भारतकोश
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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

कथं त्वमस्मासु निवत्स्यसे सदा वदस्व किं चापि तवेह वेतनम् ॥ ८ ॥ तुम किस राजाके राज्यसे यहाँ आये हो? और तुमने किस कलाकी शिक्षा प्राप्त की है? बोलो, हमारे यहाँ कैसे सदा रह सकोगे? और यहाँ तुम्हारा वेतन क्या होगा? ॥ ८ ॥

सहदेव उवाच

पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां ज्येष्ठो भ्राता युधिष्ठिरः । तस्याष्टशतसाहस्रा गवां वर्गाः शतं शतम् ॥ ९ ॥ **सहदेव बोले—**राजन्! पाँचों पाण्डवोंमें सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर हैं। उनके पास एक प्रकारकी गौओंके आठ लाख झुंड थे और प्रत्येक झुंडमें सौ-सौ गायें थीं ॥ ९ ॥

अपरे शतसाहस्रा द्विस्तावन्तस्तथा परे । तेषां गोसंख्य आसं वै तन्तिपालेति मां विदुः ॥ १० ॥ भूतं भव्यं भविष्यं च यच्च संख्यागतं गवाम् । न मेऽस्त्यविदितं किंचित् समन्ताद् दशयोजनम् ॥ ११ ॥ इनके सिवा, दूसरे प्रकारकी गौओंके एक लाख झुंड तथा तीसरे प्रकारकी गौओंके उनसे दुगुने अर्थात् दो लाख झुंड थे। (प्रत्येक झुंडमें सौ-सौ गायें थीं।) पाण्डवोंकी उन गौओंका मैं गणक और निरीक्षक था। वे लोग मुझे ‘तन्तिपाल’ कहा करते थे। चारों ओर दस योजनकी दूरीमें जितनी गौएँ हों; उनकी भूत, वर्तमान और भविष्यमें जितनी संख्या थी, है और होगी, उन सबको मैं जानता हूँ। गौओंके सम्बन्धमें तीनों कालमें होनेवाली कोई ऐसी बात नहीं है, जो मुझे ज्ञात न हो ॥

गुणाः सुविदिता ह्यासन् मम तस्य महात्मनः । असकृत् स मया तुष्टः कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ १२ ॥ क्षिप्रं च गावो बहुला भवन्ति न तासु रोगो भवतीह कश्चन । तैस्तैरुपायैर्विदितं ममैत- देतानि शिल्पानि मयि स्थितानि ॥ १३ ॥ ऋषभांश्चापि जानामि राजन् पूजितलक्षणान् । येषां मूत्रमुपाघ्राय अपि वन्ध्या प्रसूयते ॥ १४ ॥ महात्मा राजा युधिष्ठिरको मेरे ये गुण भलीभाँति विदित थे। वे कुरुराज युधिष्ठिर सदा मेरे ऊपर संतुष्ट रहते थे। किन-किन उपायोंसे गौओंकी संख्या शीघ्र बढ़ जाती है और उनमें कोई रोग नहीं पैदा होता, यह सब मुझे ज्ञात है। महाराज! ये ही कलाएँ मुझमें विद्यमान हैं। इनके सिवा मैं उन उत्तम लक्षणोंवाले बैलोंको भी जानता हूँ, जिनके मूत्रको सूँघ लेनेमात्रसे वन्ध्या स्त्री भी गर्भधारण एवं संतान उत्पन्न करनेयोग्य हो जाती है ॥ १२—१४ ॥

विराट उवाच

शतं सहस्राणि समाहितानि सवर्णवर्णस्य विमिश्रितान् गुणैः । पशून् सपालान् भवते ददाम्यहं त्वदाश्रया मे पशवो भवन्त्विह ॥ १५ ॥ **विराटने कहा—**तन्तिपाल! मेरे यहाँ एक लाख पशु संगृहीत हैं। उनमेंसे कुछ तो एक ही रंगके हैं और कुछ मिश्रित रंगके। वे सब विभिन्न गुणोंसे संयुक्त हैं। मैं उन पशुओं और पशुपालोंको आजसे तुम्हारे हाथमें सौंपता हूँ। मेरे पशु अबसे तुम्हारे ही अधीन रहेंगे ॥ १५ ॥

वैशम्पायन उवाच

तथा स राज्ञोऽविदितो विशाम्पते- रुवास तत्रैव सुखं नरोत्तमः । न चैनमन्येऽपि विदुः कथंचन प्रादाच्च तस्मै भरणं यथेप्सितम् ॥ १६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**इस प्रकार प्रजापालक राजा विराटसे अपरिचित रहकर नरश्रेष्ठ सहदेव वहीं गोशालामें रहने लगे। दूसरे लोग भी उन्हें किसी तरह पहचान न सके। राजाने उनके लिये उनकी इच्छाके अनुसार भरण-पोषणकी व्यवस्था कर दी ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि सहदेवप्रवेशे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें सहदेवप्रवेशविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥

अध्याय (पृष्ठ 2185)

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एकादशोऽध्यायः

अर्जुनका राजा विराटसे मिलना और राजाके द्वारा कन्याओंको नृत्य आदिकी शिक्षा देनेके लिये उनको नियुक्त करना

वैशम्पायन उवाच

अथापरोऽदृश्यत रूपसम्पदा
स्त्रीणामलङ्कारधरो बृहत्पुमान् ।
प्राकारवप्रे प्रतिमुच्य कुण्डले
दीर्घे च कम्बूपरि हाटके शुभे ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर नगरकी चहारदीवारीके पीछे जो मिट्टीका ऊँचा टीला था, उसके समीप रूप-सम्पदासे सुशोभित एक दूसरा पुरुष दिखायी दिया। उसका डील-डौल ऊँचा था। उसने स्त्रियोंके लिये उचित आभूषण पहन रखे थे तथा कानोंमें बड़े-बड़े कुण्डल और हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ पहनकर उनके ऊपर सोनेके सुन्दर कंगन धारण कर लिये थे ॥ १ ॥

