महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सदस्यश्चाभवद् व्यासः पुत्रशिष्यसहायवान् । उद्दालकः प्रमतकः श्वेतकेतुश्च पिङ्गलः ॥ ७ ॥ असितो देवलश्चैव नारदः पर्वतस्तथा । आत्रेयः कुण्डजठरौ द्विजः कालघटस्तथा ॥ ८ ॥ वात्स्यः श्रुतश्रवा वृद्धो जपस्वाध्यायशीलवान् । कोहलो देवशर्मा च मौद्गल्यः समसौरभः ॥ ९ ॥ एते चान्ये च बहवो ब्राह्मणा वेदपारगाः । सदस्याश्चाभवंस्तत्र सत्रे पारीक्षितस्य ह ॥ १० ॥
इसी प्रकार पुत्र और शिष्योंसहित भगवान् वेदव्यास, उद्दालक, प्रमतक, श्वेतकेतु, पिंगल, असित, देवल, नारद, पर्वत, आत्रेय, कुण्ड, जठर, द्विजश्रेष्ठ कालघट, वात्स्य, जप और स्वाध्यायमें लगे रहनेवाले बूढ़े श्रुतश्रवा, कोहल, देवशर्मा, मौद्गल्य तथा समसौरभ—ये और अन्य बहुत-से वेदविद्याके पारंगत ब्राह्मण जनमेजयके उस सर्पयज्ञमें सदस्य बने थे ॥ ७–१० ॥
जुह्वत्स्वृत्विक्ष्वथ तदा सर्पसत्रे महाक्रतौ । अहयः प्रापतंस्तत्र घोराः प्राणिभयावहाः ॥ ११ ॥
उस समय उस महान् यज्ञ सर्पसत्रमें ज्यों-ज्यों ऋत्विज् लोग आहुतियाँ डालते, त्यों-त्यों प्राणिमात्रको भय देनेवाले घोर सर्प वहाँ आ-आकर गिरते थे ॥ ११ ॥
वसामेदोवहाः कुल्या नागानां सम्प्रवर्तिताः । ववौ गन्धश्च तुमलो दह्यतामनिशं तदा ॥ १२ ॥
नागोंकी चर्बी और मेदसे भरे हुए कितने ही नाले बह चले। निरन्तर जलनेवाले सर्पोंकी तीखी दुर्गन्ध चारों ओर फैल रही थी ॥ १२ ॥
पततां चैव नागानां धिष्ठितानां तथाम्बरे । अश्रूयतानिशं शब्दः पच्यतां चाग्निना भृशम् ॥ १३ ॥
जो आगमें पड़ रहे थे, जो आकाशमें ठहरे हुए थे और जो जलती हुई आगकी ज्वालामें पक रहे थे, उन सभी सर्पोंका करुण क्रन्दन निरन्तर जोर-जोरसे सुनायी पड़ता था ॥ १३ ॥
तक्षकस्तु स नागेन्द्रः पुरन्दरनिवेशनम् । गतः श्रुत्वैव राजानं दीक्षितं जनमेजयम् ॥ १४ ॥
नागराज तक्षकने जब सुना कि राजा जनमेजयने सर्पयज्ञकी दीक्षा ली है, तब उसे सुनते ही वह देवराज इन्द्रके भवनमें चला गया ॥ १४ ॥
ततः सर्वं यथावृत्तमाख्याय भुजगोत्तमः । अगच्छच्छरणं भीत आगः कृत्वा पुरन्दरम् ॥ १५ ॥
वहाँ उसने सब बातें ठीक-ठीक कह सुनायीं। फिर सर्पोंमें श्रेष्ठ तक्षकने अपराध करनेके कारण भयभीत हो इन्द्रदेवकी शरण ली॥ १५॥
तमिन्द्रः प्राह सुप्रीतो न तवास्तीह तक्षक ।
भयं नागेन्द्र तस्माद् वै सर्पसत्रात् कदाचन ॥ १६ ॥
तब इन्द्रने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—‘नागराज तक्षक! तुम्हें यहाँ उस सर्पयज्ञसे कदापि कोई भय नहीं है॥ १६॥
प्रसादितो मया पूर्वं तवार्थाय पितामहः ।
तस्मात् तव भयं नास्ति व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ १७ ॥
तुम्हारे लिये मैंने पहलेसे ही पितामह ब्रह्माजीको प्रसन्न कर लिया है, अतः तुम्हें कुछ भी भय नहीं है। तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये’॥ १७॥
सौतिरुवाच
एवमाश्वासितस्तेन ततः स भुजगोत्तमः ।
उवास भवने तस्मिञ्छक्रस्य मुदितः सुखी ॥ १८ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— इन्द्रके इस प्रकार आश्वासन देनेपर सर्पोंमें श्रेष्ठ तक्षक उस इन्द्रभवनमें ही सुखी एवं प्रसन्न होकर रहने लगा॥ १८॥
अजस्रं निपतत्स्वग्नौ नागेषु भृशदुःखितः ।
अल्पशेषपरीवारो वासुकिः पर्यतप्यत ॥ १९ ॥
नाग निरन्तर उस यज्ञकी आगमें आहुति बनते जा रहे थे। सर्पोंका परिवार अब बहुत थोड़ा बच गया था। यह देख वासुकि नाग अत्यन्त दुःखी हो मन-ही-मन संतप्त होने लगे॥ १९॥
कश्मलं चाविशद् घोरं वासुकिं पन्नगोत्तमम् ।
स घूर्णमानहृदयो भगिनीमिदमब्रवीत् ॥ २० ॥
सर्पोंमें श्रेष्ठ वासुकिपर भयानक मोह-सा छा गया, उनके हृदयमें चक्कर आने लगा। अतः वे अपनी बहिनसे इस प्रकार बोले—॥ २०॥
दह्यन्त्यङ्गानि मे भद्रे न दिशः प्रतिभान्ति च ।
सीदामीव च सम्मोहात् घूर्णतीव च मे मनः ॥ २१ ॥
दृष्टिर्भ्राम्यति मेऽतीव हृदयं दीर्यतीव च ।
पतिष्याम्यवशोऽद्याहं तस्मिन् दीप्ते विभावसौ ॥ २२ ॥
‘भद्रे! मेरे अंगोंमें जलन हो रही है। मुझे दिशाएँ नहीं सूझतीं। मैं शिथिल-सा हो रहा हूँ और मोहवश मेरे मस्तिष्कमें चक्कर-सा आ रहा है, मेरे नेत्र घूम रहे हैं, हृदय अत्यन्त विदीर्ण-सा होता जा रहा है। जान पड़ता है, आज मैं भी विवश होकर उस यज्ञकी प्रज्वलित अग्निमें गिर पडूँगा॥ २१-२२॥
पारिक्षितस्य यज्ञोऽसौ वर्ततेऽस्मज्जिघांसया ।
