महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अङ्गान् वङ्गान् कलिङ्गांश्च शुण्डिकान् मिथिलानथ । मागधान् कर्कखण्डांश्च निवेश्य विषयेऽऽत्मनः ॥ ८ ॥ आवशीरंश्च योध्यांश्च अहिक्षत्रं च निर्जयत् । पूर्वां दिशं विनिर्जित्य वत्सभूमिं तथागमत् ॥ ९ ॥ अंग, वंग, कलिंग, शुण्डिक, मिथिला, मगध और कर्कखण्ड—इन सब देशोंको अपने राज्यमें मिलाकर कर्णने आवशीर, योध्य और अहिक्षत्र देशको भी जीत लिया। इस प्रकार पूर्व दिशापर विजय प्राप्त करके उसने वत्सभूमिमें पदार्पण किया ॥ ८-९ ॥ वत्सभूमिं विनिर्जित्य केवलां मृत्तिकावतीम् । मोहनं पत्तनं चैव त्रिपुरीं कोसलां तथा ॥ १० ॥ एतान् सर्वान् विनिर्जित्य करमादाय सर्वशः । वत्सभूमिको जीतकर कर्णने केवला, मृत्तिकावती, मोहन, पत्तन, त्रिपुरी तथा कोसला—इन सब देशोंको अपने अधिकारमें किया और सबसे कर लेकर (दक्षिण दिशाकी ओर) प्रस्थान किया ॥ १० १/२ ॥ दक्षिणां दिशमास्थाय कर्णो जित्वा महारथान् ॥ ११ ॥ रुक्मिणं दाक्षिणात्येषु योधयामास सूतजः । स युद्धं तुमुलं कृत्वा रुक्मी प्रोवाच सूतजम् ॥ १२ ॥ दक्षिण दिशामें पहुँचकर कर्णने बड़े-बड़े महारथियोंको जीता। दाक्षिणात्योमें रुक्मीके साथ कर्णने युद्ध किया। रुक्मीने पहले तो बड़ा भयंकर युद्ध किया, फिर उसने सूतपुत्र कर्णसे कहा ॥ ११-१२ ॥ प्रीतोऽस्मि तव राजेन्द्र विक्रमेण बलेन च । न ते विघ्नं करिष्यामि प्रतिज्ञां समपालयम् ॥ १३ ॥ ‘राजेन्द्र! मैं तुम्हारे बल और पराक्रमसे बहुत प्रसन्न हूँ। अतः तुम्हारे कार्यमें विघ्न नहीं डालूँगा। थोड़ी देर युद्ध करके मैंने केवल क्षत्रियधर्मका पालन किया है ॥ १३ ॥ प्रीत्या चाहं प्रयच्छामि हिरण्यं यावदिच्छसि । समेत्य रुक्मिणा कर्णः पाण्ड्यंशैलं च सोऽगमत् ॥ १४ ॥ ‘तुम जितना सोना ले जाना चाहो उतना मैं प्रसन्नतापूर्वक दे रहा हूँ।’ इस प्रकार रुक्मीसे मिलकर कर्णने पाण्ड्यदेश तथा श्रीशैलकी ओर प्रस्थान किया ॥ स केरलं रणे चैव नीलं चापि महीपतिम् । वेणुदारिसुतं चैव ये चान्ये नृपसत्तमाः ॥ १५ ॥ दक्षिणस्यां दिशि नृपान् करान् सर्वानदापयत् । उसने रणभूमिमें केरल नरेश, राजा नील तथा वेणुदारिपुत्रको हराया और दक्षिण दिशामें अन्य जितने प्रमुख भूपाल थे, उन सबको जीतकर उनसे कर वसूल किया ॥ १५ १/२ ॥
शैशुपालिं ततो गत्वा विजिग्ये सूतनन्दनः ।। १६ ।।
पार्श्वस्थांश्चापि नृपतीन् वशे चक्रे महाबलः ।
इसके बाद सूतपुत्र महाबली कर्णने चेदिदेशमें जाकर शिशुपालके पुत्रको हराया और उसके पार्श्ववर्ती नरेशोंको भी अपने अधीन कर लिया ।। १६½ ।।
आवन्त्यांश्च वशे कृत्वा साम्ना च भरतर्षभ ।
वृष्णिभिः सह संगम्य पश्चिमामपि निर्जयत् ।। १७ ।।
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर उसने सामनीतिके द्वारा अवन्तीदेशके राजाओंको वशमें करके वृष्णिवंशी यादवोंसे हिल-मिलकर पश्चिम दिशापर भी विजय प्राप्त की ।। १७ ।।
वारुणीं दिशमागम्य यवनान् बर्बरांस्तथा ।
नृपान् पश्चिमभूमिस्थान् दापयामास वै करान् ।। १८ ।।
इसके बाद पश्चिम दिशामें जाकर यवन तथा बर्बर राजाओंको, जो पश्चिम देशके ही निवासी थे, पराजित करके उनसे कर लिया ।। १८ ।।
विजित्य पृथिवीं सर्वां स पूर्वापरदक्षिणाम् ।
सम्लेच्छाटविकान् वीरः सपर्वतनिवासिनः ।। १९ ।।
भद्रान् रोहितकांश्चैव आग्रेयान् मालवानपि ।
गणान् सर्वान् विनिर्जित्य नीतिकृत् प्रहसन्निव ।। २० ।।
शशकान् यवनांश्चैव विजिग्ये सूतनन्दनः ।
इस प्रकार पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण सब दिशाओंकी समूची पृथ्वीको जीतकर म्लेच्छ, वनवासी, पर्वतीय, भद्र, रोहितक, आग्नेय तथा मालव आदि समस्त गणराज्योंको परास्त किया। इसके बाद नीतिके अनुसार काम करनेवाले सूतनन्दन कर्णने हँसते-हँसते शशक और यवन राजाओंको भी जीत लिया ।। १९-२०½ ।।
नग्नजित्प्रमुखांश्चैव गणान् जित्वा महारथान् ।। २१ ।।
एवं स पृथिवीं सर्वां वशे कृत्वा महारथः ।
विजित्य पुरुषव्याघ्रो नागसाह्वयमागमत् ।। २२ ।।
इस प्रकार पुरुषसिंह महारथी कर्ण नग्नजित् आदि महारथी नरेशसमुदायोंको जीतकर सारी पृथ्वीको पराजित करके अपने वशमें कर लेनेके पश्चात् हस्तिनापुरको लौट आया ।। २१-२२ ।।
तमागतं महेष्वासं धार्तराष्ट्रो जनाधिपः ।
प्रत्युद्गम्य महाराज सभ्रातृपितृबान्धवः ।। २३ ।।
अर्चयामास विधिना कर्णमाहवशोभिनम् ।
आश्रावयच्च तत् कर्म प्रीयमाणो जनेश्वरः ।। २४ ।।
महाराज! रणमें शोभा पानेवाले महाधनुर्धर कर्णको आया हुआ जान भाई, पिता तथा बन्धु-बान्धवोंसहित राजा दुर्योधनने उसकी अगवानी की और विधिपूर्वक उसका स्वागत-