बाहू च दीर्घान् प्रविकीर्य मूर्धजान्
महाभुजो वारणतुल्यविक्रमः ।
गतेन भूमिं प्रतिकम्पयंस्तदा
विराटमासाद्य सभासमीपतः ॥ २ ॥

अपने बड़े-बड़े केशोंकी लटोंको खोलकर हाथोंतक फैलाये वह महाबाहु पुरुष उस समय हाथीके समान मस्तानी चालसे चलता और पग-पगपर मानो पृथ्वीको कँपाता हुआ राजसभाके समीप राजा विराटके पास आकर खड़ा हुआ ॥ २ ॥

तं प्रेक्ष्य राजोपगतं सभातले
व्याजात् प्रतिच्छन्नमरिप्रमाथिनम् ।
विराजमानं परमेण वर्चसा
सुतं महेन्द्रस्य गजेन्द्रविक्रमम् ॥ ३ ॥
सर्वानपृच्छच्च सभानुचारिणः
कुतोऽयमायाति पुरा न मे श्रुतः ।
न चैनमूचुर्विदितं तदा नराः
सविस्मयं वाक्यमिदं नृपोऽब्रवीत् ॥ ४ ॥

छद्मवेशसे अपने स्वरूपको छिपाकर सभाभवनमें आया हुआ वह शत्रुविजयी वीर पुरुष अपने उत्कृष्ट तेजसे प्रकाशित हो रहा था। गजराजके समान बल-विक्रमवाले उस महेन्द्रपुत्र अर्जुनको देखकर राजाने समस्त सभासदोंसे पूछा—'यह कहाँसे आया है? आजसे पहले मैंने कभी इसके विषयमें नहीं सुना है।' राजाके पूछनेपर उन मनुष्योंमेंसे किसीने उस पुरुषको अपना परिचित नहीं बताया। तब राजाने आश्चर्ययुक्त होकर यह बात कहीं— ।। ३-४ ।।

सत्त्वोपपन्नः पुरुषोऽमरोपमः श्यामो युवा वारणयूथपोपमः । आमुच्य कम्बूपरि हाटके शुभे विमुच्य वेणीमपिनह्य कुण्डले ।। ५ ।। स्रग्वी सुकेशः परिधाय चान्यथा शुशोभ धन्वी कवची शरी यथा । आरुह्य यानं परिधावतां भवान् सुतैः समो मे भव वा मया समः ।। ६ ।।

'तात! तुम शक्ति और धैर्यसे सम्पन्न देवोपम पुरुष हो। तुम्हारी अंगकान्ति श्याम है। तुम तरुण हो और हाथियोंके यूथके अधिपति महान् गजराजके समान शोभा पा रहे हो। तुमने हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ पहनकर उनके ऊपर सोनेके सुन्दर कंगन डाल लिये हैं, वेणी खोलकर केशोंकी लटें छितरा ली हैं तथा कानोंमें कुण्डल धारणकर गलेमें गजरा डाल रखा है। तुम्हारे केश बहुत ही सुन्दर हैं। तुम नारीजनोचित वेश-भूषा धारण करके भी उसके विपरीत धनुष-बाण और कवच धारण करनेवाले वीरके समान शोभा पा रहे हो। तुम रथ आदि वाहनोंपर बैठकर इच्छानुसार भ्रमण करो और मेरे पुत्रोंके अथवा मेरे ही समान होकर रहो ।। ५-६ ।।

वृद्धो ह्यहं वै परिहारकामः सर्वान् मत्स्यांस्तरसा पालयस्व । नैवंविधाः क्लीबरूपा भवन्ति कथंचनेति प्रतिभाति मे मनः ।। ७ ।।

'मैं बूढ़ा हो गया हूँ; अब राजकाज छोड़ना चाहता हूँ; अतः तुम सम्पूर्ण मत्स्यदेशका शीघ्र ही पालन करो। तुम्हारे-जैसे स्वरूपवाले किसी तरह नपुंसक नहीं हो सकते। मेरे मनको ऐसा ही प्रतीत होता है' ।। ७ ।।

(अर्जुन उवाच वेणीं प्रकुर्यां रुचिरे च कुण्डले तथा स्रजः प्रावरणानि संहरे ।

स्नानं चरेयं विमृजे च दर्पणं विशेषकेष्वेव च कौशलं मम ।। क्लीबेषु बालेषु जनेषु नर्तने शिक्षाप्रदानेषु च योग्यता मम । करोमि वेणीषु च पुष्पपूरणं न मे स्त्रियः कर्मणि कौशलाधिकाः ।। **अर्जुन बोले—**मैं वेणी-रचना अच्छी कर सकता हूँ, मनोहर कुण्डल बनाना जानता हूँ, फूलोंके हार तथा ओढ़नेकी चादरें सुन्दर ढंगसे बनाता हूँ, स्नान करा सकता हूँ, दर्पणकी सफाई करता हूँ और चन्दन आदिसे अनेक प्रकारकी रेखाएँ बनाकर शृंगार करनेकी क्रियामें मुझे विशेष कुशलता प्राप्त है। नपुंसकों, बालकों एवं साधारण लोगोंमें नाचने तथा संगीत एवं नृत्यकी शिक्षा देनेमें मेरी अच्छी योग्यता है। स्त्रियोंकी वेणीमें फूल गूँथनेका कार्य भी मैं अच्छे ढंगसे सम्पन्न करता हूँ। इन सब कार्योंमें स्त्रियाँ भी मुझसे अधिक कुशल नहीं हैं।

तमब्रवीत् प्रांशुमुदीक्ष्य विस्मितो विराटराजोपसृतं महायशाः ।। निकट आनेपर उसका कद बहुत ऊँचा देखकर महायशस्वी राजा विराट अत्यन्त विस्मित होकर बोले।

