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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

‘राजा सदा शत्रु की गतिविधिकाे जाननेके लिये एकाग्र रहे। अपने राज्यके सभी अंगोंको गुप्त रखे। राजन्! सदा अपने शत्रुओंकी कमजोरीपर दृष्टि रखे और उनसे सदा सतर्क (सावधान) रहे ॥ १८ ॥ अग्न्याधानेन यज्ञेन काषायेण जटाजिनैः ।
लोकान् विश्वासयित्वैव ततो लुम्पेद् यथा वृकः ॥ १९ ॥
‘अग्निहोत्र और यज्ञ करके, गेरुए वस्त्र, जटा और मृगचर्म धारण करके पहले लोगोंमें विश्वास उत्पन्न करे; फिर अवसर देखकर भेड़ियेकी भाँति शत्रुओंपर टूट पड़े और उन्हें नष्ट कर दे ॥ १९ ॥
अङ्कुशं शौचमित्याहुरर्थानामुपधारणे ।
आनाम्य फलितां शाखां पक्वं पक्वं प्रशातयेत् ॥ २० ॥
‘कार्यसिद्धिके लिये शौच-सदाचार आदिका पालन एक प्रकारका अंकुश (लोगोंको आकृष्ट करनेका साधन) बताया गया है। फलोंसे लदी हुई वृक्षकी शाखाको अपनी ओर कुछ झुकाकर ही मनुष्य उसके पके-पके फलको तोड़े ॥ २० ॥
फलार्थोऽयं समारम्भो लोके पुंसां विपश्चिताम् ।
वहेदमित्रं स्कन्धेन यावत् कालस्य पर्ययः ॥ २१ ॥
‘लोकमें विद्वान् पुरुषोंका यह सारा आयोजन ही अभीष्ट फलकी सिद्धिके लिये होता है। जबतक समय बदलकर अपने अनुकूल न हो जाय, तबतक शत्रुको कंधेपर बिठाकर ढोना पड़े, तो ढोये भी ॥ २१ ॥
ततः प्रत्यागते काले भिन्द्याद् घटमिवाश्मनि ।
अमित्रो न विमोक्तव्यः कृपणं बह्वपि ब्रुवन् ॥ २२ ॥
कृपा न तस्मिन् कर्तव्या हन्यादेवापकारिणम् ।
हन्यादमित्रं सान्त्वेन तथा दानेन वा पुनः ॥ २३ ॥
तथैव भेददण्डाभ्यां सर्वोपायैः प्रशातयेत् ।
‘परंतु जब अपने अनुकूल समय आ जाय, तब उसे उसी प्रकार नष्ट कर दे, जैसे घड़ेको पत्थरपर पटककर फोड़ डालते हैं। शत्रु बहुत दीनतापूर्ण वचन बोले, तो भी उसे जीवित नहीं छोड़ना चाहिये। उसपर दया नहीं करनी चाहिये। अपकारी शत्रुको मार ही डालना चाहिये। साम अथवा दान तथा भेद एवं दण्ड सभी उपायोंद्वारा शत्रुको मार डाले—उसे मिटा दे’ ॥ २२-२३ ½ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

कथं सान्त्वेन दानेन भेदैर्दण्डेन वा पुनः ॥ २४ ॥
अमित्रः शक्यते हन्तुं तन्मे ब्रूहि यथातथम् ।

धृतराष्ट्रने पूछा— कणिक! साम, दान, भेद अथवा दण्डके द्वारा शत्रु‌का नाश कैसे किया जा सकता है, यह मुझे यथार्थरूपसे बताइये ।। २४ १/२ ।।

कणिक उवाच

शृणु राजन् यथावृत्तं वने निवसतः पुरा ।। २५ ।। जम्बुकस्य महाराज नीतिशास्त्रार्थदर्शिनः । कणिकने कहा— महाराज! इस विषयमें नीतिशास्त्रके तत्त्वको जाननेवाले एक वनवासी गीदड़‌का प्राचीन वृत्तान्त सुनाता हूँ, सुनिये ।। २५ १/२ ।। अथ कश्चित् कृतप्रज्ञः शृगालः स्वार्थपण्डितः ।। २६ ।। सखिभिर्न्यवसत् सार्धं व्याघ्राखुवृकबभ्रुभिः । तेऽपश्यन् विपिने तस्मिन् बलिनं मृगयूथपम् ।। २७ ।। अशक्ता ग्रहणे तस्य ततो मन्त्रममन्त्रयन् । एक वनमें कोई बड़ा बुद्धिमान् और स्वार्थ साधनेमें कुशल गीदड़ अपने चार मित्रों— बाघ, चूहा, भेड़िया और नेवलेके साथ निवास करता था। एक दिन उन सबने हरिणोंके एक सरदारको देखा, जो बड़ा बलवान् था। वे सब उसे पकड़नेमें सफल न हो सके, अतः सबने मिलकर यह सलाह की ।। २६-२७ १/२ ।।

जम्बुक उवाच

असकृद् यतितो ह्येष हन्तुं व्याघ्र वने त्वया ॥ २८ ॥
युवा वै जवसम्पन्नो बुद्धिशाली न शक्यते ।
मूषिकोऽस्य शयानस्य चरणौ भक्षयत्वयम् ॥ २९ ॥
यथैनं भक्षितैः पादैर्व्याघ्रो गृह्णातु वै ततः ।
ततो वै भक्षयिष्यामः सर्वे मुदितमानसाः ॥ ३० ॥
गीदड़ने कहा— भाई बाघ! तुमने वनमें इस हरिणको मारनेके लिये कई बार यत्न किया, परंतु यह बड़े वेगसे दौड़नेवाला, जवान और बुद्धिमान् है, इसलिये पकड़में नहीं आता। मेरी राय है कि जब यह हरिण सो रहा हो, उस समय यह चूहा इसके दोनों पैरोंको काट खाये। (फिर कटे हुए पैरोंसे यह उतना तेज नहीं दौड़ सकता।) उस अवस्थामें बाघ उसे पकड़ ले; फिर तो हम सब लोग प्रसन्नचित्त होकर उसे खायेंगे ॥ २८—३० ॥

जम्बुकस्य तु तद् वाक्यं तथा चक्रुः समाहिताः ।
मूषिकाभक्षितैः पादैर्मृगं व्याघ्रोऽवधीत् तदा ॥ ३१ ॥
गीदड़की वह बात सुनकर सबने सावधान होकर वैसा ही किया। चूहेके द्वारा काटे हुए पैरोंसे लड़खड़ाते हुए मृगको बाघने तत्काल ही मार डाला ॥ ३१ ॥

दृष्ट्वैवाचेष्टमानं तु भूमौ मृगकलेवरम् ।
स्नात्वाऽऽगच्छत भद्रं वो रक्षामीत्याह जम्बुकः ॥ ३२ ॥
पृथ्वीपर हरिणके शरीरको निश्चेष्ट पड़ा देख गीदड़ने कहा—'आपलोगोंका भला हो। स्नान करके आइये। तबतक मैं इसकी रखवाली करता हूँ' ॥ ३२ ॥

शृगालवचनात् तेऽपि गताः सर्वे नदीं ततः ।
स चिन्तापरमो भूत्वा तस्थौ तत्रैव जम्बुकः ॥ ३३ ॥
गीदड़के कहनेसे वे (बाघ आदि) सब साथी नदीमें (नहानेके लिये) चले गये। इधर वह गीदड़ किसी चिन्तामें निमग्न होकर वहीं खड़ा रहा ॥ ३३ ॥

