महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
शीतवातार्दितं लोकं यथा तव मरीचयः ॥ ५१ ॥ शीतकालकी वायुसे पीड़ित जगत्को अग्नि, कम्बल और वस्त्र भी उतना सुख नहीं देते जितना आपकी किरणें देती हैं ॥ ५१ ॥ त्रयोदशद्वीपवतीं गोभिर्भासयसे महीम् । त्रयाणामपि लोकानां हितायैकः प्रवर्तसे ॥ ५२ ॥ आप अपनी किरणोंद्वारा तेरह* द्वीपोंसे युक्त सम्पूर्ण पृथ्वीको प्रकाशित करते हैं; और अकेले ही तीनों लोकोंके हितके लिये तत्पर रहते हैं ॥ ५२ ॥ तव यद्युदयो न स्यादन्धं जगदिदं भवेत् । न च धर्मार्थकामेषु प्रवर्तेरन् मनीषिणः ॥ ५३ ॥ यदि आपका उदय न हो तो यह सारा जगत् अंधा हो जाय और मनीषी पुरुष धर्म, अर्थ एवं कामसम्बन्धी कर्मोंमें प्रवृत्त ही न हों ॥ ५३ ॥ आधानपशुबन्धेष्टिमन्त्रयज्ञतपःक्रियाः । त्वत्प्रसादादवाप्यन्ते ब्रह्मक्षत्रविशां गणैः ॥ ५४ ॥ गर्भाधान या अग्निकी स्थापना, पशुओंको बाँधना, इष्टि (पूजा), मन्त्र, यज्ञानुष्ठान और तप आदि समस्त क्रियाएँ आपकी ही कृपासे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यगणों द्वारा सम्पन्न की जाती हैं ॥ ५४ ॥ यदहर्ब्रह्मणः प्रोक्तं सहस्रयुगसम्मितम् । तस्य त्वमादिरन्तश्च कालज्ञैः परिकीर्तितः ॥ ५५ ॥ ब्रह्माजीका जो एक सहस्र युगोंका दिन बताया गया है, कालमानके जाननेवाले विद्वानोंने उसका आदि और अन्त आपको ही बताया है ॥ ५५ ॥ मनूनां मनुपुत्राणां जगतोऽमानवस्य च । मन्वन्तराणां सर्वेषामीश्वराणां त्वमीश्वरः ॥ ५६ ॥ मनु और मनुपुत्रोंके, जगत्के, (ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेवाले) अमानव पुरुषके, समस्त मन्वन्तरोंके तथा ईश्वरोंके भी ईश्वर आप ही हैं ॥ ५६ ॥ संहारकाले सम्प्राप्ते तव क्रोधविनिःसृतः । संवर्तकाग्निस्त्रैलोक्यं भस्मीकृत्यावतिष्ठते ॥ ५७ ॥ प्रलयकाल आनेपर आपके ही क्रोधसे प्रकट हुई संवर्तक नामक अग्नि तीनों लोकोंको भस्म करके फिर आपमें ही स्थित हो जाती है ॥ ५७ ॥ त्वद्दीधितिसमुत्पन्ना नानावर्णा महाघनाः । सैरावताः साशनयः कुर्वन्त्याभूतसम्प्लवम् ॥ ५८ ॥ आपकी ही किरणोंसे उत्पन्न हुए रंग-बिरंगे ऐरावत आदि महामेघ और बिजलियाँ सम्पूर्ण भूतोंका संहार करती हैं ॥ ५८ ॥ कृत्वा द्वादशधाऽऽत्मानं द्वादशादित्यतां गतः ।
संहृत्यैकार्णवं सर्वं त्वं शोषयसि रश्मिभिः ॥ ५९ ॥ फिर आप ही अपनेको बारह स्वरूपोंमें विभक्त करके बारह सूर्योंके रूपमें उदित हो अपनी किरणोंद्वारा त्रिलोकीका संहार करते हुए एकार्णवके समस्त जलको सोख लेते हैं ॥ ५९ ॥
त्वामिन्द्रमाहुस्त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः । त्वमग्निस्त्वं मनः सूक्ष्मं प्रभुस्त्वं ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ६० ॥ आपको ही इन्द्र कहते हैं। आप ही रुद्र, आप ही विष्णु और आप ही प्रजापति हैं। अग्नि, सूक्ष्म मन, प्रभु तथा सनातन ब्रह्म भी आप ही हैं ॥ ६० ॥
