माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
भाषाटीकासमेत । ( ५१ ) गन्धयुक्त बुरी दुर्गन्धके समान, प्यास, दाह, अरुचि, श्वास, हिचकी, पसवाडोंके हाडोंमें पीडा, मनको मोह और इंद्रियोंको मोह, अरति ये लक्षण होयँ तथा गुदाके आंटोंका पकना अनर्थ भाषण करे ऐसे अतिसारी रोगीको वैद्य छोडदे ॥ दूसरे असाध्य लक्षण । असंवृतगुदं क्षीणं दुराध्मानमुपद्रुतम् । गुदे पक्के गतोष्माणमतिसारिणमुत्सृजेत् ॥ १८ ॥ जिसकी गुदाका दस्तके पिछाडी संकोच न होवे, क्षीण पुरुष, अत्यन्त अफरा- युक्त अथवा “ दुरात्मानं ” ऐसा भी पाठान्तर है अर्थात् जिसकी इंद्रिय वश न होवे तथा अतिसारके शोथादिक उपद्रव करके युक्त और गुदाके स्थानमें पाककर्त्ता पकानेवाला पित्त विद्यमान होते हुए जिसकी देहमें गरमीसी नहीं दीखे अर्थात् देह शीतल हो अथवा जिसकी अग्नि नष्ट होजावे ऐसे अतिसारी रोगीको वैद्य त्याग देवे॥ अतिसारके उपद्रव । शोथं शूलं ज्वरं तृष्णां श्वासकासमरोचकम् । छर्दिं मूर्च्छां च हिक्कां च दृष्ट्वाऽतीसारिणं त्यजेत् ॥ १९ ॥ सूजन, शूल, ज्वर, तृषा, श्वास, खांसी, अरुचि, वमन, मूर्च्छा, हिचकी ऐसे लक्षण जिस रोगीमें होयँ उसको वैद्य छोड दे ॥ असाध्य लक्षण । श्वासशूलपिपासार्त्तं क्षीणं ज्वरनिपीडितम् । विशेषेण नरं वृद्धमतिसारो विनाशयेत् ॥ २० ॥ श्वास, शूल, प्यास इनसे पीडित, क्षीण, ज्वरसे पीडित और वृद्ध मनुष्यके ये लक्षण होयँ तो यह अतिसाररोग मनुष्यको विनाश करे ॥ रक्तातिसारके लक्षण । पित्तकृन्ति यदात्यर्थं द्रव्याण्यश्नाति पैत्तिके । तदोपजायतेऽभीक्ष्णं रक्तातीसार उल्बणः ॥ २१ ॥ पित्तातिसारवाला पुरुष अथवा पित्तातिसार होनेवाला पुरुष जब पित्त करने- वाली वस्तु अधिक और निरन्तर भोजन करे तब भयंकर रक्तातिसार प्रगट होता है । इसके लाल काले पीले आदि रंग वातादि दोषोंके दूषित होनेसे होते हैं, ये भी पित्तातिसारके भेद हैं ॥
( ५२ ) माधवनिदान ।
( ५२ ) माधवनिदान । प्रवाहिकाकी सम्प्राप्ति । वायुः प्रवृद्धो निचितं बलासं नुदत्यधस्तादहिताशनस्य । प्रवाहतोऽल्पं बहुशो मलाक्तं प्रवाहिकां तां प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ॥२२॥ अपथ्य सेवन करनेवाले पुरुषके कुपित हुई जो वात सो संचित हुए कफकों मलसंयुक्त करके बारम्बार गुदाके मार्गसे बाहर निकाले और मरोडाके साथ पीडा हो, थोडा मल कई दफा निकले इसको प्रवाहिका कहते हैं। प्रवाहिका और अति- सार इन दोनोंका एक साधर्म्य है इसीसे अतिसार रोगमें प्रवाहिका कही है। परन्तु अतिसारमें अनेक प्रकारके द्रव धातु निकलते हैं और प्रवाहिकामें केवल कफ निक- लता है. इतना भेद है। इसमें “निचितं बलासम्” यह जो पद कहा अर्थात् कफसे मिलकर सो यह केवल कफका तो उपलक्षण है अर्थात् कफके कहनेसे पित्त और रुधिर भी जानना। भोजने इस रोगका नाम विवसी कहा है, पराशरऋषिने इसको अन्तरग्रन्थी कहा है,हारीत ऋषिने निश्वारक कहा है,कोई आचार्य निर्वाहिका कहते हैं॥ प्रवाहिकाके वातादि भेदकरके लक्षण । प्रवाहिका वातकृता सशूला पित्तात्सदाहा सकफा कफाच्च । सशोणिता शोणितसम्भवा च ताः स्नेहरूक्षप्रभवा मतास्तु। तासामतीसारवदादिशेच्च लिङ्गं क्रमं चामविपक्वतां च॥२३॥ वातकी प्रवाहिकामें शूल होता है, पित्तकी दाहयुक्त, कफकी कफयुक्त और रक्तसे रक्तयुक्त होती है। यह चिकने और रूखे पदार्थ भोजन करनेसे होती है अर्थात् चिकने पदार्थसे कफकी, रूखे पदार्थसे वातकी, तु-शब्द करके तीक्ष्ण और खट्टेपदार्थसे क्रमसे पित्तकी और रुधिरकी होती है ऐसे जानना। इस प्रवाहिकाके लक्षणक्रम आम और पक्वावस्था यह अतिसार निदानके सदृश जानना ॥ अतिसार चला गया होय उसके लक्षण । यस्योच्चारं विना मूत्रं सम्यग्वायुश्च गच्छति । दीप्ताग्नेर्लघुकोष्ठस्य स्थितस्तस्योदरामयः ॥ २४ ॥ जिस मनुष्यको मूत्र करते समय दस्त न होय और अपानवायु जिसकी शुद्ध निकले और अग्नि देदीप्यमान होवे, कोठा हलका होवे उस मनुष्यका अतिसार गया जानिये ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकाया- मतिसाररोगः समाप्तः ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ ग्रहणीनिदानम् ।
भाषाटीकासमेत । (५३) अथ ग्रहणीनिदानम् । ग्रहणीकी सम्प्राप्ति । अतिसारे निवृत्तेऽपि मन्दाग्नेरहिताशिनः । भूयः संदूषितो वह्निर्ग्रहणीमभिदूषयेत् ॥ १ ॥ पहले मनुष्यके अतिसाररोग होकर जाता रहा होय फिर उस मनुष्यके कुपथ्य करनेसे मन्द हुई जो अग्नि पुरुषके उदरमें रहनेवाली जो पित्तधरानामक छठी कला जिसको ग्रहणी कहते हैं उसको बिगाड, अपिशब्द करके अतिसार न भया होय तो भी अपने कारण करके पूर्वोक्त ग्रहणीको बिगाडकर ग्रहणीरोगको प्रगट करे यह सूचना करी। कोई आचार्य ऐसे कहते हैं कि, अतिसार न गया होय, बीचमें ही ग्रहणीरोग होता है। "मन्दाग्नि" इस पद करकेयह सूचना करी कि, जिस पुरुषकी अग्नि तीक्ष्ण है वह कुपथ्य भी करे तथापि कुछ अवगुण नहीं होय, अन्नको ग्रहण करे है इसीसे इसको ग्रहणी कहे हैं, इसीसे ग्रहणी बिगडनेसे अन्नका परिपाक अच्छे प्रकार नहीं होय अर्थात् बारम्बार आम मिश्रित मल गुदाके मार्गसे गिरता है ॥ ग्रहणीरोगकी सम्प्राप्तिपूर्वक सामान्य लक्षण । एकैकशः सर्वशश्च दोषैरत्यर्थमूर्च्छितैः । सा दुष्टा बहुशो भुक्तमाममेव विमुञ्चति ॥ २ ॥ पक्वं वा सरुजं पूति मुहुर्बद्धं मुहुर्द्रवम् । ग्रहणीरोगमाहुस्तमायुर्वेदविदो जनाः ॥ ३ ॥ अत्यन्त कुपित हुए पृथक् १ दोष ( वात, पित्त, कफ ) और सर्व दोष मिलकर ग्रहणीको दुष्ट करें सो ग्रहणी दुष्ट होकर भोजन किये हुए पदार्थको कच्चा अथवा पक्का गुदाके मार्ग होकर निकाले और पीडा होय तथा उस मलमें दुर्गंध आवे, वादीसें पतला मल और पित्तसे गाढा दस्त बारम्बार होवे और कभी कफसे पानी सरीखा अधोवायुयुक्त निकले इसको आयुर्वेदके जाननेवाले वैद्य ग्रहणीरोग कहते हैं ॥ ग्रहणीके पूर्वरूप । पूर्वरूपं तु तस्येदं तृष्णाऽलस्यं बलक्षयः । विदाहोऽन्नस्य पाकश्च चिरात्कायस्य गौरवम् ॥ ४ ॥ प्यास, आलसक, बलनाश, अन्नका दाह ( पाकके समय अग्निसि जले ) और अन्नका पाक देरमें होय, देह भारी होय, यह ग्रहणीरोगका पूर्वरूप है ॥ १ यथाह चरके-" अग्न्यधिष्ठानमन्त्रस्य ग्रहणाद्ग्रहणी मता । नाभेरुपरि सा ह्यग्निबले- नस्तम्भबृंहिता । अपक्वं धारयत्यन्नं पक्वं सृजति चाप्यधः ॥"
( ५४ ) माधवनिदान ।
( ५४ ) माधवनिदान । वातग्रहणीका निदान । कटुतिक्तकषायातिरूक्षसंदुष्टभोजनैः । प्रमितानशनात्यध्ववेग- निग्रहमैथुनैः ॥ मारुतः कुपितो वह्निं संछाद्य कुरुते गदान् ॥५॥ कड़ुआ, तीखा, कसैला, अतिरूखा और संयोगविरुद्ध ऐसे भोजनसे तथा थोडे भोजनसे, उपवाससे, बहुत चलनेसे, मलमूत्रादि वेगोंके रोकनेसे, अत्यन्त मैथुनसे कुपित भई जो वात सो अग्निको कुपित कर रोगोंको प्रगट करे हैं ॥ वातजसंग्रहणीका रूप । तस्यान्नं पच्यते दुःखं शुक्तपाकं खराङ्गता ॥ ६ ॥ कंठास्यशोषः क्षुत्तृष्णा तिमिरं कर्णयोः स्वनः । पार्श्वोरुवंक्षणग्रीवारुगभीक्ष्णं विषूचिका ॥ ७ ॥ हृत्पीडाकार्श्यदौर्बल्यं वैरस्यं परिकर्तिका । गृद्धिः सर्वरसानां च मनसः स्पंदनं तथा ॥ ८ ॥ जीर्णे जीर्यति चाध्मानं भुक्तं स्वास्थ्यमुपैति च । स वातगुल्महृद्रोगप्लीहा- शङ्की च मानवः ॥ ९ ॥ चिराद्दुःखं द्रवं शुष्कं तन्वामं शब्द- फेनवत् । पुनः पुनः सृजेद्वर्चः कासश्वासार्दितोऽनिलात् ॥ १० ॥ उस वातग्रहणीवालेके अन्न दुःखसे पचे, अन्नका पाक खट्टा होय, अंगमें कर्क- शता ( यह वायुको त्वचाके चिकनापन सोखनेसे होता है ), कण्ठ मुखका सूखना, भूख, प्यास लगे, मन्द दीखे, कानोंमें शब्द हो, पसवाडे जांघ पेडू और कन्थामें पीडा होवे, विषूचिका हो अर्थात् दोनों द्वारसे कच्चे अन्नकी प्रवृत्ति होवे, हृदय दुखे, देह दुबला होजाय, जीभका स्वाद जाता रहे, गुदामें कतरनीकीसी पीडा हो, मीठेसे आदि ले सर्व रसोंके खानेकी इच्छा, मनमें ग्लानि, अन्न पचने उपरांत पेटका फूलना, भोजन करनेसे स्वस्थता, पेटमें गोला, हृद्रोग, तापतिल्लीकीसी शंका, वातके योगसे खांसी, श्वाससे पीडित, बहुत देरमें बडे कष्टसे कभी पतला कभी गाढा थोडा शब्द और झाग मिला वारम्वार दस्त हो जाय ॥ पित्तग्रहणीके लक्षण । कट्वजीर्णविदाह्यम्लक्षाराद्यैः पित्तमुल्बणम् । आप्लावयेद्धन्त्य- नलं जलं तप्तमिवानलम् ॥११॥ सोऽजीर्णं नीलपीताभं पीताभः सार्यते द्रवम् । संधूमोद्गारहृत्कण्ठदाहारुचितृडर्दितः ॥ १२ ॥ १ पृष्ट्यम्लोद्गार इत्यापि पाठः। दुर्गन्ध डकार तथा खट्टी डकार आवे ।
भाषाटीकासमेत । ( ५५ ) जो पुरुष कटु, अजीर्ण, मिरच आदि तीखी, दाहकारक (वंश, करीलकी कोंपल) आदि, खट्टी, खारी (ओंगा आदिका खार) आदिशब्दसे नोनका गरम पदार्थ इन कारणोंसे कुपित हुआ जो पित्त सो जठराग्निको ऐसे बुझा देता है जैसे तप्तजल अग्निको शांत कर देता है और पित्तकी ग्रहणीसे पीली कान्तिवाला पुरुष कच्चा तथा नीले पीले रंगके मलको निकाले तथा धूमयुक्त डकार आवे, हृदय और कंठमें दाह होवे, अरुचि और प्यास करके पीडित होवे, ये पित्तकी संग्रहणीके लक्षण हैं ॥ कफग्रहणीकी उत्पत्ति । गुर्वातिस्निग्धशीतादिभोजनादतिभोजनात् । भुक्तमात्रस्य च स्वप्नाद्धन्त्यग्निं कुपितः कफः ॥ १३ ॥ तस्यान्नं पच्यते दुःखं हृल्लासच्छर्द्यरोचकाः । आस्योपदेहमाधुर्यकासष्ठीवनपीनसाः ॥ १४ ॥ हृदयं मन्यते स्त्यानमुदरं स्तिमितं गुरु । दुष्टो मधुर उद्गारः सदनं स्त्रीष्वहर्षणम् ॥ १५ ॥ भिन्नामश्लेष्म- संसृष्टगुरुवर्चःप्रवर्तनम् । अकृशस्यापि दौर्बल्यमालस्यं च कफात्मके ॥ १६ ॥ भारी, अत्यन्त चिकना, शीतल आदि पदार्थके खानेसे अतिभोजनसे तथा भोजन करके दिनमें सोनेसे इन कारणोंसे कुपित हुआ कफ जठराग्निको शांत करे तब इसका खाया अन्न कष्टसे पचे, हृदयमें पीडा हो, वमन, अरुचि, मुख कफसे लिपासा तथा मुखका मीठा रहना, खांसी, कफ थूके, पीनस (जुखाम) हो, हृदय पानीसे भरासदृश हो, पेट भारी और जड हो, दुष्ट और मीठी डकार आवे, अग्नि शांत हो स्त्रीरमणमें अरुचि, पतला आम कफ मिला और भारी ऐसा मल निकले, बल विना शरीर पुष्ट दीखे, आलस्य बहुत आवे ये कफकी ग्रहणीके लक्षण हैं ॥ त्रिदोषकी ग्रहणीके लक्षण । पृथग्वातादिनिर्दिष्टहेतुलिङ्गसमागमे । त्रिदोषं लक्षयेद्देवं तेषां वक्ष्यामि भेषजम् ॥ १७ ॥ वातादि तीनों दोषोंके जो लक्षण कह आये हैं वे सब जिसमें मिलते होंयँ उसको त्रिदोषकी ग्रहणी जानिये “तेषां भेषजम्” यह पद केवल पादपूरणार्थ लिखा है ॥ (संग्रहणी लक्षण । अन्नकूजनमालस्यं दौर्बल्यं सदनं तथा । द्रवं शीतं घनं स्निग्धं सकटीवेदनं शकृत् ॥ १ ॥ आमं बहु सपैच्छिल्यं CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ५६ ) माधवनिदान ।