अथाजगाम पूर्वं तु स्नात्वा व्याघ्रो महाबलः ।
ददर्श जम्बुकं चैव चिन्ताकुलितमानसम् ॥ ३४ ॥
इतनेमें ही महाबली बाघ स्नान करके सबसे पहले वहाँ लौट आया। आनेपर उसने देखा, गीदड़का चित्त चिन्तासे व्याकुल हो रहा है ॥ ३४ ॥

व्याघ्र उवाच

किं शोचसि महाप्राज्ञ त्वं नो बुद्धिमतां वरः ।
अशित्वा पिशितान्यद्य विहरिष्यामहे वयम् ॥ ३५ ॥
तब बाघने पूछा— महामते! क्यों सोचमें पड़े हो? हमलोगोंमें तुम्हीं सबसे बड़े बुद्धिमान् हो। आज इस हरिणका मांस खाकर हमलोग मौजसे घूमें-फिरेंगे ॥ ३५ ॥

जम्बुक उवाच

शृणु मे त्वं महाबाहो यद् वाक्यं मूषिकोऽब्रवीत् । धिक् बलं मृगराजस्य मयाद्यायं मृगो हतः ॥ ३६ ॥ गीदड़ बोला— महाबाहो! चूहेने (तुम्हारे विषयमें) जो बात कही है, उसे तुम मुझसे सुनो। वह कहता था, 'मृगोंके राजा बाघके बलको धिक्कार है! आज इस मृगको तो मैंने मारा है ॥ ३६ ॥

मद्बाहुबलमाश्रित्य तृप्तिमद्य गमिष्यति । गर्जमानस्य तस्यैवमतो भक्ष्यं न रोचये ॥ ३७ ॥ ‘मेरे बाहुबलका आश्रय लेकर आज वह अपनी भूख बुझायेगा।' उसने इस प्रकार गरज-गरजकर (घमंडभरी) बातें कही हैं, अतः उसकी सहायतासे प्राप्त हुए इस भोजनको ग्रहण करना मुझे अच्छा नहीं लगता ॥ ३७ ॥

व्याघ्र उवाच

ब्रवीति यदि स ह्येवं काले ह्यस्मिन् प्रबोधितः । स्वबाहुबलमाश्रित्य हनिष्येऽहं वनेचरान् ॥ ३८ ॥ खादिष्ये तत्र मांसानि इत्युक्त्वा प्रस्थितो वनम् । एतस्मिन्नेव काले तु मूषिकोऽप्याजगाम ह ॥ ३९ ॥ तमागतमभिप्रेत्य शृगालोऽप्यब्रवीद् वचः । बाघने कहा— यदि वह ऐसी बात कहता है, तब तो उसने इस समय मेरी आँखें खोल दीं—मुझे सचेत कर दिया। आजसे मैं अपने ही बाहुबलके भरोसे वन-जन्तुओंका वध किया करूँगा और उन्हींका मांस खाऊँगा। यों कहकर बाघ वनमें चला गया। इसी समय चूहा भी (नहा-धोकर) वहाँ आ पहुँचा। उसे आया देख गीदड़ने कहा ॥ ३८-३९ १/२ ॥

जम्बुक उवाच

शृणु मूषिक भद्रं ते नकुलो यदिहाब्रवीत् ॥ ४० ॥ गीदड़ बोला— चूहा भाई! तुम्हारा भला हो। नेवलेने यहाँ जो बात कही है, उसे सुन लो ॥ ४० ॥

मृगमांसं न खादेयं गरमेतन्न रोचते । मूषिकं भक्षयिष्यामि तद् भवाननुमन्यताम् ॥ ४१ ॥ वह कह रहा था कि 'बाघके काटनेसे इस हरिणका मांस जहरीला हो गया है, मैं तो इसे खाऊँगा नहीं; क्योंकि यह मुझे पसंद नहीं है। यदि तुम्हारी अनुमति हो तो मैं चूहेको ही खा लूँ' ॥ ४१ ॥

तच्छ्रुत्वा मूषिको वाक्यं संत्रस्तः प्रगतो बिलम् ।

ततः स्नात्वा स वै तत्र आजगाम वृको नृप ।। ४२ ।।
यह बात सुनकर चूहा अत्यन्त भयभीत होकर बिलमें घुस गया। राजन्! तत्पश्चात् भेड़िया भी स्नान करके वहाँ आ पहुँचा ।। ४२ ।।

तमागतमिदं वाक्यमब्रवीज्जम्बुकस्तदा ।
मृगराजो हि संक्रुद्धो न ते साधु भविष्यति ।। ४३ ।।
सकलत्रस्त्विहायाति कुरुष्व यदनन्तरम् ।
एवं संचोदितस्तेन जम्बुकेन तदा वृकः ।। ४४ ।।
ततोऽवलुम्पनं कृत्वा प्रयातः पिशिताशनः ।
एतस्मिन्नेव काले तु नकुलोऽप्या जगाम ह ।। ४५ ।।
उसके आनेपर गीदड़ने इस प्रकार कहा—'भेड़िया भाई! आज बाघ तुमपर बहुत नाराज हो गया है, अतः तुम्हारी खैर नहीं; वह अभी बाघिनको साथ लेकर यहाँ आ रहा है। इसलिये अब तुम्हें जो उचित जान पड़े, वह करो।' गीदड़के इस प्रकार कहनेपर कच्चा मांस खानेवाला वह भेड़िया दुम दबाकर भाग गया। इतनेमें ही नेवला भी आ पहुँचा ।। ४३—४५ ।।

तमुवाच महाराज नकुलं जम्बुको वने ।
स्वबाहुबलमाश्रित्य निर्जितास्तेऽन्यतो गताः ।। ४६ ।।
मम दत्त्वा नियुद्धं त्वं भुङ्क्ष्व मांसं यथेप्सितम् ।
महाराज! उस नेवलेसे गीदड़ने वनमें इस प्रकार कहा—'ओ नेवले! मैंने अपने बाहुबलका आश्रय ले उन सबको परास्त कर दिया है। वे हार मानकर अन्यत्र चले गये। यदि तुझमें हिम्मत हो तो पहले मुझसे लड़ ले; फिर इच्छानुसार मांस खाना' ।। ४६ १/२ ।।

नकुल उवाच

मृगराजो वृकश्चैव बुद्धिमानपि मूषिकः ।। ४७ ।।
निर्जिता यत् त्वया वीरास्तस्माद् वीरतरो भवान् ।
न त्वयाप्युत्सहे योद्धुमित्युक्त्वा सोऽप्युपागमत् ।। ४८ ।।
नेवलेने कहा—जब बाघ, भेड़िया और बुद्धिमान् चूहा—ये सभी वीर तुमसे परास्त हो गये, तब तो तुम वीरशिरोमणि हो। मैं भी तुम्हारे साथ युद्ध नहीं कर सकता। यों कहकर नेवला भी चला गया ।। ४७-४८ ।।

कणिक उवाच

एवं तेषु प्रयातेषु जम्बुको हृष्टमानसः ।
खादति स्म तदा मांसमेकः सन् मन्त्रनिश्चयात् ।। ४९ ।।
कणिक कहते हैं—इस प्रकार उन सबके चले जानेपर अपनी युक्तिमें सफल हो जानेके कारण गीदड़का हृदय हर्षसे खिल उठा। तब उसने अकेले ही वह मांस