व्यक्तं मयापि गन्तव्यं प्रेतराजनिवेशनम् ॥ २३ ॥
‘जनमेजयका वह यज्ञ हमलोगोंकी हिंसाके लिये ही हो रहा है। निश्चय ही अब मुझे भी यमलोक जाना पड़ेगा ॥ २३ ॥
अयं स कालः सम्प्राप्तो यदर्थमसि मे स्वसः ।
जरत्कारौ मया दत्ता त्रायस्वास्मान् सबान्धवान् ॥ २४ ॥
‘बहिन! जिसके लिये मैंने तुम्हारा विवाह जरत्कारु मुनिसे किया था, उसका यह अवसर आ गया है। तुम बान्धवोंसहित हमारी रक्षा करो ॥ २४ ॥
आस्तीकः किल यज्ञं तं वर्तन्तं भुजगोत्तमे ।
प्रतिषेत्स्यति मां पूर्वं स्वयमाह पितामहः ॥ २५ ॥
‘श्रेष्ठ नागकन्ये! पूर्वकालमें साक्षात् ब्रह्माजीने मुझसे कहा था—‘आस्तीक उस यज्ञको बंद कर देगा’ ॥ २५ ॥
तद् वत्से ब्रूहि वत्सं स्वं कुमारं वृद्धसम्मतम् ।
ममाद्य त्वं सभृत्यस्य मोक्षार्थं वेदवित्तमम् ॥ २६ ॥
‘अतः वत्से! आज तुम बन्धु-बान्धवोंसहित मेरे जीवनको संकटसे छुड़ानेके लिये वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ अपने पुत्र कुमार आस्तीकसे कहो। वह बालक होनेपर भी वृद्ध पुरुषोंके लिये भी आदरणीय है’ ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रे वासुकिवाक्ये
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रके विषयमें वासुकिवचनसम्बन्धी तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 381)
चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना
सौतिरुवाच
तत आहूय पुत्रं स्वं जरत्कारुर्भुजङ्गमा ।
वासुकेर्नागराजस्य वचनादिदमब्रवीत् ॥ १ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— तब नागकन्या जरत्कारु नागराज वासुकिके कथनानुसार अपने पुत्रको बुलाकर इस प्रकार बोली— ॥ १ ॥
अहं तव पितुः पुत्र भ्रात्रा दत्ता निमित्ततः ।
कालः स चायं सम्प्राप्तस्तत् कुरुष्व यथातथम् ॥ २ ॥
‘बेटा! मेरे भैयाने एक निमित्तको लेकर तुम्हारे पिताके साथ मेरा विवाह किया था। उसकी पूर्तिका यही उपयुक्त अवसर प्राप्त हुआ है। अतः तुम यथावत्रूपसे उस उद्देश्यकी पूर्ति करो’ ॥ २ ॥
आस्तीक उवाच
किं निमित्तं मम पितुर्दत्ता त्वं मातुलेन मे ।
तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन श्रुत्वा कर्तास्मि तत् तथा ॥ ३ ॥
आस्तीकने पूछा— माँ! मामाजीने किस निमित्तको लेकर पिताजीके साथ तुम्हारा विवाह किया था? वह मुझे ठीक-ठीक बताओ। उसे सुनकर मैं उसकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करूँगा ॥ ३ ॥
सौतिरुवाच
तत आचष्ट सा तस्मै बान्धवानां हितैषिणी ।
भगिनी नागराजस्य जरत्कारुरविक्कवा ॥ ४ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— तदनन्तर अपने भाई-बन्धुओंका हित चाहनेवाली नागराजकी बहिन जरत्कारु शान्तचित्त हो आस्तीकसे बोली ॥ ४ ॥
जरत्कारुरुवाच
पन्नगानामशेषाणां माता कद्रूरिति श्रुता ।
तया शप्ता रुषितया सुता यस्मान्निबोध तत् ॥ ५ ॥
जरत्कारुने कहा— वत्स! सम्पूर्ण नागोंकी माता कद्रू नामसे विख्यात हैं। उन्होंने किसी समय रुष्ट होकर अपने पुत्रोंको शाप दे दिया था। जिस कारणसे वह शाप दिया, वह
बताती हूँ, सुनो ।। ५ ।।
उच्चैःश्रवाः सोऽश्वराजो यन्मिथ्या न कृतो मम । विनतार्थाय पणिते दासीभावाय पुत्रकाः ।। ६ ।। जनमेजयस्य वो यज्ञे धक्ष्यत्यनिलसारथिः । तत्र पञ्चत्वमापन्नाः प्रेतलोकं गमिष्यथ ।। ७ ।।
(अश्वोंका राजा जो उच्चैःश्रवा है, उसके रंगको लेकर विनताके साथ कद्रूने बाजी लगायी थी। उसमें यह शर्त थी—'जो हारे वह जीतनेवालीकी दासी बने।' कद्रू उच्चैःश्रवाकी पूँछ काली बता चुकी थी। अतः उसने अपने पुत्रोंसे कहा—'तुमलोग छलपूर्वक उस घोड़ेकी पूँछ काले रंगकी कर दो।' सर्प इससे सहमत न हुए। तब उन्होंने सर्पोंको शाप देते हुए कहा—) 'पुत्रो! तुमलोगोंने मेरे कहनेसे अश्वराज उच्चैःश्रवाकी पूँछका रंग न बदलकर विनताके साथ जो मेरी दासी होनेकी शर्त थी, उसमें—उस घोड़ेके सम्बन्धमें विनताके कथनको मिथ्या नहीं कर दिखाया, इसलिये जनमेजयके यज्ञमें तुमलोगोंको आग जलाकर भस्म कर देगी और तुम सभी मरकर प्रेतलोकको चले जाओगे' ।। ६-७ ।।
तां च शप्तवतीं देवः साक्षाल्लोकपितामहः । एवमस्त्विति तद्वाक्यं प्रोवाचानुमुमोद च ।। ८ ।।
कद्रूने जब इस प्रकार शाप दे दिया, तब साक्षात् लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने 'एवमस्तु' कहकर उनके वचनका अनुमोदन किया ।। ८ ।।