सत्कार किया। तत्पश्चात् दुर्योधनने अत्यन्त प्रसन्न होकर कर्णके दिग्विजयकी सब ओर घोषणा करा दी ।।
यन्न भीष्मान्न च द्रोणान्न कृपान्न च बाह्लिकात् ।
प्राप्तवानस्मि भद्रं ते त्वत्तः प्राप्तं मया हि तत् ।। २५ ।।
तत्पश्चात् उसने कर्णसे कहा—'वीरवर! तुम्हारा कल्याण हो। मुझे भीष्मजीसे, आचार्य द्रोणसे, कृपाचार्यसे तथा बाह्लिकसे भी जो वस्तु नहीं मिली थी, वह तुमसे प्राप्त हो गयी ।। २५ ।।
बहुना च किमुक्तेन शृणु कर्ण वचो मम ।
सनाथोऽस्मि महाबाहो त्वया नाथेन सत्तम ।। २६ ।।
‘महाबाहु कर्ण! अधिक कहनेसे क्या लाभ? तुम मेरी बात सुनो। सत्पुरुषरत्न! तुम्हें अपना नाथ (सहायक) पाकर ही मैं सनाथ हूँ ।। २६ ।।
न हि ते पाण्डवाः सर्वे कलामर्हन्ति षोडशीम् ।
अन्ये वा पुरुषव्याघ्र राजानोऽभ्युदितोदिताः ।। २७ ।।
‘पुरुषसिंह! वे समस्त पाण्डव अथवा अन्य श्रेष्ठतम नरेश तुम्हारी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते ।। २७ ।।
स भवान् धृतराष्ट्रं तं गान्धारीं च यशस्विनीम् ।
पश्य कर्ण महेष्वास अदितिं वज्रभृद् यथा ॥ २८ ॥ ‘महाधनुर्धर कर्ण! अब तुम मेरे पूज्य पिता धृतराष्ट्र तथा यशस्विनी माता गान्धारीका उसी प्रकार दर्शन करो, जैसे वज्रधारी इन्द्र माता अदितिका दर्शन करते हैं’ ॥ २८ ॥ ततो हलहलाशब्दः प्रादुरासीद् विशाम्पते । हाहाकाराश्च बहवो नगरे नागसाह्वये ॥ २९ ॥ जनमेजय! तदनन्तर हस्तिनापुर नगरमें सब ओर बड़ा भारी कोलाहल मच गया। अनेक प्रकारके हाहाकार सुनायी देने लगे ॥ २९ ॥ केचिदेनं प्रशंसन्ति निन्दन्ति स्म तथापरे । तूष्णीमासंस्तथा चान्ये नृपास्तत्र जनाधिप ॥ ३० ॥ राजन्! कोई तो कर्णकी प्रशंसा करते थे और दूसरे उसकी निन्दा। अन्य कितने ही राजा निन्दा और प्रशंसा कुछ भी न करके मौन थे ॥ ३० ॥ एवं विजित्य राजेन्द्र कर्णः शस्त्रभृतां वरः । सपर्वतवनाकाशां ससमुद्रां सनिष्कुटाम् ॥ ३१ ॥ देशैरुच्चावचैः पूर्णां पत्तनैर्नगरैरपि । द्वीपैरानूपसम्पूर्णैः पृथिवीं पृथिवीपते ॥ ३२ ॥ कालेन नातिदीर्घेण वशे कृत्वा तु पार्थिवान् । अक्षयं धनमादाय सूतजो नृपमभ्ययात् ॥ ३३ ॥ महाराज! इस प्रकार शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र कर्णने पर्वत, वन, खुले स्थान, समुद्र, उद्यान, ऊँचे-नीचे देश, पुर और नगर, द्वीप और जलयुक्त प्रदेशोंसे युक्त सारी पृथ्वीको जीतकर थोड़े ही समयमें समस्त राजाओंको वशमें कर लिया और उनसे अटूट धनराशि लेकर वह राजा धृतराष्ट्रके समीप आया ॥ ३१—३३ ॥ प्रविश्य च गृहं राजन्नभ्यन्तरमरिंदम । गान्धारीसहितं वीरो धृतराष्ट्रं ददर्श सः ॥ ३४ ॥ पुत्रवच्च नरव्याघ्र पादौ जग्राह धर्मवित् । धृतराष्ट्रेण चाश्लिष्य प्रेम्णा चापि विसर्जितः ॥ ३५ ॥ शत्रुसूदन जनमेजय! धर्मज्ञ वीर कर्णने अन्तःपुरमें प्रवेश करके गान्धारीसहित धृतराष्ट्रका दर्शन किया और पुत्रकी भाँति उसने उनके दोनों चरण पकड़ लिये। धृतराष्ट्रने भी उसे प्रेमपूर्वक हृदयसे लगाकर विदा किया ॥ तदा प्रभृति राजा च शकुनिश्चापि सौबलः । जानते निर्जितान् पार्थान् कर्णेन युधि भारत ॥ ३६ ॥ भारत! तबसे राजा दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि युद्धमें कर्णद्वारा पाण्डवोंको पराजित हुआ ही समझने लगे ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णदिग्विजये चतुष्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २५४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्णदिग्विजयसम्बन्धी दो सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २५४ ।।
२५५-
पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
कर्ण और पुरोहितकी सलाहसे दुर्योधनकी वैष्णवयज्ञके लिये तैयारी
वैशम्पायन उवाच
जित्वा तु पृथिवीं राजन् सूतपुत्रो जनाधिप ।
अब्रवीत् परवीरघ्नो दुर्योधनमिदं वचः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज जनमेजय! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सूतपुत्र कर्णने सारी पृथ्वीको जीतकर दुर्योधनसे इस प्रकार कहा ॥ १ ॥
कर्ण उवाच
दुर्योधन निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि कौरव ।
श्रुत्वा वाचं तथा सर्वं कर्तुमर्हस्यरिंदम ॥ २ ॥
**कर्ण बोला—**कुरुनन्दन दुर्योधन! मैं जो कहता हूँ, उसे सुनो। शत्रुदमन! मेरी बात सुनकर उसके अनुसार सब कुछ करो ॥ २ ॥
तवाद्य पृथिवी वीर निःसपत्ना नृपोत्तम ।
तां पालय यथा शक्रो हतशत्रुर्महामनाः ॥ ३ ॥
वीर! नृपश्रेष्ठ! आज सारी पृथ्वी तुम्हारे लिये निष्कण्टक हो गयी है। जैसे महामना इन्द्र अपने शत्रुओंका संहार करके त्रिलोकीका पालन करते हैं, उसी प्रकार तुम भी इस पृथ्वीका पालन करो ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कर्णेन कर्णं राजाब्रवीत् पुनः ।
