भारतकोश
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संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

भगवान्

गीताप्रेस, गोरखपुर

भगवान् शिव-पार्वती

भगवान्

गीताप्रेस, गोरखपुर

उमा हैमवतीदेवी

[चित्र: भगवान् वराहद्वारा भूदेवीका उद्धार]

जगन्नाथ प्रसाद
गीताप्रेस, गोरखपुर

भगवान् वराहद्वारा भूदेवीका उद्धार

बी.के. मिश्र
गीताप्रेस, गोरखपुर

आचार्य उपमन्यु और भगवान् श्रीकृष्ण

गीताप्रेस, गोरखपुर

भगवान् मायावामनका यज्ञवाटमें पूजन

गीताप्रेस, गोरखपुर

सप्ताश्व-वाहन भगवान् सूर्य

गीताप्रेस, गोरखपुर


भगवान्—कूर्मरूपमें

* अध्याय ३ *३३
एकस्मिन्नथवा सम्यग् वर्तेतामरणं द्विजः।<br>श्रद्धावानाश्रमे युक्तः सोऽमृतत्वाय कल्पते॥ १२॥अथवा निष्ठावान् द्विजको चाहिये कि किसी भी एक आश्रममें वह यावज्जीवन ठीक-ठीक व्यवहार करता रहे तो मोक्ष प्राप्त करनेमें समर्थ हो जाता है।
न्यायागतधनः शान्तो ब्रह्मविद्यापरायणः।<br>स्वधर्मपालको नित्यं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥ १३॥न्यायमार्ग (ईमानदारी)-से धन प्राप्त करनेवाला, शान्त, ब्रह्म-विद्यापरायण तथा नित्य अपने धर्मका पालन करनेवाला व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करनेमें समर्थ होता है।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि निःसंगः कामवर्जितः।<br>प्रसन्नेनैव मनसा कुर्वाणो याति तत्पदम्॥ १४॥अपने समस्त कर्मोंको ब्रह्ममें अर्पित कर आसक्तिरहित तथा निष्काम व्यक्ति प्रसन्न-मनसे कर्मोंको करते हुए उस पद (मोक्ष)-को प्राप्त करता है॥ १२-१४॥
ब्रह्मणा दीयते देयं ब्रह्मणे सम्प्रदीयते।<br>ब्रह्मैव दीयते चेति ब्रह्मार्पणमिदं परम्॥ १५॥देने योग्य पदार्थ ब्रह्मके द्वारा ही प्राप्त होता है, ब्रह्मको ही दिया जाता है और ब्रह्म ही दिया भी जाता है—यही श्रेष्ठ ब्रह्मार्पण (-की भावना) है।
नाहं कर्ता सर्वमेतद् ब्रह्मैव कुरुते तथा।<br>एतद् ब्रह्मार्पणं प्रोक्तमृषिभिः तत्त्वदर्शिभिः॥ १६॥मैं कर्ता अर्थात् करनेवाला नहीं हूँ और जो कुछ भी किया जाता है वह ब्रह्म ही करता है—इसे तत्त्वद्रष्टा ऋषियोंने 'ब्रह्मार्पण' नामसे कहा है।
प्रीणातु भगवानीशः कर्मणानेन शाश्वतः।<br>करोति सततं बुद्ध्या ब्रह्मार्पणमिदं परम्॥ १७॥'मेरे इस कर्मसे सनातन भगवान् ईश्वर प्रसन्न हों' इस प्रकारकी बुद्धिसे निरन्तर किया गया कर्म श्रेष्ठ ब्रह्मार्पण है।
यद्वा फलानां संन्यासं प्रकुर्यात् परमेश्वरे।<br>कर्मणामेतदप्याहुः ब्रह्मार्पणमनुत्तमम्॥ १८॥अथवा परमेश्वरमें सभी कर्मोंके फलोंका संन्यास करे—यह भी श्रेष्ठ ब्रह्मार्पण कहा गया है॥ १५-१८॥
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं संगवर्जितम्।<br>क्रियते विदुषा कर्म तद्भवेदपि मोक्षदम्॥ १९॥विद्वान् व्यक्तिके द्वारा आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-बुद्धिसे जो कर्म नियमतः किया जाता है, उसका वह कर्म भी मोक्ष देनेवाला होता है।
अन्यथा यदि कर्माणि कुर्यान्नित्यमपि द्विजः।<br>अकृत्वा फलसंन्यासं बध्यते तत्फलेन तु॥ २०॥इसके विपरीत यदि द्विज नित्य कर्मोंको करता भी रहे तो कर्मफलका संन्यास न करनेके कारण वह उस कर्मफलके बन्धनसे बँधा रहता है।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन त्यक्त्वा कर्माश्रितं फलम्।<br>अविद्वानपि कुर्वीत कर्माज्योत्यचिरात् पदम्॥ २१॥इसलिये अविद्वान् व्यक्तिको भी चाहिये कि सभी प्रकारके प्रयत्नसे कर्मके आश्रित फलका त्यागकर कर्म करता रहे, इससे उसे शीघ्र ही (परम) पद प्राप्त होता है।
कर्मणा क्षीयते पापमैहिकं पौर्विकं तथा।<br>मनः प्रसादमन्वेति ब्रह्म विज्ञायते ततः॥ २२॥(निष्काम) कर्मसे व्यक्तिके इस जन्म तथा पूर्व-जन्मका पाप नष्ट हो जाता है, तदनन्तर चित्तकी प्रसन्नता प्राप्त होती है और फिर (उसे) ब्रह्मका परिज्ञान हो जाता है॥ १९-२२॥
कर्मणा सहिताज्ज्ञानात् सम्यग् योगोऽभिजायते।<br>ज्ञानं च कर्मसहितं जायते दोषवर्जितम्॥ २३॥कर्मयुक्त ज्ञानसे सम्यक् योगकी प्राप्ति होती है और कर्मयुक्त ज्ञान दोषरहित होता है।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तत्र तत्राश्रमे रतः।<br>कर्माणीश्वरतुष्ट्यर्थं कुर्यान्नैष्कर्म्यमाप्नुयात्॥ २४॥इसलिये किसी भी आश्रममें रहते हुए सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे भगवान्‌की प्रसन्नताके लिये कर्मोंको करता रहे। (इससे) नैष्कर्म्यकी प्राप्ति हो जाती है।
सम्प्राप्य परमं ज्ञानं नैष्कर्म्यं तत्प्रसादतः।<br>एकाकी निर्ममः शान्तो जीवन्नेव विमुच्यते॥ २५॥परम ज्ञानको प्राप्त करनेके अनन्तर उसके प्रभावसे नैष्कर्म्यकी सिद्धि कर वह एकाकी, ममताशून्य तथा शान्त (व्यक्ति) जीवनकालमें ही मुक्तिको प्राप्त कर लेता है अर्थात् जीवन्मुक्त हो जाता है॥ २३-२५॥
३४* कूर्मपुराण *
वीक्षते परमात्मानं परं ब्रह्म महेश्वरम्।<br>नित्यानन्दं निराभासं तस्मिन्नेव लयं व्रजेत्॥ २६॥<br><br>तस्मात् सेवेत सततं कर्मयोगं प्रसन्नधीः।<br>तृप्तये परमेशस्य तत् पदं याति शाश्वतम्॥ २७॥(ऐसा व्यक्ति) नित्यानन्दस्वरूप, निराभास (स्वतः-प्रकाश), महेश्वर, परम ब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार कर उसीमें लीन हो जाता है। इसलिये प्रसन्नचित्त होकर परमेश्वरकी संतुष्टिके लिये निरन्तर कर्मयोगका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। (इससे वह परमेश्वरके) उस सनातन पदको प्राप्त करता है॥ २६-२७॥
एतद् वः कथितं सर्वं चातुराश्रम्यमुत्तमम्।<br>न ह्येतत् समतिक्रम्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥ २८॥इस प्रकार आप लोगोंको यह चारों आश्रमोंका सम्पूर्ण श्रेष्ठ क्रम बतलाया। इस क्रमका अतिक्रमण करके कोई भी मनुष्य सिद्धिको प्राप्त नहीं कर सकता॥ २८॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें तीसरा अध्याय समाप्त हुआ॥ ३॥


चौथा अध्याय

सांख्य-सिद्धान्तके अनुसार ब्रह्माण्डकी सृष्टिका क्रम, पञ्चीकरण-प्रक्रिया तथा परमेश्वरके विविध नामोंका निरूपण