खाया ।। ४९ ।। एवं समाचरन्नित्यं सुखमेधेत भूपतिः । भयेन भेदयेद् भीरुं शूरमञ्जलिकर्मणा ।। ५० ।। राजन्! ऐसा ही आचरण करनेवाला राजा सदा सुखसे रहता और उन्नतिको प्राप्त होता है। डरपोकको भय दिखाकर फोड़ ले तथा जो अपनेसे शूरवीर हो, उसे हाथ जोड़कर वशमें करे ।। ५० ।।

लुब्धमर्थप्रदानेन समं न्यूनं तथौजसा । एवं ते कथितं राजञ्शृणु चाप्यपरं तथा ।। ५१ ।। लोभीको धन देकर तथा बराबर और कमजोरको पराक्रमसे वशमें करे। राजन्! इस प्रकार आपसे नीतियुक्त बर्तावका वर्णन किया गया। अब दूसरी बातें सुनिये ।। ५१ ।।

पुत्रः सखा वा भ्राता वा पिता वा यदि वा गुरुः । रिपुस्थानेषु वर्तन्तो हन्तव्या भूतिमिच्छता ।। ५२ ।। पुत्र, मित्र, भाई, पिता अथवा गुरु—कोई भी क्यों न हो, जो शत्रुके स्थानपर आ जायँ—शत्रुवत् बर्ताव करने लगें, तो उन्हें वैभव चाहनेवाला राजा अवश्य मार डाले ।। ५२ ।।

शपथेनाप्यर्रिं हन्यादर्थदानेन वा पुनः । विषेण मायया वापि नोपेक्षेत कथंचन । उभौ चेत् संशयोपेतौ श्रद्धावांस्तत्र वर्द्धते ।। ५३ ।। सौगंध खाकर, धन अथवा जहर देकर या धोखेसे भी शत्रुको मार डाले। किसी तरह भी उसकी उपेक्षा न करे। यदि दोनों राजा समानरूपसे विजयके लिये यत्नशील हों और उनकी जीत संदेहास्पद जान पड़ती हो तो उनमें भी जो मेरे इस नीतिपूर्ण कथनपर श्रद्धा-विश्वास रखता है, वही उन्नतिको प्राप्त होता है ।। ५३ ।।

गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथप्रतिपन्नस्य न्याय्यं भवति शासनम् ।। ५४ ।। यदि गुरु भी घमंडमें भरकर कर्तव्य और अकर्तव्यको न जानता हो तथा बुरे मार्गपर चलता हो तो उसे भी दण्ड देना उचित माना जाता है ।। ५४ ।।

क्रुद्धोऽप्यक्रुद्धरूपः स्यात् स्मितपूर्वाभिभाषिता । न चाप्यन्यमपध्वंसेत् कदाचित् कोपसंयुतः ।। ५५ ।। प्रहरिष्यन् प्रियं ब्रूयात् प्रहरन्नपि भारत । प्रहृत्य च कृपायीत शोचेत च रुदेत च ।। ५६ ।। मनमें क्रोध भरा हो, तो भी ऊपरसे क्रोधशून्य बना रहे और मुसकराकर बातचीत करे। कभी क्रोधमें आकर किसी दूसरेका तिरस्कार न करे। भारत! शत्रुपर प्रहार करनेसे पहले और प्रहार करते समय भी उससे मीठे वचन ही बोले। शत्रुको मारकर भी उसके प्रति दया दिखाये, उसके लिये शोक करे तथा रोये और आँसू बहाये ।। ५५-५६ ।।

आश्वासयेच्चापि परं सान्त्वधर्मार्थवृत्तिभिः ।
अथास्य प्रहरेत् काले यदा विचलितो पथि ॥ ५७ ॥
शत्रुको समझा-बुझाकर, धर्म बताकर, धन देकर और सद्व्यवहार करके आश्वासन दे—अपने प्रति उसके मनमें विश्वास उत्पन्न करे; फिर समय आनेपर ज्यों ही वह मार्गसे विचलित हो, त्यों ही उसपर प्रहार करे ॥ ५७ ॥

अपि घोरापराधस्य धर्ममाश्रित्य तिष्ठतः ।
स हि प्रच्छाद्यते दोषः शैलो मेघैरिवासितैः ॥ ५८ ॥
धर्मके आचरणका ढोंग करनेसे घोर अपराध करनेवालेका दोष भी उसी प्रकार ढक जाता है, जैसे पर्वत काले मेघोंकी घटासे ढक जाता है ॥ ५८ ॥

यः स्यादनुप्राप्तवधस्तस्यागारं प्रदीपयेत् ।
अधनान् नास्तिकांश्चौरान् विषये स्वे न वासयेत् ॥ ५९ ॥
जिसे शीघ्र ही मार डालनेकी इच्छा हो, उसके घरमें आग लगा दे। धनहीनों, नास्तिकों और चोरोंको अपने राज्यमें न रहने दे ॥ ५९ ॥

प्रत्युत्थानासनाद्येन सम्प्रदानेन केनचित् ।
प्रतिविश्रब्धघाती स्यात् तीक्ष्णदंष्ट्रो निमग्नकः ॥ ६० ॥
(शत्रुके) आनेपर उठकर अगवानी करे, आसन और भोजन दे और कोई प्रिय वस्तु भेंट करे। ऐसे बर्तावोंसे अपने प्रति जिसका पूर्ण विश्वास हो गया हो, उसे भी (अपने लाभके लिये) मारनेमें संकोच न करे। सर्पकी भाँति तीखे दाँतोंसे काटे, जिससे शत्रु फिर उठकर बैठ न सके ॥ ६० ॥

अशङ्कितेभ्यः शङ्केत शङ्कितेभ्यश्च सर्वशः ।
अशङ्क्याद् भयमुत्पन्नमपि मूलं निकृन्तति ॥ ६१ ॥
जिनसे भय प्राप्त होनेका संदेह न हो, उनसे भी सशंक (चौकन्ना) ही रहे और जिनसे भयकी आशंका हो, उनकी ओरसे तो सब प्रकारसे सावधान रहे ही। जिनसे भयकी शंका नहीं है, ऐसे लोगोंसे यदि भय उत्पन्न होता है तो वह मूलोच्छेद कर डालता है ॥ ६१ ॥

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् ।
विश्वासाद् भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ॥ ६२ ॥
जो विश्वासपात्र नहीं है, उसपर कभी विश्वास न करे; परंतु जो विश्वासपात्र है, उसपर भी अति विश्वास न करे; क्योंकि अति विश्वाससे उत्पन्न होनेवाला भय राजाकी जड़मूलका भी नाश कर डालता है ॥ ६२ ॥

चारः सुविहितः कार्य आत्मनश्च परस्य वा ।
पाषण्डांस्तापसादींश्च परराष्ट्रेषु योजयेत् ॥ ६३ ॥
भलीभाँति जाँच-परखकर अपने तथा शत्रुके राज्यमें गुप्तचर रखे। शत्रुके राज्यमें ऐसे गुप्तचरोंको नियुक्त करे, जो पाखण्ड-वेशधारी अथवा तपस्वी आदि हों ॥ ६३ ॥

