माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
भाषाटीकासमेत । (८९)
शिरसः परिपूर्णत्वमभक्तच्छन्द एव च । कासः कण्ठस्य चोद्ध्वंसो विज्ञेयः कफकोपतः ॥ ७ ॥ एकादशभिरेतैर्वा षड्भिर्वापि समन्वितम् । कासातिसारपार्श्वार्तिस्वरभेदारुचिज्वरैः ॥ ८ ॥ त्रिभिर्वा पीडितं लिङ्गैर्ज्वरकासासृगामयैः । जह्याच्छोषार्दितं जन्तुमिच्छन्सुविपुलं यशः ॥ ९ ॥ यह राजयक्ष्मा त्रिदोषसे उत्पन्न है इसमें दोषोंके न्यारे न्यारे मिलाय कर सब ग्यारह रूप हैं, ये व्याधिके प्रभावसे होते हैं। सन्निपातज्वरके सदृश सर्वलक्षण सब दोषोंसे नहीं होते पृथक् पृथक् होते हैं। सो दिखाते हैं-बादीके प्रभावसे स्वरभेद, कन्धे और पसवाडोंमें संकोच और पीडा हो, पित्तसे ज्वर, दाह, अतिसार और मुखसे रुधिरका गिरना और कफके कोपसे मस्तकका भारीपना, अन्नसे द्वेष, खांसी, स्वरभेद ये लक्षण होते हैं, इसमें तीन तो वातसे और चार लक्षण पित्तसे तथा चारही लक्षण कफसे ऐसे सब ग्यारह लक्षणसे अथवा खांसी, अतिसार, पसवाडोंमें पीडा, स्वरभेद, अरुचि और ज्वर इन छः लक्षणोंसे अथवा ज्वर खांसी और रुधिरविकार इन तीन लक्षणोंसे पीडित क्षयीरोगवाले मनुष्य तथा जिसका बल मांस क्षीण होगया हो ऐसे रोगीको यशकी इच्छावाला वैद्य त्याग दे ऐसा रोगी असाध्य है ॥ साध्यासाध्य विचार । सर्वैरधैँस्त्रिभिर्वापि लिङ्गैरैर्वापि बलक्षये । युक्तो वर्ज्यश्चिकित्स्यस्तु सर्वरूपोऽप्यतोऽन्यथा ॥ १० ॥ स्वरभेदादिक जो ग्यारह लक्षण कहे उन सब लक्षणों करके अथवा उनमेंसे आधे अर्थात् छः लक्षणोंसे अथवा तीन लक्षण कहे इनसे युक्त जो क्षयीरोगी बल, मांस क्षीण होनेपर त्याज्य है। यदि बल, मांस जिसका क्षीण न भया हो परन्तु सर्व- लक्षण युक्त भी है तथापि त्याज्य नहीं है, उसकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ असाध्य लक्षण । महाशिनं क्षीयमाणमतिसारनिपीडितम् । शूनमुष्कोदरं चैव यक्ष्मिणं परिवर्जयेत् ॥ ११ ॥ जो बहुत भोजन करे परन्तु दिनप्रति क्षीण होता जाय वह असाध्य रोगी है, अतिसार करके अत्यन्त पीडित हो सो रोगी भी असाध्य होता है. क्योंकि क्षय- रोगवालेका जीना मलके आधीन है । जैसे लिखा है-“मलायत्तं बलं पुंसां शुक्रा-
( ९० ) माधवनिदान ।
( ९० ) माधवनिदान । यत्तं तु जीवितम् । तस्माद्यत्नेन संरक्षेद्यक्ष्मिणो मलरेतसी ॥" इति । और जिसके अंडकोश और उदर ये सूज गये हों ऐसा रोगी असाध्य है क्योंकि शोथवाला दस्तके करानेसे अच्छा होता है सो इसपर दस्त कराना वर्जित है । इसीसे ऐसे रोगीको वैद्य त्याग दे ॥ कौनसे रोगीको औषध देना योग्य है ? सो कहते हैं— ज्वरानुबन्धरहितं बलवन्तं क्रियासहम् । उपक्रमेदात्मवन्तं दीप्ताग्निमकृशं नरम् ॥ १२ ॥ जिस क्षय रोगवाले मनुष्यको ज्वरका सम्बन्ध होय नहीं, बलवान्, औषधादि उपचारका सहनेवाला और जिसकी इन्द्रियें बलमें हों तथा जठराग्नि जिसकी दीप्त होय और कृश न हो ऐसे रोगीकी चिकित्सा ( उपचार ) करना चाहिये । इस श्लोकमें "अकृशं" इस पदके धरनेका यह प्रयोजन है कि पुष्टदेहवाला भी क्षय रोगसे हजार दिन बच सके है सोई ग्रन्थान्तरमें लिखो है ॥ असाध्य लक्षण । शुक्लाक्षमन्नद्वेष्टारमूर्ध्वश्वासनिपीडितम् । कृच्छ्रेण बहु मेहन्तं यक्ष्मा हन्तीह मानवम् ॥ १३ ॥ सफेद नेत्र जिसके होगये हों, अन्न जिसको बुरा लगे, ऊर्ध्वश्वाससे पीडित और कष्टसे बहुत मूतनेवाला अर्थात् मल सुखसे उतरे इससे यह दिखाया कि जो आहार खाय सो मल होजाय, जब आहारका मल होगया तब उसके मांस रुधिर इनका क्षय होता है इसीसे यह असाध्य है, शुक्लाक्षादिक ये प्रत्येक अलग २ भी असाध्य हैं ॥ अब कहते हैं, कि अति मैथुनादि करनेसे धातुका क्षय होता है इसीसे क्षयरोग प्रगट होता है ऐसा नहीं किन्तु और भी कारणसे होता है उसको कहते हैं— व्यवायशोकवार्द्धक्यव्यायामाध्वप्रशोषिणः । व्रणोरःक्षतसंज्ञौ च शोषिणौ लक्षणं शृणु ॥ १४ ॥ अति मैथुनसे शोषी, शोक शोषी, वार्द्धक्यशोषी, व्यायामशोषी, मार्गशोषी, व्रण- शोषी और उरःक्षतशोषी इनके न्यारे न्यारे लक्षण कहता हूँ ॥ व्यवायशोषीके लक्षण । व्यवायशोषी शुक्रस्य क्षयलिङ्गैरुपद्रुतः । पाण्डुदेहो यथापूर्वं क्षीयन्ते चास्य धातवः ॥ १५ ॥ १ परं दिनसहस्रं तु यदि जीवति मानवः । सुभिषग्भिरुपक्रान्तस्तरुणः शोषपीडितः ॥ इति ॥
