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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**मन्त्रियोंकी बात सुनकर राजा जनमेजय दुःखसे आतुर हो संतप्त हो उठे और कुपित होकर हाथसे हाथ मलने लगे ॥ ४४ ॥
निःश्वासमुष्णमसकृद् दीर्घं राजीवलोचनः ।
मुमोचाश्रूणि च तदा नेत्राभ्यां प्ररुदन् नृपः ॥ ४५ ॥
वे बारम्बार लम्बी और गरम साँस छोड़ने लगे। कमलके समान नेत्रोंवाले राजा जनमेजय उस समय नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ४५ ॥
उवाच च महीपालो दुःखशोकसमन्वितः ।
दुर्धरं बाष्पमुत्सृज्य स्पृष्ट्वा चापो यथाविधि ॥ ४६ ॥
मुहूर्तमिव च ध्यात्वा निश्चित्य मनसा नृपः ।
अमर्षी मन्त्रिणः सर्वानिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४७ ॥
राजाने दो घड़ीतक ध्यान करके मन-ही-मन कुछ निश्चय किया, फिर दुःख-शोक और अमर्षमें डूबे हुए नरेश न थमनेवाले आँसुओंकी अविच्छिन्न धारा बहाते हुए विधिपूर्वक जलका स्पर्श करके सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले— ॥ ४६-४७ ॥

जनमेजय उवाच

श्रुत्वैतद् भवतां वाक्यं पितुर्मे स्वर्गतिं प्रति ।
निश्चितेयं मम मतिर्या च तां मे निबोधत ।
अनन्तरं च मन्येऽहं तक्षकाय दुरात्मने ॥ ४८ ॥
प्रतिकर्तव्यमित्येवं येन मे हिंसितः पिता ।
शृङ्गिणं हेतुमात्रं यः कृत्वा दग्ध्वा च पार्थिवम् ॥ ४९ ॥
**जनमेजयने कहा—**मन्त्रियो! मेरे पिताके स्वर्गलोकगमनके विषयमें आपलोगोंका यह वचन सुनकर मैंने अपनी बुद्धिद्वारा जो कर्तव्य निश्चित किया है, उसे आप सुन लें। मेरा विचार है, उस दुरात्मा तक्षकसे तुरंत बदला लेना चाहिये, जिसने शृंगी ऋषिको निमित्तमात्र बनाकर स्वयं ही मेरे पिता महाराजको अपनी विषाग्निसे दग्ध करके मारा है ॥ ४८-४९ ॥
इयं दुरात्मता तस्य काश्यपं यो न्यवर्तयत् ।
यदाऽऽगच्छेत् स वै विप्रो ननु जीवेत् पिता मम ॥ ५० ॥
उसकी सबसे बड़ी दुष्टता यह है कि उसने काश्यपको लौटा दिया। यदि वे ब्राह्मणदेवता आ जाते तो मेरे पिता निश्चय ही जीवित हो सकते थे ॥ ५० ॥
परिहीयेत किं तस्य यदि जीवेत् स पार्थिवः ।
काश्यपस्य प्रसादेन मन्त्रिणां विनयेन च ॥ ५१ ॥
यदि मन्त्रियोंके विनय और काश्यपके कृपाप्रसादसे महाराज जीवित हो जाते तो इसमें उस दुष्टकी क्या हानि हो जाती? ॥ ५१ ॥
स तु वारितवान् मोहात् काश्यपं द्विजसत्तमम् ।

संजिजीवयिषुं प्राप्तं राजानमपराजितम् ॥ ५२ ॥
जो कहीं भी परास्त न होते थे, ऐसे मेरे पिता राजा परीक्षित्को जीवित करनेकी इच्छासे द्विजश्रेष्ठ काश्यप आ पहुँचे थे, किंतु तक्षकने मोहवश उन्हें रोक दिया ॥ ५२ ॥
महानतिक्रमो ह्येष तक्षकस्य दुरात्मनः ।
द्विजस्य योऽददद् द्रव्यं मा नृपं जीवयेदिति ॥ ५३ ॥
दुरात्मा तक्षकका यह सबसे बड़ा अपराध है कि उसने ब्राह्मणदेवको इसलिये धन दिया कि वे महाराजको जिला न दें ॥ ५३ ॥
उत्तङ्कस्य प्रियं कर्तुमात्मनश्च महत् प्रियम् ।
भवतां चैव सर्वेषां गच्छाम्यपचितिं पितुः ॥ ५४ ॥
इसलिये मैं महर्षि उत्तंकका, अपना तथा आप सब लोगोंका अत्यन्त प्रिय करनेके लिये पिताके वैरका अवश्य बदला लूँगा ॥ ५४ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि पारिक्षिन्मन्त्रिसंवादे
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें जनमेजय और मन्त्रियोंका संवादविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥

जनमेजयके सर्पयज्ञका उपक्रम

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एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

जनमेजयके सर्पयज्ञका उपक्रम

सौतिरुवाच

एवमुक्त्वा ततः श्रीमान् मन्त्रिभिश्चानुमोदितः ।
आरुरोह प्रतिज्ञां स सर्पसत्राय पार्थिवः ॥ १ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं—शौनक! श्रीमान् राजा जनमेजयने जब ऐसा कहा, तब उनके मन्त्रियोंने भी उस बातका समर्थन किया। तत्पश्चात् राजा सर्पयज्ञ करनेकी प्रतिज्ञापर आरूढ़ हो गये ॥ १ ॥

ब्रह्मन् भरतशार्दूलो राजा पारिक्षितस्तदा ।
पुरोहितमथाहूय ऋत्विजो वसुधाधिपः ॥ २ ॥
अब्रवीद् वाक्यसम्पन्नः कार्यसम्पत्करं वचः ।

ब्रह्मन्! सम्पूर्ण वसुधाके स्वामी भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ परीक्षित्कुमार राजा जनमेजयने उस समय पुरोहित तथा ऋत्विजोंको बुलाकर कार्य सिद्ध करनेवाली बात कही— ॥ २॥

यो मे हिंसितवांस्तातं तक्षकः स दुरात्मवान् ॥ ३ ॥
प्रतिकुर्यां तथा तस्य तद् भवन्तो ब्रुवन्तु मे ।
अपि तत् कर्म विदितं भवतां येन पन्नगम् ॥ ४ ॥
तक्षकं सम्प्रदीप्तेऽग्नौ प्रक्षिपेयं सबान्धवम् ।
यथा तेन पिता मह्यं पूर्वं दग्धो विषाग्निना ।
तथाहमपि तं पापं दग्धुमिच्छामि पन्नगम् ॥ ५ ॥