वासुकिश्चापि तच्छ्रुत्वा पितामहवचस्तदा । अमृते मथिते तात देवाञ्छरणमीयिवान् ।। ९ ।।
तात! मेरे भाई वासुकिने भी उस समय पितामहकी बात सुनी थी। फिर अमृत-मन्थनका कार्य हो जानेपर वे देवताओंकी शरणमें गये ।। ९ ।।
सिद्धार्थाश्च सुराः सर्वे प्राप्यामृतमनुत्तमम् । भ्रातरं मे पुरस्कृत्य पितामहमुपागमन् ।। १० ।। ते तं प्रसादयामासुः सुराः सर्वेऽब्जसम्भवम् । राज्ञा वासुकिना सार्धं शापोऽसौ न भवेदिति ।। ११ ।।
देवतालोग मेरे भाईकी सहायतासे उत्तम अमृत पाकर अपना मनोरथ सिद्ध कर चुके थे। अतः वे मेरे भाईको आगे करके पितामह ब्रह्माजीके पास गये। वहाँ समस्त देवताओंने नागराज वासुकिके साथ रहकर पितामह ब्रह्माजीको प्रसन्न किया। उन्हें प्रसन्न करनेका उद्देश्य यह था कि माताका वह शाप लागू न हो ।। १०-११ ।।
देवा ऊचुः
वासुकिर्नागराजोऽयं दुःखितो ज्ञातिकारणात् । अभिशापः स मातुस्तु भगवन् न भवेत् कथम् ।। १२ ।।
देवता बोले— भगवन्! ये नागराज वासुकि अपने जाति-भाइयोंके लिये बहुत दुःखी हैं। कौन-सा ऐसा उपाय है, जिससे माताका शाप इन लोगोंपर लागू न हो ॥ १२ ॥
ब्रह्मोवाच
जरत्कारुर्जरत्कारुं यां भार्यां समवाप्स्यति । तत्र जातो द्विजः शापान्मोक्षयिष्यति पन्नगान् ॥ १३ ॥ ब्रह्माजीने कहा— जरत्कारु मुनि जरत्कारु नामवाली जिस पत्नीको ग्रहण करेंगे, उसके गर्भसे उत्पन्न ब्राह्मण सर्पोंको माताके शापसे मुक्त करेगा ॥ १३ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं वासुकिः पन्नगोत्तमः । प्रादान्माममरप्रख्य तव पित्रे महात्मने ॥ १४ ॥ प्रागेवानागते काले तस्मात् त्वं मय्यजायथाः । अयं स कालः सम्प्राप्तो भयान्रस्त्रातुमर्हसि ॥ १५ ॥ भ्रातरं चापि मे तस्मात् त्रातुमर्हसि पावकात् । न मोघं तु कृतं तत् स्याद् यदहं तव धीमते । पित्रे दत्ता विमोक्षार्थं कथं वा पुत्र मन्यसे ॥ १६ ॥ देवताके समान तेजस्वी पुत्र! ब्रह्माजीकी वह बात सुनकर नागश्रेष्ठ वासुकिने मुझे तुम्हारे महात्मा पिताकी सेवामें समर्पित कर दिया। यह अवसर आनेसे बहुत पहले इसी निमित्तसे मेरा विवाह किया गया। तदनन्तर उन महर्षिद्वारा मेरे गर्भसे तुम्हारा जन्म हुआ। जनमेजयके सर्पयज्ञका वह पूर्वनिर्दिष्ट काल आज उपस्थित है (उस यज्ञमें निरन्तर सर्प जल रहे हैं), अतः उस भयसे तुम उन सबका उद्धार करो। मेरे भाईको भी उस भयंकर अग्निसे बचा लो। जिस उद्देश्यको लेकर तुम्हारे बुद्धिमान् पिताकी सेवामें मैं दी गयी, वह व्यर्थ नहीं जाना चाहिये। अथवा बेटा! सर्पोंको इस संकटसे बचानेके लिये तुम क्या उचित समझते हो? ॥ १४—१६ ॥
सौतिरुवाच
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सास्तीको मातरं तदा । अब्रवीद् दुःखसंतप्तं वासुकिं जीवयन्निव ॥ १७ ॥ उग्रश्रवाजी कहते हैं— माताके ऐसा कहनेपर आस्तीकने उससे कहा—'माँ! तुम्हारी जैसी आज्ञा है वैसा ही करूँगा।' इसके बाद वे दुःखपीड़ित वासुकिको जीवनदान देते हुए-से बोले— ॥ १७ ॥
अहं त्वां मोक्षयिष्यामि वासुके पन्नगोत्तम । तस्माच्छापान्महासत्त्व सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ १८ ॥ 'महान् शक्तिशाली नागराज वासुके! मैं आपको माताके उस शापसे छुड़ा दूँगा। यह आपसे सत्य कहता हूँ ॥ १८ ॥
भव स्वस्थमना नाग न हि ते विद्यते भयम् । प्रयतिष्ये तथा राजन् यथा श्रेयो भविष्यति ॥ १९ ॥ 'नागप्रवर! आप निश्चिन्त रहें। आपके लिये कोई भय नहीं है। राजन्! जैसे भी आपका कल्याण होगा, मैं वैसा प्रयत्न करूँगा ॥ १९ ॥ न मे वागनृतं प्राह स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा । तं वै नृपवरं गत्वा दीक्षितं जनमेजयम् ॥ २० ॥ वाग्भिर्मङ्गलयुक्ताभिस्तोष्यिष्येऽद्य मातुल । यथा स यज्ञो नृपतेर्निवर्तिष्यति सत्तम ॥ २१ ॥ 'मैंने कभी हँसी-मजाकमें भी झूठी बात नहीं कही है, फिर इस संकटके समय तो कह ही कैसे सकता हूँ। सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ मामाजी! सर्पयज्ञके लिये दीक्षित नृपश्रेष्ठ जनमेजयके पास जाकर अपनी मंगलमयी वाणीसे आज उन्हें ऐसा संतुष्ट करूँगा, जिससे राजाका वह यज्ञ बंद हो जायगा ॥ २०-२१ ॥ स सम्भावय नागेन्द्र मयि सर्वं महामते । न ते मयि मनो जातु मिथ्या भवितुमर्हति ॥ २२ ॥ 'महाबुद्धिमान् नागराज! मुझमें यह सब कुछ करनेकी योग्यता है, आप इसपर विश्वास रखें। आपके मनमें मेरे प्रति जो आशा-भरोसा है, वह कभी मिथ्या नहीं हो सकता' ॥ २२ ॥