भाषाटीकासमेत । ( ९१ ) व्यवायशोषी ( अति मैथुनसे क्षीण भया ) सुश्रुतके कहे अनुसार शुक्रक्षय- लक्षणोंसे [ शुक्रक्षय होनेसे लिंग और अण्डकोशमें पीडा होय, मैथुन करनेसे अशक्त और बलसे मैथुन करे तो बहुत देरमें शुक्रका स्राव हो और वह स्राव बहुत अल्प होय अथवा रुधिरका स्राव होय ] पीडित होय उसके देहका वर्ण पीला होजाता है और शुक्रसे मज्जा, मज्जासे हड्डी ऐसे उलटे धातु क्षीण हो जाते हैं ॥ शोकशोषीके लक्षण । प्रध्यानशीलः स्त्रस्ताङ्गः शोकशोष्याप तादृशः । शोकशोषी अर्थात् शोचसे जिसको क्षय होय वह चिन्ता करे और हाथ पैर गलने लगें तथा शुक्रक्षयव्यतिरिक्त शोषवान् हो और पाण्डु देह हो ऐसा शोचसे क्षय- वाला पुरुष होता है ॥ जराशोषीके लक्षण । जराशोषी कृशो मन्दवीर्यबुद्धिबलेन्द्रियः ॥ १६ ॥ कंपनोऽरुचिमान् भिन्नकांस्यपात्रहतस्वरः । ष्ठीवति श्लेष्मणा हीनं गौरवारुचिपीडितः ॥ १७ ॥ संप्रस्रुतास्यनासाक्षः शुष्करूक्षमलच्छविः । जरा ( बुढापे ) से शोषवाला मनुष्य कृश होता है, उसके वीर्य बुद्धि बल और इंद्रिय ये मन्द हो जाते हैं, कम्प हो, अन्नमें अरुचि, फूटे कांसीके बासनको लक- डीके बजानेसे जैसा शब्द हो ऐसा शब्द हो, कफरहित बारम्बार थूके अर्थात् कफके निकालनेके वास्ते यत्न करे तथापि कफ नहीं निकले, शरीर भारी रहे, अरु- चिसे पीडित पुनः अरुचिग्रहण विशेषतः द्योतनके वास्ते कहा है। मुख नाक और नेत्र इनसे स्राव हो, मल शुष्क उतरे और देहकी कांति निस्तेज होय ॥ अध्वप्रशोषीके लक्षण । अध्वप्रशोषी स्रस्ताङ्गः संभृष्टपरुषच्छविः । प्रसुप्तगात्रावयवः शुष्कक्लोमग्लाननः ॥ १८ ॥ अध्वप्रशोषी ( अतिमार्ग चलनेसे क्षीण हुआ ) मनुष्यके हाथ पैर शिथिल हो जावें, उसके देहका वर्ण भूञ्जे पदार्थके सदृश और खरदरा होय है, सर्व देहमें प्रसुप्तता, हृदयमें प्यासका स्थान है सो गला और मुख इनका सूखना । शंका-क्योंजी ! जराशोषीके अनन्तर व्यायामशोषीके लक्षण कहने चाहिये पीछे अध्व ( मार्ग )-
( ९२ ) माधवनिदान ।
( ९२ ) माधवनिदान । शोषीके लक्षण कहने चाहिये फिर माधवाचार्यने अध्वशोषीके लक्षण क्यों कहे ? उत्तर-अध्वशोषीके लक्षण इस वास्ते कहे कि व्यायामशोषीके इसके सब लक्षण मिलते हैं । शंका-अच्छा आप ऐसे कहोगे तो व्यायामशोषीमें अध्वशोषीके कौनसे लक्षण नहीं मिलते ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है परन्तु अध्वशोषीमें उरःक्षत आदि चिह्न नहीं हैं इससे पूर्व अध्वशोषीके लक्षण कहे ॥ व्यायामशोषीके लक्षण । व्यायामशोषी भूयिष्ठमेभिरेव समन्वितः । लिङ्गैरुरःक्षतकृतैः संयुक्तश्च क्षतं विना ॥ १९ ॥ व्यायामशोषी ( अत्यन्त दंडकसरत आदि श्रमसे क्षीण ) मनुष्य विशेष करके अध्वशोषीके लक्षण स्रस्तांगतादियुक्त होता है अर्थात् जो लक्षण अध्वशोषीमें थोडे थोडे होते हैं वे व्यायामशोषीमें अधिक होते हैं और उस मनुष्यके घावके बिनाही उरःक्षतके लक्षण मिलते हैं । उरःक्षतके लक्षण सुश्रुतमें लिखे हैं ॥ तीन कारणोंसे व्रणशोष होय, सो कहते हैं-- रक्तक्षयाद्वेदनाभिस्तथैवाहारयन्त्रणात् । व्रणिनश्च भवेच्छोषः स चासाध्यतमो मतः ॥ २० ॥ रुधिरके क्षयसे, फोडाकी पीडासे तैसे ही आहारके घटनेसे व्रणी पुरुषके जो शोष होय सो अत्यन्त असाध्य जानना ॥ उरःक्षतसे धातुशोष होनेका सम्भव है अतएव शोषप्रकरणमें निदानसहित उरःक्षतरोग कहते हैं-- धनुषाऽऽयस्यतोऽत्यर्थं भारमुद्वहतो गुरुम् । युध्यमानस्य बलिभिः पततो विषमोच्चतः ॥ २१ ॥ वृषं हयं वा धावन्तं दम्यं चान्यं निगृह्णतः । शिलाकाष्ठाश्मनिर्घातान् क्षिपतो निघ्नतः परान् ॥ २२ ॥ अधीयानस्य वाऽप्युच्चैर्दूरं वा व्रजतो द्रुतम् । महानदीर्वा तरतो हयैर्वा सह धावतः ॥ २३ ॥ सह- सोत्पततो दूरात्तूण वातिप्रनृत्यतः । तथाऽन्यैः कर्मभिः १ "तस्योरसि क्षते रक्तं भूयः श्लेष्मा च गच्छति । कासमानश्छर्दयेच्च पीतरक्तासितारुणम्॥ सन्तप्तवक्षसोऽत्यर्थं दमनात्परिताम्यति । दुर्गन्धोच्छ्वासवदनो भिन्नवर्णस्वरो नरः ॥ " इति
भाषाटीकासमेत । ( ९३ ) क्रूरैर्भृशमभ्याहतस्य च ॥ २४ ॥ ताडिते वक्षसि व्याधि- र्बलवान् समुदीर्यते । स्त्रीषु चातिप्रसक्तस्य रूक्षाल्पप्रमिता- शिनः ॥ २५ ॥ उरो विरुज्यतेऽत्यर्थं भिद्यतेऽथ विभज्यते । प्रपीड्यते तथा पार्श्वे शुष्यत्यङ्गं प्रवेपते ॥ २६॥ क्रमाद्वीर्यं बलं वर्णो रुचिरग्निश्च हीयते । ज्वरो व्यथा मनोदैन्यं विड्भेदोऽग्निवधावपि ॥ २७॥ दुष्टः श्यावोऽथ दुर्गन्धः पीतो विग्रथितो बहुः । कासमानस्य चाभीक्ष्णं कफः सास्रः प्रवर्त्तते ॥ २८ ॥ सक्षतः क्षीयतेऽत्यर्थं तथा शुक्रौजसोः क्षयात् । बहुत तीरंदाजी करनेसे, बहुत भारी वस्तु उठानेसे, बलवान् पुरुषके साथ युद्ध करनेसे, ऊंचे स्थानसे गिरनेसे, बैल, घोडा, हाथी, ऊंट इत्यादिक दौडते हुएको थामनेसे, भारी शिला लकडी पत्थर निर्घात ( अस्त्रविशेष ) इनके फेंकनेसे शत्रुको मारनेवाला, जोरसे वेदादिक शास्त्रको पढनेसे अथवा दूर दिशावर शीघ्र चलकर जानेसे, गंगा यमुनादि महानदीको तरनेवाला, अथवा घोडेके साथ दौडनेवाला, अकस्मात् कला खानेवाला, जल्दी जल्दी बहुत नाचनेसे, इसी प्रकार दूसरे मल्ल- युद्धादि क्रूरकर्म करनेसे, उर ( छाती ) फट जाती है ऐसे पुरुषकी छाती दुखनेसे बलवान् उरःक्षतरूप व्याधि उत्पन्न होय है और बहुत मैथुन करनेसे वा खानेसे तथा छातीमें चोट लगनेसे अत्यंत स्त्रीरमण करनेसे और रूखा थोडा कुसमय और बिना अनुमानका भोजन करनेवालेके-पूर्वोक्त लक्षणयुक्त ऐसे पुरुषका हृदय फटेके सदृश मालूम हो अथवा हृदयके दो टूक कर डाले ऐसा मालूम हो और हृदयमें अत्यन्त पीडा हो और उसके पसवाडोंमें अत्यन्त पीडा हो, अंग सब सूखने लगें तथा थरथर कांपने लगें और शक्ति, मांस, वर्ण, रुचि और अग्नि ये सब क्रमसे घटने लगे, ज्वर रहे, व्यथा हो, मनमें सन्ताप, दीन होजाय, अग्नि मन्द होनेसे दस्त होने लगें और बारंबार खाँसते २ दुष्ट काला अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त पीला गांठके समान बहुत और रुधिर मिला ऐसा कफ गिरे इस प्रकार क्षतरोगी अत्यन्त क्षीण होय सो केवल क्षतसे ही क्षीण हो जाय ऐसा नहीं किन्तु स्त्रीसेवन करनेसे शुक्र और ओज ( सब धातुओंका तेज ) इनका क्षय होनेसे यह मनुष्य क्षीण हो जाता है ॥ उरःक्षतका पूर्वरूप । अव्यक्तं लक्षणं तस्य पूर्वरूपमिति स्मृतम् ॥ २९ ॥ उस उरःक्षतके अप्रगट लक्षणोंको पूर्वरूप कहते हैं ॥