सूत उवाचसूतजीने कहा—आश्रमोंके सम्बन्धमें पूरे विधिविधानको सुनकर प्रसन्न मनवाले ऋषियोंने भगवान् हृषीकेशको नमस्कार करके पुनः इस प्रकारका वचन कहा—॥ १॥
श्रुत्वाश्रमविधिं कृत्स्नमृषयो हृष्टमानसाः।<br>नमस्कृत्य हृषीकेशं पुनर्वचनमब्रुवन्॥ १॥
मुनय ऊचुःमुनिजन बोले—(भगवन्!) आपने श्रेष्ठ चारों आश्रमोंके विषयमें सब कुछ बतलाया, अब इस समय हमें यह सुननेकी इच्छा है कि इस जगत्की सृष्टि कैसे होती है। हे पुरुषोत्तम! यह सब (संसार) कहाँसे उत्पन्न हुआ, किसमें विलीन होगा और इन सबका नियामक कौन है? यह सब आप बतलायें। ऋषियोंका वचन सुनकर कूर्मरूप धारण करनेवाले तथा सभी भूत-प्राणियोंके उत्पत्ति और विनाशके स्थान भगवान् नारायण गम्भीर वाणीमें बोले—॥ २–४॥
भाषितं भवता सर्वं चातुराश्रम्यमुत्तमम्।<br>इदानीं श्रोतुमिच्छामो यथा सम्भवते जगत्॥ २॥
कुतः सर्वमिदं जातं कस्मिंश्च लयमेष्यति।<br>नियन्ता कश्च सर्वेषां वदस्व पुरुषोत्तम॥ ३॥
श्रुत्वा नारायणो वाक्यमृषीणां कूर्मरूपधृक्।<br>प्राह गम्भीरया वाचा भूतानां प्रभवाप्ययौ॥ ४॥
श्रीकूर्म उवाच**श्रीकूर्मने कहा—**सर्वत्र (चारों ओर) मुखवाले महेश्वर (प्रकृतिसे) पर, अव्यक्त, चतुर्व्यूह, सनातन, अनन्त, अप्रमेय तथा (समस्त जगत्के) नियन्ता हैं। तत्त्वचिन्तक जिसे प्रधान और प्रकृति कहते हैं और जो सत्-असत्-रूप हैं, वही अव्यक्त नित्य कारण है॥ ५-६॥
महेश्वरः परोऽव्यक्तश्चतुर्व्यूहः सनातनः।<br>अनन्तश्चाप्रमेयश्च नियन्ता विश्वतोमुखः॥ ५॥
अव्यक्तं कारणं यत्तन्नित्यं सदसदात्मकम्।<br>प्रधानं प्रकृतिश्चेति यदाहुस्तत्त्वचिन्तकाः॥ ६॥
गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्दस्पर्शविवर्जितम्।<br>अजरं ध्रुवमक्षय्यं नित्यं स्वात्मन्यवस्थितम्॥ ७॥गन्ध, वर्ण और रससे हीन, शब्द-स्पर्शसे रहित, अजर, ध्रुव, अक्षय्य (कभी नाश न होनेवाला), नित्य
* अध्याय ४ *३५
जगद्योन्निर्महाभूतं परं ब्रह्म सनातनम्।<br>विग्रहः सर्वभूतानामात्मनाधिष्ठितं महत्॥ ८ ॥<br><br>अनाद्यन्तमजं सूक्ष्मं त्रिगुणं प्रभवाप्ययम्।<br>असाम्प्रतमविज्ञेयं ब्रह्माग्ने समवर्तत॥ ९ ॥<br>गुणसाम्ये तदा तस्मिन् पुरुषे चात्मनि स्थिते।<br>प्राकृतः प्रलयो ज्ञेयो यावद् विश्वसमुद्भवः॥ १० ॥<br><br>ब्राह्मी रात्रिरियं प्रोक्ता अहः सृष्टिरुदाहृता।<br>अहर्न विद्यते तस्य न रात्रिर्ह्युपचारतः॥ ११ ॥<br>निशान्ते प्रतिबुद्धोऽसौ जगदादिरनादिमान्।<br>सर्वभूतमयोऽव्यक्त्तो ह्यन्तर्यामीश्वरः परः॥ १२ ॥<br><br>प्रकृतिं पुरुषं चैव प्रविश्याशु महेश्वरः।<br>क्षोभयामास योगेन परेण परमेश्वरः॥ १३ ॥<br>यथा मदो नरस्त्रीणां यथा वा माधवोऽनिलः।<br>अनुप्रविष्टः क्षोभाय तथासौ योगमूर्तिमान्॥ १४ ॥<br><br>स एव क्षोभको विप्राः क्षोभ्यश्च परमेश्वरः।<br>स संकोचविकासाभ्यां प्रधानत्वेऽपि च स्थितः॥ १५ ॥<br><br>प्रधानात् क्षोभ्यमाणाच्च तथा पुंसः पुरातनात्।<br>प्रादुरासीन्महद् बीजं प्रधानपुरुषात्मकम्॥ १६ ॥<br><br>महानात्मा मतिर्ब्रह्मा प्रबुद्धिः ख्यातिरीश्वरः।<br>प्रज्ञा धृतिः स्मृतिः संविदेतस्मादिति तत् स्मृतम्॥ १७ ॥<br><br>वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चैव तामसः।<br>त्रिविधोऽयमहंकारो महतः सम्बभूव ह॥ १८ ॥<br><br>अहंकारोऽभिमानश्च कर्ता मन्ता च स स्मृतः।<br>आत्मा च पुद्गलो जीवो यतः सर्वाः प्रवृत्तयः॥ १९ ॥<br><br>पञ्चभूतान्यहंकारात् तन्मात्राणि च जज्ञिरे।<br>इन्द्रियाणि तथा देवाः सर्वं तस्यात्मजं जगत्॥ २० ॥अपनी आत्मामें स्थित संसारका बीजरूप, महाभूत, सनातन, परब्रह्म, सभी प्राणियोंकी मूर्तिरूप, आत्मासे अधिष्ठित, महत्तत्त्व, अनादि, अनन्त, अजन्मा, सूक्ष्म, त्रिगुण, उत्पत्ति और प्रलयका स्थान, शाश्वत तथा अविज्ञेय ब्रह्म ही आदिमें विद्यमान था॥ ७—९॥<br>उस समय गुणोंकी साम्यावस्थारूप उस पुरुषके आत्मस्वरूपमें स्थित होनेपर जबतक विश्वकी सृष्टि नहीं हो जाती, प्राकृत प्रलय (-का समय) जानना चाहिये। यह ब्रह्माकी रात्रि कही गयी है और सृष्टिको ब्रह्माका दिन कहा गया है, (वास्तवमें) उसका न दिन होता है और न रात होती है॥ १०-११॥<br>आदिसे रहित वह जगत्का आदि कारण, सर्वभूतमय, अव्यक्त, अन्तर्यामी परात्पर ईश्वर रात्रि व्यतीत होनेपर जाग्रत् हुआ। परमेश्वर महेश्वरने प्रकृति एवं पुरुषमें शीघ्र ही प्रविष्ट होकर परम योगके द्वारा (उनमें) क्षोभ (गति) उत्पन्न किया॥ १२-१३॥<br>जैसे वसन्त ऋतुकी वायु अथवा मद पुरुष एवं स्त्रियोंको (क्षुब्ध करता है) वैसे ही वह योगविग्रह (योगबलसे विविध शरीर-धारणमें समर्थ ईश्वर) प्रकृति एवं पुरुषमें अनुप्रविष्ट होकर क्षोभका कारण बनता है। हे ब्राह्मणो! वही परमेश्वर क्षोभ उत्पन्न करनेवाला है एवं स्वयं क्षुब्ध होनेवाला है, वह प्रलय एवं सृष्टि करनेके कारण प्रधान भी कहलाता है। प्रधान पुरातनपुरुषके क्षुब्ध होनेसे प्रधान (प्रकृति) पुरुषात्मक महद् बीजका आविर्भाव हुआ॥ १४-१६॥<br>इसी कारणसे (वह महद्बीज) महान् आत्मा, मति, ब्रह्मा, प्रबुद्धि, ख्याति, ईश्वर, प्रज्ञा, धृति, स्मृति तथा संवित् कहलाता है॥ १७॥<br>महत्तत्त्वसे समस्त प्राणियोंकी सृष्टिका आदि कारण—वैकारिक, तैजस तथा तामस—यह तीन प्रकारका अहंकार उत्पन्न हुआ॥ १८॥<br>वह अहंकार अभिमान, कर्ता, मन्ता, आत्मा, पुद्गल तथा जीव (नामों)-से कहा गया है। उसी अहंकारसे सभी प्रवृत्तियाँ होती हैं। अहंकारसे पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश), पाँच तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध), सभी इन्द्रियाँ तथा उन इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ देवता उत्पन्न हुए। यह सम्पूर्ण जगत् उससे ही उत्पन्न हुआ है॥ १९-२०॥