त्वं हंसः सविता भानुरंशुमाली वृषाकपिः । विवस्वान् मिहिरः पूषा मित्रो धर्मस्तथैव च ॥ ६१ ॥ सहस्ररश्मिरादित्यस्तपनस्त्वं गवाम्पतिः । मार्तण्डोऽर्को रविः सूर्यः शरण्यो दिनकृत् तथा ॥ ६२ ॥ दिवाकरः सप्तसप्तिर्धामकेशी विरोचनः । आशुगामी तमोघ्नश्च हरिताश्वश्च कीर्त्यसे ॥ ६३ ॥ आप ही हंस (शुद्धस्वरूप), सविता (जगत्की उत्पत्ति करनेवाले), भानु (प्रकाशमान), अंशुमाली (किरणसमूहसे सुशोभित), वृषाकपि (धर्मरक्षक), विवस्वान् (सर्वव्यापी), मिहिर (जलकी वृष्टि करनेवाले), पूषा (पोषक), मित्र (सबके सुहृद्), धर्म (धारण करनेवाले), सहस्ररश्मि (हजारों किरणोंवाले), आदित्य (अदितिपुत्र), तपन (तापकारी), गवाम्पति (किरणोंके स्वामी), मार्तण्ड, अर्क (अर्चनीय), रवि, सूर्य (उत्पादक), शरण्य (शरणागतकी रक्षा करनेवाले), दिनकृत् (दिनके कर्ता), दिवाकर (दिनको प्रकट करनेवाले), सप्तसप्ति (सात घोड़ोंवाले), धामकेशी (ज्योतिर्मय किरणोंवाले), विरोचन (देदीप्यमान), आशुगामी (शीघ्रगामी), तमोघ्न (अन्धकारनाशक) तथा हरिताश्व (हरे रंगके घोड़ोंवाले) कहे जाते हैं ॥ ६१—६३ ॥
सप्तम्यामथवा षष्ठ्यां भक्त्या पूजां करोति यः । अनिर्विण्णोऽनहंकारी तं लक्ष्मीर्भजते नरम् ॥ ६४ ॥ जो सप्तमी अथवा षष्ठीको खेद और अहंकारसे रहित हो भक्तिभावसे आपकी पूजा करता है, उस मनुष्यको लक्ष्मी प्राप्त होती है ॥ ६४ ॥
न तेषामापदः सन्ति नाधयो व्याधयस्तथा । ये तवानन्यमनसः कुर्वन्त्यर्चनवन्दनम् ॥ ६५ ॥ भगवन्! जो अनन्य चित्तसे आपकी अर्चना और वन्दना करते हैं, उनपर कभी आपत्ति नहीं आती। वे मानसिक चिन्ताओं तथा रोगोंसे भी ग्रस्त नहीं होते ॥ ६५ ॥
सर्वरोगैर्विरहिताः सर्वपापविवर्जिताः । त्वद्भावभक्ताः सुखिनो भवन्ति चिरजीविनः ॥ ६६ ॥
जो प्रेमपूर्वक आपके प्रति भक्ति रखते हैं वे समस्त रोगों तथा सम्पूर्ण पापोंसे रहित हो चिरंजीवी एवं सुखी होते हैं ।। ६६ ।।
त्वं ममापन्नकामस्य सर्वातिथ्यं चिकीर्षतः ।
अन्नमन्नपते दातुमभितः श्रद्धयार्हसि ।। ६७ ।।
अन्नपते! मैं श्रद्धापूर्वक सबका आतिथ्य करनेकी इच्छासे अन्न प्राप्त करना चाहता हूँ। आप मुझे अन्न देनेकी कृपा करें ।। ६७ ।।
ये च तेऽनुचराः सर्वे पादोपान्तं समाश्रिताः ।
माठरारुणदण्डाद्यास्तांस्तान् वन्देऽशनिक्षुभान् ।। ६८ ।।
आपके चरणोंके निकट रहनेवाले जो माठर, अरुण तथा दण्ड आदि अनुचर (गण) हैं, वे विद्युत्के प्रवर्तक हैं। मैं उन सबकी वन्दना करता हूँ ।। ६८ ।।
क्षुभया सहिता मैत्री याश्चान्या भूतमातरः ।
ताश्च सर्वा नमस्यामि पान्तु मां शरणागतम् ।। ६९ ।।
क्षुभाके साथ जो मैत्रीदेवी तथा गौरी, पद्मा आदि अन्य भूतमाताएँ हैं, उन सबको मैं नमस्कार करता हूँ। वे सभी मुझ शरणागतकी रक्षा करें ।। ६९ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवं स्तुतो महाराज भास्करो लोकभावनः ।