‘ब्राह्मणो! जिस दुरात्मा तक्षकने मेरे पिताकी हत्या की है, उससे मैं उसी प्रकारका बदला लेना चाहता हूँ। इसके लिये मुझे क्या करना चाहिये, यह आपलोग बतावें। क्या आपलोगोंको ऐसा कोई कर्म विदित है जिसके द्वारा मैं तक्षक नागको उसके बन्धु-बान्धवोंसहित जलती हुई आगमें झोंक सकूँ? उसने अपनी विषाग्निसे पूर्वकालमें मेरे पिताको जिस प्रकार दग्ध किया था, उसी प्रकार मैं भी उस पापी सर्पको जलाकर भस्म कर देना चाहता हूँ’ ॥ ३—५ ॥

ऋत्विज ऊचुः

अस्ति राजन् महत् सत्रं त्वदर्थं देवनिर्मितम् ।
सर्पसत्रमिति ख्यातं पुराणे परिपठ्यते ॥ ६ ॥

**ऋत्विजोंने कहा—**राजन्! इसके लिये एक महान् यज्ञ है, जिसका देवताओंने आपके लिये पहलेसे ही निर्माण कर रखा है। उसका नाम है सर्पसत्र। पुराणोंमें उसका वर्णन आया है॥ ६॥
आहर्ता तस्य सत्रस्य त्वन्नान्योऽस्ति नराधिप।
इति पौराणिकाः प्राहुरस्माकं चास्ति स क्रतुः॥ ७॥
नरेश्वर! उस यज्ञका अनुष्ठान करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है, ऐसा पौराणिक विद्वान् कहते हैं। उस यज्ञका विधान हमलोगोंको मालूम है॥ ७॥
एवमुक्तः स राजर्षिर्मेने दग्धं हि तक्षकम्।
हुताशनमुखे दीप्ते प्रविष्टमिति सत्तम॥ ८॥
साधुशिरोमणे! ऋत्विजोंके ऐसा कहनेपर राजर्षि जनमेजयको विश्वास हो गया कि अब तक्षक निश्चय ही प्रज्वलित अग्निके मुखमें समाकर भस्म हो जायगा॥ ८॥
ततोऽब्रवीन्मन्त्रविदस्तान् राजा ब्राह्मणांस्तदा।
आहरिष्यामि तत् सत्रं सम्भाराः सम्भ्रियन्तु मे॥ ९॥
तब राजाने उस समय उन मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणोंसे कहा—‘मैं उस यज्ञका अनुष्ठान करूँगा। आपलोग उसके लिये आवश्यक सामग्री संग्रह कीजिये’॥ ९॥
ततस्ते ऋत्विजस्तस्य शास्त्रतो द्विजसत्तम।
तं देशं मापयामासुर्यज्ञायतनकारणात्॥ १०॥
द्विजश्रेष्ठ! तब उन ऋत्विजोंने शास्त्रीय विधिके अनुसार यज्ञमण्डप बनानेके लिये वहाँकी भूमि नाप ली॥ १०॥
यथावद् वेदविद्वांसः सर्वे बुद्धेः परं गताः।
ऋद्ध्या परमया युक्तमिष्टं द्विजगणैर्युतम्॥ ११॥
प्रभूतधनधान्याढ्यमृत्विग्भिः सुनिषेवितम्।
निर्माय चापि विधिवद् यज्ञायतनमीप्सितम्॥ १२॥
राजानं दीक्षयामासुः सर्पसत्राप्तये तदा।
इदं चासीत् तत्र पूर्वं सर्पसत्रे भविष्यति॥ १३॥
वे सभी ऋत्विज् वेदोंके यथावत् विद्वान् तथा परम बुद्धिमान् थे। उन्होंने विधिपूर्वक मनके अनुरूप एक यज्ञ-मण्डप बनाया, जो परम समृद्धिसे सम्पन्न, उत्तम द्विजोंके समुदायसे सुशोभित, प्रचुर धनधान्यसे परिपूर्ण तथा ऋत्विजोंसे सुसेवित था। उस यज्ञमण्डपका निर्माण कराकर ऋत्विजोंने सर्पयज्ञकी सिद्धिके लिये उस समय राजा जनमेजयको दीक्षा दी। इसी समय जब कि सर्पसत्र अभी प्रारम्भ होनेवाला था, वहाँ पहले ही यह घटना घटित हुई॥ ११—१३॥
निमित्तं महदुत्पन्नं यज्ञविघ्नकरं तदा।
यज्ञस्यायतने तस्मिन् क्रियमाणे वचोऽब्रवीत्॥ १४॥

स्थपतिर्बुद्धिसम्पन्नो वास्तुविद्याविशारदः । इत्यब्रवीत् सूत्रधारः सूतः पौराणिकस्तदा ॥ १५ ॥ उस यज्ञमें विघ्न डालनेवाला बहुत बड़ा कारण प्रकट हो गया। जब वह यज्ञमण्डप बनाया जा रहा था, उस समय वास्तुशास्त्रके पारंगत विद्वान्, बुद्धिमान् एवं अनुभवी सूत्रधार शिल्पवेत्ता सूतने वहाँ आकर कहा— ॥ १४-१५ ॥ यस्मिन् देशे च काले च मापनेयं प्रवर्तिता । ब्राह्मणं कारणं कृत्वा नायं संस्थास्यते क्रतुः ॥ १६ ॥ ‘जिस स्थान और समयमें यह यज्ञमण्डप मापनेकी क्रिया प्रारम्भ हुई है, उसे देखकर यह मालूम होता है कि एक ब्राह्मणको निमित्त बनाकर यह यज्ञ पूर्ण न हो सकेगा’ ॥ १६ ॥ एतच्छ्रुत्वा तु राजासौ प्राग्दीक्षाकालमब्रवीत् । क्षत्तारं न हि मे कश्चिदज्ञातः प्रविशेदिति ॥ १७ ॥ यह सुनकर राजा जनमेजयने दीक्षा लेनेसे पहले ही सेवकको यह आदेश दे दिया—‘मुझे सूचित किये बिना किसी अपरिचित व्यक्तिको यज्ञमण्डपमें प्रवेश न करने दिया जाय’ ॥ १७ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रोपक्रमे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रोपक्रमसम्बन्धी इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥

अध्याय (पृष्ठ 375)

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द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सर्पसत्रका आरम्भ और उसमें सर्पोंका विनाश