उद्यानेषु विहारेषु देवतायतनेषु च । पानागारेषु रथ्यासु सर्वतीर्थेषु चाप्यथ ॥ ६४ ॥ चत्वरेषु च कूपेषु पर्वतेषु वनेषु च । समवायेषु सर्वेषु सरित्सु च विचारयेत् ॥ ६५ ॥ उद्यान, घूमने-फिरनेके स्थान, देवालय, मद्यपानके अड्डे, गली या सड़क, सम्पूर्ण तीर्थस्थान, चौराहे, कुएँ, पर्वत, वन, नदी तथा जहाँ मनुष्योंकी भीड़ इकट्ठी होती हो, उन सभी स्थानोंमें अपने गुप्तचरोंको घुमाता रहे ॥ ६४-६५ ॥

वाचा भृशं विनीतः स्याद् हृदयेन तथा क्षुरः । स्मितपूर्वाभिभाषी स्यात् सृष्टो रौद्राय कर्मणे ॥ ६६ ॥ राजा बातचीतमें अत्यन्त विनयशील हो, परंतु हृदय छूरेके समान तीखा बनाये रखे। अत्यन्त भयानक कर्म करनेके लिये उद्यत हो तो भी मुसकराकर ही वार्तालाप करे ॥ ६६ ॥

अञ्जलिः शपथः सान्त्वं शिरसा पादवन्दनम् । आशाकरणमित्येवं कर्तव्यं भूतिमिच्छता ॥ ६७ ॥ अवसर देखकर हाथ जोड़ना, शपथ खाना, आश्वासन देना, पैरोंपर मस्तक रखकर प्रणाम करना और आशा बँधाना—ये सब ऐश्वर्य-प्राप्तिकी इच्छावाले राजाके कर्तव्य हैं ॥ ६७ ॥

सुपुष्पितः स्यादफलः फलवान् स्याद् दुरारुहः । आमः स्यात् पक्वसंकाशो न च जीर्येत कर्हिचित् ॥ ६८ ॥ नीतिज्ञ राजा ऐसे वृक्षके समान रहे, जिसमें फूल तो खूब लगे हों परंतु फल न हों (वह बातोंसे लोगोंको फलकी आशा दिलाये, उसकी पूर्ति न करे)। फल लगनेपर भी उसपर चढ़ना अत्यन्त कठिन हो (लोगोंकी स्वार्थसिद्धिमें वह विघ्न डाले या विलम्ब करे)। वह रहे तो कच्चा, पर दीखे पकेके समान (अर्थात् स्वार्थ-साधकोंकी दुराशाको पूर्ण न होने दे)। कभी स्वयं जीर्ण न हो (तात्पर्य यह कि अपना धन खर्च करके शत्रुओंका पोषण करते हुए अपने-आपको निर्धन न बना दे) ॥ ६८ ॥

त्रिवर्गे त्रिविधा पीडा ह्यनुबन्धस्तथैव च । अनुबन्धाः शुभा ज्ञेयाः पीडास्तु परिवर्जयेत् ॥ ६९ ॥ धर्म, अर्थ और काम—इन त्रिविध पुरुषार्थोंके सेवनमें तीन प्रकारकी बाधा—अड़चन उपस्थित होती है*। उसी प्रकार उनके तीन ही प्रकारके फल होते हैं। (धर्मका फल है अर्थ एवं काम अर्थात् भोगकी प्राप्ति, अर्थका फल है धर्मका सेवन एवं भोगकी प्राप्ति और काम अर्थात् भोगका फल है—इन्द्रियतृप्ति।) इन (तीनों प्रकारके) फलोंको शुभ (वरणीय) जानना चाहिये; परंतु (उक्त तीनों प्रकारकी) बाधाओंसे यत्नपूर्वक बचना चाहिये। (त्रिविध

पुरुषार्थोंका सेवन इस प्रकार करना चाहिये कि तीनों एक-दूसरेके बाधक न हों अर्थात् जीवनमें तीनोंका सामंजस्य ही सुखदायक है।) ।। ६९ ।। धर्मं विचरतः पीडा सापि द्वाभ्यां नियच्छति । अर्थं चाप्यर्थलुब्धस्य कामं चातिप्रवर्तिनः ।। ७० ।। धर्मका अनुष्ठान करनेवाले धर्मात्मा पुरुषके धर्ममें काम और अर्थ—इन दोनोंके द्वारा प्राप्त होनेवाली पीड़ा बाधा पहुँचाती है। इसी प्रकार अर्थलोभीके अर्थमें और अत्यन्त भोगासक्तके काममें भी शेष दो वर्गोंद्वारा प्राप्त होनेवाली पीड़ा बाधा उपस्थित करती है ।। ७० ।। अगर्वितात्मा युक्तश्च सान्त्वयुक्तोऽनसूयिता । अवेक्षितार्थः शुद्धात्मा मन्त्रयीत द्विजैः सह ।। ७१ ।। राजा अपने हृदयसे अहंकारको निकाल दे। चित्तको एकाग्र रखे। सबसे मधुर बोले। दूसरोंके दोष प्रकाशित न करे। सब विषयोंपर दृष्टि रखे और शुद्धचित्त हो द्विजोंके साथ बैठकर मन्त्रणा करे ।। ७१ ।। कर्मणा येन केनैव मृदुना दारुणेन च । उद्धरेद् दीनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत् ।। ७२ ।। राजा यदि संकटमें हो तो कोमल या भयंकर—जिस किसी भी कर्मके द्वारा उस दुरवस्थासे अपना उद्धार करे; फिर समर्थ होनेपर धर्मका आचरण करे ।। ७२ ।। न संशयमनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति । संशयं पुनरारुह्य यदि जीवति पश्यति ।। ७३ ।। कष्ट सहे बिना मनुष्य कल्याणका दर्शन नहीं करता। प्राण-संकटमें पड़कर यदि वह पुनः जीवित रह जाता है तो अपना भला देखता है ।। ७३ ।। यस्य बुद्धिः परिभवेत् तमतीतेन सान्त्वयेत् । अनागतेन दुर्बुद्धिं प्रत्युत्पन्नेन पण्डितम् ।। ७४ ।। जिसकी बुद्धि संकटमें पड़कर शोकाभिभूत हो जाय, उसे भूतकालकी बातें (राजा नल तथा श्रीरामचन्द्रजी आदिके जीवनका वृत्तान्त) सुनाकर सान्त्वना दे। जिसकी बुद्धि अच्छी नहीं है, उसे भविष्यमें लाभकी आशा दिलाकर तथा विद्वान् पुरुषको तत्काल ही धन आदि देकर शान्त करे ।। ७४ ।। योऽरिणा सह संधाय शयीत कृतकृत्यवत् । स वृक्षाग्रे यथा सुप्तः पतितः प्रतिबुध्यते ।। ७५ ।। जैसे वृक्षके ऊपरकी शाखापर सोया हुआ पुरुष जब गिरता है, तब होशमें आता है उसी प्रकार जो अपने शत्रुके साथ संधि करके कृतकृत्यकी भाँति सोता (निश्चिन्त हो जाता) है, वह शत्रुसे धोखा खानेपर सचेत होता है ।। ७५ ।। मन्त्रसंवरणे यत्नः सदा कार्योऽनसूयता ।