न किंचिद् दुर्लभं तस्य यस्य त्वं पुरुषर्षभ ॥ ४ ॥
सहायश्चानुरक्तश्च मदर्थं च समुद्यतः ।
अभिप्रायस्तु मे कश्चित् तं वै शृणु यथातथम् ॥ ५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कर्णके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधनने पुनः उससे कहा—'पुरुषश्रेष्ठ! जिसके सहायक तुम हो एवं जिसपर तुम्हारा अनुराग है, उसके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है। तुम सदा मेरे हितके लिये उद्यत रहते हो। मेरा एक मनोरथ है, जिसे यथार्थरूपसे बतलाता हूँ, सुनो' ॥ ४-५॥
राजसूयं पाण्डवस्य दृष्ट्वा क्रतुवरं महत् ।
मम स्पृहा समुत्पन्ना तां सम्पादय सूतज ॥ ६ ॥
सूतनन्दन! 'पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके उस क्रतुश्रेष्ठ महान् राजसूययज्ञको देखकर मेरे मनमें
भी उसे करनेकी इच्छा जाग उठी है। तुम इस इच्छाको पूर्ण करो' ।। ६ ।।
एवमुक्तस्ततः कर्णो राजानमिदमब्रवीत् ।
तवाद्य पृथिवीपाला वश्याः सर्वे नृपोत्तम ॥ ७ ॥
आहूयन्तां द्विजवराः सम्भाराश्च यथाविधि ।
सम्भ्रियन्तां कुरुश्रेष्ठ यज्ञोपकरणानि च ।। ८ ।।
दुर्योधनकी यह बात सुनकर कर्णने उससे यह कहा—'नृपश्रेष्ठ! इस समय भूपाल
तुम्हारे वशमें हैं। कुरुकुलश्रेष्ठ! उत्तम ब्राह्मणोंको बुलाओ और विधिपूर्वक यज्ञकी सामग्रियों
तथा उपकरणोंको जुटाओ ।। ७-८ ।।
ऋत्विजश्च समाहूता यथोक्ता वेदपारगाः ।
क्रियां कुर्वन्तु ते राजन् यथाशास्त्रमरिंदम ॥ ९ ॥
'शत्रुदमन नरेश! तुम्हारे द्वारा आमन्त्रित शास्त्रोक्त योग्यतासे सम्पन्न वेदज्ञ ऋत्विक्
विधिके अनुसार सब कार्य करें ।। ९ ।।
बह्वन्नपानसंयुक्तः सुसमृद्धगुणान्वितः ।
प्रवर्त्ततां महायज्ञस्तवापि भरतर्षभ ॥ १० ॥
'भरतश्रेष्ठ! तुम्हारा महायज्ञ भी प्रचुर अन्नपानकी सामग्रीसे युक्त और अत्यन्त
समृद्धिशाली गुणोंसे सम्पन्न हो' ।। १० ।।
एवमुक्तस्तु कर्णेन धार्तराष्ट्रो विशाम्पते ।
पुरोहितं समानाय्य वचनं चेदमब्रवीत् ।। ११ ।।
राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं समाप्तवरदक्षिणम् ।
आहर त्वं मम कृते यथान्यायं यथाक्रमम् ।। १२ ।।
राजन्! कर्णके इस प्रकार अनुमोदन करनेपर दुर्योधनने अपने पुरोहितको बुलाकर यह
बात कही—'ब्रह्मन्! आप मेरे लिये उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका यथोचित
रीतिसे विधिपूर्वक अनुष्ठान करवाइये' ।। ११-१२ ।।
स एवमुक्तो नृपतिमुवाच द्विजसत्तमः ।
(ब्राह्मणैः सहितो राजन् ये तत्रासन् समागताः ।)
न स शक्यः क्रतुश्रेष्ठो जीवमाने युधिष्ठिरे ।। १३ ।।
आहर्तुं कौरवश्रेष्ठ कुले तव नृपोत्तम ।
दीर्घायुर्जीवति च ते धृतराष्ट्रः पिता नृप ।। १४ ।।
अतश्चापि विरुद्धस्ते क्रतुरेष नृपोत्तम ।
नरेश्वर! राजाके इस प्रकार आदेश देनेपर विप्रवर पुरोहितने वहाँ आये हुए अन्य
ब्राह्मणोंके साथ इस प्रकार उत्तर दिया—'कौरवश्रेष्ठ! नृपशिरोमणे! राजा युधिष्ठिरके जीते
आपके कुलमें इस उत्तम क्रतु राजसूयका अनुष्ठान नहीं किया जा सकता। महाराज! अभी
आपके दीर्घायु पिता धृतराष्ट्र भी जीवित हैं, इसलिये भी यह यज्ञ आपके लिये अनुकूल नहीं पड़ता ।।
अस्ति त्वन्यन्महत् सत्रं राजसूयसमं प्रभो ॥ १५ ॥ प्रभो! एक-दूसरा महान् यज्ञ है, जो राजसूयकी समानता रखता है ॥ १५ ॥
तेन त्वं यज राजेन्द्र शृणु चेदं वचो मम । य इमे पृथिवीपालाः करदास्तव पार्थिव ॥ १६ ॥ ते करान् सम्प्रयच्छन्तु सुवर्णं च कृताकृतम् । तेन ते क्रियतामद्य लाङ्गलं नृपसत्तम ॥ १७ ॥ ‘राजेन्द्र! आप उसीके द्वारा भगवान्का यजन कीजिये और इसके सम्बन्धमें मेरी यह बात सुनिये। पृथ्वीनाथ! ये जो सब भूपाल आपको कर देते हैं, इन्हें आज्ञा दीजिये—ये लोग आपको सुवर्णके बने हुए आभूषण तथा सुवर्ण ‘कर’ के रूपमें अर्पण करें। नृपश्रेष्ठ! उसी सुवर्णसे आप एक हल तैयार करवाइये ॥ १६-१७ ॥
यज्ञवाटस्य ते भूमिः कृष्यतां तेन भारत । तत्र यज्ञो नृपश्रेष्ठ प्रभूतान्नः सुसंस्कृतः ॥ १८ ॥ प्रवर्ततां यथान्यायं सर्वतो ह्यनिवारितः । ‘भारत! उसी हलसे आपके यज्ञमण्डपकी भूमि जोती जाय। नृपश्रेष्ठ! उस जोती हुई भूमिमें ही उत्तम संस्कारसे सम्पन्न, प्रचुर अन्नपानसे युक्त और सबके लिये खुला हुआ यज्ञ यथोचितरूपसे प्रारम्भ किया जाय ॥ १८ १/२ ॥