सौतिरुवाच

ततः कर्म प्रवृत्ते सर्पसत्रविधानतः ।
पर्यक्रामंश्च विधिवत् स्वे स्वे कर्मणि याजकाः ॥ १ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं—शौनक! तदनन्तर सर्पयज्ञकी विधिसे कार्य प्रारम्भ हुआ। सब याजक विधिपूर्वक अपने-अपने कर्ममें संलग्न हो गये ॥ १ ॥

प्रावृत्य कृष्णवासांसि धूमसंरक्तलोचनाः ।
जुहुवुर्मन्त्रवच्चैव समिद्धं जातवेदसम् ॥ २ ॥
सबकी आँखें धूएँसे लाल हो रही थीं। वे सभी ऋत्विज् काले वस्त्र पहनकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक प्रज्वलित अग्निमें होम करने लगे ॥ २ ॥

कम्पयन्तश्च सर्वेषामुरगाणां मनांसि च ।
सर्पानाजुहुवुस्तत्र सर्वानग्निमुखे तदा ॥ ३ ॥
वे समस्त सर्पोंके हृदयमें कँपकँपी पैदा करते हुए उनके नाम ले-लेकर उन सबका वहाँ आगके मुखमें होम करने लगे ॥ ३ ॥

ततः सर्पाः समापेतुः प्रदीप्ते हव्यवाहने ।
विचेष्टमानाः कृपणमाह्वयन्तः परस्परम् ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् सर्पगण तड़फड़ाते और दीनस्वरमें एक-दूसरेको पुकारते हुए प्रज्वलित अग्निमें टपाटप गिरने लगे ॥ ४ ॥

विस्फुरन्तः श्वसन्तश्च वेष्टयन्तः परस्परम् ।
पुच्छैः शिरोभिश्च भृशं चित्रभानुं प्रपेदिरे ॥ ५ ॥
वे उछलते, लम्बी साँसें लेते, पूँछ और फनोंसे एक-दूसरेको लपेटते हुए धधकती आगके भीतर अधिकाधिक संख्यामें गिरने लगे ॥ ५ ॥

श्वेताः कृष्णाश्च नीलाश्च स्थविराः शिशवस्तथा ।
नदन्तो विविधान् नादान् पेतुर्दीप्ते विभावसौ ॥ ६ ॥
सफेद, काले, नीले, बूढ़े और बच्चे सभी प्रकारके सर्प विविध प्रकारसे चीत्कार करते हुए जलती आगमें विवश होकर गिर रहे थे ॥ ६ ॥

क्रोशयोजनमात्रा हि गोकर्णस्य प्रमाणतः ।
पतन्त्यजस्रं वेगेन वह्नावग्निमतां वर ॥ ७ ॥
कोई एक कोस लम्बे थे, तो कोई चार कोस और किन्हीं-किन्हींकी लम्बाई तो केवल गायके कानके बराबर थी। अग्निहोत्रियोंमें श्रेष्ठ शौनक! वे छोटे-बड़े सभी सर्प बड़े वेगसे

आगकी ज्वालामें निरन्तर आहुति बन रहे थे ॥ ७ ॥
एवं शतसहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ।
अवशानि विनष्टानि पन्नगानां तु तत्र वै ॥ ८ ॥
इस प्रकार लाखों, करोड़ों तथा अरबों सर्प वहाँ विवश होकर नष्ट हो गये ॥ ८ ॥
तुरगा इव तत्रान्ये हस्तिहस्ता इवापरे ।
मत्ता इव च मातङ्गा महाकाया महाबलाः ॥ ९ ॥
कुछ सर्पोंकी आकृति घोड़ोंके समान थी और कुछकी हाथीकी सूँड़के सदृश। कितने ही विशाल-काय महाबली नाग मतवाले गजराजोंको मात कर रहे थे ॥ ९ ॥
उच्चावचाश्च बहवो नानावर्णा विषोल्बणाः ।
घोराश्च परिघप्रख्या दन्दशूका महाबलाः ।
प्रपेतुरग्नावुरगा मातृवाग्दण्डपीडिताः ॥ १० ॥
भयंकर विषवाले छोटे-बड़े अनेक रंगके बहु-संख्यक सर्प, जो देखनेमें भयानक, परिघके समान मोटे, अकारण ही डँस लेनेवाले और अत्यन्त शक्तिशाली थे, अपनी माताके शापसे पीड़ित होकर स्वयं ही आगमें पड़ रहे थे ॥ १० ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रोपक्रमे
द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रोपक्रमविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 377)

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त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सर्पयज्ञके ऋत्विजोंकी नामावली, सर्पोंका भयंकर विनाश, तक्षकका इन्द्रकी शरणमें जाना तथा वासुकिका अपनी बहिनसे आस्तीकको यज्ञमें भेजनेके लिये कहना

शौनक उवाच

सर्पसत्रे तदा राज्ञः पाण्डवेयस्य धीमतः ।
जनमेजयस्य के त्वासन्नृत्विजः परमर्षयः ॥ १ ॥
शौनकजीने पूछा— सूतनन्दन! पाण्डववंशी बुद्धिमान् राजा जनमेजयके उस सर्पयज्ञमें कौन-कौनसे महर्षि ऋत्विज् बने थे? ॥ १ ॥
के सदस्या बभूवुश्च सर्पसत्रे सुदारुणे ।
विषादजननेऽत्यर्थं पन्नगानां महाभये ॥ २ ॥
उस अत्यन्त भयंकर सर्पसत्रमें, जो सर्पोंके लिये महान् भयदायक और विषादजनक था, कौन-कौनसे मुनि सदस्य हुए थे? ॥ २ ॥
सर्वं विस्तरशस्तात भवाञ्छंसितुमर्हति ।
सर्पसत्रविधानज्ञविज्ञेयाः के च सूतज ॥ ३ ॥
तात! ये सब बातें आप विस्तारपूर्वक बताइये। सूतपुत्र! यह भी सूचित कीजिये कि सर्पसत्रकी विधिको जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ समझे जानेयोग्य कौन-कौनसे महर्षि वहाँ उपस्थित थे ॥ ३ ॥

