महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अकृतव्रणके द्वारा युधिष्ठिरसे परशुरामजीके उपाख्यानके प्रसंगमें ऋचीक मुनिका गाधिकन्याके साथ विवाह और भृगुऋषिकी कृपासे जमदग्निकी उत्पत्तिका वर्णन
पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः
अकृतव्रणके द्वारा युधिष्ठिरसे परशुरामजीके उपाख्यानके प्रसंगमें ऋचीक मुनिका गाधिकन्याके साथ विवाह और भृगुऋषिकी कृपासे जमदग्निकी उत्पत्तिका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
स तत्र तामुषित्वैकां रजनीं पृथिवीपतिः ।
तापसानां परं चक्रे सत्कारं भ्रातृभिः सह ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस पर्वतपर एक रात निवास करके भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरने तपस्वी मुनियोंका बहुत सत्कार किया ॥ १ ॥
लोमशस्तस्य तान् सर्वानचख्यौ तत्र तापसान् ।
भृगूनङ्गिरसश्चैव वसिष्ठानथ काश्यपान् ॥ २ ॥
लोमशजीने युधिष्ठिरसे उन सभी तपस्वी महात्माओंका परिचय कराया। उनमें भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ तथा कश्यपगोत्रके अनेक संत महात्मा थे ॥ २ ॥
तान् समेत्य स राजर्षिरभिवाद्य कृताञ्जलिः ।
रामस्यानुचरं वीरमपृच्छदकृतव्रणम् ॥ ३ ॥
कदा तु रामो भगवांस्तापसान् दर्शयिष्यति ।
तेनैवाहं प्रसंगेन द्रष्टुमिच्छामि भार्गवम् ॥ ४ ॥
उन सबसे मिलकर राजर्षि युधिष्ठिरने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और परशुरामजीके सेवक वीरवर अकृतव्रणसे पूछा—'भगवान् परशुरामजी इन तपस्वी महात्माओंको कब दर्शन देंगे? उसी निमित्तसे मैं भी उन भगवान् भार्गवका दर्शन करना चाहता हूँ' ॥ ३-४ ॥
अकृतव्रण उवाच
आयानेवासि विदितो रामस्य विदितात्मनः ।
प्रीतिस्त्वयि च रामस्य क्षिप्रं त्वां दर्शयिष्यति ॥ ५ ॥
चतुर्दशीमष्टमीं च रामं पश्यन्ति तापसाः ।
अस्यां रात्र्यां व्यतीतायां भवित्री श्वश्चतुर्दशी ॥ ६ ॥
अकृतव्रणने कहा—राजन्! आत्मज्ञानी परशुरामजीको पहले ही यह ज्ञात हो गया था कि आप आ रहे हैं। आपपर उनका बहुत प्रेम है, अतः वे शीघ्र ही आपको दर्शन देंगे। ये तपस्वीलोग प्रत्येक चतुर्दशी और अष्टमीको परशुरामजीका दर्शन करते हैं। आजकी रात बीत जानेपर कल सबेरे चतुर्दशी हो जायगी ॥ ५-६ ॥
युधिष्ठिर उवाच
भवाननुगतो रामं जामदग्न्यं महाबलम् । प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य पूर्ववृत्तस्य कर्मणः ॥ ७ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—मुने! आप महाबली परशुरामजीके अनुगत भक्त हैं। उन्होंने पहले जो-जो कार्य किये हैं, उन सबको आपने प्रत्यक्ष देखा है ॥ ७ ॥
स भवान् कथयत्वद्य यथा रामेण निर्जिताः । आहवे क्षत्रियाः सर्वे कथं केन च हेतुना ॥ ८ ॥ अतः हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि परशुरामजीने किस प्रकार और किस कारणसे समस्त क्षत्रियोंको युद्धमें पराजित किया था। आप वह सब वृत्तान्त आज मुझे बताइये ॥ ८ ॥
अकृतव्रण उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि महदाख्यानमुत्तमम् । भृगूणां राजशार्दूल वंशे जातस्य भारत ॥ ९ ॥ अकृतव्रणने कहा—भरतकुलभूषण नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर! भृगुवंशी परशुरामजीकी कथा बहुत बड़ी और उत्तम है, मैं आपसे उसका वर्णन करूँगा ॥ ९ ॥
रामस्य जामदग्न्यस्य चरितं देवसम्मितम् । हैहयाधिपतेश्चैव कार्तवीर्यस्य भारत ॥ १० ॥ भारत! जमदग्निकुमार परशुराम तथा हैहयराज कार्तवीर्यका चरित्र देवताओंके तुल्य है ॥ १० ॥
रामेण चार्जुनो नाम हैहयाधिपतिर्हतः । तस्य बाहुशतान्यासंत्रीणि सप्त च पाण्डव ॥ ११ ॥ पाण्डुनन्दन! परशुरामजीने अर्जुन नामसे प्रसिद्ध जिस हैहयराज कार्तवीर्यका वध किया था, उसके एक हजार भुजाएँ थीं ॥ ११ ॥