एष ते वैष्णवो नाम यज्ञः सत्पुरुषोचितः ॥ १९ ॥ एतेन नेष्टवान् कश्चिदृते विष्णुं पुरातनम् । राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं स्पर्धत्येष महाक्रतुः ॥ २० ॥ ‘यह मैंने आपको वैष्णव नामक यज्ञ बताया है जिसका अनुष्ठान सत्पुरुषोंके लिये सर्वथा उचित है। पुरातन पुरुष भगवान् विष्णुके सिवा और किसीने अबतक इस यज्ञका अनुष्ठान नहीं किया है। यह महायज्ञ क्रतुश्रेष्ठ राजसूयसे टक्कर लेनेवाला है ॥ १९-२० ॥
अस्माकं रोचते चैव श्रेयश्च तव भारत । निर्विघ्नश्च भवत्येष सफला स्यात् स्पृहा तव ॥ २१ ॥ ‘भारत! हमलोगोंको तो यही यज्ञ पसंद है और यही आपके लिये कल्याणकारी होगा। यह यज्ञ बिना किसी विघ्न-बाधाके सम्पन्न हो जाता है; अतः तुम्हारी यह यज्ञविषयक अभिलाषा भी इसीसे सफल होगी ॥ २१ ॥
(तस्मादेष महाबाहो तव यज्ञः प्रवर्तताम् ।) एवमुक्तस्तु तैर्विप्रैर्धार्तराष्ट्रो महीपतिः । कर्णं च सौबलं चैव भ्रातॄंश्चैवेदमब्रवीत् ॥ २२ ॥
‘इसलिये महाबाहो! तुम्हारा यह यज्ञ आरम्भ होना चाहिये।’ उन ब्राह्मणोंके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधनने कर्ण, शकुनि तथा अपने भाइयोंसे इस प्रकार कहा— ॥ २२ ॥
रोचते मे वचः कृत्स्नं ब्राह्मणानां न संशयः ।
रोचते यदि युष्माकं तस्मात् प्रब्रूत मा चिरम् ॥ २३ ॥
‘बन्धुओ! मुझे तो इन ब्राह्मणोंकी सारी बातें रुचिकर जान पड़ती हैं, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। यदि तुमलोगोंको भी यह बात अच्छी लगे तो शीघ्र अपनी सम्मति प्रकट करो’ ॥ २३ ॥
एवमुक्तास्तु ते सर्वे तथेत्यूचुर्नराधिपम् ।
संदिदेश ततो राजा व्यापारस्थान् यथाक्रमम् ॥ २४ ॥
हलस्य करणे चापि व्यादिष्टाः सर्वशिल्पिनः ।
यथोक्तं च नृपश्रेष्ठ कृतं सर्वं यथाक्रमम् ॥ २५ ॥
यह सुनकर उन सबने राजासे ‘तथास्तु’ कहकर उसकी हाँ-में-हाँ मिला दी। तदनन्तर राजा दुर्योधनने काममें लगे हुए सब शिल्पियोंको क्रमशः हल बनानेकी आज्ञा दी। नृपश्रेष्ठ! राजाकी आज्ञा पाकर सब शिल्पियोंने तदनुसार सारा कार्य क्रमशः सम्पन्न किया ॥ २४-२५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनयज्ञसमारम्भे पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनयज्ञसमारम्भविषयक दो सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २६ श्लोक हैं)
२५६-
षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
दुर्योधनके यज्ञका आरम्भ एवं समाप्ति
वैशम्पायन उवाच
ततस्तु शिल्पिनः सर्वे अमात्यप्रवराश्च ये ।
विदुरश्च महाप्राज्ञो धार्तराष्ट्रे न्यवेदयन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर समस्त शिल्पियों, श्रेष्ठ मन्त्रियों तथा परम बुद्धिमान् विदुरजीने दुर्योधनको सूचना दी— ॥ १ ॥
सज्जं क्रतुवरं राजन् प्राप्तकालं च भारत ।
सौवर्णं च कृतं सर्वं लाङ्गलं च महाधनम् ॥ २ ॥
‘भारत! क्रतुश्रेष्ठ वैष्णवयज्ञकी सारी सामग्री जुट गयी है। यज्ञका नियत समय भी आ पहुँचा है और सोनेका बहुमूल्य हल भी पूर्णरूपसे बन गया है’ ॥ २ ॥
एतच्छ्रुत्वा नृपश्रेष्ठो धार्तराष्ट्रो विशाम्पते ।
आज्ञापयामास नृपः क्रतुराजप्रवर्तनम् ॥ ३ ॥
राजन्! यह सुनकर नृपश्रेष्ठ दुर्योधनने उस क्रतुराजको प्रारम्भ करनेकी आज्ञा दी ॥ ३ ॥
ततः प्रवृत्ते यज्ञः प्रभूतार्थः सुसंस्कृतः ।
दीक्षितश्चापि गान्धारिर्यथाशास्त्रं यथाक्रमम् ॥ ४ ॥
फिर तो उत्तम संस्कारसे युक्त और प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न वह वैष्णवयज्ञ आरम्भ हुआ। गान्धारीनन्दन दुर्योधनने शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार विधिपूर्वक उस यज्ञकी दीक्षा ली ॥ ४ ॥
प्रहृष्टो धृतराष्ट्रश्च विदुरश्च महायशाः ।
भीष्मो द्रोणः कृप, कर्णो गान्धारी च यशस्विनी ॥ ५ ॥
धृतराष्ट्र, महायशस्वी विदुर, भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण तथा यशस्विनी गान्धारीको इस यज्ञसे बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ५ ॥
निमन्त्रणार्थं दूतांश्च प्रेषयामास शीघ्रगान् ।
पार्थिवानां च राजेन्द्र ब्राह्मणानां तथैव च ॥ ६ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर समस्त भूपालों तथा ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करनेके लिये बहुत-से शीघ्रगामी दूत भेजे ॥ ६ ॥
ते प्रयाता यथोद्दिष्टा दूतास्त्वरितवाहनाः ।
तत्र कंचित् प्रयातं तु दूतं दुःशासनोऽब्रवीत् ॥ ७ ॥
दूतगण तेज चलनेवाले वाहनोंपर सवार हो जिन्हें जैसी आज्ञा मिली थी, उसके अनुसार कर्तव्यपालनके लिये प्रस्थित हुए। उन्हींमेंसे एक जाते हुए दूतसे दुःशासनने कहा — ॥ ७॥
गच्छ द्वैतवनं शीघ्रं पाण्डवान् पापपूरुषान् ।
निमन्त्रय यथान्यायं विप्रांस्तस्मिन् वने तदा ॥ ८ ॥