३६

  • कूर्मपुराण *

मनस्त्वव्यक्तजं प्रोक्तं विकारः प्रथमः स्मृतः ।<br>येनासौ जायते कर्ता भूतादींश्चानुपश्यति ॥ २१ ॥अव्यक्तसे उत्पन्न मनको प्रथम विकार माना गया है। इस कारण यह कर्ता एवं भूतादिकोंको देखनेवाला है। वैकारिक अहंकारसे वैकारिक सृष्टि उत्पन्न हुई। इन्द्रियाँ तैजस हैं और (उन इन्द्रियोंके अधिष्ठाता) दस देवता वैकारिक हैं ॥ २१-२२ ॥
वैकारिकादहंकारात् सर्गो वैकारिकोऽभवत् ।<br>तैजसानीन्द्रियाणि स्युर्देवा वैकारिका दश ॥ २२ ॥<br>एकादशं मनस्तत्र स्वगुणेनोभयात्मकम् ।<br>भूततन्मात्रसर्गोऽयं भूतादेरभवन् प्रजाः ॥ २३ ॥उनमें (ग्यारहवाँ) इन्द्रिय मन अपने गुणके कारण उभयात्मक* है। यह भूततन्मात्राओंकी सृष्टि है। भूतादिकोंसे ही प्रजा उत्पन्न हुई। विकारप्राप्त भूतोंने शब्दतन्मात्राको उत्पन्न किया। उस (शब्द तन्मात्रा)-से शब्द लक्षण-वाले तथा अवकाशस्वरूप आकाशकी उत्पत्ति हुई। वैकारिक आकाशने स्पर्श तन्मात्राको उत्पन्न किया। उससे वायु उत्पन्न हुआ और वायुका गुण स्पर्श कहा गया है ॥ २३-२५ ॥
भूतादिस्तु विकुर्वाणः शब्दमात्रं ससर्ज ह ।<br>आकाशं शुषिरं तस्मादुत्पन्नं शब्दलक्षणम् ॥ २४ ॥
आकाशस्तु विकुर्वाणः स्पर्शमात्रं ससर्ज ह ।<br>वायुरुत्पद्यते तस्मात् तस्य स्पर्शो गुणो मतः ॥ २५ ॥
वायुश्चापि विकुर्वाणो रूपमात्रं ससर्ज ह ।<br>ज्योतिरुपद्यते वायोस्तद्रूपगुणमुच्यते ॥ २६ ॥विकारप्राप्त वायुने रूप तन्मात्राको उत्पन्न किया, वायुसे तेज उत्पन्न हुआ और इसका 'रूप' गुण कहा जाता है। विकारको प्राप्त हुए तेजने भी रस तन्मात्राकी सृष्टि की और उससे फिर जलकी उत्पत्ति हुई, वह जल इस 'रस' गुणका आधार है। विकारको प्राप्त हो रहे जलने गन्ध तन्मात्राको उत्पन्न किया, उससे संघात (पृथ्वीतत्त्व) उत्पन्न हुआ और उसका गुण 'गन्ध' माना गया है ॥ २६-२८ ॥
ज्योतिश्चापि विकुर्वाणं रसमात्रं ससर्ज ह ।<br>सम्भवन्ति ततोऽम्भांसि रसाधाराणि तानि तु ॥ २७ ॥
आपश्चापि विकुर्वन्त्यो गन्धमात्रं ससर्जरे ।<br>संघातो जायते तस्मात् तस्य गन्धो गुणो मतः ॥ २८ ॥
आकाशं शब्दमात्रं यत् स्पर्शमात्रं समावृणोत् ।<br>द्विगुणस्तु ततो वायुः शब्दस्पर्शात्मकोऽभवत् ॥ २९ ॥आकाशकी शब्द नामक तन्मात्रा है, उसने स्पर्श नामक तन्मात्राको आवृत किया है, इसलिये वायु शब्द तथा स्पर्श—इन दो गुणोंवाला है। उसी प्रकार रूप (नामक) गुण, शब्द एवं स्पर्श दो गुणोंसे आविष्ट है, अतः तेज या अग्नि—शब्द, स्पर्श तथा रूप—इन तीन गुणोंवाला है। शब्द, स्पर्श तथा रूप एवं रस तन्मात्रामें प्रविष्ट हुए, इसलिये रसात्मक जल-तत्त्वको चार गुणों (शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस)-से युक्त समझना चाहिये। शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस—ये चार गुण गन्ध तन्मात्रामें प्रविष्ट हुए, इसलिये पञ्च स्थूल महाभूतसे युक्त पृथ्वी तत्त्व पाँच गुणोंवाला कहा गया है ॥ २९-३२ ॥
रूपं तथैवाविशतः शब्दस्पर्शौ गुणावुभौ ।<br>त्रिगुणः स्यात् ततो वह्निः स शब्दस्पर्शरूपवान् ॥ ३० ॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसमात्रं समाविशन् ।<br>तस्माच्चतुर्गुणा आपो विज्ञेयास्तु रसात्मिकाः ॥ ३१ ॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धं समाविशन् ।<br>तस्मात् पञ्चगुणा भूमिः स्थूला भूतेषु शब्द्यते ॥ ३२ ॥
शान्ता घोराश्च मूढाश्च विशेषास्तेन ते स्मृताः ।<br>परस्परानुप्रवेशाद् धारयन्ति परस्परम् ॥ ३३ ॥इसी कारण ये शान्त, घोर, मूढ तथा विशेष कहलाते हैं। ये परस्पर एक-दूसरेमें प्रविष्ट होनेके कारण आपसमें एक दूसरेको धारण किये रहते हैं ॥ ३३ ॥

* हस्त आदि पाँच कर्मेन्द्रिय हैं तथा चक्षु आदि पाँच ज्ञानेन्द्रिय हैं। 'मन' उभयात्मक है अर्थात् संकल्प-विकल्प-रूप कर्म भी करता है तथा उसे सुख-दुःखका ज्ञान भी होता है।

* अध्याय ४ *३७
एते सप्त महात्मानो ह्यन्योन्यस्य समाश्रयात्।<br>नाशक्नुवन् प्रजाः स्रष्टुमसमागम्य कृत्स्नशः ॥ ३४ ॥<br><br>पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च अव्यक्तानुग्रहेण च।<br>महदादयो विशेषान्ता ह्यण्डमुत्पादयन्ति ते ॥ ३५ ॥<br>एककालसमुत्पन्नं जलबुद्बुदवच्च तत्।<br>विशेषेभ्योऽण्डमभवद् बृहत् तदुदकेशयम् ॥ ३६ ॥<br><br>तस्मिन् कार्यस्य करणं संसिद्धिः परमेष्ठिनः।<br>प्राकृतेऽण्डे विवृत्तः स क्षेत्रज्ञो ब्रह्मसंज्ञितः ॥ ३७ ॥<br><br>स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते।<br>आदिकर्ता स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्तत ॥ ३८ ॥<br><br>यमाहुः पुरुषं हंसं प्रधानात् परतः स्थितम्।<br>हिरण्यगर्भं कपिलं छन्दोमूर्त्तिं सनातनम् ॥ ३९ ॥<br>मेरुरुल्बमभूत् तस्य जरायुश्चापि पर्वताः।<br>गर्भोदकं समुद्राश्च तस्यासन् परमात्मनः ॥ ४० ॥<br><br>तस्मिन्नण्डेऽभवद् विश्वं सदेवासुरमानुषम्।<br>चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ सग्रहौ सह वायुना ॥ ४१ ॥<br>अद्भिर्दशगुणाभिश्च बाह्यतोऽण्डं समावृतम्।<br>आपो दशगुणेनैव तेजसा बाह्यतो वृताः ॥ ४२ ॥<br><br>तेजो दशगुणेनैव बाह्यतो वायुनावृतम्।<br>आकाशेनावृतो वायुः खं तु भूतादिनावृतम् ॥ ४३ ॥<br><br>भूतादिर्महता तद्वदव्यक्तेनावृतो महान्।<br>एते लोका महात्मानः सर्वतत्त्वाभिमानिनः ॥ ४४ ॥<br>वसन्ति तत्र पुरुषास्तदात्मानो व्यवस्थिताः।<br>ईश्वरा योगधर्माणो ये चान्ये तत्त्वचिन्तकाः ॥ ४५ ॥<br><br>सर्वज्ञाः शान्तरजसो नित्यं मुदितमानसाः।<br>एतैरावरणैरण्डं सप्तभिः प्राकृतैर्वृतम् ॥ ४६ ॥ये सातों महात्मा (महत्, अहंकार आदि तत्त्व) एक-दूसरेके आश्रित होनेके कारण बिना सम्पूर्ण रूपसे मिले सृष्टि करनेमें समर्थ नहीं हो सके ॥ ३४ ॥ पुरुषसे अधिष्ठित और अव्यक्तसे अनुगृहीत होनेके कारण महत्तत्त्वसे लेकर विशेष (पञ्चभूत)-पर्यन्त वे सभी (तत्त्व) अण्डको उत्पन्न करते हैं ॥ ३४-३५ ॥<br>विशेषों (महाभूतों)-से एक बारमें ही जलके बुलबुलेके समान तथा जलमें स्थित वह बृहत् अण्ड उत्पन्न हुआ। उसी (बृहत् अण्ड)-में परमेष्ठीके (सृष्टिस्वरूप) कार्यका करण सिद्ध (निष्पन्न) हुआ। प्राकृत अण्डमें क्षेत्रज्ञ आविर्भूत हुआ जो ब्रह्मा नामसे कहलाया। वे प्रथम शरीर धारण करनेवाले हैं। वे पुरुष कहलाते हैं और समस्त प्राणियोंके आदिकर्ता वे ब्रह्मा सर्वप्रथम उत्पन्न हुए। प्रधानसे परमें स्थित उस पुरुषको हंस, हिरण्यगर्भ, कपिल, छन्दोमूर्ति तथा सनातन कहा जाता है ॥ ३६-३९ ॥<br>उस परमात्माका गर्भवेष्टन था मेरु, पर्वत थे गर्भके आवरणरूप चर्म-जरायु तथा गर्भोदक थे सभी समुद्र। उस अण्डमें देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसहित सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ तथा ग्रहों, नक्षत्रोंसहित वायु, सूर्य एवं चन्द्रमा भी उत्पन्न हुए ॥ ४०-४१ ॥<br>अण्ड (ब्रह्माण्ड) बाहरकी ओर अपनेसे दस गुने अधिक जलसे घिरा हुआ है और जल बाहरसे अपनेसे दस गुने अधिक तेजसे आवृत है। तेज बाहरसे अपनेसे दस गुने अधिक वायुसे आवृत है। इसी प्रकार वायु आकाशसे आवृत है और आकाश भूतादि अर्थात् अहंकारसे घिरा हुआ है। जैसे अहंकार महत्तत्त्वसे आवृत है, वैसे ही महत्तत्त्व अव्यक्तसे आवृत है। ये लोक सर्वतत्त्वाभिमानी महान् स्वरूप-वाले हैं ॥ ४२-४४ ॥<br>उन (लोकों)-में उन्हींके आत्मरूप ऐश्वर्यसम्पन्न तथा योगधर्मा (योगधर्मसे युक्त) पुरुष निवास करते हैं और अन्य भी जो तत्त्वचिन्तक हैं, वे भी निवास करते हैं। (वे सभी पुरुष) सर्वज्ञ, शान्त रजोगुणवाले अर्थात् सत्त्वसम्पन्न तथा नित्य ही अत्यन्त प्रसन्न मनवाले हैं। ब्रह्माण्ड इन्हीं प्राकृत सात आवरणोंसे आवृत है ॥ ४५-४६ ॥