सौतिरुवाच

हन्त ते कथयिष्यामि नामानीह मनीषिणाम् ।
ये ऋत्विजः सदस्याश्च तस्यासन् नृपतेस्तदा ॥ ४ ॥
तत्र होता बभूवाथ ब्राह्मणश्चण्डभार्गवः ।
च्यवनस्यान्वये ख्यातो जातो वेदविदां वरः ॥ ५ ॥
उद्गाता ब्राह्मणो वृद्धो विद्वान् कौत्सोऽथ जैमिनिः ।
ब्रह्माभवच्छाङ्गँरवोऽथाध्वर्युश्चापि पिङ्गलः ॥ ६ ॥
उग्रश्रवाजीने कहा— शौनकजी! मैं आपको उन मनीषी महात्माओंके नाम बता रहा हूँ, जो उस समय राजा जनमेजयके ऋत्विज् और सदस्य थे। उस यज्ञमें वेद-वेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण चण्डभार्गव होता थे। उनका जन्म च्यवन मुनिके वंशमें हुआ था। वे उस समयके विख्यात कर्मकाण्डी थे। वृद्ध एवं विद्वान् ब्राह्मण कौत्स उद्गाता, जैमिनि ब्रह्मा तथा शार्ङ्गरव और पिंगल अध्वर्यु थे ॥ ४—६ ॥

सदस्यश्चाभवद् व्यासः पुत्रशिष्यसहायवान् । उद्दालकः प्रमतकः श्वेतकेतुश्च पिङ्गलः ॥ ७ ॥ असितो देवलश्चैव नारदः पर्वतस्तथा । आत्रेयः कुण्डजठरौ द्विजः कालघटस्तथा ॥ ८ ॥ वात्स्यः श्रुतश्रवा वृद्धो जपस्वाध्यायशीलवान् । कोहलो देवशर्मा च मौद्गल्यः समसौरभः ॥ ९ ॥ एते चान्ये च बहवो ब्राह्मणा वेदपारगाः । सदस्याश्चाभवंस्तत्र सत्रे पारीक्षितस्य ह ॥ १० ॥

इसी प्रकार पुत्र और शिष्योंसहित भगवान् वेदव्यास, उद्दालक, प्रमतक, श्वेतकेतु, पिंगल, असित, देवल, नारद, पर्वत, आत्रेय, कुण्ड, जठर, द्विजश्रेष्ठ कालघट, वात्स्य, जप और स्वाध्यायमें लगे रहनेवाले बूढ़े श्रुतश्रवा, कोहल, देवशर्मा, मौद्गल्य तथा समसौरभ—ये और अन्य बहुत-से वेदविद्याके पारंगत ब्राह्मण जनमेजयके उस सर्पयज्ञमें सदस्य बने थे ॥ ७–१० ॥

जुह्वत्स्वृत्विक्ष्वथ तदा सर्पसत्रे महाक्रतौ । अहयः प्रापतंस्तत्र घोराः प्राणिभयावहाः ॥ ११ ॥

उस समय उस महान् यज्ञ सर्पसत्रमें ज्यों-ज्यों ऋत्विज् लोग आहुतियाँ डालते, त्यों-त्यों प्राणिमात्रको भय देनेवाले घोर सर्प वहाँ आ-आकर गिरते थे ॥ ११ ॥

वसामेदोवहाः कुल्या नागानां सम्प्रवर्तिताः । ववौ गन्धश्च तुमलो दह्यतामनिशं तदा ॥ १२ ॥

नागोंकी चर्बी और मेदसे भरे हुए कितने ही नाले बह चले। निरन्तर जलनेवाले सर्पोंकी तीखी दुर्गन्ध चारों ओर फैल रही थी ॥ १२ ॥

पततां चैव नागानां धिष्ठितानां तथाम्बरे । अश्रूयतानिशं शब्दः पच्यतां चाग्निना भृशम् ॥ १३ ॥

जो आगमें पड़ रहे थे, जो आकाशमें ठहरे हुए थे और जो जलती हुई आगकी ज्वालामें पक रहे थे, उन सभी सर्पोंका करुण क्रन्दन निरन्तर जोर-जोरसे सुनायी पड़ता था ॥ १३ ॥

तक्षकस्तु स नागेन्द्रः पुरन्दरनिवेशनम् । गतः श्रुत्वैव राजानं दीक्षितं जनमेजयम् ॥ १४ ॥

नागराज तक्षकने जब सुना कि राजा जनमेजयने सर्पयज्ञकी दीक्षा ली है, तब उसे सुनते ही वह देवराज इन्द्रके भवनमें चला गया ॥ १४ ॥

ततः सर्वं यथावृत्तमाख्याय भुजगोत्तमः । अगच्छच्छरणं भीत आगः कृत्वा पुरन्दरम् ॥ १५ ॥

वहाँ उसने सब बातें ठीक-ठीक कह सुनायीं। फिर सर्पोंमें श्रेष्ठ तक्षकने अपराध करनेके कारण भयभीत हो इन्द्रदेवकी शरण ली॥ १५॥

तमिन्द्रः प्राह सुप्रीतो न तवास्तीह तक्षक ।
भयं नागेन्द्र तस्माद् वै सर्पसत्रात् कदाचन ॥ १६ ॥
तब इन्द्रने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—‘नागराज तक्षक! तुम्हें यहाँ उस सर्पयज्ञसे कदापि कोई भय नहीं है॥ १६॥

प्रसादितो मया पूर्वं तवार्थाय पितामहः ।
तस्मात् तव भयं नास्ति व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ १७ ॥
तुम्हारे लिये मैंने पहलेसे ही पितामह ब्रह्माजीको प्रसन्न कर लिया है, अतः तुम्हें कुछ भी भय नहीं है। तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये’॥ १७॥

सौतिरुवाच

एवमाश्वासितस्तेन ततः स भुजगोत्तमः ।
उवास भवने तस्मिञ्छक्रस्य मुदितः सुखी ॥ १८ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— इन्द्रके इस प्रकार आश्वासन देनेपर सर्पोंमें श्रेष्ठ तक्षक उस इन्द्रभवनमें ही सुखी एवं प्रसन्न होकर रहने लगा॥ १८॥

अजस्रं निपतत्स्वग्नौ नागेषु भृशदुःखितः ।
अल्पशेषपरीवारो वासुकिः पर्यतप्यत ॥ १९ ॥
नाग निरन्तर उस यज्ञकी आगमें आहुति बनते जा रहे थे। सर्पोंका परिवार अब बहुत थोड़ा बच गया था। यह देख वासुकि नाग अत्यन्त दुःखी हो मन-ही-मन संतप्त होने लगे॥ १९॥