वासुकिरुवाच आस्तीक परिघूर्णामि हृदयं मे विदीर्यते । दिशो न प्रतिजानामि ब्रह्मदण्डनिपीडितः ॥ २३ ॥ वासुकि बोले—आस्तीक! माताके शापरूप ब्रह्मदण्डसे पीड़ित होनेके कारण मुझे चक्कर आ रहा है, मेरा हृदय विदीर्ण होने लगा है और मुझे दिशाओंका ज्ञान नहीं हो रहा है ॥ २३ ॥
आस्तीक उवाच न संतापस्त्वया कार्यः कथंचित् पन्नगोत्तम । प्रदीप्ताग्नेः समुत्पन्नं नाशयिष्यामि ते भयम् ॥ २४ ॥ आस्तीकने कहा—नागप्रवर! आपको मनमें किसी प्रकार संताप नहीं करना चाहिये। सर्पयज्ञकी धधकती हुई आगसे जो भय आपको प्राप्त हुआ है, मैं उसका नाश कर दूँगा ॥ २४ ॥ ब्रह्मदण्डं महाघोरं कालाग्निसमतेजसम् । नाशयिष्यामि मात्र त्वं भयं कार्षीः कथंचन ॥ २५ ॥
कालाग्निके समान दाहक और अत्यन्त भयंकर शापका यहाँ मैं अवश्य नाश कर डालूँगा। अतः आप उससे किसी तरह भय न करें ।। २५ ।।
सौतिरुवाच
ततः स वासुकेर्घोरमपनीय मनोज्वरम् । आधाय चात्मनोऽङ्गेषु जगाम त्वरितो भृशम् ।। २६ ।। जनमेजयस्य तं यज्ञं सर्वैः समुदितं गुणैः । मोक्षाय भुजगेन्द्राणामास्तीको द्विजसत्तमः ।। २७ ।। **उग्रश्रवाजी कहते हैं—**तदनन्तर नागराज वासुकिके भयंकर चिन्ता-ज्वरको दूर कर और उसे अपने ऊपर लेकर द्विजश्रेष्ठ आस्तीक बड़ी उतावलीके साथ नागराज वासुकि आदिको प्राण-संकटसे छुड़ानेके लिये राजा जनमेजयके उस सर्पयज्ञमें गये, जो समस्त उत्तम गुणोंसे सम्पन्न था ।। २६-२७ ।।
स गत्वापश्यदास्तीको यज्ञायतनमुत्तमम् । वृतं सदस्यैर्बहुभिः सूर्यवह्निसमप्रभैः ।। २८ ।। वहाँ पहुँचकर आस्तीकने परम उत्तम यज्ञमण्डप देखा, जो सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी अनेक सदस्योंसे भरा हुआ था ।। २८ ।।
स तत्र वारितो द्वाःस्थैः प्रविशन् द्विजसत्तमः । अभितुष्टाव तं यज्ञं प्रवेशार्थी परंतपः ।। २९ ।। द्विजश्रेष्ठ आस्तीक जब यज्ञमण्डपमें प्रवेश करने लगे, उस समय द्वारपालोंने उन्हें रोक दिया। तब काम-क्रोध आदि शत्रुओंको संतप्त करनेवाले आस्तीक उसमें प्रवेश करनेकी इच्छा रखकर उस यज्ञकी स्तुति करने लगे ।। २९ ।।
स प्राप्य यज्ञायतनं वरिष्ठं द्विजोत्तमः पुण्यकृतां वरिष्ठः । तुष्टाव राजानमनन्तकीर्ति- मृत्विक्सदस्यांश्च तथैव चाग्निम् ।। ३० ।। इस प्रकार उस परम उत्तम यज्ञमण्डपके निकट पहुँचकर पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ विप्रवर आस्तीकने अक्षय कीर्तिसे सुशोभित यजमान राजा जनमेजय, ऋत्विजों, सदस्यों तथा अग्निदेवका स्तवन आरम्भ किया ।। ३० ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रे आस्तीकागमने चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रमें आस्तीकका आगमनविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५४ ।।
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अध्याय (पृष्ठ 387)
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
आस्तीकके द्वारा यजमान, यज्ञ, ऋत्विज्, सदस्यगण और अग्निदेवकी स्तुति-प्रशंसा
आस्तीक उवाच
सोमस्य यज्ञो वरुणस्य यज्ञः
प्रजापतेर्यज्ञ आसीत् प्रयागे ।
तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्र्य
पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ १ ॥
आस्तीकने कहा— भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! चन्द्रमाका जैसा यज्ञ हुआ था, वरुणने जैसा यज्ञ किया था और प्रयागमें प्रजापति ब्रह्माजीका यज्ञ जिस प्रकार समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न हुआ था, उसी प्रकार तुम्हारा यह यज्ञ भी उत्तम गुणोंसे युक्त है। हमारे प्रियजनोंका कल्याण हो ॥ १ ॥
शक्रस्य यज्ञः शतसंख्य उक्त-
स्तथा पूरोस्तुल्यसंख्यं शतं वै ।
तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्र्य
पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ २ ॥
भरतकुलशिरोमणि परीक्षित्कुमार! इन्द्रके यज्ञोंकी संख्या सौ बतायी गयी है, राजा पूरुके यज्ञोंकी संख्या भी उनके समान ही सौ है। उन सबके यज्ञोंके तुल्य ही तुम्हारा यह यज्ञ शोभा पा रहा है। हमारे प्रियजनोंका कल्याण हो ॥ २ ॥
यमस्य यज्ञो हरिमेधसश्च
यथा यज्ञो रन्तिदेवस्य राज्ञः ।
तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्र्य
पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ ३ ॥
जनमेजय! यमराजका यज्ञ, हरिमेधाका यज्ञ तथा राजा रन्तिदेवका यज्ञ जिस प्रकार श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न था, वैसे ही तुम्हारा यह यज्ञ है। हमारे प्रियजनोंका कल्याण हो ॥ ३ ॥
गयस्य यज्ञः शशबिन्दोश्च राज्ञो
यज्ञस्तथा वैश्रवणस्य राज्ञः ।
तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्र्य
पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ ४ ॥
भरतवंशियोंमें अग्रगण्य जनमेजय! महाराज गयका यज्ञ, राजा शशबिन्दुका यज्ञ तथा राजाधिराज कुबेरका यज्ञ जिस प्रकार उत्तम विधि-विधानसे सम्पन्न हुआ था, वैसा ही तुम्हारा यह यज्ञ है। हमारे प्रियजनोंका कल्याण हो ।। ४ ।।
नृगस्य यज्ञस्त्वजमीढस्य चासीद् यथा यज्ञो दाशरथेश्च राज्ञः । तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्रय पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ ५ ॥
परीक्षित्कुमार! राजा नृग, राजा अजमीढ़ और महाराज दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीने जिस प्रकार यज्ञ किया था, वैसा ही तुम्हारा यह यज्ञ भी है। हमारे प्रियजनोंका कल्याण हो ।। ५ ।।
यज्ञः श्रुतो दिवि देवस्य सूनो- र्युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः । तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्रय पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ ६ ॥
भरतश्रेष्ठ जनमेजय! अजमीढ़वंशी धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिरके यज्ञकी ख्याति स्वर्गके श्रेष्ठ देवताओंने भी सुन रखी थी, वैसा ही तुम्हारा भी यह यज्ञ है। हमारे प्रियजनोंका कल्याण हो ।। ६ ।।
कृष्णस्य यज्ञः सत्यवत्याः सुतस्य स्वयं च कर्म प्रचकार यत्र । तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्रय पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ ७ ॥
भरताग्रगण्य जनमेजय! सत्यवतीनन्दन व्यासजीका यज्ञ जिसमें उन्होंने स्वयं सब कार्य सम्पन्न किया था, जैसा हो पाया था, वैसा ही तुम्हारा यह यज्ञ भी है। हमारे प्रियजनोंका कल्याण हो ।। ७ ।।
इमे च ते सूर्यसमानवर्चसः समासते वृत्रहणः क्रतुं यथा । नैषां ज्ञातुं विद्यते ज्ञानमद्य दत्तं येभ्यो न प्रणश्येत् कदाचित् ॥ ८ ॥
तुम्हारे ये ऋत्विज सूर्यके समान तेजस्वी हैं और इन्द्रके यज्ञकी भाँति तुम्हारे इस यज्ञका भलीभाँति अनुष्ठान करते हैं। कोई भी ऐसी जानने योग्य वस्तु नहीं है, जिसका इन्हें ज्ञान न हो। इन्हें दिया हुआ दान कभी नष्ट नहीं हो सकता ।। ८ ।।
ऋत्विक् समो नास्ति लोकेषु चैव द्वैपायनेनेति विनिश्चितं मे ।
एतस्य शिष्याः क्षितिमाचरन्ति सर्वर्त्विजः कर्मसु स्वेषु दक्षाः ॥ ९ ॥ द्वैपायन व्यासजीके समान पारलौकिक साधनोंमें कुशल दूसरा कोई ऋत्विज् नहीं है, यह मेरा निश्चित मत है। इनके शिष्य ही अपने-अपने कर्मोंमें निपुण होता, उद्गाता आदि सभी प्रकारके ऋत्विज् हैं, जो यज्ञ करानेके लिये सम्पूर्ण भूमण्डलमें विचरते रहते हैं ॥ ९ ॥
विभावसुश्चित्रभानुर्महात्मा हिरण्यरेता हुतभुक् कृष्णवर्त्मा । प्रदक्षिणावर्तशिखः प्रदीप्तो हव्यं तवेदं हुतभुग् वष्टि देवः ॥ १० ॥ जो विभावसु, चित्रभानु, महात्मा, हिरण्यरेता, हविष्यभोजी तथा कृष्णवर्त्मा कहलाते हैं, वे अग्निदेव तुम्हारे इस यज्ञमें दक्षिणावर्त शिखाओंसे प्रज्वलित हो दी हुई आहुतिको भोग लगाते हुए तुम्हारे इस हविष्यकी सदा इच्छा रखते हैं ॥ १० ॥
नेह त्वदन्यो विद्यते जीवलोके समो नृपः पालयिता प्रजानाम् । धृत्या च ते प्रीतमनाः सदाहं त्वं वा वरुणो धर्मराजो यमो वा ॥ ११ ॥ इस मृत्युलोकमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा राजा नहीं है, जो तुम्हारी भाँति प्रजाका पालन कर सके। तुम्हारे धैर्यसे मेरा मन सदा प्रसन्न रहता है। तुम साक्षात् वरुण, धर्मराज एवं यमके समान प्रभावशाली हो ॥ ११ ॥
शक्रः साक्षाद् वज्रपाणिर्यथेह त्राता लोकेऽस्मिंस्त्वं तथेह प्रजानाम् । मतस्त्वं नः पुरुषेन्द्रह लोके न च त्वदन्यो भूपतिरस्ति जज्ञे ॥ १२ ॥ पुरुषोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! जैसे साक्षात् वज्रपाणि इन्द्र सम्पूर्ण प्रजाकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार तुम भी इस लोकमें हम प्रजावर्गके पालक माने गये हो। संसारमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई भूपाल तुम-जैसा प्रजापालक नहीं है ॥ १२ ॥