विराट उवाच

नार्हस्तु वेषोऽयमनूर्जितस्ते
नापुंस्त्वमर्हो नरदेवसिंह ।
तवैष वेषोऽशुभवेषभूषणै-
र्विभूषितो भूतपतेरिव प्रभो ।।
विभाति भानोरिव रश्मिमालिनो
घनावरुद्धे गगने घनैखिव ।
धनुर्हि मन्ये तव शोभयेद् भुजौ
तथा हि पीनावतिमात्रमायतौ ।।)
**विराट ने कहा—**नरदेवसिंह! ओज और बलसे रहित नपुंसकका-सा यह वेष तुम्हारे योग्य नहीं है। तुम क्लीब होनेके योग्य नहीं हो। प्रभो! तुम्हारा यह वेष भगवान् भूतनाथकी भाँति अशुभ वेष-भूषासे विभूषित है। जैसे बादलोंकी घटासे आच्छादित आकाशमें भी अंशुमाली सूर्यका मण्डल सुशोभित होता है, उसी प्रकार इस क्लीबवेषमें भी तुम पौरुषसे प्रकाशित हो रहे हो। मेरा ऐसा विश्वास है कि तुम्हारी इन मोटी और अत्यन्त विशाल भुजाओंको धनुष ही सुशोभित कर सकता है।

अर्जुन उवाच

गायामि नृत्याम्यथ वादयामि
भद्रोऽस्मि नृत्ये कुशलोऽस्मि गीते ।
त्वमुत्तरायै प्रदिशस्व मां स्वयं
भवामि देव्या नरदेव नर्तकः ॥ ८ ॥
**अर्जुनने कहा—**नरदेव! मैं गाता, नाचता और बाजे बजाता हूँ। नृत्यकलामें निपुण और संगीत-कलामें भी कुशल हूँ। आप उत्तराको शिक्षा देनेके लिये मुझे रख लें। मैं स्वयं राजकुमारी उत्तराको नृत्य सिखलाऊँगा ।। ८ ।।

इदं तु रूपं मम येन किं तव
प्रकीर्तयित्वा भृशशोकवर्धनम् ।
बृहन्नलां मां नरदेव विद्धि
सुतं सुतां वा पितृमातृवर्जिताम् ॥ ९ ॥
मेरा ऐसा रूप जिस कारणसे हुआ है, उसे आपके सामने कहनेसे क्या लाभ है? वह अधिक शोक बढ़ानेवाली बात है। राजन्! आप मुझे बृहन्नला समझें और पिता-मातासे रहित पुत्र या पुत्री मान लें ।। ९ ।।

विराट उवाच

ददामि ते हन्त वरं बृहन्नले

सुतां च मे नर्तय याश्च तादृशीः ।

इदं तु ते कर्म समं न मे मतं

समुद्रनेमिं पृथिवीं त्वमर्हसि ।। १० ।।

विराट बोले—बृहन्नले! मैं तुम्हें अभीष्ट वर देता हूँ। तुम मेरी पुत्रीको तथा उसके समान

अवस्थावाली अन्य राजकुमारियोंको नृत्यकला सिखलाओ। परंतु मुझे यह कर्म तुम्हारे

योग्य नहीं जान पड़ता। तुम तो समुद्रसे घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वीके शासक होने योग्य

हो ।। १० ।।

वैशम्पायन उवाच

बृहन्नलां तामभिवीक्ष्य मत्स्यराट्

कलासु नृत्येषु तथैव वादिते ।

सम्मन्त्र्य राजा विविधैः स्वमन्त्रिभिः

परीक्ष्य चैनं प्रमदाभिराशु वै ।। ११ ।।

अपुंस्त्वमप्यस्य निशम्य च स्थिरं

ततः कुमारीपुरमुत्ससर्ज तम् ।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर मत्स्यनरेशने बृहन्नलाकी गीत, नृत्य

और बाजे बजानेकी कलाओंमें परीक्षा करके अपने अनेक मन्त्रियोंसे यह सलाह ली कि

इसे अन्तःपुरमें रखना चाहिये या नहीं। फिर तरुणी स्त्रियोंद्वारा शीघ्र ही उनके नपुंसकत्वकी

जाँच करायी। जब सब तरहसे उनका नपुंसक होना ठीक प्रमाणित हो गया, तब यह सुन-

समझकर उन्होंने बृहन्नलाको कन्याके अन्तःपुरमें जानेकी आज्ञा दी ।। ११ १/२ ।।

स शिक्षयामास च गीतवादितं

सुतां विराटस्य धनंजयः प्रभुः ।। १२ ।।

सखीश्च तस्याः परिचारिकास्तथा

प्रियश्च तासां स बभूव पाण्डवः ।। १३ ।।

तथा स सत्रेण धनंजयो वसन्

प्रियाणि कुर्वन् सह ताभिरात्मवान् ।

तथा च तं तत्र न जज्ञिरे जना

बहिश्चरा वाप्यथ चान्तरेचराः ।। १४ ।।

शक्तिशाली अर्जुन विराटकन्या उत्तरा, उसकी सखियों तथा सेविकाओंको भी गीत,

वाद्य एवं नृत्यकलाकी शिक्षा देने लगे। इससे वे उन सबके प्रिय हो गये। छद्मवेशमें

कन्याओंके साथ रहते हुए भी अर्जुन अपने मनको सदा पूर्णरूपसे वशमें रखते और उन

सबको प्रिय लगनेवाले कार्य करते थे। इस रूपमें वहाँ रहते हुए अर्जुनको बाहर अथवा

अन्तःपुरके कोई भी मनुष्य पहचान न सके ।। १२—१४ ।।

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि अर्जुनप्रवेशो नाम एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें अर्जुनप्रवेशनामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १८ १/३ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 2191)

