महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
चित्रसेन, अर्जुन तथा युधिष्ठिरका संवाद और दुर्योधनका छुटकारा
षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
चित्रसेन, अर्जुन तथा युधिष्ठिरका संवाद और दुर्योधनका छुटकारा
वैशम्पायन उवाच
ततोऽर्जुनश्चित्रसेनं प्रहसन्निदमब्रवीत् ।
मध्ये गन्धर्वसैन्यानां महेष्वासो महाद्युतिः ॥ १ ॥
किं ते व्यवसितं वीर कौरवाणां विनिग्रहे ।
किमर्थं च सदारोऽयं निगृहीतः सुयोधनः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर परम कान्तिमान् महाधनुर्धर अर्जुनने गन्धर्वोंकी सेनाके बीच चित्रसेनसे हँसते हुए पूछा—'वीर! कौरवोंको बंदी बनानेमें तुम्हारा क्या उद्देश्य था? स्त्रियोंसहित दुर्योधनको तुमने किसलिये कैद किया?' ॥ १-२ ॥
चित्रसेन उवाच
विदितोऽयमभिप्रायस्तत्रस्थेन दुरात्मनः ।
दुर्योधनस्य पापस्य कर्णस्य च धनंजय ॥ ३ ॥
वनस्थान् भवतो ज्ञात्वा क्लिश्यमानाननाथवत् ।
समस्थो विषमस्थांस्तान् द्रक्ष्यामीत्यनवस्थितान् ॥ ४ ॥
इमेऽवहसितुं प्राप्ता द्रौपदीं च यशस्विनीम् ।
ज्ञात्वा चिकीर्षितं चैषां मामुवाच सुरेश्वरः ॥ ५ ॥
**चित्रसेनने कहा—**धनंजय! देवराज इन्द्रको स्वर्गमें बैठे-ही-बैठे दुरात्मा दुर्योधन और पापी कर्णका यह अभिप्राय मालूम हो गया था कि ये आपलोगोंको वनमें रहकर अनाथकी भाँति क्लेश उठाते और विषम परिस्थितिमें पड़कर अस्थिरभावसे रहते हुए जानकर भी उस अवस्थामें आपको देखने और दुःखी करनेका निश्चय कर चुके हैं। ये स्वयं सम (सुखपूर्ण)-अवस्थामें स्थित हैं, फिर भी आप पाण्डवों तथा यशस्विनी द्रौपदीकी हँसी उड़ानेके लिये वनमें आये हैं। इस प्रकार इनकी (आपलोगोंका अनिष्ट करनेकी) इच्छा जानकर देवेश्वर इन्द्रने मुझसे इस प्रकार कहा— ॥ ३—५ ॥
गच्छ दुर्योधनं बद्ध्वा सहामात्यमिहानय ।
धनंजयश्च ते रक्ष्यः सह भ्रातृभिराहवे ॥ ६ ॥
स च प्रियः सखा तुभ्यं शिष्यश्च तव पाण्डवः ।
'चित्रसेन! तुम जाओ और दुर्योधनको उसके मन्त्रियोंसहित बाँधकर यहाँ ले आओ। युद्धमें तुम्हें भाइयोंसहित अर्जुनकी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि पाण्डुनन्दन अर्जुन तुम्हारे
प्रिय सखा तथा शिष्य हैं' ।। वचनाद् देवराजस्य ततोऽस्मीहागतो द्रुतम् ।। ७ ।। अयं दुरात्मा बद्धश्च गमिष्यामि सुरालयम् । नेष्याम्येनं दुरात्मानं पाकशासनशासनात् ।। ८ ।। वहाँसे देवराजकी यह आज्ञा मानकर मैं तुरन्त यहाँ चला आया। यह दुरात्मा दुर्योधन मेरी कैदमें आ गया है; अतः अब मैं देवलोकको जाऊँगा और पाकशासन इन्द्रकी आज्ञासे इस दुरात्माको भी वहीं ले जाऊँगा ।। ८ ।।
अर्जुन उवाच
उत्सृज्यतां चित्रसेन भ्रातास्माकं सुयोधनः । धर्मराजस्य संदेशान्मम चेदिच्छसि प्रियम् ।। ९ ।। **अर्जुन बोले—**चित्रसेन! दुर्योधन हमलोगोंका भाई है। यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो धर्मराजके आदेशसे इसे छोड़ दो ।। ९ ।।
चित्रसेन उवाच
पापोऽयं नित्यसंतुष्टो न विमोक्षणमर्हति । प्रलब्धा धर्मराजस्य कृष्णायाश्च धनंजय ।। १० ।। **चित्रसेनने कहा—**धनंजय! यह पापी सदा राज्यसुख भोगनेके कारण हर्षसे मतवाला हो उठा है; अतः इसे छोड़ना उचित नहीं है। इसने धर्मराज युधिष्ठिर तथा द्रौपदीको धोखा दिया है ।। १० ।। नेदं चिकीर्षितं तस्य कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । जानाति धर्मराजो हि श्रुत्वा कुरु यथेच्छसि ।। ११ ।। कुन्तीनन्दन धर्मराज युधिष्ठिर इसके इस कुटिल अभिप्रायको नहीं जानते हैं; अतः यह सब सुनकर तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो ।। ११ ।।
वैशम्पायन उवाच
ते सर्व एव राजानमभिजग्मुर्युधिष्ठिरम् । अभिगम्य च तत् सर्वं शशंसुस्तस्य चेष्टितम् ।। १२ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर वे सब लोग राजा युधिष्ठिरके पास गये। वहाँ जाकर गन्धर्वोने दुर्योधनकी सारी कुचेष्टा कह सुनायी ।। १२ ।। अजातशत्रुस्तच्छ्रुत्वा गन्धर्वस्य वचस्तदा । मोक्षयामास तान् सर्वान् गन्धर्वान् प्रशशंस च ।। १३ ।। गन्धर्वोंका यह कथन सुनकर अजातशत्रु युधिष्ठिरने उस समय समस्त कौरवोंको बन्धनसे छुड़ा दिया और गन्धर्वोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा की— ।। १३ ।।
दिष्ट्या भवद्भिर्बलिभिः शक्तैः सर्वैर्न हिंसितः । दुर्वृत्तो धार्तराष्ट्रोऽयं सामात्यज्ञातिबान्धवः ॥ १४ ॥ 'आप सब लोग बलवान् और सामर्थ्यशाली हैं। आपने मन्त्रियों तथा जाति-भाइयोंसहित इस दुराचारी दुर्योधनका वध नहीं किया, यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ १४ ॥