खट्वाङ्गनाभागदिलीपकल्प ययातिमान्धातृसमप्रभाव । आदित्यतेजःप्रतिमानतेजा भीष्मो यथा राजसि सुव्रतस्त्वम् ॥ १३ ॥ राजन्! तुम खट्वांग, नाभाग और दिलीपके समान प्रतापी हो। तुम्हारा प्रभाव राजा ययाति और मान्धाताके समान है। तुम अपने तेजसे भगवान् सूर्यके प्रचण्ड तेजकी
समानता कर रहे हो। जैसे भीष्मपितामहने उत्तम ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया था, उसी प्रकार तुम भी इस यज्ञमें परम उत्तम व्रतका पालन करते हुए शोभा पा रहे हो ॥ १३ ॥
वाल्मीकिवत् ते निभृतं स्ववीर्यं
वसिष्ठवत् ते नियतश्च कोपः ।
प्रभुत्वमिन्द्रत्वसमं मतं मे
द्युतिश्च नारायणवद् विभाति ॥ १४ ॥
महर्षि वाल्मीकिकी भाँति तुम्हारा अद्भुत पराक्रम तुममें ही छिपा हुआ है। महर्षि वसिष्ठजीके समान तुमने अपने क्रोधको काबूमें कर रखा है। मेरी ऐसी मान्यता है कि तुम्हारा प्रभुत्व इन्द्रके ऐश्वर्यके तुल्य है और तुम्हारी अंगकान्ति भगवान् नारायणके समान सुशोभित होती है ॥ १४ ॥
यमो यथा धर्मविनिश्चयज्ञः
कृष्णो यथा सर्वगुणोपपन्नः ।
श्रिया निवासोऽसि यथा वसूनां
निधानभूतोऽसि तथा ऋतूनाम् ॥ १५ ॥
तुम यमराजकी भाँति धर्मके निश्चित सिद्धान्तको जाननेवाले हो। भगवान् श्रीकृष्णकी भाँति सर्वगुणसम्पन्न हो। वसुगणोंके पास जो सम्पत्तियाँ हैं, वैसी ही सम्पदाओंके तुम निवासस्थान हो तथा यज्ञोंकी तो तुम साक्षात् निधि ही हो ॥ १५ ॥
दम्भोद्भवैनासि समो बलेन
रामो यथा शास्त्रविदस्त्रविच्च ।
और्वत्रिताभ्यामसि तुल्यतेजा
दुष्प्रेक्षणीयोऽसि भगीरथेन ॥ १६ ॥
राजन्! तुम बलमें दम्भोद्भवके समान और अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञानमें परशुरामके सदृश हो। तुम्हारा तेज और्व और त्रित नामक महर्षियोंके तुल्य है। राजा भगीरथकी भाँति तुम्हारी ओर देखना भी कठिन है ॥ १६ ॥
सौतिरुवाच
एवं स्तुताः सर्व एव प्रसन्ना
राजा सदस्या ऋत्विजो हव्यवाहः ।
तेषां दृष्ट्वा भावितानीङ्गितानि
प्रोवाच राजा जनमेजयोऽथ ॥ १७ ॥
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**आस्तीकके इस प्रकार स्तुति करनेपर यजमान राजा जनमेजय, सदस्य, ऋत्विज् और अग्निदेव सभी बड़े प्रसन्न हुए। इन सबके मनोभावों तथा बाह्य चेष्टाओंको लक्ष्य करके राजा जनमेजय इस प्रकार बोले ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रे आस्तीककृतराजस्तवे पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय ॥ ५५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें आस्तीकद्वारा सर्पसत्रमें राजा जनमेजयकी स्तुतिविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 392)
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
राजाका आस्तीकको वर देनेके लिये तैयार होना, तक्षक नागकी व्याकुलता तथा आस्तीकका वर माँगना
जनमेजय उवाच
बालोऽप्ययं स्थविर इवावभाषते
नायं बालः स्थविरोऽयं मतो मे ।
इच्छाम्यहं वरमस्मै प्रदातुं
तन्मे विप्राः संविदध्वं यथावत् ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा— ब्राह्मणो! यह बालक है तो भी वृद्ध पुरुषोंके समान बात करता है, इसलिये मैं इसे बालक नहीं, वृद्ध मानता हूँ और इसको वर देना चाहता हूँ। इस विषयमें आपलोग अच्छी तरह विचार करके अपनी सम्मति दें ॥ १ ॥
सदस्या ऊचुः
बालोऽपि विप्रो मान्य एवेह राज्ञां
विद्वान् यो वै स पुनर्वे यथावत् ।
सर्वान् कामांस्त्वत्त एवार्हतेऽद्य
यथा च नस्तक्षक एति शीघ्रम् ॥ २ ॥
सदस्योंने कहा— ब्राह्मण यदि बालक हो तो भी यहाँ राजाओंके लिये सम्माननीय ही है। यदि वह विद्वान् हो तब तो कहना ही क्या है? अतः यह ब्राह्मण बालक आज आपसे यथोचित रीतिसे अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको पानेके योग्य है, किंतु वर देनेसे पहले तक्षक नाग चाहे जैसे भी शीघ्रतापूर्वक हमारे पास आ पहुँचे, वैसा उपाय करना चाहिये ॥ २ ॥
सौतिरुवाच
व्याहर्तुकामे वरदे नृपे द्विजं
वरं वृणीष्वेति ततोऽभ्युवाच ।
होता वाक्यं नातिहृष्टान्तरात्मा