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द्वादशोऽध्यायः

नकुलका विराटके अश्वोंकी देखरेखमें नियुक्त होना

वैशम्पायन उवाच

अथापरोऽदृश्यत पाण्डवः प्रभु-
 विराटराजं तरसा समेयिवान् ।
तमापतन्तं ददृशे पृथग्जनो
 विमुक्तमभ्रादिव सूर्यमण्डलम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर अन्य पाण्डुपुत्र शक्तिशाली नकुल बड़े वेगसे चलते हुए राजा विराटके यहाँ आये। उन्हें आते समय साधारण लोगोंने देखा; उस समय वे मेघमालाकी ओटसे निकले हुए सूर्यमण्डलके समान तेजस्वी जान पड़ते थे ॥ १ ॥

स वै हयानैक्षत तांस्ततस्ततः
 समीक्षमाणं स ददर्श मत्स्यराट् ।
ततोऽब्रवीत् ताननुगान् नरेश्वरः
 कुतोऽयमायाति नरोऽमरोपमः ॥ २ ॥
स्वयं हयानीक्षति मामकान् दृढं
 ध्रुवं हयज्ञो भविता विचक्षणः ।
प्रवेश्यतामेष समीपमाशु मे
 विभाति वीरो हि यथामरस्तथा ॥ ३ ॥

आते ही उन्होंने इधर-उधर घूमकर घोड़ोंको देखना प्रारम्भ किया। इस प्रकार उन अश्वोंका निरीक्षण करते समय उन्हें मत्स्यराज विराटने देखा। तब वे नरेश वहाँ बैठे हुए अनुचरोंसे बोले—'पता तो लगाओ, यह देवोपम पुरुष कहाँसे आ रहा है? यह बिना कहे-सुने स्वयं मेरे घोड़ोंको बहुत ध्यानसे देख रहा है; अतः यह अवश्य घोड़ोंको पहचाननेवाला और अश्वविद्याका विद्वान् होगा। इसलिये इसे शीघ्र मेरे समीप ले आओ। यह वीर देवताओंकी भाँति सुशोभित हो रहा है' ॥ २-३ ॥

अभ्येत्य राजानममित्रहाब्रवी- ज्जयोऽस्तु ते पार्थिव भद्रमस्तु वः। हयेषु युक्तो नृप सम्मतः सदा तवाश्वसूतो निपुणो भवाम्यहम् ॥ ४॥ तत्पश्चात् राजसेवकोंके साथ राजाके समीप आकर शत्रुहन्ता नकुलने कहा—‘राजन्! आपकी जय हो। आपका कल्याण हो। मैं घोड़ोंको शिक्षा देनेमें निपुण हूँ और अनेक राजाओंसे सम्मानित हूँ। मैं सदा आपके घोड़ोंका चतुर सारथि हो सकता हूँ’ ॥ ४ ॥

विराट उवाच

ददामि यानानि धनं निवेशनं ममाश्वसूतो भवितुं त्वमर्हसि । कुतोऽसि कस्यासि कथं त्वमागतः प्रब्रूहि शिल्पं तव विद्यते च यत् ॥ ५ ॥ विराटने कहा— भद्र पुरुष! मैं तुम्हें सवारी, धन और रहनेके लिये घर देता हूँ। तुम मेरे घोड़ोंको शिक्षा देनेवाले सारथि हो सकते हो, किंतु मैं पहले यह जानना चाहता हूँ कि तुम

कहाँसे आये हो? किसके पुत्र हो और किसलिये तुम्हारा यहाँ आगमन हुआ है? तुममें जो कला-कौशल हो, उसे भी बताओ।। ५ ।।

नकुल उवाच

पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां ज्येष्ठो भ्राता युधिष्ठिरः ।
तेनाहमश्वेषु पुरा नियुक्तः शत्रुकर्शन ।। ६ ।।
अश्वानां प्रकृतिं वेद्मि विनयं चापि सर्वशः ।
दुष्टानां प्रतिपत्तिं च कृत्स्नं चैव चिकित्सितम् ।। ७ ।।

**नकुल बोले—**शत्रुदमन! सुनिये, पाँचों पाण्डवोंमें जो बड़े भ्राता युधिष्ठिर हैं, उन्होंने पहले मुझे घोड़ोंकी देखभालके कामपर लगा रखा था। मैं घोड़ोंकी जाति पहचानता हूँ एवं उन्हें सब प्रकारकी शिक्षा देनेकी कला भी जानता हूँ। दुष्ट घोड़ोंकी दुष्टता-निवारणका ढंग भी मुझे मालूम है तथा घोड़ोंकी चिकित्सा भी मैं पूर्णरूपसे जानता हूँ।। ६-७ ।।

न कातरं स्यान्मम जातु वाहनं
न मेऽस्ति दुष्टा वडवा कुतो हयाः ।
जनस्तु मामाह स चापि पाण्डवो
युधिष्ठिरो ग्रन्थिकमेव नामतः ।। ८ ।।

मेरा सिखाया हुआ घोड़ा कभी कायर नहीं हो सकता। मेरी सिखायी हुई घोड़ीमें भी कोई ऐब नहीं आता, फिर घोड़े तो बिगड़ ही कैसे सकते हैं? मुझे साधारण लोग तथा पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिर भी 'ग्रन्थिक' नामसे ही पुकारा करते थे ।। ८ ।।

(मातलिरिव देवपतेर्दशरथनृपतेः सुमन्त्र इव यन्ता ।
सुमह इव जामदग्नेस्तथैव तव शिक्षयाम्यश्वान् ।।
युधिष्ठिरस्य राजेन्द्र नरराजस्य शासनात् ।
शतसाहस्रकोटीनाम्श्वानाम्स्मि रक्षिता ।।)