३८ * कूर्मपुराण *


एतावच्छक्यते वक्तुं मायैषा गहना द्विजाः।<br>एतत् प्राधानिकं कार्यं यन्मया बीजमीरितम्।<br>प्रजापतेः परा मूर्तिरितीयं वैदिकी श्रुतिः॥ ४७॥ब्राह्मणो! (इस विषयमें) केवल इतना ही कहा जा सकता है कि 'यह माया बहुत ही गहन है'। बीजरूपसे मैंने जिसका वर्णन किया वह सब प्रधान अर्थात् प्रकृतिका कार्य (व्यापार) है। यह (प्रकृति या माया अन्य और कोई नहीं) प्रजापतिकी (ही) परा मूर्ति है—ऐसा वेदोंका अभिमत है॥ ४७॥
ब्रह्माण्डमेतत् सकलं सप्तलोकतलान्वितम्।<br>द्वितीयं तस्य देवस्य शरीरं परमेष्ठिनः॥ ४८॥सात लोकोंके तलसे युक्त यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उन परमेष्ठी देवका दूसरा शरीर है। वेदोंके अर्थको ठीक-ठीक जाननेवाले बतलाते हैं कि सोनेके समान वर्णवाले पीत अण्डसे प्रादुर्भूत हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्मा भगवान्‌के तीसरे रूप (शरीर) हैं॥ ४८-४९॥
हिरण्यगर्भो भगवान् ब्रह्मा वै कनकाण्डजः।<br>तृतीयं भगवद्रूपं प्राहुर्वेदार्थवेदिनः॥ ४९॥
रजोगुणमयं चान्यद् रूपं तस्यैव धीमतः।<br>चतुर्मुखः स भगवान् जगत्सृष्टौ प्रवर्तते॥ ५०॥उन्हीं धीमान्‌का जो रजोगुणयुक्त अन्य रूप है, वे ही चतुर्मुख भगवान् ब्रह्मा हैं तथा संसारकी सृष्टि करते हैं। स्वयं विश्वेश्वर विश्वतोमुख विश्वात्मा भगवान् विष्णु सत्त्वगुणका आश्रय ग्रहणकर उत्पन्न हुए सम्पूर्ण (संसार)-का पालन-पोषण करते हैं। अन्तकालमें स्वयं परमेश्वर सर्वात्मा रुद्रदेव तमोगुणका समाश्रयणकर संसारका संहार करते हैं॥ ५०—५२॥
सृष्टं च पाति सकलं विश्वात्मा विश्वतोमुखः।<br>सत्त्वं गुणमुपाश्रित्य विष्णुर्विश्वेश्वरः स्वयम्॥ ५१॥
अन्तकाले स्वयं देवः सर्वात्मा परमेश्वरः।<br>तमोगुणं समाश्रित्य रुद्रः संहरते जगत्॥ ५२॥
एकोऽपि सन्महादेवस्त्रिधासौ समवस्थितः।<br>सर्गरक्षालयगुणैर्निर्गुणोऽपि निरञ्जनः।<br>एकधा स द्विधा चैव त्रिधा च बहुधा पुनः॥ ५३॥एक होनेपर भी वे निर्गुण-निरञ्जन महादेव सृष्टि, पालन और संहाररूपी तीन गुणोंके कारण तीन रूपोंमें स्थित हैं। वे कभी एक, कभी दो, कभी तीन तथा कभी अनन्त रूप धारण कर लेते हैं। वे योगेश्वर (परमात्मा) अपनी लीलासे अनेक आकार, क्रिया, रूप तथा नामवाले शरीरोंका निर्माण करते हैं और फिर संहार कर डालते हैं॥ ५३-५४॥
योगेश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च।<br>नानाकृतिक्रियारूपनामवन्ति स्वलीलया॥ ५४॥
हिताय चैव भक्तानां स एव ग्रसते पुनः।<br>त्रिधा विभज्य चात्मानं त्रैकाल्ये सम्प्रवर्तते।<br>सृजते ग्रसते चैव वीक्षते च विशेषतः॥ ५५॥भक्तोंके कल्याणके लिये ही वे पुनः संहार करते हैं। अपनेको तीन रूपोंमें विभक्तकर तीनों कालोंमें प्रवृत्त होते हैं। इस प्रकार (वे) विशेष रूपसे सृष्टि, संहार और पालनका कार्य करते हैं॥ ५५॥
यस्मात् सृष्टाननुगृह्णाति ग्रसते च पुनः प्रजाः।<br>गुणात्मकत्वात् त्रैकाल्ये तस्मादेकः स उच्यते॥ ५६॥चूँकि वे (स्वयं ही) प्रजाकी सृष्टि करते हैं, उसका पालन करते हैं और (स्वयं उसका) पुनः संहार करते हैं, इसलिये तीनों कालोंमें (सत्त्व, रज तथा तमरूप) त्रिगुणात्मक होनेसे वे (परमात्मा) एक (अद्वैत) कहलाते हैं। प्रारम्भमें वे सनातन हिरण्यगर्भ प्रादुर्भूत हुए। आदिमें उत्पन्न होनेसे वे आदिदेव तथा अजन्मा होनेसे अज कहलाते हैं॥ ५६-५७॥
अग्रे हिरण्यगर्भः स प्रादुर्भूतः सनातनः।<br>आदित्वादादिदेवोऽसौ अजातत्वादजः स्मृतः॥ ५७॥
  • अध्याय ४ * | ३९ ---|---