दत्तात्रेयप्रसादेन विमानं काञ्चनं तथा । ऐश्वर्यं सर्वभूतेषु पृथिव्यां पृथिवीपते ॥ १२ ॥ पृथिवीपते! श्रीदत्तात्रेयजीकी कृपासे उसे एक सोनेका विमान मिला था और भूतलके सभी प्राणियोंपर उसका प्रभुत्व था ॥ १२ ॥
अव्याहतगतिश्चैव रथस्तस्य महात्मनः । रथेन तेन तु सदा वरदानेन वीर्यवान् ॥ १३ ॥ ममर्द देवान् यक्षांश्च ऋषींश्चैव समन्ततः । भूतांश्चैव स सर्वांस्तु पीडयामास सर्वतः ॥ १४ ॥
महामना कार्तवीर्यके रथकी गतिको कोई भी रोक नहीं सकता था। उस रथ और वरके प्रभावसे शक्तिसम्पन्न हुआ कार्तवीर्य अर्जुन सब ओर घूमकर सदा देवताओं, यक्षों तथा ऋषियोंको रौंदता फिरता था और सम्पूर्ण प्राणियोंको भी सब प्रकारसे पीड़ा देता था ॥ १३-१४ ॥
ततो देवाः समेत्याहुर्ऋषयश्च महाव्रताः ।
देवदेवं सुरारिघ्नं विष्णुं सत्यपराक्रमम् ॥ १५ ॥
भगवन् भूतरक्षार्थमर्जुनं जहि वै प्रभो ।
विमानेन च दिव्येन हैहयाधिपतिः प्रभुः ॥ १६ ॥
शचीसहायं क्रीडन्तं धर्षयामास वासवम् ।
ततस्तु भगवान् देवः शक्रेण सहितस्तदा ।
कार्तवीर्यविनाशार्थं मन्त्रयामास भारत ॥ १७ ॥
कार्तवीर्यका ऐसा अत्याचार देख देवता तथा महान् व्रतका पालन करनेवाले ऋषि मिलकर दैत्योंका विनाश करनेवाले सत्यपराक्रमी देवाधिदेव भगवान् विष्णुके पास जा इस प्रकार बोले—'भगवन्! आप समस्त प्राणियोंकी रक्षाके लिये कृतवीर्यकुमार अर्जुनका वध कीजिये।' एक दिन शक्तिशाली हैहयराजने दिव्य विमानद्वारा शचीके साथ क्रीड़ा करते हुए देवराज इन्द्रपर आक्रमण किया। भारत! तब भगवान् विष्णुने कार्तवीर्य अर्जुनका नाश करनेके सम्बन्धमें इन्द्रके साथ विचार-विनिमय किया ॥ १५-१७ ॥
यत् तद् भूतहितं कार्यं सुरेन्द्रेण निवेदितम् ।
सम्प्रतिश्रुत्य तत् सर्वं भगवाँल्लोकपूजितः ॥ १८ ॥
जगाम बदरीं रम्यां स्वमेवाश्रममण्डलम् ।
समस्त प्राणियोंके हितके लिये जो कार्य करना आवश्यक था उसे देवेन्द्रने बताया। तत्पश्चात् विश्ववन्दित भगवान् विष्णुने वह सब कार्य करनेकी प्रतिज्ञा करके अत्यन्त रमणीय बदरीतीर्थकी यात्रा की, जहाँ उनका अपना ही विस्तृत आश्रम था ॥ १८ १/२ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु पृथिव्यां पृथिवीपतिः ॥ १९ ॥
कान्यकुब्जे महानासीत् पार्थिवः सुमहाबलः ।
गाधीति विश्रुतो लोके वनवासं जगाम ह ॥ २० ॥
वने तु तस्य वसतः कन्या जज्ञेऽप्सरःसमा ।
ऋचीको भार्गवस्तां च वरयामास भारत ॥ २१ ॥
इसी समय इस भूतलपर कान्यकुब्जदेशमें एक महाबली महाराज शासन करते थे जो गाधिके नामसे विख्यात थे। वे राजधानी छोड़कर वनमें गये और वहीं रहने लगे। उनके वनवासकालमें ही एक कन्या उत्पन्न हुई जो अप्सराके समान सुन्दरी थी। भारत! विवाहके योग्य होनेपर भृगुपुत्र ऋचीक मुनिने उसका वरण किया ॥ १९—२१ ॥
तमुवाच ततो गाधिर्ब्राह्मणं संशितव्रतम् ।
उचितं नः कुले किंचित् पूर्वैर्यत् सम्प्रवर्तितम् ॥ २२ ॥ एकतः श्यामकणीनां पाण्डुराणां तरस्विनाम् । सहस्रं वाजिनां शुल्कमिति विद्धि द्विजोत्तम ॥ २३ ॥ उस समय राजा गाधिने कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मर्षि ऋचीकसे कहा—‘द्विजश्रेष्ठ! हमारे कुलमें पूर्वजोंने जो कुछ शुल्क लेनेका नियम चला रखा है, उसका पालन करना हमलोगोंके लिये भी उचित है। अतः आप यह जान लें कि इस कन्याके लिये एक सहस्र वेगशाली अश्व शुल्करूपमें देने पड़ेंगे, जिनके शरीरका रंग तो सफेद और पीला मिला हुआ-सा और कान एक ओरसे काले रंगके हों॥ २२-२३॥ न चापि भगवान् वाच्यो दीयतामिति भार्गव । देया मे दुहिता चैव त्वद्विधाय महात्मने ॥ २४ ॥ ‘भृगुनन्दन! आप कोई निन्दनीय तो हैं नहीं, यह शुल्क चुका दीजिये, फिर आप-जैसे महात्माको मैं अवश्य अपनी कन्या ब्याह दूँगा’॥ २४ ॥
ऋचीक उवाच एकतः श्यामकणीनां पाण्डुराणां तरस्विनाम् । दास्याम्यश्वसहस्रं ते मम भार्या सुतास्तु ते ॥ २५ ॥ ऋचीक बोले—राजन्! मैं आपको एक ओरसे श्याम कर्णवाले पाण्डुरंगके वेगशाली अश्व एक हजारकी संख्यामें अर्पित करूँगा। आपकी पुत्री मेरी धर्मपत्नी बने॥ २५॥