उपकारो महांस्तात कृतोऽयं मम खेचरैः । कुलं न परिभूतं मे मोक्षणेऽस्य दुरात्मनः ॥ १५ ॥ 'तात! आकाशचारी गन्धर्वोंने यह मेरा बहुत बड़ा उपकार किया कि इस दुरात्माको छोड़ दिया, इसलिये मेरे कुलका अपमान नहीं हुआ ॥ १५ ॥
आज्ञापयध्वमिष्टानि प्रीयामो दर्शनेन वः । प्राप्य सर्वानभिप्रायांस्ततो व्रजत मा चिरम् ॥ १६ ॥ 'गन्धर्वो! अपनी अभीष्ट सेवाके लिये हमें आज्ञा दीजिये। हम सब लोग आपके दर्शनसे बहुत प्रसन्न हैं। अपनी समस्त मनोवांछित वस्तुओंको प्राप्त करनेके पश्चात् यहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कीजियेगा ॥ १६ ॥
अनुज्ञातास्तु गन्धर्वाः पाण्डुपुत्रेण धीमता । सहाप्सरोभिः संहृष्टाश्चित्रसेनमुखा ययुः ॥ १७ ॥ बुद्धिमान् पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे आज्ञा लेकर चित्रसेन आदि सब गन्धर्व अप्सराओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे विदा हुए ॥ १७ ॥
(देवलोकं ततो गत्वा गन्धर्वैः सहितस्तदा । न्यवेदयच्च तत् सर्वं चित्रसेनः शतक्रतोः ॥) देवराडपि गन्धर्वान् मृतांस्तान् समजीवयत् । दिव्येनामृतवर्षेण ये हताः कौरवैर्युधि ॥ १८ ॥ तदनन्तर गन्धर्वोंसहित चित्रसेनने देवलोकमें पहुँचकर देवराज इन्द्रके समक्ष सब समाचार निवेदन किया। युद्धमें कौरवोंद्वारा जो गन्धर्व मारे गये थे, उन सबको देवराज इन्द्रने दिव्य अमृतकी वर्षा करके जिला दिया ॥ १८ ॥
ज्ञातींस्तानवमुच्याथ राजदारांश्च सर्वशः । कृत्वा च दुष्करं कर्म प्रीतियुक्ताश्च पाण्डवाः ॥ १९ ॥ सस्त्रीकुमारैः कुरुभिः पूज्यमाना महारथाः । बभ्राजिरे महात्मानः क्रतुमध्ये यथाग्नयः ॥ २० ॥ इस प्रकार उन सब भाई-बंधुओं एवं राजकुलकी महिलाओंको गन्धर्वोंसे छुड़ाकर एवं दुष्कर पराक्रम करके प्रसन्न हुए महारथी महामना पाण्डव स्त्री-बालकोंसहित कौरवोंद्वारा पूजित एवं प्रशंसित हो यज्ञ-मण्डपमें प्रज्वलित अग्नियोंके समान देदीप्यमान हो रहे थे ॥ १९-२० ॥
ततो दुर्योधनं मुक्तं भ्रातृभिः सहितस्तदा । युधिष्ठिरस्तु प्रणयादिदं वचनमब्रवीत् ॥ २१ ॥ तदनन्तर बन्धनमुक्त हुए दुर्योधनसे भाइयोंसहित युधिष्ठिरने प्रेमपूर्वक यह बात कही — ॥ २१ ॥
मा स्म तात पुनः कार्षीरीदृशं साहसं क्वचित् । न हि साहसकर्तारः सुखमेधन्ति भारत ॥ २२ ॥ ‘तात! फिर कभी ऐसा दुःसाहस न करना। भारत! दुःसाहस करनेवाले मनुष्य कभी सुखी नहीं होते ॥ २२ ॥
स्वस्तिमान् सहितः सर्वैर्भ्रातृभिः कुरुनन्दन । गृहान् व्रज यथाकामं वैमनस्यं च मा कृथाः ॥ २३ ॥ ‘कुरुनन्दन! अब तुम अपने सब भाइयोंके साथ कुशलपूर्वक इच्छानुसार घर जाओ। हमलोगोंके प्रति मनमें वैमनस्य न रखना? ॥ २३ ॥
वैशम्पायन उवाच
पाण्डवेनाभ्यनुज्ञातो राजा दुर्योधनस्तदा । प्रणम्य धर्मपुत्रं तु गतेन्द्रिय इवातुरः ॥ २४ ॥
विदीर्यमाणो व्रीडावान् जगाम नगरं प्रति ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी आज्ञा पाकर राजा दुर्योधनने उन धर्मपुत्र अजातशत्रुको प्रणाम करके अपने नगरकी ओर प्रस्थान किया। उस समय जिसकी इन्द्रियाँ काम न देती हों उस रोगीकी भाँति उसका हृदय व्यथासे विदीर्ण हो रहा था। उसे अपने कुकृत्यपर बड़ी लज्जा हो रही थी ॥ २४ १/२ ॥
तस्मिन् गते कौरवेये कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ २५ ॥
भ्रातृभिः सहितो वीरः पूज्यमानो द्विजातिभिः ।
तपोधनैश्च तैः सर्वैर्वृतः शक्र इवामरैः ॥ २६ ॥
तथा द्वैतवने तस्मिन् विजहार मुदा युतः ॥ २७ ॥
दुर्योधनके चले जानेपर द्विजातियोंसे प्रशंसित होते हुए भाइयोंसहित वीर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर वहाँके समस्त तपस्वी मुनियोंसे घिरे रहकर देवताओंके बीचमें बैठे हुए इन्द्रकी भाँति शोभा पाने और प्रसन्नतापूर्वक द्वैतवनमें विहार करने लगे ॥ २५—२७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनमोक्षणे
षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनको छुड़ानेसे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २८ श्लोक हैं)
२४७-
सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः सेनासहित दुर्योधनका मार्गमें ठहरना और कर्णके द्वारा उसका अभिनन्दन
जनमेजय उवाच