पाति यस्मात् प्रजाः सर्वाः प्रजापतिरिति स्मृतः।<br>देवेषु च महादेवो महादेव इति स्मृतः॥ ५८॥ | वे समस्त प्रजाओंका पालन करते हैं, इसलिये 'प्रजापति' इस नामसे कहे जाते हैं और देवताओंमें सबसे बड़े देव हैं, इसलिये 'महादेव' कहलाते हैं॥ ५८॥ बृहत्त्वाच्च स्मृतो ब्रह्मा परत्वात् परमेश्वरः।<br>वशित्वादप्यवश्यत्वादीश्वरः परिभाषितः॥ ५९॥ | बृहत् होनेसे वे ब्रह्मा तथा परम (श्रेष्ठ) होनेके कारण परमेश्वर कहे जाते हैं। सबको अपने वशमें रखनेवाले, परंतु स्वयं किसीके वशमें न रहनेके कारण वे ईश्वर (नामसे) परिभाषित किये जाते हैं। ऋषिः सर्वत्रगत्वेन हरिः सर्वहरो यतः।<br>अनुत्पादाच्च पूर्वत्वात् स्वयम्भूरिति स स्मृतः॥ ६०॥ | उनकी सर्वत्र गति होनेके कारण वे ऋषि और (प्रलयकालमें) सब कुछ हरण करनेके कारण हरि कहलाते हैं। किसीके द्वारा उत्पन्न न होने तथा सर्वप्रथम होनेके कारण 'स्वयम्भू' इस नामसे कहे जाते हैं। सभी मनुष्योंके वे अयन (आश्रय-स्थान) हैं, इसलिये नराणामयनो यस्मात् तेन नारायणः स्मृतः।<br>हरः संसारहरणाद् विभुत्वाद् विष्णुरुच्यते॥ ६१॥<br>भगवान् सर्वविज्ञानादवनादोमिति स्मृतः।<br>सर्वज्ञः सर्वविज्ञानात् सर्वः सर्वमयो यतः॥ ६२॥ | नारायण कहे जाते हैं, संसारका संहार करनेसे हर तथा सर्वत्र व्यापक होनेसे विष्णु कहलाते हैं॥ ५९-६१॥<br>(वे) सब कुछ जाननेके कारण भगवान् तथा रक्षा-कार्य करनेसे ॐ कहलाते हैं। सभीका विशिष्ट ज्ञान होनेसे सर्वज्ञ तथा सभीके आत्मस्वरूप होनेके कारण वे सर्व कहे जाते हैं। वे मलशून्य हैं, इसलिये शिव और सर्वत्र व्याप्त होनेसे विभु तथा शिवः स निर्मलो यस्माद् विभुः सर्वगतो यतः।<br>तारणात् सर्वदुःखानां तारकः परिगीयते॥ ६३॥ | सभी प्रकारके कष्टोंका निवारण करनेसे 'तारक' कहलाते हैं॥ ६२-६३॥ बहुनात्र किमुक्तेन सर्वं ब्रह्ममयं जगत्।<br>अनेकभेदभिन्नस्तु क्रीडते परमेश्वरः॥ ६४॥ | और अधिक कहनेसे क्या लाभ! यह सारा जगत् ब्रह्ममय ही है और वे परमेश्वर अनेक रूपोंमें विभक्त होकर अनेक क्रीड़ाएँ (लीलाएँ) करते रहते हैं॥ ६४॥ इत्येष प्राकृतः सर्गः संक्षेपात् कथितो मया।<br>अबुद्धिपूर्वको विप्रा ब्राह्मीं सृष्टिं निबोधत॥ ६५॥ | हे ब्राह्मणो! मैंने संक्षेपमें इस अबुद्धिपूर्वक हुए प्राकृत सर्ग (प्राकृत सृष्टि)-का वर्णन किया है। अब आप लोग ब्रह्माकी सृष्टिके सम्बन्धमें सुनें॥ ६५॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौथा अध्याय समाप्त हुआ॥ ४॥


४० * कूर्मपुराण *

पाँचवाँ अध्याय

ब्रह्माजीकी आयुका वर्णन, युग, मन्वन्तर तथा कल्प आदि कालकी गणना, प्राकृत प्रलय तथा कालकी महिमाका वर्णन

श्रीकूर्म उवाचश्रीकूर्मने कहा— श्रेष्ठ ब्राह्मणो! स्वयम्भू-ब्रह्माके बीते हुए कालकी गणनाका वर्णन बहुत वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता। संक्षेपमें कालकी गणना दो परार्ध कही गयी है। वही परम काल है और उसके बीत जानेपर प्रलय होता है॥ १-२॥
स्वयम्भुवो विवृत्तस्य कालसंख्या द्विजोत्तमाः।<br>न शक्यते समाख्यातुं बहुवर्षैरपि स्वयम्॥ १ ॥
कालसंख्या समासेन परार्धद्वयकल्पिता।<br>स एव स्यात् परः कालः तदन्ते प्रतिसृज्यते॥ २ ॥
निजेन तस्य मानेन आयुर्वर्षशतं स्मृतम्।<br>तत् पराख्यं तदर्धं च परार्धमभिधीयते॥ ३ ॥अपने मानसे ब्रह्माकी एक सौ वर्षकी आयु कही गयी है। उसी (ब्रह्माकी एक सौ वर्षकी आयु)-को 'पर' नामसे कहा जाता है और उस परका आधा 'परार्ध' कहलाता है॥ ३॥
काष्ठा पञ्चदश ख्याता निमेषा द्विजसत्तमाः।<br>काष्ठास्त्रिंशत् कला त्रिंशत् कला मौहूर्तकी गतिः॥ ४ ॥द्विजोत्तमो! पंद्रह निमेषकी एक काष्ठा कही गयी है। तीस काष्ठाकी एक कला और तीस कलाका समय एक मुहूर्त-काल होता है। उतनी ही संख्या अर्थात् तीस मुहूर्तोंका एक मानवीय अहोरात्र (दिन-रात) होता है, उतने ही अर्थात् तीस अहोरात्रोंका एक मास होता है जो दो पक्षवाला है। छः मासोंका एक अयन तथा उत्तर एवं दक्षिण नामसे दो अयनोंका एक वर्ष होता है। दक्षिण अयन अर्थात् दक्षिणायन देवताओंकी रात्रि और उत्तर अयन अर्थात् उत्तरायण (देवताओंका) दिन होता है॥ ४–६॥
तावत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्तैर्मानुषं स्मृतम्।<br>अहोरात्राणि तावन्ति मासः पक्षद्वयात्मकः॥ ५ ॥
तैः षड्भिरयनं वर्षं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे।<br>अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम्॥ ६ ॥
दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु कृतत्रेतादिसंज्ञितम्।<br>चतुर्युगं द्वादशभिः तद्विभागं निबोधत॥ ७ ॥(श्रीकूर्मने ब्राह्मणोंसे कहा—) दिव्य बारह हजार वर्षोंका सत्य, त्रेता इत्यादि नामसे एक चतुर्युग होता है। उसके विभागोंका वर्णन सुनें॥ ७॥
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्।<br>तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च कृतस्य तु॥ ८ ॥चार हजार दिव्य वर्षोंका सत्ययुग होता है। सत्ययुगकी उतने ही सौ वर्षोंकी अर्थात् चार सौ वर्षोंकी संध्या तथा संध्यांश (त्रेतायुगका संधिकाल) होता है। सत्ययुगके संध्यांशको छोड़कर क्रमशः तीन सौ, दो सौ तथा एक सौ—इस प्रकार कुल मिलाकर दिव्य छः सौ वर्षोंके द्वापर तथा कलियुगके संध्या तथा संध्यांश होते हैं॥ ८-९॥
त्रिशती द्विशती संध्या तथा चैकशती क्रमात्।<br>अंशकं षट्शतं तस्मात् कृतसंध्यांशकं विना॥ ९ ॥
त्रिद्व्येकसाहस्रमतो विना संध्यांशकेन तु।<br>त्रेताद्वापरतिष्याणां कालज्ञाने प्रकीर्तितम्॥ १०॥कालका ज्ञान करनेके लिये संध्यांशोंसे रहित त्रेता, द्वापर तथा कलियुग क्रमशः तीन, दो तथा एक हजार (दिव्य) वर्षोंके कहे गये हैं। कुछ अधिकता लिये यही (दिव्य) बारह हजार वर्षोंका कालपरिमाण कहा गया है। इसके इकहत्तर गुना कालको एक मनुका अन्तर अर्थात् एक मन्वन्तरका समय कहा गया है॥ १०-११॥
एतद् द्वादशसाहस्रं साधिकं परिकल्पितम्।<br>तदेकसप्ततिगुणं मनोरन्तरमुच्यते॥ ११ ॥
* अध्याय ५ *४१

