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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 648)

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षडशीतितमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका धौम्य मुनिसे पुण्य तपोवन, आश्रम एवं नदी आदिके विषयमें पूछना

वैशम्पायन उवाच

भ्रातॄणां मतमाज्ञाय नारदस्य च धीमतः ।
पितामहसमं धौम्यं प्राह राजा युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अपने भाइयों तथा परम बुद्धिमान् देवर्षि नारदकी सम्मति जानकर राजा युधिष्ठिरने पितामहके समान प्रभावशाली पुरोहित धौम्यजीसे कहा— ॥ १ ॥

मया स पुरुषव्याघ्रो जिष्णुः सत्यपराक्रमः ।
अस्त्रहेतोर्महाबाहुरमितात्मा विवासितः ॥ २ ॥
‘ब्रह्मन्! मैंने अस्त्रप्राप्तिके लिये विजयी सत्य-पराक्रमी, महामना एवं प्रतापी पुरुषसिंह महाबाहु अर्जुनको निर्वासित कर रखा है ॥ २ ॥

स हि वीरोऽनुरक्तश्च समर्थश्च तपोधनः ।
कृती च भृशमप्यस्त्रे वासुदेव इव प्रभुः ॥ ३ ॥
‘वह वीर मुझमें अनुराग रखनेवाला, सामर्थ्यशाली, तपस्याका धनी, पुण्यात्मा और अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञानमें भगवान् श्रीकृष्णकी भाँति प्रभावशाली है ॥ ३ ॥

अहं ह्येतावुभौ ब्रह्मन् कृष्णावरिविघातिनौ ।
अभिजानामि विक्रान्तौ तथा व्यासः प्रतापवान् ॥ ४ ॥
‘विप्रवर! मैं इन दोनों कृष्णनामधारी वीरोंको शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ और महापराक्रमी समझता हूँ। महाप्रतापी वेदव्यासजीकी भी यही धारणा है ॥ ४ ॥

त्रियुगौ पुण्डरीकाक्षौ वासुदेवधनंजयौ ।
नारदोऽपि तथा वेद योऽप्यशंसत् सदा मम ॥ ५ ॥
‘कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन तीन युगोंसे सदा साथ रहते आये हैं। नारदजी भी इन दोनोंको इसी रूपमें जानते हैं; और सदा मुझसे इस बातकी चर्चा करते रहते हैं ॥ ५ ॥

तथाहमपि जानामि नरनारायणावृषी ।
शक्तोऽयमित्यतो मत्वा मया स प्रेषितोऽर्जुनः ॥ ६ ॥
इन्द्रादनवरः शक्रं सुरसूनुः सुराधिपम् ।
द्रष्टुमस्त्राणि चादातुमिन्द्रादिति विवासितः ॥ ७ ॥

भीष्मद्रोणावतिरथौ कृपो द्रौणिश्च दुर्जयः । धृतराष्ट्रस्य पुत्रेण वृता युधि महारथाः ॥ ८ ॥ ‘मैं भी ऐसा ही समझता हूँ कि श्रीकृष्ण और अर्जुन सुप्रसिद्ध नर-नारायण ऋषि हैं। अर्जुनको शक्तिशाली समझकर ही मैंने उसे दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिके लिये भेजा है। देवपुत्र अर्जुन इन्द्रसे कम नहीं हैं। यह जानकर ही मैंने उसे देवराज इन्द्रका दर्शन करने और उनसे दिव्यास्त्रोंको प्राप्त करनेके लिये भेजा है। भीष्म और द्रोण अतिरथी वीर हैं। कृपाचार्य तथा अश्वत्थामाको भी जीतना कठिन है। धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने इन सभी महारथियोंको युद्धके लिये वरण कर लिया है ॥ ६—८ ॥

सर्वे वेदविदः शूराः सर्वास्त्रविदुषस्तथा । योद्धुकामाश्च पार्थेन सततं ये महाबलाः । स च दिव्यास्त्रवित् कर्णः सूतपुत्रो महारथः ॥ ९ ॥ ‘वे सब-के-सब वेदज्ञ, शूरवीर, सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता, महाबली और सदा अर्जुनके साथ युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले हैं। वह सूतपुत्र महारथी कर्ण भी दिव्यास्त्रोंका ज्ञाता है ॥ ९ ॥

योऽस्त्रवेगानिलबलः शरार्चिस्तलनिःस्वनः । रजोधूमोऽस्त्रसम्पातो धार्तराष्ट्रानिलोद्धतः ॥ १० ॥ निसृष्ट इव कालेन युगान्ते ज्वलनो महान् । मम सैन्यमयं कक्षं प्रधक्ष्यति न संशयः ॥ ११ ॥ ‘कालने उसे प्रलयकालीन संवर्तक नामक महान् अग्निके समान उत्पन्न किया है। अस्त्रोंका वेग ही उसका वायुतुल्य बल है। बाण ही उसकी ज्वाला हैं। हथेलीसे होनेवाली आवाज ही उस दाहक अग्निका शब्द है। युद्धमें उठनेवाली धूल ही उस कर्णरूपी अग्निका धूम है। अस्त्रोंकी वर्षा ही उसकी लपटोंका लगना है। धृतराष्ट्र-पुत्ररूपी वायुका सहारा पाकर वह और भी उद्धत एवं प्रज्वलित हो उठा है। इसमें संदेह नहीं कि वह मेरी सेनाको सूखे तिनकोंकी राशिके समान भस्म कर डालेगा ॥ १०-११ ॥

तं स कृष्णानिलोद्धूतो दिव्यास्त्रज्वलनो महान् । श्वेतवाजिबलाकाभृद् गाण्डीवेन्द्रायुधोल्बणः ॥ १२ ॥ संरब्धः शरधाराभिः सुदीप्तं कर्णपावकम् । अर्जुनोदीरितो मेघः शमयिष्यति संयुगे ॥ १३ ॥ स साक्षादेव सर्वाणि शक्रात् परपुरंजयः । दिव्यान्यस्त्राणि बीभत्सुस्ततश्च प्रतिपत्स्यते ॥ १४ ॥ ‘उस आगको युद्धमें अर्जुन नामक महामेघ ही बुझा सकेगा। श्रीकृष्णरूपी वायुका सहारा पाकर ही वह मेघ उठेगा। दिव्यास्त्रोंका प्रकाश ही उसमें बिजलीकी चमक होगी। रथके श्वेत घोड़े ही उसके निकट उड़नेवाली बकपंक्तियोंकी भाँति सुशोभित होंगे। गाण्डीव

धनुष ही इन्द्रधनुषके समान दुःसह दृश्य उपस्थित करनेवाला होगा। वह क्रोधमें भरकर बाणरूपी जलकी धारासे कर्णरूपी प्रज्वलित अग्निको निश्चय ही शान्त कर देगा। शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाला अर्जुन साक्षात् इन्द्रसे सारे दिव्यास्त्र प्राप्त करेगा ।। १२—१४ ।।

अलं स तेषां सर्वेषामिति मे धीयते मतिः ।
नास्ति त्वतिकृतार्थानां रणेऽरीणां प्रतिक्रिया ।। १५ ।।
‘धृतराष्ट्र-पक्षके उक्त सभी महारथियोंको जीतनेके लिये वह अकेला ही पर्याप्त होगा; ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है। अन्यथा अत्यन्त कृतार्थताका अनुभव करनेवाले शत्रुओंको दबानेका और कोई उपाय नहीं है ।।

