महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं ॥ १२—१४ ॥
एतत् प्रत्यक्षतः सर्वं पूर्वं वृत्तं द्विजोत्तम ।
तस्मादिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वहेत्वात्मिकां कथाम् ॥ १५ ॥
द्विजोत्तम! यह सारा पुरातन इतिहास आपका प्रत्यक्ष देखा हुआ है। इसलिये मैं आपके मुखसे सबके हेतुभूत कालका निरूपण करनेवाली कथा सुनना चाहता हूँ ॥ १५ ॥
अनुभूतं हि बहुशस्त्वयैकेन द्विजोत्तम ।
न तेऽस्त्यविदितं किंचित् सर्वलोकेषु नित्यदा ॥ १६ ॥
विप्रवर! केवल आपने ही अनेक कल्पोंकी श्रेष्ठ रचनाका बहुत बार अनुभव किया है। सम्पूर्ण लोकोंमें कभी कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो' ॥ १६ ॥
मार्कण्डेय उवाच
हन्त ते वर्णयिष्यामि नमस्कृत्य स्वयम्भुवे ।
पुरुषाय पुराणाय शाश्वतायाव्ययाय च ॥ १७ ॥
अव्यक्ताय सुसूक्ष्माय निर्गुणाय गुणात्मने ।
स एष पुरुषव्याघ्र पीतवासा जनार्दनः ॥ १८ ॥
एष कर्ता विकर्ता च भूतात्मा भूतकृत् प्रभुः ।
अचिन्त्यं महदाश्चर्यं पवित्रमिति चोच्यते ॥ १९ ॥
मार्कण्डेयजी बोले— राजन्! मैं स्वयं प्रकट होनेवाले सनातन, अविनाशी, अव्यक्त, सूक्ष्म, निर्गुण एवं गुणस्वरूप पुराणपुरुषको नमस्कार करके तुम्हें वह कथा अभी सुनाता हूँ। पुरुषसिंह! ये जो हमलोगोंके पास बैठे हुए पीताम्बरधारी भगवान् जनार्दन हैं, ये ही संसारकी सृष्टि और संहार करनेवाले हैं। ये ही भगवान् समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी आत्मा और उनके रचयिता हैं। ये पवित्र, अचिन्त्य एवं महान् आश्चर्यमय तत्त्व कहे जाते हैं ॥ १७—१९ ॥
अनादिनिधनं भूतं विश्वमव्ययमक्षयम् ।
एष कर्ता न क्रियते कारणं चापि पौरुषे ॥ २० ॥
इनका न आदि है, न अन्त। ये सर्वभूतस्वरूप, अव्यय और अक्षय हैं। ये ही सबके कर्ता हैं, इनका कोई कर्ता नहीं है। पुरुषार्थकी प्राप्तिमें भी ये ही कारण हैं ॥ २० ॥
यद्येष पुरुषो वेद वेदा अपि न तं विदुः ।
सर्वमाश्चर्यमेवैतन्निवृतं राजसत्तम ॥ २१ ॥
आदितो मनुजव्याघ्र कृत्स्नस्य जगतः क्षये ।
ये अन्तर्यामी आत्मा होनेसे सबको जानते हैं, परंतु इन्हें वेद भी नहीं जानते। नृपशिरोमणे! नरश्रेष्ठ! सम्पूर्ण जगत्का प्रलय होनेके पश्चात् इन आदिभूत परमेश्वरसे ही यह सम्पूर्ण आश्चर्यमय जगत् पुनः उत्पन्न हो जाता है ॥ २१½ ॥
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत् कृतं युगम् ॥ २२ ॥
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः ।
चार हजार दिव्य वर्षोंका एक सत्ययुग बताया गया है, उतने ही सौ वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके होते हैं (इस प्रकार कुल अड़तालीस सौ दिव्य वर्ष सत्ययुगके हैं) ॥ २२½ ॥
त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते ॥ २३ ॥
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च ततः परम् ।
तीन हजार दिव्य वर्षोंका त्रेतायुग बताया जाता है, उसकी संध्या और संध्यांशके भी उतने ही (तीन-तीन) सौ दिव्य वर्ष होते हैं (इस तरह यह युग छत्तीस सौ दिव्य वर्षोंका होता है) ॥ २३½ ॥
तथा वर्षसहस्रे द्वे द्वापरं परिमाणतः ॥ २४ ॥
तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः ।
द्वापरका मान दो हजार दिव्य वर्ष है तथा उतने ही सौ दिव्य वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके हैं (अतः सब मिलकर चौबीस सौ दिव्य वर्ष द्वापरके हैं) ॥ २४½ ॥
सहस्रमेकं वर्षाणां ततः कलियुगं स्मृतम् ॥ २५ ॥
तस्य वर्षशतं संधिः संध्यांशश्च ततः परम् ।
संधिसंध्यांशयोस्तुल्यं प्रमाणमुपधारय ॥ २६ ॥
तदनन्तर एक हजार दिव्य वर्ष कलियुगका मान कहा गया है, सौ वर्ष उसकी संध्याके और सौ वर्ष संध्यांशके बताये गये हैं (इस प्रकार कलियुग बारह सौ दिव्य वर्षोंका होता है)। संध्या और संध्यांशका मान बराबर-बराबर ही समझो ॥ २५-२६ ॥
क्षीणे कलियुगे चैव प्रवर्तेत कृतं युगम् ।
एषा द्वादशसाहस्री युगाख्या परिकीर्त्तिता ॥ २७ ॥
कलियुगके क्षीण हो जानेपर पुनः सत्ययुगका आरम्भ होता है। इस तरह बारह हजार दिव्य वर्षोंकी एक चतुर्युगी बतायी गयी है ॥ २७ ॥
एतत् सहस्रपर्यन्तमहो ब्राह्ममुदाहृतम् ।
विश्वं हि ब्रह्मभवने सर्वतः परिवर्त्तते ॥ २८ ॥
लोकानां मनुजव्याघ्र प्रलयं तं विदुर्बुधाः ।