ब्रह्मणो दिवसे विप्रा मनवः स्युश्चतुर्दश।<br>स्वायम्भुवादयः सर्वे ततः सावर्णिकादयः ॥ १२ ॥<br><br>तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता।<br>पूर्णं युगसहस्रं वै परिपाल्या नरेश्वरैः ॥ १३ ॥<br>मन्वन्तरेण चैकेन सर्वाण्येवान्तराणि वै।<br>व्याख्यातानि न संदेहः कल्पं कल्पेन चैव हि ॥ १४ ॥<br><br>ब्राह्ममेकमहः कल्पस्तावती रात्रिरिष्यते।<br>चतुर्युगसहस्रं तु कल्पमाहुर्मनीषिणः ॥ १५ ॥<br>त्रीणि कल्पशतानि स्युस्तथा षष्टिर्द्विजोत्तमाः।<br>ब्रह्मणः कथितं वर्षं पराख्यं तच्छतं विदुः ॥ १६ ॥<br><br>तस्यान्ते सर्वतत्त्वानां स्वहेतौ प्रकृतौ लयः।<br>तेनायं प्रोच्यते सद्भिः प्राकृतः प्रतिसंचरः ॥ १७ ॥<br><br>ब्रह्मनारायणेशानां त्रयाणां प्रकृतौ लयः।<br>प्रोच्यते कालयोगेन पुनरेव च सम्भवः ॥ १८ ॥<br>एवं ब्रह्मा च भूतानि वासुदेवोऽपि शंकरः।<br>कालेनैव तु सृज्यन्ते स एव ग्रसते पुनः ॥ १९ ॥<br><br>अनादिरेष भगवान् कालोऽनन्तोऽजरोऽमरः।<br>सर्वगत्वात् स्वतन्त्रत्वात् सर्वात्मासौ महेश्वरः ॥ २० ॥<br><br>ब्रह्माणो बहवो रुद्रा ह्यन्ये नारायणादयः।<br>एको हि भगवान्नीशः कालः कविरिति श्रुतिः ॥ २१ ॥<br><br>एकमत्र व्यतीतं तु परार्धं ब्रह्मणो द्विजाः।<br>साम्प्रतं वर्तते तद्वत् तस्य कल्पोऽयमष्टमः ॥ २२ ॥<br><br>योऽतीतः सप्तमः कल्पः पाद्म इत्युच्यते बुधैः।<br>वाराहो वर्तते कल्पः तस्य वक्ष्यामि विस्तरम् ॥ २३ ॥ब्राह्मणो ! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु (मन्वन्तर) होते हैं। वे सभी स्वायम्भुव (प्रथम मनु) आदि तथा सावर्णिक (अष्टम मनु) आदि मनु हैं। उन नरेश्वरों (मन्वन्तराधिपों)-के द्वारा सात द्वीपों एवं पर्वतोंवाली इस पृथ्विका पूरे एक हजार युगोंतक पालन किया जाता है ॥ १२-१३ ॥<br><br>एक मन्वन्तरके वर्णनसे अन्य भी—सभी मन्वन्तरोंका वर्णन कर दिया गया है (ऐसा समझना चाहिये)। इसमें संदेह नहीं करना चाहिये। प्रत्येक कल्प (पूर्व) कल्पके समान ही होता है। ब्रह्माका एक दिन एक कल्पके बराबर और रात्रि भी उतनी (अर्थात् एक कल्पके बराबर) ही होती है। विद्वानोंने एक हजार चतुर्युगीका एक कल्प कहा है ॥ १४-१५ ॥<br><br>श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! तीन सौ साठ कल्पोंका ब्रह्माका एक वर्ष कहा गया है, उसके सौ गुने (अर्थात् ३६०×१०० = ३६,००० कल्पों या १०० वर्षोंके) कालको 'पर' इस नामसे जानना चाहिये। ('पर' नामक) उस कालके बीतनेपर सभी तत्त्वोंका अपने मूल कारण प्रकृतिमें लय हो जाता है। इसीलिये विद्वानोंने इसे प्राकृत प्रतिसञ्चर (प्राकृत प्रलय) कहा है। ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश तीनोंका प्रकृतिमें लय हो जाता है। पुनः कालयोगसे उनका आविर्भाव होना कहा जाता है ॥ १६-१८ ॥<br><br>इस प्रकार ब्रह्मा, जीव, वासुदेव तथा शंकरकी कालके द्वारा ही सर्जना होती है, पुनः वही काल इनका संहार भी करता है। यह काल भगवान् है, अनन्त है, अजर है, अमर है एवं अनादि है। सर्वव्यापी होनेसे, स्वतन्त्र होनेसे तथा सबका आत्मस्वरूप होनेसे यह महेश्वर कहलाता है ॥ १९-२० ॥<br><br>ब्रह्मा, रुद्र तथा नारायण आदि बहुत होते हैं, किंतु भगवान् एक ही है, जो ईश, काल तथा कवि कहलाता है—ऐसा वेदका अभिमत है ॥ २१ ॥<br><br>ब्राह्मणो ! इस समय ब्रह्माजीका एक परार्ध बीत चुका है, अब उनका दूसरा परार्ध चल रहा है, उस (द्वितीय परार्ध)-का यह आठवाँ कल्प चल रहा है। ब्रह्माजीका जो सातवाँ कल्प व्यतीत हो चुका है, विद्वानोंद्वारा वह 'पाद्म' (कल्प) कहा गया है। वर्तमानमें वाराह कल्प चल रहा है, इसके विस्तारका मैं वर्णन करूँगा ॥ २२-२३ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५ ॥


४२ * कूर्मपुराण *


छठा अध्याय

'नारायण' नामका निर्वचन, वराहरूपधारी नारायणद्वारा पृथ्वीका उद्धार, सनकादि ऋषियोंद्वारा वराहकी स्तुति