कश्मलं चाविशद् घोरं वासुकिं पन्नगोत्तमम् ।
स घूर्णमानहृदयो भगिनीमिदमब्रवीत् ॥ २० ॥
सर्पोंमें श्रेष्ठ वासुकिपर भयानक मोह-सा छा गया, उनके हृदयमें चक्कर आने लगा। अतः वे अपनी बहिनसे इस प्रकार बोले—॥ २०॥

दह्यन्त्यङ्गानि मे भद्रे न दिशः प्रतिभान्ति च ।
सीदामीव च सम्मोहात् घूर्णतीव च मे मनः ॥ २१ ॥
दृष्टिर्भ्राम्यति मेऽतीव हृदयं दीर्यतीव च ।
पतिष्याम्यवशोऽद्याहं तस्मिन् दीप्ते विभावसौ ॥ २२ ॥
‘भद्रे! मेरे अंगोंमें जलन हो रही है। मुझे दिशाएँ नहीं सूझतीं। मैं शिथिल-सा हो रहा हूँ और मोहवश मेरे मस्तिष्कमें चक्कर-सा आ रहा है, मेरे नेत्र घूम रहे हैं, हृदय अत्यन्त विदीर्ण-सा होता जा रहा है। जान पड़ता है, आज मैं भी विवश होकर उस यज्ञकी प्रज्वलित अग्निमें गिर पडूँगा॥ २१-२२॥

पारिक्षितस्य यज्ञोऽसौ वर्ततेऽस्मज्जिघांसया ।
व्यक्तं मयापि गन्तव्यं प्रेतराजनिवेशनम् ॥ २३ ॥
‘जनमेजयका वह यज्ञ हमलोगोंकी हिंसाके लिये ही हो रहा है। निश्चय ही अब मुझे भी यमलोक जाना पड़ेगा ॥ २३ ॥

अयं स कालः सम्प्राप्तो यदर्थमसि मे स्वसः ।
जरत्कारौ मया दत्ता त्रायस्वास्मान् सबान्धवान् ॥ २४ ॥
‘बहिन! जिसके लिये मैंने तुम्हारा विवाह जरत्कारु मुनिसे किया था, उसका यह अवसर आ गया है। तुम बान्धवोंसहित हमारी रक्षा करो ॥ २४ ॥

आस्तीकः किल यज्ञं तं वर्तन्तं भुजगोत्तमे ।
प्रतिषेत्स्यति मां पूर्वं स्वयमाह पितामहः ॥ २५ ॥
‘श्रेष्ठ नागकन्ये! पूर्वकालमें साक्षात् ब्रह्माजीने मुझसे कहा था—‘आस्तीक उस यज्ञको बंद कर देगा’ ॥ २५ ॥

तद् वत्से ब्रूहि वत्सं स्वं कुमारं वृद्धसम्मतम् ।
ममाद्य त्वं सभृत्यस्य मोक्षार्थं वेदवित्तमम् ॥ २६ ॥
‘अतः वत्से! आज तुम बन्धु-बान्धवोंसहित मेरे जीवनको संकटसे छुड़ानेके लिये वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ अपने पुत्र कुमार आस्तीकसे कहो। वह बालक होनेपर भी वृद्ध पुरुषोंके लिये भी आदरणीय है’ ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रे वासुकिवाक्ये
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रके विषयमें वासुकिवचनसम्बन्धी तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 381)

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चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

माताकी आज्ञासे मामाको सान्त्वना देकर आस्तीकका सर्पयज्ञमें जाना

सौतिरुवाच

तत आहूय पुत्रं स्वं जरत्कारुर्भुजङ्गमा ।
वासुकेर्नागराजस्य वचनादिदमब्रवीत् ॥ १ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— तब नागकन्या जरत्कारु नागराज वासुकिके कथनानुसार अपने पुत्रको बुलाकर इस प्रकार बोली— ॥ १ ॥

अहं तव पितुः पुत्र भ्रात्रा दत्ता निमित्ततः ।
कालः स चायं सम्प्राप्तस्तत् कुरुष्व यथातथम् ॥ २ ॥
‘बेटा! मेरे भैयाने एक निमित्तको लेकर तुम्हारे पिताके साथ मेरा विवाह किया था। उसकी पूर्तिका यही उपयुक्त अवसर प्राप्त हुआ है। अतः तुम यथावत्रूपसे उस उद्देश्यकी पूर्ति करो’ ॥ २ ॥

आस्तीक उवाच

किं निमित्तं मम पितुर्दत्ता त्वं मातुलेन मे ।
तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन श्रुत्वा कर्तास्मि तत् तथा ॥ ३ ॥
आस्तीकने पूछा— माँ! मामाजीने किस निमित्तको लेकर पिताजीके साथ तुम्हारा विवाह किया था? वह मुझे ठीक-ठीक बताओ। उसे सुनकर मैं उसकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करूँगा ॥ ३ ॥

सौतिरुवाच

तत आचष्ट सा तस्मै बान्धवानां हितैषिणी ।
भगिनी नागराजस्य जरत्कारुरविक्कवा ॥ ४ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— तदनन्तर अपने भाई-बन्धुओंका हित चाहनेवाली नागराजकी बहिन जरत्कारु शान्तचित्त हो आस्तीकसे बोली ॥ ४ ॥

जरत्कारुरुवाच

पन्नगानामशेषाणां माता कद्रूरिति श्रुता ।
तया शप्ता रुषितया सुता यस्मान्निबोध तत् ॥ ५ ॥
जरत्कारुने कहा— वत्स! सम्पूर्ण नागोंकी माता कद्रू नामसे विख्यात हैं। उन्होंने किसी समय रुष्ट होकर अपने पुत्रोंको शाप दे दिया था। जिस कारणसे वह शाप दिया, वह

बताती हूँ, सुनो ।। ५ ।।

उच्चैःश्रवाः सोऽश्वराजो यन्मिथ्या न कृतो मम । विनतार्थाय पणिते दासीभावाय पुत्रकाः ।। ६ ।। जनमेजयस्य वो यज्ञे धक्ष्यत्यनिलसारथिः । तत्र पञ्चत्वमापन्नाः प्रेतलोकं गमिष्यथ ।। ७ ।।