नरश्रेष्ठ! एक हजार चतुर्युग बीतनेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है। यह सारा जगत् ब्रह्माके दिनभर ही रहता है (और वह दिन समाप्त होते ही नष्ट हो जाता है।) इसीको विद्वान् पुरुष लोकोंका प्रलय मानते हैं ।। २८ १/२ ।। अल्पावशिष्टे तु तदा युगान्ते भरतर्षभ ।। २९ ।। सहस्रान्ते नराः सर्वे प्रायशोऽनृतवादिनः । यज्ञप्रतिनिधिः पार्थ दानप्रतिनिधिस्तथा ।। ३० ।। व्रतप्रतिनिधिश्चैव तस्मिन् काले प्रवर्तते । भरतश्रेष्ठ! सहस्र युगकी समाप्तिमें जब थोड़ा-सा ही समय शेष रह जाता है, उस समय कलियुगके अन्तिम भागमें प्रायः सभी मनुष्य मिथ्यावादी हो जाते हैं। पार्थ! उस समय यज्ञ, दान और व्रतके प्रतिनिधि कर्म चालू हो जाते हैं अर्थात् यज्ञ, दान, तप मुख्य विधिसे न होकर गौण विधिसे नाममात्र होने लगते हैं ।। २९-३० १/२ ।। ब्राह्मणाः शूद्रकर्माणस्तथा शूद्रा धनार्जकाः ।। ३१ ।। क्षत्रधर्मेण वाप्यत्र वर्तयन्ति गते युगे । युगकी समाप्तिके समय ब्राह्मण शूद्रोंके कर्म करते हैं और शूद्र वैश्योंकी भाँति धनोपार्जन करने लगते हैं अथवा क्षत्रियोंके कर्मसे जीविका चलाने लगते हैं ।। ३१ १/२ ।। निवृत्तयज्ञस्वाध्याया दण्डाजिनविवर्जिताः ।। ३२ ।। ब्राह्मणाः सर्वभक्षाश्च भविष्यन्ति कलौ युगे । अजपा ब्राह्मणास्तात शूद्रा जपपरायणाः ।। ३३ ।। (सहस्र चतुर्युगके अन्तिम) कलियुगके अन्तिम भागमें ब्राह्मण यज्ञ, स्वाध्याय, दण्ड और मृगचर्मका त्याग कर देंगे और (भक्ष्याभक्ष्यका विचार छोड़कर) सब कुछ खाने-पीनेवाले हो जायेंगे। तात! ब्राह्मण तो जपसे दूर भागेंगे और शूद्र वैदिक मन्त्रोंके जपमें संलग्न होंगे ।। ३२-३३ ।। विपरीते तदा लोके पूर्वरूपं क्षयस्य तत् । बहवो म्लेच्छराजानः पृथिव्यां मनुजाधिप ।। ३४ ।। नरेश्वर! इस प्रकार जब लोगोंके विचार और व्यवहार विपरीत हो जाते हैं, तब प्रलयका पूर्वरूप आरम्भ हो जाता है। उस समय इस पृथ्वीपर बहुत-से म्लेच्छ राजा राज्य करने लगते हैं ।। ३४ ।। मृषानुशासिनः पापा मृषावादपरायणाः । आन्ध्राः शकाः पुलिन्दाश्च यवनाश्च नराधिपाः ।। ३५ ।। काम्बोजा बाह्निकाः शूरास्तथाऽऽभीरा नरोत्तम । न तदा ब्राह्मणः कश्चित् स्वधर्ममुपजीवति ।। ३६ ।। छलसे शासन करनेवाले, पापी और असत्यवादी आन्ध्र, शक, पुलिन्द, यवन, काम्बोज, बाह्लीक तथा शौर्यसम्पन्न आभीर इस देशके राजा होंगे। नरश्रेष्ठ! उस समय कोई
ब्राह्मण अपने धर्मके अनुसार जीविका चलानेवाला न होगा ।। ३५-३६ ।। क्षत्रियाश्चापि वैश्याश्च विकर्मस्था नराधिप । अल्पायुषः स्वल्पबलाः स्वल्पवीर्यपराक्रमाः ।। ३७ ।। नरेश्वर! क्षत्रिय और वैश्य भी अपना-अपना धर्म छोड़कर दूसरे वर्णोंके कर्म करने लगेंगे। सबकी आयु कम होगी, सबके बल, वीर्य और पराक्रम घट जायँगे ।। ३७ ।। अल्पसारल्पदेहाश्च तथा सत्याल्पभाषिणः । बहुशून्या जनपदा मृगव्यालावृता दिशः ।। ३८ ।। युगान्ते समनुप्राप्ते वृथा च ब्रह्मवादिनः । भोवादिनस्तथा शूद्रा ब्राह्मणाश्चार्यवादिनः ।। ३९ ।। मनुष्य नाटे कदके होंगे। उनकी शरीरिक शक्ति बहुत कम हो जायगी और उनकी बातोंमें सत्यका अंश बहुत कम होगा। बहुधा सारे जनपद जनशून्य होंगे। सम्पूर्ण दिशाएँ पशुओं और सर्पोंसे भरी होंगी। युगान्तकाल उपस्थित होनेपर अधिकांश मनुष्य (अनुभव न होते हुए भी) वृथा ही ब्रह्मज्ञानकी बातें कहेंगे। शूद्र द्विजातियोंको भो (ऐ) कहकर पुकारेंगे और ब्राह्मणलोग शूद्रोंको आर्य अर्थात् आप कहकर सम्बोधन करेंगे ।। ३८-३९ ।। युगान्ते मनुजव्याघ्र भवन्ति बहुजन्तवः । न तथा घ्राणयुक्ताश्च सर्वगन्धा विशाम्पते ।। ४० ।। पुरुषसिंह राजन्! युगान्तकालमें बहुतसे जीव-जन्तु उत्पन्न हो जायँगे। सब प्रकारके सुगन्धित पदार्थ नासिकाको उतने गन्धयुक्त नहीं प्रतीत होंगे ।। ४० ।। रसाश्च मनुजव्याघ्र न तथा स्वादुयोगिनः । बहुप्रजा ह्रस्वदेहाः शीलाचारविवर्जिताः । मुखे भगाः स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये ।। ४१ ।। अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः । केशशूलाः स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये ।। ४२ ।। नरव्याघ्र! इसी प्रकार रसीले पदार्थभी जैसे चाहिये वैसे स्वादिष्ट नहीं होंगे। राजन्! उस समयकी स्त्रियाँ नाटे कदकी और बहुत संतान (बच्चा) पैदा करनेवाली होंगी। उनमें शील और सदाचारका अभाव होगा। युगान्तकालमें स्त्रियाँ मुखसे भगसम्बन्धी यानी व्यभिचारकी ही बातें करनेवाली होंगी। राजन्! युगान्त-कालमें हर देशके लोग अन्न बेचनेवाले होंगे। ब्राह्मण वेद बेचनेवाले तथा (प्रायः) स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिको अपनानेवाली होंगी* ।। ४१-४२ ।। अल्पक्षीरास्तथा गावो भविष्यन्ति जनाधिप । अल्पपुष्पफलाश्चापि पादपा बहुवायसाः ।। ४३ ।। ब्रह्मवध्यानुलिप्तानां तथा मिथ्याभिशंसिनाम् । नृपाणां पृथिवीपाल प्रतिगृह्णन्ति वै द्विजाः ।। ४४ ।।
जनेश्वर! युगान्तकालमें गायोंके थनोंमें बहुत कम दूध होगा। वृक्षपर फल और फूल बहुत कम होंगे और उनपर (अच्छे पक्षियोंकी अपेक्षा) कौए ही अधिक बसेरे लेंगे। भूपाल! ब्राह्मणलोग (लोभवश) ब्रह्महत्या-जैसे पापोंसे लिप्त और मिथ्यावादी नरेशोंसे ही दान-दक्षिणा लेंगे ।। ४३-४४ ।।
लोभमोहपरीताश्च मिथ्याधर्मध्वजावृताः ।
भिक्षार्थं पृथिवीपाल चञ्चूर्यन्ते द्विजैर्दिशः ।। ४५ ।।
राजन्! वे ब्राह्मण लोभ और मोहमें फँसकर झूठे धर्मका ढोंग रचनेवाले होंगे, इतना ही नहीं, वे भिक्षाके लिये सारी दिशाओंके लोगोंको पीड़ित करते रहेंगे ।। ४५ ।।
करभारभयाद् भीता गृहस्थाः परिमोषकाः ।