जैसे देवराज इन्द्रके सारथि मातलि हैं, जैसे राजा दशरथके रथचालक सुमन्त्र हैं और जैसे जमदग्निनन्दन परशुरामके सूत सुमह हैं, उसी प्रकार मैं आपका सारथि होकर आपके घोड़ोंको शिक्षा दूँगा। राजेन्द्र! मैं महाराज युधिष्ठिरके आदेशसे उनके यहाँ लक्षकोटि अश्वोंका संरक्षक रहा हूँ।

विराट उवाच

यदस्ति किंचिन्मम वाजिवाहनं
तदस्तु सर्वं त्वदधीनमद्य वै ।
ये चापि केचिन्मम वाजियोजका-
स्त्वदाश्रयाः सारथयश्च सन्तु मे ।। ९ ।।

**विराटने कहा—**ग्रन्थिक! मेरे पास जो भी घोड़े और अन्य वाहन हैं, वे सब आजसे ही तुम्हारे अधीन हो जायँ। इसके सिवा जो कोई भी मेरे घोड़ोंको जोतनेवाले सारथि हैं, वे सब तुम्हारे अधिकारमें इदं रहें ।। ९ ।।
इदं तवेष्टं यदि वै सुरोपम
ब्रवीहि यत् ते प्रसमीक्षितं वसु ।
न तेऽनुरूपं हयकर्म विद्यते
प्रभासि राजेव हि सम्मतो मम ।। १० ।।
युधिष्ठिरस्येव हि दर्शनेन मे
समं तवेदं प्रियमत्र दर्शनम् ।
कथं तु भृत्यैः स विनाकृतो वने
वसत्यनिन्द्यो रमते च पाण्डवः ।। ११ ।।
देवोपम पुरुष! यदि यही कार्य तुम्हें प्रिय है, तो बताओ, इसके लिये वेतनरूपसे कितना धन लेनेका तुमने विचार किया है? यह घोड़ोंकी शिक्षाका कार्य तुम्हारे अनुरूप नहीं है। तुम तो राजाकी भाँति शोभा पा रहे हो और मुझे भी अत्यन्त प्रिय लगते हो। आज मुझे तुम्हारा जो यहाँ दर्शन हुआ है, यह राजा युधिष्ठिरके ही दर्शनके समान मुझे अत्यन्त प्रिय है। अहो! सर्वथा प्रशंसाके योग्य पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिर सेवकोंके बिना वनमें कैसे रहते होंगे और कैसे उनका मन वहाँ लगता होगा? ।। १०-११ ।।

वैशम्पायन उवाच

तथा स गन्धर्ववरोपमो युवा
विराटराज्ञा मुदितेन पूजितः ।
न चैनमन्येऽपि विदुः कथंचन
प्रियाभिरामं विचरन्तमन्तरा ।। १२ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार प्रसन्न हुए राजा विराटके द्वारा सम्मानित हो श्रेष्ठ गन्धर्वके सदृश शोभा पानेवाले युवावस्थासम्पन्न नकुल वहाँ रहने लगे। उनका स्वरूप बड़ा ही प्रिय और नयनाभिराम था। वे नगरके भीतर विचरते रहते थे, तो भी उन्हें राजा तथा अन्य मनुष्य किसी प्रकार पहचान न सके ।। १२ ।।
एवं हि मत्स्ये न्यवसन्त पाण्डवा
यथाप्रतिज्ञाभिरमोघदर्शनाः ।
अज्ञातचर्यां व्यचरन् समाहिताः
समुद्रनेमीपतयोऽतिदुःखिताः ।। १३ ।।
जिनका दर्शन अमोघ है, वे पाण्डवगण इस प्रकार अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार मत्स्यदेशमें रहने और एकाग्रतापूर्वक अज्ञातवासका समय व्यतीत करने लगे। वे सागरसे

घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वीके अधिपति होकर भी अत्यन्त कष्ट उठा रहे थे ।। १३ ।।

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि नकुलप्रवेशे द्वादशोऽध्यायः ।। १२ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें नकुलप्रवेशसम्बन्धी बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १५ श्लोक हैं।)

(समयपालनपर्व)

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(समयपालनपर्व)

त्रयोदशोऽध्यायः

भीमसेनके द्वारा जीमूत नामक विश्वविख्यात मल्लका वध

जनमेजय उवाच

एवं ते मत्स्यनगरे प्रच्छन्नाः कुरुनन्दनाः ।
अत ऊर्ध्वं महावीर्याः किमकुर्वत वै द्विज ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! इस प्रकार मत्स्यदेशकी राजधानीमें गुप्तरूपसे निवास करनेवाले महापराक्रमी पाण्डुपुत्रोंने इसके बाद क्या किया? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं मत्स्यस्य नगरे प्रच्छन्नाः कुरुनन्दनाः ।
आराधयन्तो राजानं यदकुर्वत तच्छृणु ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! इस प्रकार मत्स्यदेशकी राजधानीमें गुप्तरूपसे निवास करनेवाले पाण्डवोंने राजा विराटकी सेवा करते हुए जो-जो कार्य किया, वह सुनो ॥ २ ॥

तृणबिन्दुप्रसादाच्च धर्मस्य च महात्मनः ।
अज्ञातवासमेवं तु विराटनगरेऽवसन् ॥ ३ ॥
युधिष्ठिरः सभास्तारो मत्स्यानामभवत् प्रियः ।
तथैव च विराटस्य सपुत्रस्य विशाम्पते ॥ ४ ॥
स ह्यक्षहृदयज्ञस्तान् क्रीडयामास पाण्डवः ।
अक्षवत्यां यथाकामं सूत्रबद्धानिव द्विजान् ॥ ५ ॥
राजर्षि तृणबिन्दु और महात्मा धर्मके प्रसादसे पाण्डवलोग इस प्रकार विराटके नगरमें अज्ञातवासके दिन पूरे करने लगे। महाराज युधिष्ठिर राजसभाके प्रमुख सदस्य और मत्स्यदेशकी प्रजाके अत्यन्त प्रिय थे। राजन्! इसी प्रकार पुत्रसहित राजा विराट्का भी उनपर विशेष प्रेम था। वे पासोंका मर्म जानते थे। जैसे कोई सूतमें बाँधे हुए पक्षियोंको इच्छानुसार उड़ावे, उसी प्रकार वे