अकृतव्रण उवाच स तथेति प्रतिज्ञाय राजन् वरुणमब्रवीत् । एकतः श्यामकणीनां पाण्डुराणां तरस्विनाम् ॥ २६ ॥ सहस्रं वाजिनामेकं शुल्कार्थं मे प्रदीयताम् । तस्मै प्रादात् सहस्रं वै वाजिनां वरुणस्तदा ॥ २७ ॥ अकृतव्रण कहते हैं—राजन्! इस प्रकार शुल्क देनेकी प्रतिज्ञा करके ऋचीक मुनिने वरुणके पास जाकर कहा—‘देव! मुझे शुल्कमें देनेके लिये एक हजार ऐसे अश्व प्रदान करें, जिनके शरीरका रंग पाण्डुर और कान एक ओरसे श्याम हों। साथ ही वे सभी अश्व तीव्रगामी होने चाहिये।’ उस समय वरुणने उनकी इच्छाके अनुसार एक हजार श्यामकर्ण घोड़े दे दिये॥ तदश्वतीर्थं विख्यातमुत्थिता यत्र ते हयाः । गङ्गायां कान्यकुब्जे वै ददौ सत्यवतीं तदा ॥ २८ ॥ ततो गाधिः सुतां चास्मै जन्याश्चासन् सुरास्तदा । लब्ध्वा हयसहस्रं तु तांश्च दृष्ट्वा दिवौकसः ॥ २९ ॥
जहाँ वे श्यामकर्ण घोड़े प्रकट हुए थे, वह स्थान अश्वतीर्थके नामसे विख्यात हुआ। तत्पश्चात् राजा गाधिने शुल्करूपमें एक हजार श्यामकर्ण घोड़े प्राप्त करके गंगातटपर कान्यकुब्ज नगरमें ऋचीक मुनिको अपनी पुत्री सत्यवती ब्याह दी! उस समय देवता बराती बने थे। देवता उन सबको देखकर वहाँसे चले गये ।। २८-२९ ।।
धर्मेण लब्ध्वा तां भार्यामृचीको द्विजसत्तमः ।
यथाकामं यथाजोषं तया रेमे सुमध्यया ।। ३० ।।
विप्रवर ऋचीकने धर्मपूर्वक सत्यवतीको पत्नीरूपमें प्राप्त करके उस सुन्दरीके साथ अपनी इच्छाके अनुसार सुखपूर्वक रमण किया ।। ३० ।।
तं विवाहे कृते राजन् सभार्यमवलोककः ।
आजगाम भृगुः श्रेष्ठं पुत्रं दृष्ट्वा ननन्द ह ।। ३१ ।।
राजन्! विवाह करनेके पश्चात् पत्नीसहित ऋचीकको देखनेके लिये महर्षि भृगु उनके आश्रमपर आये और अपने श्रेष्ठ पुत्रको विवाहित देखकर वे बड़े प्रसन्न हुए ।। ३१ ।।
भार्यापती तमासीनं गुरुं सुरगणार्चितम् ।
अर्चित्वा पर्युपासीनौ प्राञ्जली तस्थतुस्तदा ।। ३२ ।।
उन दोनों पति-पत्नीने पवित्र आसनपर विराजमान देववृन्दवन्दित गुरु (पिता एवं श्वशुर)-का पूजन किया और उनकी उपासनामें संलग्न हो वे हाथ जोड़े खड़े रहे ।। ३२ ।।
ततः स्नुषां स भगवान् प्रहृष्टो भृगुरब्रवीत् ।
वरं वृणीष्व सुभगे दाता ह्यस्मि तवेप्सितम् ।। ३३ ।।
भगवान् भृगुने अत्यन्त प्रसन्न होकर अपनी पुत्रवधूसे कहा—'सौभाग्यवती बहू! कोई वर माँगो, मैं तुम्हारी इच्छाके अनुरूप वर प्रदान करूँगा' ।। ३३ ।। सा वै प्रसादयामास तं गुरुं पुत्रकारणात् । आत्मनश्चैव मातुश्च प्रसादं च चकार सः ।। ३४ ।। सत्यवतीने श्वशुरको अपने और अपनी माताके लिये पुत्र-प्राप्तिका उद्देश्य रखकर प्रसन्न किया। तब भृगुजीने उसपर कृपादृष्टि की ।। ३४ ।।
भृगुरुवाच ऋतौ त्वं चैव माता च स्नाते पुंसवनाय वै । आलिङ्गेतां पृथग् वृक्षौ साश्वत्थं त्वमुदुम्बरम् ।। ३५ ।। **भृगुजी बोले—**बहू! ऋतुकालमें स्नान करनेके पश्चात् तुम और तुम्हारी माता पुत्र-प्राप्तिके उद्देश्यसे दो भिन्न-भिन्न वृक्षोंका आलिंगन करो। तुम्हारी माता तो पीपलका और तुम गूलरका आलिंगन करना ।। ३५ ।। चरुद्वयमिदं भद्रे जनन्याश्च तवैव च । विश्वमावर्तयित्वा तु मया यत्नेन साधितम् ।। ३६ ।। भद्रे! मैंने विराट् पुरुष परमात्माका चिन्तन करके तुम्हारे और तुम्हारी माताके लिये यत्नपूर्वक दो चरु तैयार किये हैं ।। ३६ ।। प्राशितव्यं प्रयत्नेन चेत्युक्त्वादर्शनं गतः ।
आलिङ्गने चरौ चैव चक्रतुस्ते विपर्ययम् ॥ ३७ ॥ तुम दोनों प्रयत्नपूर्वक अपने-अपने चरुका भक्षण करना; ऐसा कहकर भृगुजी अन्तर्धान हो गये। इधर सत्यवती और उसकी माताने वृक्षोंके आलिंगन और चरु-भक्षणमें उलट-फेर कर दिया ॥ ३७ ॥
ततः पुनः स भगवान् काले बहुतिथे गते । दिव्यज्ञानाद् विदित्वा तु भगवानागतः पुनः ॥ ३८ ॥ तदनन्तर बहुत दिन बीतनेपर भगवान् भृगु अपनी दिव्य ज्ञानशक्तिसे सब बातें जानकर पुनः वहाँ आये ॥ ३८ ॥