श्रीकूर्म उवाचश्रीकूर्मने कहा—(सृष्टिके पूर्व) केवल एकमात्र समुद्र ही था अर्थात् सर्वत्र जल-ही-जल था और कुछ नहीं। कोई विभाग नहीं था, घोर अन्धकारमय था। उस समय वायु आदि सभी शान्त थे। कुछ भी जाना नहीं जाता था। स्थावर तथा जंगम (सम्पूर्ण सृष्टि)-के उस एकार्णवमें नष्ट हो जानेपर (विलीन हो जानेपर) उस समय हजार नेत्रों तथा हजार चरणोंवाले ब्रह्मा प्रादुर्भूत हुए। हजार सिरवाले, सोनेके समान वर्णवाले, अतीन्द्रिय, ब्रह्मा जो नारायण नामवाले पुरुष कहलाते हैं, उस समय जलमें (एकार्णवमें) सोये हुए थे॥ १—३॥
आसीदेकार्णवं घोरमविभागं तमोमयम्।<br>शान्तवातादिकं सर्वं न प्रज्ञायत किञ्चन॥ १ ॥<br><br>एकार्णवे तदा तस्मिन् नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>तदा समभवद् ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात्॥ २ ॥<br><br>सहस्रशीर्षा पुरुषो रुक्मवर्णस्त्वतीन्द्रियः।<br>ब्रह्मा नारायणाख्यस्तु सुष्वाप सलिले तदा॥ ३ ॥
इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणम्प्रति।<br>ब्रह्मस्वरूपिणं देवं जगतः प्रभवाप्ययम्॥ ४ ॥सम्पूर्ण संसारके सृष्टि एवं विनाशके कारण, ब्रह्मस्वरूप नारायणदेवके विषयमें यह श्लोक कहा जाता है—॥ ४ ॥
आपो नारा इति प्रोक्ता नाम्ना पूर्वमिति श्रुतिः।<br>अयनं तस्य ता यस्मात् तेन नारायणः स्मृतः॥ ५ ॥<br><br>तुल्यं युगसहस्रस्य नैशं कालमुपास्य सः।<br>शर्वर्यन्ते प्रकुरुते ब्रह्मत्वं सर्गकारणात्॥ ६ ॥<br><br>ततस्तु सलिले तस्मिन् विज्ञायान्तर्गतां महीम्।<br>अनुमानात् तदुद्धारं कर्तुकामः प्रजापतिः॥ ७ ॥वेदमें 'अप्' अर्थात् 'जल' को 'नार' इस नामसे पहले कहा गया है और वह नार (जल) नरका अयन अर्थात् आश्रय-स्थान है, इस कारण वे 'नारायण' कहे जाते हैं। हजार युगोंके बराबर रात्रिका उपभोग करके वे नारायण (उस प्रलयकालीन) रात्रिके बीत जानेपर सृष्टि करनेके लिये ब्रह्मत्व ग्रहण करते हैं। तदनन्तर उस जल (एकार्णव)-में प्रलीन पृथ्वीको अनुमानद्वारा जानकर प्रजापतिने उसके उद्धारकी कामना की॥ ५—७॥
जलक्रीडासु रुचिरं वाराहं रूपमास्थितः।<br>अधृष्यं मनसाप्यन्यैर्वाङ्मयं ब्रह्मसंज्ञितम्॥ ८ ॥<br><br>पृथिव्युद्धरणार्थाय प्रविश्य च रसातलम्।<br>दंष्ट्रयाभ्युज्जहारैनामात्माधारो धराधरः॥ ९ ॥<br><br>दृष्ट्वा दंष्ट्राग्रविन्यस्तां पृथिवीं प्रथितपौरुषम्।<br>अस्तुवञ्जनलोकस्थाः सिद्धा ब्रह्मर्षयो हरिम्॥ १० ॥जलमें क्रीडा करते समय (वे) अत्यन्त सुन्दर वराहरूपमें अवस्थित हो गये। (भगवान्‌का वह स्वरूप) अन्य लोगोंके द्वारा मनसे भी न जाना जा सकने योग्य, वाक्स्वरूप तथा ब्रह्मसंज्ञक है। धराको धारण करनेवाले (उन) धराधर एवं आत्माधारने पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये रसातलमें प्रवेश करके अपनी दाढ़ (दंष्ट्रा)-द्वारा इसे (रसातलमें डूबी पृथ्वीको) ऊपर निकाला। (नारायणकी) दंष्ट्राके अग्रभागमें अवस्थित पृथ्वीको देखकर जनलोकमें रहनेवाले सिद्धों तथा ब्रह्मर्षियोंने अपने पौरुषको व्यक्त करनेवाले हरिकी (इस प्रकार) स्तुति की॥ ८—१०॥
  • अध्याय ६ * | ४३ ---|---:
ऋषय ऊचुः<br>नमस्ते देवदेवाय ब्रह्मणे परमेष्ठिने ।<br>पुरुषाय पुराणाय शाश्वताय जयाय च ॥ ११ ॥<br>नमः स्वयम्भुवे तुभ्यं स्रष्ट्रे सर्वार्थवेदिने ।<br>नमो हिरण्यगर्भाय वेधसे परमात्मने ॥ १२ ॥<br>नमस्ते वासुदेवाय विष्णवे विश्वयोनये ।<br>नारायणाय देवाय देवानां हितकारिणे ॥ १३ ॥<br>नमोऽस्तु ते चतुर्वक्त्र शार्ङ्गचक्रासिधारिणे ।<br>सर्वभूतात्मभूताय कूटस्थाय नमो नमः ॥ १४ ॥ऋषि बोले—देवाधिदेव, पुराणपुरुष, सनातन, जयस्वरूप परमेष्ठी ब्रह्माको नमस्कार है। सृष्टि करनेवाले तथा सभी अर्थोंके ज्ञाता स्वयम्भू! आपको नमस्कार है। हिरण्यगर्भ, वेधा परमात्माको नमस्कार है। विश्वके उत्पत्ति-स्थान, देवोंके हितकारी, वासुदेव, नारायणदेव विष्णुको नमस्कार है। शार्ङ्ग (धनुष), चक्र (सुदर्शन) तथा तलवार (नन्दक) आदि धारण करनेवाले चतुर्मुख! आपको नमस्कार है। सभी प्राणियोंके आत्मरूप, कूटस्थको बार-बार नमस्कार है॥ ११—१४॥
नमो वेदरहस्याय नमस्ते वेदयोनये ।<br>नमो बुद्धाय शुद्धाय नमस्ते ज्ञानरूपिणे ॥ १५ ॥<br>नमोऽस्त्वानन्दरूपाय साक्षिणे जगतां नमः ।<br>अनन्तायाप्रमेयाय कार्याय करणाय च ॥ १६ ॥<br>नमस्ते पञ्चभूताय पञ्चभूतात्मने नमः ।<br>नमो मूलप्रकृतये मायारूपाय ते नमः ॥ १७ ॥वेदके रहस्यरूपको नमस्कार है। वेद-योनिको नमस्कार है। शुद्ध-बुद्धको नमस्कार है। ज्ञानरूपको नमस्कार है। आनन्दस्वरूपको नमस्कार है। जगत्के साक्षी, अनन्त, अप्रमेय तथा कार्य एवं कारणरूपको नमस्कार है। पञ्चभूतरूपको नमस्कार है। पञ्चभूतात्मा (पञ्चभूतके अधिष्ठान आत्मा)-को नमस्कार है, मूलप्रकृतिको नमस्कार है। मायारूप आपको नमस्कार है॥ १५–१७॥
नमोऽस्तु ते वराहाय नमस्ते मत्स्यरूपिणे ।<br>नमो योगाधिगम्याय नमः संकर्षणाय ते ॥ १८ ॥<br>नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं त्रिधाम्ने दिव्यतेजसे ।<br>नमः सिद्धाय पूज्याय गुणत्रयविभाविने ॥ १९ ॥<br>नमोऽस्त्वादित्यवर्णाय नमस्ते पद्मयोनये ।<br>नमोऽमूर्ताय मूर्ताय माधवाय नमो नमः ॥ २० ॥हे वराह! आपको नमस्कार है। मत्स्यरूप धारण करनेवालेको नमस्कार है। योगद्वारा जानने योग्यको नमस्कार है। संकर्षण! आपको नमस्कार है। तीन मूर्तियों एवं तीन धामों (स्थानों)-वाले दिव्य तेजःस्वरूप आपको नमस्कार है। तीन गुणोंको प्रवृत्त करनेवाले सिद्ध एवं पूज्य आपको नमस्कार है। आदित्यके समान वर्णवाले अर्थात् प्रकाशस्वरूप आपको नमस्कार है। पद्मयोनिको नमस्कार है। मूर्त एवं अमूर्तरूपको नमस्कार है। माधवको बारम्बार नमस्कार है॥ १८–२०॥
त्वयैव सृष्टमखिलं त्वय्येव लयमेष्यति ।<br>पालयैतज्जगत् सर्वं त्राता त्वं शरणं गतिः ॥ २१ ॥आपके द्वारा ही सम्पूर्ण सृष्टि हुई है और आपमें ही (वह) विलीन भी हो जायगी। इस सम्पूर्ण जगत्का आप पालन करें। आप ही रक्षक हैं, आप ही शरण देनेवाले आश्रय-स्थान हैं॥ २१॥
इत्थं स भगवान् विष्णुः सनकाद्यैरभिष्टुतः ।<br>प्रसादमकरोत् तेषां वराहवपुरीश्वरः ॥ २२ ॥सनक आदि (महर्षियों)-के द्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर वराह-शरीर धारण करनेवाले सर्वसमर्थ उन भगवान् विष्णुने उनपर कृपा की। इसके बाद पृथ्वीके स्वामी प्रजापतिने पृथ्वीको उसके स्थानमें प्रतिष्ठित कर दिया और मनसे उसको धारण करके अपने (वराह)-रूपको छोड़ दिया॥ २२-२३॥
ततः संस्थानमानीय पृथिवीं पृथिवीपतिः ।<br>मुमोच रूपं मनसा धारयित्वा प्रजापतिः ॥ २३ ॥
तस्योपरि जलौघस्य महती नौरिव स्थिता ।<br>विततत्वाच्च देहस्य न मही याति सम्प्लवम् ॥ २४ ॥उस महान् जलराशिके ऊपर विशाल नौकाके समान स्थित पृथ्वी अपने देहके विस्तारके कारण डूबती नहीं है॥२४॥

४४ * कूर्मपुराण *


पृथिवीं तु समीकृत्य पृथिव्यां सोऽचिनोद् गिरीन्।
प्राक्सर्गदग्धानखिलांस्ततः सर्गेऽदधन्मनः ॥ २५ ॥

तदनन्तर पृथ्वीको समतल बनाकर उन्होंने पहली सृष्टिके दग्ध हुए समस्त पर्वतोंको पृथ्वीपर स्थापित किया और सृष्टि (करने)-में अपना मन लगाया ॥ २५ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें छठा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६ ॥


सातवाँ अध्याय

नौ प्रकारकी सृष्टि, ब्रह्माजीके मानस पुत्रोंका आविर्भाव, ब्रह्माजीके चारों मुखोंसे चारों वेदोंकी उत्पत्ति इत्यादिका वर्णन

श्रीकूर्म उवाच

सृष्टिं चिन्तयतस्तस्य कल्पादिषु यथा पुरा।
अबुद्धिपूर्वकः सर्गः प्रादुर्भूतस्तमोमयः ॥ १ ॥
तमो मोहो महामोहस्तामिस्रश्चान्धसंज्ञितः।
अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः ॥ २ ॥
पञ्चधावस्थितः सर्गो ध्यायतः सोऽभिमानिनः।
संवृतस्तमसा चैव बीजकम्भुवनावृतः ॥ ३ ॥
बहिरन्तश्चाप्रकाशः स्तब्धो निःसंज्ञ एव च।
मुख्या नगा इति प्रोक्ता मुख्यसर्गस्तु स स्मृतः ॥ ४ ॥

तं दृष्ट्वासाधकं सर्गममन्यदपरं प्रभुः।
तस्याभिध्यायतः सर्गस्तिर्यक्स्रोतोऽभ्यवर्तत ॥ ५ ॥