ततो दिवाकरः प्रीतो दर्शयामास पाण्डवम् ।
दीप्यमानः स्ववपुषा ज्वलन्निव हुताशनः ।। ७० ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज! जब युधिष्ठिरने लोकभावन भगवान् भास्करका इस प्रकार स्तवन किया, तब दिवाकरने प्रसन्न होकर उन पाण्डुकुमारको दर्शन दिया। उस समय उनके श्रीअंग प्रज्वलित अग्निके समान उद्भासित हो रहे थे ।। ७० ।।
विवस्वानुवाच
यत् तेऽभिलषितं किंचित् तत् त्वं सर्वमवाप्स्यसि ।
अहमन्नं प्रदास्यामि सप्त पञ्च च ते समाः ।। ७१ ।।
**भगवान् सूर्य बोले—**धर्मराज! तुम जो कुछ चाहते हो, वह सब तुम्हें प्राप्त होगा। मैं बारह वर्षोंतक तुम्हें अन्न प्रदान करूँगा ।। ७१ ।।
(इस पृष्ठ पर केवल चित्र उपस्थित है, कोई पाठ/श्लोक अंकित नहीं है।)
गीताप्रेस, गोरखपुर
पाण्डवोंका वनगमन
गीताप्रेस, गोरखपुर
उर्वशीका अर्जुनको शाप देना
गीताप्रेस, गोरखपुर
नलका अपने पूर्वरूपमें प्रकट होकर दमयन्तीसे मिलना
गीताप्रेस, गोरखपुर
जमदग्निका परशुरामसे कार्तवीर्य-अर्जुनका अपराध बताना
गीताप्रेस, गोरखपुर
महाप्रलयके समय भगवान् मत्स्यके सींगमें बँधी हुई मनु और सप्तर्षियोंसहित नौका
गीताप्रेस, गोरखपुर
मार्कण्डेय मुनिको अक्षयवटकी शाखापर बालमुकुन्दका दर्शन
गीताप्रेस, गोरखपुर
इन्द्रके द्वारा देवसेनाका स्कन्दको समर्पण
कौरवोंद्वारा विराटकी गायोंका हरण
गृहीष्व पिठरं ताम्रं मया दत्त नराधिप ।
यावद् वत्स्यति पाञ्चाली पात्रेणानेन सुव्रत ।। ७२ ।। फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे । चतुर्विधं तदन्नाद्यमक्षय्यं ते भविष्यति ।। ७३ ।। राजन्! यह मेरी दी हुई ताँबेकी बटलोई लो। सुव्रत! तुम्हारे रसोईघरमें इस पात्रद्वारा फल, मूल, भोजन करनेके योग्य अन्य पदार्थ तथा साग आदि जो चार प्रकारकी भोजन-सामग्री तैयार होगी, वह तबतक अक्षय बनी रहेगी, जबतक द्रौपदी स्वयं भोजन न करके परोसती रहेगी ।। ७२-७३ ।। इतश्चतुर्दशे वर्षे भूयो राज्यमवाप्स्यसि । आजसे चौदहवें वर्षमें तुम अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लोगे ।। ७३ ½ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ।। ७४ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! इतना कहकर भगवान् सूर्य वहीं अन्तर्धान हो गये ।। ७४ ।। इमं स्तवं प्रयतमनाः समाधिना पठेदिहान्योऽपि वरं समर्थयन् । तत् तस्य दद्याच्च रविर्मनीषितं तदाप्नुयाद् यद्यपि तत् सुदुर्लभम् ।। ७५ ।। जो कोई अन्य पुरुष भी मनको संयममें रखकर चित्तवृत्तियोंको एकाग्र करके इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह यदि कोई अत्यन्त दुर्लभ वर भी माँगे तो भगवान् सूर्य उसकी उस मनोवांछित वस्तुको दे सकते हैं ।। ७५ ।। यश्चेदं धारयेन्नित्यं शृणुयाद् वाप्यभीक्ष्णशः । पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम् । विद्यार्थी लभते विद्यां पुरुषोऽप्यथवा स्त्रियः ।। ७६ ।। जो प्रतिदिन इस स्तोत्रको धारण करता अथवा बार-बार सुनता है, वह यदि पुत्रार्थी हो तो पुत्र पाता है, धन चाहता हो तो धन पाता है, विद्याकी अभिलाषा रखता हो तो उसे विद्या प्राप्त होती है और पत्नीकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको पत्नी सुलभ होती है ।। ७६ ।। उभे संध्ये पठेन्नित्यं नारी वा पुरुषो यदि । आपदं प्राप्य मुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।। ७७ ।। स्त्री हो या पुरुष यदि दोनों संध्याओंके समय इस स्तोत्रका पाठ करता है तो आपत्तिमें पड़कर भी उससे मुक्त हो जाता है। बन्धनमें पड़ा हुआ मनुष्य बन्धनसे मुक्त हो जाता है ।। ७७ ।। एतद् ब्रह्मा ददौ पूर्वं शक्राय सुमहात्मने ।
शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यस्तु तदनन्तरम् । धौम्याद् युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान् कामानवाप्तवान् ॥ ७८ ॥ यह स्तुति सबसे पहले ब्रह्माजीने महात्मा इन्द्रको दी, इन्द्रसे नारदजीने और नारदजीसे धौम्यने इसे प्राप्त किया। धौम्यसे इसका उपदेश पाकर राजा युधिष्ठिरने अपनी सब कामनाएँ प्राप्त कर लीं ॥ ७८ ॥ संग्रामे च जयेन्नित्यं विपुलं चाप्नुयाद् वसु । मुच्यते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं स गच्छति ॥ ७९ ॥ जो इसका अनुष्ठान करता है वह सदा संग्राममें विजयी होता है, बहुत धन पाता है, सब पापोंसे मुक्त होता और अन्तमें सूर्यलोकको जाता है ॥ ७९ ॥
वैशम्पायन उवाच
लब्ध्वा वरं तु कौन्तेयो जलादुत्तीर्य धर्मवित् । जग्राह पादौ धौम्यस्य भ्रातॄंश्च परिषस्वजे ॥ ८० ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पूर्वोक्त वर पाकर धर्मके ज्ञाता कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर गंगाजीके जलसे बाहर निकले। उन्होंने धौम्यजीके दोनों चरण पकड़े और भाइयोंको हृदयसे लगा लिया ॥ ८० ॥ द्रौपद्या सह संगम्य वन्द्यमानस्तया प्रभुः । महानसे तदानीं तु साधयामास पाण्डवः ॥ ८१ ॥ द्रौपदीने उन्हें प्रणाम किया और वे उससे प्रेमपूर्वक मिले। फिर उसी समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने चूल्हेपर बटलोई रखकर रसोई तैयार करायी ॥ ८१ ॥ संस्कृतं प्रसवं याति स्वल्पमन्नं चतुर्विधम् । अक्षय्यं वर्धते चान्नं तेन भोजयते द्विजान् ॥ ८२ ॥ उसमें तैयार की हुई चार प्रकारकी थोड़ी-सी भी रसोई उस पात्रके प्रभावसे बढ़ जाती और अक्षय हो जाती थी। उसीसे वे ब्राह्मणोंको भोजन कराने लगे ॥ ८२ ॥ भुक्तवत्सु च विप्रेषु भोजयित्वानुजानपि । शेषं विघससंज्ञं तु पश्चाद् भुङ्क्ते युधिष्ठिरः ॥ ८३ ॥ ब्राह्मणोंके भोजन कर लेनेपर अपने छोटे भाइयोंको भी भोजन करानेके पश्चात् 'विघस' संज्ञक अवशिष्ट अन्नको युधिष्ठिर सबसे पीछे खाते थे ॥ ८३ ॥ युधिष्ठिरं भोजयित्वा शेषमश्नाति पार्षती । द्रौपद्यां भुज्यमानायां तदन्नं क्षयमेति च । एवं दिवाकरात् प्राप्य दिवाकरसमप्रभः ॥ ८४ ॥ कामान् मनोऽभिलषितान् ब्राह्मणेभ्योऽददात् प्रभुः । पुरोहितपुरोगाश्च तिथिनक्षत्रपर्वसु ।
यज्ञियार्थाः प्रवर्तन्ते विधिमन्त्रप्रमाणतः ॥ ८५ ॥
युधिष्ठिरको भोजन कराकर द्रौपदी शेष अन्न स्वयं खाती थी। द्रौपदीके भोजन कर लेनेपर उस पात्रका अन्न समाप्त हो जाता था। इस प्रकार सूर्यसे मनोवांछित वरोंको पाकर उन्हींके समान तेजस्वी प्रभावशाली राजा युधिष्ठिर ब्राह्मणोंको नियमपूर्वक अन्नदान करने लगे। पुरोहितोंको आगे करके उत्तम तिथि, नक्षत्र एवं पर्वोंपर विधि और मन्त्रके प्रमाणके अनुसार उनके यज्ञसम्बन्धी कार्य होने लगे ॥ ८४-८५ ॥
ततः कृतस्वस्त्ययना धौम्येन सह पाण्डवाः । द्विजसङ्घैः परिवृताः प्रययुः काम्यकं वनम् ॥ ८६ ॥
तदनन्तर स्वस्तिवाचन कराकर ब्राह्मणसमुदायसे घिरे हुए पाण्डव धौम्यजीके साथ काम्यकवनको चले गये ॥ ८६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि काम्यकवनप्रवेशे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें काम्यकवनप्रवेशविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
१. बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, आठ वसु, इन्द्र और प्रजापति—ये तैंतीस देवता हैं। २. सभापर्वके ११ वें अध्याय श्लोक ४६, ४७ में सात पितरोंके नाम इस प्रकार बताये हैं—वैराज, अग्निष्वात्त, सोमपा, गार्हपत्य, एकशृंग, चतुर्वेद और कला। * जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर—ये सात प्रधान द्वीप माने गये हैं। इनके सिवा, कई उपद्वीप हैं। उनको लेकर यहाँ १३ द्वीप बताये गये हैं।
अध्याय (पृष्ठ 72)
चतुर्थोऽध्यायः
विदुरजीका धृतराष्ट्रको हितकी सलाह देना और धृतराष्ट्रका रुष्ट होकर महलमें चला जाना
वैशम्पायन उवाच
वनं प्रविष्टेष्वथ पाण्डवेषु
प्रज्ञाचक्षुस्तप्यमानोऽम्बिकेयः ।
धर्मात्मानं विदुरमगाधबुद्धिं
सुखासीनो वाक्यमुवाच राजा ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! जब पाण्डव वनमें चले गये, तब प्रज्ञाचक्षु अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र मन-ही-मन संतप्त हो उठे। उन्होंने अगाधबुद्धि धर्मात्मा विदुरको बुलाकर स्वयं सुखद आसनपर बैठे हुए उनसे इस प्रकार कहा ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
प्रज्ञा च ते भार्गवस्येव शुद्धा
धर्मं च त्वं परमं वेत्थ सूक्ष्मम् ।
समश्च त्वं सम्मतः कौरवाणां