अथोवाच महातेजा भृगुः सत्यवतीं स्नुषाम् । उपयुक्तश्चरुर्भद्रे वृक्षे चालिङ्गनं कृतम् ॥ ३९ ॥ विपरीतेन ते सुभ्रूर्मात्रा चैवासि वञ्चिता । ब्राह्मणः क्षत्रवृत्तिर्वै तव पुत्रो भविष्यति ॥ ४० ॥ उस समय महातेजस्वी भृगु अपनी पुत्रवधू सत्यवतीसे बोले—‘भद्रे! तुमने जो चरुभक्षण और वृक्षोंका आलिङ्गन किया है, उसमें उलट-फेर करके तुम्हारी माताने तुम्हें ठग लिया। सुभ्रू! इस भूलके कारण तुम्हारा पुत्र ब्राह्मण होकर भी क्षत्रियोचित आचार-विचारवाला होगा’ ॥ ३९-४० ॥
क्षत्रियो ब्राह्मणाचारो मातुस्तव सुतो महान् । भविष्यति महावीर्यः साधूनां मार्गमास्थितः ॥ ४१ ॥ ‘और तुम्हारी माताका पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणोचित आचार-विचारका पालन करनेवाला होगा। वह महापराक्रमी बालक साधु-महात्माओंके मार्गका अवलम्बन करेगा’ ॥ ४१ ॥
ततः प्रसादयामास श्वशुरं सा पुनः पुनः । न मे पुत्रो भवेदीदृक् कामं पौत्रो भवेदिति ॥ ४२ ॥ तब सत्यवतीने बारंबार प्रार्थना करके पुनः अपने श्वशुरको प्रसन्न किया और कहा—‘भगवन्! मेरा पुत्र ऐसा न हो। भले ही, पौत्र क्षत्रियस्वभावका हो जाय’ ॥ ४२ ॥
एवमस्त्विति सा तेन पाण्डव प्रतिनन्दिता । जमदग्निं ततः पुत्रं जज्ञे सा काल आगते ॥ ४३ ॥ पाण्डुनन्दन! तब ‘एवमस्तु’ कहकर भृगुजीने अपनी पुत्रवधूका अभिनन्दन किया। तत्पश्चात् प्रसवका समय आनेपर सत्यवतीने जमदग्निनामक पुत्रको जन्म दिया ॥ ४३ ॥
तेजसा वर्चसा चैव युक्तं भार्गवनन्दनम् । स वर्धमानस्तेजस्वी वेदस्याध्ययनेन च ॥ ४४ ॥ बहूनृषीन् महातेजाः पाण्डवेयात्यवर्तत ।
भार्गवनन्दन जमदग्नि तेज और ओज (बल) दोनोंसे सम्पन्न थे। युधिष्ठिर! बड़े होनेपर महातेजस्वी जमदग्नि मुनि वेदाध्ययनद्वारा अन्य बहुत-से ऋषियोंसे आगे बढ़ गये ।। ४४ १/२ ।।
तं तु कृत्स्नो धनुर्वेदः प्रत्यभाद् भरतर्षभ ।
चतुर्विधानि चास्त्राणि भास्करोपमवर्चसम् ।। ४५ ।।
भरतश्रेष्ठ! सूर्यके समान तेजस्वी जमदग्निकी बुद्धिमें सम्पूर्ण धनुर्वेद और चारों प्रकारके अस्त्र स्वतः स्फुरित हो गये ।। ४५ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कार्तवीर्योपाख्याने पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें कार्तवीर्योपाख्यानविषयक एक सौ पन्द्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११५ ।।
११६-
षोडशाधिकशततमोऽध्यायः
पिताकी आज्ञासे परशुरामजीका अपनी माताका मस्तक काटना और उन्हींके वरदानसे पुन: जिलाना, परशुरामजीद्वारा कार्तवीर्य-अर्जुनका वध और उसके पुत्रोंद्वारा जमदग्नि मुनिकी हत्या
अकृतव्रण उवाच
स वेदाध्ययने युक्तो जमदग्निर्महातपाः ।
तपस्तेपे ततो देवान् नियमाद् वशमानयत् ॥ १ ॥
**अकृतव्रण कहते हैं—**राजन्! महातपस्वी जमदग्निने वेदाध्ययनमें तत्पर होकर तपस्या आस्मभ की। तदनन्तर शौचसंतोषादि नियमोंका पालन करते हुए उन्होंने सम्पूर्ण देवताओंको अपने वशमें कर लिया* ॥ १ ॥
स प्रसेनजितं राजन्नधिगम्य नराधिपम् ।
रेणुकां वरयामास स च तस्मै ददौ नृपः ॥ २ ॥
युधिष्ठिर! फिर राजा प्रसेनजित्के पास जाकर जमदग्नि मुनिने उनकी पुत्री रेणुकाके लिये याचना की और राजाने मुनिको अपनी कन्या ब्याह दी ॥ २ ॥
रेणुकां त्वथ सम्प्राप्य भार्यां भार्गवनन्दनः ।
आश्रमस्थस्तया सार्धं तपस्तेपेऽनुकूलया ॥ ३ ॥
भृगुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले जमदग्नि राजकुमारी रेणुकाको पत्नीरूपमें पाकर आश्रमपर ही रहते हुए उसके साथ तपस्या करने लगे। रेणुका सदा सब प्रकारसे पतिके अनुकूल चलनेवाली स्त्री थी ॥ ३ ॥
तस्याः कुमाराश्चत्वारो जज्ञिरे रामपञ्चमाः ।
सर्वेषामजघन्यस्तु राम आसीज्जघन्यजः ॥ ४ ॥
उसके गर्भसे क्रमशः चार पुत्र हुए, फिर पाँचवें पुत्र परशुरामजीका जन्म हुआ। अवस्थाकी दृष्टिसे भाइयोंमें छोटे होनेपर भी वे गुणोंमें उन सबसे बढ़े-चढ़े थे ॥ ४ ॥
फलाहारेषु सर्वेषु गतेष्वथ सुतेषु वै ।
रेणुका स्नातुमगमत् कदाचिन्नियतव्रता ॥ ५ ॥