कर्मण्यस्मिंस्तक्षको नैति तावत् ॥ ३ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— शौनक! तदनन्तर वर देनेके लिये उद्यत राजा जनमेजय विप्रवर आस्तीकसे यह कहना ही चाहते थे कि 'तुम मुँहमाँगा वर माँग लो।' इतनेमें ही होता, जिसका मन अधिक प्रसन्न नहीं था, बोल उठा—'हमारे इस यज्ञकर्ममें तक्षक नाग तो अभीतक आया ही नहीं' ॥ ३ ॥
जनमेजय उवाच
यथा चेदं कर्म समाप्यते मे
यथा च वै तक्षक एति शीघ्रम् ।
तथा भवन्तः प्रयतन्तु सर्वे
परं शक्त्या स हि मे विद्विषाणः ॥ ४ ॥
जनमेजयने कहा—ब्राह्मणो! जैसे भी यह कर्म पूरा हो जाय और जिस प्रकार भी तक्षक नाग शीघ्र यहाँ आ जाय, आपलोग पूरी शक्ति लगाकर वैसा ही प्रयत्न कीजिये; क्योंकि मेरा असली शत्रु तो वही है ॥ ४ ॥
ऋत्विज ऊचुः
यथा शास्त्राणि नः प्राहुर्यथा शंसति पावकः ।
इन्द्रस्य भवने राजंस्तक्षको भयपीडितः ॥ ५ ॥
ऋत्विज बोले—राजन्! हमारे शास्त्र जैसा कहते हैं तथा अग्निदेव जैसी बात बता रहे हैं, उसके अनुसार तो तक्षक नाग भयसे पीड़ित हो इन्द्रके भवनमें छिपा हुआ है ॥ ५ ॥
यथा सूतो लोहिताक्षो महात्मा
पौराणिको वेदितवान् पुरस्तात् ।
स राजानं प्राह पृष्टस्तदानीं
यथाहुर्विप्रास्तद्वदेतन्नृदेव ॥ ६ ॥
लाल नेत्रोंवाले पुराणवेत्ता महात्मा सूतजीने पहले ही यह बात सूचित कर दी थी। तब राजाने सूतजीसे इसके विषयमें पूछा। पूछनेपर उन्होंने राजासे कहा—‘नरदेव! ब्राह्मणलोग जैसी बात कह रहे हैं, वह ठीक वैसी ही है ॥ ६ ॥
पुराणमागम्य ततो ब्रवीम्यहं
दत्तं तस्मै वरमिन्द्रेण राजन् ।
वसेह त्वं मत्सकाशे सुगुप्तो
न पावकस्त्वां प्रधहिष्यतीति ॥ ७ ॥
‘राजन्! पुराणको जानकर मैं यह कह रहा हूँ कि इन्द्रने तक्षकको वर दिया है—‘नागराज! तुम यहाँ मेरे समीप सुरक्षित होकर रहो। सर्पसत्रकी आग तुम्हें नहीं जला सकेगी’ ॥ ७ ॥
एतच्छ्रुत्वा दीक्षितस्तप्यमान
आस्ते होतारं चोदयन् कर्मकाले ।
होता च यत्तोऽस्याजुहावाथ मन्त्रै-
रथो महेन्द्रः स्वयमाजगाम ॥ ८ ॥
विमानमारुह्य महानुभावः
सर्वैर्देवैः परिसंस्तूयमानः । बलाहकैश्चाप्यनुगम्यमानो विद्याधरैरप्सरसां गणैश्च ॥ ९ ॥ यह सुनकर यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करनेवाले यजमान राजा जनमेजय संतप्त हो उठे और कर्मके समय होता-को इन्द्रसहित तक्षक नागका आकर्षण करनेके लिये प्रेरित करने लगे। तब होताने एकाग्रचित्त होकर मन्त्रोंद्वारा इन्द्रसहित तक्षकका आवाहन किया। तब स्वयं देवराज इन्द्र विमानपर बैठकर आकाशमार्गसे चल पड़े। उस समय सम्पूर्ण देवता सब ओरसे घेरकर उन महानुभाव इन्द्रकी स्तुति कर रहे थे। अप्सराएँ, मेघ और विद्याधर भी उनके पीछे-पीछे आ रहे थे ॥ ८-९ ॥ तस्योत्तरीये निहितः स नागो भयोद्विग्नः शर्म नैवाभ्यगच्छत् । ततो राजा मन्त्रविदोऽब्रवीत् पुनः क्रुद्धो वाक्यं तक्षकस्यान्तमिच्छन् ॥ १० ॥ तक्षक नाग उन्हींके उत्तरीय वस्त्र (दुपट्टे)-में छिपा था। भयसे उद्विग्न होनेके कारण तक्षकको तनिक भी चैन नहीं आता था। इधर राजा जनमेजय तक्षकका नाश चाहते हुए कुपित होकर पुनः मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणोंसे बोले ॥ १० ॥
जनमेजय उवाच
इन्द्रस्य भवने विप्रा यदि नागः स तक्षकः । तमिन्द्रेणैव सहितं पातयध्वं विभावसौ ॥ ११ ॥ **जनमेजयने कहा—**विप्रगण! यदि तक्षक नाग इन्द्रके विमानमें छिपा हुआ है तो उसे इन्द्रके साथ ही अग्निमें गिरा दो ॥ ११ ॥
सौतिरुवाच
जनमेजयेन राज्ञा तु नोदितस्तक्षकं प्रति । होता जुहाव तत्रस्थं तक्षकं पन्नगं तथा ॥ १२ ॥ **उग्रश्रवाजी कहते हैं—**राजा जनमेजयके द्वारा इस प्रकार तक्षककी आहुतिके लिये प्रेरित हो होताने इन्द्रके समीपवर्ती तक्षक नागका अग्निमें आवाहन किया—उसके नामकी आहुति डाली ॥ १२ ॥ हूयमाने तथा चैव तक्षकः सपुरन्दरः । आकाशे ददृशे चैव क्षणेन व्यथितस्तदा ॥ १३ ॥ इस प्रकार आहुति दी जानेपर क्षणभरमें इन्द्रसहित तक्षक नाग आकाशमें दिखायी दिया। उस समय उसे बड़ी पीड़ा हो रही थी ॥ १३ ॥ पुरन्दरस्तु तं यज्ञं दृष्ट्वोरुभयमाविशत् ।
हित्वा तु तक्षकं त्रस्तः स्वमेव भवनं ययौ ॥ १४ ॥ उस यज्ञको देखते ही इन्द्र अत्यन्त भयभीत हो उठे और तक्षक नागको वहीं छोड़कर बड़ी घबराहटके साथ अपने भवनको ही चलते बने ॥ १४ ॥ इन्द्रे गते तु नागेन्द्रस्तक्षको भयमोहितः । मन्त्रशक्त्या पावकार्चिः समीपमवशो गतः ॥ १५ ॥ इन्द्रके चले जानेपर नागराज तक्षक भयसे मोहित हो मन्त्रशक्तिसे खिंचकर विवशतापूर्वक अग्निकी ज्वालाके समीप आने लगा ॥ १५ ॥