ते वयं पाण्डवं सर्वे गृहीतास्त्रमरिंदमम् ।
द्रष्टारो न हि बीभत्सुर्भारमुद्यम्य सीदति ।। १६ ।।
‘अतः हम शत्रुहन्ता पाण्डुनन्दन अर्जुनको अवश्य ही सब दिव्यास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करके आया हुआ देखेंगे; क्योंकि वह वीर किसी कार्य-भारको उठाकर उसे पूर्ण किये बिना कभी श्रान्त नहीं होता ।। १६ ।।

वयं तु तमृते वीरं वनेऽस्मिन् द्विपदां वर ।
अवधानं न गच्छामः काम्यके सह कृष्णया ।। १७ ।।
‘नरश्रेष्ठ! इस काम्यकवनमें वीर अर्जुनके बिना द्रौपदीसहित हम सब पाण्डवोंका मन बिलकुल नहीं लग रहा है ।। १७ ।।

भवानन्यद् वनं साधु बह्वन्नं फलवच्छुचि ।
आख्यातु रमणीयं च सेवितं पुण्यकर्मभिः ।। १८ ।।
‘इसलिये आप हमें किसी ऐसे रमणीय वनका पता बतायें जो बहुत अच्छा, पवित्र, प्रचुर अन्न और फलसे सम्पन्न तथा पुण्यात्मा पुरुषोंद्वारा सेवित हो ।। १८ ।।

यत्र कंचिद् वयं कालं वसन्तः सत्यविक्रमम् ।
प्रतीक्षामोऽर्जुनं वीरं वृष्टिकामा इवाम्बुदम् ।। १९ ।।
‘यहाँ हमलोग कुछ काल रहकर सत्यपराक्रमी वीर अर्जुनके आगमनकी उसी प्रकार प्रतीक्षा करें, जैसे वृष्टिकी इच्छा रखनेवाले किसान बादलोंकी राह देखते हैं ।। १९ ।।

विविधानाश्रमान् कांश्चिद् द्विजातिभ्यः प्रतिश्रुतान् ।
सरांसि सरितश्चैव रमणीयांश्च पर्वतान् ।। २० ।।
आचक्ष्व न हि मे ब्रह्मन् रोचते तमृतेऽर्जुनम् ।
वनेऽस्मिन् काम्यके वासो गच्छामोऽन्यां दिशं प्रति ।। २१ ।।
‘ब्रह्मन्! आप दूसरे ब्राह्मणोंसे सुने हुए नाना प्रकारके कतिपय आश्रमों, सरोवरों, सरिताओं तथा रमणीय पर्वतोंका पता बताइये। अर्जुनके बिना अब काम्यकवनमें रहना हमें अच्छा नहीं लगता; इसलिये अब दूसरी दिशाको चलेंगे’ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायां षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें धौम्यकी तीर्थयात्राविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥

धौम्यद्वारा पूर्वदिशाके तीर्थोंका वर्णन

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सप्ताशीतितमोऽध्यायः

धौम्यद्वारा पूर्वदिशाके तीर्थोंका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

तान् सर्वानुत्सुकान् दृष्ट्वा पाण्डवान् दीनचेतसः ।
आश्वासयंस्तथा धौम्यो बृहस्पतिसमोऽब्रवीत् ॥ १ ॥
ब्राह्मणानुमतान् पुण्यानाश्रमान् भरतर्षभ ।
दिशस्तीर्थानि शैलांश्च शृणु मे वदतोऽनघ ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! पाण्डवोंका चित्त अर्जुनके लिये अत्यन्त दीन हो रहा था। वे सब-के-सब उनसे मिलनेको उत्सुक थे। उनकी ऐसी अवस्था देखकर बृहस्पतिके समान तेजस्वी महर्षि धौम्यने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—'पापरहित भरतकुलभूषण! ब्राह्मणलोग जिन्हें आदर देते हैं, उन पुण्य आश्रमों, दिशाओं, तीर्थों और पर्वतोंका मैं वर्णन करता हूँ, सुनो ॥

याञ्छ्रुत्वा गदतो राजन् विशोको भवितासि ह ।
द्रौपद्या चानया सार्धं भ्रातृभिश्च नरेश्वर ॥ ३ ॥
'नरेश्वर! राजन्! मेरे मुखसे उन सबका वर्णन सुनकर तुम द्रौपदी तथा भाइयोंके साथ शोकरहित हो जाओगे ॥ ३ ॥

श्रवणाच्चैव तेषां त्वं पुण्यमाप्स्यसि पाण्डव ।
गत्वा शतगुणं चैव तेभ्य एव नरोत्तम ॥ ४ ॥
'नरश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन! उनका श्रवण करनेमात्रसे तुम्हें उनके सेवनका पुण्य प्राप्त होगा; और वहाँ जानेसे सौगुने पुण्यकी प्राप्ति होगी ॥ ४ ॥

पूर्वं प्राचीं दिशं राजन् राजर्षिगणसेविताम् ।
रम्यां ते कथयिष्यामि युधिष्ठिर यथास्मृति ॥ ५ ॥
'महाराज युधिष्ठिर! मैं अपनी स्मरणशक्तिके अनुसार सबसे पहले राजर्षिगणोंद्वारा सेवित रमणीय प्राची दिशाका वर्णन करूँगा ॥ ५ ॥

तस्यां देवर्षिजुष्टायां नैमिषं नाम भारत ।
यत्र तीर्थानि देवानां पुण्यानि च पृथक् पृथक् ॥ ६ ॥
'भरतनन्दन! देवर्षिसेवित प्राची दिशामें नैमिष नामक तीर्थ है, जहाँ भिन्न-भिन्न देवताओंके अलग-अलग पुण्यतीर्थ हैं ॥ ६ ॥

यत्र सा गोमती पुण्या रम्या देवर्षिसेविता ।
यज्ञभूमिश्च देवानां शामित्रं च विवस्वतः ॥ ७ ॥

'जहाँ देवर्षिसेवित परम रमणीय पुण्यमयी गोमती नदी है। देवताओंकी यज्ञभूमि और सूर्यका यज्ञपात्र विद्यमान है ।। ७ ।।
तस्यां गिरिवरः पुण्यो गयो राजर्षिसत्कृतः ।
शिवं ब्रह्मसरो यत्र सेवितं त्रिदशर्षिभिः ।। ८ ।।
'प्राची दिशामें ही पुण्य पर्वतश्रेष्ठ गय है जो राजर्षि गयके द्वारा सम्मानित हुआ है। वहाँ कल्याणमय ब्रह्मसरोवर है जिसका देवर्षिगण सेवन करते हैं ।। ८ ।।
यदर्थे पुरुषव्याघ्र कीर्तयन्ति पुरातनाः ।
एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् ।। ९ ।।
यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ।
उत्तारयति संतत्या दशपूर्वान् दशावरान् ।। १० ।।
'पुरुषसिंह! उस गयाके विषयमें ही प्राचीनलोग यह कहा करते हैं कि 'बहुत-से पुत्रोंकी इच्छा करनी चाहिये; सम्भव है उनमेंसे एक भी गया जाय या अश्वमेधयज्ञ करे अथवा नीलवृषका* उत्सर्ग करे। ऐसा पुरुष अपनी संततिद्वारा दस पहलेकी और दस बादकी पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है' ।। ९-१० ।।
महानदी च तत्रैव तथा गयशिरो नृप ।
यत्रासौ कीर्त्यते विप्रैरक्षय्यकरणो वटः ।। ११ ।।
'राजन्! वहीं महानदी और गयशीर्षतीर्थ है, जहाँ ब्राह्मणोंने अक्षयवटकी स्थिति बतायी है जिसके जड़ और शाखा आदि उपकरण कभी नष्ट नहीं होते ।। ११ ।।
यत्र दत्तं पितृभ्योऽन्नमक्षय्यं भवति प्रभो ।
सा च पुण्यजला तत्र फल्गुर्नाम महानदी ।। १२ ।।
बहुमूलफला चापि कौशिकी भरतर्षभ ।
विश्वामित्रोऽध्यगाद् यत्र ब्राह्मणत्वं तपोधनः ।। १३ ।।
'प्रभो! वहाँ पितरोंके लिये दिया हुआ अन्न अक्षय होता है। भरतश्रेष्ठ! वहीं फल्गु नामवाली पुण्यसलिला महानदी है और वहीं बहुत-से फल-मूलोंवाली कौशिकी नदी प्रवाहित होती है जहाँ तपोधन विश्वामित्र ब्राह्मणत्वको प्राप्त हुए थे ।। १२-१३ ।।
गङ्गा यत्र नदी पुण्या यस्यास्तीरे भगीरथः ।
अयजत् तत्र बहुभिः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ।। १४ ।।
'पूर्वदिशामें ही पुण्यनदी गङ्गा बहती है, जिसके तटपर राजा भगीरथने प्रचुर दक्षिणावाले बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ।। १४ ।।
पञ्चालेषु च कौरव्य कथयन्त्युत्पलावनम् ।