पथ्यं चैषां मम चैव ब्रवीहि ॥ २ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**विदुर! तुम्हारी बुद्धि शुक्राचार्यके समान शुद्ध है। तुम सूक्ष्म-से-सूक्ष्म श्रेष्ठ धर्मको जानते हो। तुम्हारी सबके प्रति समान दृष्टि है और कौरव तथा पाण्डव सभी तुम्हारा सम्मान करते हैं। अतः मेरे तथा इन पाण्डवोंके लिये जो हितकर कार्य हो, वह मुझे बताओ ॥ २ ॥
एवंगते विदुर यदद्य कार्यं
पौराश्च मे कथमस्मान् भजेरन् ।
ते चाप्यस्मान् नोद्धरेयुः समूलां-
स्तत्त्वं ब्रूयाः साधुकार्याणि वेत्सि ॥ ३ ॥
विदुर! ऐसी दशामें अब हमारा जो कर्तव्य हो वह बताओ। ये पुरवासी कैसे हमलोगोंसे प्रेम करेंगे। तुम ऐसा कोई उपाय बताओ जिससे वे पाण्डव हमलोगोंको जड़-मूलसहित उखाड़ न फेंकें। तुम अच्छे कार्योंको जानते हो। अतः हमें ठीक-ठीक कर्तव्यका निर्देश करो ॥ ३ ॥
विदुर उवाच
त्रिवर्गोऽयं धर्ममूलो नरेन्द्र
राज्यं चेदं धर्ममूलं वदन्ति ।
धर्मे राजन् वर्तमानः स्वशक्त्या
पुत्रान् सर्वान् पाहि पाण्डोःसुतांश्च ॥ ४ ॥
**विदुरजीने कहा—**नरेन्द्र! धर्म, अर्थ और काम इन तीनोंकी प्राप्तिका मूल कारण धर्म ही है। धर्मात्मा पुरुष इस राज्यकी जड़ भी धर्मको ही बतलाते हैं, अतः महाराज! आप धर्मके मार्गपर स्थिर रहकर यथाशक्ति अपने तथा पाण्डुके सब पुत्रोंका पालन कीजिये ॥ ४ ॥
स वै धर्मो विप्रलब्धः सभायां
पापात्मभिः सौबलेयप्रधानैः ।
आहूय कुन्तीसुतमक्षवत्यां
पराजैषीत् सत्यसंधं सुतस्ते ॥ ५ ॥
शकुनि आदि पापात्माओंने द्यूतसभामें उस धर्मके साथ विश्वासघात किया; क्योंकि आपके पुत्रने सत्य-प्रतिज्ञ कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको बुलाकर उन्हें कपटपूर्वक पराजित किया है ॥ ५ ॥
एतस्य ते दुष्प्रणीतस्य राजन्
शेषस्याहं परिपश्याम्युपायम् ।
यथा पुत्रस्तव कौरव्य पापा-
न्मुक्तो लोके प्रतितिष्ठेत साधु ॥ ६ ॥
कुरुराज! दुरात्माओंद्वारा पाण्डवोंके प्रति किये हुए इस दुर्व्यवहारकी शान्तिका उपाय मैं जानता हूँ, जिससे आपका पुत्र दुर्योधन पापसे मुक्त हो लोकमें भलीभाँति प्रतिष्ठा प्राप्त करे ॥ ६ ॥
तद् वै सर्वं पाण्डुपुत्रा लभन्तां
यत् तद् राजन्नभिसृष्टं त्वयाऽऽसीत् ।
एष धर्मः परमो यत् स्वकेन
राजा तुष्येन्न परस्वेषु गृध्येत् ॥ ७ ॥
आपने पाण्डवोंको जो राज्य दिया था, वह सब उन्हें मिल जाना चाहिये। राजाके लिये यह सबसे बड़ा धर्म है कि वह अपने धनसे संतुष्ट रहे। दूसरेके धनपर लोभभरी दृष्टि न डाले ॥ ७ ॥
यशो न नश्येज्ज्ञातिभेदश्च न स्याद्
धर्मो न स्यान्नैव चैवं कृते त्वाम् ।
एतत् कार्यं तव सर्वप्रधानं
तेषां तुष्टिः शकुनेश्चावमानः ॥ ८ ॥