( ९४ ) माधवनिदान ।
( ९४ ) माधवनिदान । क्षतक्षीणके असाध्य लक्षण । उरोरुक्शोणितच्छर्दिः कासो वैशेषिकः कफे । क्षीणे सरक्तमूत्रत्वं पार्श्वपृष्ठकटिग्रहः ॥ ३० ॥ क्षतक्षीण रोगीके हृदयमें पीडा होय, रुधिरकी उलटी करे और विशिष्ट कास अर्थात् पूर्व कहे जो दुष्टश्वासादि लक्षण उन्होंसे युक्त और रुधिरयुक्त मूत्रका उतरना, पसवाडे, पीठ और कमर इनमें पीडा होय ॥ साध्यलक्षण । अल्पलिङ्गस्य दीप्ताग्नेः साध्यो बलवतो नवः । परिसंवत्सरो याप्यः सर्वलिङ्गं विवर्जयेत् ॥ ३१ ॥ जिसमें थोडे लक्षण मिलते हों और जिसकी अग्नि दीप्त हो ऐसे पुरुष बलवान् हो तथा रोग नवा हो तो वह साध्य है और रोगको भये एक वर्ष व्यतीत हो गया हो सो याप्य ( साध्यासाध्य ) है और जिसमें सर्वलक्षण मिलते हों सो असाध्य है उसको वैद्य त्याग दे ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां राजयक्ष्मरोगः समाप्तः ॥ अथ कासनिदानम् । कारण सम्प्राप्ति और निरुक्ति । धूमोपघाताद्रजसस्तथैव व्यायामरूक्षान्ननिषेवणाच्च । विमार्गगत्वादपि भोजनस्य वेगावरोधात्क्षवथोस्तथैव ॥ १ ॥ प्राणो ह्युदानानुगतः प्रदुष्टः संभिन्नकांस्यस्वरतुल्यघोषः । निरेति वक्रात्सहसा सदोषो मनीषिभिः कास इति प्रदिष्टः ॥२॥ नाक मुखमें धूर धूआँ जानेसे, दंडकसरत, रूक्षान्न इनके नित्य सेवन करनेसे, भोजनके कुपथ्यसे, मलमूत्रके रोकनेसे, उसी प्रकार छिक्का अर्थात् छींक आती हुईके रोकनेसे प्राणवायु अत्यन्त दुष्ट होकर और दुष्ट उदानवायुसे मिलकर कफ- पित्तयुक्त अकस्मात् मुखसे बाहर निकले उसका शब्द फूटे कांस्यपात्रके समान हो उसको विद्वान् लोग कास ( खांसी ) कहते हैं ॥ १ कसति शिरः कण्ठादूर्ध्वं गच्छति वायुरिति कासः ।
भाषाटीकासमेत । (९५) पञ्च कासाः स्मृता वातपित्तश्लेष्मक्षतक्षयैः । क्षयायोपेक्षिताः सर्वे बलिनश्चोत्तरोत्तरम् ॥ ३ ॥ वात, पित्त, कफ, क्षत और क्षय ऐसे पांच प्रकारकी खांसी होती है इनकी औषध न करे तो सर्वका क्षयरूप हो जाता है। ये उत्तरोत्तर बलवान् जाननी जैसे वातसे पित्तकी, पित्तसे कफकी, कफसे क्षतकी, क्षतसे क्षयकी खांसी प्रबल है ॥ कासका पूर्वरूप । पूर्वरूपं भवेत्तेषां शूकपूर्णगलास्यता । कण्ठे कण्डूश्च भोज्यानामवरोधश्च जायते ॥ ४ ॥ मुख और गलेमें कांटेसे पडजायँ तथा कण्ठमें खुजली चले, भोजन करा न जाय ये खांसी होनेवालेके लक्षण हैं ॥ वातकी खांसीके लक्षण । हृच्छङ्खसूर्धोदरपार्श्वशूली क्षामाननः क्षीणबलस्वरौजाः । प्रसक्तवेगस्तु समीरणेन भिन्नस्वरः कासति शुष्कमेव ॥ ५ ॥ हृदय, कनपटी, मस्तक, उदर, पसवाडा इनमें शूल चले, मुँह उतर जाय, बल, स्वर, पराक्रम ये क्षीण पडजायँ, वारम्वार खांसीका उठना, स्वरभेद और सूखी खांसी उठे ये वातकी खांसीके लक्षण हैं ॥ पित्तकी खांसीके लक्षण । उरोविदाहज्वरवक्त्रशोषैरभ्यर्दितस्तिक्तमुखस्तृषार्तः । पित्तेन पीतानि वमेत्कटूनि कासेत्स पाण्डुः परिदह्यमानः ॥६॥ पित्तकी खांसीके हृदयमें दाह, ज्वर, मुखका सूखना इनसे पीडित हो, मुख कडुवा रहे, प्यास लगे, पीले रंगकी और कडुवी ऐसी पित्तके प्रभावसे वमन हो खांसीके समय रोगीका पीला वर्ण हो जाय और सब देहमें दाह होय ॥ कफकी खांसीके लक्षण । प्रलिप्यमानेन मुखेन सीदञ्छिरोरुजार्तः कफपूर्णदेहः । अभक्तरुग्गौरवकण्डुयुक्तः कासेद्भृशं सान्द्रकफः कफेन ॥ ७ ॥ कफकी खांसीसे मुख कफसे लिपटा रहे, शिरमें दर्द और सब देह कफसे परि- पूर्ण रहे, अन्नमें अरुचि, शरीर भारी रहे, कण्ठमें खुजली और रोगी बारंबार खांसे, कफकी गांठ थूकनेसे सुख मालूम होय ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ९६ ) माधवनिदान ।