शत्रुभिर्जितबद्धस्य पाण्डवैश्च महात्मभिः । मोक्षितस्य युधा पश्चान्मानिनः सुदुरात्मनः ॥ १ ॥ कत्थनस्यावलिप्तस्य गर्वितस्य च नित्यशः । सदा च पौरुषौदार्यैः पाण्डवानवमन्यतः ॥ २ ॥ दुर्योधनस्य पापस्य नित्याहंकारवादिनः । प्रवेशो हास्तिनपुरे दुष्करः प्रतिभाति मे ॥ ३ ॥ तस्य लज्जान्वितस्यैव शोकव्याकुलचेतसः । प्रवेशं विस्तरेण त्वं वैशम्पायन कीर्तय ॥ ४ ॥ **जनमेजय बोले—**मुने! दुर्योधनको शत्रुओंने जीता और बाँध लिया। फिर महात्मा पाण्डवोंने गन्धर्वोंके साथ युद्ध करके उसे छुड़ाया। ऐसी दशामें उस अभिमानी और दुरात्मा दुर्योधनका हस्तिनापुरमें प्रवेश करना मुझे तो अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है; क्योंकि वह अपने शौर्यके विषयमें बहुत डींग हाँका करता था, घमंडमें भरा रहता था और सदा गर्वके नशेमें चूर रहा करता था। उसने अपने पौरुष और उदारताद्वारा सदा पाण्डवोंका अपमान ही किया था। पापी दुर्योधन सदा अहंकारकी ही बातें करता था। पाण्डवोंकी सहायतासे मेरे जीवनकी रक्षा हुई, यह सोचकर तो वह लज्जित हो गया होगा; उसका हृदय शोकसे व्याकुल हो उठा होगा। वैशम्पायनजी! ऐसी स्थितिमें उसने अपनी राजधानीमें कैसे प्रवेश किया? यह विस्तारपूर्वक कहिये ।।
वैशम्पायन उवाच
धर्मराजनिसृष्टस्तु धार्तराष्ट्रः सुयोधनः । लज्जयाधोमुखः सीदन्नुपासर्पत् सुदुःखितः ॥ ५ ॥ **वैशम्पायनजी बोले—**राजन्! धर्मराजसे विदा होकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन लज्जासे मुँह नीचा किये अत्यन्त दुःखी और खिन्न होकर वहाँसे चल दिया ।। ५ ।। स्वपुरं प्रययौ राजा चतुरंगबलानुगः । शोकोपहतया बुद्ध्या चिन्तयानः पराभवम् ॥ ६ ॥ राजा दुर्योधनकी बुद्धि शोकसे मारी गयी थी। वह अपने अपमानपर विचार करता हुआ चतुरंगिणी सेनाके साथ नगरकी ओर चल पड़ा ।। ६ ।।
विमुच्य पथि यानानि देशे सुयवसोदके ।
संनिविष्टः शुभे रम्ये भूमिभागे यथेप्सितम् ॥ ७ ॥
हस्त्यश्वरथपादातं यथास्थानं न्यवेशयत् ।
रास्तेमें एक ऐसा स्थान मिला जहाँ घास और जलकी सुविधा थी। दुर्योधन अपने वाहनोंको वहीं छोड़कर एक सुन्दर एवं रमणीय भूभागमें अपनी रुचिके अनुसार ठहर गया। हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंको भी उसने यथास्थान ठहरनेकी आज्ञा दे दी ॥ ७ १/२ ॥
अथोपविष्टं राजानं पर्यङ्के ज्वलनप्रभे ॥ ८ ॥
उपप्लुतं यथा सोमं राहुणा रात्रिसंक्षये ।
राजा दुर्योधन अग्निके समान उद्दीप्त होनेवाले (सोनेके) पलंगपर बैठा हुआ था। रात्रिके अन्तमें चन्द्रमापर राहुद्वारा ग्रहण लग जानेपर जैसे उसकी शोभा नष्ट हो जाती है, वही दशा उस समय दुर्योधनकी भी थी ॥ ८ १/२ ॥
उपागम्याब्रवीत् कर्णो दुर्योधनमिदं तदा ॥ ९ ॥
दिष्ट्या जीवसि गान्धारे दिष्ट्या नः सङ्गमः पुनः ।
दिष्ट्या त्वया जिताश्चैव गन्धर्वाः कामरूपिणः ॥ १० ॥
उस समय कर्णने समीप आकर दुर्योधनसे इस प्रकार कहा—'गान्धारीनन्दन! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम जीवित हो। सौभाग्यवश हमलोग पुनः एक-दूसरेसे मिल गये। भाग्यसे तुमने इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले गन्धर्वोंपर विजय पायी, यह और भी प्रसन्नताकी बात है ॥ ९-१० ॥
दिष्ट्या समग्रान् पश्यामि भ्रातूंस्ते कुरुनन्दन ।
विजिगीषून् रणे युक्तान् निर्जितारीन् महारथान् ॥ ११ ॥
'कुरुनन्दन! मैं तुम्हारे सम्पूर्ण महारथी भाइयोंको, जो शत्रुओंपर विजय पा चुके हैं, युद्धके लिये उद्यत तथा पुनः विजयकी अभिलाषासे युक्त देख रहा हूँ, यह भी सौभाग्यका ही सूचक है ॥ ११ ॥
अहं त्वभिद्रुतः सर्वैर्गन्धर्वैः पश्यतस्तव ।
नाशक्नुवं स्थापयितुं दीर्यमाणां च वाहिनीम् ॥ १२ ॥
'मैं तो तुम्हारे देखते-देखते ही समस्त गन्धर्वोंसे पराजित होकर भाग गया था। तितर-बितर होकर भागती हुई सेनाको स्थिर न रख सका ॥ १२ ॥
शरक्षताङ्गश्च भृशं व्यपयातोऽभिपीडितः ।
इदं त्वत्यद्भुतं मन्ये यद् युष्मानिह भारत ॥ १३ ॥
अरिष्टानक्षतांश्चापि सदारबलवाहनान् ।
विमुक्तान् सम्प्रपश्यामि युद्धात् तस्मादमानुषात् ॥ १४ ॥
'बाणोंके आघातसे मेरा सारा शरीर क्षत-विक्षत हो गया था। समस्त अंगोंमें बड़ी वेदना हो रही थी; इसीलिये मुझे भागना पड़ा। भारत! तुमलोग, जो उस अमानुषिक युद्धसे
छूटकर यहाँ स्त्री, सेना और वाहनोंसहित सकुशल तथा क्षतिसे रहित दिखायी देते हो; यह बात मुझे बड़ी अद्भुत जान पड़ती है ।। १३-१४ ।। नैतस्य कर्ता लोकेऽस्मिन् पुमान् भारत विद्यते । यत् कृतं ते महाराज सह भ्रातृभिराहवे ।। १५ ।। 'भरतनन्दन महाराज! इस युद्धमें भाइयोंसहित तुमने जो पराक्रम कर दिखाया है, उसे करनेवाला दूसरा कोई पुरुष इस संसारमें नहीं है' ।। १५ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कर्णेन राजा दुर्योधनस्तदा । उवाच चाङ्गराजानं वाष्पगद्गदया गिरा ।। १६ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! कर्णके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधन उस समय अश्रुगद्गद वाणीद्वारा अंगराज (कर्ण)-से इस प्रकार बोला ।। १६ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णदुर्योधनसंवादे सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २४७ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्णदुर्योधनसंवादविषयक दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २४७ ।।