(अश्वोंका राजा जो उच्चैःश्रवा है, उसके रंगको लेकर विनताके साथ कद्रूने बाजी लगायी थी। उसमें यह शर्त थी—'जो हारे वह जीतनेवालीकी दासी बने।' कद्रू उच्चैःश्रवाकी पूँछ काली बता चुकी थी। अतः उसने अपने पुत्रोंसे कहा—'तुमलोग छलपूर्वक उस घोड़ेकी पूँछ काले रंगकी कर दो।' सर्प इससे सहमत न हुए। तब उन्होंने सर्पोंको शाप देते हुए कहा—) 'पुत्रो! तुमलोगोंने मेरे कहनेसे अश्वराज उच्चैःश्रवाकी पूँछका रंग न बदलकर विनताके साथ जो मेरी दासी होनेकी शर्त थी, उसमें—उस घोड़ेके सम्बन्धमें विनताके कथनको मिथ्या नहीं कर दिखाया, इसलिये जनमेजयके यज्ञमें तुमलोगोंको आग जलाकर भस्म कर देगी और तुम सभी मरकर प्रेतलोकको चले जाओगे' ।। ६-७ ।।

तां च शप्तवतीं देवः साक्षाल्लोकपितामहः । एवमस्त्विति तद्वाक्यं प्रोवाचानुमुमोद च ।। ८ ।।

कद्रूने जब इस प्रकार शाप दे दिया, तब साक्षात् लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने 'एवमस्तु' कहकर उनके वचनका अनुमोदन किया ।। ८ ।।

वासुकिश्चापि तच्छ्रुत्वा पितामहवचस्तदा । अमृते मथिते तात देवाञ्छरणमीयिवान् ।। ९ ।।

तात! मेरे भाई वासुकिने भी उस समय पितामहकी बात सुनी थी। फिर अमृत-मन्थनका कार्य हो जानेपर वे देवताओंकी शरणमें गये ।। ९ ।।

सिद्धार्थाश्च सुराः सर्वे प्राप्यामृतमनुत्तमम् । भ्रातरं मे पुरस्कृत्य पितामहमुपागमन् ।। १० ।। ते तं प्रसादयामासुः सुराः सर्वेऽब्जसम्भवम् । राज्ञा वासुकिना सार्धं शापोऽसौ न भवेदिति ।। ११ ।।

देवतालोग मेरे भाईकी सहायतासे उत्तम अमृत पाकर अपना मनोरथ सिद्ध कर चुके थे। अतः वे मेरे भाईको आगे करके पितामह ब्रह्माजीके पास गये। वहाँ समस्त देवताओंने नागराज वासुकिके साथ रहकर पितामह ब्रह्माजीको प्रसन्न किया। उन्हें प्रसन्न करनेका उद्देश्य यह था कि माताका वह शाप लागू न हो ।। १०-११ ।।

देवा ऊचुः

वासुकिर्नागराजोऽयं दुःखितो ज्ञातिकारणात् । अभिशापः स मातुस्तु भगवन् न भवेत् कथम् ।। १२ ।।

देवता बोले— भगवन्! ये नागराज वासुकि अपने जाति-भाइयोंके लिये बहुत दुःखी हैं। कौन-सा ऐसा उपाय है, जिससे माताका शाप इन लोगोंपर लागू न हो ॥ १२ ॥

ब्रह्मोवाच

जरत्कारुर्जरत्कारुं यां भार्यां समवाप्स्यति । तत्र जातो द्विजः शापान्मोक्षयिष्यति पन्नगान् ॥ १३ ॥ ब्रह्माजीने कहा— जरत्कारु मुनि जरत्कारु नामवाली जिस पत्नीको ग्रहण करेंगे, उसके गर्भसे उत्पन्न ब्राह्मण सर्पोंको माताके शापसे मुक्त करेगा ॥ १३ ॥

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं वासुकिः पन्नगोत्तमः । प्रादान्माममरप्रख्य तव पित्रे महात्मने ॥ १४ ॥ प्रागेवानागते काले तस्मात् त्वं मय्यजायथाः । अयं स कालः सम्प्राप्तो भयान्रस्त्रातुमर्हसि ॥ १५ ॥ भ्रातरं चापि मे तस्मात् त्रातुमर्हसि पावकात् । न मोघं तु कृतं तत् स्याद् यदहं तव धीमते । पित्रे दत्ता विमोक्षार्थं कथं वा पुत्र मन्यसे ॥ १६ ॥ देवताके समान तेजस्वी पुत्र! ब्रह्माजीकी वह बात सुनकर नागश्रेष्ठ वासुकिने मुझे तुम्हारे महात्मा पिताकी सेवामें समर्पित कर दिया। यह अवसर आनेसे बहुत पहले इसी निमित्तसे मेरा विवाह किया गया। तदनन्तर उन महर्षिद्वारा मेरे गर्भसे तुम्हारा जन्म हुआ। जनमेजयके सर्पयज्ञका वह पूर्वनिर्दिष्ट काल आज उपस्थित है (उस यज्ञमें निरन्तर सर्प जल रहे हैं), अतः उस भयसे तुम उन सबका उद्धार करो। मेरे भाईको भी उस भयंकर अग्निसे बचा लो। जिस उद्देश्यको लेकर तुम्हारे बुद्धिमान् पिताकी सेवामें मैं दी गयी, वह व्यर्थ नहीं जाना चाहिये। अथवा बेटा! सर्पोंको इस संकटसे बचानेके लिये तुम क्या उचित समझते हो? ॥ १४—१६ ॥

सौतिरुवाच

एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सास्तीको मातरं तदा । अब्रवीद् दुःखसंतप्तं वासुकिं जीवयन्निव ॥ १७ ॥ उग्रश्रवाजी कहते हैं— माताके ऐसा कहनेपर आस्तीकने उससे कहा—'माँ! तुम्हारी जैसी आज्ञा है वैसा ही करूँगा।' इसके बाद वे दुःखपीड़ित वासुकिको जीवनदान देते हुए-से बोले— ॥ १७ ॥

अहं त्वां मोक्षयिष्यामि वासुके पन्नगोत्तम । तस्माच्छापान्महासत्त्व सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ १८ ॥ 'महान् शक्तिशाली नागराज वासुके! मैं आपको माताके उस शापसे छुड़ा दूँगा। यह आपसे सत्य कहता हूँ ॥ १८ ॥