मुनिच्छद्माकृतिच्छन्ना वाणिज्यमुपजीविनः ।। ४६ ।।
मिथ्या च नखरोमाणि धारयन्ति तदा द्विजाः ।
गृहस्थलोग करके भारसे डरकर लुटेरे बन जायँगे। ब्राह्मण मुनियों-जैसी कपटपूर्ण आकृति धारण किये वैश्यवृत्तिसे जीविका चलायेंगे और झूठे दिखावेके लिये नख तथा दाढ़ी-मूंछ धारण करेंगे ।। ४६ १/२ ।।
अर्थलोभान्नरव्याघ्र तथा च ब्रह्मचारिणः ।। ४७ ।।
आश्रमेषु वृथाचाराः पानपा गुरुतल्पगाः ।
इह लौकिकमीहन्ते मांसशोणितवर्धनम् ।। ४८ ।।
नरश्रेष्ठ! धनके लोभसे ब्रह्मचारी भी आश्रमोंमें दम्भपूर्ण आचारको अपनायेंगे और मद्यपान करके गुरुपत्नीगमन करेंगे। लोग अपने शरीरके मांस और रक्त बढ़ानेवाले इहलौकिक कर्मोंमें ही लगे रहेंगे ।।
बहुपाषण्डसंकीर्णाः परान्नगुणवादिनः ।
आश्रमा मनुजव्याघ्र भविष्यन्ति युगक्षये ।। ४९ ।।
नरश्रेष्ठ! युगान्तकालमें सभी आश्रम अनेक प्रकारके पाखण्डोंसे व्याप्त और दूसरोंसे मिले हुए भोजनका ही गुणगान करनेवाले होंगे ।। ४९ ।।
यथर्तुवर्षी भगवान् न तथा पाकशासनः ।
न चापि सर्वबीजानि सम्यग् रोहन्ति भारत ।। ५० ।।
भगवान् इन्द्र भी ठीक वर्षाऋतुके समय जलकी वर्षा नहीं करेंगे। भारत! भूमिमें बोये हुए सभी बीज ठीकसे नहीं जमेंगे ।। ५० ।।
हिंसाभिरमश्च जनस्तथा सम्पद्यतेऽशुचिः ।
अधर्मफलमत्यर्थं तदा भवति चानघ ।। ५१ ।।
कलियुगमें सब लोग हिंसामें ही सुख माननेवाले तथा अपवित्र रहेंगे। निष्पाप! उस समय अधर्मका फल बहुत अधिक मात्रामें मिलेगा ।। ५१ ।।
तदा च पृथिवीपाल यो भवेद् धर्मसंयुतः ।
अल्पायुः स हि मन्तव्यो न हि धर्मोऽस्ति कश्चन ।। ५२ ।।
भूपाल! उस समय जो भी धर्ममें तत्पर रहेगा, उसकी आयु बहुत थोड़ी देखनेमें आयेगी; क्योंकि उस समय कोई भी धर्म टिक नहीं सकेगा ।। ५२ ।।
भूयिष्ठं कूटमानैश्च पण्यं विक्रीणते जनाः ।
वणिजश्च नरव्याघ्र बहुमाया भवन्त्युत ।। ५३ ।।
लोग बाजारमें झूठे माप-तौल बनाकर बहुत-सा माल बेचते रहेंगे। नरश्रेष्ठ! उस समयके बनिये भी बहुत माया जाननेवाले (धूर्त) होंगे ।। ५३ ।।
धर्मिष्ठाः परिहीयन्ते पापीयान् वर्धते जनः ।
धर्मस्य बलहानिः स्यादधर्मश्च बली तथा ।। ५४ ।।
धर्मात्मा पुरुष हानि उठाते दीखेंगे और बड़े-बड़े पापी लौकिक दृष्टिसे उन्नतिशील होंगे। धर्मका बल घटेगा और अधर्म बलवान् होगा ।। ५४ ।।
अल्पायुषो दरिद्राश्च धर्मिष्ठा मानवास्तथा ।
दीर्घायुषः समृद्धाश्च विधर्माणो युगक्षये ।। ५५ ।।
युगान्तकालमें धर्मिष्ठ मानव अल्पायु तथा दरिद्र देखे जायँगे और अधर्मी मनुष्य दीर्घायु तथा समृद्धिशाली देखे जायँगे ।। ५५ ।।
नगराणां विहारेषु विधर्माणो युगक्षये ।
अधर्मिष्ठैरुपायैश्च प्रजा व्यवहरन्त्युत ।। ५६ ।।
युगान्तके समय नगरोंके उद्यानोंमें पापी पुरुष अड्डा जमायेंगे और पापपूर्ण उपायोंद्वारा प्रजाके साथ दुर्व्यवहार करेंगे ।। ५६ ।।
संचयेन तथाल्पेन भवन्त्याढ्यमदान्विताः ।
धनं विश्वासतो न्यस्तं मिथो भूयिष्ठशो नराः ।। ५७ ।।
हर्तुं व्यवसिता राजन् पापाचारसमन्विताः ।
नैतदस्तीति मनुजा वर्तन्ते निरपत्रपाः ।। ५८ ।।
राजन्! थोड़ेसे धनका संग्रह हो जानेपर लोग धनाढ्यताके मदसे उन्मत्त हो उठेंगे। यदि किसीने विश्वास करके अपने धनको धरोहरके रूपमें रख दिया तो अधिकांश पापाचारी और निर्लज मनुष्य उस धरोहरको हड़प लेनेकी चेष्टा करेंगे और उससे साफ कह देंगे कि हमारे यहाँ तुम्हारा कुछ भी नहीं है ।। ५७-५८ ।।
पुरुषादानि सत्त्वानि पक्षिणोऽथ मृगास्तथा ।
नगराणां विहारेषु चैत्येष्वपि च शेरते ।। ५९ ।।
मनुष्यका मांस खानेवाले हिंसक जीव तथा पशु-पक्षी नागरिकोंके बगीचों और देवालयोंमें भी शयन करेंगे ।। ५९ ।।
सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च स्त्रियो गर्भधरा नृप ।
दशद्वादशवर्षाणां पुंसां पुत्रः प्रजायते ।। ६० ।।
राजन्! युगान्तकालमें सात-आठ वर्षकी स्त्रियाँ गर्भ धारण करेंगी और दस-बारह वर्षकी अवस्थावाले पुरुषोंके भी पुत्र होंगे ।। ६० ।। भवन्ति षोडशे वर्षे नराः पलितिनस्तथा । आयुःक्षयो मनुष्याणां क्षिप्रमेव प्रपद्यते ।। ६१ ।। सोलहवें वर्षमें मनुष्योंके बाल पक जायँगे और उनकी आयु शीघ्र ही समाप्त हो जायगी ।। ६१ ।। क्षीणायुषो महाराज तरुणा वृद्धशीलिनः । तरुणानां च यच्छीलं तद् वृद्धेषु प्रजायते ।। ६२ ।। महाराज! उस समयके तरुणोंकी आयु क्षीण होगी और उनका शील-स्वभाव बूढ़ोंका-सा हो जायगा और तरुणोंका जो शील-स्वभाव होना चाहिये, वह बूढ़ोंमें प्रकट होगा ।। ६२ ।। विपरीतास्तदा नार्यो वञ्चयित्वार्हतः पतीन् । व्युच्चरन्त्यपि दुःशीला दासैः पशुभिरेव च ।। ६३ ।। उस समयकी विपरीत स्वभाववाली स्त्रियाँ अपने योग्य पतियोंको भी धोखा देकर बुरे शील-स्वभावकी हो जायँगी और सेवकों तथा पशुओंके साथ भी व्यभिचार करेंगी ।। ६३ ।। वीरपत्न्यस्तथा नार्यः संश्रयन्ति नरान् नृप । भर्तारमपि जीवन्तमन्यान् व्यभिचरन्त्युत ।। ६४ ।। राजन्! वीर पुरुषोंकी पत्नियाँ भी परपुरुषोंका आश्रय लेंगी और पतिके जीते हुए भी दूसरोंसे व्यभिचार करेंगी ।। ६४ ।। तस्मिन् युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते चायुषः क्षये । अनावृष्टिर्महाराज जायते बहुवार्षिकी ।। ६५ ।। महाराज! इस प्रकार आयुको क्षीण करनेवाले सहस्र युगोंके अन्तिम भागकी समाप्ति होनेपर बहुत वर्षोंतक वृष्टि बंद हो जाती है ।। ६५ ।। ततस्तान्यल्पसाराणि सत्त्वानि क्षुधितानि वै । प्रलयं यान्ति भूयिष्ठं पृथिव्यां पृथिवीपते ।। ६६ ।। पृथिवीपते! इससे भूतलके थोड़ी शक्तिवाले अधिकांश प्राणी भूखसे व्याकुल होकर मर जाते हैं ।। ६६ ।। ततो दिनकरैर्दीप्तैः सप्तभिर्मनुजाधिप । पीयते सलिलं सर्वं समुद्रेषु सरित्सु च ।। ६७ ।। नरेश्वर! तदनन्तर प्रचण्ड तेजवाले सात सूर्य उदित होकर सरिताओं और समुद्रोंका सारा जल सोख लेते हैं ।। ६७ ।। यच्च काष्ठं तृणं चापि शुष्कं चार्द्रं च भारत । सर्वं तद् भस्मसाद् भूतं दृश्यते भरतर्षभ ।। ६८ ।।
भरतकुलभूषण! उस समय जो भी तृण-काष्ठ अथवा सूखे-गीले पदार्थ होते हैं, वे सभी भस्मीभूत दिखायी देने लगते हैं ॥ ६८ ॥ ततः संवर्तको वह्निर्वायुना सह भारत । लोकमाविशते पूर्वमादित्यैरुपशोषितम् ॥ ६९ ॥ भारत! इसके बाद ‘संवर्तक’ नामकी प्रलयकालीन अग्नि वायुके साथ उन सम्पूर्ण लोकोंमें फैल जाती है, जहाँका जल पहले सात सूर्योंद्वारा सोख लिया गया है ॥ ६९ ॥ ततः स पृथिवीं भित्त्वा प्रविश्य च रसातलम् । देवदानवयक्षाणां भयं जनयते महत् ॥ ७० ॥ तत्पश्चात् पृथिवीका भेदन कर वह अग्नि रसातलतक पहुँच जाती है तथा देवता, दानव और यक्षोंके लिये महान् भय उपस्थित कर देती है ॥ ७० ॥ निर्दहन् नागलोकं च यच्च किञ्चित् क्षिताविह । अधस्तात् पृथिवीपाल सर्वं नाशयते क्षणात् ॥ ७१ ॥ राजन्! वह नागलोकको जलाती हुई इस पृथिवीके नीचे जो कुछ भी है, उस सबको क्षणभरमें नष्ट कर देती है ॥ ७१ ॥ ततो योजनविंशानां सहस्राणि शतानि च । निर्दहत्यशिवो वायुः स च संवर्तकोऽनलः ॥ ७२ ॥ इसके बाद वह अमंगलकारी प्रचण्ड वायु और वह संवर्तक अग्नि बाईस हजार योजन तकके लोगोंको भस्म कर डालती है ॥ ७२ ॥ सदेवासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् । ततो दहति दीप्तः स सर्वमेव जगद् विभुः ॥ ७३ ॥ इस प्रकार सर्वत्र फैली हुई वह प्रज्वलित अग्नि देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण विश्वको भस्म कर डालती है ॥ ७३ ॥ ततो गजकुलप्रख्यास्तडिन्मालाविभूषिताः । उत्तिष्ठन्ति महामेघा नभस्यद्भुतदर्शनाः ॥ ७४ ॥ इसके बाद आकाशमें महान् मेघोंकी घोर घटा घिर आती है, जो अद्भुत दिखायी देता है। उनमेंसे प्रत्येक मेघ-समूह हाथियोंके झुंडकी भाँति विशालकाय और श्यामवर्ण तथा बिजलीकी मालाओंसे विभूषित होता है ॥ ७४ ॥ केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित् कुमुदसंनिभाः । केचित् किञ्जल्कसंकाशाः केचित् पीताः पयोधराः ॥ ७५ ॥ केचिद्धारिद्रसंकाशाः कारण्डवनिभास्तथा । केचित् कमलपत्राभाः केचिद्धिङ्गुलसप्रभाः ॥ ७६ ॥ कुछ बादल नील कमलके समान श्याम और कुछ कुमुद-कुसुमके समान सफेद होते हैं। कुछ जलधरोंकी कान्ति केसरोंके समान दिखायी देती है। कुछ मेघ हल्दीके सदृश पीले
और कुछ कारण्डव पक्षीके समान दृष्टिगोचर होते हैं। कोई-कोई कमलदलके समान और कुछ हिंगुल-जैसे जान पड़ते हैं ।। ७५-७६ ।।
केचित् पुरवराकाराः केचिद् गजकुलोपमाः ।
केचिदञ्जनसंकाशाः केचिन्मकरसंनिभाः ।। ७७ ।।
कुछ श्रेष्ठ नगरोंके समान, कुछ हाथियोंके झुंड-जैसे, कुछ काजलके रंगवाले और कुछ मगरोंकी-सी आकृतिवाले होते हैं ।। ७७ ।।
विद्युन्मालापिनद्धाङ्गाः समुत्तिष्ठन्ति वै घनाः ।
घोररूपा महाराज घोरस्वननिनादिताः ।
ततो जलधराः सर्वे व्याप्नुवन्ति नभस्तलम् ।। ७८ ।।
वे सभी बादल विद्युन्मालाओंसे अलंकृत होकर घिर आते हैं। महाराज! भयंकर गर्जना करनेके कारण उनका स्वरूप बड़ा भयानक जान पड़ता है। धीरे-धीरे वे सभी जलधर समूचे आकाशमण्डलको ढक लेते हैं ।। ७८ ।।
तैरियं पृथिवी सर्वा सपर्वतवनाकरा ।
आपूर्यते महाराज सलिलौघपरिप्लुता ।। ७९ ।।
महाराज! उनके वर्षा करनेपर पर्वत, वन और खानोंसहित यह सारी पृथ्वी अगाध जलराशिमें डूबकर सब ओरसे भर जाती है ।। ७९ ।।
ततस्ते जलदा घोरा राविणः पुरुषर्षभ ।
सर्वतः प्लावयन्त्याशु चोदिताः परमेष्ठिना ।। ८० ।।
पुरुषरत्न! तदनन्तर विधातासे प्रेरित हो गर्जन-तर्जन करनेवाले वे भयंकर मेघ शीघ्र सब ओर वर्षा करके सबको जलसे आप्लावित कर देते हैं ।। ८० ।।
वर्षमाणा महत् तोयं पूरयन्तो वसुंधराम् ।
सुघोरमशिवं रौद्रं नाशयन्ति च पावकम् ।। ८१ ।।
महान् जल-समूहकी वर्षा करके वसुन्धराको जलमें डुबोनेवाले वे समस्त मेघ उस अत्यन्त घोर, अमंगलकारी और भयानक अग्निको बुझा देते हैं ।। ८१ ।।
ततो द्वादशवर्षाणि पयोदास्त उपप्लवे ।
धाराभिः पूरयन्तो वै चोद्यमाना महात्मना ।। ८२ ।।
तदनन्तर प्रलयकालके वे पयोधर महात्मा ब्रह्माजीकी प्रेरणा पाकर पृथ्वीको परिपूर्ण करनेके लिये बारह वर्षोंतक धारावाहिक वृष्टि करते हैं ।। ८२ ।।