२४८-
अष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
दुर्योधनका कर्णको अपनी पराजयका समाचार बताना
दुर्योधन उवाच
अजानतस्ते राधेय नाभ्यसूयाम्यहं वचः ।
जानासि त्वं जिताञ्छत्रून् गन्धर्वांस्तेजसा मया ॥ १ ॥
**दुर्योधन बोला—**राधानन्दन! तुम सब बातें जानते नहीं हो, इसीसे मैं तुम्हारे इस कथनको बुरा नहीं मानता। तुम समझते हो कि मैंने अपने शत्रुभूत गन्धर्वोंको अपने ही पराक्रमसे हराया है; परंतु ऐसी बात नहीं है ॥ १ ॥
आयोधित्वास्तु गन्धर्वाः सुचिरं सोदरैर्मम ।
मया सह महाबाहो कृतश्चोभयतः क्षयः ॥ २ ॥
महाबाहो! मेरे भाइयोंने मेरे साथ रहकर गन्धर्वोंके साथ बहुत देरतक युद्ध किया और उसमें दोनों पक्षके बहुत-से सैनिक मारे गये ॥ २ ॥
मायाधिकास्त्वयुध्यन्त यदा शूरा वियद्गताः ।
तदा नो न समं युद्धमभवत् खेचरैः सह ॥ ३ ॥
परंतु जब मायाके कारण अधिक शक्तिशाली शूरवीर गन्धर्व आकाशमें खड़े होकर युद्ध करने लगे, तब उनके साथ हमलोगोंका युद्ध समान स्थितिमें नहीं रह सका ॥
पराजयं च प्राप्ताः स्मो रणे बन्धनमेव च ।
सभृत्यामात्यपुत्राश्च सदारबलवाहनाः ॥ ४ ॥
युद्धमें हमारी पराजय हुई और हम सेवक, सचिव, पुत्र, स्त्री, सेना तथा सवारियोंसहित बंदी बना लिये गये ॥ ४ ॥
उच्चैराकाशमार्गेण हृताःस्मस्तैः सुदुःखिताः ।
अथ नः सैनिकाः केचिदमात्याश्च महारथाः ॥ ५ ॥
उपगम्याब्रुवन् दीनाः पाण्डवाञ्छरणप्रदान् ।
फिर गन्धर्व हमें ऊँचे आकाशमार्गसे ले चले। उस समय हमलोग अत्यन्त दुःखी हो रहे थे। तदनन्तर हमारे कुछ सैनिकों और महारथी मन्त्रियोंने अत्यन्त दीन हो शरणदाता पाण्डवोंके पास जाकर कहा— ॥ ५ १/२ ॥
एष दुर्योधनो राजा धार्तराष्ट्रः सहानुजः ॥ ६ ॥
सामात्यदारो ह्रियते गन्धर्वैर्दिवमाश्रितैः ।
'कुन्तीकुमारो! ये धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन अपने भाइयों, मन्त्रियों तथा स्त्रियोंके साथ यहाँ आये थे। इन्हें गन्धर्वगण आकाशमार्गसे हरकर लिये जाते हैं ॥ ६ १/२ ॥
तं मोक्षयत भद्रं वः सहदारं नराधिपम् ॥ ७ ॥
पराभवो मा भविष्यत् कुरुदारेषु सर्वशः । 'आपलोगोंका कल्याण हो। रानियोंसहित महाराजको छुड़ाइये। कहीं ऐसा न हो कि कुरुकुलकी स्त्रियोंका तिरस्कार हो जाय' ॥ ७ १/२ ॥ एवमुक्ते तु धर्मात्मा ज्येष्ठः पाण्डुसुतस्तदा ॥ ८ ॥ प्रसाद्य पाण्डवान् सर्वान्राज्ञापयत मोक्षणे । उनके ऐसा कहनेपर ज्येष्ठ पाण्डुपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिरने अन्य सब पाण्डवोंको राजी करके हम सब लोगोंको छुड़ानेके लिये आज्ञा दी ॥ ८ १/२ ॥ अथागम्य तमुद्देशं पाण्डवाः पुरुषर्षभाः ॥ ९ ॥ सान्त्वपूर्वमयाचन्त शक्ताः सन्तो महारथाः । तदनन्तर पुरुषसिंह महारथी पाण्डव उस स्थानपर आकर समर्थ होते हुए भी गन्धर्वोंसे सान्त्वनापूर्ण शब्दोंमें (हमें छोड़ देनेके लिये) याचना करने लगे ॥ ९ १/२ ॥ यदा चास्मान् न मुमुचुर्गन्धर्वाः सान्त्विता अपि ॥ १० ॥ (आकाशचारिणो वीरा नदन्तो जलदा इव) । ततोऽर्जुनश्च भीमश्च यमौ च बलोत्कटौ । मुमुचुः शरवर्षाणि गन्धर्वान् प्रत्यनेकशः ॥ ११ ॥ उनके समझाने-बुझानेपर भी जब आकाशचारी वीर गन्धर्व हमें न छोड़ सके और बादलोंकी भाँति गर्जने लगे तब अर्जुन, भीम तथा उत्कट बलशाली नकुल-सहदेवने उन असंख्य गन्धर्वोंकी ओर लक्ष्य करके बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १०-११ ॥ अथ सर्वे रणं मुक्त्वा प्रयाताः खेचराः दिवम् । अस्मानेवाभिकर्षन्तो दीनान् मुदितमानसाः ॥ १२ ॥ फिर तो सारे गन्धर्व रणभूमि छोड़कर आकाशमें उड़ गये और मन-ही-मन आनन्दका अनुभव करते हुए हम दीन-दुखियोंको अपनी ओर घसीटने लगे ॥ १२ ॥ ततः समन्तात् पश्यामः शरजालेन वेष्टितम् । अमानुषाणि चास्त्राणि प्रमुञ्चन्तं धनंजयम् ॥ १३ ॥ इसी समय हमने देखा, चारों ओर बाणोंका जाल-सा बन गया है और उससे वेष्टित हो अर्जुन अलौकिक अस्त्रोंकी वर्षा कर रहे हैं ॥ १३ ॥ समावृता दिशो दृष्ट्वा पाण्डवेन शितैः शरैः । धनंजयसखाऽऽत्मानं दर्शयामास वै तदा ॥ १४ ॥ पाण्डुनन्दन अर्जुनने अपने तीखे बाणोंसे समस्त दिशाओंको आच्छादित कर दिया है, यह देखकर उनके सखा चित्रसेनने अपने-आपको उनके सामने प्रकट कर दिया ॥ १४ ॥ चित्रसेनः पाण्डवेन समाश्लिष्य परस्परम् । कुशलं परिपप्रच्छ तैः पृष्टश्चाप्यनामयम् ॥ १५ ॥