( ९६ ) माधवनिदान । क्षतकासलक्षण । अतिव्यवायभाराध्वयुद्धाश्वगजनिग्रहैः। रूक्षस्योरःक्षतं वायु- र्गृहीत्वा कासमावहेत् ॥ ८ ॥ स पूर्वं कासते शुष्कं ततः ष्ठीवेत् सशोणितम् । कण्ठेन रुजताऽत्यर्थं विरुग्णेनेव चोरसा ॥ ९ ॥ सूचीभिरिव तीक्ष्णाभिस्तुद्यमानेन शूलिना । दुःख- स्पर्शेन शूलेन भेदपीडाभितापिना ॥१०॥ पर्वभेदज्वरश्वास- तृष्णावैस्वर्यपीडितः । पारावत इवाकूजन्कासवेगात्क्षतोद्भवात् १ १ बहुत स्त्रीसंग करनेसे, भारके उठानेसे, बहुत मार्ग चलनेसे, मलयुद्ध ( कुस्ती ) करनेसे, दौडते हुए हाथी घोडेको रोकनेसे इन कारणोंसे रूक्ष पुरुषका हृदय फूट- कर वायुकोप होकर खांसीको प्रगट करे । सो पुरुष प्रथम सूखा खांसे, पीछे रुधिर मिला थुके, कण्ठ अत्यन्त दूखे, हृदय फटे सदृश मालूम हो और तीखी सूईकेसे चुभक्का चलें और उसको हृदयका स्पर्श सुहाय नहीं, दोनों पसवाडोंमें शूल हो, यह वाग्भटका भी मत है तथा दाह हो उस रोगीके गांठ गांठमें पीडा हो, ज्वर, श्वास, प्यास, क्षतजन्य खांसीके वेगसे रोगी कबूतरकी तरह घुंघुं शब्द करे ॥ क्षयकी खांसीके लक्षण । विषमासात्म्यभोज्यातिव्यवायाद्वेगनिग्रहात् । घृणिनां शोचतां नॄणां व्यापन्नेऽग्नौ त्रयो मलाः ॥ १२ ॥ कुपिताः क्षयजं कासं कुर्युर्देहक्षयप्रदम् । स गात्रशूलज्वरदाहमोहान्प्राणक्षयं चापि लभेत कासी ॥ १३ ॥ शुष्यन्विनिष्ठीवति दुर्बलस्तु प्रक्षीणमांसो रुधिरं सपूयम् । तं सर्वलिङ्गं भृशदुश्चिकित्स्यं चिकित्सितज्ञाः क्षयजं वदन्ति ॥ १४ ॥ कुपथ्य और विषमाशनके करनेसे, अति मैथुन, मलमूत्रादिका वेग धारण इनसे, अति दया करनेसे, अति शोक करनेसे अग्नि मन्द होय अर्थात् आहार थक- कर वायु कुपित हो अग्निको नष्ट करे । तब तीनों दोष कोपको प्राप्त हों क्षयजन्य देहकी नाशक ऐसी खांसीको प्रगट करे । तब वह खांसी देहको क्षीण करे, शूल, ज्वर, दाह और मोह ये होयं, तब यह प्राणका नाश करे । सूखी खांसी, रुधिर, मांस, शरीरका सूखजाना, रुधिर और राध थूके इन सर्व लक्षणयुक्त और चिकित्सा करनेमें अतिकठिन ऐसी इस खांसीको वैद्य क्षयज कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( ९७ ) साध्यासाध्यविचार । इत्येष क्षयजः कासः क्षीणानां देहनाशनः । साध्यो बलवतां वा स्याद्याप्यस्त्वेवं क्षतोत्थितः ॥ १५ ॥ नवौ कदाचित्सिध्येतामपि पादगुणान्वितौ । स्थविराणां जराकासः सर्वो याप्यः प्रकीर्तितः ॥ १६ ॥ त्रीन्पूर्वान्साधयेत्साध्यान्पथ्यैर्याप्यांस्तु यापयेत् ॥ १७ ॥ इस प्रकार यह क्षयज कास (खांसी) क्षीण पुरुषकी घातक होती है, बलवान पुरुषके असाध्य याप्य (साध्यासाध्य) होती है, क्षतज खांसी भी इसी प्रकारकी होती है। यदि वैद्यादि पादचतुष्टयसंपन्न हों और ये दोनों प्रकारकी खांसी नवीन हों तो कदाचित् साध्य होंय और बूढे पुरुषके जराकास अर्थात् धातुक्षीण होनेसे भई जो खांसी सो सब प्रकारकी याप्य हैं, सो सब इन्द्रियोंके अन्तर्गत जाननी । अब कहते हैं कि, वात, पित्त, कफ ये तीन खांसी साध्य हैं और बाकी तीन याप्य हैं वह पथ्य सेवन करनेसे नाश होती हैं और अवज्ञा करनेसे असाध्य होजाती है ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनोमाधुरीभाषाटीकायां कासरोगनिदानं समाप्तम् ॥ हिक्का-श्वासनिदानम् । ꕤ—ꕤ—ꕤ विदाहिगुरुविष्टम्भिरूक्षाभिष्यन्दिभोजनैः । शीतपानाञ्जनस्नानरजोधूमातपानिलैः ॥ १ ॥ व्यायामकर्मभाराध्ववेगघातातपर्पणैः । हिक्का श्वासश्च कासश्च नृणां समुपजायते ॥ २ ॥ दाहकारक, भारी, अफराकारक, रूखा, अभिष्यंदी ऐसे भोजन करनेसे शीतल जल पीनेसे, शीतल अन्न खानेसे शीत जल करके स्नान करनेसे, रज और धूएँके मुख नाकमें जानेसे, गरमी व हवामें डोलनेसे, दंड कसरतके करनेसे, भारके उठानेसे, बहुत मार्गके चलनेसे, मलादि वेगके रोकनेसे और उपवासके करनेसे मनु- ष्यके हिक्का (हिचकी) श्वास (दमा) और (कास) खांसी ये रोग उत्पन्न होते हैं ॥ १ पूयाभमरुणं श्याम हरितं पीतनीलकम् । निष्ठीवेच्छ्वासकासार्तो न जीवति हतस्वरः ॥ कासश्वासक्षयच्छर्दिरस्वरभेदादयो गदाः । मंवत्युपेष्ययाऽसाध्यास्तस्मात्तांस्त्वरया जयेत् ॥ इति॥ ५
( ९८ ) माधवनिदान ।
( ९८ ) माधवनिदान । हिक्काका स्वरूप और निरुक्ति । मुहुर्मुहुर्वायुरुदेति सस्वनो यकृत्प्लीहान्त्राणि मुखादिवाक्षिपन् । सघोषवानाशु हिनस्त्यसून यत- स्ततस्तु हिक्केत्यभिधीयते बुधैः ॥ ३ ॥ उदानवायु प्राणवायुके साथ मिलकर जब निकले तब मनुष्य हिंग हिंग ऐसा शब्द करे और कलेजा प्लीहा इनको मुखपर्यन्त खींच लावे ( इस स्थानमें मुखशब्द करके प्राण जल अन्न इनके बहनेवाले मार्ग जानने ) और मुखमें आनकर बडा शब्द निकले उसको वैद्यवर हिक्का ( हिचकी ) रोग कहे हैं । यह शीघ्र प्राणोंकी हरनेवाली होती है ॥ हिक्काके भेद और सम्प्राप्ति । अन्नजां यमलां क्षुद्रां गम्भीरां महतीं तथा । वायुः कफेनानुगतः पञ्च हिक्काः करोति हि ॥ ४ ॥ वात कफसे मिलकर १ अन्नजा, २ यमला, ३ क्षुद्रा, ४ गम्भीरा और ५ महती ऐसे पांच प्रकारकी हिचकी रोगको प्रगट करे हैं ॥ हिक्काके पूर्वरूप । कण्ठोरसो गुरुत्वं च वदनस्य कषायता । हिक्कानां पूर्वरूपाणि कुक्षेराटोप एव च ॥ ५ ॥ कंठ और हृदय भारी रहे और बादीसे मुख कसैला रहे कूखमें अफरा रहे, यह हिचकीका पूर्वरूप जानना ॥ अन्नजाके लक्षण । पानान्नैरतिसंयुक्तैः सहसा पीडितोऽनिलः । हिक्कयत्यूर्ध्वगो भूत्वा तां विद्यादन्नजां भिषक् ॥ ६ ॥ अन्न और पानीके बहुत सेवन करनेसे वात अकस्मात् कुपित हो ऊर्ध्वगामी होकर मनुष्यके अन्नजा हिचकी प्रगट करे ॥ १ अत्र प्लीहो ह्रस्वकारवान् छन्दोऽनुरोधात् । २ हिनस्त्यसूनिति हिक्केति निरुक्तिः, पृषोदरादिना रूपसिद्धिः । हिगिति कृत्वा कम्पति शब्दायते इति हिक्केति शाब्दिकाः । ३ उक्तं च-प्राणादकान्नव हीनि स्रोतांसि विकृतोऽनिलः । हिक्काः करोति संरुध्य तासां लिङ्गं पृथक् शृणु ॥ इति ।