आकारमभिरक्षेत चारेणाप्यनुपालितः ॥ ७६ ॥
राजाको चाहिये कि वह दूसरोंके दोष प्रकाशित न करके अपनी गुप्त मन्त्रणाको सदा छिपाये रखनेकी चेष्टा करे। दूसरोंके गुप्तचरोंसे तो अपने आकारतकको (क्रोध और हर्ष आदिको सूचित करनेवाली चेष्टातकको) गुप्त रखे; परंतु अपने गुप्तचरसे भी सदा अपनी गुप्त मन्त्रणाकी रक्षा करे ॥ ७६ ॥

नाच्छित्त्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दारुणम् ।
नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति महतीं श्रियम् ॥ ७७ ॥
राजा मछलीमारोंकी भाँति दूसरोंके मर्म विदीर्ण किये बिना, अत्यन्त क्रूर कर्म किये बिना तथा बहुतोंके प्राण लिये बिना बड़ी भारी सम्पत्ति नहीं पाता ॥ ७७ ॥

कर्शितं व्याधितं क्लिन्नमपानीयमघासकम् ।
परिविश्वस्तमन्दं च प्रहर्तव्यमरेर्बलम् ॥ ७८ ॥
जब शत्रु्की सेना दुर्बल, रोगग्रस्त, जल या कीचड़में फँसी, भूख-प्याससे पीड़ित और सब ओरसे विश्वस्त होकर निश्चेष्ट पड़ी हो, उस समय उसपर प्रहार करना चाहिये ॥ ७८ ॥

नार्थिकोऽर्थिनमभ्येति कृतार्थे नास्ति संगतम् ।
तस्मात् सर्वाणि साध्यानि सावशेषाणि कारयेत् ॥ ७९ ॥
धनवान् मनुष्य किसी धनीके पास नहीं जाता। जिसके सब काम पूरे हो चुके हैं, वह किसीके साथ मैत्री निभानेकी चेष्टा नहीं करता; अतः अपनेद्वारा सिद्ध होनेवाले दूसरोंके कार्य ही अधूरे रख दे (जिससे अपने कार्यके लिये उनका आना-जाना बना रहे) ॥ ७९ ॥

संग्रहे विग्रहे चैव यत्नः कार्योंऽनसूयता ।
उत्साहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो भूतिमिच्छता ॥ ८० ॥
ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले राजाको दूसरोंके दोष न बताकर सदा आवश्यक सामग्रीके संग्रह और शत्रुओंके साथ विग्रह (युद्ध) करनेका प्रयत्न करते रहना चाहिये; साथ ही यत्नपूर्वक अपने उत्साहको बनाये रखना चाहिये ॥ ८० ॥

नास्य कृत्यानि बुध्येरन् मित्राणि रिपवस्तथा ।
आरब्धान्येव पश्येरन् सुपर्यवसितान्यपि ॥ ८१ ॥
मित्र और शत्रु—किसीको भी यह पता न चले कि राजा कब क्या करना चाहता है। कार्यके आरम्भ अथवा समाप्त हो जानेपर ही (सब) लोग उसे देखें ॥ ८१ ॥

भीतवत् संविधातव्यं यावद् भयमानागतम् ।
आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमभीतवत् ॥ ८२ ॥
जबतक अपने ऊपर भय आया न हो, तबतक डरे हुएकी भाँति उसको टालनेका प्रयत्न करना चाहिये; परंतु जब भयको सामने आया देखे, तब निडर होकर शत्रुपर प्रहार करना चाहिये ॥ ८२ ॥

दण्डेनोपनतं शत्रुमनुगृह्णाति यो नरः ।

स मृत्युमुपगृह्णीयाद् गर्भमश्वतरी यथा ॥ ८३ ॥
जो मनुष्य दण्डके द्वारा वशमें किये हुए शत्रुपर दया करता है, वह मौतको ही अपनाता है—ठीक उसी तरह जैसे खच्चरी गर्भके रूपमें अपनी मृत्युको ही उदरमें धारण करती है ॥ ८३ ॥

अनागतं हि बुध्येत यच्च कार्यं पुरः स्थितम् ।
न तु बुद्धिक्षयात् किंचिदतिक्रामेत् प्रयोजनम् ॥ ८४ ॥
जो कार्य भविष्यमें करना हो, उसपर बुद्धिसे विचार करे और विचारनेके पश्चात् तदनुकूल व्यवस्था करे। इसी प्रकार जो कार्य सामने उपस्थित हो, उसे भी बुद्धिसे विचारकर ही करे। बुद्धिसे निश्चय किये बिना किसी भी कार्य या उद्देश्यका परित्याग न करे ॥ ८४ ॥

उत्साहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो भूतिमिच्छता ।
विभज्य देशकालौ च दैवं धर्मादयस्त्रयः ।
नैःश्रेयसौ तु तौ ज्ञेयौ देशकालाविति स्थितिः ॥ ८५ ॥
ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले राजाको देश और कालका विभाग करके ही यत्नपूर्वक उत्साह एवं उद्यम करना चाहिये। इसी प्रकार देश-कालके विभाग-पूर्वक ही प्रारब्धकर्म तथा धर्म, अर्थ और कामका सेवन करना चाहिये। देश और कालको ही मंगलके प्रधान हेतु समझना चाहिये। यही नीतिशास्त्रका सिद्धान्त है ॥ ८५ ॥

तालवत् कुरुते मूलं बालः शत्रुरुपेक्षितः ।
गहनेऽग्निरिवोत्सृष्टः क्षिप्रं संजायते महान् ॥ ८६ ॥
छोटे शत्रुborder... छोटे शत्रु की भी उपेक्षा कर दी जाय, तो वह ताड़के वृक्षकी भाँति जड़ जमा लेता है और घने वनमें छोड़ी हुई आगकी भाँति शीघ्र ही महान् विनाशकारी बन जाता है ॥ ८६ ॥

अग्निं स्तोकमिवात्मानं संधुक्षयति यो नरः ।
स वर्धमानो ग्रसते महान्तमपि संचयम् ॥ ८७ ॥
जो मनुष्य थोड़ी-सी अग्निकी भाँति अपने-आपको (सहायक सामग्रियोंद्वारा धीरे-धीरे) प्रज्वलित या समृद्ध करता रहता है, वह एक दिन बहुत बड़ा होकर शत्रुरूपी ईंधनकी बहुत बड़ी राशिको भी अपना ग्रास बना लेता है ॥ ८७ ॥

आशां कालवतीं कुर्यात् कालं विघ्नेन योजयेत् ।
विघ्नं निमित्ततो ब्रूयान्निमित्तं वापि हेतुतः ॥ ८८ ॥
यदि किसीको किसी बातकी आशा दे तो उसे शीघ्र पूरी न करके दीर्घकालतक लटकाये रखे। जब उसे पूर्ण करनेका समय आये, तब उसमें कोई विघ्न डाल दे और इस प्रकार समयकी अवधिको बढ़ा दे। उस विघ्नके पड़नेमें कोई उपयुक्त कारण बता दे और उस कारणको भी युक्तियोंसे सिद्ध कर दे ॥ ८८ ॥