ततः समुद्रः स्वां वेलामतिक्रामति भारत ।
पर्वताश्च विदीर्यन्ते मही चाप्सु निमज्जति ।। ८३ ।।
भारत! तदनन्तर समुद्र अपनी सीमाको लाँघ जाता है, पर्वत फट जाते और पृथ्वी पानीमें डूब जाती है ।। ८३ ।।
सर्वतः सहसा भ्रान्तास्ते पयोदा नभस्तलम् ।
संवेशयित्वा नश्यन्ति वायुवेगपराहताः ॥ ८४ ॥ तत्पश्चात् समस्त आकाशको घेरकर सब ओर फैले हुए वे मेघ वायुके प्रचण्ड वेगसे छिन्न-भिन्न होकर सहसा अदृश्य हो जाते हैं ॥ ८४ ॥ ततस्तं मारुतं घोरं स्वयम्भूर्मनुजाधिप । आदिः पद्मालयो देवः पीत्वा स्वपिति भारत ॥ ८५ ॥ नरेश्वर! इसके बाद कमलमें निवास करनेवाले आदिदेव स्वयं ब्रह्माजी उस भयंकर वायुको पीकर सो जाते हैं ॥ ८५ ॥ तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे । नष्टे देवासुरगणे यक्षराक्षसवर्जिते ॥ ८६ ॥ निर्मनुष्ये महीपाल निःश्वापदमहीरुहे । अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन् भ्रमाम्येकोऽहमाहतः ॥ ८७ ॥ इस प्रकार चराचर प्राणियों, देवताओं तथा असुर आदिके नष्ट हो जानेपर यक्ष, राक्षस, मनुष्य, हिंसक जीव, वृक्ष तथा अन्तरिक्षसे शून्य उस घोर एकार्णवमय जगत्में मैं अकेला ही इधर-उधर मारा-मारा फिरता हूँ ॥ ८६-८७ ॥ एकार्णवे जले घोरे विचरन् पार्थिवोत्तम । अपश्यन् सर्वभूतानि वैक्लव्यमगमं ततः ॥ ८८ ॥ नृपश्रेष्ठ! एकार्णवके उस भयंकर जलमें विचरते हुए जब मैंने किसी भी प्राणीको नहीं देखा, तब मुझे बड़ी व्याकुलता हुई ॥ ८८ ॥ ततः सुदीर्घं गत्वाहं प्लवमानो नराधिप । श्रान्तः क्वचिन्न शरणं लभाम्यहमतन्द्रितः ॥ ८९ ॥ नरेश्वर! उस समय आलस्यशून्य होकर सुदीर्घकाल-तक तैरता हुआ मैं दूर जाकर बहुत थक गया। परंतु कहीं भी मुझे कोई आश्रय नहीं मिला ॥ ८९ ॥ ततः कदाचित् पश्यामि तस्मिन् सलिलसंचये । न्यग्रोधं सुमहन्तं वै विशालं पृथिवीपते ॥ ९० ॥ राजन्! तदनन्तर एक दिन एकार्णवकी उस अगाध जलराशिमें मैंने एक बहुत विशाल बरगदका वृक्ष देखा ॥ ९० ॥ शाखायां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णायां नराधिप । पर्यङ्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्कृते ॥ ९१ ॥ उपविष्टं महाराज पद्मेन्दुसदृशाननम् । फुल्लपद्मविशालाक्षं बालं पश्यामि भारत ॥ ९२ ॥ नराधिप! उस वृक्षकी चौड़ी शाखापर एक पलंग था, जिसके ऊपर दिव्य बिछौने बिछे हुए थे। महाराज! उस पलंगपर एक सुन्दर बालक बैठा दिखायी दिया, जिसका मुख
कमलके समान कमनीय शोभा धारण करनेवाला तथा चन्द्रमाके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाला था। उसके नेत्र प्रफुल्ल पद्मदलके समान विशाल थे ॥ ९१-९२ ॥ ततो मे पृथिवीपाल विस्मयः सुमहानभूत् । कथं त्वयं शिशुः शेते लोके नाशमुपागते ॥ ९३ ॥ पृथ्वीनाथ! उसे देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। मैं सोचने लगा—'सारे संसारके नष्ट हो जानेपर भी यह बालक यहाँ कैसे सो रहा है?' ॥ ९३ ॥ तपसा चिन्तयंश्चापि तं शिशुं नोपलक्षये । भूतं भव्यं भविष्यं च जानन्नपि नराधिप ॥ ९४ ॥ नरेश्वर! मैं भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंका ज्ञाता होनेपर भी तपस्यासे भलीभाँति चिन्तन करता (ध्यान लगाता) रहा, तो भी उस शिशुके विषयमें कुछ न जान सका ॥ ९४ ॥ अतसीपुष्पवर्णाभः श्रीवत्सकृतभूषणः । साक्षाल्लक्ष्म्या इवावासः स तदा प्रतिभाति मे ॥ ९५ ॥ उसकी अंगकान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम थी। उसका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित था। वह उस समय मुझे साक्षात् लक्ष्मीका निवासस्थान-सा प्रतीत होता था ॥ ९५ ॥ ततो मामब्रवीद् बालः स पद्मनिभलोचनः । श्रीवत्सधारी द्युतिमान् वाक्यं श्रुतिसुखावहम् ॥ ९६ ॥ जानामि त्वां परिश्रान्तं ततो विश्रामकाङ्क्षिणम् । मार्कण्डेय इहास्स्व त्वं यावदिच्छसि भार्गव ॥ ९७ ॥ मुझे विस्मयमें पड़ा देख कमलके समान नेत्रवाले उस श्रीवत्सधारी कान्तिमान् बालकने मुझसे इस प्रकार श्रवणसुखद वचन कहा—'भृगुवंशी मार्कण्डेय! मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम बहुत थक गये हो और विश्राम चाहते हो। तुम्हारी जबतक इच्छा हो यहाँ बैठो ।।
अभ्यन्तरं शरीरे मे प्रविश्य मुनिसत्तम । आस्स्व भो विहितो वासः प्रसादस्ते कृतो मया ॥ ९८ ॥ ‘मुनिश्रेष्ठ! मैंने तुमपर कृपा की है। तुम मेरे शरीरके भीतर प्रवेश करके विश्राम करो। वहाँ तुम्हारे रहनेके लिये व्यवस्था की गयी है’ ॥ ९८ ॥ ततो बालेन तेनैवमुक्तस्यासीत् तदा मम । निर्वेदो जीविते दीर्घे मनुष्यत्वे च भारत ॥ ९९ ॥ उस बालकके ऐसा कहनेपर उस समय मुझे अपने दीर्घ-जीवन और मानव-शरीरपर बड़ा खेद और वैराग्य हुआ ॥ ९९ ॥ ततो बालेन तेनास्यं सहसा विवृतं कृतम् । तस्याहमवशो वक्त्रे दैवयोगात् प्रवेशितः ॥ १०० ॥ तदनन्तर उस बालकने सहसा अपना मुख खोला और मैं दैवयोगसे परवशकी भाँति उसमें प्रवेश कर गया ॥ १०० ॥ ततः प्रविष्टस्तत्कुक्षिं सहसा मनुजाधिप । सराष्ट्रनगराकीर्णां कृत्स्नां पश्यामि मेदिनीम् ॥ १०१ ॥ राजन्! उसमें प्रवेश करते ही मैं सहसा उस बालकके उदरमें जा पहुँचा। वहाँ मुझे समस्त राष्ट्रों और नगरोंसे भरी हुई यह सारी पृथ्वी दिखायी दी ॥ १०१ ॥ गङ्गां शतद्रुं सीतां च यमुनामथ कौशिकीम् ।