विश्वामित्रोऽयजद् यत्र पुत्रेण सह कौशिकः ॥ १५ ॥ ‘कुरुनन्दन! पंचालदेशमें ऋषिलोग उत्पलावन बतलाते हैं, जहाँ कुशिकनन्दन विश्वामित्रने अपने पुत्रके साथ यज्ञ किया था ॥ १५ ॥

यत्रानुवंशं भगवाञ्जामदग्न्यस्तथा जगौ । विश्वामित्रस्य तां दृष्ट्वा विभूतिमतिमानुषीम् ॥ १६ ॥ ‘उसी यज्ञमें विश्वामित्रका अलौकिक वैभव देखकर जमदग्निनन्दन परशुरामने उनके वंशके अनुरूप यशका वर्णन किया था ॥ १६ ॥

कान्यकुब्जेऽपिबत् सोममिन्द्रेण सह कौशिकः । ततः क्षत्रादपाक्रामद् ब्राह्मणोऽस्मीति चाब्रवीत् ॥ १७ ॥ ‘विश्वामित्रजीने कान्यकुब्जदेशमें इन्द्रके साथ सोमपान किया; वहीं वे क्षत्रियत्वसे ऊपर उठ गये और ‘मैं ब्राह्मण हूँ’ यह बात घोषित कर दी ॥ १७ ॥

पवित्रमृषिभिर्जुष्टं पुण्यं पावनमुत्तमम् । गङ्गायमुनयोर्वीर संगमं लोकविश्रुतम् ॥ १८ ॥ ‘वीरवर! गंगा और यमुनाका परम उत्तम पुण्यमय पवित्र संगम सम्पूर्ण जगत्में विख्यात है और बड़े-बड़े महर्षि उसका सेवन करते हैं ॥ १८ ॥

यत्रायजत भूतात्मा पूर्वमेव पितामहः । प्रयागमिति विख्यातं तस्माद् भरतसत्तम ॥ १९ ॥ ‘जहाँ समस्त प्राणियोंके आत्मा भगवान् ब्रह्माजीने पहले ही यज्ञ किया था। भरतकुलभूषण! ब्रह्माजीके उस प्रकृष्टयागसे ही उस स्थानका नाम ‘प्रयाग’ हो गया ॥

अगस्त्यस्य तु राजेन्द्र तत्राश्रमवरो नृप । तत् तथा तापसारण्यं तापसैरुपशोभितम् ॥ २० ॥ ‘राजेन्द्र! वहाँ महर्षि अगस्त्यका श्रेष्ठ आश्रम है। इसी प्रकार तापसारण्य तपस्वीजनोंसे सुशोभित है ॥ २० ॥

हिरण्यबिन्दुः कथितो गिरौ कालञ्जरे महान् । आगस्त्यपर्वतो रम्यः पुण्यो गिरिवरः शिवः ॥ २१ ॥ ‘कालञ्जर पर्वतपर हिरण्यबिन्दु नामसे प्रसिद्ध महान् तीर्थ बताया गया है। आगस्त्यपर्वत बहुत ही रमणीय, पवित्र, श्रेष्ठ एवं कल्याणस्वरूप है ॥ २१ ॥

महेन्द्रो नाम कौरव्य भार्गवस्य महात्मनः । अयजत् तत्र कौन्तेय पूर्वमेव पितामहः ॥ २२ ॥ ‘कुरुनन्दन! महात्मा भार्गवका निवासस्थान महेन्द्र-पर्वत है। कुन्तीनन्दन! वहाँ ब्रह्माजीने पूर्वकालमें यज्ञ किया था ॥ २२ ॥

यत्र भागीरथी पुण्या सरस्यासीद् युधिष्ठिर ।

यत्र सा ब्रह्मशालेति पुण्या ख्याता विशाम्पते ।। २३ ।।
धूतपाप्मभिराकीर्णा पुण्यं तस्याश्च दर्शनम्।
‘युधिष्ठिर! जहाँ पुण्यसलिला भागीरथी गंगा सरोवरमें स्थित थी। महाराज! जहाँपर उन्हें ‘ब्रह्मशाला’ यह पवित्र नाम दिया गया है। वह पुण्यतीर्थ निष्पाप मनुष्योंसे व्याप्त है; उसका दर्शन पुण्यमय बताया गया है ।।
पवित्रो मङ्गलीयश्च ख्यातो लोके महात्मनः ।। २४ ।।
केदारश्च मतङ्गस्य महानाश्रम उत्तमः ।
कुण्डोदः पर्वतो रम्यो बहुमूलफलोदकः ।। २५ ।।
नैषधस्तृषितो यत्र जलं शर्म च लब्धवान् ।
‘वहीं महात्मा मतंगऋषिका महान् एवं उत्तम आश्रम केदारतीर्थ है। वह परम पवित्र, मंगलकारी और लोकमें विख्यात है। कुण्डोद नामक रमणीय पर्वत बहुत फल-मूल और जलसे सम्पन्न है, जहाँ प्यासे हुए निषधनरेशको जल और शान्तिकी उपलब्धि हुई थी ।।
यत्र देववनं पुण्यं तापसैरुपशोभितम् ।। २६ ।।
बाहुदा च नदी यत्र नन्दा च गिरिमूर्धनि ।
‘वहीं तपस्वीजनोंसे सुशोभित पवित्र देववन नामक पुण्यक्षेत्र है, जहाँ पर्वतके शिखरपर बाहुदा और नन्दा नदी बहती हैं ।। २६½ ।।
तीर्थानि सरितः शैलाः पुण्यान्यायतनानि च ।। २७ ।।
प्राच्यां दिशि महाराज कीर्तितानि मया तव ।
तिसृष्वन्यानि पुण्यानि दिक्षु तीर्थानि मे शृणु ।
सरितः पर्वतांश्चैव पुण्यान्यायतनानि च ।। २८ ।।
‘महाराज! पूर्वदिशामें जो बहुत-से तीर्थ, नदियाँ, पर्वत और पुण्य मन्दिर आदि हैं, उनका मैंने तुमसे (संक्षेपमें) वर्णन किया है। अब शेष तीन दिशाओंके सरिताओं, पर्वतों और पुण्यस्थानोंका वर्णन करता हूँ, सुनो’ ।। २७-२८ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायां
सप्ताशीतितमोऽध्यायः ।। ८७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें
धौम्यतीर्थयात्राविषयक सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८७ ।।