क्षुरो भूत्वा हरेत् प्राणान् निशितः कालसाधनः ।

प्रतिच्छन्नो लोमहारी द्विषतां परिकर्तनः ॥ ८९ ॥
लोहेका बना हुआ छूरा शानपर चढ़ाकर तेज किया जाता है और चमड़ेके सम्पुटमें छिपाकर रखा जाता है तो वह समय आनेपर (सिर आदि अंगोंके समस्त) बालोंको काट देता है। उसी प्रकार राजा अनुकूल अवसरकी अपेक्षा रखकर अपने मनोभावको छिपाये हुए अनुकूल साधनोंका संग्रह करता रहे और छूरेकी तरह तीक्ष्ण या निर्दय होकर शत्रुओंके प्राण ले ले—उनका मूलोच्छेद कर डाले ॥ ८९ ॥

पाण्डवेषु यथान्यायमन्येषु च कुरूद्वह ।
वर्तमानो न मज्जेस्त्वं तथा कृत्यं समाचर ॥ ९० ॥
सर्वकल्याणसम्पन्नो विशिष्ट इति निश्चयः ।
तस्मात् त्वं पाण्डुपुत्रेभ्यो रक्षात्मानं नराधिप ॥ ९१ ॥
कुरुश्रेष्ठ! आप भी इसी नीतिका अनुसरण करके पाण्डवों तथा दूसरे लोगोंके साथ यथोचित बर्ताव करते रहें। परंतु ऐसा कार्य करें, जिससे स्वयं संकटके समुद्रमें डूब न जायें। आप समस्त कल्याणकारी साधनोंसे सम्पन्न और सबसे श्रेष्ठ हैं, यही सबका निश्चय है; अतः नरेश्वर! आप पाण्डुके पुत्रोंसे अपनी रक्षा कीजिये ॥ ९०-९१ ॥

भ्रातृव्या बलिनो यस्मात् पाण्डुपुत्रा नराधिप ।
पश्चात्तापो यथा न स्यात् तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ ९२ ॥
राजन्! आपके भतीजे पाण्डव बहुत बलवान् हैं; अतः ऐसी नीति काममें लाइये, जिससे आगे चलकर आपको पछताना न पड़े ॥ ९२ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा सम्प्रतस्थे कणिकः स्वगृहं ततः ।
धृतराष्ट्रोऽपि कौरव्यः शोकार्तः समपद्यत ॥ ९३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! यों कहकर कणिक अपने घरको चले गये। इधर कुरुवंशी धृतराष्ट्र शोकसे व्याकुल हो गये ॥ ९३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कणिकवाक्ये
एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें कणिकवाक्यविषयक एक सौ उन्तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३९ ॥


१. तीन प्रकारकी शक्तियाँ ही यहाँ त्रिवर्ग कही गयी हैं। उनके नाम ये हैं—प्रभुशक्ति (ऐश्वर्यशक्ति), उत्साहशक्ति और मन्त्रशक्ति। दुर्ग आदिपर आक्रमण करके शत्रुंकी ऐश्वर्यशक्तिका नाश करे। विश्वसनीय व्यक्तियोंद्वारा अपने उत्कर्षका वर्णन कराकर शत्रुको तेजोहीन बनाना, उसके उत्साह एवं साहसको घटा देना ही उत्साहशक्तिका नाश करना है। गुप्तचरोंद्वारा उनकी गुप्त मन्त्रणाको प्रकट कर देना ही मन्त्रशक्तिका नाश करना है।

२. अमात्य, राष्ट्र, दुर्ग, कोष और सेना—ये पाँच प्रकृतियाँ ही पंचवर्ग हैं।
३. साम, दान, भेद, दण्ड, उद्बन्धन, विषप्रयोग और आग लगाना—शत्रुको वशमें करने या दबानेके ये सात साधन ही सप्तवर्ग हैं।
* इन बाधाओंको श्लोक ७० में स्पष्ट किया गया है।

(जतुगृहपर्व)

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(जतुगृहपर्व)

चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

पाण्डवोंके प्रति पुरवासियोंका अनुराग देखकर दुर्योधनकी चिन्ता

वैशम्पायन उवाच

ततः सुबलपुत्रस्तु राजा दुर्योधनश्च ह ।
दुःशासनश्च कर्णश्च दुष्टं मन्त्रममन्त्रयन् ॥ १ ॥
ते कौरव्यमनुज्ञाप्य धृतराष्ट्रं नराधिपम् ।
दहने तु सपुत्रायाः कुन्त्या बुद्धिमकारयन् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर सुबलपुत्र शकुनि, राजा दुर्योधन, दुःशासन और कर्णने (आपसमें) एक दुष्टतापूर्ण गुप्त सलाह की। उन्होंने कुरुनन्दन महाराज धृतराष्ट्रसे आज्ञा लेकर पुत्रोंसहित कुन्तीको आगमें जला डालनेका विचार किया ॥ १-२ ॥

तेषामिङ्गितभावज्ञो विदुरस्तत्त्वदर्शिवान् ।
आकारेण च तं मन्त्रं बुबुधे दुष्टचेतसाम् ॥ ३ ॥
तत्त्वज्ञानी विदुर उनकी चेष्टाओंसे उनके मनका भाव समझ गये और उनकी आकृतिसे ही उन दुष्टोंकी गुप्त मन्त्रणाका भी उन्होंने पता लगा लिया ॥ ३ ॥

ततो विदितवेद्यात्मा पाण्डवानां हिते रतः ।
पलायने मतिं चक्रे कुन्त्याः पुत्रैः सहानघः ॥ ४ ॥
विदुरजीने मन-ही-मन जाननेयोग्य सभी बातें जान लीं। वे सदा पाण्डवोंके हितमें संलग्न रहते थे, अतः निष्पाप विदुरने यही निश्चय किया कि कुन्ती अपने पुत्रोंके साथ यहाँसे भाग जाय ॥ ४ ॥

ततो वातसहां नावं यन्त्रयुक्तां पताकिनीम् ।
ऊर्मिक्षमां दृढां कृत्वा कुन्तीमिदमुवाच ह ॥ ५ ॥
उन्होंने एक सुदृढ़ नाव बनवायी, जिसे चलानेके लिये उसमें यन्त्र* लगाया गया था। वह वायुके वेग और लहरोंके थपेड़ोंका सामना करनेमें समर्थ थी। उसमें झंडियाँ और पताकाएँ फहरा रही थीं। उस नावको तैयार कराके विदुरजीने कुन्तीसे कहा— ॥ ५ ॥

एष जातः कुलस्यास्य कीर्तिवंशप्रणाशनः । धृतराष्ट्रः परीतात्मा धर्मं त्यजति शाश्वतम् ॥ ६ ॥ इयं वारिपथे युक्ता तरङ्गपवनक्षमा । नौरया मृत्युपाशात् त्वं सपुत्रा मोक्ष्यसे शुभे ॥ ७ ॥ ‘देवि! राजा धृतराष्ट्र इस कुरुकुलकी कीर्ति एवं वंशपरम्पराका नाश करनेवाले पैदा हुए हैं। इनका चित्त पुत्रोंके प्रति ममतासे व्याप्त हुआ है, इसलिये ये सनातन धर्मका त्याग कर रहे हैं। शुभे! जलके मार्गमें यह नाव तैयार है, जो हवा और लहरोंके वेगको भलीभाँति सह सकती है। इसीके द्वारा (कहीं अन्यत्र जाकर) तुम पुत्रोंसहित मौतकी फाँसीसे छूट सकोगी’ ॥ ६-७ ॥