चर्मणवतीं वेत्रवतीं चन्द्रभागां सरस्वतीम् ॥ १०२ ॥ सिन्धुं चैव विपाशां च नदीं गोदावरीमपि । वस्वोकसारां नलिनीं नर्मदां चैव भारत ॥ १०३ ॥ नदीं ताम्रां च वेणां च पुण्यतोयां शुभावहाम् । सुवेणां कृष्णवेणां च इरामां च महानदीम् ॥ १०४ ॥ वितस्तां च महाराज कावेरीं च महानदीम् । शोणं च पुरुषव्याघ्र विशल्यां किम्पुनामपि ॥ १०५ ॥ एताश्चान्याश्च नद्योऽहं पृथिव्यां या नरोत्तम । परिक्रामन् प्रपश्यामि तस्य कुक्षौ महात्मनः ॥ १०६ ॥ नरश्रेष्ठ! फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना—इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा ॥ १०२—१०६ ॥ ततः समुद्रं पश्यामि यादोगणनिषेवितम् । रत्नाकरममित्रघ्न पयसो निधिमुत्तमम् ॥ १०७ ॥ शत्रुसूदन! इसके बाद जलजन्तुओंसे भरे हुए अगाध जलके भण्डार परम उत्तम रत्नाकर समुद्रको भी देखा ॥ १०७ ॥ तत्र पश्यामि गगनं चन्द्रसूर्यविराजितम् । जाज्वल्यमानं तेजोभिः पावकार्कसमप्रभम् ॥ १०८ ॥ वहाँ मुझे चन्द्रमा और सूर्यसे सुशोभित आकाशमण्डल दिखायी दिया, जो अनन्त तेजसे प्रज्वलित तथा अग्नि एवं सूर्यके समान देदीप्यमान था ॥ १०८ ॥ पश्यामि च महीं राजन् काननैरुपशोभिताम् । (सपर्वतवनद्वीपां निमग्नाशतसङ्कुलाम् ।) यजन्ते हि तदा राजन् ब्राह्मणा बहुभिर्मखैः ॥ १०९ ॥ राजन्! वहाँकी भूमि विविध काननोंसे सुशोभित, पर्वत, वन और द्वीपोंसे उपलक्षित तथा सैकड़ों सरिताओंसे संयुक्त दिखायी देती थी। ब्राह्मणलोग नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करते थे ॥ १०९ ॥ क्षत्रियाश्च प्रवर्तन्ते सर्ववर्णानुरंजनैः । वैश्याः कृषिं यथान्यायं कारयन्ति नराधिप ॥ ११० ॥ नरेश्वर! क्षत्रिय राजा सब वर्णोंकी प्रजाका अनुरंजन करते—सबको सुखी और प्रसन्न रखते थे। वैश्य न्यायपूर्वक खेतीका काम और व्यापार करते थे ॥ ११० ॥ शुश्रूषायां च निरता द्विजानां वृषलास्तदा ।
ततः परिपतन् राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मनः ॥ १११ ॥ हिमवन्तं च पश्यामि हेमकूटं च पर्वतम् । निषधं चापि पश्यामि श्वेतं च रजतान्वितम् ॥ ११२ ॥ पश्यामि च महीपाल पर्वतं गन्धमादनम् । मन्दरं मनुजव्याघ्र नीलं चापि महागिरिम् ॥ ११३ ॥ पश्यामि च महाराज मेरुं कनकपर्वतम् । महेन्द्रं चैव पश्यामि विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम् ॥ ११४ ॥ मलयं चापि पश्यामि पारियात्रं च पर्वतम् । एते चान्ये च बहवो यावन्तः पृथिवीधराः ॥ ११५ ॥ तस्योदरे मया दृष्टाः सर्वे रत्नविभूषिताः । सिंहान् व्याघ्रान् वराहांश्च पश्यामि मनुजाधिप ॥ ११६ ॥ शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन्! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन्! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याघ्र और वाराह आदि पशु भी देखे ॥ १११—११६ ॥
पृथिव्यां यानि चान्यानि सत्त्वानि जगतीपते । तानि सर्वाण्यहं तत्र पश्यन् पर्यचरं तदा ॥ ११७ ॥ पृथ्वीपते! भूमण्डलमें जितने प्राणी हैं, उन सबको देखते हुए मैं उस समय उस बालकके उदरमें विचरता रहा ॥ ११७ ॥
कुक्षौ तस्य नरव्याघ्र प्रविष्टः संचरन् दिशः । शक्रादींश्चापि पश्यामि कृत्स्नान् देवगणानहम् ॥ ११८ ॥ नरश्रेष्ठ! उस शिशुके उदरमें प्रविष्ट हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते हुए इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंके भी दर्शन हुए ॥ ११८ ॥
साध्यान् रुद्रांस्तथाऽऽदित्यान् गुह्यकान् पितरस्तदा । सर्पान् नागान् सुपर्णांश्च वसूनप्यश्विनावपि ॥ ११९ ॥ गन्धर्वाप्सरसो यक्षानृषींश्चैव महीपते । दैत्यदानवसङ्घांश्च नागांश्च मनुजाधिप ॥ १२० ॥ सिंहिकातनयांश्चापि ये चान्ये सुरशत्रवः । यच्च किंचिन्मया लोके दृष्टं स्थावरजङ्गमम् ॥ १२१ ॥ सर्वं पश्याम्यहं राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मनः । चरमाणः फलाहारः कृत्स्नं जगदिदं विभो ॥ १२२ ॥
पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगत्में घूमता रहता॥ ११९-१२२॥
अन्तःशरीरे तस्याहं वर्षाणामधिकं शतम् ।
न च पश्यामि तस्याहं देहस्यान्तं कदाचन ॥ १२३ ॥
उस बालकके शरीरके भीतर मैं सौ वर्षसे अधिक कालतक घूमता रहा, तो भी कभी उसके शरीरका अन्त नहीं दिखायी दिया ॥ १२३ ॥
सततं धावमानश्च चिन्तयानो विशाम्पते ।
(भ्रमंस्तत्र महीपाल यदा वर्षगणान् बहून् ।)
आसादयामि नैवान्तं तस्य राजन् महात्मनः ॥ १२४ ॥
ततस्तमेव शरणं गतोऽस्मि विधिवत् तदा ।
वरेण्यं वरदं देवं मनसा कर्मणैव च ॥ १२५ ॥
युधिष्ठिर! मैं निरन्तर दौड़ लगाता और चिन्तामें पड़ा रहता था। महाराज! जब बहुत वर्षोंतक भ्रमण करनेपर भी उस महात्माके शरीरका अन्त नहीं मिला, तब मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन वरदायक एवं वरेण्य देवताकी ही विधिपूर्वक शरण ली ॥ १२४-१२५ ॥