* लोहितो यस्तु वर्णेन पुच्छाग्रेण तु पाण्डुरः । श्वेतः खुरविषाणाभ्यां स नीलो वृष उच्यते ।।
जिसका रंग तो लाल हो पर पूँछका अग्रभाग सफेद हो एवं खुर और सींग भी सफेद हों, वह नील वृष कहा जाता है।

धौम्यमुनिके द्वारा दक्षिण दिशावर्ती तीर्थोंका वर्णन

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अष्टाशीतितमोऽध्यायः

धौम्यमुनिके द्वारा दक्षिण दिशावर्ती तीर्थोंका वर्णन

धौम्य उवाच

दक्षिणस्यां तु पुण्यानि शृणु तीर्थानि भारत ।
विस्तरेण यथाबुद्धि कीर्त्यमानानि तानि वै ॥ १ ॥
धौम्यजी कहते हैं—भरतवंशी युधिष्ठिर! अब मैं अपनी बुद्धिके अनुसार दक्षिणदिशावर्ती पुण्यतीर्थोंका विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ, सुनो— ॥ १ ॥

यस्यामाख्यायते पुण्या दिशि गोदावरी नदी ।
बह्वारामा बहुजला तापसाचरिता शिवा ॥ २ ॥
दक्षिणमें पुण्यमयी गोदावरी नदी बहुत प्रसिद्ध है, जिसके तटपर अनेक बगीचे सुशोभित हैं। उसके भीतर अगाध जल भरा हुआ है। बहुत-से तपस्वी उसका सेवन करते हैं तथा वह सबके लिये कल्याण-स्वरूपा है ॥ २ ॥

वेणा भीमरथी चैव नद्यौ पापभयापहे ।
मृगद्विजसमाकीर्णे तापसालयभूषिते ॥ ३ ॥
वेणा और भीमरथी—ये दो नदियाँ भी दक्षिणमें ही हैं जो समस्त पापभयका नाश करनेवाली हैं। उसके दोनों तट अनेक प्रकारके पशु-पक्षियोंसे व्याप्त और तपस्वीजनोंके आश्रमोंसे विभूषित हैं ॥ ३ ॥

राजर्षेस्तस्य च सरिन्नृगस्य भरतर्षभ ।
रम्यतीर्था बहुजला पयोष्णी द्विजसेविता ॥ ४ ॥
भरतकुलभूषण! राजा नृगकी नदी पयोष्णी भी उधर ही है जो रमणीय तीर्थों और अगाध जलसे सुशोभित है। द्विज उसका सेवन करते हैं ॥ ४ ॥

अपि चात्र महायोगी मार्कण्डेयो महायशाः ।
अनुवंश्यां जगौ गाथां नृगस्य धरणीपतेः ॥ ५ ॥
नृगस्य यजमानस्य प्रत्यक्षमिति नः श्रुतम् ।
अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः ॥ ६ ॥
पयोष्ण्यां यजमानस्य वाराहे तीर्थ उत्तमे ।
उद्धृतं भूतलंस्थं वा वायुना समुदीरितम् ।
पयोष्ण्या हरते तोयं पापमामरणान्तिकम् ॥ ७ ॥
इस विषयमें हमारे सुननेमें आया है कि महायोगी एवं महायशस्वी मार्कण्डेयने यजमान राजा नृगके सामने उनके वंशके योग्य यशोगाथाका वर्णन इस प्रकार किया था—‘पयोष्णीके तटपर उत्तम वाराहतीर्थमें यज्ञ करनेवाले राजा नृगके यज्ञमें इन्द्र सोमपान

करके मस्त हो गये थे और प्रचुर दक्षिणा पाकर ब्राह्मणलोग भी हर्षोल्लाससे पूर्ण हो गये थे।' पयोष्णीका जल हाथसे उठाया गया हो या धरतीपर पड़ा हो अथवा वायुके वेगसे उछलकर अपने ऊपर पड़ गया हो तो वह जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त किये हुए समस्त पापोंको हर लेता है ॥ ५-७ ॥

स्वर्गादुत्तुङ्गममलं विषाणं यत्र शूलिनः ।
स्वमात्मविहितं दृष्ट्वा मर्त्यः शिवपुरं व्रजेत् ॥ ८ ॥
जहाँ भगवान् शंकरका स्वयं ही अपने लिये बनाया हुआ शृंग नामक वाद्यविशेष स्वर्गसे भी ऊँचा और निर्मल है, उसका दर्शन करके मरणधर्मा मानव शिवधाममें चला जाता है ॥ ८ ॥

एकतः सरितः सर्वा गङ्गाद्याः सलिलोच्चयाः ।
पयोष्णी चैकतः पुण्या तीर्थेभ्यो हि मता मम ॥ ९ ॥
एक ओर अगाध जलराशिसे भरी हुई गंगा आदि सम्पूर्ण नदियाँ हों और दूसरी ओर केवल पुण्यसलिला पयोष्णी नदी हो तो वही अन्य सब नदियोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ है; ऐसा मेरा विचार है ॥ ९ ॥

माठरस्य वनं पुण्यं बहुमूलफलं शिवम् ।
यूपश्च भरतश्रेष्ठ वरुणस्रोतसे गिरौ ॥ १० ॥
भरतश्रेष्ठ! दक्षिणमें पवित्र माठरवन है, जो प्रचुर फलमूलसे सम्पन्न और कल्याणस्वरूप है। वहाँ वरुण-स्रोतस नामक पर्वतपर माठर (सूर्यके पार्श्ववर्ती देवता) का विजय-स्तम्भ सुशोभित होता है ॥ १० ॥

प्रवेण्युत्तरमार्गे तु पुण्ये कण्वाश्रमे तथा ।
तापसानामरण्यानि कीर्तितानि यथाश्रुति ॥ ११ ॥
यह स्तम्भ प्रवेणी नदीके उत्तरवर्ती मार्गमें कण्वके पुण्यमय आश्रममें है। इस प्रकार जैसा कि मैंने सुन रखा था, तपस्वी महात्माओंके निवासयोग्य वनोंका वर्णन किया है ॥ ११ ॥

वेदी शूर्पारके तात जमदग्नेर्महात्मनः ।
रम्या पाषाणतीर्था च पुनश्चन्द्रा च भारत ॥ १२ ॥
तात! शूर्पारकरक्षेत्रमें महात्मा जमदग्निकी वेदी है। भारत! वहीं रमणीय पाषाणतीर्था और पुनश्चन्द्रा नामक तीर्थ-विशेष हैं ॥ १२ ॥

अशोकतीर्थं तत्रैव कौन्तेय बहुलाश्रमम् ।
अगस्त्यतीर्थं पाण्ड्येषु वारुणं च युधिष्ठिर ॥ १३ ॥
कुमार्यः कथिताः पुण्याः पाण्ड्येष्वेव नरर्षभ ।
ताम्रपर्णीं तु कौन्तेय कीर्तयिष्यामि तां शृणु ॥ १४ ॥