भव स्वस्थमना नाग न हि ते विद्यते भयम् । प्रयतिष्ये तथा राजन् यथा श्रेयो भविष्यति ॥ १९ ॥ 'नागप्रवर! आप निश्चिन्त रहें। आपके लिये कोई भय नहीं है। राजन्! जैसे भी आपका कल्याण होगा, मैं वैसा प्रयत्न करूँगा ॥ १९ ॥ न मे वागनृतं प्राह स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा । तं वै नृपवरं गत्वा दीक्षितं जनमेजयम् ॥ २० ॥ वाग्भिर्मङ्गलयुक्ताभिस्तोष्यिष्येऽद्य मातुल । यथा स यज्ञो नृपतेर्निवर्तिष्यति सत्तम ॥ २१ ॥ 'मैंने कभी हँसी-मजाकमें भी झूठी बात नहीं कही है, फिर इस संकटके समय तो कह ही कैसे सकता हूँ। सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ मामाजी! सर्पयज्ञके लिये दीक्षित नृपश्रेष्ठ जनमेजयके पास जाकर अपनी मंगलमयी वाणीसे आज उन्हें ऐसा संतुष्ट करूँगा, जिससे राजाका वह यज्ञ बंद हो जायगा ॥ २०-२१ ॥ स सम्भावय नागेन्द्र मयि सर्वं महामते । न ते मयि मनो जातु मिथ्या भवितुमर्हति ॥ २२ ॥ 'महाबुद्धिमान् नागराज! मुझमें यह सब कुछ करनेकी योग्यता है, आप इसपर विश्वास रखें। आपके मनमें मेरे प्रति जो आशा-भरोसा है, वह कभी मिथ्या नहीं हो सकता' ॥ २२ ॥

वासुकिरुवाच आस्तीक परिघूर्णामि हृदयं मे विदीर्यते । दिशो न प्रतिजानामि ब्रह्मदण्डनिपीडितः ॥ २३ ॥ वासुकि बोले—आस्तीक! माताके शापरूप ब्रह्मदण्डसे पीड़ित होनेके कारण मुझे चक्कर आ रहा है, मेरा हृदय विदीर्ण होने लगा है और मुझे दिशाओंका ज्ञान नहीं हो रहा है ॥ २३ ॥

आस्तीक उवाच न संतापस्त्वया कार्यः कथंचित् पन्नगोत्तम । प्रदीप्ताग्नेः समुत्पन्नं नाशयिष्यामि ते भयम् ॥ २४ ॥ आस्तीकने कहा—नागप्रवर! आपको मनमें किसी प्रकार संताप नहीं करना चाहिये। सर्पयज्ञकी धधकती हुई आगसे जो भय आपको प्राप्त हुआ है, मैं उसका नाश कर दूँगा ॥ २४ ॥ ब्रह्मदण्डं महाघोरं कालाग्निसमतेजसम् । नाशयिष्यामि मात्र त्वं भयं कार्षीः कथंचन ॥ २५ ॥

कालाग्निके समान दाहक और अत्यन्त भयंकर शापका यहाँ मैं अवश्य नाश कर डालूँगा। अतः आप उससे किसी तरह भय न करें ।। २५ ।।

सौतिरुवाच

ततः स वासुकेर्घोरमपनीय मनोज्वरम् । आधाय चात्मनोऽङ्गेषु जगाम त्वरितो भृशम् ।। २६ ।। जनमेजयस्य तं यज्ञं सर्वैः समुदितं गुणैः । मोक्षाय भुजगेन्द्राणामास्तीको द्विजसत्तमः ।। २७ ।। **उग्रश्रवाजी कहते हैं—**तदनन्तर नागराज वासुकिके भयंकर चिन्ता-ज्वरको दूर कर और उसे अपने ऊपर लेकर द्विजश्रेष्ठ आस्तीक बड़ी उतावलीके साथ नागराज वासुकि आदिको प्राण-संकटसे छुड़ानेके लिये राजा जनमेजयके उस सर्पयज्ञमें गये, जो समस्त उत्तम गुणोंसे सम्पन्न था ।। २६-२७ ।।

स गत्वापश्यदास्तीको यज्ञायतनमुत्तमम् । वृतं सदस्यैर्बहुभिः सूर्यवह्निसमप्रभैः ।। २८ ।। वहाँ पहुँचकर आस्तीकने परम उत्तम यज्ञमण्डप देखा, जो सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी अनेक सदस्योंसे भरा हुआ था ।। २८ ।।

स तत्र वारितो द्वाःस्थैः प्रविशन् द्विजसत्तमः । अभितुष्टाव तं यज्ञं प्रवेशार्थी परंतपः ।। २९ ।। द्विजश्रेष्ठ आस्तीक जब यज्ञमण्डपमें प्रवेश करने लगे, उस समय द्वारपालोंने उन्हें रोक दिया। तब काम-क्रोध आदि शत्रुओंको संतप्त करनेवाले आस्तीक उसमें प्रवेश करनेकी इच्छा रखकर उस यज्ञकी स्तुति करने लगे ।। २९ ।।

स प्राप्य यज्ञायतनं वरिष्ठं द्विजोत्तमः पुण्यकृतां वरिष्ठः । तुष्टाव राजानमनन्तकीर्ति- मृत्विक्सदस्यांश्च तथैव चाग्निम् ।। ३० ।। इस प्रकार उस परम उत्तम यज्ञमण्डपके निकट पहुँचकर पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ विप्रवर आस्तीकने अक्षय कीर्तिसे सुशोभित यजमान राजा जनमेजय, ऋत्विजों, सदस्यों तथा अग्निदेवका स्तवन आरम्भ किया ।। ३० ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रे आस्तीकागमने चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रमें आस्तीकका आगमनविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५४ ।।

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अध्याय (पृष्ठ 387)

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पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

आस्तीकके द्वारा यजमान, यज्ञ, ऋत्विज्, सदस्यगण और अग्निदेवकी स्तुति-प्रशंसा

आस्तीक उवाच

सोमस्य यज्ञो वरुणस्य यज्ञः
प्रजापतेर्यज्ञ आसीत् प्रयागे ।
तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्र्य
पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ १ ॥

आस्तीकने कहा— भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! चन्द्रमाका जैसा यज्ञ हुआ था, वरुणने जैसा यज्ञ किया था और प्रयागमें प्रजापति ब्रह्माजीका यज्ञ जिस प्रकार समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न हुआ था, उसी प्रकार तुम्हारा यह यज्ञ भी उत्तम गुणोंसे युक्त है। हमारे प्रियजनोंका कल्याण हो ॥ १ ॥

शक्रस्य यज्ञः शतसंख्य उक्त-
स्तथा पूरोस्तुल्यसंख्यं शतं वै ।
तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्र्य
पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ २ ॥

भरतकुलशिरोमणि परीक्षित्कुमार! इन्द्रके यज्ञोंकी संख्या सौ बतायी गयी है, राजा पूरुके यज्ञोंकी संख्या भी उनके समान ही सौ है। उन सबके यज्ञोंके तुल्य ही तुम्हारा यह यज्ञ शोभा पा रहा है। हमारे प्रियजनोंका कल्याण हो ॥ २ ॥