ऋत्विज ऊचुः वर्तते तव राजेन्द्र कर्मैतद् विधिवत् प्रभो । अस्मै तु द्विजमुख्याय वरं त्वं दातुमर्हसि ॥ १६ ॥ ऋत्विजोंने कहा—राजेन्द्र! आपका यह यज्ञकर्म विधिपूर्वक सम्पन्न हो रहा है। अब आप इन विप्रवर आस्तीकको मनोवांछित वर दे सकते हैं ॥ १६ ॥
जनमेजय उवाच बालाभिरूपस्य तवाप्रमेय वरं प्रयच्छामि यथानुरूपम् । वृणीष्व यत् तेऽभिमतं हृदि स्थितं तत् ते प्रदास्याम्यपि चेददेयम् ॥ १७ ॥ जनमेजयने कहा—ब्राह्मणबालक! तुम अप्रमेय हो—तुम्हारी प्रतिभाकी कोई सीमा नहीं है। मैं तुम-जैसे विद्वान्के लिये वर देना चाहता हूँ। तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट कामना हो, उसे बताओ। वह देनेयोग्य न होगी, तो भी तुम्हें अवश्य दे दूँगा ॥ १७ ॥
ऋत्विज ऊचुः अयमायाति तूर्णं स तक्षकस्ते वशं नृप । श्रूयतेऽस्य महान् नादो नदतो भैरवं रवम् ॥ १८ ॥ ऋत्विज बोले—राजन्! यह तक्षक नाग अब शीघ्र ही तुम्हारे वशमें आ रहा है। वह बड़ी भयानक आवाजमें चीत्कार कर रहा है। उसकी भारी चिल्लाहट अब सुनायी देने लगी है ॥ १८ ॥ नूनं मुक्तो वज्रभृता स नागो भ्रष्टो नाकान्मन्त्रविस्रस्तकायः । घूर्णन्नाकाशे नष्टसंज्ञोऽभ्युपैति तीव्रान् निःश्वासान् निःश्वसन् पन्नगेन्द्रः ॥ १९ ॥
निश्चय ही इन्द्रने उस नागराज तक्षकको त्याग दिया है। उसका विशाल शरीर मन्त्रद्वारा आकृष्ट होकर स्वर्गलोकसे नीचे गिर पड़ा है। वह आकाशमें चक्कर काटता अपनी सुध-बुध खो चुका है और बड़े वेगसे लम्बी साँसें छोड़ता हुआ अग्निकुण्डके समीप आ रहा है ॥ १९ ॥
सौतिरुवाच
पतिष्यमाणे नागेन्द्रे तक्षके जातवेदसि ।
इदमन्तरमित्येव तदाऽऽस्तीकोऽभ्यचोदयत् ॥ २० ॥
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**शौनक! नागराज तक्षक अब कुछ ही क्षणोंमें आगकी ज्वालामें गिरनेवाला था। उस समय आस्तीकने यह सोचकर कि ‘यही वर माँगनेका अच्छा अवसर है’ राजाको वर देनेके लिये प्रेरित किया ॥ २० ॥
आस्तीक उवाच
वरं ददासि चेन्मह्यं वृणोमि जनमेजय ।
सत्रं ते विरमत्येतन्न पतेयुरिहोरगाः ॥ २१ ॥
**आस्तीकने कहा—**राजा जनमेजय! यदि तुम मुझे वर देना चाहते हो तो सुनो, मैं माँगता हूँ कि तुम्हारा यह यज्ञ बंद हो जाय और अब इसमें सर्प न गिरने पावें ॥ २१ ॥
एवमुक्तस्तदा तेन ब्रह्मन् पारिक्षितस्तु सः ।
नातिहृष्टमनाश्चेदमास्तीकं वाक्यमब्रवीत् ॥ २२ ॥
ब्रह्मन्! आस्तीकके ऐसा कहनेपर वे परीक्षित्-कुमार जनमेजय खिन्नचित्त होकर बोले — ॥ २२ ॥
सुवर्णं रजतं गाश्च यच्चान्यन्मन्यसे विभो ।
तत् ते दद्यां वरं विप्र न निवर्तेत् क्रतुर्मम ॥ २३ ॥
‘विप्रवर! आप सोना, चाँदी, गौ तथा अन्य अभीष्ट वस्तुओंको, जिन्हें आप ठीक समझते हों, माँग लें। प्रभो! वह मुँहमाँगा वर मैं आपको दे सकता हूँ, किंतु मेरा यह यज्ञ बंद नहीं होना चाहिये’ ॥ २३ ॥
आस्तीक उवाच
सुवर्णं रजतं गाश्च न त्वां राजन् वृणोम्यहम् ।
सत्रं ते विरमत्येतत् स्वस्ति मातृकुलस्य नः ॥ २४ ॥
**आस्तीकने कहा—**राजन्! मैं तुमसे सोना, चाँदी और गौएँ नहीं माँगूँगा, मेरी यही इच्छा है कि तुम्हारा यह यज्ञ बंद हो जाय, जिससे मेरी माताके कुलका कल्याण हो ॥ २४ ॥
सौतिरुवाच
आस्तीकेनैवमुक्तस्तु राजा पारिक्षितस्तदा । पुनः पुनरुवाचेदमास्तीकं वदतां वरः ।। २५ ।। अन्यं वरय भद्रं ते वरं द्विजवरोत्तम । अयाचत न चाप्यन्यं वरं स भृगुनन्दन ।। २६ ।। **उग्रश्रवाजी कहते हैं—**भृगुनन्दन शौनक! आस्तीकके ऐसा कहनेपर उस समय वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा जनमेजयने उनसे बार-बार अनुरोध किया—‘विप्रशिरोमणे! आपका कल्याण हो, कोई दूसरा वर माँगिये।' किंतु आस्तीकने दूसरा कोई वर नहीं माँगा ।। २५-२६ ।। ततो वेदविदस्तात सदस्याः सर्व एव तम् । राजानमूचुः सहिता लभतां ब्राह्मणो वरम् ।। २७ ।। तब सम्पूर्ण वेदवेत्ता सभासदोंने एक साथ संगठित होकर राजासे कहा—‘ब्राह्मणको (स्वीकार किया हुआ) वर मिलना ही चाहिये' ।। २७ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि आस्तीकवरप्रदानं नाम षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें आस्तीकको वरप्रदान नामक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५६ ।।