द्यूतशालामें पासोंको अपने इच्छानुसार फेंकते हुए राजा आदिको जूआ खेलाया करते थे ।। ३—५ ।। अज्ञातं च विराट्स्य विजित्य वसु धर्मराट् । भ्रातृभ्यः पुरुषव्याघ्रो यथार्हं सम्प्रयच्छति ।। ६ ।। 'पुरुषसिंह धर्मराज युधिष्ठिर जूएमं धन जीतकर अपने भाइयोंको यथायोग्य बाँट देते थे।' इसका राजा विराटको भी पता नहीं लगता था ।। ६ ।। भीमसेनोऽपि मांसानि भक्ष्याणि विविधानि च । अतिसृष्टानि मत्स्येन विक्रीणीते युधिष्ठिरे ।। ७ ।। भीमसेन भी नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ, जो मत्स्यनरेशद्वारा उन्हें पुरस्काररूपमें प्राप्त होते, बेच देते और उससे मिला हुआ धन युधिष्ठिरकी सेवामें अर्पित करते थे ।। ७ ।। वासांसि परिजीर्णानि लब्धान्यन्तःपुरेऽर्जुनः । विक्रीणानश्च सर्वेभ्यः पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति ।। ८ ।। अर्जुनको अन्तःपुरमें जो पुराने उतारे हुए बहुमूल्य वस्त्र प्राप्त होते, उन्हें वे बेचते और बेचनेसे मिला हुआ मूल्य सब पाण्डवोंको देते थे ।। ८ ।। सहदेवोऽपि गोपानां वेषमास्थाय पाण्डवः । दधि क्षीरं घृतं चैव पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति ।। ९ ।। पाण्डुनन्दन सहदेव भी ग्वालोंका वेश धारणकर पाण्डवोंको दही, दूध और घी दिया करते थे ।। ९ ।। नकुलोऽपि धनं लब्ध्वा कृते कर्मणि वाजिनाम् । तुष्टे तस्मिन् नरपतौ पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति ।। १० ।। नकुल भी घोड़ोंके शिक्षणका कार्य करके महाराज विराटके संतुष्ट होनेपर उनसे पुरस्कारस्वरूप जो धन पाते, उसे सब पाण्डवोंको बाँट दिया करते थे ।। १० ।। कृष्णा तु सर्वान् भर्तूंस्तान् निरीक्षन्ती तपस्विनी । यथा पुनरविज्ञाता तथा चरति भामिनी ।। ११ ।। तपस्विनी एवं सुन्दरी द्रौपदी भी उन सब पतियोंकी देखभाल करती हुई ऐसा बर्ताव करती, जिससे फिर कोई उसे पहचान न सके ।। ११ ।। एवं सम्पादयन्तस्ते तदान्योन्यं महारथाः । विराटनगरे चेरुः पुनर्गर्भधृता इव ।। १२ ।। इस प्रकार एक-दूसरेका सहयोग करते हुए वे महारथी पाण्डव विराटनगरमें बहुत छिपकर रहते थे; मानो पुनः माताके गर्भमें निवास कर रहे हों ।। १२ ।। साशङ्का धार्तराष्ट्रस्य भयात् पाण्डुसुतास्तदा ।

प्रेक्षमाणास्तदा कृष्णामुषुश्छन्ना नराधिप ॥ १३ ॥ राजन्! दुर्योधनद्वारा पहचान लिये जानेके भयसे पाण्डव सदा सशंक रहते थे; अतः वे उस समय द्रौपदीकी देखभाल करते हुए भी छिपकर ही वहाँ निवास करते थे ॥

अथ मासे चतुर्थे तु ब्रह्मणः सुमहोत्सवः । आसीत् समृद्धो मत्स्येषु पुरुषाणां सुसम्मतः ॥ १४ ॥ तत्र मल्लाः समापेतुर्दिग्भ्यो राजन् सहस्रशः । समाजे ब्रह्मणो राजन् यथा पशुपतेरिव ॥ १५ ॥ तदनन्तर चौथा महीना प्रारम्भ होनेपर मत्स्यदेशमें ब्रह्माजीकी पूजाका महान् उत्सव मनाया जाने लगा। इसमें बड़ा समारोह होता था। मत्स्यदेशके लोगोंको यह बहुत प्रिय था। जनमेजय! उस समय विराटनगरमें चारों दिशाओंसे हजारों कुश्ती लड़नेवाले मल्ल जुटने लगे। इसी अवसरपर ब्रह्माजी और भगवान् शंकरकी सभाके समान उस राजधानीमें लोगोंका जमाव होता था ॥ १४-१५ ॥

महाकाया महावीर्याः कालखञ्जा इवासुराः । वीर्योन्मत्ता बलोदग्रा राज्ञा समभिपूजिताः ॥ १६ ॥ वहाँ आये हुए विशालकाय और महान् बलशाली मल्ल कालखंज नामक असुरोंके समान जान पड़ते थे। वे सब अपनी शक्ति और पराक्रमके मदसे उन्मत्त थे एवं बलमें बहुत बड़े-चढ़े थे। राजा विराटने उन सबका खूब स्वागत-सत्कार किया ॥ १६ ॥

सिंहस्कन्धकटिग्रीवाः स्ववदाता मनस्विनः । असकृल्लब्धलक्षास्ते रङ्गे पार्थिवसंनिधौ ॥ १७ ॥ उनके कंधे, कमर और कण्ठ सिंहके समान थे। वे निर्मल यशसे सुशोभित और मनस्वी थे। उन्होंने अनेक बार राजाके समीप रंगभूमि (अखाड़े) में विजय पायी थी ॥ १७ ॥