एक दिन जब सब पुत्र फल लानेके लिये वनमें चले गये तब नियमपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाली रेणुका स्नान करनेके लिये नदी-तटपर गयी ॥ ५ ॥
सा तु चित्ररथं नाम मार्तिकावतकं नृपम् । ददर्श रेणुका राजन्नागच्छन्ती यदृच्छया ॥ ६ ॥ क्रीडन्तं सलिले दृष्ट्वा सभार्यं पद्ममालिनम् । ऋद्धिमन्तं ततस्तस्य स्पृहयामास रेणुका ॥ ७ ॥ राजन्! जब वह स्नान करके लौटने लगी उस समय अकस्मात् उसकी दृष्टि मार्तिकावत देशके राजा चित्ररथपर पड़ी, जो कमलोंकी माला धारण करके अपनी पत्नीके साथ जलमें क्रीड़ा कर रहा था। उस समृद्धिशाली नरेशको उस अवस्थामें देखकर रेणुकाने उसकी इच्छा की ॥ ६-७ ॥ व्यभिचाराच्च तस्मात् सा क्लिन्नाम्भसि विचेतना । प्रविवेशाश्रमं त्रस्ता तां वै भर्तान्र्वबुध्यत ॥ ८ ॥ उस समय इस मानसिक विकारसे द्रवित हुई रेणुका जलमें बेहोश-सी हो गयी। फिर त्रस्त होकर उसने आश्रमके भीतर प्रवेश किया। परंतु पतिदेव उसकी सब बातें जान गये ॥ ८ ॥ स तां दृष्ट्वा च्युतां धैर्याद् ब्राह्मया लक्ष्म्या विवर्जिताम् । धिक्शब्देन महातेजा गर्हयामास वीर्यवान् ॥ ९ ॥ उसे धैर्यसे च्युत और ब्रह्मतेजसे वंचित हुई देख उन महातेजस्वी शक्तिशाली महर्षिने धिक्कारपूर्ण वचनोंद्वारा उसकी निन्दा की ॥ ९ ॥ ततो ज्येष्ठो जामदग्न्यो रुमण्वान् नाम नामतः । आजगाम सुषेणश्च वसुर्विश्वावसुस्तथा ॥ १० ॥ इसी समय जमदग्निके ज्येष्ठ पुत्र रुमण्वान् वहाँ आ गये। फिर क्रमशः सुषेण, वसु और विश्वावसु भी आ पहुँचे ॥ १० ॥ तानानुपूर्व्याद् भगवान् वधे मातुरचोदयत् । न च ते जातसंस्नेहाः किंचिदूचुर्विचेतसः ॥ ११ ॥ भगवान् जमदग्निने बारी-बारीसे उन सभी पुत्रोंको यह आज्ञा दी कि तुम अपनी माताका वध कर डालो, परंतु मातृस्नेह उमड़ आनेसे वे कुछ भी बोल न सके—बेहोश-से खड़े रहे ॥ ११ ॥ ततः शशाप तान् क्रोधात् ते शप्ताश्चेतनां जहुः । मृगपक्षिसधर्माणः क्षिप्रामासञ्जडोपमाः ॥ १२ ॥ तब महर्षिने कुपित हो उन सब पुत्रोंको शाप दे दिया। शापग्रस्त होनेपर वे अपनी चेतना (विचार-शक्ति) खो बैठे और तुरंत मृग एवं पक्षियोंके समान जडबुद्धि हो गये ॥ १२ ॥ ततो रामोऽभ्ययात् पश्चादाश्रमं परवीरहा । तमुवाच महाबाहुर्जमदग्निर्महातपाः ॥ १३ ॥
तदनन्तर शत्रुपक्षके वीरोंका संहार करनेवाले परशुरामजी सबसे पीछे आश्रमपर आये। उस समय महातपस्वी महाबाहु जमदग्निने उनसे कहा — ॥ १३ ॥
जहीमां मातरं पापां मा च पुत्र व्यथां कृथाः ।
तत आदाय परशुं रामो मातुः शिरोऽहरत् ॥ १४ ॥
‘बेटा! अपनी इस पापिनी माताको अभी मार डालो और इसके लिये मनमें किसी प्रकारका खेद न करो।' तब परशुरामजीने फरसा लेकर उसी क्षण माताका मस्तक काट डाला ॥ १४ ॥
ततस्तस्य महाराज जमदग्नेर्महात्मनः ।
कोपोऽभ्यगच्छत् सहसा प्रसन्नश्चाब्रवीदिदम् ॥ १५ ॥
महाराज! इससे महात्मा जमदग्निका कोप सहसा शान्त हो गया और उन्होंने प्रसन्न होकर कहा— ॥ १५ ॥
ममेदं वचनात् तात कृतं ते कर्म दुष्करम् ।
वृणीष्व कामान् धर्मज्ञ यावतो वाञ्छसे हृदा ॥ १६ ॥
स वव्रे मातुरुत्थानमस्मृतिं च वधस्य वै ।
पापेन तेन चास्पर्शं भ्रातॄणां प्रकृतिं तथा ॥ १७ ॥
अप्रतिद्वन्द्वतां युद्धे दीर्घमायुश्च भारत ।
ददौ च सर्वान् कामांस्ताञ्जमदग्निर्महातपाः ॥ १८ ॥
'तात! तुमने मेरे कहनेसे यह कार्य किया है, जिसे करना दूसरोंके लिये बहुत कठिन है। तुम धर्मके ज्ञाता हो। तुम्हारे मनमें जो-जो कामनाएँ हों, उन सबको माँग लो।' तब परशुरामजीने कहा—'पिताजी! मेरी माता जीवित हो उठें, उन्हें मेरे द्वारा मारे जानेकी बात याद न रहे, वह मानस-पाप उनका स्पर्श न कर सके, मेरे चारों भाई स्वस्थ हो जायँ, युद्धमें मेरा सामना करनेवाला कोई न हो और मैं बड़ी आयु प्राप्त करूँ।' भारत! महातपस्वी जमदग्निने वरदान देकर उनकी वे सभी कामनाएँ पूर्ण कर दीं ॥ १६—१८ ॥
कदाचित् तु तथैवास्य विनिष्क्रान्ताः सुताः प्रभो ।
अथानूपपतिर्वीरः कार्तवीर्योऽभ्यवर्तत ॥ १९ ॥