( ५६ ) माधवनिदान । सशब्दं मन्दवेदनम् । पक्षान्मासादशाहाद्वा नित्यं वाप्यथ मुञ्चति ॥ २ ॥ दिवा प्रकोपो भवति रात्रौ शान्तिं व्रजेच्च सा । दुर्विज्ञेया दुश्चिकित्स्या चिरकालानुबन्धिनी ॥ सा भवे- दामवातेन संग्रहग्रहणी मता ॥ ३ ॥ आंतोंमें शब्द होना, आलसक, दुर्बलता, शरीरमें पीडा तथा पतला ठण्डा कुछ गाढा चिकना दस्त होवे दस्त होते समय कमरमें दर्द होवे । पन्द्रह दिन अथवा एक महीना अथवा दस दिन बाद हमेशा बहुत आम रेसादार शब्दसहित मन्द २ पीडासे निकले वह भी आम दिनमें अधिक निकले और रातमें शांतिको प्राप्त हो । दुःखसे जानने योग्य दुःखसे चिकित्सा करने योग्य बहुत समयतक रहनेवाली होवे । ऋषियोंने आम और वातसे संगृहीतको संग्रहणी कहा है ॥ स्वपतः पार्श्वयोः शूलं गलज्जलघटीध्वनिः । तं वदन्ति घटीयन्त्रमसाध्यं ग्रहणीगदम् ॥ ४ ॥ सोतेहुए मनुष्यके दोनों पसवाडोंमें शूल तथा निगलते हुए जलकी चेष्टाके समान शब्द हो उस ग्रहणी रोगको घटीयन्त्र कहते हैं और वह असाध्य है ॥ ) दोषं सामं निरामं च विद्यादत्रातिसारवत् ॥ १८ ॥ जैसे अतिसारमें मलका जलमें डूबने आदि लक्षणोंसे आम और उसके विप- रीत होनेसे निरामता ( यकृत् ) जानी जाती है उसी प्रकार ग्रहणीरोगमें भी जाननी चाहिये ॥ लिङ्गैरैसाध्यो ग्रहणीविकारो यैस्तैरतीसारगदो न सिध्येत् । वृद्धस्य नूनं ग्रहणीविकारो हत्वा तनूमेव निवर्तते च ॥ १९ ॥ जिन " पक्वं जाम्बवसंकाशम् " इत्यादि लक्षणोंसे अतिसाररोग असाध्य होजाता है उन्हीं लक्षणोंसे ग्रहणीरोग भी असाध्य होजाता है अर्थात् जो अतिसारके असाध्य लक्षण हैं वे ही ग्रहणीरोगके असाध्य लक्षण समझने चाहिये । और वृद्ध मनुष्यका ग्रहणीरोग तो शरीरको नाश करके ही दूर होता है ॥ बालके ग्रहणी साध्या यूनि कृच्छ्रा समीरिता । वृद्घे त्वसाध्या विज्ञेया मतं धन्वन्तरेरिदम् ॥ २० ॥ बच्चेके हुआ ग्रहणीरोग साध्य होता है और जवान पुरुषके ग्रहणीरोग कृच्छ्रसाध्य होता है और वृद्धके असाध्य जानना चाहिये, यह धन्वन्तरिजीका मत है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । (५७) डाक्टरीमतके अनुसार परीक्षा व कारण । आमसे मिला मल उतरे, दस्त होते समय गुदा शब्द करे ऐसे एक महीना अथवा अधिक दिवस पर्यंत पीडा हो ॥ कारण-भारी द्रव्यके खानेसे अथवा देहके दुर्बल होनेसे मनुष्यके संग्रहणीरोग होता है ॥ इति श्रीपंडितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाधुरीभाषाटीकायां ग्रहणीरोगः समाप्तः ॥
अर्शोरोगनिदानम् । अतिसार ग्रहणी और अर्शका परस्पर सम्बन्ध है इससे ग्रहणीरोगके पीछे अर्शोरोग कहते हैं- संख्या रूप सम्प्राप्ति । पृथग्दोषैः समस्तैश्च शोणितात् सहजानि च । अर्शांसि षट्प्रकाराणि विद्याद्गुदवलित्रये ॥ १ ॥ पृथक् पृथक् दोषोंसे ३, समस्त दोष मिलकर १, रुधिरसे १ और सहज १ ऐसे छः प्रकारका अर्श ( बवासीर ) रोग है यह रोग गुदाकी तीन वलीके भीतर हो । गुदामें प्रवाहिणी विसर्जनी संवरणी यह तीन वली ( आँटे ) हैं ॥ सम्प्राप्तिपूर्वके अर्शका रूप । दोषास्त्वङ्मांसमेदांसि संदूष्य विविधाकृतीन् । मांसाङ्कुरानपानादौ कुर्वन्त्यर्शांसि तान् जगुः ॥ २ ॥ वातादि दोष त्वचा, मांस और मेदा इनको और उस ठिकानेके रुधिरको दूषित कर अपान (गुदा) में अनेक प्रकारकी आकृतिके मांसके अंकुर उत्पन्न करे अर्थात् मस्से प्रगट करे उसको बवासीर कहते हैं। आदिशब्दसे नाक, नेत्र, नाभिमें भी जानना, यह मत सुश्रुतका है। कायचिकित्सक तो गुदामें जो होय उसे बवासीर १ मनुष्यकी गुदामें तीन आंटे हैं एक ऊपर, एक नीचे क बीचमें। ऊपरके आंटेका नाम प्रवाहिणी है सो मल पवन आदिको बाहर काढे, बीचका आंटा मल पवनको बाहर पटक दे इसका नाम विसर्जनी है, तीसरा नीचेका आँटा मल पवन निकले पीछे ज्योंका त्यों गुदाको करदे तिसका नाम संवरणी है॥ २ गुदा साढे चार अंगुलकी होती है और गुदाके अवयवभूत तीन वली शंखके आवर्त समान प्रवाहिणी, विसर्जनी, संवरणीनामवाली ऊपर २ ही स्थित हैं। उसमें गुदाका ओष्ठ आधा अंगुलका होता है गुदोष्ठसे ऊपर प्रवाहिणी एक अंगुलकी और विसर्जनी डेढ अंगुलकी और संवरणीभी डेढ अंगुलकी होती है, इसी प्रकारसे गुदाका प्रमाण साढे चार अंगुलका होता है ।
( ५८ ) माधवनिदान ।