'तुम शीघ्रतापूर्वक द्वैतवनमें जाओ और पापात्मा पाण्डवों तथा उस वनमें रहनेवाले ब्राह्मणोंको यथोचित रीतिसे निमन्त्रण दे आओ' ॥ ८ ॥
स गत्वा पाण्डवान् सर्वानुवाचाभिप्रणम्य च ।
दुर्योधनो महाराज यजते नृपसत्तमः ॥ ९ ॥
स्ववीर्यार्जितमर्थौघमवाप्य कुरुसत्तमः ।
तत्र गच्छन्ति राजानो ब्राह्मणाश्च ततस्ततः ॥ १० ॥
उस दूतने समस्त पाण्डवोंके पास जाकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'महाराज! कुरुकुलके श्रेष्ठ पुरुष नृपतिशिरोमणि दुर्योधन अपने पराक्रमसे अतुल धनराशि प्राप्तकर एक यज्ञ कर रहे हैं। उसमें (विभिन्न स्थानोंसे) बहुत-से राजा और ब्राह्मण पधार रहे हैं ॥ ९-१० ॥
अहं तु प्रेषितो राजन् कौरवेण महात्मना ।
आमन्त्रयति वो राजा धार्तराष्ट्रो जनेश्वरः ॥ ११ ॥
मनोऽभिलषितं राज्ञस्तं क्रतुं द्रष्टुमर्हथ ।
'राजन्! महामना दुःशासनने मुझे आपके पास भेजा है। जननायक महाराज दुर्योधन आपलोगोंको उस यज्ञमें बुला रहे हैं। आपलोग चलकर राजाके मनोवांछित उस यज्ञका दर्शन कीजिये' ॥ ११ १/२ ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा तच्छ्रुत्वा दूतभाषितम् ॥ १२ ॥ अब्रवीन्नृपशार्दूलो दिष्ट्या राजा सुयोधनः । यजते क्रतुमुख्येन पूर्वेषां कीर्तिवर्धनः ॥ १३ ॥ दूतका यह कथन सुनकर राजाओंमें सिंहके समान महाराज युधिष्ठिरने इस प्रकार उत्तर दिया—‘सौभाग्यकी बात है कि पूर्वजोंकी कीर्ति बढ़ानेवाले राजा सुयोधन श्रेष्ठ यज्ञके द्वारा भगवान्का यजन कर रहे हैं ॥ १२-१३ ॥ वयमध्युपयास्यामो न त्विदानीं कथंचन । समयः परिपाल्यो नो यावद् वर्षं त्रयोदशम् ॥ १४ ॥ ‘हम भी उस यज्ञमें चलते, परंतु इस समय यह किसी तरह सम्भव नहीं है। हमें तेरह वर्षतक वनमें रहनेकी अपनी प्रतिज्ञाका पालन करना है' ॥ १४ ॥ श्रुत्वैतद् धर्मराजस्य भीमो वचनमब्रवीत् । तदा तु नृपतिर्गन्ता धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १५ ॥ अस्त्रशस्त्रप्रदीप्तेऽग्नौ यदा तं पातयिष्यति । वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्वं रणसत्रे नराधिपः ॥ १६ ॥ यदा क्रोधहविर्मोक्ता धार्तराष्ट्रेषु पाण्डवः । आगन्ताहं तदास्मीति वाच्यस्ते स सुयोधनः ॥ १७ ॥
धर्मराजकी यह बात सुनकर भीमसेनने दूतसे इस प्रकार कहा—'दूत! तुम राजा दुर्योधनसे जाकर यह कह देना कि सम्राट् धर्मराज युधिष्ठिर तेरह वर्ष बीतनेके पश्चात् उस समय वहाँ पधारेंगे जब कि रणयज्ञमें अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा प्रज्वलित की हुई रोषाग्निमें वे तुम्हारी आहुति देंगे। जब रोषकी आगमें जलते हुए धृतराष्ट्रके पुत्रोंपर पाण्डव अपने क्रोधरूपी घीकी आहुति डालनेको उद्यत होंगे, उस समय मैं (भीमसेन) वहाँ पदार्पण करूँगा।' ।। १५—१७ ।।
शेषास्तु पाण्डवा राजन् नैवोचुः किंचिदप्रियम् ।
दूतश्चापि यथावृत्तं धार्तराष्ट्रे न्यवेदयत् ॥ १८ ॥
राजन्! शेष पाण्डवोंने कोई अप्रिय वचन नहीं कहा। दूतने भी लौटकर दुर्योधनसे सब समाचार ठीक-ठीक बता दिया ॥ १८ ॥
अथाजग्मुर्नरश्रेष्ठा नानाजनपदेश्वराः ।
ब्राह्मणाश्च महाभाग धार्तराष्ट्रपुरं प्रति ॥ १९ ॥
महाभाग! तदनन्तर विभिन्न देशोंके अधिपति नरश्रेष्ठ भूपाल तथा ब्राह्मण दुर्योधनकी राजधानी हस्तिनापुरमें आये ॥ १९ ॥
ते त्वर्चिता यथाशास्त्रं यथाविधि यथाक्रमम् ।
मुदा परमया युक्ताः प्रीताश्चापि नरेश्वराः ॥ २० ॥
उन सबकी शास्त्रीय विधिसे यथोचित सेवा-पूजा की गयी। इससे वे नरेशगण अत्यन्त प्रसन्न हो मन-ही-मन आनन्दका अनुभव करने लगे ॥ २० ॥
धृतराष्ट्रोऽपि राजेन्द्र संवृतः सर्वकौरवैः ।
हर्षेण महता युक्तो विदुरं प्रत्यभाषत ॥ २१ ॥
राजेन्द्र! समस्त कौरवोंसे घिरे हुए धृतराष्ट्रको भी बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने विदुरसे कहा— ॥ २१ ॥
यथा सुखी जनः सर्वः क्षत्तः स्यादन्नसंयुतः ।
तुष्येत् तु यज्ञसदने तथा क्षिप्रं विधीयताम् ॥ २२ ॥
'भैया! शीघ्र ऐसी व्यवस्था करो, जिससे इस यज्ञमण्डपमें पधारे हुए सभी लोग खान-पानसे संतुष्ट एवं सुखी हों' ॥ २२ ॥
विदुरस्तु तदाज्ञाय सर्ववर्णानरिंदम ।
यथा प्रमाणतो विद्वान् पूजयामास धर्मवित् ॥ २३ ॥
शत्रुदमन जनमेजय! धर्मज्ञ एवं विद्वान् विदुरजीने सब मनुष्योंकी ठीक-ठीक संख्याका ज्ञान करके उन सबका यथोचित स्वागत-सत्कार किया ॥ २३ ॥
भक्ष्यपेयान्नपानेन माल्यैश्चापि सुगन्धिभिः ।
वासोभिर्विविधैश्चैव योजयामास हृष्टवत् ॥ २४ ॥
वे बड़े हर्षके साथ सभी अतिथियोंको उत्तम भक्ष्य, पेय, अन्न-पान, सुगन्धित पुष्पहार तथा नाना प्रकारके वस्त्र देने लगे ॥ २४ ॥
कृत्वा ह्यावसथान् वीरो यथाशास्त्रं यथाक्रमम् ।
सान्त्वयित्वा च राजेन्द्रो दत्त्वा च विविधं वसु ॥ २५ ॥