ऐसा कर लेनेपर आपके यशका नाश नहीं होगा, भाइयोंमें फूट नहीं होगी और आपको धर्मकी भी प्राप्ति होगी। आपके लिये सबसे प्रमुख कार्य यह है कि पाण्डवोंको संतुष्ट करें और शकुनिका तिरस्कार करें ।। ८ ।। एवं शेषं यदि पुत्रेषु ते स्या- देतद् राजंस्त्वरमाणः कुरुष्व । तथैतदेवं न करोषि राजन् ध्रुवं कुरूणां भविता विनाशः ।। ९ ।। राजन्! ऐसा करनेपर भी यदि आपके पुत्रोंका भाग्य शेष होगा तो उनका राज्य उनके पास रह जायगा; अतः आप शीघ्र ही यह काम कर डालिये। महाराज! यदि आप ऐसा न करेंगे तो कौरवकुलका निश्चय ही नाश हो जायगा ।। ९ ।। न हि क्रुद्धो भीमसेनोऽर्जुनो वा शेषं कुर्याच्छात्रवाणामनीके । येषां योद्धा सव्यसाची कृतास्त्रो धनुर्येषां गाण्डिवं लोकसारम् ।। १० ।। येषां भीमो बाहुशाली च योद्धा तेषां लोके किं नु न प्राप्यमस्ति । उक्तं पूर्वं जातमात्रे सुते ते मया यत् ते हितमासीत् तदानीम् ।। ११ ।। क्रोधमें भरे हुए भीमसेन अथवा अर्जुन अपने शत्रुओंकी सेनामें किसीको जीवित नहीं छोड़ेंगे। अस्त्रविद्यामें निपुण सव्यसाची अर्जुन जिनके योद्धा हैं, सम्पूर्ण लोकोंका सारभूत गाण्डीव जिनका धनुष है तथा अपने बाहुबलसे सुशोभित होनेवाले भीमसेन जिनकी ओरसे युद्ध करनेवाले हैं, उन पाण्डवोंके लिये संसारमें ऐसी कौन-सी वस्तु है जो प्राप्त न हो सके। आपके पुत्र दुर्योधनके जन्म लेते ही मुझे उस समय जो हितकी बात जान पड़ी, वह मैंने पहले ही बता दी थी ।। १०-११ ।। पुत्रं त्यजेममहितं कुलस्य हितं परं न च तत् त्वं चकर्थ । इदं च राजन् हितमुक्तं न चेत् त्व- मेवं कर्ता परितप्तासि पश्चात् ।। १२ ।। मैंने साफ कह दिया था कि आपका यह पुत्र समस्त कुलका अहित करनेवाला है, अतः इसको त्याग दीजिये; परंतु आपने मेरी उत्तम और सात्त्विक सलाहके अनुसार कार्य नहीं किया। राजन्! इस समय भी मैंने जो यह आपके हितकी बात बतायी है यदि उसे आप नहीं करेंगे तो आपको बहुत पश्चात्ताप करना पड़ेगा ।। १२ ।। यद्येतदेवमनुमन्ता सुतस्ते
सम्प्रीयमाणः पाण्डवैरेकराज्यम् । तापो न ते भविता प्रीतियोगा- न्न चेन्निगृह्णीष्व सुतं सुखाय ॥ १३ ॥ यदि आपका पुत्र दुर्योधन प्रसन्नतापूर्वक पाण्डवोंके साथ एक राज्य बनानेकी बात मान ले तो आपको पश्चात्ताप नहीं होगा, प्रसन्नता ही प्राप्त होगी। यदि दुर्योधन आपकी बात न माने तो समस्त कुलको सुख पहुँचानेके लिये आप अपने उस पुत्रपर नियन्त्रण कीजिये ॥ १३ ॥
दुर्योधनं त्वहितं वै निगृह्य पाण्डोः पुत्रं कुरुष्वाधिपत्ये । अजातशत्रुर्हि विमुक्तरागो धर्मेणेमां पृथिवीं शास्तु राजन् ॥ १४ ॥ इस प्रकार अहितकारक दुर्योधनको काबूमें करके आप पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको राज्यपर अभिषिक्त कर दीजिये; क्योंकि वे अजातशत्रु हैं। उनका किसीसे राग या द्वेष नहीं है। राजन्! वे ही इस पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन करेंगे ॥ १४ ॥