( ५८ ) माधवनिदान । कहते हैं, जो नासिका आदिमें होय उसको अधिमांस कहते हैं, क्योंकि नासिका आदिमें जो बवासीर होती है उसमें पूर्वरूपके लक्षण नहीं मिलते हैं ॥ वातकी बवासीरके कारण । कषायकटुतिक्तानि रूक्षशीतलघूनि च । प्रमिताल्पाशनं तीक्ष्णं मद्यं मैथुनसेवनम् ॥ ३ ॥ लंघनं देशकालौ च शीतौ व्यायाम- कर्म च । शोको वातातपस्पर्शं हेतुर्वातार्शसां मतः ॥ ४ ॥ कसैला, कडुवा, तीखा, रूखा, शीतल और अतिलघु ऐसे पदार्थोंके खानेसे तथा अति थोडा खानेसे, भोजनकालके उल्लंघन करनेसे, तीव्र मद्यके पान करनेसे, अत्यन्त मैथुन ( स्त्रीसंग ) करनेसे, उपवास, शीतदेश और शीतकाल ( हेमन्तादिकृतु ) दंड कसरतसे, शोकसे, हवा घाममें डोलनेसे ये वातकी बवासीर होनेके कारण हैं ॥ पित्तकी बवासीरके कारण । कट्वम्ललवणोष्णानि व्यायामाग्न्यातपश्रमाः । देशकालावाशिशिरौ क्रोधो मद्यमसूयनम् ॥ ५ ॥ विदाहि तीक्ष्णमुष्णं च सर्वं पानान्नभेषजम् । पित्तोल्वणानां विज्ञेयः प्रकोप हेतुर्शसाम् ॥ ६ ॥ तीखा, खट्टा, लवणका, गरम ऐसे पदार्थोंसे, दण्ड कसरतसे, अग्निके समीप तथा घाममें रहनेसे, श्रम, गरम देश ( मारवाड आदि ) और उष्णकाल अर्थात् ग्रीष्मऋतु, क्रोध, मद्यपान, परद्रव्य देखकर जलना, दाहकारक, तीखी, गरम वस्तुका पीना, अन्नका और गरम औषधिका सेवन ये सब पित्ताधिक बवासीरके कारण हैं ॥ कफकी बवासीरके कारण । मधुरस्निग्धशीतानि लवणाम्लगुरूणि च । अव्यायामदिवास्वप्न- शय्यासनसुखे रतिः ॥ ७ ॥ प्राग्वातसेवा शीतौ च देशकाला- वचिन्तनम् । श्लेष्मोल्वणानामुद्दिष्टमेतत्कारणमर्शसाम् ॥ ८ ॥ मीठा, चिकना, शीतल, खारी, खट्टा, भारी ऐसे भोजनसे, व्यायामके न करनेसे, दिनमें सोनेसे, सेज, गद्दी इनके सेवन करनेसे, पूर्वकी हवा खानेसे, शीतल देश, शीतकाल, चिन्तारहित होनेसे ये कफकी बवासीर होनेके हेतु हैं ॥ द्वंद्वज बवासीरके कारण । हेतुलक्षणसंसर्गाद्विद्याद्द्वन्द्वोल्वणानि च । दो दो दोषोंके कारण और लक्षण मिले तो द्वंद्वजबवासीर हुई है ऐसे जाने ॥
भाषाटीकासमेत । ( ५९ ) त्रिदोषकी बवासीरके कारण । सर्वो हेतुस्त्रिदोषाणां सहजैर्लक्षणैः समम् ॥ ९ ॥ पृथक् वातादि बवासीरके जो कारण कहे हैं वे सर्व त्रिदोषकी बवासीरके कारण हैं, और जो सहज अर्शके अर्थात् सहज बवासीरके लक्षण सो भी इसके लक्षण जानने ॥ वातकी बवासीरके लक्षण । गुदाङ्कुरा बह्वनिलाः शुष्काश्चिमिचिमान्विताः । म्लानाः श्यावारुणाः स्तब्धा विशदाः परुषाः खराः ॥ १० ॥ मिथो विसदृशा वक्रास्तीक्ष्णा विस्फुटिताननाः । बिंबिकर्कन्धु- खर्जूरकार्पासीफलसंनिभाः ॥ ११ ॥ केचित्कदम्बपुष्पाभाः केचित्सिद्धार्थकोपमाः । शिरःपार्श्वासकट्यूरूंवक्षणाभ्यधिक- व्यथाः ॥ १२ ॥ क्षवथूद्गारविष्टंभहृद्ग्रहारोचकप्रदाः । कास- श्वासाग्निवैषम्यकर्णनादभ्रमावहाः ॥ १३ ॥ तैरात्तो ग्रथितं स्तोकं सशब्दं सप्रवाहिकम् । रुक्फेनापिच्छानुगतं विबद्ध- मुपवेश्यते ॥ १४ ॥ कृष्णत्वङ्नखविण्मूत्रनेत्रवक्त्रश्च जायते । गुल्मप्लीहोदराष्ठीलासंभवस्तत एव च ॥ १५ ॥ वाताधिक्यसे गुदाके अंकुर सूखे (स्रावरहित) चिमचिम पीडायुक्त मुरझाये हुए, काले, लाल, टेढे, विशद, कर्कश, खरदरे, एकसे न होय, बांके, तीखे, फटे मुखके, कन्दूरी, बेर, खजूर, कपासके फलसदृश होय, कोई कदंबके फूल समान हों, कोई सरसोंके सदृश हों, शिर, पसवाडे, कन्धा, कमर, जांघ, पेडू इनमें अधिक पीडा हो, छींक, डकार, दस्तका न होना, हृदय पकडासा मालूम हो, अरुचि, खांसी, श्वास, अग्निका विषम होना अर्थात् कभी अन्न पचे, कभी नहीं पचे, कानोंमें शब्द होय, भ्रम होय उस बवासीरसे पीडित मनुष्यके पत्थरके समान, थोडा शब्दयुक्त १. अथ सहजाशोलक्षणम् । यथाच सुश्रुतः- "दुर्दर्शनानि परुषारुणपांडूनि दारुणान्त- मुखानि तैरुपद्रुतः कृशोऽल्पभुक् शिरासततगात्रोऽल्पप्रजः क्षीणरेताः क्षामस्वरः क्रोधनोऽल्पामि- र्घ्राणशिरोऽक्षिश्रवणरोगवान् सततमन्त्रकूजनाटोपहृदयोपलेपारोचकप्रभृतिभिः पीड्यते ।" दुःखसे देखने योग्य (बहुत छोटे होनेसे) अथवा भयंकर दर्शन और खरदरे लाल पीले वर्णवाले कठिन और भीतर मुखवाले मस्सों उपद्रवसे युक्त मनुष्य दुबला थोडा भोजन करने- वाला शिराओंसे व्याप्त शरीर (सब शरीरपर दीखें) अल्प सन्तान, क्षीण शुक्र, बैठी हुई आवाज, क्रोध, मन्दाग्नि, नाक शिर नेत्र कानोंके रोगवाला, निरन्तर आंतोंमें शब्द, अफरा, हृदयका भारीपन, अरुचि आदिसे पीडित होता है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ६० ) माधवनिदान ।
( ६० ) माधवनिदान । और वातकी प्रवाहिकाके लक्षणसंयुक्त शूल, झाग, चिकटा इन लक्षण संयुक्त हौले हौले दस्त होयँ उस मनुष्यकी त्वचाका रंग तथा नख, विष्ठा, मूत्र, नेत्र, मुख ये काले होयँ, गोला तापतिल्ली ( उदररोग ) अष्ठीला ( वातकी गाँठ ) इन रोगोंके उपद्रव इस वातकी बवासीरमें होते हैं ॥ पित्तकी बवासीरके लक्षण । पित्तोत्तरा नीलमुखा रक्तपीताः सितप्रभाः । तन्वस्रस्राविणो विस्रास्तनवो मृदवः श्लथाः ॥ १६ ॥ शुकजिह्वायकृत्खण्ड- जलौकावक्त्रसन्निभाः । दाहपाकज्वरस्वेदतृण्मूर्च्छाऽरुचि- मोहदाः ॥ १७ ॥ सोष्माणो द्र्वनीलोष्णपीतरक्तामवर्चसः । यवमध्या हरितपीतहारिद्रत्वङ्नखादयः ॥ १८ ॥ मस्सोंका मुख नीला, लाल, पीला और सफेदाई लिये होवे उन मस्सोंमेंसे महीन धारसे रुधिर चुवाय और रुधिरकी वास आवे, महीन और कोमल तथा शिथिल हों और उनका आकार तोतेकी जीभ कलेजा और जोंकके मुखके समान हो और देहमें दाह हो, गुदाका पकना, ज्वर, पसीना, प्यास, मूर्च्छा, अरुचि और मोह ये होवें और हाथके स्पर्श करनेसे गरम मालूम होवे और जिसके मलका द्रव नीला, पीला, लाल, गरम, आमसंयुक्त होय, जबके समान बीचमें मोटे हों और जिसकी त्वचा, नख नेत्रादिक हरे पीले हरतालके समान और हलदीके समान होवे ये लक्षण पित्ताधिक बवासीरके हैं ॥ कफकी बवासीरके लक्षण । श्लेष्मोल्वणा महामूला घना मन्दरुजः सिताः । उत्सन्नो- पचिताः स्निग्धाः स्तब्धा वृत्तगुरुस्थिराः ॥१९॥ पिच्छिलाः स्तिमिताः श्लक्ष्णाः कण्ड्वाढ्याः स्पर्शनाप्रियाः । करीर- पनसास्थ्याभास्तथा गोस्तनसन्निभाः॥ २०॥ वंक्षणानाहिनः पायुवस्तिनाभिविकारिणः । सश्वासकासहृल्लासप्रसेकारुचि- पीनसाः ॥ २१ ॥ मेहकृच्छ्रशिरोजाड्यशिशिरज्वरकारिणः। क्लैब्याग्निमार्दवच्छर्दिरानप्रायविकारदाः ॥ २२ ॥ वसाभाः १ "सामान्यतो बवासीरो रीही खूनी द्विधा भवेत् । खूनी ह्यपि च वातस्य विना कोपं न संभवेत् ॥ १ ॥" इति यवनशास्त्रे । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत। ( ६१ ) सकफप्रायपुरीषाः सप्रवाहिकाः । न स्रवन्ति न भिद्यन्ते पाण्डुस्निग्धत्वगादयः ॥ २३ ॥ कफकी बवासीरके लक्षण ये हैं, जैसे कि, गुदाके मस्से महामूल ( दूर धातुके प्रति जानेवाले ), एक दूसरेसे मिले हुए, मन्द पीडाके करनेवाले, सफेद, लम्बे, मोटे, चिकने, करडे, गोल, भारी, स्थिर, गाढे, कफसे लिपटे, मणिके समान स्वच्छ, खुजली बहुत होय और प्यारी लगे, करील कटहर इनके कांटेके समान होयं, दाखके सदृश होयं, पेडूमें अफरा करनेवाले, गुदा, मूत्रस्थान और नाभि इनमें पीडा करने- वाले, श्वास, खांसी, खाली ओकारी, लारका टपकना, अरुचि, पीनस इनको करने- वाले, प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, मस्तकका भारी होना, शीतज्वर, नपुंसकपना, अग्निका मन्द होना, वमनका और आम जिनमें बहुत ऐसे अतिसार, संग्रहणी आदि रोगके करने- वाले वसा ( चर्बी ) और कफ मिला दस्त होवे, प्रवाहिका उत्पन्न करनेवाले और मस्सोंमेंसे रुधिर न निकले, गाढा मल होनेसे भी मस्से न फूटें और शरीरका रंग पीला और चिकना होय ये कफकी बवासीरके लक्षण हैं ॥ सन्निपातके और सहज बवासीरके लक्षण । सर्वैः सर्वात्मकान्याहुर्लक्षणैः सहजानि च । जो पूर्व वातादि तीनों दोषोंकी बवासीरोंके लक्षण कहे सो सब मिलते हों उसको सन्निपातकी बवासीर जाननी और यही लक्षण सहज बवासीरके हैं ॥ रक्तार्शके लक्षण । रक्तोल्वणा गुदे कीलाः पित्ताकृतिसमन्विताः ॥ २४ ॥ वटप्ररोहसदृशा गुञ्जाविद्रुमसंनिभाः । तेऽत्यर्थं दुष्टमुष्णं च गाढविट्कप्रपीडिताः ॥ २५ ॥ स्रवन्ति सहसा रक्तं तस्य चातिप्रवृत्तितः । भेकाभः पीड्यते दुःखैः शोणितक्षय- संभवः ॥ २६ ॥ हीनवर्णबलोत्साहो हतौजाः कलुषेन्द्रियः । विट् श्यावं कठिनं रूक्षमधोवायुर्न गच्छति ॥ २७ ॥ गुदाके मस्सोंका रंग चिरमिटीके समान होवे अथवा बटके अंकुरसे हो और पित्तकी बवासीरके लक्षण जिसमें मिलते हों, मूँगाके सदृश हों और दस्त कठिन उतरनेसे मस्से दबें तब उन मस्सोंमेंसे दुष्ट और गरमागरम रुधिर पडे और रुधि- रके बहुत पडनेसे वर्षाऋतुके मेंडकके समान पीला रंग होजाय, रुधिरके निकलनेसे जो प्रगट त्वचाका कठोरपना, नाडीका शिथिलपना और खट्टी वस्तु तथा शीतकी
( ६२ ) माधवनिदान ।
( ६२ ) माधवनिदान । इच्छा इत्यादि दुःख तिनसे पीडित होय, हीनवर्ण, बल उत्साह पराक्रमका नाश होय, सम्पूर्ण इंद्रियोंका व्याकुल होना, उसका काला, कठिन और रूखा ऐसा मल होय, अपानवायु करे नहीं, ये लक्षण रुधिरकी बवासीरके जानने चाहिये ॥ अब इसी रक्तार्शनिदानके वातादिभेदकरके लक्षण कहते हैं— तनु चारुणवर्णं च फेनिलं चासृगर्र्शसाम् । कट्यूरुगुदशूलं च दौर्बल्यं यदि चाधिकम् ॥ तत्रानुबन्धो वातस्य हेतुर्यदि च रूक्षणम् ॥ २८ ॥ बवासीरमें रुधिर थोडा, अरुणवर्ण और झागसंयुक्त निकले और कमर जाँघ और गुदा इनमें दर्द होवे । यदि दुर्बलता विशेष होजावे और उसमें कोई रूक्ष हेतु पहुँचा होवे तो इस रक्तार्शको वातका सम्बन्ध है ऐसे जानना ॥ कफसम्बन्धके लक्षण । शिथिलं श्वेतपीतं च विट् स्निग्धं गुरु शीतलम् । यच्चार्शसां घनं चासृक्तन्तुमत्पाण्डु पिच्छिलम् ॥ २९ ॥ गुदं सपिच्छं स्तिमितं गुरु स्निग्धं च कारणम् । श्लेष्मानुबन्धो विज्ञेयस्तत्र रक्तार्शसां बुधैः ॥ ३० ॥ जिसमेंसे शिथिल, सफेद, पीला, चिकना, भारी और शीतल ऐसा दस्त होय और जिसका रुधिर गाढा तन्तुयुक्त पीला तथा बबूलेयुक्त निकले और गुदा बबूलयुक्त, गीला होवे और भारी चिकनी ऐसे कोई कारण होवे तो उस रक्तार्शको कफका सम्बन्ध जानना । शंका-क्यों जी ! पित्तके अनुबन्धकी बवासीर क्यों नहीं कही ? उत्तर-रक्तके और पित्तके प्रायः करके समान लक्षण होनेसे नहीं कहे, क्योंकि पहले २४ वें श्लोकमें कहि आये हैं कि "पित्ताकृतिसमन्विताः" इति ॥ बवासीरका पूर्वरूप । विष्टम्भोऽन्नस्य दौर्बल्यं कुक्षेराटोप एव च । कार्श्यमुद्गार- बाहुल्यं सक्थिसादोऽल्पविट्कता ॥ ३१ ॥ ग्रहणीदोषपाण्ड्वार्ते- राशङ्का चोदरस्य च। पूर्वरूपाणि निर्दिष्टान्यर्शसामभिवृद्धये ॥३२ अन्नका परिपाक अच्छी तरह हो नहीं, अन्न कूखमें रहे, देहमें दुर्बलता हो, कूखमें अफारा हो, अग्नि मन्द हो जावे, डकार बहुत आवै, जंघामें पीडा, थोडा दस्त उतरे, संग्रहणी और पाण्डुरोगकी भ्रांति होना, क्योंकि, उनके लक्षण मिलते हैं और उदर- रोगकी शंका होना ये लक्षण होवें तब जानना कि पुरुषके बवासीर रोग होवेगा ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । (६३) शंका-केवल गुदामें दोषोंके कोपसे बवासीर रोग होती है फिर सब देहमें कृशत्व और काला हो जाना कैसे है ? उत्तर। पञ्चात्मा मारुतः पित्तं कफो गुदवलित्रये । सर्व एव प्रकुप्यन्ति गुदजानां समुद्भवे ॥ ३३ ॥ तस्मादशांसि दुःखानि बहुव्याधि- कराणि च । सर्वदेहोपतापीनि प्रायः कृच्छ्रतमानि च ॥ ३४ ॥ गुदाके तीन आंटोंमें बवासीरके मस्से प्रगट होनेसे पांच प्रकारकी वायु, पांच प्रकारका पित्त, पांच प्रकारका कफ ये सब दोष कुपित होते हैं । प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान ये पांच प्रकारकी वायु, हृदय, गुदा, नाभि, कण्ठ और सर्व देह ये इनके क्रमसे स्थान हैं तथा आलोचक, रंजक, साधक, पाचक, भ्राजक इन भेदोंसे पित्त पांच प्रकारका है । इनके स्थान-आलोचक नेत्रोंमें, रञ्जक यकृत् और प्लीहोंमें, साधक हृदयमें, पाचक पक्वाशय और आमाशयमें, भ्राजक त्वचामें रहता है । ऐसे ही कफ भी अवलम्बक, क्लेदक, बोधक, तर्पक और श्लेष्मक इन पांच भेदके क्रमकरके हृदय, आमाशय जीभ, मस्तक और सन्धि इन पांचों स्थानोंमें रहता है । इस प्रकार सर्व दोष अपने पांच पांच स्वरूपोंसे कुपित होते हैं, इससे यह रोग (बवासीर) बहुत दुःखकारक और अनेक प्रकारकी व्याधि (उदर और अग्निमांद्य इत्यादि उपद्रव) कर्ता सर्व देहको क्लेशदायक और विशेषकरके कृच्छ्र- साध्य तथा असाध्य जानना ॥ सुखसाध्यके लक्षण । बाह्यायां तु वलौ जातान्येकदोषोल्वणानि च । अ॒र्शांसि सुखसाध्यानि न चिरोत्पतितानि च ॥ ३५ ॥ बाहरके आंटेमें भई हो, एक दोषोल्वण हो और जिसको एक वर्ष व्यतीत न भया हो, ऐसी बवासीर सुखसाध्य है ॥ कृच्छ्रसाध्य लक्षण । द्वंद्वजानि द्वितीयायां वलौ यान्याश्रितानि च । कृच्छ्रसाध्यानि तान्याहुः परिसंवत्सराणि च ॥ ३६ ॥ दो दोषोंसे प्रगट भई हो और दूसरी वली अर्थात् आंटेमें होय और जिसको एक वर्ष व्यतीत हो गया हो ऐसी बवासीरके मस्से कृच्छ्रसाध्य होते हैं और जो बाहरकी वलीमें द्विदोषोल्वण होय और एक दोषोल्वण दूसरी वली (दूसरे आंटे) में होवे तो यह भी कृच्छ्रसाध्य जानना ॥
( ६४ ) माधवनिदान ।
( ६४ ) माधवनिदान । असाध्यके लक्षण । सहजानि त्रिदोषाणि यानि चाभ्यन्तरावलिम् । जायन्तेऽर्शांसि संश्रित्य तान्यसाध्यानि निर्दिशेत् ॥ ३७॥ सहज कहिये जन्म होनेके समयसे जो होय अथवा तीन दोषोंसे प्रगट भई हो और जो तीसरा अन्तका आंटा है उसमें भई हो सो बवासीर असाध्य जानना ॥ याप्यलक्षण । शेषत्वादायुषस्तानी चतुष्पादसमन्विते । याप्यन्ते दीप्तकायाग्नेः प्रत्याख्येयान्यतोऽन्यथा ॥ ३८॥ यदि असाध्य बवासीर होय और उस रोगीका आयुष्य बाकी हो और चतुष्पाद सम्पत्ति ( वैद्य, औषध, परिचारक और रोगी ये जैसे चाहिये वैसे ) होवे और रोगीकी जठराग्नि प्रदीप्त होवे तो रोग याप्य जानना । इसीसे विपरीत होवे तो रोगीको वैद्य छोड़ देवे ॥ प्रसंगवशसे रोगी, वैद्य, औषध और सेवकके लक्षण कहते हैं- वैद्यो व्याध्युपसृष्टश्च भेषजं परिचारकः । एते पादाश्चिकित्सायाः कर्मसाधनहेतवः ॥ ३९ ॥ वैद्य, रोगी, औषध और सेवक ये कर्मसाधन हेतु चिकित्साके ( चार ) पाद हैं ॥ तत्रादौ वैद्यलक्षण । तत्त्वाधिगतशास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वयं कृती । लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपस्कृतभेषजः ॥४०॥ प्रत्युत्पन्नमतिर्धीमान् व्यव- सायी प्रियंवदः । सत्यधर्मपरो यश्च वैद्य ईदृक् प्रशस्यते ॥४१॥ गुरुसे भले प्रकार शास्त्रको पढा हो और दूसरे वृद्ध वैद्यकी चिकित्सा अर्थात् इलाज जिसने देखा हो और आप चिकित्सा करनेमें चतुर हो तथा सिद्धहस्त अर्थात् जिस रोगीका इलाज करे सो शीघ्र अच्छा हो जावे, पवित्र रहे, शूर हो, श्रेष्ठ औषधि चन्द्रोदय आदि रसादिक सामग्री जिसके समीप रहा करे, तत्काल जिसकी बुद्धि स्फुरणवाली होय, बुद्धिमान्, संसारके व्यवहारको जाननेवाला हो, प्रियवचन बोलने- वाला, सत्य और धर्मका आचरण करनेवाला ऐसा वैद्य प्रशंसाके योग्य होता है ॥ निषिद्धवैद्यके लक्षण । कुचैलः कर्कशः स्तब्धः कुग्रामी स्वयमागतः । पञ्च वैद्या न पूज्यन्ते धन्वन्तरिसमा अपि ॥ ४२ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ६५ ) मैले वस्त्रवाला, बुरा बोलनेवाला, अभिमानी, व्यवहारमें न समझे और जो बिना बुलाये आवे ये पांच वैद्य श्रीधन्वन्तरिके समान भी हों तो भी पूजने योग्य नहीं हैं ॥ रोगीके लक्षण । आयुष्मान् सत्त्ववान् साध्यो द्रव्यवानात्मवानपि । उच्यते व्याधितः पादो वैद्यवाक्यकृदास्तिकः ॥ ४३ ॥ आयुवाला, बलयुक्त साध्य, द्रव्यवान्, ज्ञानी, वैद्यका आज्ञाकारी और आस्तिक ऐसा रोगी होना चाहिये ॥ उत्तम औषधिके लक्षण । प्रशस्तदेशसंभूतं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम् । अल्पमात्रं बहुगुणं गन्धवर्णरसान्वितम् ॥ ४४ ॥ उत्तम स्थानोंमें प्रगट हुई हो और शुभ दिनमें उसको उखाडी हो, थोडी मात्रा देनेसे बहुत गुण करे, दुर्गंधरहित, उत्तम स्वरूप और रसयुक्त हो सो औषधि उत्तम है ॥ दुष्ट औषधिके लक्षण । वल्मीककुत्सितानूपश्मशानोषरमार्गजाः । जन्तुवह्निहिमव्याप्ता नौषध्यः कार्यसाधकाः ॥ ४५ ॥ इतने स्थानकी औषधें कार्य करनेवाली नहीं होती हैं-बांबीकी, खोटी धरतीकी, जलके समीपकी, इमशानकी, ऊषरकी, जहां रेहं चूना निकलता होय तहांकी और रास्तेकी, कीडोंकी खाई, अग्निसे जली हुई, जाडेकी मारी ऐसी औषधें कार्य करने- वाली नहीं हैं ॥ दूतके लक्षण । स्निग्धोऽजुगुप्सुर्बलवान् युक्तो व्याधितरक्षणे । वैद्यवाक्यकृदश्रान्तः पादः परिचरः स्मृतः ॥ ४६ ॥ नवीन अवस्थाका, बलवान्, रोगीकी रक्षा करनेमें तत्पर होवे, वैद्यके वचनका करनेवाला होवे, आलस्यरहित ऐसा परिचारक अर्थात् दूत होय । इन पूर्वोक्तको चतुष्पाद सम्पत्ति कहते हैं सो यह आयु शेषके बिना नहीं मिलते ॥ ४ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ६६ ) माधवनिदान ।
( ६६ ) माधवनिदान । अब उपद्रवसे असाध्यत्व कहते हैं- हस्ते पादे गुदे नाभ्यां मुखे वृषणयोस्तथा । शोथो हृत्पार्श्वशूलं च यस्यासाध्योऽर्शसो हि सः ॥ ४७ ॥ जिसके हाथ, पैर, गुदा, नाभि, मुख और अण्डकोश इनमें सूजन हो, हृदय और पसवाडे दूखें वह रोगी असाध्य जानना ॥ हृत्पार्श्वशूलं संमोहश्छर्दिरङ्गस्य रुगुज्वरः । तृष्णा गुदस्य पाकश्च निहन्युर्गुदजातुरम् ॥ ४८ ॥ हृदय और पसवाडोंमें दर्द होय, इन्द्रिय और मन इनमें मोह होय, वमन, अङ्गोंमें पीडा, ज्वर, प्यास, गुदाका पकना अर्थात् गुदाके ऊपर पीले फोडे ये लक्षण होनेसे बवासीरवाला रोगी असाध्य जानना ॥ तृष्णारोचकशूलार्तमतिप्रसृतशोणितम् । शोथातिसारसंयुक्तमर्शॉसि क्षपयन्ति हि ॥ ४९ ॥ प्यास, अरुचि, शूल इनसे पीडित, जिसके अत्यन्त रुधिर बहे और सूजन अति- सार ये होयँ उस रोगीका बवासीर नाश कर देता है ॥ मेढ्रादिष्वपि वक्ष्यन्ते यथास्वं नाभिजान्यपि । गण्डूपदास्यरूपाणि पिच्छिलानि मृदूनि च ॥ ५० ॥ मेढ्र कहिये लिंग, आदिशब्दकरके नाक कान इत्यादि स्थानोंमें दोषभेद करके बवासीर होती है सो आगे कहेंगे । उसी प्रकार नाभिस्थानमें भी अर्शरोग होता है वह केंचुआके मुखके समान गाढी और नरम होय ॥ चर्मकीलकी संप्राप्ति । व्यानो गृहीत्वा श्लेष्माणं करोत्यर्शस्त्वचो बहिः । कीलोपमः स्थिरखरं चर्मकीलं तु तद्विदुः ॥ ५१ ॥ व्यानवायु कफको लेकर त्वचामें कीलके सदृश स्थिर और खरदरी ऐसे बवा- सीरको करे उसको चर्मकील कहते हैं । “त्वचो बहिः” इसके कहनेसे गुद होठका त्याग कहा ॥
भाषाटीकासमेत । ( ६७ ) वातादिभेदकरके उसके लक्षण । वातेन तोदपारुष्ये पित्तादतिसरक्तता । श्लेष्मणा स्निग्धता चास्य ग्रथितत्वं सवर्णता ॥ ५२ ॥ वातसे सुईके चुभानेसे जैसे पीडा होती है ऐसी पीडा हो, पित्तसे कठोरता, कफसे काला और कुछ तथा चिकनी गांठके समान वर्ण होवै ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरी- भाषाटीकायामर्शोरोगः समाप्तः ॥ अथ मन्दाग्निरोगनिदानम् । अर्शरोगसे मन्दाग्नि होती हैं, इसीसे मन्दाग्निरोगको कहते हैं— मन्दस्तीक्ष्णोऽथ विषमः समश्चेति चतुर्विधः । कफपित्तानिलाधिक्यात्तत्साम्याज्जाठरोऽनलः ॥ १ ॥ मनुष्यके कफकी प्रकृतिसे मंदाग्नि, पित्तकी प्रकृतिसे तीक्ष्णाग्नि, वातकी प्रकृ- तिसे विषमाग्नि तथा वात, पित्त, कफ इनके समान होनेसे समाग्नि होवे है । ऐसी अग्नि चार प्रकारकी है । इसमें मन्दाग्निको दुर्जय होनेसे प्रथम कही और जाठर शब्द कहनेसे धातुकी अग्निका त्याग जानना ॥ अजीर्णरोग । विषमो वातजान् रोगांस्तीक्ष्णः पित्तनिमित्तजान् । करोत्यग्निस्तथा मन्दो विकारान् कफसंभवान् ॥ २ ॥ विषमाग्नि वातजन्य ८० रोगोंमेंसे किसी रोगको प्रगट करे और सामान्य ज्वरा- तिसारादिकको प्रगट करे, तीक्ष्णाग्नि पित्तके ४० रोगोंमेंसे किसी रोगको प्रगट करे । उसी प्रकार मन्दाग्नि कफजन्य २० रोगोंमेंसे किसी रोगको पैदा कर आल- स्यादिकोंको उत्पन्न करती है ॥ समाग्न्यादिकोंके लक्षण । समा समाग्नेरशिता मात्रा सम्यग्विपाच्यते । स्वल्पापि नैव मन्दाग्नेर्विषमाग्नेस्तु देहिनः ॥ ३ ॥ कदाचित्पच्यते सम्यक्