फिर तो चित्रसेन और अर्जुन दोनों एक-दूसरेसे मिले और कुशल-मंगल तथा स्वास्थ्यका समाचार पूछने लगे ॥ १५ ॥
ते समेत्य तथान्योन्यं सन्नाहान् विप्रमुच्य च ।
एकीभूतास्ततो वीरा गन्धर्वाः सह पाण्डवैः ।
अपूजयतामन्योन्यं चित्रसेनधनंजयौ ॥ १६ ॥
दोनोंने एक-दूसरेसे मिलकर अपना कवच उतार दिया। फिर समस्त वीर गन्धर्व पाण्डवोंके साथ मिलकर एक हो गये। तत्पश्चात् चित्रसेन और धनंजयने एक-दूसरेका आदर-सत्कार किया ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनवाक्ये
अष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनवाक्यविषयक दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल १६ १/२ श्लोक हैं)
दुर्योधनका कर्णसे अपनी ग्लानिका वर्णन करते हुए आमरण अनशनका निश्चय, दुःशासनको राजा बननेका आदेश, दुःशासनका दुःख और कर्णका दुर्योधनको समझाना
एकोनपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
दुर्योधनका कर्णसे अपनी ग्लानिका वर्णन करते हुए आमरण अनशनका निश्चय, दुःशासनको राजा बननेका आदेश, दुःशासनका दुःख और कर्णका दुर्योधनको समझाना
दुर्योधन उवाच
चित्रसेनं समागम्य प्रहसन्नर्जुनस्तदा ।
इदं वचनमक्लीबमब्रवीत् परवीरहा ॥ १ ॥
दुर्योधन बोला— कर्ण! चित्रसेनसे मिलकर उस समय शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनने हँसते हुए-से यह शूरोचित वचन कहा— ॥ १ ॥
भ्रातॄनर्हसि मे वीर मोक्तुं गन्धर्वसत्तम ।
अनर्हधर्षणा हीमे जीवमानेषु पाण्डुषु ॥ २ ॥
‘वीर गन्धर्वश्रेष्ठ! तुम्हें मेरे इन भाइयोंको मुक्त कर देना चाहिये। पाण्डवोंके जीते-जी ये इस प्रकार अपमान सहन करनेयोग्य नहीं हैं’ ॥ २ ॥
एवमुक्तस्तु गन्धर्वः पाण्डवेन महात्मना ।
उवाच यत् कर्ण वयं मन्त्रयन्तो विनिर्गताः ॥ ३ ॥
द्रष्टारः स्म सुखाद्धीनान् सदारान् पाण्डवानिति ।
कर्ण! महात्मा पाण्डुनन्दन अर्जुनके ऐसा कहनेपर गन्धर्वने वह बात कह दी, जिसके लिये सलाह करके हमलोग घरसे चले थे। उसने बताया कि ‘ये कौरव सुखसे वञ्चित हुए पाण्डवों तथा द्रौपदीकी दुर्दशा देखनेके लिये आये हैं’ ॥ ३ १/२ ॥
तस्मिन्नुच्चार्यमाणे तु गन्धर्वेण वचस्तथा ॥ ४ ॥
भूमेर्विवरमान्वैच्छं प्रवेष्टुं व्रीडयान्वितः ।
जिस समय गन्धर्व उपर्युक्त बात कह रहा था, उस समय मैं (अत्यन्त) लज्जित हो गया। मेरी इच्छा हुई कि धरती फटे और मैं उसमें समा जाऊँ ॥ ४ १/२ ॥
युधिष्ठिरमथागम्य गन्धर्वाः सह पाण्डवैः ॥ ५ ॥
अस्मद्दुर्मन्त्रितं तस्मै बद्धांश्चास्मान् न्यवेदयन् ।
तत्पश्चात् गन्धर्वोंने पाण्डवोंके साथ युधिष्ठिरके पास आकर हमलोगोंकी दुर्मन्त्रणा उन्हें बतायी और हमें उनके सुपुर्द कर दिया। उस समय हम सब लोग बँधे हुए थे ॥ ५ १/२ ॥
स्त्रीसमक्षमहं दीनो बद्धः शत्रुवशं गतः ॥ ६ ॥
युधिष्ठिरस्योपहृतः किं नु दुःखमतः परम् ।
स्त्रियोंके सामने मैं दीनभावसे बँधकर शत्रुओंके वशमें पड़ गया और उसी दशामें युधिष्ठिरको अर्पित किया गया। इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है? ॥ ६ १/२ ॥
ये मे निराकृता नित्यं रिपुर्येषामहं सदा ॥ ७ ॥
तैर्मोक्षितोऽहं दुर्बुद्धिर्दत्तं तैरेव जीवितम् ।
जिनका मैंने सदा तिरस्कार किया और जिनका मैं सर्वदा शत्रु बना रहा, उन्हीं लोगोंने मुझ दुर्बुद्धिको शत्रुओंके बन्धनसे छुड़ाया है और उन्होंने ही मुझे जीवनदान दिया है ॥ ७ १/२ ॥
प्राप्तः स्यां यद्यहं वीर वधं तस्मिन् महारण्ये ॥ ८ ॥
श्रेयस्तद् भविता मह्यं नैवंभूतस्य जीवितम् ।
वीर! यदि मैं उस महायुद्धमें मारा गया होता तो यह मेरे लिये कल्याणकारी होता; परंतु इस दशामें जीवित रहना कदापि अच्छा नहीं है ॥ ८ १/२ ॥
भवेद् यशः पृथिव्यां मे ख्यातं गन्धर्वतो वधात् ॥ ९ ॥
प्राप्ताश्च पुण्यलोकाः स्युर्महेन्द्रसदनेऽक्षयाः ।
गन्धर्वके हाथसे मारे जानेपर इस भूमण्डलमें मेरा यश विख्यात हो जाता और इन्द्रलोकमें मुझे अक्षय पुण्यधाम प्राप्त होते ॥ ९ १/२ ॥
यत् त्वद्य मे व्यवसितं तच्छृणुध्वं नरर्षभाः ॥ १० ॥
इह प्रायमुपासिष्ये यूयं व्रजत वै गृहान् ।
नरश्रेष्ठ वीरो! अब मैंने जो निश्चय किया है, उसे सुनो। मैं यहाँ आमरण अनशन करूँगा। तुम सब लोग घर लौट जाओ ॥ १० १/२ ॥
भ्रातरश्चैव मे सर्वे यान्त्वद्य स्वपुरं प्रति ॥ ११ ॥
कर्णप्रभृतयश्चैव सुहृदो बान्धवाश्च ये ।
दुःशासनं पुरस्कृत्य प्रयान्त्वद्य पुरं प्रति ॥ १२ ॥
मेरे सब भाई आज अपनी राजधानीको चले जायँ। कर्ण आदि मेरे मित्र तथा बान्धवगण भी दुःशासनको आगे करके आज ही हस्तिनापुरको लौट जायँ ॥