युधिष्ठिर! एक दिन इसी तरह उनके सब पुत्र बाहर गये हुए थे। उसी समय अनूपदेशका वीर राजा कार्तवीर्य अर्जुन उधर आ निकला ॥ १९ ॥
तमाश्रमपदं प्राप्तमृषेर्भार्या समर्चयत् ।
स युद्धमदसम्मत्तो नाभ्यनन्दत् तथार्चनम् ॥ २० ॥
प्रमथ्य चाश्रमात् तस्माद्धोमधेनोस्तथा बलात् ।
जहार वत्सं क्रोशन्त्या बभञ्ज च महाद्रुमान् ॥ २१ ॥
आश्रममें आनेपर ऋषिपत्नी रेणुकाने उसका यथोचित आतिथ्य-सत्कार किया। कार्तवीर्य अर्जुन युद्धके मदसे उन्मत्त हो रहा था। उसने उस सत्कारको आदरपूर्वक ग्रहण नहीं किया। उलटे मुनिके आश्रमको तहस-नहस करके वहाँसे डकराती हुई होमधेनुके बछड़ेको बलपूर्वक हर लिया और आश्रमके बड़े-बड़े वृक्षोंको भी तोड़ डाला ॥ २०-२१ ॥
आगताय च रामाय तदाचष्ट पिता स्वयं ।
गां च रोरुदतीं दृष्ट्वा कोपो रामं समाविशत् ॥ २२ ॥
जब परशुरामजी आश्रममें आये तब स्वयं जमदग्निने उनसे सारी बातें कहीँ। बारंबार डकराती हुई होमकी धेनुपर भी उनकी दृष्टि पड़ी। इससे वे अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ २२ ॥
स मृत्युवशमापन्नं कार्त्तवीर्यमुपाद्रवत् । तस्याथ युधि विक्रम्य भार्गवः परवीरहा ॥ २३ ॥ चिच्छेद निशितैर्भल्लैर्बाहून् परिघसंनिभान् । सहस्रसम्मितान् राजन् प्रगृह्य रुचिरं धनुः ॥ २४ ॥
और कालके वशीभूत हुए कार्तवीर्य अर्जुनपर धावा बोल दिया। शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भृगुनन्दन परशुरामजीने अपना सुन्दर धनुष ले युद्धमें महान् पराक्रम दिखाकर पैने बाणोंद्वारा उसकी परिघसदृश सहस्र भुजाओंको काट डाला ॥ २३-२४ ॥
अभिभूतः स रामेण संयुक्तः कालधर्मणा । अर्जुनस्याथ दायादा रामेण कृतमन्यवः ॥ २५ ॥
इस प्रकार परशुरामजीसे परास्त हो कार्तवीर्य अर्जुन कालके गालमें चला गया। पिताके मारे जानेसे अर्जुनके पुत्र परशुरामजीपर कुपित हो उठे ॥ २५ ॥
आश्रमस्थं विना रामं जमदग्निमुपाद्रवन् । ते तं जघ्नुर्महावीर्यमयुध्यन्तं तपस्विनम् ॥ २६ ॥
और एक दिन परशुरामजीकी अनुपस्थितिमें जब आश्रमपर केवल जमदग्निजी ही रह गये थे, वे उन्हींपर चढ़ आये। यद्यपि जमदग्निजी महान् शक्तिशाली थे तो भी तपस्वी ब्राह्मण होनेके कारण युद्धमें प्रवृत्त नहीं हुए। इस दशामें भी कार्तवीर्यके पुत्र उनपर प्रहार करने लगे ॥ २६ ॥
असकृद् रामरामेति विक्रोशन्तमनाथवत् । कार्तवीर्यस्य पुत्रास्तु जमदग्निं युधिष्ठिर ॥ २७ ॥ पीडयित्वा शरैर्जग्मुर्यथागतमरिंदमाः । अपक्रान्तेषु वै तेषु जमदग्नौ तथा गते ॥ २८ ॥ समित्पाणिरुपागच्छदाश्रमं भृगुनन्दनः । स दृष्ट्वा पितरं वीरस्तथा मृत्युवशं गतम् । अनर्हन्तं तथाभूतं विललाप सुदुःखितः ॥ २९ ॥ युधिष्ठिर! वे महर्षि अनाथकी भाँति 'राम! राम!!' की रट लगा रहे थे, उसी अवस्थामें कार्तवीर्य अर्जुनके पुत्रोंने उन्हें बाणोंसे घायल करके मार डाला। इस प्रकार मुनिकी हत्या करके वे शत्रुसंहारक क्षत्रिय जैसे आये थे, उसी प्रकार लौट गये। जमदग्निके इस तरह मारे जानेके बाद जब वे कार्तवीर्य-पुत्र भाग गये, तब भृगुनन्दन परशुरामजी हाथोंमें समिधा लिये आश्रममें आये। वहाँ अपने पिताको इस प्रकार दुर्दशापूर्वक मरा देख उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उनके पिता इस प्रकार मारे जानेके योग्य कदापि नहीं थे, परशुरामजी उन्हें याद करके विलाप करने लगे ॥ २७—२९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कार्तवीर्योपाख्याने जमदग्निवधे षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें कार्तवीर्योपाख्यानमें जमदग्निवधविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११६ ॥