यमस्य यज्ञो हरिमेधसश्च
यथा यज्ञो रन्तिदेवस्य राज्ञः ।
तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्र्य
पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ ३ ॥

जनमेजय! यमराजका यज्ञ, हरिमेधाका यज्ञ तथा राजा रन्तिदेवका यज्ञ जिस प्रकार श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न था, वैसे ही तुम्हारा यह यज्ञ है। हमारे प्रियजनोंका कल्याण हो ॥ ३ ॥

गयस्य यज्ञः शशबिन्दोश्च राज्ञो
यज्ञस्तथा वैश्रवणस्य राज्ञः ।
तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्र्य
पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ ४ ॥

भरतवंशियोंमें अग्रगण्य जनमेजय! महाराज गयका यज्ञ, राजा शशबिन्दुका यज्ञ तथा राजाधिराज कुबेरका यज्ञ जिस प्रकार उत्तम विधि-विधानसे सम्पन्न हुआ था, वैसा ही तुम्हारा यह यज्ञ है। हमारे प्रियजनोंका कल्याण हो ।। ४ ।।

नृगस्य यज्ञस्त्वजमीढस्य चासीद् यथा यज्ञो दाशरथेश्च राज्ञः । तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्रय पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ ५ ॥

परीक्षित्कुमार! राजा नृग, राजा अजमीढ़ और महाराज दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीने जिस प्रकार यज्ञ किया था, वैसा ही तुम्हारा यह यज्ञ भी है। हमारे प्रियजनोंका कल्याण हो ।। ५ ।।

यज्ञः श्रुतो दिवि देवस्य सूनो- र्युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः । तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्रय पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ ६ ॥

भरतश्रेष्ठ जनमेजय! अजमीढ़वंशी धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिरके यज्ञकी ख्याति स्वर्गके श्रेष्ठ देवताओंने भी सुन रखी थी, वैसा ही तुम्हारा भी यह यज्ञ है। हमारे प्रियजनोंका कल्याण हो ।। ६ ।।

कृष्णस्य यज्ञः सत्यवत्याः सुतस्य स्वयं च कर्म प्रचकार यत्र । तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्रय पारिक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ ७ ॥

भरताग्रगण्य जनमेजय! सत्यवतीनन्दन व्यासजीका यज्ञ जिसमें उन्होंने स्वयं सब कार्य सम्पन्न किया था, जैसा हो पाया था, वैसा ही तुम्हारा यह यज्ञ भी है। हमारे प्रियजनोंका कल्याण हो ।। ७ ।।

इमे च ते सूर्यसमानवर्चसः समासते वृत्रहणः क्रतुं यथा । नैषां ज्ञातुं विद्यते ज्ञानमद्य दत्तं येभ्यो न प्रणश्येत् कदाचित् ॥ ८ ॥

तुम्हारे ये ऋत्विज सूर्यके समान तेजस्वी हैं और इन्द्रके यज्ञकी भाँति तुम्हारे इस यज्ञका भलीभाँति अनुष्ठान करते हैं। कोई भी ऐसी जानने योग्य वस्तु नहीं है, जिसका इन्हें ज्ञान न हो। इन्हें दिया हुआ दान कभी नष्ट नहीं हो सकता ।। ८ ।।

ऋत्विक् समो नास्ति लोकेषु चैव द्वैपायनेनेति विनिश्चितं मे ।

एतस्य शिष्याः क्षितिमाचरन्ति सर्वर्त्विजः कर्मसु स्वेषु दक्षाः ॥ ९ ॥ द्वैपायन व्यासजीके समान पारलौकिक साधनोंमें कुशल दूसरा कोई ऋत्विज् नहीं है, यह मेरा निश्चित मत है। इनके शिष्य ही अपने-अपने कर्मोंमें निपुण होता, उद्गाता आदि सभी प्रकारके ऋत्विज् हैं, जो यज्ञ करानेके लिये सम्पूर्ण भूमण्डलमें विचरते रहते हैं ॥ ९ ॥

विभावसुश्चित्रभानुर्महात्मा हिरण्यरेता हुतभुक् कृष्णवर्त्मा । प्रदक्षिणावर्तशिखः प्रदीप्तो हव्यं तवेदं हुतभुग् वष्टि देवः ॥ १० ॥ जो विभावसु, चित्रभानु, महात्मा, हिरण्यरेता, हविष्यभोजी तथा कृष्णवर्त्मा कहलाते हैं, वे अग्निदेव तुम्हारे इस यज्ञमें दक्षिणावर्त शिखाओंसे प्रज्वलित हो दी हुई आहुतिको भोग लगाते हुए तुम्हारे इस हविष्यकी सदा इच्छा रखते हैं ॥ १० ॥

नेह त्वदन्यो विद्यते जीवलोके समो नृपः पालयिता प्रजानाम् । धृत्या च ते प्रीतमनाः सदाहं त्वं वा वरुणो धर्मराजो यमो वा ॥ ११ ॥ इस मृत्युलोकमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा राजा नहीं है, जो तुम्हारी भाँति प्रजाका पालन कर सके। तुम्हारे धैर्यसे मेरा मन सदा प्रसन्न रहता है। तुम साक्षात् वरुण, धर्मराज एवं यमके समान प्रभावशाली हो ॥ ११ ॥

शक्रः साक्षाद् वज्रपाणिर्यथेह त्राता लोकेऽस्मिंस्त्वं तथेह प्रजानाम् । मतस्त्वं नः पुरुषेन्द्रह लोके न च त्वदन्यो भूपतिरस्ति जज्ञे ॥ १२ ॥ पुरुषोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! जैसे साक्षात् वज्रपाणि इन्द्र सम्पूर्ण प्रजाकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार तुम भी इस लोकमें हम प्रजावर्गके पालक माने गये हो। संसारमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई भूपाल तुम-जैसा प्रजापालक नहीं है ॥ १२ ॥

खट्वाङ्गनाभागदिलीपकल्प ययातिमान्धातृसमप्रभाव । आदित्यतेजःप्रतिमानतेजा भीष्मो यथा राजसि सुव्रतस्त्वम् ॥ १३ ॥ राजन्! तुम खट्वांग, नाभाग और दिलीपके समान प्रतापी हो। तुम्हारा प्रभाव राजा ययाति और मान्धाताके समान है। तुम अपने तेजसे भगवान् सूर्यके प्रचण्ड तेजकी