ततोऽहं सहसा राजन् वायुवेगेन निःसृतः ।
महात्मनो मुखात् तस्य विवृतात् पुरुषोत्तम ॥ १२६ ॥
पुरुषरत्न युधिष्ठिर! उनकी शरण लेते ही मैं वायुके समान वेगसे उक्त महात्मा बालकके खुले हुए मुखकी राहसे सहसा बाहर निकल आया ॥ १२६ ॥
ततस्तस्यैव शाखायां न्यग्रोधस्य विशाम्पते ।
आस्ते मनुजशार्दूल कृत्स्नमादाय वै जगत् ॥ १२७ ॥
तेनैव बालवेषेण श्रीवत्सकृतलक्षणम् ।
आसीनं तं नरव्याघ्र पश्याम्यमिततेजसम् ॥ १२८ ॥
नरश्रेष्ठ राजन्! बाहर आकर देखा तो उसी बरगदकी शाखापर उसी बाल-वेषसे सम्पूर्ण जगत्को अपने उदरमें लेकर श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित वह अमिततेजस्वी बालक पूर्ववत् बैठा हुआ है ॥ १२७-१२८ ॥
ततो मामब्रवीद् बालः स प्रीतः प्रहसन्निव ।
श्रीवत्सधारी द्युतिमान् पीतवासा महाद्युतिः ॥ १२९ ॥
तब महातेजस्वी पीताम्बरधारी श्रीवत्सभूषित कान्तिमान् उस बालकने प्रसन्न होकर हँसते हुए-से मुझसे कहा— ॥ १२९ ॥
अपीदानीं शरीरेऽस्मिन् मामके मुनिसत्तम ।
उषितस्त्वं सुविश्रान्तो मार्कण्डेय ब्रवीहि मे ॥ १३० ॥
‘मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय! क्या तुम मेरे इस शरीरमें रहकर विश्राम कर चुके? मुझे बताओ' ॥ १३० ॥
मुहूर्तादथ मे दृष्टिः प्रादुर्भूता पुनर्नवा ।
यया निर्मुक्तमात्मानमपश्यं लब्धचेतसम् ॥ १३१ ॥
फिर दो ही घड़ीमें मुझे एक नवीन दृष्टि प्राप्त हुई, जिससे मैं अपने-आपको मायासे मुक्त और सचेत अनुभव करने लगा ॥ १३१ ॥
तस्य ताम्रतलौ तात चरणौ सुप्रतिष्ठितौ ।
सुजातौ मृदुरक्ताभिरङ्गुलीभिर्विराजितौ ॥ १३२ ॥
प्रयत्नेन मया मूर्ध्ना गृहीत्वा ह्यभिवन्दितौ ।
तात! तदनन्तर मैंने कोमल और लाल रंगकी अँगुलियोंसे सुशोभित लाल-लाल तलवेवाले उस बालकके सुन्दर एवं सुप्रतिष्ठित चरणोंको प्रयत्नपूर्वक पकड़कर उन्हें अपने मस्तकसे प्रणाम किया ॥ १३२ ½ ॥
दृष्ट्वा परिमितं तस्य प्रभावममितौजसः ॥ १३३ ॥
विनयेनाञ्जलिं कृत्वा प्रयत्नेनोपगम्य ह ।
दृष्टो मया स भूतात्मा देवः कमललोचनः ॥ १३४ ॥
उस अमित तेजस्वी शिशुका अनन्त प्रभाव देखकर मैं यत्नपूर्वक उसके समीप गया और विनीतभावसे हाथ जोड़कर सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा उस कमलनयन देवताका दर्शन किया ॥ १३३-१३४ ॥
तमहं प्राञ्जलिर्भूत्वा नमस्कृत्येदमब्रुवम् ।
ज्ञातुमिच्छामि देव त्वां मायां चैतां तवोत्तमाम् ॥ १३५ ॥
फिर हाथ जोड़े नमस्कार करके मैंने उससे इस प्रकार कहा—देव! मैं आपको और आपकी इस उत्तम मायाको जानना चाहता हूँ ॥ १३५ ॥
आस्येनानुप्रविष्टोऽहं शरीरे भगवंस्तव ।
दृष्टवानखिलान् सर्वान् समस्तान् जठरे हि ते ॥ १३६ ॥
‘भगवन्! मैंने आपके मुखकी राहसे शरीरमें प्रवेश करके आपके उदरमें समस्त सांसारिक पदार्थोंका अवलोकन किया है ॥ १३६ ॥
तव देव शरीरस्था देवदानवराक्षसाः ।
यक्षगन्धर्वनागाश्च जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ १३७ ॥
‘देव! आपके शरीरमें देवता, दानव, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, नाग तथा समस्त स्थावर-जंगमरूप जगत् विद्यमान है॥
त्वत्प्रसादाच्च मे देव स्मृतिर्न परिहीयते ।
द्रुतमन्तःशरीरे ते सततं परिवर्ततः ॥ १३८ ॥
‘प्रभो! आपकी कृपासे आपके शरीरके भीतर निरन्तर शीघ्र गतिसे घूमते रहनेपर भी मेरी स्मरणशक्ति नष्ट नहीं हुई है॥ १३८॥
निर्गतोऽहमकामस्तु इच्छया ते महाप्रभो ।
इच्छामि पुण्डरीकाक्ष ज्ञातुं त्वाममनिन्दितम् ॥ १३९ ॥
‘महाप्रभो! मैं अपनी अभिलाषा न रहनेपर भी केवल आपकी इच्छासे बाहर निकल आया हूँ। कमलनयन! आप सर्वोत्कृष्ट देवताको मैं जानना चाहता हूँ॥ १३९॥
इह भूत्वा शिशुः साक्षात् किं भवानवतिष्ठते ।
पीत्वा जगदिदं सर्वमेतदाख्यातुमर्हसि ॥ १४० ॥
‘आप इस सम्पूर्ण जगत्को पी करके यहाँ साक्षात् बालकवेषमें क्यों विराजमान हैं? यह सब बतानेकी कृपा करें॥ १४०॥
किमर्थं च जगत् सर्वं शरीरस्थं तवानघ ।
कियन्तं च त्वया कालमिह स्थेयमरिंदम ॥ १४१ ॥
‘अनघ! यह सारा संसार आपके शरीरमें किसलिये स्थित है? शत्रुदमन! आप कितने समयतक यहाँ इस रूपमें रहेंगे?॥ १४१॥
एतदिच्छामि देवेश श्रोतुं ब्राह्मणकाम्यया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष विस्तरेण यथातथम् ॥ १४२ ॥
‘देवेश्वर! कमलनयन! ब्राह्मणमें जो सहज जिज्ञासा होती है, उससे प्रेरित होकर मैं आपसे यह सब बातें यथाविधि विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ॥ १४२॥
महद्भूयेतदचिन्त्यं च यदहं दृष्टवान् प्रभो ।
इत्युक्तः स मया श्रीमान् देवदेवो महाद्युतिः ।
सान्त्वयन् मामिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः ॥ १४३ ॥