कदाचिन्न विपच्यते। मात्रातिमात्राप्याशिता सुखं यस्य विप- च्यते ॥ ४ ॥ तीक्ष्णाग्निरिति तं विद्यात्समाग्निः श्रेष्ठ उच्यते ॥ समाग्निवाले पुरुषके यथोचित आहार भले प्रकार पाचन होता है और मन्दाग्नि- वाले पुरुषको थोडा भी आहार यथार्थ नहीं पचता और विषमाग्निवाले मनुष्यको कभी अच्छी तरहसे अन्न पचे और कभी नहीं पचे और बहुत भोजन करा हुआ भी जिसके सुखपूर्वक पचजावे उसको तीक्ष्णाग्नि कहते हैं । इन चारों प्रकारकी अग्निमें समाग्नि उत्तम है । तीक्ष्णाग्निके कहनेसे भस्मकका ग्रहण नहीं करना चाहिये क्योंकि अत्यन्त तीक्ष्णाग्निको भस्मक कहते हैं उसके लक्षण चरकमें कहे हैं ॥ यथा- नरे क्षीणकफे पित्तं कुपितं मारुतानुगम् ॥ ५ ॥ सोष्मणा पाचकस्थाने बलमग्नेः प्रयच्छति । तदा लब्धबलो देहं रूक्षं यत्सानिलोऽनलः ॥ ६ ॥ अभिभूय पचत्यन्नं तैक्ष्ण्यादाशु मुहुर्मुहुः । पक्त्वाऽन्नं स ततो धातूञ्शोणितादीन्पचत्यपि ॥ ७ ॥ ततो दौर्बल्यमातङ्कं मृत्युं चोपनयेत् परम् । भुक्तेऽन्ने लभते शान्तिं जीर्णमात्रे प्रताम्यति । तृट्कासदाहमोहाः स्यु- र्व्याधयोऽत्यग्निसंभवाः ॥ ८ ॥ क्षीणकफवाले पुरुषके कफ कुपित हो वायुसे मिलकर ऊष्माके साथ पाचक- स्थानमें जाकर अग्निको बल देवे तब जठराग्नि वातकी सहायता पाकर प्रबल होकर देहको रूखा कर देवे और उसके जोरसे बारंबार अन्नको पचावे । अन्नको पचाय पीछे रुधिरादि धातुओंको पचावे, रुधिर आदिके पचनेसे देहमें दुर्बलताका रोग और मृत्युको मनुष्य प्राप्त होवे, जब अन्नको खावे तब तो शांति हो जाय और जब अन्न पचजाय तब मूर्च्छित होय । प्यास, खांसी, दाह, मोह, (कुछ सुध न रहै) ये रोग अत्यन्त अग्निसे होते हैं ! इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा- टीकायामग्निमांद्यनिदानं समाप्तम् ॥
अथाजीर्णनिदानम् ।
भाषाटीकासमेत । ( ६९ ) अथाजीर्णनिदानम् । अग्निमांद्य और अजीर्ण इनका परस्पर कारण है, इसीसे अग्निमांद्यके पीछे अजीर्णनिदानको कहते हैं- आमं विदग्धं विष्टब्धं कफपित्तानिलैस्त्रिभिः । अजीर्णं केचि- दिच्छन्ति चतुर्थं रसशेषतः ॥ १ ॥ अजीर्णं पञ्चमं केचिन्निर्दोषं दिनपाकि च । वदन्ति षष्ठं चाजीर्णं प्राकृतं प्रतिवासरम् ॥ २ ॥ मनुष्यके कफसे आम, पित्तसे विदग्ध, वातसे विष्टब्ध ऐसे तीन प्रकारका अजीर्णरोग होता है । और जो भोजन करा सो पक्व होय नहीं रस शेष रहे सो रसशेषसे चतुर्थ अजीर्ण होय है । और रात्रि दिनमें जो आहार पचे और जिसमें अफरा, हडफूटन कुछ होय यह पांचवां अजीर्ण किसीके मतसे है । और जो नित्य ही स्वाभाविक अजीर्ण रहे अर्थात् विकृतिजन्य न होय उसको छठा अजीर्ण कहते हैं इस अजीर्णके पचानेके अर्थ सुश्रुतमें वामपार्श्वशयनादिक उपाय कहे हैं सो करने चाहिये ॥ भुक्त्वा शतपदं गच्छेदामपार्श्वेन संविशेत् । शब्दरूपरसस्पर्श- गन्धांश्च मनसः प्रियान् ॥ भुक्तवानुपसेवेत तेनान्नं साधु तिष्ठति ३॥ भोजन करे पीछे सौ पेंड डोलना, बांई करवट शयन करना, अपने मनको जो प्रिय शब्द, रूप, रस, स्पर्श, सुगन्ध उनको सेवन करना इस प्रकार करनेसे अन्न भले प्रकार पचे है ॥ अजीर्णके कारण । अत्यम्बुपानाद्विषमाशनाच्च सन्धारणात् स्वप्नविपर्ययाच्च । कालेऽपि सात्म्यं लघु चापि भुक्तमन्नं न पाकं भजते नरस्य॥४॥ ईर्ष्याभयक्रोधपरिप्लुतेन लुब्धेन शुग्दैन्यनिपीडितेन । प्रद्वेषयुक्तेन च सेव्यमानमन्नं न सम्यक्परिपाकमेति ॥ ५ ॥ बहुत जल पीनेसे, भोजनके समयको छोड पीछे भोजन करनेसे, मल, मूत्र आदि वेगोंके रोकनेसे, दिनमें सोनेसे, रातमें जागनेसे इन कारणोंसे भोजनके समय यदि १ शंका-आमादिक तीनों अजीर्ण और रसशेषमें क्या भेद है? उत्तर-आम, विदग्ध, विष्टब्ध ये तीनों अजीर्ण अन्नसे उत्पन्न होते हैं और रसशेष अजीर्ण आहारके रससे उत्पन्न होता है ॥
( ७० ) माधवनिदान ।
( ७० ) माधवनिदान । लघु और स्निग्ध गरम आदिगुणयुक्त भी हितकारी पदार्थ खाय तो भी अन्न अच्छी रीतिसे नहीं पचे ये देहके कारण कहे । अब अजीर्णके कारण जो मनसे सम्बन्ध रखते हैं उनको कहते हैं-ईर्ष्या कहिये परद्रव्यको न देख सकना, डरना, क्रोध करना इन कारणोंसे युक्त तथा लोभ, शोक, दीनतासे पीडित और मत्सरता करना इन कारणोंसे मनुष्यके भोजन करा हुआ अन्न भले प्रकार पचता नहीं है ॥ आमादिक अजीर्णोंके लक्षण । तत्राामे गुरुतोत्क्लेशः शोथो गण्डाक्षिकूटगः । उद्गारश्च यथाभुक्तमविदग्धः प्रवर्त्तते ॥ ६ ॥ उन चारों अजीर्णोंमें प्रथम आमाजीर्णके लक्षण कहते हैं-पेट और अंग भारी हो, वमनके आनेकेसे प्रतीत हो, कपोल और नेत्रोंमें सूजन होवै और इसी अजी- र्णके प्रभावसे जैसा भोजन करा होय मीठा आदि उसी प्रकारकी डकार आवे ॥ विदग्धाजीर्णके लक्षण । विदग्धे भ्रमतृण्मूर्च्छाः पित्ताच्च विविधा रुजः । उद्गारश्च सधूमाम्लः स्वेदो दाहश्च जायते ॥ ७ ॥ विदग्ध अजीर्णमें भ्रम, प्यास और मूर्च्छा ये लक्षण होते हैं और पित्तके अनेक रोग प्रगट हों तथा धुएँके साथ खट्टी डकार आवे पसीना आवे और दाह होय ॥ विष्टब्ध अजीर्णके लक्षण । विष्टब्धे शूलमाध्मानं विविधा वातवेदनाः । मलवाताप्रवृत्तिश्च स्तम्भो मोहोऽङ्गपीडनम् ॥ ८ ॥ विष्टब्ध अजीर्णके ये लक्षण हैं-शूल, अफरा, अनेक वातकी पीडा, मल और अधोवायुका रुकजाना, देह जकडजाय, मोह और देहमें पीडा होय ॥ रसशेष अजीर्णके लक्षण । रसशेषेऽन्नविद्वेषो हृदयाशुद्धिगौरवे । रसशेष अजीर्णके ये लक्षण हैं-अन्नमें अरुचि, हृदयमें शुद्धि न होय और देह भारी होय ॥ अजीर्णके उपद्रव । मूर्च्छा प्रलापो वमथुः प्रसेकः सदनं भ्रमः । उपद्रवा भवन्त्येते मरणं चाप्यजीर्णतः ॥ ९ ॥