न ह्यहं सम्प्रयास्यामि पुरं शत्रुनिराकृतः ।
शत्रुमानापहो भूत्वा सुहृदां मानकृत् तथा ॥ १३ ॥
शत्रुओंसे अपमानित होकर अब मैं अपने नगरको नहीं जाऊँगा। अबतक मैंने शत्रुओंका मानमर्दन किया है और सुहृदोंको सम्मान दिया है ॥ १३ ॥
स सुहृच्छोकदो जातः शत्रूणां हर्षवर्धनः ।
वारणाह्वयमासाद्य किं वक्ष्यामि जनाधिपम् ॥ १४ ॥
परंतु आज मैं अपने सुहृदोंके लिये शोकदायक और शत्रुओंका हर्ष बढ़ानेवाला हो गया। हस्तिनापुर जाकर मैं राजासे क्या कहूँगा? ।। १४ ।।
भीष्मद्रोणौ कृपद्रौणी विदुरः संजयस्तथा ।
बाह्लीकः सौमदत्तिश्च ये चान्ये वृद्धसम्मताः ।। १५ ।।
ब्राह्मणाः श्रेणिमुख्याश्च तथोदासीनवृत्तयः ।
किं मां वक्ष्यन्ति किं चापि प्रतिवक्ष्यामि तानहम् ।। १६ ।।
भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विदुर, संजय, बाह्लीक, भूरिश्रवा तथा अन्य जो वृद्ध पुरुषोंके लिये आदरणीय महानुभाव हैं वे, तथा ब्राह्मण, प्रमुख वैश्यगण और उदासीन वृत्तिवाले लोग मुझसे क्या कहेंगे और मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? ।। १५-१६ ।।
रिपूणां शिरसि स्थित्वा तथा विक्रम्य चोरसि ।
आत्मदोषात् परिभ्रष्टः कथं वक्ष्यामि तानहम् ।। १७ ।।
मैं पराक्रम करके शत्रुओंके मस्तक तथा छातीपर खड़ा हो गया था; परंतु अब अपने ही दोषसे नीचे गिर गया। ऐसी दशामें उन आदरणीय पुरुषोंसे मैं किस प्रकार वार्तालाप करूँगा? ।। १७ ।।
दुर्विनीताः श्रियं प्राप्य विद्यामैश्वर्यमेव च ।
तिष्ठन्ति न चिरं भद्रे यथाहं मदगर्वितः ।। १८ ।।
उद्दण्ड मनुष्य लक्ष्मी, विद्या तथा ऐश्वर्यको पाकर भी दीर्घकालतक कल्याणमय पदपर प्रतिष्ठित नहीं रह पाते हैं। जैसे मैं मद और अहंकारमें चूर होकर अपनी प्रतिष्ठा खो बैठा हूँ ।। १८ ।।
अहो नार्हमिदं कर्म कष्टं दुश्चरितं कृतम् ।
स्वयं दुर्बुद्धिना मोहाद् येन प्राप्तोऽस्मि संशयम् ।। १९ ।।
अहो! यह कुकर्म मेरे योग्य नहीं था। मुझ दुर्बुद्धिने स्वयं ही मोहवश दुःखदायक दुष्कर्म कर डाला; जिससे (गन्धर्वोंका बंदी हो जानेके कारण) मेरा जीवन संदिग्ध हो गया ।। १९ ।।
तस्मात् प्रायमुपासिष्ये न हि शक्ष्यामि जीवितुम् ।
चेतयानो हि को जीवेत् कृच्छ्राच्छत्रुभिरुद्धृतः ।। २० ।।
इसलिये मैं (अवश्य) आमरण उपवास करूँगा। अब जीवित नहीं रह सकूँगा। जिसका शत्रुओंने संकटसे उद्धार किया हो, ऐसा कौन विचारशील पुरुष जीवित रहना चाहेगा? ।। २० ।।
शत्रुभिश्चावहसितो मानी पौरुषवर्जितः ।
पाण्डवैर्विक्रमाढ्यैश्च सावमानमवेक्षितः ।। २१ ।।
शत्रुओंने मेरी हँसी उड़ायी है। मुझे अपने पौरुषका अभिमान था; किंतु यहाँ मैं कोई पुरुषार्थ न दिखा सका। पराक्रमी पाण्डवोंने अवहेलनापूर्ण दृष्टिसे मुझे देखा है। (ऐसी
दशामें मुझे इस जीवनसे विरक्ति हो गयी है) ॥ २१ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं चिन्तापरिगतो दुःशासनमथाब्रवीत् ।
दुःशासन निबोधेदं वचनं मम भारत ॥ २२ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार चिन्तामग्न हुए दुर्योधनने दुःशासनसे कहा—'भरतनन्दन दुःशासन! मेरी यह बात सुनो— ॥ २२ ॥
प्रतीच्छ त्वं मया दत्तमभिषेकं नृपो भव ।
प्रशाधि पृथिवीं स्फीतां कर्णसौबलपालिताम् ॥ २३ ॥
'मैं तुम्हारा राज्याभिषेक करता हूँ। तुम मेरे दिये हुए इस राज्यको ग्रहण करो और राजा बनो। कर्ण और शकुनिकी सहायतासे सुरक्षित एवं धन-धान्यसे समृद्ध इस पृथ्वीका शासन करो ॥ २३ ॥
भ्रातॄन् पालय विस्रब्धं मरुतो वृत्रहा यथा ।
बान्धवाश्चोपजीवन्तु देवा इव शतक्रतुम् ॥ २४ ॥
'जैसे इन्द्र मरुद्गणोंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार तुम अपने अन्य भाइयोंका विश्वासपूर्वक पालन करना। जैसे देवता इन्द्रके आश्रित रहकर जीवननिर्वाह करते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे बान्धवजन भी तुम्हारा आश्रय लेकर जीविका चलावें ॥ २४ ॥
ब्राह्मणेषु सदा वृत्तिं कुर्वीथाश्चाप्रमादतः ।
बन्धूनां सुहृदां चैव भवेथास्त्वं गतिः सदा ॥ २५ ॥
'प्रमाद छोड़कर सदा ब्राह्मणोंकी जीविकाकी व्यवस्था एवं रक्षा करना। बन्धुओं तथा सुहृदोंको सदैव सहारा देते रहना ॥ २५ ॥
ज्ञातींश्चाप्यनुपश्येथा विष्णुर्देवगणान् यथा ।
गुरवः पालनीयास्ते गच्छ पालय मेदिनीम् ॥ २६ ॥
नन्दयन् सुहृदः सर्वान् शात्रवांश्चावभर्त्सयन् ।
कण्ठे चैनं परिष्वज्य गम्यतामित्युवाच ह ॥ २७ ॥