भाषाटीकासमेत । (९९) यमलाके लक्षण । चिरेण यमलैर्वेगैर्या हिक्का संप्रवर्त्तते । कंपयन्ती शिरो ग्रीवां यमलां तां विनिर्दिशेत् ॥ ७ ॥ ठहर ठहरके दो दो हिचकी चले, शिर कन्धाको कंपावे वह यमला हिचकी जाननी॥ क्षुद्राके लक्षण । प्रकृष्टकालैर्या वेगैर्मन्दैः समभिवर्त्तते । नाभिप्रवृत्ता या हिक्का जत्रुमूलात्प्रधावति ॥ ८ ॥ जो हिचकी बहुत देरमें कण्ठ हृदयकी सन्धिस मन्द मन्द चले उसको क्षुद्रा नाम हिचकी कहते हैं ॥ गंभीराके लक्षण । नाभिप्रवृत्ता या हिक्का घोरा गम्भीरनादिनी । अनेकोपद्रववती गम्भीरा नाम सा स्मृता ॥ ९ ॥ जो हिचकी नाभिके पाससे उठ घोर गम्भीर शब्द करे और जिसमें प्यास ज्वरादि अनेक उपद्रव हों उसको गम्भीरा हिचकी कहते हैं ॥ महती हिचकीके लक्षण । मर्माप्युत्पीडयन्तीव सततं या प्रवर्तते । महाहिक्केति सा ज्ञेया सर्वगात्रप्रकम्पिनी ॥ १० ॥ जो हिचकी मर्मस्थानमें पीडा करती हुई और सर्व गात्रोंको कम्पावती हुई सब कालमें प्रवृत्त होय उसको महाहिक्का कहते हैं ॥ हिचकीके असाध्य लक्षण । आयम्यते हिक्कतो यस्य देहो दृष्टिश्चोर्ध्वं ताम्यते यस्य नित्यम्। क्षीणोऽन्नद्विट् क्षौति यश्चातिमात्रं तौ द्वौ चान्त्यौ वर्जयेद्धिक्कमानौ ॥ ११ ॥ जिसका हिचकीसे देह तन जावे, ऊंची दृष्टि हो जावे और मोह होय, क्षीण पड , जाय, भोजनमें अरुचि हो और छींक बहुत आवें इन दोनों हिचकियोंवाले रोगी अर्थात् जिसको गम्भीरा और महती हिचकी होंय, सो वैद्यको त्याज्य है ॥ अतिसञ्चितदोषस्य भक्तच्छेदकृशस्य च । व्याधिभिः क्षीणदेहस्य वृद्धस्यातिव्यवायिनः ॥ आसां या सा समुत्पन्ना हिक्का हन्त्याशु जीवितम् ॥ १२ ॥
( १०० ) माधवनिदान ।
( १०० ) माधवनिदान । जिसके अत्यन्त दोषोंका संचय हो गया हो और जिसका अन्न छूटगया हो जो कृश हो गया हो, जिसका अनेक व्याधिसे देह क्षीण होगया हो और जो वृद्ध है, अति मैथुन करनेवाला है ऐसे पुरुषके ये दोनों हिचकी उत्पन्न होंयँ तो तत्क्षण उस रोगीके प्राणनाश करें ॥ यमिकाके असाध्य लक्षण । यमिका च प्रलापार्त्तिमोहतृष्णासमन्विता ॥ १३ ॥ बकवाद करे, पीडा हो, मोह प्यास इन लक्षणोंसे युक्त जो यमिकानामकी हिचकी सो तत्काल प्राण हरनेवाली जाननी ॥ यमिकाके साध्य लक्षण । अक्षीणश्चाप्यदीनश्च स्थिरधात्विन्द्रियश्च यः । तस्य साधयितुं शक्या यमिका हन्त्यतोऽन्यथा ॥ १४ ॥ बलवान् प्रसन्न मन जिसकी धातु और इन्द्रिय स्थिर हों ऐसे पुरुषकी यमिका हिचकी साध्य है और इससे विपरीत अर्थात् क्षीण, दीन इत्यादि पुरुषको तत्का- लही नाश करे । अन्नजा, क्षुद्रा ये दोनों साध्य हैं दो बार आनेसे यमिका कहाती है । चरकोक्त यमला इस जगह नहीं ग्रहण करना चाहिये ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाधुरीभाषाटीकायां हिक्कारोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ श्वासनिदानम् । हिक्का श्वासका एक हेतु होनेसे हिक्काके अनन्तर श्वासरोगको कहते हैं— महोर्द्धाच्छिन्नतमकक्षुद्रभेदैस्तु पञ्चधा । भिद्यते स महाव्याधिः श्वास एको विशेषतः ॥ १ ॥ महाश्वास, ऊर्ध्वश्वास, छिन्नश्वास, तमकश्वास और क्षुद्रश्वास इन भेदोंसे एक श्वासरोग पांच प्रकारका है ॥ श्वासके पूर्वरूपके लक्षण । प्राग्रूपं तस्य हृत्पीडा शूलमाध्मानमेव च । आनाहो वक्त्रवैरस्यं शंखनिस्तोद एव च ॥ २ ॥ हृदय दुखे, शूल हो, अफरा हो, पेट तनासा हो, कनपटी दूखे, मुखमें रसका स्वाद आवे नहीं, यह श्वासरोगका पूर्वरूप है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । (१०१) श्वासरोगकी सम्प्राप्ति । यदा स्रोतांसि संरुध्य मारुतः कफपूर्वकः । विष्वग्व्रजति संरुद्धस्तदा श्वासान् करोति सः ॥ ३ ॥ सर्व देहमें विचरनेवाला पवन जब कफसे मिलकर प्राण अन्न उदक बहनेवाली सब नसोंके मार्गको रोक देवे तब पवन फिरनेसे रुककर श्वासरोगको प्रगट करे ॥ महाश्वासके लक्षण । उद्धूयमानवातो यः शब्दवद् दुःखितो नरः । उच्चैः श्वसिति संरुद्धो मत्तर्षभ इवानिशम् ॥ ४ ॥ प्रनष्टज्ञानविज्ञानस्तथा विभ्रान्तलोचनः । विवृताक्ष्याननो बद्धमूत्रवर्चा विशीर्ण- वाक् ॥ ५ ॥ दीनः प्रश्वसितं चास्य दूराद्विज्ञायते भृशम् । महाश्वासोपसृष्टस्तु क्षिप्रमेव विपद्यते ॥ ६ ॥ जिसका वायु ऊपरको जायके प्राप्त हो ऐसा मनुष्य दुःखित होकर मुखसे शब्द- युक्त श्वासको निकाले, ऊंचे स्वरसे अथवा जैसे मतवाला बैल शब्द करे इस प्रकार रात्रिदिन श्वाससे पीडित हो उसके ज्ञान विज्ञान जाते रहे, नेत्र चंचल हों और जिसका श्वास लेनेमें नेत्र और मुख फटजांय, मल मूत्र बन्द हो जाय, बोला जाय नहीं अथवा बोले तो मन्द बोले, मन खिन्न हो और जिसका श्वास दूरसे सुनाई दे यह महाश्वास जिस पुरुषके हो वह तत्काल मरणको प्राप्त होय ॥ ऊर्ध्वश्वासके लक्षण । ऊर्ध्वं श्वसिति यो दीर्घं न च प्रत्याहरत्यधः । श्लेष्मावृतमुख- स्रोताः क्रुद्धगन्धवहादितः ॥ ७ ॥ ऊर्ध्वदृष्टिर्विपश्यंश्च विभ्रां- ताक्ष इतस्ततः । प्रमुह्यन्वेदनार्तश्च शुष्कास्योऽरतिपीडितः ॥८॥ बहुत देरपर्यंत ऊंचा श्वास ले, नीचे आवे नहीं, कफसे मुख भरजाय तथा और सब नाडियोंके मार्ग कफसे बन्द हो जायँ, कुपित वायुसे पीडित हो, ऊपरको नेत्र कर चंचल दृष्टिसे चारों ओर देखे, मूर्च्छाकी पीडासे अत्यन्त पीडित हो, मुख सूखे तथा बेहोश हो ये ऊर्ध्वश्वासके लक्षण हैं ॥ ऊपरकोही श्वास ले नीचे नहीं आवे यह जो कहा उसमें कारण कहते हैं— ऊर्ध्वश्वासे प्रकुपिते ह्यधश्वासो निरुध्यते । मुह्यतस्ताम्यतश्चोर्ध्वं श्वासस्तस्यैव हन्त्यसून् ॥ ९ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( १०२ ) माधवनिदान ।
( १०२ ) माधवनिदान । ऊपरका श्वास कुपित होनेसे नीचेका बन्द होय अर्थात् हृदयमें रुकजाय अथवा श्वास कहिये वायु सो नीचे नहीं उतरे तब मनुष्यको मोह हो, ग्लानि हो ऐसे पुरु- षके ऊर्ध्वश्वास प्राणको हरण करे ॥ छिन्नश्वासके लक्षण । यस्तु श्वसिति विच्छिन्नं सर्वप्राणेन पीडितः । न वा श्वसिति दुःखार्त्तो मर्मच्छेदैरुगर्दितः ॥ १० ॥ आनाहस्वेदमूर्च्छार्त्तो दह्यमानेन बस्तिना । विप्लुताक्षः परिक्षीणः श्वसन्नैकलोचनः ॥ ११ ॥ विचेताः परिशुष्कास्यो विवर्णः प्रलपन्नरः । छिन्नश्वासेन विच्छिन्नः स शीघ्रं विजहात्यसून् ॥ १२ ॥ जो पुरुष ठहर ठहरकर जितनी शक्ति हो उतनी शक्तिसे श्वास त्याग करे अथवा क्लेशको प्राप्त हो श्वासको नहीं छोडे और मर्म कहिये हृदय बस्ति ( मूत्र- स्थान ) और नाडियोंको मानो कोई छेदन करे ऐसी पीडा हो, पेटका फूलना, पसीना और मूर्च्छा इनसे पीडित हो, वस्ति ( मूत्रस्थान ) में जलन हो, नेत्र चला- यमान हों, अथवा नेत्र आंसुओंसे भरे हों, श्वास लेते २ थक जाय तथा श्वास लेते २ एक नेत्र लाल हो जाय ( यह व्याधिके प्रभावसे होय है दोषके प्रभावसे होय तो दोनों होजायँ ), उद्विग्नचित्त होजाय, मुख सूखे, देहका वर्ण पलट जाय, बकवाद करे, संधिके सब बन्ध शिथिल होजायँ, इस छिन्नश्वास करके मनुष्य शीघ्र प्राणका त्याग करे ॥ तमकश्वासके लक्षण । प्रतिलोमं यदा वायुः स्रोतांसि प्रतिपद्यते । ग्रीवां शिरश्च संगृह्य श्लेष्माणं समुदीर्य च ॥ १३ ॥ करोति पीनसं तेन रुद्धो घुर्घुरकं तथा । अतीव तीव्रवेगेन श्वासं प्राणप्रपीडकम् ॥ १४ ॥ प्रताम्यति स वेगेन त्रस्यते संनिरुद्ध्यते । प्रमोहं कासमानश्च स गच्छति मुहुर्मुहुः ॥ १५ ॥ श्लेष्मणा मुच्यमा- नेन भृशं भवति दुःखितः । तस्यैव च विमोक्षान्ते मुहूर्त्तं लभते सुखम् ॥ १६ ॥ तथाऽस्योध्वंसते कण्ठः कृच्छ्रा- च्छक्नोति भाषितुम् । न चापि निद्रां लभते शयानः श्वास- पीडितः ॥ १७ ॥ पार्श्वे तस्यावगृह्णाति शयानस्य समीरणः । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( १०३ ) आसीनो लभते सौख्यमुष्णं चैवाभिनन्दति ॥ १८ ॥ उच्छ्रि- ताक्षो ललाटेन स्विद्यता भृशमार्त्तिमान् । विशुष्कास्यो मुहुः श्वासो मुहुश्चैवावधम्यते ॥ १९ ॥ मेघाम्बुशीतप्राग्वातैः श्लेष्मलैश्च विवर्द्धते । स याप्यस्तमकश्वासः साध्यो वा स्या- न्नवोत्थितः ॥ २० ॥ जिस कालमें शरीरकी पवन उलटी गतिसे नाडियोंके छिद्रमें प्राप्त होकर मस्तक तथा कण्ठका आश्रय कर कफसंयुक्त होय, तब कफसे रुककर अतिवेगपूर्वक कण्ठमें घुरघुर शब्द करे और मस्तकमें पीनस्रोग करे और अत्यन्त तीव्र वेगसे हृदयको पीडाका करनेवाला ऐसे श्वासको उत्पन्न करे उस श्वासके वेगसे मूर्च्छित होय, त्रासको प्राप्त होय, चेष्टारहित होय और खांसीके उठनेसे बडे मोहको बारंबार प्राप्त होय और जब कफ छूटे तब दुःख होय और कफ छूटनेके बाद दो घटी पर्यन्त सुख पावे, कण्ठमें खुजली चले, बडे कष्टसे बोले, श्वासकी पीडासे नींद न आवे, सोवे तो वायुसे पसवाडोंमें पीडा होय, बैठे ही चैन पडे और गरमीके पदार्थोंसे खुश होय, नेत्रोंमें सूजन होय, ललाटमें पसीना आवे, अत्यन्त पीडा होय, मुख सूखे, बारंबार श्वास और बारंबार हाथीपर बैठनेके सदृश सर्व देह चलायमान होवे । यह श्वास मेघके वर्षनेसे, शीतसे, पूर्वकी पवनसे और कफकारक पदार्थोंके सेवन करनेसे बढे है. यह तमकश्वास याप्य है, यदि नया प्रगट भया होय तो साध्य होय है ॥ पित्तका अनुबन्ध होकर ज्वरादिकोंका योग होनेसे प्रतमक होय है, उसको कहते हैं- ज्वरमूर्च्छापरीतस्य विद्यात्प्रतमकं तु तम् । इस तमकश्वासमें ज्वर और मूर्च्छा ये दोनों लक्षण होनेसे इसको प्रतमकश्वास कहते हैं ॥ प्रतमकके दूसरे लक्षण और कारण कहते हैं- उदावर्त्तरजोजीर्णक्लिन्नकायनिरोधजः ॥ २१ ॥ तमसा वर्धतेऽत्यर्थं शीतैश्चाशु प्रशाम्यति । मज्जतस्तमसीवास्य विद्यात्प्रतमकं तु तम् ॥ २२ ॥ उदावर्त, धूल, आमादि अजीर्ण, विदग्धान्न, मलमूत्रादि वेगके रोकनेसे अथवा क्लिन्नकाय कहिये वृद्ध मनुष्य और निरोध कहिये वेगरोध इन कारणोंसे प्रगट भई जो श्वास सो अन्धकारसे अथवा तमोगुणसे अत्यन्त बढे और शीतल उपचारसे शीघ्र शांति हो जाय, इस श्वासके योगसे रोगीको अन्धकारमें डूबा सदृश मालूम होय, इसको प्रतमकश्वास ऐसे कहते हैं ॥