तच्छ्रुत्वा व्यथिता कुन्ती पुत्रैः सह यशस्विनी । नावमारुह्य गङ्गायां प्रययौ भरतर्षभ ॥ ८ ॥ भरतश्रेष्ठ! यह बात सुनकर यशस्विनी कुन्तीको बड़ी व्यथा हुई। वे पुत्रोंसहित (वारणावतके लाक्षागृहसे बचकर) नावपर जा चढ़ीं और गङ्गाजीकी धारापर यात्रा करने लगीं ॥ ८ ॥

ततो विदुरवाक्येन नावं विक्षिप्य पाण्डवाः । धनं चादाय तैर्दत्तमरिष्टं प्राविशन् वनम् ॥ ९ ॥ तदनन्तर विदुरजीके कहनेसे पाण्डवोंने नावको वहीं डुबा दिया और उन कौरवोंके दिये हुए धनको लेकर विघ्न-बाधाओंसे रहित वनमें प्रवेश किया ॥ ९ ॥

निषादी पञ्चपुत्रा तु जातुषे तत्र वेश्मनि । कारणाभ्यागता दग्धा सह पुत्रैरनागसा ॥ १० ॥ वारणावतके उस लाक्षागृहमें निषाद जातिकी एक स्त्री किसी कारणवश अपने पाँच पुत्रोंके साथ आकर ठहर गयी थी। वह बेचारी निरपराध होनेपर भी उसमें पुत्रोंसहित जलकर भस्म हो गयी ॥ १० ॥

स च म्लेच्छाधमः पापो दग्धस्तत्र पुरोचनः । वञ्चिताश्च दुरात्मानो धार्तराष्ट्राः सहानुगाः ॥ ११ ॥ म्लेच्छोंमें (भी) नीच पापी पुरोचन भी उसी घरमें जल मरा और धृतराष्ट्रके दुरात्मा पुत्र अपने सेवकोंसहित धोखा खा गये ॥ ११ ॥

अविज्ञाता महात्मानो जनानामक्षतास्तथा । जनन्या सह कौन्तेया मुक्ता विदुरमन्त्रिताः ॥ १२ ॥ विदुरकी सलाहके अनुसार काम करनेवाले महात्मा कुन्तीपुत्र अपनी माताके साथ मृत्युसे बच गये। उन्हें किसी प्रकारकी क्षति नहीं पहुँची। साधारण लोगोंको उनके जीवित रहनेकी बात ज्ञात न हो सकी ॥ १२ ॥

ततस्तस्मिन् पुरे लोका नगरे वारणावते ।

दृष्ट्वा जतुगृहं दग्धमन्वशोचन्त दुःखिताः ॥ १३ ॥
तदनन्तर वारणावत नगरमें वहाँके लोगोंने लाक्षागृहको दग्ध हुआ देख (अत्यन्त) दुःखी हो पाण्डवोंके लिये (बड़ा) शोक किया ॥ १३ ॥

राज्ञे च प्रेषयामासुर्यथावृत्तं निवेदितुम् ।
संवृत्तस्ते महान् कामः पाण्डवान् दग्धवानसि ॥ १४ ॥
सकामो भव कौरव्य भुङ्क्ष्व राज्यं सपुत्रकः ।
तच्छ्रुत्वा धृतराष्ट्रस्तु सह पुत्रेण शोचयन् ॥ १५ ॥
तथा राजा धृतराष्ट्रके पास यथावत् समाचार कहनेके लिये किसीको भेजकर कहलाया—‘कुरुनन्दन! तुम्हारा महान् मनोरथ पूरा हो गया। पाण्डवोंको तुमने जला दिया। अब तुम कृतार्थ हो जाओ और पुत्रोंके साथ राज्य भोगो।’ यह सुनकर पुत्रसहित धृतराष्ट्र शोकमग्न हो गये ॥ १४-१५ ॥

प्रेतकार्याणि च तथा चकार सह बान्धवैः ।
पाण्डवानां तथा क्षत्ता भीष्मश्च कुरुसत्तमः ॥ १६ ॥
उन्होंने, विदुरजीने तथा कुरुकुलशिरोमणि भीष्मजीने भी भाई-बन्धुओंके साथ (पुत्तल-विधिसे) पाण्डवोंके प्रेतकार्य (दाह और श्राद्ध आदि) सम्पन्न किये ॥ १६ ॥

जनमेजय उवाच

पुनर्विस्तरशः श्रोतुमिच्छामि द्विजसत्तम ।
दाहं जतुगृहस्यैव पाण्डवानां च मोक्षणम् ॥ १७ ॥
**जनमेजय बोले—**विप्रवर! मैं लाक्षागृहके जलने और पाण्डवोंके उससे बच जानेका वृत्तान्त पुनः विस्तारसे सुनना चाहता हूँ ॥ १७ ॥

सुनृशंसमिदं कर्म तेषां क्रूरोपसंहितम् ।
कीर्तयस्व यथावृत्तं परं कौतूहलं मम ॥ १८ ॥
क्रूर कणिकके उपदेशसे किया हुआ कौरवोंका यह कर्म अत्यन्त निर्दयतापूर्ण था। आप उसका ठीक-ठीक वर्णन कीजिये। मुझे यह सब सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ॥ १८ ॥

वैशम्पायन उवाच

शृणु विस्तरशो राजन् वदतो मे परंतप ।
दाहं जतुगृहस्यैतत् पाण्डवानां च मोक्षणम् ॥ १९ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! मैं लाक्षागृहके जलने और पाण्डवोंके उससे बच जानेका वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कहता हूँ, सुनो ॥ १९ ॥

प्राणाधिकं भीमसेनं कृतविद्यं धनंजयम् ।
दुर्योधनो लक्षयित्वा पर्यतप्यत दुर्मनाः ॥ २० ॥