तेषामेको महानासीत् सर्वमल्लानथाह्वयत् । आवल्गमानं तं रङ्गे नोपतिष्ठति कश्चन ॥ १८ ॥ उन सबमें एक बहुत बड़ा पहलवान था, जो दूसरे सब पहलवानोंको अपने साथ लड़नेके लिये ललकारता था। जब वह अखाड़ेमें उतरकर उलछने लगा, उस समय कोई भी उसके समीप खड़ा न हो सका ॥ १८ ॥

यदा सर्वे विमनसस्ते मल्ला हतचेतसः । अथ सूदेन तं मल्लं योधयामास मत्स्यराट् ॥ १९ ॥

जब वे सभी मल्ल उदासीन हो हिम्मत हार बैठे, तब मत्स्यनरेशने अपने रसोइयेसे उस पहलवानको लड़ानेका निश्चय किया ॥ १९ ॥ नोद्यमानस्तदा भीमो दुःखैनावाकरोन्मतिम् । न हि शक्नोति विवृते प्रत्याख्यातुं नराधिपम् ॥ २० ॥ उस समय राजासे प्रेरित होनेपर भीमसेनने [पहचाने जानेके भयसे] दुःखी होकर ही उससे लड़नेका विचार किया। वे राजाकी बातको प्रकटरूपमें टाल नहीं सकते थे ॥ २० ॥ ततः स पुरुषव्याघ्रः शार्दूलशिथिलश्वरन् । प्रविवेश महारङ्गं विराटमभिपूजयन् ॥ २१ ॥ तदनन्तर पुरुषसिंह भीमने सिंहके समान धीमी चालसे चलते हुए राजा विराटका मान रखनेके लिये उस विशाल रंगभूमिमें प्रवेश किया ॥ २१ ॥ बबन्ध कक्षां कौन्तेयस्ततः संहर्षयन् जनम् । ततस्तु वृत्रसंकाशं भीमो मल्लं समाह्वयत् ॥ २२ ॥ जीमूतं नाम तं तत्र मल्लं प्रख्यातविक्रमम् । फिर लोगोंमें हर्षका संचार करते हुए उन्होंने लँ गोट बाँधा और उस प्रसिद्ध पराक्रमी जीमूत नामक मल्लको, जो वृत्रासुरके समान दिखायी देता था, युद्धके लिये ललकारा ॥ २२ ½ ॥ तावुभौ सुमहोत्साहावुभौ भीमपराक्रमौ ॥ २३ ॥ मत्ताविव महाकायौ वारणौ षष्टिहायनौ । वे दोनों बड़े उत्साहमें भरे थे। दोनों ही प्रचण्ड पराक्रमी थे, ऐसा लगता था मानो साठ वर्षके दो मतवाले एवं विशालकाय गजराज एक-दूसरेसे भिड़नेको उद्यत हों ॥ २३ ½ ॥ ततस्तौ नरशार्दूलौ बाहुयुद्धं समीयुतुः ॥ २४ ॥ वीरौ परमसंहृष्टावन्योन्यजयकाङ्क्षिणौ । आसीत् सुभीमः सम्पातो वज्रपर्वतयोरिव ॥ २५ ॥ अत्यन्त हर्षमें भरकर एक-दूसरेको जीत लेनेकी इच्छावाले वे दोनों नरश्रेष्ठ वीर बाहुयुद्ध करने लगे। उस समय उन दोनोंमें बड़ी भयंकर भिड़न्त हुई। उनके परस्परके आघातसे इस प्रकार चटचट शब्द होने लगा, मानो वज्र और पर्वत एक-दूसरेसे टकरा गये हों ॥ उभौ परमसंहृष्टौ बलेनातिबलावुभौ । अन्योन्यस्यान्तरं प्रेप्सू परस्परजयैषिणौ ॥ २६ ॥ दोनों अत्यन्त प्रसन्न थे। बलकी दृष्टिसे दोनों ही अत्यन्त बलशाली थे और एक-दूसरेपर चोट करनेका अवसर देखते हुए विजयके अभिलाषी हो रहे

थे ॥ २६ ॥ उभौ परमसंहृष्टौ मत्ताविव महागजी । कृतप्रतिकृतैश्चित्रैर्बाहुभिश्च सुसङ्कटैः । संनिपातावधूतैश्च प्रमाथोन्मथनैस्तथा३ ॥ २७ ॥ दोनोंमें भरपूर हर्ष और उत्साह भरा था। दोनों ही मतवाले गजराजोंकी भाँति एक-दूसरेसे भिड़े हुए थे। जब एक-दूसरेका कोई अंग जोरसे दबाता, तब दूसरा फौरन उसका प्रतीकार करता—उस अंगको उसकी पकड़से छुड़ा लेता था। दोनों एक-दूसरेके हाथोंको मुट्ठीसे पकड़कर विवश कर देते और विचित्र ढंगसे परस्पर प्रहार करते थे। दोनों आपसमें गुँथ जाते और फिर धक्के देकर एक दूसरेको दूर हटा देते। कभी एक-दूसरेको पटककर जमीनपर रगड़ता, तो दूसरा नीचेसे ही कुलाँचकर ऊपरवालेको दूर फेंक देता या उसे लिये-दिये खड़ा हो अपने शरीरसे दबाकर उसके अंगोंको भी मथ डालता था ॥ २७ ॥

क्षेपणैर्मुष्टिभिश्चैव३ ३ वराहोद्भूतनिःस्वनैः३ । तलैर्वज्रनिपातैश्च४ प्रसृष्टाभिस्तथैव५ च ॥ २८ ॥ कभी दोनों दोनोंको बलपूर्वक पीछे हटाते और मुक्कोंसे एक-दूसरेकी छातीपर चोट करते थे। कभी एकको दूसरा अपने कंधेपर उठा लेता और उसका मुँह नीचे करके घुमाकर पटक देता था, जिससे ऐसा शब्द होता; मानो किसी शूकरने चोट की हो। कभी परस्पर तर्जनी और अँगूठेके मध्यभागको फैलाकर चाँटोंकी मार होती और कभी हाथकी अंगुलियोंको फैलाकर वे एक-दूसरेको थप्पड़ मारते थे ॥ २८ ॥