'जैसे भगवान् विष्णु देवताओंपर कृपादृष्टि रखते हैं, उसी प्रकार तुम भी अपने कुटुम्बीजनोंकी देखभाल करते रहना और गुरुजनोंका सदैव पालन करना। अच्छा, अब जाओ और समस्त सुहृदोंका आनन्द बढ़ाते तथा शत्रुओंकी भर्त्सना करते हुए अपनी अधिकृत भूमिकी रक्षा करो।' ऐसा कहकर दुर्योधनने दुःशासनको गलेसे लगा लिया और गद्गद कण्ठसे कहा—'जाओ' ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा दीनो दुःशासनोऽब्रवीत् ।
अश्रुकण्ठः सुदुःखार्तः प्राञ्जलिः प्रणिपत्य च ॥ २८ ॥
सगद्गदमिदं वाक्यं भ्रातरं ज्येष्ठमात्मनः ।
प्रसीदेत्यपतद् भूमौ दूयमानेन चेतसा ॥ २९ ॥
दुःखितः पादयोस्तस्य नेत्रजं जलमुत्सृजन् ।
उक्त्वांश्र्च नरव्याघ्रो नैतदेवं भविष्यति ॥ ३० ॥
दुर्योधनकी यह बात सुनकर दुःशासनका गला भर आया। वह अत्यन्त दुःखसे आतुर हो दीनभावसे हाथ जोड़कर अपने बड़े भाईके चरणोंमें गिर पड़ा और गद्गद वाणीमें व्यथित चित्तसे इस प्रकार बोला—‘भैया! आप प्रसन्न हों?’ ऐसा कहकर वह धरतीपर लोट गया और दुःखसे कातर हो दुर्योधनके दोनों चरणोंमें अपने नेत्रोंका अश्रुजल चढ़ाता हुआ नरश्रेष्ठ दुःशासन यों बोला—‘नहीं, ऐसा नहीं होगा ॥ २८—३० ॥
विदीर्येत् सकला भूमिर्द्यौश्चापि शकलीभवेत् ।
रविरात्मप्रभां जह्यात् सोमः शीतांशुतां त्यजेत् ॥ ३१ ॥
वायुः शैघ्र्यमथो जह्याद्धिमवांश्च परिव्रजेत् ।
शुष्येत् तोयं समुद्रेषु वह्निरप्युष्णतां त्यजेत् ॥ ३२ ॥
न चाहं त्वदृते राजन् प्रशासेयं वसुन्धराम् ।
पुनः पुनः प्रसीदेति वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ ३३ ॥
‘चाहे सारी पृथ्वी फट जाय, आकाशके टुकड़े-टुकड़े हो जायँ, सूर्य अपनी प्रभा और चन्द्रमा अपनी शीतलता त्याग दें, वायु अपनी तीव्र गति छोड़ दें, हिमालय अपना स्थान छोड़कर इधर-उधर घूमने लगे, समुद्रका जल सूख जाय तथा अग्नि अपनी उष्णता त्याग दे; परंतु मैं आपके बिना इस पृथ्वीका शासन नहीं करूँगा। राजन्! अब आप प्रसन्न हो जाइये, प्रसन्न हो जाइये।’ इस अन्तिम वाक्यको दुःशासनने बार-बार दुहराया और इस प्रकार कहा— ॥ ३१—३३ ॥
त्वमेव नः कुले राजा भविष्यसि शतं समाः ।
एवमुक्त्वा स राजानं सुस्वरं प्ररुरोद ह ॥ ३४ ॥
पादौ संस्पृश्य मानार्हो भ्रातुर्ज्येष्ठस्य भारत ।
‘भैया! आप ही हमारे कुलमें सौ वर्षोंतक राजा बने रहेंगे।’ जनमेजय! ऐसा कहकर दुःशासन अपने बड़े भाईके माननीय चरणोंको पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगा ॥ ३४ १/२ ॥
तथा तौ दुःखितौ दृष्ट्वा दुःशासनसुयोधनौ ॥ ३५ ॥
अभिगम्य व्यथाविष्टः कर्णस्तौ प्रत्यभाषत ।
दुःशासन और दुर्योधनको इस प्रकार दुःखी होते देख कर्णके मनमें बड़ी व्यथा हुई। उसने निकट जाकर उन दोनोंसे कहा— ॥ ३५ १/२ ॥
विषीदथः किं कौरव्यौ बालिश्यात् प्राकृताविव ॥ ३६ ॥
न शोकः शोचमानस्य विनिवर्तेत कर्हिचित् ।
‘कुरुकुलके श्रेष्ठ वीरो! तुम दोनों गँवारोंकी तरह नासमझीके कारण इतना विषाद क्यों कर रहे हो? शोकमें डूबे रहनेसे किसी मनुष्यका शोक कभी निवृत्त नहीं होता ॥ ३६ १/२ ॥
यदा च शोचतः शोको व्यसनं नापकर्षति ।। ३७ ।। सामर्थ्यं किं ततः शोके शोचमानौ प्रपश्यथः । धृतिं गृहीत मा शत्रून् शोचन्तौ नन्दयिष्यथः ।। ३८ ।। जब शोक करनेवालेका शोक उसपर आये हुए संकटको टाल नहीं सकता है, तब उसमें क्या सामर्थ्य है? यह तुम दोनों भाई शोक करके प्रत्यक्ष देख रहे हो। अतः धैर्य धारण करो। शोक करके तो शत्रुओंका हर्ष ही बढ़ाओगे ।।
कर्तव्यं हि कृतं राजन् पाण्डवैस्तव मोक्षणम् । नित्यमेव प्रियं कार्यं राज्ञो विषयवासिभिः ।। ३९ ।। ‘राजन्! पाण्डवोंने गन्धर्वोंके हाथसे तुम्हें छुड़ाकर अपने कर्तव्यका ही पालन किया है। राजाके राज्यमें रहनेवालोंको सदा ही उसका प्रिय करना चाहिये ।। ३९ ।।
पाल्यमानास्त्वया ते हि निवसन्ति गतज्वराः । नार्हस्येवंगते मन्युं कर्तुं प्राकृतवद् यथा ।। ४० ।। ‘तुमसे सुरक्षित होकर वे यहाँ निश्चिन्ततापूर्वक निवास कर रहे हैं। ऐसी दशामें तुम्हें निम्न कोटिके मनुष्योंकी तरह दीनतापूर्ण खेद नहीं करना चाहिये ।। ४० ।।
विषण्णास्तव सोदर्यास्त्वयि प्रायं समास्थिते । (तदलं दुःखितानेतान् कर्तुं सर्वान् नराधिप ।।) उत्तिष्ठ व्रज भद्रं ते समाश्वासय सोदरान् ।। ४१ ।। ‘राजन्! तुम आमरण उपवासका व्रत लेकर बैठे हो और इधर तुम्हारे सगे भाई शोक एवं विषादमें डूबे हुए हैं। बस, इन सबको दुःखी करनेसे कोई लाभ नहीं है। तुम्हारा भला हो। उठो, चलो और अपने भाइयोंको आश्वासन दो’ ।। ४१ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनप्रायोपवेशे एकोनपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २४९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनप्रायोपवेशनविषयक दो सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २४९ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४१ १/३ श्लोक हैं)