भीमसेनको सबसे अधिक बलवान् और अर्जुनको अस्त्र-विद्यामें सबसे श्रेष्ठ देखकर दुर्योधन सदा संतप्त होता रहता था। उसके मनमें बड़ा दुःख था ।। २० ।। ततो वैकर्तनः कर्णः शकुनिश्चापि सौबलः । अनेकैरभ्युपायैस्ते जिघांसन्ति स्म पाण्डवान् ।। २१ ।। तब सूर्यपुत्र कर्ण और सुबलकुमार शकुनि आदि अनेक उपायोंसे पाण्डवोंको मार डालनेकी इच्छा करने लगे ।। २१ ।। पाण्डवा अपि तत् सर्वं प्रतिचक्रुर्यथागतम् । उद्भावनमकुर्वन्तो विदुरस्य मते स्थिताः ।। २२ ।। पाण्डवोंने भी जब जैसा संकट आया, सबका निवारण किया और विदुरकी सलाह मानकर वे कौरवोंके षड्यन्त्रका कभी भंडाफोड़ नहीं करते थे ।। २२ ।। गुणैः समुदितान् दृष्ट्वा पौराः पाण्डुसुतांस्तदा । कथयांचक्रिरे तेषां गुणान् संसत्सु भारत ।। २३ ।। भारत! उन दिनों पाण्डवोंको सर्वगुणसम्पन्न देख नगरके निवासी भरी सभाओंमें उनके सद्गुणोंकी प्रशंसा करते थे ।। २३ ।। राज्यप्राप्तिं च सम्प्राप्तं ज्येष्ठं पाण्डुसुतं तदा । कथयन्ति स्म सम्भूय चत्वरेषु सभासु च ।। २४ ।। वे जहाँ कहीं चौराहोंपर और सभाओंमें इकट्ठे होते वहीं पाण्डुके ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिरको राज्यप्राप्तिके योग्य बताते थे ।। २४ ।। प्रज्ञाचक्षुरचक्षुष्ट्वाद धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । राज्यं न प्राप्तवान् पूर्वं स कथं नृपतिर्भवेत् ।। २५ ।। वे कहते, 'प्रज्ञाचक्षु महाराज धृतराष्ट्र नेत्रहीन होनेके कारण जब पहले ही राज्य न पा सके, तब (अब) वे कैसे राजा हो सकते हैं ।। २५ ।। तथा शांतनवो भीष्मः सत्यसंधो महाव्रतः । प्रत्याख्याय पुरा राज्यं न स जातु ग्रहीष्यति ।। २६ ।। 'महान् व्रतका पालन करनेवाले शांतनुनन्दन भीष्म तो सत्यप्रतिज्ञ हैं। वे पहले ही राज्य ठुकरा चुके हैं, अतः अब उसे कदापि ग्रहण न करेंगे ।। २६ ।। ते वयं पाण्डवज्येष्ठं तरुणं वृद्धशीलिनम् । अभिषिञ्चाम साध्वद्य सत्यकारुण्यवेदिनम् ।। २७ ।। 'पाण्डवोंके बड़े भाई युधिष्ठिर यद्यपि अभी तरुण हैं, तो भी उनका शील-स्वभाव वृद्धोंके समान है। वे सत्यवादी, दयालु और वेदवेत्ता हैं; अतः अब हमलोग उन्हींका विधिपूर्वक राज्याभिषेक करें ।। २७ ।। स हि भीष्मं शांतनवं धृतराष्ट्रं च धर्मवित् । सपुत्रं विविधैर्भोगैर्योजयिष्यति पूजयन् ।। २८ ।।

‘महाराज युधिष्ठिर बड़े धर्मज्ञ हैं। वे शांतनुनन्दन भीष्म तथा पुत्रोंसहित धृतराष्ट्रका आदर करते हुए उन्हें नाना प्रकारके भोगोंसे सम्पन्न रखेंगे’ ॥ २८ ॥

तेषां दुर्योधनः श्रुत्वा तानि वाक्यानि जल्पताम् ।
युधिष्ठिरानुरक्तानां पर्यतप्यत दुर्मतिः ॥ २९ ॥
युधिष्ठिरमें अनुरक्त हो उपर्युक्त उद्गार प्रकट करनेवाले लोगोंकी बातें सुनकर खोटी बुद्धिवाला दुर्योधन भीतर-ही-भीतर जलने लगा ॥ २९ ॥

स तप्यमानो दुष्टात्मा तेषां वाचो न चक्षमे ।
ईर्ष्या चापि संतप्तो धृतराष्ट्रमुपागमत् ॥ ३० ॥
इस प्रकार संतप्त हुआ वह दुष्टात्मा लोगोंकी बातोंको सहन न कर सका। वह ईर्ष्याकी आगसे जलता हुआ धृतराष्ट्रके पास आया ॥ ३० ॥

ततो विरहितं दृष्ट्वा पितरं प्रतिपूज्य सः ।
पौरानुरागसंतप्तः पश्चादिदमभाषत ॥ ३१ ॥
वहाँ अपने पिताको अकेला पाकर पुरवासियोंके युधिष्ठिरविषयक अनुरागसे दुःखी हुए दुर्योधनने पहले पिताके प्रति आदर प्रदर्शित किया। तत्पश्चात् इस प्रकार कहा ॥ ३१ ॥

दुर्योधन उवाच

श्रुता मे जल्पतां तात पौराणामशिवा गिरः ।
त्वामनादृत्य भीष्मं च पतिमिच्छन्ति पाण्डवम् ॥ ३२ ॥
दुर्योधन बोला—‘पिताजी! मैंने परस्पर वार्तालाप करते हुए पुरवासियोंके मुखसे (बड़ी) अशुभ बातें सुनी हैं। वे आपका और भीष्मजीका अनादर करके पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको राजा बनाना चाहते हैं ॥ ३२ ॥

मतमेतच्च भीष्मस्य न स राज्यं बुभुक्षति ।
अस्माकं तु परां पीडां चिकीर्षन्ति पुरे जनाः ॥ ३३ ॥
भीष्मजी तो इस बातको मान लेंगे; क्योंकि वे स्वयं राज्य भोगना नहीं चाहते। परंतु नगरके लोग हमारे लिये बहुत बड़े कष्टका आयोजन करना चाहते हैं ॥ ३३ ॥

पितृतः प्राप्तवान् राज्यं पाण्डुरात्मगुणैः पुरा ।
त्वमन्धगुणसंयोगात् प्राप्तं राज्यं न लब्धवान् ॥ ३४ ॥
पाण्डुने अपने सद्गुणोंके कारण पितासे राज्य प्राप्त कर लिया और आप अंधे होनेके कारण अधिकारप्राप्त राज्यको भी नहीं पा सके ॥ ३४ ॥

स एष पाण्डोर्दायाद्यं यदि प्राप्नोति पाण्डवः ।
तस्य पुत्रो ध्रुवं प्राप्तस्तस्य तस्यापि चापरः ॥ ३५ ॥
यदि ये पाण्डुकुमार युधिष्ठिर पाण्डुके राज्यको, जिसका उत्तराधिकारी पुत्र ही होता है, प्राप्त कर लेते हैं तो निश्चय ही उनके बाद उनका पुत्र ही इस राज्यका अधिकारी होगा और

उसके बाद पुनः उसीकी पुत्रपरम्परामें दूसरे-दूसरे लोग इसके अधिकारी होते जायँगे ॥ ३५ ॥

ते वयं राजवंशेन हीनाः सह सुतैरपि । अवज्ञाता भविष्यामो लोकस्य जगतीपते ॥ ३६ ॥ महाराज! ऐसी दशामें हमलोग अपने पुत्रोंसहित राजपरम्परासे वंचित होनेके कारण सब लोगोंकी अव-हेलनाके पात्र बन जायँगे ॥ ३६ ॥ सततं निरयं प्राप्ताः परपिण्डोपजीविनः । न भवेम यथा राजंस्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ ३७ ॥ राजन्! आप कोई ऐसी नीति काममें लाइये, जिससे हमें दूसरोंके दिये हुए अन्नसे गुजारा करके सदा नरकतुल्य कष्ट न भोगना पड़े ॥ ३७ ॥ यदि त्वं हि पुरा राजन्निदं राज्यमवाप्तवान् । ध्रुवं प्राप्स्याम च वयं राज्यमप्यवशे जने ॥ ३८ ॥ राजन्! यदि पहले ही आपने यह राज्य पा लिया होता तो आज हम अवश्य ही इसे प्राप्त कर लेते; फिर तो लोगोंका कोई वश नहीं चलता ॥ ३८ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि दुर्योधनेर्ष्यायां चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें दुर्योधनकी ईर्ष्याविषयक एक सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४० ॥


* इससे महाभारतकालमें यन्त्रयुक्त नौकाओं (जहाजों)-का निर्माण सूचित होता है।