कुन्तीनन्दन! उसी क्षेत्रमें अशोकतीर्थ है, जहाँ महर्षियोंके बहुत-से आश्रम हैं। युधिष्ठिर! पाण्ड्यदेशमें अगस्त्यतीर्थ और वारुणतीर्थ है। नरश्रेष्ठ! पाण्ड्यदेशके भीतर पवित्र कुमारी कन्याएँ (कन्याकुमारी तीर्थ) कही गयी हैं। कुन्तीकुमार! अब मैं तुमसे ताम्रपर्णी नदीकी महिमाका वर्णन करूँगा, सुनो ॥ १३-१४ ॥ यत्र देवैस्तपस्तप्तं महदिच्छद्भिराश्रमे । गोकर्ण इति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु भारत ॥ १५ ॥ भरतनन्दन! वहाँ मोक्ष पानेकी इच्छासे देवताओंने आश्रममें रहकर बड़ी भारी तपस्या की थी। वहाँका गोकर्णतीर्थ तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥ १५ ॥ शीततोयो बहुजलः पुण्यस्तात शिवः शुभः । ह्रदः परमदुष्प्रापो मानुषैरकृतात्मभिः ॥ १६ ॥ तात! गोकर्णतीर्थमें शीतल जल भरा रहता है। उसकी जलराशि अनन्त है। वह पवित्र, कल्याणमय और शुभ है। जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है, ऐसे मनुष्योंके लिये गोकर्णतीर्थ अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १६ ॥ तत्र वृक्षतृणाद्यैश्च सम्पन्नः फलमूलवान् । आश्रमोऽगस्त्यशिष्यस्य पुण्यो देवसमो गिरिः ॥ १७ ॥ वहाँ अगस्त्यके शिष्यका पुण्यमय आश्रम है, जो वृक्षों और तृण आदिसे सम्पन्न एवं फल-मूलोंसे परिपूर्ण है। देवसम नामक पर्वत ही वह आश्रम है ॥ १७ ॥ वैदूर्यपर्वतस्तत्र श्रीमान् मणिमयः शिवः । अगस्त्यस्याश्रमश्चैव बहुमूलफलोदकः ॥ १८ ॥ वहाँ परम सुन्दर मणिमय वैदूर्यपर्वत है जो शिवस्वरूप है। उसीपर महर्षि अगस्त्यका आश्रम है जो प्रचुर फल-मूल और जलसे सम्पन्न है ॥ १८ ॥ सुराष्ट्रेष्वपि वक्ष्यामि पुण्यान्यायतनानि च । आश्रमान् सरितश्चैव सरांसि च नराधिप ॥ १९ ॥ नरेश्वर! अब मैं सुराष्ट्र (सौराष्ट्र)-देशीय पुण्य-स्थानों, मन्दिरों, आश्रमों, सरिताओं और सरोवरोंका वर्णन करता हूँ ॥ १९ ॥ चमसोद्भेदनं विप्रास्तत्रापि कथयन्त्युत । प्रभासं चोदधौ तीर्थं त्रिदशानां युधिष्ठिर ॥ २० ॥ विप्रगण! वहीं चमसोद्भेदतीर्थकी चर्चा की जाती है। युधिष्ठिर! सुराष्ट्रमें ही समुद्रके तटपर प्रभासक्षेत्र है जो देवताओंका तीर्थ कहा गया है ॥ २० ॥ तत्र पिण्डारकं नाम तापसाचरितं शिवम् । उज्जयन्तश्च शिखरी क्षिप्रं सिद्धिकरो महान् ॥ २१ ॥ वहीं पिण्डारक नामक तीर्थ है जो तपस्वी जनोंद्वारा सेवित और कल्याणस्वरूप है। उधर ही उज्जयन्त नामक महान् पर्वत है जो शीघ्र सिद्धि प्रदान करनेवाला है ॥ २१ ॥

तत्र देवर्षिवर्येण नारदेनानुकीर्तितः । पुराणः श्रूयते श्लोकस्तं निबोध युधिष्ठिर ॥ २२ ॥ युधिष्ठिर! उसके विषयमें देवर्षिप्रवर श्रीनारदजीके द्वारा कहा हुआ एक प्राचीन श्लोक सुना जाता है, उसको मुझसे सुनो ॥ २२ ॥ पुण्ये गिरौ सुराष्ट्रेषु मृगपक्षिनिषेविते । उज्जयन्ते स्म तप्ताङ्गो नाकपृष्ठे महीयते ॥ २३ ॥ सुराष्ट्र देशमें मृगों और पक्षियोंसे सेवित उज्जयन्त नामक पुण्यपर्वतपर तपस्या करनेवाला पुरुष स्वर्गलोकमें पूजित होता है ॥ २३ ॥ पुण्या द्वारवती तत्र यत्रासौ मधुसूदनः । साक्षाद् देवः पुराणोऽसौ स हि धर्मः सनातनः ॥ २४ ॥ उज्जयन्तके ही आस-पास पुण्यमयी द्वारकापुरी है जहाँ साक्षात् पुराणपुरुष भगवान् मधुसूदन निवास करते हैं। वे ही सनातन धर्मस्वरूप हैं ॥ २४ ॥ ये च वेदविदो विप्रा ये चाध्यात्मविदो जनाः । ते वदन्ति महात्मानं कृष्णं धर्मं सनातनम् ॥ २५ ॥ जो वेदवेत्ता और अध्यात्मशास्त्रके विद्वान् ब्राह्मण हैं, वे परमात्मा श्रीकृष्णको ही सनातन धर्मरूप बताते हैं ॥ ५४ ॥ पवित्राणां हि गोविन्दः पवित्रं परमुच्यते । पुण्यानामपि पुण्योऽसौ मङ्गलानां च मङ्गलम् । त्रैलोक्ये पुण्डरीकाक्षो देवदेवः सनातनः ॥ २६ ॥ अव्ययात्मा व्ययात्मा च क्षेत्रज्ञः परमेश्वरः । आस्ते हरिरचिन्त्यात्मा तत्रैव मधुसूदनः ॥ २७ ॥ भगवान् गोविन्द पवित्रोंको भी पावन करनेवाले परम पवित्र कहे जाते हैं। वे पुण्योंके भी पुण्य और मंगलोंके भी मंगल हैं। कमलनयन देवाधिदेव सनातन श्रीहरि अविनाशी परमात्मा, व्ययात्मा (क्षरपुरुष), क्षेत्रज्ञ और परमेश्वर हैं। वे अचिन्त्यस्वरूप भगवान् मधुसूदन वहीं द्वारकापुरीमें विराजमान हैं ॥ २६-२७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायामष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें धौम्यतीर्थयात्राविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥

धौम्यद्वारा पश्चिम दिशाके तीर्थोंका वर्णन

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एकोननवतितमोऽध्यायः

धौम्यद्वारा पश्चिम दिशाके तीर्थोंका वर्णन

धौम्य उवाच

आनर्तेषु प्रतीच्यां वै कीर्तयिष्यामि ते दिशि ।
यानि तत्र पवित्राणि पुण्यान्यायतनानि च ॥ १ ॥
धौम्यजी कहते हैं—युधिष्ठिर! अब मैं पश्चिम दिशाके आनर्तदेशमें जो-जो पवित्र तीर्थ और पुण्यस्वरूप देवालय हैं, उन सबका वर्णन करूँगा ॥ १ ॥