शलाखानखपातैश्च पादोद्भूतैश्च दारुणैः । जानुभिश्चाश्मनिर्घोषैः शिरोभिश्चावघट्टनैः ॥ २९ ॥ कभी वे रोषपूर्वक अंगुलियोंके नखोंसे एक-दूसरेको बकोटते। कभी पैरोंसे उलझाकर दोनों दोनोंको गिरा देते। कभी घुटने और सिरसे टक्कर मारते; जिससे पत्थर टकरानेके समान भयंकर शब्द होता था ॥ २९ ॥

तद् युद्धमभवद् घोरमशस्त्रं बाहुतेजसा । बलप्राणेन शूराणां समाजोत्सवसंनिधौ ॥ ३० ॥

अरज्यत जनः सर्वः सोत्कृष्टनिनदोत्थितः । बलिनोः संयुगे राजन् वृत्रवासवयोरिव ॥ ३१ ॥

प्रकर्षणाकर्षणयोरभ्याकर्षविकर्षणैः६ । आकर्षतुरथान्योन्यं जानुभिश्चापि जघ्नतुः ॥ ३२ ॥

कभी वे प्रतिपक्षीको गोदमें घसीट लाते, कभी खेलमें ही उसे सामने खींच लेते, कभी आगे-पीछे, दायें-बायें पैंतरे बदलते और कभी सहसा पीछे ढकेलकर पटक देते थे। इस तरह दोनों दोनोंको अपनी ओर खींचते और घुटनोंसे एक-दूसरेपर प्रहार करते थे। उस सामूहिक उत्सवमें पहलवानों और जनसमुदायके निकट उन दोनोंमें केवल बाहुबल, शारीरिक बल तथा प्राणबलसे किसी अस्त्र-शस्त्रके बिना बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। राजन्! इन्द्र और वृत्रासुरके समान भीम और जीमूतके उस मल्लयुद्धमें सब लोगोंका बड़ा मनोरंजन हुआ। सभी दर्शक जीतनेवालेका उत्साह बढ़ानेके लिये जोर-जोरसे हर्षनाद कर उठते थे ।। ३०—३२ ।।

ततः शब्देन महता भर्त्सयन्तौ परस्परम् ।
व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ नियुद्धकुशलावुभौ ।
बाहुभिः समसज्जेतामायसैः परिघैरिव ।। ३३ ।।
चकर्ष दोर्भ्यामुत्पाट्य भीमो मल्लममित्रहा ।
निनदन्तमभिक्रोशन् शार्दूल इव वारणम् ।। ३४ ।।
समुद्यम्य महाबाहुर्भ्रामयामास वीर्यवान् ।
ततो मल्लाश्च मत्स्याश्च विस्मयं चक्रिरे परम् ।। ३५ ।।

तदनन्तर चौड़ी छाती और लंबी भुजावाले, कुश्तीके दाँव-पेचमें कुशल वे दोनों वीर गम्भीर गर्जनाके साथ एक-दूसरेको डाँट बताते हुए लोहेके परिघ (मोटे डंडे)-जैसी बाँहोंसे बाँहें मिलाकर परस्पर भिड़ गये। फिर विपुलपराक्रमी शत्रुहन्ता महाबाहु भीमसेनने गर्जना करते हुए, जैसे सिंह हाथीपर झपटे, उसी प्रकार झपटकर जीमूतको दोनों हाथोंसे पकड़कर खींचा और ऊपर उठाकर उसे घुमाना आरम्भ किया। यह देख वहाँ आये हुए पहलवानों तथा मत्स्यदेशकी प्रजाको बड़ा आश्चर्य हुआ ।। ३३—३५ ।।

भ्रामयित्वा शतगुणं गतसत्त्वमचेतनम् । प्रत्यपिंषन्महाबाहुर्मल्लं भुवि वृकोदरः ॥ ३६ ॥ सौ बार घुमानेपर जब वह धैर्य, साहस और चेतनासे भी हाथ धो बैठा, तब बड़ी-बड़ी बाहुओंवाले वृकोदरने उसे पृथ्वीपर गिराकर मसल डाला ॥ ३६ ॥

तस्मिन् विनिहते वीरे जीमूते लोकविश्रुते । विराटः परमं हर्षमगच्छद् बान्धवैः सह ॥ ३७ ॥ इस प्रकार उस लोकविख्यात वीर जीमूतके मारे जानेपर राजा विराटको अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३७ ॥

प्रहर्षात् प्रददौ वित्तं बहु राजा महामनाः । बल्लवाय महारङ्गे यथा वैश्रवणस्तथा ॥ ३८ ॥ उस समय कुबेरके समान महामनस्वी राजा विराटने अत्यन्त हर्षमें भरकर बल्लवको उस विशाल रंगभूमिमें ही बहुत धन दिया ॥ ३८ ॥

एवं स सुबहून् मल्लान् पुरुषांश्च महाबलान् । विनिघ्नन् मत्स्यराजस्य प्रीतिमाहरदुत्तमाम् ॥ ३९ ॥ इसी तरह बहुत-से पहलवानों और महाबली पुरुषोंको मारकर भीमसेनने मत्स्यनरेश विराट्का उत्तम प्रेम प्राप्त किया ॥ ३९ ॥

यदास्य तुल्यः पुरुषो न कश्चित् तत्र विद्यते । ततो व्याघ्रैश्च सिंहैश्च द्विरदैश्चाप्ययोधयत् ॥ ४० ॥