विसर्जयामास नृपान् ब्राह्मणांश्च सहस्रशः ।
वीर राजा दुर्योधनने सभीको शास्त्रानुसार यथायोग्य निवासगृह बनवाकर उनमें ठहराया था। उसने सब प्रकारसे आश्वासन तथा भाँति-भाँतिके रत्न देकर सहस्रों राजाओं तथा ब्राह्मणोंको विदा किया ॥ २५ १/२ ॥
विसृज्य च नृपान् सर्वान् भ्रातृभिः परिवारितः ॥ २६ ॥
विवेश हास्तिनपुरं सहितः कर्णसौबलैः ॥ २७ ॥
इस प्रकार सब राजाओंको विदा देकर भाइयोंसे घिरे हुए दुर्योधनने कर्ण और शकुनिके साथ हस्तिनापुरमें प्रवेश किया ॥ २६-२७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनयज्ञे
षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनका यज्ञविषयक दो सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५६ ॥
२५७-
सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
दुर्योधनके यज्ञके विषयमें लोगोंका मत, कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा, युधिष्ठिरकी चिन्ता तथा दुर्योधनकी शासननीति
वैशम्पायन उवाच
प्रविशन्तं महाराज सूतास्तुष्टुवुरच्युतम् ।
जनाश्चापि महेष्वासं तुष्टुवू राजसत्तम ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज! राजश्रेष्ठ! नगरमें प्रवेश करते समय सूतों तथा अन्य लोगोंने भी अटल निश्चयी और महान् धनुर्धर राजा दुर्योधनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ १ ॥
लाजैश्चन्दनचूर्णैश्च विकीर्य च जनास्ततः ।
ऊचुर्दिष्ट्या नृपाविघ्नः समाप्तोऽयं क्रतुस्तव ॥ २ ॥
तत्पश्चात् सब लोग लावा और चन्दनचूर्ण बिखेरकर कहने लगे—'महाराज! आपका यह यज्ञ बिना किसी विघ्न-बाधाके पूर्ण हो गया, यह बड़े सौभाग्यकी बात है' ॥ २ ॥
अपरे त्वब्रुवंस्तत्र वातिकास्तं महीपतिम् ।
युधिष्ठिरस्य यज्ञेन न समो ह्येष ते क्रतुः ॥ ३ ॥
वहीं कुछ ऐसे लोग भी थे, जिनका मस्तिष्क वातरोगसे विकृत था—कब क्या कहना उचित है, इसको वे नहीं जानते थे, अतः राजा दुर्योधनको सम्बोधित करके कहने लगे—'राजन्! आपका यह यज्ञ युधिष्ठिरके यज्ञके समान नहीं था' ॥ ३ ॥
नैव तस्य क्रतोरेष कलामर्हति षोडशीम् ।
एवं तत्राब्रुवन् केचिद् वातिकास्तं जनेश्वरम् ॥ ४ ॥
कुछ अन्य वायुरोगग्रस्त लोग राजा दुर्योधनसे इस प्रकार कहने लगे—'यह यज्ञ तो युधिष्ठिरके यज्ञकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है' ॥ ४ ॥
सुहृदस्त्वब्रुवंस्तत्र अति सर्वानयं क्रतुः ।
ययातिर्नहुषश्चापि मान्धाता भरतस्तथा ॥ ५ ॥
क्रतुमेनं समाहृत्य पूताः सर्वे दिवं गताः ।
जो राजाके सुहृद् थे, वे वहाँ इस प्रकार बोले—'यह यज्ञ पिछले सब यज्ञोंसे बढ़कर हुआ है। ययाति, नहुष, मांधाता और भरत भी इस यज्ञ-कर्मका अनुष्ठान करके पवित्र हो सब-के-सब स्वर्गलोकमें गये हैं' ॥ ५ १/२ ॥
एता वाचः शुभाः शृण्वन् सुहृदां भरतर्षभ ॥ ६ ॥
प्रविवेश पुरं हृष्टः स्ववेश्म च नराधिपः । भरतश्रेष्ठ! सुहृदोंकी ये सुन्दर बातें सुनता हुआ राजा दुर्योधन प्रसन्नतापूर्वक नगरमें प्रवेश करके अपने राजभवनमें गया ॥ ६ १/२ ॥ अभिवाद्य ततः पादौ मातापित्रोर्विशाम्पते ॥ ७ ॥ भीष्मद्रोणकृपादीनां विदुरस्य च धीमतः । अभिवादितः कनीयोभिर्भ्रातृभिर्भ्रातृनन्दनः ॥ ८ ॥ महाराज! उसने सबसे पहले अपने माता-पिताके चरणोंमें प्रणाम किया। तत्पश्चात् क्रमशः भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदिको तथा बुद्धिमान् विदुरजीको भी मस्तक झुकाया। तदनन्तर छोटे भाइयोंने आकर भ्राताओंका आनन्द बढ़ानेवाले दुर्योधनको प्रणाम किया ॥ ७-८ ॥ निशसादासने मुख्ये भ्रातृभिः परिवारितः । तमुत्थाय महाराजं सूतपुत्रोऽब्रवीद् वचः ॥ ९ ॥ इसके बाद सब भाइयोंसे घिरा हुआ अपने प्रमुख राजसिंहासनपर विराजमान हुआ। उस समय सूतपुत्र कर्णने उठकर महाराज दुर्योधनसे इस प्रकार कहा— ॥ ९ ॥ दिष्ट्या ते भरतश्रेष्ठ समाप्तोऽयं महाक्रतुः । हतेषु युधि पार्थेषु राजसूये तथा त्वया ॥ १० ॥ आहृतेऽहं नरश्रेष्ठ त्वां सभाजयिता पुनः । ‘भरतश्रेष्ठ! सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा यह महान् यज्ञ सकुशल समाप्त हुआ। नरश्रेष्ठ! जब युद्धमें पाण्डव मारे जायँगे, उस समय तुम्हारे द्वारा आयोजित राजसूययज्ञकी समाप्तिपर मैं पुनः इसी प्रकार तुम्हारा अभिनन्दन करूँगा' ॥ १० १/२ ॥ तमब्रवीन्महाराजो धार्तराष्ट्रो महायशाः ॥ ११ ॥ सत्यमेतत् त्वयोक्तं हि पाण्डवेषु दुरात्मसु । निहतेषु नरश्रेष्ठ प्राप्ते चापि महाक्रतौ ॥ १२ ॥ राजसूये पुनर्वीर त्वमेवं वर्धयिष्यसि । तब महायशस्वी महाराज दुर्योधनने उससे इस प्रकार कहा—'वीर! तुम्हारा यह कथन सत्य है। नरश्रेष्ठ! जब दुरात्मा पाण्डव मारे जायँगे, उस समय महायज्ञ राजसूयके समाप्त होनेपर तुम पुनः इसी प्रकार मेरा अभिनन्दन करोगे' ॥ ११-१२ १/२ ॥ एवमुक्त्वा महाराज कर्णमाश्लिष्य भारत ॥ १३ ॥ राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं चिन्तयामास कौरवः । भरतकुलभूषण! महाराज! ऐसा कहकर दुर्योधनने कर्णको छातीसे लगा लिया और क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका चिन्तन करने लगा ॥ १३ १/२ ॥ सोऽब्रवीत् कौरवांश्चापि पार्श्वस्थान् नृपसत्तमः ॥ १४ ॥ कदा तु तं क्रतुवरं राजसूयं महाधनम् ।