प्रियङ्गवाम्रवणोपेता वानीरफलमालिनी ।
प्रत्यक्स्रोता नदी पुण्या नर्मदा तत्र भारत ॥ २ ॥
भरतनन्दन! पश्चिम दिशामें पुण्यमयी नर्मदा नदी प्रवाहित होती है, जिसकी धारा पूर्वसे पश्चिमकी ओर है। उसके तटपर प्रियंगु और आमके वृक्षोंका वन है। बेंत तथा फलवाले वृक्षोंकी श्रेणियाँ भी उसकी शोभा बढ़ाती हैं ॥ २ ॥

त्रैलोक्ये यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च ।
सरिद्वनानि शैलेन्द्रा देवाश्च सपितामहाः ॥ ३ ॥
नर्मदायां कुरुश्रेष्ठ सह सिद्धर्षिचारणैः ।
स्नातुमायान्ति पुण्यौघैः सदा वारिषु भारत ॥ ४ ॥
भरतनन्दन कुरुश्रेष्ठ! त्रिलोकीमें जो-जो पुण्यतीर्थ, मन्दिर, नदी, वन, पर्वत, ब्रह्मा आदि देवता, सिद्ध, ऋषि, चारण एवं पुण्यात्माओंके समूह हैं, वे सब सदा नर्मदाके जलमें स्नान करनेके लिये आया करते हैं ॥ ३-४ ॥

निकेतः श्रूयते पुण्यो यत्र विश्रवसो मुनेः ।
जज्ञे धनपतिर्यत्र कुबेरो नरवाहनः ॥ ५ ॥
वहीं मुनिवर विश्रवाका पवित्र आश्रम सुना जाता है, जहाँ नरवाहन धनाध्यक्ष कुबेरका जन्म हुआ था ॥ ५ ॥

वैदूर्यशिखरो नाम पुण्यो गिरिवरः शिवः ।
नित्यपुष्पफलास्तत्र पादपा हरितच्छदाः ॥ ६ ॥
वैदूर्यशिखर नामक मंगलमय पवित्र पर्वत भी नर्मदा-तटपर है, वहाँ हरे-हरे पत्तोंसे सुशोभित सदा फल और फूलोंके भारसे लदे हुए वृक्ष शोभा पाते हैं ॥

तस्य शैलस्य शिखरे सरः पुण्यं महीपते ।
फुल्लपद्मं महाराज देवगन्धर्वसेवितम् ॥ ७ ॥
राजन्! उस पर्वतके शिखरपर एक पुण्य सरोवर है जिसमें सदा कमल खिले रहते हैं। महाराज! देवता और गन्धर्व भी उस पुण्यतीर्थका सेवन करते हैं ॥ ७ ॥

बह्वाश्चर्यं महाराज दृश्यते तत्र पर्वते । पुण्ये स्वर्गोपमे चैव देवर्षिगणसेविते ॥ ८ ॥ राजन्! देवर्षिगणोंसे सेवित वह पुण्यपर्वत स्वर्गके समान सुन्दर एवं सुखद है। वहाँ अनेक आश्चर्यकी बातें देखी जाती हैं ॥ ८ ॥ ह्रदिनी पुण्यतीर्था च राजर्षेस्तत्र वै सरित् । विश्वामित्रनदी राजन् पुण्या परपुरंजय ॥ ९ ॥ यस्यास्तीरे सतां मध्ये ययातिर्नहुषात्मजः । पपात स पुनर्लोकाँल्लेभे धर्मान् सनातनान् ॥ १० ॥ शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले नरेश! वहाँ राजर्षि विश्वामित्रकी तपस्यासे प्रकट हुई एक पुण्यमयी नदी है, जो परम पवित्र तीर्थ मानी गयी है। उसीके तटपर नहुषनन्दन राजा ययाति स्वर्गसे साधु पुरुषोंके बीचमें गिरे थे और पुनः सनातन धर्ममय लोकोंमें चले गये थे ॥ ९-१० ॥ तत्र पुण्यो ह्रदः ख्यातो मैनाकश्चैव पर्वत: । बहुमूलफलोपेतस्त्वसितो नाम पर्वत: ॥ ११ ॥ वहाँ पुण्यसरोवर, विख्यात मैनाक पर्वत और प्रचुर फलमूलोंसे सम्पन्न असित नामक पर्वत है ॥ ११ ॥ आश्रमः कक्षसेनस्य पुण्यस्तत्र युधिष्ठिर । च्यवनस्याश्रमश्चैव विख्यातस्तत्र पाण्डव ॥ १२ ॥ युधिष्ठिर! उसी पर्वतपर कच्छसेनका पुण्यदायक आश्रम है। पाण्डुनन्दन! महर्षि च्यवनका सुविख्यात आश्रम भी वहीं है ॥ १२ ॥ तत्राल्पेनैव सिध्यन्ति मानवास्तपसा विभो । जम्बूमार्गो महाराज ऋषीणां भावितात्मनाम् ॥ १३ ॥ आश्रमः शाम्यतां श्रेष्ठ मृगद्विजन्निषेवितः । प्रभो! वहाँ थोड़ी ही तपस्यासे मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। महाराज! पश्चिम दिशामें ही जम्बूमार्ग है, जहाँ शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षियोंका आश्रम है। शान्त पुरुषोंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! वह आश्रम पशु-पक्षियोंसे सेवित है ॥ १३ १/२ ॥ ततः पुण्यतमा राजन् सततं तापसैर्युता ॥ १४ ॥ केतुमाला च मेध्या च गङ्गाद्वारं च भूमिप । ख्यातं च सैन्धवारण्यं पुण्यं द्विजन्निषेवितम् ॥ १५ ॥ राजन्! उधर ही सदा तपस्वीजनोंसे भरे हुए पुण्यतम तीर्थ—केतुमाला, मेध्या और गङ्गाद्वार (हरिद्वार) हैं। भूपाल! द्विजोंसे सेवित सुप्रसिद्ध सैन्धवारण्य भी उधर ही है ॥ पितामहसरः पुण्यं पुष्करं नाम नामतः । वैखानसानां सिद्धानामृषीणामाश्रमः प्रियः ॥ १६ ॥

ब्रह्माजीका पुण्यदायक सरोवर पुष्कर भी पश्चिम दिशामें ही है, जो वानप्रस्थों, सिद्धों और महर्षियोंका प्रिय आश्रम है ॥ १६ ॥ अप्यत्र संश्रयार्थाय प्रजापतिरथो जगौ ।
पुष्करेषु कुरुश्रेष्ठ गाथां सुकृतिनां वर ॥ १७ ॥
पुण्यवानोंमें प्रधान कुरुश्रेष्ठ! पुष्करमें निवास करनेके लिये प्रजापति ब्रह्माजीने एक गाथा गायी है, जो इस प्रकार है ॥ १७ ॥
मनसाप्यभिकामस्य पुष्कराणि मनस्विनः ।
विप्रणश्यन्ति पापानि नाकपृष्ठे च मोदते ॥ १८ ॥
‘जो मनस्वी पुरुष मनसे भी पुष्करतीर्थमें निवास करनेकी इच्छा करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और वह स्वर्गलोकमें आनन्द भोगता है’ ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायां
एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें धौम्यतीर्थयात्राविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥

धौम्यद्वारा उत्तर दिशाके तीर्थोंका वर्णन

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नवतितमोऽध्यायः

धौम्यद्वारा उत्तर दिशाके तीर्थोंका वर्णन

धौम्य उवाच

उदीच्यां राजशार्दूल दिशि पुण्यानि यानि वै ।
तानि ते कीर्तयिष्यामि पुण्यान्यायतनानि च ॥ १ ॥
शृणुष्वावहितो भूत्वा मम मन्त्रयतः प्रभो ।
कथाप्रतिग्रहो वीर श्रद्धां जनयते शुभाम् ॥ २ ॥
धौम्यजी कहते हैं—नृपश्रेष्ठ! उत्तर दिशामें जो पुण्यप्रद तीर्थ और देवालय आदि हैं, उनका तुमसे वर्णन करता हूँ। प्रभो! तुम सावधान होकर वह सब मेरे मुखसे सुनो। वीरवर! तीर्थोंकी कथाका प्रसंग उनके प्रति मंगलमयी श्रद्धा उत्पन्न करता है ॥ १-२ ॥

सरस्वती महापुण्या ह्रदिनी तीर्थमालिनी ।
समुद्रगा महावेगा यमुना यत्र पाण्डव ॥ ३ ॥
तीर्थोंकी पंक्तिसे सुशोभित सरस्वती नदी बड़ी पुण्यदायिनी है। पाण्डुनन्दन! समुद्रमें मिलनेवाली महावेगशालिनी यमुना भी उत्तर दिशामें ही हैं ॥ ३ ॥

यत्र पुण्यतरं तीर्थं प्लक्षावतरणं शुभम् ।
यत्र सारस्वतैरिष्ट्वा गच्छन्त्यवभृथैर्द्विजाः ॥ ४ ॥
उधर ही अत्यन्त पुण्यमय प्लक्षावतरण नामक मंगलकारक तीर्थ है; जहाँ ब्राह्मणगण यज्ञ करके सरस्वतीके जलसे अवभृथस्नान करते और अपने स्थानको जाते हैं ॥ ४ ॥

पुण्यं चाख्यायते दिव्यं शिवमग्निशिरोऽनघ ।
सहदेवोऽयजद् यत्र शम्याक्षेपेण भारत ॥ ५ ॥
उधर ही अग्निशिर नामक दिव्य, कल्याणमय, पुण्यतीर्थ बताया जाता है। निष्पाप भरतनन्दन! उसी तीर्थमें सहदेवने शमीका डंडा फेंकवाकर, जितनी दूरीमें वह डंडा पड़ा था उतनी दूरीमें, मण्डप बनवाकर उसमें यज्ञ किया ॥ ५ ॥

एतस्मिन्नेव चार्थेऽसाविन्द्रगीता युधिष्ठिर ।
गाथा चरति लोकेऽस्मिन् गीयमाना द्विजातिभिः ॥ ६ ॥
युधिष्ठिर! इसी विषयमें इन्द्रकी गायी हुई एक गाथा लोकमें प्रचलित है, जिसे ब्राह्मण गाया करते हैं ॥ ६ ॥

अग्नयः सहदेवेन सेविता यमुनामनु ।
ते तस्य कुरुशार्दूल सहस्रशतदक्षिणाः ॥ ७ ॥

कुरुश्रेष्ठ! सहदेवने यमुना-तटपर लाख स्वर्ण-मुद्राओंकी दक्षिणा देकर अग्निकी उपासना की थी*॥ ७ ॥ तत्रैव भरतो राजा चक्रवर्ती महायशाः । विंशतिः सप्त चाष्टौ च हयमेधानुपाहरत् ॥ ८ ॥ वहीं महायशस्वी चक्रवर्ती राजा भरतने पैंतीस अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान किया ॥ ८ ॥ कामकृद् यो द्विजातीनां श्रुतस्तात यथा पुरा । अत्यन्तमाश्रमः पुण्यः शरभंगस्य विश्रुतः ॥ ९ ॥ तात! प्राचीनकालमें राजा भरत ब्राह्मणोंकी मनोवाञ्छाको पूर्ण करनेवाला राजा सुना गया है। उत्तराखण्डमें ही महर्षि शरभङ्गका अत्यन्त पुण्यदायक आश्रम विख्यात है ॥ ९ ॥ सरस्वती नदी सद्भिः सततं पार्थ पूजिता । बालखिल्यैर्महाराज यत्रेष्टमृषिभिः पुरा ॥ १० ॥ कुन्तीनन्दन! साधु पुरुषोंने सरस्वती नदीकी सदा उपासना की है। महाराज! पूर्वकालमें बालखिल्य ऋषियोंने वहाँ यज्ञ किया था ॥ १० ॥ दृषद्वती महापुण्या यत्र ख्याता युधिष्ठिर । न्यग्रोधाख्यस्तु पुण्याख्यः पाञ्चाल्यो द्विपदां वर ॥ ११ ॥ दाल्भ्यघोषश्च दाल्भ्यश्च धरणीस्थो महात्मनः । कौन्तेयानन्तयशसः सुव्रतस्यामितौजसः ॥ १२ ॥ आश्रमः ख्यायते पुण्यस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । युधिष्ठिर! परम पुण्यमयी दृषद्वती नदी भी उधर ही बतायी गयी है। मनुष्योंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! वहीं न्यग्रोध, पुण्य, पाञ्चाल्य, दाल्भ्यघोष और दाल्भ्य—ये पाँच आश्रम हैं तथा अनन्तकीर्ति एवं अमिततेजस्वी महात्मा सुव्रतका पुण्य आश्रम भी उत्तराखण्डमें ही बताया जाता है, जो पृथ्वीपर रहकर भी तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥ एतावर्णविवर्णौ च विश्रुतौ मनुजाधिप ॥ १३ ॥ नरेश्वर! उत्तराखण्डमें ही विख्यात मुनि नर और नारायण हैं, जो एतावर्ण (श्यामवर्ण—साकार) होते हुए भी वास्तवमें अवर्ण (निराकार) ही हैं ॥ १३ ॥ वेदज्ञौ वेदविद्वांसौ वेदविद्याविदावुभौ । ईजाते क्रतुभिर्मुख्यैः पुण्यैर्भरतसत्तम ॥ १४ ॥ भरतश्रेष्ठ! ये दोनों मुनि वेदज्ञ, वेदके मर्मज्ञ तथा वेदविद्याके पूर्ण जानकार हैं। इन्होंने पुण्यदायक उत्तम यज्ञोंद्वारा शंकरका यजन किया है ॥ १४ ॥ समेत्य बहुशो देवाः सेन्द्राः सवरुणाः पुरा । विशाखयूपेऽतप्यन्त तेन पुण्यतमश्च सः ॥ १५ ॥ पूर्वकालमें इन्द्र, वरुण आदि बहुत-से देवताओंने मिलकर विशाखयूप नामक स्थानमें तप किया था, अतः वह अत्यन्त पुण्यप्रद स्थान है ॥ १५ ॥

ऋषिर्महान् महाभागो जमदग्निर्महायशाः । पलाशकेषु पुण्येषु रम्येष्वयजत प्रभुः ॥ १६ ॥ महाभाग, महायशस्वी और महाप्रभावशाली महर्षि जमदग्निने परम सुन्दर तथा पुण्यप्रद पलाशवनमें यज्ञ किया था ॥ १६ ॥

यत्र सर्वाः सरिच्छ्रेष्ठाः साक्षात् तमृषिसत्तमम् । स्वं स्वं तोयमुपादाय परिवार्योपतस्थिरे ॥ १७ ॥ जिसमें सब श्रेष्ठ नदियाँ मूर्तिमती हो अपना-अपना जल लेकर उन मुनिश्रेष्ठके पास आयीं और उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़ी हुई थीं ॥ १७ ॥