२५०-
पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
कर्णके समझानेपर भी दुर्योधनका आमरण अनशन करनेका ही निश्चय
कर्ण उवाच
राजन्नाद्यावगच्छामि तवेह लघुसत्त्वताम् ।
किमत्र चित्रं यद् वीर मोक्षितः पाण्डवैरसि ॥ १ ॥
सद्यो वशं समापन्नः शत्रूणां शत्रुकर्शन ।
कर्ण बोला— राजन्! आज तुम जो यहाँ इतनी लघुताका अनुभव कर रहे हो, इसका कोई कारण मेरी समझमें नहीं आता। शत्रुनाशक वीर! यदि एक बार शत्रुओंके वशमें पड़ जानेपर पाण्डवोंने तुम्हें छुड़ाया है, तो इसमें कौन अद्भुत बात हो गयी? ॥ १ १/२ ॥
सेनाजीवैश्च कौरव्य तथा विषयवासिभिः ॥ २ ॥
अज्ञातैर्यादि वा ज्ञातैः कर्तव्यं नृपतेः प्रियम् ।
कुरुश्रेष्ठ! जो राजकीय सेनामें रहकर जीविका चलाते हैं तथा राजाके राज्यमें निवास करते हैं, वे ज्ञात हों या अज्ञात; उनका कर्तव्य है कि वे सदा राजाका प्रिय करें ॥ २ १/२ ॥
प्रायः प्रधानाः पुरुषाः क्षोभयन्त्यरिवाहिनीम् ॥ ३ ॥
निगृह्यन्ते च युद्धेषु मोक्ष्यन्ते चैव सैनिकैः ।
प्रायः देखा जाता है कि प्रधान पुरुष लड़ते-लड़ते शत्रुओंकी सेनाको व्याकुल कर देते हैं। फिर उसी युद्धमें वे बंदी बना लिये जाते हैं और साधारण सैनिकोंकी सहायतासे छूट भी जाते हैं ॥ ३ १/२ ॥
सेनाजीवाश्च ये राज्ञां विषये सन्ति मानवाः ॥ ४ ॥
तैः सङ्गम्य नृपार्थाय यतितव्यं यथातथम् ।
जो मनुष्य सेनाजीवी हैं अथवा राजाके राज्यमें निवास करते हैं, उन सबको मिलकर अपने राजाके हितके लिये यथोचित प्रयत्न करना चाहिये ॥ ४ १/२ ॥
यद्येवं पाण्डवै राजन् भवद्विषयवासिभिः ॥ ५ ॥
यदृच्छया मोक्षितोऽसि तत्र का परिदेवना ।
राजन्! यदि तुम्हारे राज्यमें निवास करनेवाले पाण्डवोंने इसी नीतिके अनुसार दैववश तुम्हें शत्रुओंके हाथसे छुड़ा दिया है, तो इसमें खेद करनेकी क्या बात है? ॥ ५ १/२ ॥
न चैतत् साधु यद् राजन् पाण्डवास्तां नृपोत्तमम् ॥ ६ ॥
स्वसेनया सम्प्रयान्तं नानुयान्ति स्म पृष्ठतः ।
राजन्! आप श्रेष्ठ नरेश हैं और अपनी सेनाके साथ वनमें पधारे हैं, ऐसी दशामें यहाँ रहनेवाले पाण्डव यदि आपके पीछे-पीछे न चलते—आपकी सहायता न करते तो यह उनके लिये अच्छी बात न होती ॥ ६ ½ ॥
शूराश्च बलवन्तश्च संयुगेष्वपलायिनः ॥ ७ ॥
भवतस्ते सहाया वै प्रेष्यतां पूर्वमागताः ।
पाण्डव शौर्यसम्पन्न, बलवान् तथा युद्धमें पीठ न दिखानेवाले हैं। वे आपके दास तो बहुत पहले ही हो चुके हैं, अतः उन्हें आपका सहायक होना ही चाहिये ॥ ७ ½ ॥
पाण्डवेयानि रत्नानि त्वमद्याप्युपभुञ्जसे ॥ ८ ॥
सत्त्वस्थान् पाण्डवान् पश्य न ते प्रायमुपाविशन् ।
(तदलं ते महाबाहो विषादं कर्तुमीदृशम् ।)
उत्तिष्ठ राजन् भद्रं ते न चिरं कर्तुमर्हसि ॥ ९ ॥
पाण्डवोंके पास जितने रत्न थे, उन सबका उपभोग आज तुम्हीं कर रहे हो; तथापि देखो, पाण्डव कितने धैर्यवान् हैं कि उन्होंने कभी आमरण अनशन नहीं किया। अतः महाबाहो! तुम्हारे इस प्रकार विषाद करनेसे कोई लाभ नहीं है। राजन्! उठो, तुम्हारा कल्याण हो। अब यहाँ अधिक विलम्ब नहीं करना चाहिये ॥
अवश्यमेव नृपते राज्ञो विषयवासिभिः ।
प्रियाण्याचरितव्यानि तत्र का परिदेवना ॥ १० ॥
नरेश्वर! राजाके राज्यमें निवास करनेवाले लोगोंको अवश्य ही उसके प्रिय कार्य करने चाहिये। अतः इसके लिये पछताने या विलाप करनेकी क्या बात है? ॥ १० ॥
मद्वाक्यमेतद् राजेन्द्र यद्येवं न करिष्यसि ।
स्थास्यामीह भवत्पादौ शुश्रूषन्नरिमर्दन ॥ ११ ॥
शत्रुओंका मान मर्दन करनेवाले महाराज! यदि तुम मेरी यह बात नहीं मानोगे तो मैं भी तुम्हारे चरणोंकी सेवा करता हुआ यहीं रह जाऊँगा ॥ ११ ॥
नोत्सहे जीवितुमहं त्वद्विहीनो नरर्षभ ।
प्रायोपविष्टस्तु नृप राज्ञां हास्यो भविष्यसि ॥ १२ ॥
नरश्रेष्ठ! तुमसे अलग होकर मैं जीवित नहीं रहना चाहता। राजन्! आमरण अनशनके लिये बैठ जानेपर तुम समस्त राजाओंके उपहासपात्र हो जाओगे ॥ १२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कर्णेन राजा दुर्योधनस्तदा ।
नैवोत्थातुं मनश्चक्रे स्वर्गाय कृतनिश्चयः ॥ १३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! कर्णके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधनने स्वर्गलोकमें ही जानेका निश्चय करके उस समय उठनेका विचार नहीं किया ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनप्रायोपवेशे कर्णवाक्ये पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनप्रायोपवेशनके प्रसंगमें कर्णवाक्यसम्बन्धी दो सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल १३ १/३ श्लोक हैं)