* यहाँ कुछ प्रतियोंमें 'देवान्' की जगह 'वेदान्' पाठ मिलता है। उस दशामें यह अर्थ होगा कि 'वेदोंको वशमें कर लिया।' परंतु वेदोंको वशमें करनेकी बात असंगत-सी लगती है। देवताओंको वशमें करना ही सुसंगत जान पड़ता है, इसलिये हमने 'देवान्' यही पाठ रखा है। काश्मीरकी देवनागरी लिपिवाली हस्तलिखित पुस्तकमें यहाँ तीन श्लोक अधिक मिलते हैं। उनसे भी 'देवान्' पाठका ही समर्थन होता है। वे श्लोक इस प्रकार हैं— तं तप्यमानं ब्रह्मर्षिमूचुर्देवाः सबान्धवाः । किमर्थं तप्यसे ब्रह्मन् कः कामः प्रार्थितस्तव ॥ एवमुक्तः प्रत्युवाच देवान् ब्रह्मर्षिसत्तमः । स्वर्गहेतोस्तपस्तप्ये लोकाश्च स्युर्ममाक्षयाः ॥ तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य तदा देवास्तमूचिरे । नासंततेर्भवेल्लोकः कृत्वा धर्मशतान्यपि ॥ स श्रुत्वा वचनं तेषां त्रिदशानां कुरूद्वह ॥ इन श्लोकोंद्वारा देवताओंके प्रकट होकर वरदान देनेका प्रसंग सूचित होता है, अतः '........ततो देवान् नियमाद् वशमानयत्' यही पाठ ठीक है।
११७-
सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः
परशुरामजीका पिताके लिये विलाप और पृथ्वीको इक्कीस बार निःक्षत्रिय करना एवं महाराज युधिष्ठिरके द्वारा परशुरामजीका पूजन
राम उवाच
ममापराधात् तैः क्षुद्रैर्हतस्त्वं तात बालिशैः ।
कार्तवीर्यस्य दायादैर्वने मृग इवेषुभिः ॥ १ ॥
**परशुरामजी बोले—**हा तात! मेरे अपराधका बदला लेनेके लिये कार्तवीर्यके उन नीच और पामर पुत्रोंने वनमें बाणोंद्वारा मारे जानेवाले मृगकी भाँति आपकी हत्या की है ॥ १ ॥
धर्मज्ञस्य कथं तात वर्तमानस्य सत्पथे ।
मृत्युरेवंविधो युक्तः सर्वभूतेष्वनागसः ॥ २ ॥
पिताजी! आप तो धर्मज्ञ होनेके साथ ही सन्मार्गपर चलनेवाले थे, कभी किसी भी प्राणीके प्रति कोई अपराध नहीं करते थे, फिर आपकी ऐसी मृत्यु कैसे उचित हो सकती है? ॥ २ ॥
किं नु तैर्न कृतं पापं यैर्भवांस्तपसि स्थितः ।
अयुध्यमानो वृद्धः सन् हतः शरशतैः शितैः ॥ ३ ॥
आप तपस्यामें संलग्न, युद्धसे विरत और वृद्ध थे तो भी जिन्होंने सैकड़ों तीखे बाणोंद्वारा आपकी हत्या की है, उन्होंने कौन-सा पाप नहीं किया? ॥ ३ ॥
किं नु ते तत्र वक्ष्यन्ति सचिवेषु सुहृत्सु च । अयुध्यमानं धर्मज्ञमेकं हत्वानपत्रपाः ॥ ४ ॥ वे निर्लज्ज राजकुमार युद्धसे दूर रहनेवाले आप-जैसे धर्मज्ञ एवं असहाय पुरुषको मारकर अपने सुहृदों और मन्त्रियोंके सामने क्या कहेंगे? ॥ ४ ॥ विलप्यैवं सकरुणं बहु नानाविधं नृप । प्रेतकार्याणि सर्वाणि पितुश्चक्रे महातपाः ॥ ५ ॥ ददाह पितरं चाग्नौ रामः परपुरंजयः । प्रतिजज्ञे वधं चापि सर्वक्षत्रस्य भारत ॥ ६ ॥ राजन्! इस प्रकार भाँति-भाँतिसे अत्यन्त करुणा-जनक विलाप करके शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले महातपस्वी परशुरामजीने अपने पिताके समस्त प्रेतकर्म किये। भारत! पहले तो उन्होंने विधिपूर्वक अग्निमें पिताका दाह-संस्कार किया, तत्पश्चात् सम्पूर्ण क्षत्रियोंके वधकी प्रतिज्ञा की ॥ ५-६ ॥ संक्रुद्धोऽतिबलः संख्ये शस्त्रमादाय वीर्यवान् । जघ्निवान् कार्तवीर्यस्य सुतानेकोऽन्तकोपमः ॥ ७ ॥
अत्यन्त बलवान् एवं पराक्रमी परशुरामजी क्रोधके आवेशमें साक्षात् यमराजके समान हो गये। उन्होंने युद्धमें शस्त्र लेकर अकेले ही कार्तवीर्यके सब पुत्रोंको मार डाला ।। ७ ।।
तेषां चानुगता ये च क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ।
तांश्च सर्वानवामृद्नाद् रामः प्रहरतां वरः ।। ८ ।।
क्षत्रियशिरोमणे! उस समय जिन-जिन क्षत्रियोंने उनका साथ दिया, उन सबको भी योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने मिट्टीमें मिला दिया ।। ८ ।।
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः ।
समन्तपञ्चके पञ्च चकार रुधिरह्रदान् ।। ९ ।।
इस प्रकार भगवान् परशुरामने इस पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियोंसे सूनी करके उनके रक्तसे समन्तपञ्चक क्षेत्रमें पाँच रुधिर-कुण्ड भर दिये ।। ९ ।।
स तेषु तर्पयामास भृगून् भृगुकुलोद्वहः ।
साक्षाद् ददर्श चर्चीकं स च रामं न्यवारयत् ।। १० ।।