अपि चात्र महाराज स्वयं विश्वावसुर्जगौ । इमं श्लोकं तदा वीर प्रेक्ष्य दीक्षां महात्मनः ॥ १८ ॥ वीर महाराज! यहाँ महात्मा जमदग्निकी वह यज्ञदीक्षा देखकर स्वयं गन्धर्वराज विश्वावसुने इस श्लोकका गान किया था ॥ १८ ॥

यजमानस्य वै देवाञ्जमदग्नेर्महात्मनः । आगम्य सरितो विप्रान् मधुना समतर्पयन् ॥ १९ ॥ ‘महात्मा जमदग्नि जब यज्ञद्वारा देवताओंका यजन कर रहे थे, उस समय उनके यज्ञमें सरिताओंने आकर मधुसे ब्राह्मणोंको तृप्त किया’ ॥ १९ ॥

गन्धर्वयक्षरक्षोभिरप्सरोभिश्च सेवितम् । किरातकिन्नरावासं शैलं शिखरिणां वरम् ॥ २० ॥ बिभेद तरसा गङ्गा गङ्गाद्वारं युधिष्ठिर । पुण्यं तत् ख्यायते राजन् ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥ २१ ॥ युधिष्ठिर! गिरिश्रेष्ठ हिमालय किरातों और किन्नरोंका निवासस्थान है। गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और अप्सराएँ उसका सदा सेवन करती हैं। गङ्गाजी अपने वेगसे उस शैलराजको फोड़कर जहाँ प्रकट हुई हैं, वह पुण्यस्थान गङ्गाद्वार (हरिद्वार)-के नामसे विख्यात है। राजन्! उस तीर्थका ब्रह्मर्षिगण सदा सेवन करते हैं ॥ २०-२१ ॥

सनत्कुमारः कौरव्य पुण्यं कनखलं तथा । पर्वतश्च पुरुर्नाम यत्र यातः पुरूरवाः ॥ २२ ॥ कुरुनन्दन! पुण्यमय कनखलमें पहले सनत्कुमारने यात्रा की थी। वहीं पुरु नामसे प्रसिद्ध पर्वत है, जहाँ पूर्वकालमें पुरूरवाने यात्रा की थी ॥ २२ ॥

भृगुर्यत्र तपस्तेपे महर्षिगणसेविते । राजन् स आश्रमः ख्यातो भृगुतुङ्गो महागिरिः ॥ २३ ॥ राजन्! महर्षियोंसे सेवित जिस महान् पर्वतपर भृगुने तपस्या की थी वह भृगुतुंग आश्रमके नामसे विख्यात है ॥ २३ ॥

यः स भूतं भविष्यच्च भवच्च भरतर्षभ ।

नारायणः प्रभुर्विष्णुः शाश्वतः पुरुषोत्तमः ॥ २४ ॥
तस्यातियशसः पुण्यां विशालां बदरीमनु ।
आश्रमः ख्यायते पुण्यस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥ २५ ॥
भरतश्रेष्ठ! भूत, भविष्य और वर्तमान जिनका स्वरूप है, जो सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी, सनातन एवं पुरुषोत्तम नारायण हैं उन अत्यन्त यशस्वी श्रीहरिकी पुण्यमयी विशालापुरी बदरीवनके निकट है। वह नर-नारायणका आश्रम कहा गया है, वह पुण्यप्रद बदरिकाश्रम तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥ २४-२५ ॥

उष्णतोयवहा गङ्गा शीततोयवहा पुरा ।
सुवर्णसिकता राजन् विशालां बदरीमनु ॥ २६ ॥
राजन्! पूर्वकालसे ही विशाला बदरीके समीप गंगा कहीं गरम जल तथा कहीं शीतल जल प्रवाहित करती हैं। उनकी बालू सुवर्णकी भाँति चमकती रहती है ॥ २६ ॥

ऋषयो यत्र देवाश्च महाभागा महौजसः ।
प्राप्य नित्यं नमस्यन्ति देवं नारायणं प्रभुम् ॥ २७ ॥
यत्र नारायणो देवः परमात्मा सनातनः ।
तत्र कृत्स्नं जगत् सर्वं तीर्थान्यायतनानि च ॥ २८ ॥
वहाँ महाभाग एवं महातेजस्वी देवता तथा महर्षि प्रतिदिन जाकर अमित प्रभावशाली भगवान् नारायणको नमस्कार करते हैं। जहाँ सनातन परमात्मा भगवान् नारायण विराजमान हैं वहाँ सम्पूर्ण जगत् है और समस्त तीर्थ तथा देवालय हैं ॥ २७-२८ ॥

तत् पुण्यं परमं ब्रह्म तत् तीर्थं तत् तपोवनम् ।
तत् परं परमं देवं भूतानां परमेश्वरम् ॥ २९ ॥
वह बदरिकाश्रम पुण्यक्षेत्र और परब्रह्मस्वरूप है। वही तीर्थ है, वही तपोवन है, वही सम्पूर्ण भूतोंका परमदेव परमेश्वर है ॥ २९ ॥

शाश्वतं परमं चैव धातारं परमं पदम् ।
यं विदित्वा न शोचन्ति विद्वांसः शास्त्रदृष्टयः ॥ ३० ॥
तत्र देवर्षयः सिद्धाः सर्वे चैव तपोधनाः ।
वही सनातन परमधाता एवं परमपद है, जिसे जान लेनेपर शास्त्रदर्शी विद्वान् कभी शोक नहीं करते हैं। वहीं देवर्षि सिद्ध और समस्त तपोधन महात्मा निवास करते हैं ॥ ३० १/२ ॥

आदिदेवो महायोगी यत्रास्ते मधुसूदनः ॥ ३१ ॥
पुण्यानामपि तत् पुण्यमत्र ते संशयोऽस्तु मा ।
एतानि राजन् पुण्यानि पृथिव्यां पृथिवीपते ॥ ३२ ॥
कीर्तितानि नरश्रेष्ठ तीर्थान्यायतनानि च ।
एतानि वसुभिः साध्यैरादित्यैर्मरुदश्विभिः ॥ ३३ ॥

ऋषिभिर्देवकल्पैश्च सेवितानि महात्मभिः । चरन्नेतानि कौन्तेय सहितो ब्राह्मणर्षभैः । भ्रातृभिश्च महाभागैरुत्कण्ठां विहरिष्यसि ॥ ३४ ॥

जहाँ महायोगी आदिदेव भगवान् मधुसूदन विराजमान हैं वह स्थान पुण्योंका भी पुण्य है। इस विषयमें तुम्हें संशय नहीं होना चाहिये। राजन्! पृथ्वीपते! नरश्रेष्ठ! ये भूमण्डलके पुण्यतीर्थ और आश्रम आदि कहे गये वसु, साध्य, आदित्य, मरुद्गण, अश्विनीकुमार तथा देवोपम महात्मा मुनि इन सब तीर्थोंका सेवन करते हैं। कुन्तीनन्दन! तुम श्रेष्ठ ब्राह्मणों और महान् सौभाग्यशाली भाइयोंके साथ इन तीर्थोंमें विचरते रहोगे तो अर्जुनके लिये तुम्हारी मिलनेकी उत्कट इच्छा अर्थात् विरहव्याकुलता शान्त हो जायगी ॥ ३१—३४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायां नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें धौम्यतीर्थयात्राविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९० ॥


* ये सहदेव सुप्रसिद्ध राजा सृंजयके पुत्र थे—‘सहदेवः सृंजयपुत्रः’ इति नीलकण्ठी।