‘प्रभो! मैंने जो कुछ देखा है, यह अगाध और अचिन्त्य है।’ मेरे इस प्रकार पूछनेपर वे वक्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी देवाधिदेव श्रीभगवान् मुझे सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले॥ १४३॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि
अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें एक सौ अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८८॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १४४ श्लोक हैं)
* अट्टमन्नं शिवो वेदो ब्राह्मणाश्च चतुष्पथाः । केशो भगं समाख्यातं शूलं तद् विक्रयं विदुः ।। (नीलकण्ठकृत टीका)
१८९-
एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः
भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना
देव उवाच
कामं देवा अपि न मां विप्र जानन्ति तत्त्वतः ।
त्वत्प्रीत्या तु प्रवक्ष्यामि यथेदं विसृजाम्यहम् ॥ १ ॥
**भगवान् बोले—**विप्रवर! देवता भी मेरे स्वरूपको यथेष्ट और यथार्थरूपसे नहीं जानते। मैं जिस प्रकार इस जगत्की रचना करता हूँ, वह तुम्हारे प्रेमके कारण तुम्हें बताऊँगा ॥ १ ॥
पितृभक्तोऽसि विप्रर्षे मां चैव शरणं गतः ।
ततो दृष्टोऽस्मि ते साक्षाद् ब्रह्मचर्यं च ते महत् ॥ २ ॥
ब्रह्मर्षे! तुम पितृभक्त हो, मेरी शरणमें आये हो और तुमने महान् ब्रह्मचर्यका पालन किया है। इन्हीं सब कारणोंसे तुम्हें मेरे साक्षात् स्वरूपका दर्शन हुआ ॥ २ ॥
अपां नारा इति पुरा संज्ञाकर्म कृतं मया ।
तेन नारायणोऽप्युक्तो मम तत् त्वयनं सदा ॥ ३ ॥
पूर्वकालमें मैंने ही जलका 'नारा' नाम रखा था। वह 'नारा' मेरा सदा अयन (वासस्थान) है, इसलिये मैं 'नारायण' नामसे विख्यात हूँ ॥ ३ ॥
अहं नारायणो नाम प्रभवः शाश्वतोऽव्ययः ।
विधाता सर्वभूतानां संहर्ता च द्विजोत्तम ॥ ४ ॥
अहं विष्णुरहं ब्रह्मा शक्रश्चाहं सुराधिपः ।
अहं वैश्रवणो राजा यमः प्रेताधिपस्तथा ॥ ५ ॥
मैं नारायण ही सबकी उत्पत्तिका कारण, सनातन और अविनाशी हूँ। द्विजश्रेष्ठ! सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि और संहार करनेवाला भी मैं ही हूँ। मैं ही विष्णु हूँ, मैं ही ब्रह्मा हूँ, मैं ही देवराज इन्द्र हूँ और मैं ही राजा कुबेर तथा प्रेतराज यम हूँ ॥ ४-५ ॥
अहं शिवश्च सोमश्च कश्यपोऽथ प्रजापतिः ।
अहं धाता विधाता च यज्ञश्चाहं द्विजोत्तम ॥ ६ ॥
विप्रवर! मैं ही शिव, चन्द्रमा, प्रजापति कश्यप, धाता, विधाता और यज्ञ हूँ ॥ ६ ॥
अग्निरास्यं क्षितिः पादौ चन्द्रादित्यौ च लोचने ।
द्यौर्मूर्धा खं दिशः श्रोत्रे तथाऽपः स्वेदसम्भवाः ॥ ७ ॥
सदिशं च नभः कायो वायुर्मनसि मे स्थितः ।
मया क्रतुशतैरिष्टं बहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः ॥ ८ ॥
अग्नि मेरा मुख है, पृथ्वी चरण हैं, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं। द्युलोक मेरा मस्तक है। आकाश और दिशाएँ मेरे कान हैं तथा जल मेरे शरीरके पसीनेसे प्रकट हुआ है। दिशाओंसहित आकाश मेरा शरीर है। वायु मेरे मनमें स्थित है। मैंने पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त अनेक शत यज्ञोंद्वारा यजन किया है ॥ ७-८ ॥
यजन्ते वेदविदुषो मां देवयजने स्थितम् ।
पृथिव्यां क्षत्रियेन्द्राश्च पार्थिवाः स्वर्गकाङ्क्षिणः ॥ ९ ॥
यजन्ते मां तथा वैश्याः स्वर्गलोकजिगीषया ।
चतुःसमुद्रपर्यन्तां मेरुमन्दरभूषणां ॥ १० ॥
शेषो भूत्वाहमेवैतां धारयामि वसुन्धराम् ।
वेदवेत्ता ब्राह्मण देवयज्ञमें स्थित मुझ यज्ञपुरुषका यजन करते हैं। पृथ्वीका पालन करनेवाले क्षत्रियनरेश स्वर्गप्राप्तिकी अभिलाषासे इस भूतलपर यज्ञोंद्वारा मेरा यजन करते हैं। इसी प्रकार वैश्य भी स्वर्गलोकपर विजय पानेकी इच्छासे मेरी सेवा-पूजा करते हैं। मैं ही शेषनाग होकर मेरुमन्दरसे विभूषित तथा चारों समुद्रोंसे घिरी हुई इस वसुन्धराको अपने सिरपर धारण करता हूँ ॥ ९-१० १/२ ॥
वाराहं रूपमास्थाय मयेयं जगती पुरा ॥ ११ ॥
मज्जमाना जले विप्र वीर्येणासीत् समुद्धृता ।
अग्निश्च वडवावक्त्रो भूत्वाहं द्विजसत्तम ॥ १२ ॥
पिबाम्यपः सदा विद्वंस्ताश्चैवं विसृजाम्यहम् ।
ब्रह्म वक्त्रं भुजौ क्षत्रमूरू मे संस्थिता विशः ॥ १३ ॥
विप्रवर! पूर्वकालमें जब यह पृथ्वी जलमें डूब गयी थी, उस समय मैंने ही वाराहरूप धारण करके इसे बलपूर्वक जलसे बाहर निकाला था। विद्वन्! मैं ही बडवामुख अग्नि होकर सदा समुद्रके जलको पीता हूँ और फिर उस जलको बरसा देता हूँ। ब्राह्मण मेरा मुख है, क्षत्रिय दोनों भुजाएँ हैं और वैश्य मेरी दोनों जाँघोंके रूपमें स्थित हैं ॥ ११—१३ ॥
पादौ शूद्रा भवन्तीमे विक्रमेण क्रमेण च ।
ऋग्वेदः सामवेदश्च यजुर्वेदोऽप्यथर्वणः ॥ १४ ॥
मत्तः प्रादुर्भवन्त्येते मामेव प्रविशन्ति च ।
ये शूद्र मेरे दोनों चरण हैं। मेरी शक्तिसे क्रमशः इनका प्रादुर्भाव हुआ है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—ये मुझसे ही प्रकट होते और मुझमें ही लीन हो जाते हैं ॥ १४ १/२ ॥
यतयः शान्तिपरमा यतात्मानो बुभुत्सवः ॥ १५ ॥
कामक्रोधद्वेषमुक्ता निःसंगा वीतकल्मषाः ।