निहत्य पाण्डवान् सर्वानाहरिष्यामि कौरवाः ॥ १५ ॥ नृपश्रेष्ठ दुर्योधनने अपने पास खड़े हुए कौरवोंको सम्बोधित करके कहा—'कुरुकुलके राजकुमारो! कब ऐसा समय आयेगा जब मैं समस्त पाण्डवोंको मारकर प्रचुर धनसे सम्पन्न होनेवाले उस ऋतुश्रेष्ठ राजसूयका अनुष्ठान करूँगा' ॥ १४-१५ ॥ तमब्रवीत् तदा कर्णः शृणु मे राजकुञ्जर । पादौ न धावये तावद् यावन्न निहतोऽर्जुनः ॥ १६ ॥ कीलालजं न खादेयं करिष्ये चासुरव्रतम् । नास्तीति नैव वक्ष्यामि याचितो येन केनचित् ॥ १७ ॥ उस समय कर्णने दुर्योधनसे कहा—'नृपश्रेष्ठ! मेरी यह प्रतिज्ञा सुन लो—'जबतक अर्जुन मेरे हाथसे मारा नहीं जाता, तबतक मैं दूसरोंसे पैर नहीं धुलवाऊँगा, केवल जलसे उत्पन्न पदार्थ नहीं खाऊँगा और आसुरव्रत (क्रूरता आदि) नहीं धारण करूँगा। किसीके भी कुछ माँगनेपर 'नहीं है', ऐसी बात नहीं कहूँगा' ॥ १६-१७ ॥ अथोत्कृष्टं महेष्वासैर्धार्तराष्ट्रैर्महारथैः । प्रतिज्ञाते फाल्गुनस्य वधे कर्णेन संयुगे ॥ १८ ॥ कर्णके द्वारा युद्धमें अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा करनेपर महान् धनुर्धर महारथी धृतराष्ट्रपुत्रोंने बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ १८ ॥ विजितांश्चाप्यमन्यन्त पाण्डवान् धृतराष्ट्राः । दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र विसृज्य नरपुङ्गवान् ॥ १९ ॥ प्रविवेश गृहं श्रीमान् यथा चैत्ररथं प्रभुः । तेऽपि सर्वे महेष्वासा जग्मुर्वेश्मानि भारत ॥ २० ॥ उस दिनसे कौरव पाण्डवोंको पराजित ही मानने लगे। राजेन्द्र! तदनन्तर जैसे देवराज इन्द्र चैत्ररथ नामक उद्यानमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार श्रीमान् राजा दुर्योधनने उन नरपुंगवोंको विदा करके अपने महलमें प्रवेश किया। भारत! तदनन्तर वे सभी महाधनुर्धर वीर अपने-अपने भवनमें चले गये ॥ १९-२० ॥ पाण्डवाश्च महेष्वासा दूतवाक्यप्रचोदिताः । चिन्तयन्तस्तमेवार्थं नालभन्त सुखं क्वचित् ॥ २१ ॥ इधर महाधनुर्धर पाण्डव दूतके वाक्यसे प्रेरित हो उसी विषयका चिन्तन करते हुए कभी चैन नहीं पाते थे ॥ २१ ॥ भूयश्च चारै राजेन्द्र प्रवृत्तिरुपपादिता । प्रतिज्ञा सूतपुत्रस्य विजयस्य वधं प्रति ॥ २२ ॥ महाराज! फिर उन्होंने गुप्तचरोंद्वारा वह समाचार भी प्राप्त कर लिया, जिसमें अर्जुनके वधके लिये सूतपुत्र कर्णकी प्रतिज्ञा दोहरायी गयी थी ॥ २२ ॥ एतच्छ्रुत्वा धर्मसुतः समुद्विग्नो नराधिप ।
अभेद्यकवचं मत्वा कर्णमद्भुतविक्रमम् ॥ २३ ॥
अनुस्मरंश्च संक्लेशान् न शान्तिमुपयाति सः।
राजन्! यह सब सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर उद्विग्न हो उठे। वे विचारने लगे—'कर्णका कवच अभेद्य है और उसका पराक्रम भी अद्भुत है।' यह मानकर तथा वनके क्लेशोंका स्मरण करके उन्हें शान्ति नहीं प्राप्त होती थी ॥ २३ १/२ ॥
तस्य चिन्तापरीतस्य बुद्धिर्जज्ञे महात्मनः ॥ २४ ॥
बहुव्यालमृगाकीर्णं त्यक्तुं द्वैतवनं वनम् ।
इस प्रकार चिन्तासे घिरे हुए महात्मा युधिष्ठिरके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि 'अनेक प्रकारके सर्पों तथा मृगोंसे भरे हुए इस द्वैतवनको छोड़कर हम कहीं अन्यत्र चले चलें' ॥ २४ १/२ ॥
धार्तराष्ट्रोऽपि नृपतिः प्रशाशास वसुन्धराम् ॥ २५ ॥
भ्रातृभिः सहितो वीरैर्भीष्मद्रोणकृपैस्तथा ।
सङ्गम्य सूतपुत्रेण कर्णेनाहवशोभिना ॥ २६ ॥
(सततं प्रीयमाणो वै देविना सौबलेन च ।)
इधर राजा दुर्योधन भी अपने वीर भाइयोंके साथ रहकर भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, युद्धमें शोभा पानेवाले सूतपुत्र कर्ण तथा द्यूतकुशल शकुनिसे मिलकर निरन्तर प्रसन्नताका अनुभव करता हुआ इस पृथ्वीका शासन करने लगा ॥
दुर्योधनः प्रिये नित्यं वर्तमानो महीभृताम् ।
पूजयामास विप्रेन्द्रान् क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥ २७ ॥
दुर्योधन सदा अपने अधीन रहनेवाले राजाओंका प्रिय करने लगा और प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका भी स्वागत-सत्कार करता रहा ॥ २७ ॥
