्त प्रकार का ध्यान करता है, उसकी इन्द्रियाँ सुगठित और सुपुष्ट होती हैं। सदैव मूर्ध्नि में ध्यान करने से साधक अजर-अमर होता है। यह फल उक्त सात्विक ध्यान करने से साधक को प्राप्त होता है। सभी शान्ति कर्मों को इसी विधि से सम्पन्न करे। द्वादश आधार पद्मों में द्वादश स्वरों से युक्त बीज का ध्यान करने से साधक अजर-अमर होता है। अथवा षडाधारों में दीर्घस्वरों से युक्त बीज का ध्यान करे। हृदय-कमल की कर्णिका

६८ हिन्दी कुलार्णव के मध्य में सूर्य-मण्डल में स्थित परा प्रासाद बीज का ध्यान इस प्रकार करे कि वह तरुण अरुण के समान प्रकाशमान है, जवा- बन्धूक-पद्मराग जैसी उसकी प्रभा है। पचीस स्पर्शाक्षरों से युक्त उसकी प्रभा से तीनों लोक प्रकाशित हैं और अपने को भी उसी से अभिभूत ध्यान करे। तरुणोल्लास के सहित पराप्रासाद बीज का एक सहस्र आठ बार जप करे। इस विधान से देव, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, किन्नर, विद्याधर, मुनि, यक्ष, नाग, अप्सरायें, स्त्रियाँ, सिंह, व्याघ्र, सर्प आदि सभी साधक के वशीभूत हो जाते हैं। साधारण मनुष्यों की क्या बात है। उक्त राजस ध्यान के फलस्वरूप साधक महान् ऐश्वर्य को प्राप्त कर स्वर्ग के भोगों को पाता है। जिसके मस्तक में स्मरण करते हुए वह जप करता है वह निश्चय ही उसके वश में हो जाता है। इसी प्रकार पराप्रासाद बीज को कल्पान्त की अग्नि की प्रभा- वाला और अपने को कालानल के समान सर्व प्राणियों के लिए भयङ्कर ध्यान करता हुआ दक्षिण मुख बैठकर यौवनोल्लासपूर्वक १००८ बार जप करने से साधक सभी क्रूर, विघ्नकर्ता, दुष्ट और क्लेशकारी प्राणियों का तत्क्षण नाश करने में समर्थ होता है। यह काम्य-कर्म के सम्बन्ध में मैंने तुम्हें कुछ अति संक्षेप में बताया है। अब तुम क्या सुनना चाहते हो ?