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( १०४ ) माधवनिदान ।
( १०४ ) माधवनिदान । क्षुद्रश्वासके लक्षण और साध्यासाध्य । रूक्षायासोद्भवः कोष्ठे क्षुद्रो वातमुदीरयेत् । क्षुद्रश्वासो न सोऽत्यर्थं दुःखैनाङ्ग-प्रबाधकः ॥ २३ ॥ हिनस्ति न स गात्राणि न च दुःखी यथेतरे । न च भोजनपानानां निरुणद्ध्युचितां गतिम् ॥ २४ ॥ नेन्द्रियाणां व्यथां चापि काञ्चिदापादयेद्रुजम् । स साध्य उक्तो बलिनः सर्वे चाव्यक्तलक्षणाः ॥ २५ ॥ क्षुद्रः साध्यतमस्तेषां तमकः क्षुद्र उच्यते । त्रयः श्वासा न सिध्यन्ति तमको दुर्बलस्य च ॥ २६ ॥ रूखा पदार्थ खानेसे, श्रमके करनेसे प्रगट भई जो क्षुद्र श्वास सो पवनको ऊपर ले जाय, यह क्षुद्रश्वास अत्यन्त दुःखदायक नहीं है तथा अंगोंको कुछ विकार नहीं करे। जैसे ऊर्ध्वश्वासादिक दुःखदायक हैं ऐसे यह नहीं है और भोजनपानादिकोंकी उचित गतिको बन्द नहीं प्रगट करे और इन्द्रियोंको पीडा नहीं करे और कोई रोगको भी नहीं प्रगट करे । यह क्षुद्रश्वास साध्य कहा है । बलवान् पुरुषके सब महाश्वासादिकोंके लक्षण प्रगट न होयँ तो साध्य हैं, तिनमें भी क्षुद्रश्वास अत्यन्त साध्य है और तमकको क्षुद्र कहते हैं । अथवा-“ तमकः क्षुद्र उच्यते ” इस जगह “ तमकः कृच्छ्र उच्यते ” ऐसा भी पाठ कोई कहते हैं । उसका अर्थ यह है कि, तमक कृच्छ्रसाध्य है, महान्, ऊर्ध्व और छिन्न ये तीन श्वास सम्पूर्ण लक्षणयुक्त साध्य नहीं और निर्बल पुरुषके तमकश्वास भी साध्य नहीं होय ॥ कामं प्राणहरा रोगा बहवो न तु ते तथा । यथा श्वासश्च हिक्का च हरतः प्राणमाशु वै ॥ २७ ॥ प्राणहरण करनेवाले ऐसे सन्निपात ज्वरादिक रोग बहुतसे हैं सो ठीक है । परन्तु श्वास और हिचकी ये जैसे जल्दी प्राण हरण करते हैं ऐसे और ज्वरादिक नहीं करे॥ इति श्रीपंडितदत्ताराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां श्वासनिदानं समाप्तम् ॥
अथ स्वरभेदनिदानम् ।
भाषाटीकासमेत । (१०५) अथ स्वरभेदनिदानम् । अत्युच्चभाषणविषाध्ययनाभिघातसंदूषणैः प्रकुपिताः पवना- दयस्तु । स्रोतःसु ते स्वरवहेषु गताः प्रतिष्ठां हन्युः स्वरं भवति चापि हि षड्विधः सः ॥ वातादिभिः पृथक् सर्वैर्मेदसा च क्षयेण च ॥ १ ॥ बहुत जोरसे बोलनेसे, विषके खानेसे, ऊंचे स्वरसे पाठ करनेसे अर्थात् वेदादि पाठ करनेसे कण्ठमें लकडी काष्ठ आदिकी चोट लगनेसे कोपको प्राप्त हुए जो वात, कफ, पित्त सो कण्ठमें स्वरके बहनेवाली चार नसें हैं उनमें प्राप्त हो अथवा उनमें वृद्धिको प्राप्त स्वरको नाश करे । यह स्वरभेद वात, पित्त, कफ, सन्निपात, क्षय और मेद इन भेदोंसे छः प्रकारका है ॥ वातस्वरभेदके लक्षण । वातेन कृष्णनयनाननमूत्रवर्चा भिन्नं स्वरं वदति गर्दभवत्स्वरं च । वायुसे स्वरभंग होय तो रोगीके नेत्र, मुख, मूत्र और विष्ठा यह काले होयँ वह पुरुष टूटाहुआ शब्द बोले अथवा गधेके स्वरप्रमाण कर्कश बोले ॥ पित्तज स्वरभेदके लक्षण । पित्तेन पीतनयनाननमूत्रवर्चा ब्रूयाद्गलेन स च दाहसमन्वितेन ॥ २॥ पित्तस्वरभेदवाले मनुष्यके नेत्र, मुख, मूत्र और विष्ठा ये पीले होते हैं और बोलते समय गलेमें दाह होता है ॥ कफके स्वरभेदके लक्षण । ब्रूयात्कफेनससतंकफरुद्धकण्ठः स्वल्पंशनैर्वदतिचापि दिवाविशेषात्। कफके स्वरभेदमें, कण्ठ कफसे रुका रहे और मन्द मन्द तथा थोडा बोले दिनमें बहुत बोले ॥ सन्निपातके स्वरभेदका लक्षण । सर्वात्मके भवति सर्वविकारसंपत्तं चाप्यसाध्यमृषयः स्वरभेदंमाहुः ३ सन्निपातके स्वरभेदमें तीनों दोषोंके लक्षण होते हैं यह स्वरभेद असाध्य है ऐसे ऋषि लोग कहते हैं ॥ १ यदुक्तं सुश्रुते-द्वाभ्यां भाषते द्वाभ्यां घोषं करोति, भाषणघोषणयोरल्पमहत्त्वाभ्यां भेदः ।
( १०६ ) माधवनिदान ।
( १०६ ) माधवनिदान । क्षयजन्यस्वरभेदके लक्षण । धूम्येत वाक्क्षयकृते क्षयमाप्नुयाच्च वागेश चापि हतवाक्परिवर्जनीयः। क्षयीके स्वरभेदवाले पुरुषके बोलते समय मुखसे धुआँसा निकले और वाणी क्षय हो जाय अर्थात् स्वर नहीं निकले । इस स्वरभेदमें जिस समय वाणी हत हो जाय अर्थात् ओजका क्षय होनेसे बोलनेकी सामर्थ्य नहीं हो तब यह असाध्य होता है और ओजका क्षय ( नाश ) नहीं हो तो साध्य है ॥ मेदके स्वरभेदका लक्षण । अन्तर्गतस्वरमलक्ष्यपदं चिरेण मेदोन्वयाद्वदति दिग्धगलस्तृषार्त्तः४ मेदके सम्बन्धसे कफ अथवा मेदसे गला लिप्त होय अथवा मेदसे स्वरके मार्ग रुक जानेसे प्यास बहुत लगे, गलेके भीतर बोले और मन्द बोले ॥ असाध्य लक्षण । क्षीणस्य वृद्धस्य कृशस्य चापि चिरोत्थितो यस्य सहोपजातः । मेदस्विनः सर्वसमुद्भवश्च स्वरामयो यो न स सिद्धिमेति ॥ ५ ॥ क्षीण पुरुषके, वृद्धके, कृशके, बहुत दिनका, जन्मके संग ही प्रगट भया, मोटें पुरुषके और सन्निपातोद्भव ऐसा स्वरभेदरोग साध्य नहीं होता ॥ इति श्रीपंडितदत्ताराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां स्वरभेदनिदानं समाप्तम् ॥ अथारोचकनिदानम् । ───◇◆◇─── वातजादि अरुचियोंके लक्षण । वातादिभिः शोकभयातिलोभक्रोधैर्मनोग्राशनरूपगन्धैः । अरोचकाः स्युः परिहृष्टदन्तकषायवक्त्रश्च मतोऽनिलेन ॥ १ ॥ पृथक् वातादिक दोषों करके ३, सन्निपातसे १, आगन्तुकसे १ जैसे भयसे अतिलोभसे तथा अतिक्रोधसे ऐसे पांच प्रकारका अरोचक ( अरुचि ) रोग है । वह मनको क्लेश देनेवाला अन्न, रूप और गन्ध इन कारणोंसे प्रगट होता है । सुश्रुत और अन्य ग्रन्थोंके मतसे भी पांच ही प्रकार मुख्य माने हैं, भय, लोभ, क्रोधकी अरुचिको शोककी ही अरुचिके अन्तर्गत मानते हैं । बादीकी अरुचिसे दांत खट्टे हो और मुख कसेला होय ॥ १ अरोचको भवेद्दोषैरेको हृदयसंश्रयैः । सन्निपातेन मनसः सन्तापेन च पञ्चमः ॥ इति ॥