ततो राजन् पार्थिवाः सर्व एव वैश्या इवास्मानुपतिष्ठन्तु सद्यः । दुर्योधनः शकुनिः सूतपुत्रः प्रीत्या राजन् पाण्डुपुत्रान् भजन्तु ॥ १५ ॥ महाराज! यदि ऐसा हुआ तो भूमण्डलके समस्त राजा वैश्योंकी भाँति उपहार ले हम कौरवोंकी सेवामें शीघ्र उपस्थित होंगे। राजराजेश्वर! दुर्योधन, शकुनि तथा सूतपुत्र कर्ण प्रेमपूर्वक पाण्डवोंको अपनावें ॥ १५ ॥
दुःशासनो याचतु भीमसेनं सभामध्ये द्रुपदस्यात्मजां च । युधिष्ठिरं त्वं परिसान्त्वयस्व राज्ये चैनं स्थापयस्वाभिपूज्य ॥ १६ ॥ दुःशासन भरी सभामें भीमसेन तथा द्रौपदीसे क्षमा माँगे और आप युधिष्ठिरको भलीभाँति सान्त्वना दे सम्मानपूर्वक इस राज्यपर बिठा दीजिये ॥ १६ ॥
त्वया पृष्टः किमहमन्यद् वदेय- मेतत् कृत्वा कृतकृत्योऽसि राजन् ॥ १७ ॥ कुरुराज! आपने हितकी बात पूछी है तो मैं इसके सिवा और क्या बताऊँ। यह सब कर लेनेपर आप कृतकृत्य हो जायेंगे ॥ १७ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
एतद् वाक्यं विदुर यत् ते सभाया- मिह प्रोक्तं पाण्डवान् प्राप्य मां च । हितं तेषामहितं मामकाना- मेतत् सर्वं मम नैवैति चेतः ॥ १८ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—विदुर! तुमने यहाँ सभामें पाण्डवोंके तथा मेरे विषयमें जो बात कही है वह पाण्डवोंके लिये तो हितकर है, पर मेरे पुत्रोंके लिये अहितकारक है, अतः यह सब मेरा मन स्वीकार नहीं करता है ॥ १८ ॥
इदं त्विदानीं गत एव निश्चितं तेषामर्थे पाण्डवानां यदात्थ । तेनाद्य मन्ये नासि हितो ममेति कथं हि पुत्रं पाण्डवार्थे त्यजेयम् ॥ १९ ॥
इस समय तुम जो कुछ कह रहे हो इससे यह भलीभाँति निश्चय होता है कि तुम पाण्डवोंके हितके लिये ही यहाँ आये थे। तुम्हारे आजके ही व्यवहारसे मैं समझ गया कि तुम मेरे हितैषी नहीं हो। मैं पाण्डवोंके लिये अपने पुत्रोंको कैसे त्याग दूँ ॥ १९ ॥
असंशयं तेऽपि ममैव पुत्रा दुर्योधनस्तु मम देहात् प्रसूतः । स्वं वै देहं परहेतोस्त्यजेति को नु ब्रूयात् समतामन्ववेक्ष्य ॥ २० ॥
इसमें संदेह नहीं कि पाण्डव भी मेरे पुत्र हैं, पर दुर्योधन साक्षात् मेरे शरीरसे उत्पन्न हुआ है। समताकी ओर दृष्टि रखते हुए भी कौन किसको ऐसी बातें कहेगा कि तुम दूसरेके हितके लिये अपने शरीरका त्याग कर दो ॥ २० ॥
स मां जिह्मं विदुर सर्वं ब्रवीषि मानं च तेऽहमधिकं धारयामि । यथेच्छकं गच्छ वा तिष्ठ वा त्वं सुसान्त्व्यमानाप्यसती स्त्री जहाति ॥ २१ ॥
विदुर! मैं तुम्हारा अधिक सम्मान करता हूँ; किंतु तुम मुझे सब कुटिलतापूर्ण सलाह दे रहे हो। अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो, चले जाओ या रहो। तुमसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। कुलटा स्त्रीको कितनी ही सान्त्वना दी जाय, वह स्वामीको त्याग ही देती है ॥ २१ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतावदुक्त्वा धृतराष्ट्रोऽन्वपद्य- दन्तर्वेश्म सहसोत्थाय राजन् । नेदमस्तीत्यथ विदुरो भाषमाणः