यस्मात् तिर्यक् प्रवृत्तः स तिर्यक्स्रोतस्ततः स्मृतः।
पश्वादयस्ते विख्याता उत्पथग्राहिणो द्विजाः ॥ ६ ॥
तमप्यसाधकं ज्ञात्वा सर्गमन्यं ससर्ज ह।
ऊर्ध्वस्रोत इति प्रोक्तो देवसर्गस्तु सात्त्विकः ॥ ७ ॥

ते सुखप्रीतिबहुला बहिरन्तश्च नावृताः।
प्रकाशा बहिरन्तश्च स्वभावाद् देवसंज्ञिताः ॥ ८ ॥


श्रीकूर्म बोले— उनके (ब्रह्माके) द्वारा सृष्टिके विषयमें सोचते रहनेपर अबुद्धिपूर्वक अन्धकाररूप वैसी ही सृष्टि हुई जैसी कि पूर्वके कल्पोंमें हुई थी। उन महात्मासे तम, मोह, महामोह, तामिस्र तथा अन्ध नामवाली यह पञ्चपर्वा अविद्या उत्पन्न हुई। उस अभिमानी (देव)-के द्वारा ध्यान करते समय अन्धकारसे ढकी हुई बीज-सदृश तथा लोकोंसे आवृत्त वह सृष्टि पाँच भागोंमें विभाजित होकर स्थित हुई ॥ १–३ ॥

बाहर एवं भीतरके प्रकाश (ज्ञान)-से शून्य, स्तब्ध (जड) तथा संज्ञा (चेतना)-विहीन नग (अर्थात् पर्वत, वृक्ष आदि) 'मुख्य' इस नामसे कहे जाते हैं और वही मुख्य सर्ग (मुख्य सृष्टि) कहलाता है। प्रभुने उस (मुख्य सर्ग)-को (सृष्टिके विस्तारमें) साधक (समर्थ) न देखकर दूसरी सृष्टिके लिये विचार किया। उनके ऐसा विचार करते ही 'तिर्यक्स्रोत' नामक (पशु-पक्षियों आदिकी) सृष्टि हुई। हे ब्राह्मणो! क्योंकि वह सृष्टि तिर्यक् (तिरछी) चलनेवाली थी, इसलिये तिर्यक्स्रोत सृष्टि कहलाती है। वे (मार्गका उल्लंघन करनेवाले) पशु आदि उत्पथग्राही कहे जाते हैं ॥ ४–६ ॥

उस तिर्यक्स्रोत नामक सृष्टिको भी (सृष्टि-विस्तारके लिये) निष्प्रयोजन जानकर (उन देवने) अन्य सर्गको उत्पन्न किया। वह (सर्ग) ऊर्ध्वस्रोत सात्त्विक सर्ग 'देवसर्ग' नामसे कहा गया। इस देवसर्गके लोगोंमें सुख और प्रीतिकी अधिकता रहती है। वे अंदर तथा बाहर आवरणसे रहित होते हैं तथा स्वभावसे ही अंदर-बाहर प्रकाशसे परिपूर्ण रहते हैं, इसलिये वे देव कहलाते हैं ॥ ७-८ ॥

  • अध्याय ७ * ४५

ततोऽभिध्यायस्तस्तस्य सत्याभिध्यायिनस्तदा।
प्रादुरासीत् तदाव्यक्तादर्वाक्स्रोतस्तु साधकः ॥ ९ ॥

तदनन्तर निरन्तर सत्यका ध्यान करनेवाले उन देवके चिन्तन करनेपर उसी समय अव्यक्त (प्रकृति)-से (सृष्टि-विस्तारका) साधक अर्वाक्स्रोतवाला साधक (सर्ग) उत्पन्न हुआ। वे (अर्वाक्स्रोत प्राणी) प्रकाश (ज्ञान)-के बाहुल्यवाले, तमोगुण तथा रजोगुणकी अधिकतावाले, अधिक दुःखवाले और सत्त्वगुणसे सम्पन्न मनुष्य नामसे कहे जाते हैं॥ ९-१०॥

ते च प्रकाशबहुलास्तमोद्रिक्ता रजोऽधिकाः।
दुःखोत्कटाः सत्त्वयुता मनुष्याः परिकीर्तिताः ॥ १० ॥
तं दृष्ट्वा चापरं सर्गममन्यद् भगवानजः।
तस्याभिधायतः सर्गं सर्गो भूतादिकोऽभवत् ॥ ११ ॥

उस (मानुष-सर्ग)-को देखकर अजन्मा भगवान्ने अन्य सर्गकी रचनाका विचार किया और उनके ऐसे सर्ग-विषयक ध्यान करते ही भूतादि सर्ग उत्पन्न हुआ।

तेऽपरिग्राहिणः सर्वे संविभागरताः पुनः।
खादनाश्चाप्यशीलाश्च भूताद्याः परिकीर्तिताः।
इत्येते पञ्च कथिताः सर्गा वै द्विजपुंगवाः ॥ १२ ॥

वे सभी संग्रह न करनेवाले, फिर भी बाँटनेके स्वभाववाले, उपभोग करनेवाले तथा शीलरहित 'भूतादि' इस नामसे कहे गये हैं। ब्राह्मणश्रेष्ठो! इस प्रकार ये पाँच सर्ग कहे गये हैं॥ ११-१२॥

प्रथमो महतः सर्गो विज्ञेयो ब्रह्मणस्तु सः।
तन्मात्राणां द्वितीयस्तु भूतसर्गो हि स स्मृतः ॥ १३ ॥
वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्ग ऐन्द्रियकः स्मृतः।
इत्येष प्राकृतः सर्गः सम्भूतोऽबुद्धिपूर्वकः ॥ १४ ॥

ब्रह्माका वह पहला सर्ग महत्सर्ग कहा गया है। तन्मात्राओंका दूसरा सर्ग भूतसर्ग कहलाता है। तीसरा वैकारिक सर्ग ऐन्द्रियक सर्ग कहा जाता है। इस प्रकार यह प्राकृत सर्ग अबुद्धिपूर्वक हुआ। चौथा सर्ग मुख्य सर्ग है। स्थावर (जड पदार्थ) मुख्य कहलाते हैं।

मुख्यसर्गश्चतुर्थस्तु मुख्या वै स्थावराः स्मृताः।
तिर्यक्स्रोतस्तु यः प्रोक्तस्तिर्यग्योन्यः स पञ्चमः ॥ १५ ॥
तथोर्ध्वस्रोतसां षष्ठो देवसर्गस्तु स स्मृतः।
ततोऽर्वाक्स्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः ॥ १६ ॥
अष्टमो भौतिकः सर्गो भूतादीनां प्रकीर्तितः।
नवमश्चैव कौमारः प्राकृता वैकृतास्त्विमे ॥ १७ ॥

तिर्यक्स्रोतसे जिस सर्गको बतलाया है वह तिर्यग्योनिवाला पाँचवाँ सर्ग है। तदनन्तर ऊर्ध्वस्रोतसोंका छठा सर्ग है जो देवसर्ग कहलाता है। तदनन्तर अर्वाक्स्रोतसोंका सातवाँ सर्ग है जो मानुष सर्ग है। भूतादिकोंका आठवाँ सर्ग भौतिक सर्ग कहा गया है। नवाँ सर्ग कौमार सर्ग है। इस प्रकार ये नवों सर्ग प्राकृत तथा वैकृत दोनों प्रकारके हैं॥ १३-१७॥

प्राकृतास्तु त्रयः पूर्वे सर्गास्तेऽबुद्धिपूर्वकाः।
बुद्धिपूर्वं प्रवर्तन्ते मुख्याद्या मुनिपुंगवाः ॥ १८ ॥

मुनिश्रेष्ठो! पहलेके तीन सर्ग (महत्सर्ग, भूतसर्ग तथा ऐन्द्रियक सर्ग) प्राकृत सर्ग हैं, जो अबुद्धिपूर्वक होते हैं। और मुख्य आदि सर्ग (अवशिष्ट ६ सर्ग) बुद्धिपूर्वक होते हैं॥ १८॥

अग्रे ससर्ज वै ब्रह्मा मानसानात्मनः समान्।
सनकं सनातनं चैव तथैव च सनन्दनम्।
ऋभुं सनत्कुमारं च पूर्वमेव प्रजापतिः ॥ १९ ॥
पञ्चैते योगिनो विप्राः परं वैराग्यमास्थिताः।
ईश्वरासक्तमनसो न सृष्टौ दधिरे मतिम् ॥ २० ॥

प्रजापति ब्रह्माजीने सबसे पहले अपने ही समान सनक, सनातन, सनन्दन, ऋभु तथा सनत्कुमार नामक मानस पुत्रोंको उत्पन्न किया। हे ब्राह्मणो! ये पाँचों योगी थे, परम वैराग्यवान् थे और ईश्वरमें उनका मन आसक्त था। (इसलिये) उन्होंने सृष्टि (-के विस्तार)-में अपनी बुद्धि नहीं लगायी ॥ १९-२०॥