भाषाटीकासमेत । ( १०७ ) कट्वम्लमुष्णं विरसं च पूति पित्तेन विद्याल्लवणं च वक्त्रम् । माधुर्यपैच्छिल्यगुरुत्वशैत्यविबद्धसंबद्धयुतं कफेन ॥ २ ॥ पित्तकी अरुचिसे कडुआ, खट्टा, गरम, विरस, दुर्गंधयुक्त, लुनखरा ऐसा मुख होय है, कफकी अरुचिसे खारा, मीठा, पिच्छिल, भारी, शीतल मुख होय है और मुख बँधा सरीखा अर्थात् खाय नहीं और भीतर कफसे लिप्त होय ॥ शोकादि अरुचिके लक्षण । अरोचके शोकभयातिलोभक्रोधाद्यहृद्याशुचिगन्धजे स्यात् । स्वाभाविकं चास्यमथारुचिश्च त्रिदोषजे नैकरसं भवेत्तु ॥ ३ ॥ शोक, भय, अतिलोभ, क्रोध, अहृद्य (मनको बुरी लगे ऐसी वस्तु) अपवित्र बास इनमें प्रगट हुई अरुचिमें मुख स्वाभाविक रहे अर्थात् वातजादिकोंके सदृश कसेला, खट्टा आदि नहीं होय । सन्निपातकी अरुचिमें अन्नसे अरुचि तथा मुखसे अनेक रस मालूम हों ॥ वातजादि भेदकरके मुखकी विकृतिको कहकर अन्य ठिकानेपर जो विकृति होय है उसे कहते हैं— हृच्छूलपीडानयुतं पवनेनपित्तात्तृड्दाहचोषबहुलं सकफप्रसेकम् । श्लेष्मात्मकं बहुरुजं बहुभिश्चविद्याद्वैगुण्यमोहजडताभिरथापरंच ॥ ४॥ वातकी अरुचिसे हृदयमें शूल और वेदना होती है । पित्तसे प्यास, दाह और चूसनेके सदृश पीडा ये लक्षण होते हैं । कफकी अरुचिमें मुखसे कफ गिरे, सन्निपातकी अरुचिमें पीडा अत्यन्त होय । वैगुण्य कहिये मनकी व्याकुलता, मोह, जडत्व इन लक्षणोंसे अपर कहिये आगंतुक अरोचक जाने । भूख होय परन्तु खानेकी सामर्थ्य न होना इसको अरुचि कहते हैं । आपको प्रिय भी अन्न किसीने दिया हो परन्तु खाय नहीं उसको अन्नाभिनन्दन कहते हैं । अन्नके स्मरण, श्रवण, दर्शन और वास इनसे जिसको त्रास होय उसको भक्तद्वेष कहते हैं । इस प्रकार यह रोग तीन प्रकारका है । इसी वास्ते चरक सुश्रुतने अरोचके शब्द करके संग्रह करा है ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकाया- मरुचिरोगनिदानं समाप्तम् ॥ १ उक्तं हि वृद्धभोजेन–प्रक्षिप्तं यन्मुखे चान्नं जन्तोस्तत्स्वदते मुहुः । अरोचकः स विज्ञेयो भक्तद्वेषमतः शृणु । चिन्तयित्वा तु मनसा दृष्ट्वा श्रुत्वा च भोजनम् । द्वेषमायाति यो जन्तु- र्भक्तद्वेषः स उच्यते ॥ कुपितस्य भयार्त्तस्य अभिचाराभिभूतये । यस्यान्रे न भवेच्छ्रद्धा स भक्तद्वेष उच्यते ॥ इति । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१०८ ) माधवनिदान ।
१०८ ) माधवनिदान । अथ छर्द्दिनिदानम् । छर्दिके कारण और निरुक्ति । दुष्टैर्दोषैःपृथक्सर्वैर्बीभत्सालोकनादिभिः। छर्दयःपञ्च विज्ञेया- स्तासां लक्षणमुच्यते ॥ १ ॥ अतिद्रवैरतिस्निग्धैरहृद्यैर्लवणै- रपि । अकाले चातिमात्रैश्च तथाऽसात्म्यैश्च भोजनैः ॥ २ ॥ श्रमाद्भयात्तथोद्वेगादजीर्णात्कृमिदोषतः । नार्याश्चापन्नसत्त्वाया स्तथातिद्रुतमश्नतः॥३॥ बीभत्सैर्हेतुभिश्चान्यैर्द्रुतमुत्क्लेशितो बलात् । छादयन्नाननं वेगैरर्दयन्नङ्गभञ्जनैः ॥ निरुच्यते छर्दिरिति दोषो वक्त्रं प्रधावति ॥ ४ ॥ दुष्ट हुए पृथक् और सब दोषों करके तथा दुष्ट वस्तुके देखनेसे आदिशब्द करके दुष्ट गन्धके सूंघनेसे पांच प्रकारकी छर्दि जाननी अर्थात् जिसको रद्द वमन उलटी कहते हैं उसके लक्षण आगे कहते हैं । अत्यन्त पतले अथवा चिकने अहृद्य ( अप्रिय ) वस्तु, खारके पदार्थ इनके सेवन करनेने, कुसमय भोजन करनेसे अथवा अत्यन्त भोजन करनेसे अथवा जो न पचे ऐसे भोजन करनेसे, श्रम, भय, उद्वेग, अजीर्ण, कृमिदोष इन कारणोंसे, गर्भिणी स्त्रीके गर्भकी पीडासे तथा जल्दी२ भोजन करनेसे और बीभत्स ( खोटे ) कारणोंसे जैसे विष्ठा, राध आदिका देखना इनसे तीनों दोष कुपित हो बलसे मुखको आच्छादन करें और अंगोंको पीडा कर मुखद्वारा भोजन किया हुआ सब निकाल देयँ इसको ( छर्दि ) उलटी ऐसे मनुष्य कहते हैं । इस जगह उदानवायु वमन कराती है ॥ छर्दिके पूर्वरूप । हृल्लासोद्गारसंरोधौ प्रसेको लवणास्यता । द्वेषोऽन्नपाने च भृशं वमीनां पूर्वरक्षणम् ॥ ५ ॥ हृदयमें खारा, खट्टा प्रथमही निकले अथवा सूखी रद्द होय, डकार आवे नहीं, लार गिरे, खारी मुख हो जाय, अन्न और पानीसे अत्यन्त अरुचि होय ये छर्दी ( छाट ) के पूर्वरूप हैं ॥ वातकी छर्दिके लक्षण । हृत्पार्श्वपीडा मुखशोषशीर्षनाभ्यर्त्तिकासस्वरभेदतोदैः । १ छादयति मुखम् अर्दयति चाङ्गानि इति छर्दिः ।