भ्रातॄणां च प्रियं राजन् स चकार परंतपः ।
निश्चित्य मनसा वीरो दत्तभुक्तफलं धनम् ॥ २८ ॥
राजन्! शत्रुओंको संताप देनेवाला वीर दुर्योधन निरन्तर अपने भाइयोंका प्रिय कार्य किया करता था। 'धनके दो ही फल हैं—दान और भोग' ऐसा मन-ही-मन निश्चय करके वह इन्हींमें धनका उपयोग करता था ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि युधिष्ठिरचिन्तायां
सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें युधिष्ठिरकी चिन्तासे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल २८ १/२ श्लोक हैं)
(मृगस्वप्नोद्भवपर्व)
(मृगस्वप्नोद्भवपर्व)
अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
पाण्डवोंका काम्यकवनमें गमन
जनमेजय उवाच
दुर्योधनं मोक्षयित्वा पाण्डुपुत्रा महाबलाः ।
किमकार्षुर्वने तस्मिंस्तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**दुर्योधनको गन्धर्वोंके बन्धनसे छुड़ाकर महाबली पाण्डवोंने उस वनमें कौन-सा कार्य किया? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः शयानं कौन्तेयं रात्रौ द्वैतवने मृगाः ।
स्वप्रान्ते दर्शयामासुर्बाष्पकण्ठा युधिष्ठिरम् ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**तदनन्तर एक रातमें जब कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर सो रहे थे, स्वप्नमें द्वैतवनके सिंह-बाघ आदि हिंस्र पशुओंने उन्हें दर्शन दिया। उन सबके कण्ठ आँसुओंसे रुँधे हुए थे ॥ २ ॥
तानब्रवीत् स राजेन्द्रो वेपमानान् कृताञ्जलीन् ।
ब्रूत यद् वक्तुकामाः स्थ के भवन्तः किमिष्यते ॥ ३ ॥
वे थर-थर काँपते हुए हाथ जोड़कर खड़े थे। महाराज युधिष्ठिरने उनसे पूछा—'आपलोग कौन हैं? क्या कहना चाहते हैं? आपकी क्या इच्छा है? बताइये' ॥ ३ ॥
एवमुक्ताः पाण्डवेन कौन्तेयेन यशस्विना ।
प्रत्यब्रुवन् मृगास्तत्र हतशेषा युधिष्ठिरम् ॥ ४ ॥
यशस्वी पाण्डव कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर मरनेसे बचे हुए हिंसक पशुओंने उनसे कहा— ॥ ४ ॥
वयं मृगा द्वैतवने हतशिष्टास्तु भारत ।
नोत्सीदेम महाराज क्रियतां वासपर्ययः ॥ ५ ॥
‘भारत! हम द्वैतवनके पशु हैं। आपलोगोंके मारनेसे हमारी इतनी ही संख्या शेष रह गयी है। महाराज! हमारा सर्वथा संहार न हो जाय, इसके लिये आप अपना निवासस्थान बदल दीजिये ॥ ५ ॥
भवतो भ्रातरः शूराः सर्व एवास्त्रकोविदाः । कुलान्यल्पावशिष्टानि कृतवन्तो वनौकसाम् ॥ ६ ॥ ‘आपके सभी भाई शूरवीर एवं अस्त्रविद्याके पण्डित हैं। इन्होंने हम वनवासी हिंसक पशुओंके कुलोंको थोड़ी ही संख्यामें जीवित छोड़ा है ॥ ६ ॥
बीजभूता वयं केचिदवशिष्टा महामते । विवर्धेमहि राजेन्द्र प्रसादात् ते युधिष्ठिर ॥ ७ ॥ ‘महामते! हम सिंह, बाघ आदि पशु थोड़ी-सी संख्यामें अपने वंशके बीजमात्र शेष रह गये हैं। महाराज युधिष्ठिर! आपकी कृपासे हमारे वंशकी वृद्धि हो, यही हम निवेदन करते हैं’ ॥ ७ ॥
तान् वेपमानान् वित्रस्तान् बीजमात्रावशेषितान् । मृगान् दृष्ट्वा सुदुःखार्तो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ८ ॥ वे सिंह-बाघ आदि पशु त्रस्त होकर थर-थर काँप रहे थे और बीजमात्र ही शेष रह गये थे। उनकी यह दयनीय दशा देखकर धर्मराज युधिष्ठिर अत्यन्त दुःखसे व्याकुल हो गये ॥ ८ ॥
तांस्तथेत्यब्रवीद् राजा सर्वभूतहिते रतः । यथा भवन्तो ब्रुवते करिष्यामि च तत् तथा ॥ ९ ॥ समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले राजा युधिष्ठिरने उनसे कहा—‘बहुत अच्छा, तुमलोग जैसा कहते हो, वैसा ही करूँगा’ ॥ ९ ॥
इत्येवं प्रतिबुद्धः स रात्र्यन्ते राजसत्तमः । अब्रवीत् सहितान् भ्रातॄन् दयापन्नो मृगान् प्रति ॥ १० ॥ उक्तो रात्रौ मृगैरस्मि स्वप्नान्ते हतशेषितैः । तन्तुभूताः स्म भद्रं ते दया नः क्रियतामिति ॥ ११ ॥ इस प्रकार रात बीतनेपर जब सबेरे उनकी नींद खुली, तब वे नृपतिशिरोमणि हिंसक पशुओंके प्रति दयाभावसे द्रवित हो अपने सब भाइयोंसे बोले—‘बन्धुओ! रातको सपनेमें मरनेसे बचे हुए इस वनके पशुओंने मुझसे कहा है—‘राजन्! आपका भला हो। हम अपनी वंशपरम्पराके एक-एक तन्तुमात्र शेष रह गये हैं। अब हमलोगोंपर दया कीजिये’ ॥ १०-११ ॥
ते सत्यमाहुः कर्तव्या दयास्माभिर्वनौकसाम् । साष्टमासं हि नो वर्षं यदेतदुपयुङ्क्ष्महे ॥ १२ ॥ ‘मेरी समझमें वे पशु ठीक कहते हैं। हमलोगोंको वनवासी हिंस्र जीवोंपर भी दया करनी चाहिये। अबतक हमलोगोंको इस द्वैतवनमें रहते हुए एक वर्ष आठ महीने बीत चुके हैं ॥ १२ ॥
पुनर्बहुमृगं रम्यं काम्यकं काननोत्तमम् ।