भृगुकुलभूषण रामने उन कुण्डोंमें भृगुवंशी पितरोंका तर्पण किया और उस समय साक्षात् प्रकट हुए महर्षि ऋचीकको देखा। उन्होंने परशुरामको इस घोर कर्मसे रोका ।। १० ।।
ततो यज्ञेन महता जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
तर्पयामास देवेन्द्रमृत्विग्भ्यः प्रददौ महीम् ।। ११ ।।
तदनन्तर प्रतापी जमदग्निकुमारने एक महान् यज्ञ करके देवराज इन्द्रको तृप्त किया तथा ऋत्विजोंको दक्षिणारूपमें भूमि दी ।। ११ ।।
वेदीं चाप्यददद्धैमीं कश्यपाय महात्मने ।
दशव्यामायतां कृत्वा नवोत्सेधां विशाम्पते ॥ १२ ॥
युधिष्ठिर! उन्होंने महात्मा कश्यपको एक सोनेकी वेदी प्रदान की, जिसकी लम्बाई-चौड़ाई दस-दस व्याम (चालीस-चालीस हाथ)-की थी। ऊँचाईमें भी वह वेदी नौ व्याम (छत्तीस हाथ)-की थी ॥ १२ ॥
तां कश्यपस्यानुमते ब्राह्मणाः खण्डशस्तदा ।
व्यभजंस्ते तदा राजन् प्रख्याताः खाण्डवायनाः ॥ १३ ॥
राजन्! उस समय कश्यपजीकी आज्ञासे ब्राह्मणोंने उस स्वर्णवेदीको खण्ड-खण्ड करके बाँट लिया, अतः वे खाण्डवायन नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ १३ ॥
स प्रदाय महीं तस्मै कश्यपाय महात्मने ।
अस्मिन् महेन्द्रे शैलेन्द्रे वसत्यमितविक्रमः ॥ १४ ॥
इस प्रकार सारी पृथ्वी महात्मा कश्यपको देकर अमित पराक्रमी परशुरामजी इस पर्वतराज महेन्द्रपर निवास करते हैं ॥ १४ ॥
एवं वैरमभूत् तस्य क्षत्रियैर्लोकवासिभिः ।
पृथिवी चापि विजिता रामेणामिततेजसा ॥ १५ ॥
इस तरह उनका सम्पूर्ण जगत्के क्षत्रियोंके साथ वैर हुआ था और उसी समय अमित तेजस्वी परशुरामजीने सारी पृथ्वी जीती थी ।। १५ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततश्चतुर्दशीं रामः समयेन महामनाः ।
दर्शयामास तान् विप्रान् धर्मराजं च सानुजम् ।। १६ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर चतुर्दशी तिथिको निश्चित समयपर महामना परशुरामजीने उस पर्वतपर रहनेवाले उन ब्राह्मणों तथा भाइयोंसहित युधिष्ठिरको दर्शन दिया ।। १६ ।।
स तमानर्च राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितः प्रभुः ।
द्विजानां च परां पूजां चक्रे नृपतिसत्तमः ।। १७ ।।
राजेन्द्र! उस समय प्रभावशाली नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरने भाइयोंके साथ श्रद्धापूर्वक भगवान् परशुरामजीकी पूजा की तथा अन्य ब्राह्मणोंका भी बहुत आदर-सत्कार किया ।। १७ ।।
अर्चित्वा जामदग्न्यं स पूजितस्तेन चोदितः ।
महेन्द्र उष्य तां रात्रिं प्रययौ दक्षिणामुखः ।। १८ ।।
जमदग्निनन्दन परशुरामजीकी पूजा करके स्वयं भी उनके द्वारा सम्मानित हो वे उन्हींकी आज्ञासे उस रातको महेन्द्रपर्वतपर ही रहे, फिर सबेरे उठकर दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये ।। १८ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कार्तवीर्योपाख्याने सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें कार्तवीर्योपाख्यानविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११७ ।।
११८-
अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका विभिन्न तीर्थोंमें होते हुए प्रभासक्षेत्रमें पहुँचकर तपस्यामें प्रवृत्त होना और यादवोंका पाण्डवोंसे मिलना
वैशम्पायन उवाच
गच्छन् स तीर्थानि महानुभावः
पुण्यानि रम्याणि ददर्श राजा ।
सर्वाणि विप्रैरुपशोभितानि
क्वचित् क्वचिद् भारत सागरस्य ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! आगे जाते हुए महानुभाव राजा युधिष्ठिरने समुद्रतटके समस्त पुण्य तीर्थोंका दर्शन किया। वे सभी तीर्थ परम मनोहर थे। उनमें कहीं-कहीं ब्राह्मणलोग निवास करते थे, जिससे उन तीर्थोंकी बड़ी शोभा होती थी ॥ १ ॥
स वृत्तवांस्तेषु कृताभिषेकः
सहानुजः पार्थिवपुत्रपौत्रः ।
समुद्रगां पुण्यतमां प्रशस्तां
जगाम पारिक्षित पाण्डुपुत्रः ॥ २ ॥
परीक्षितनन्दन! सदाचारी पाण्डुकुमार युधिष्ठिर कश्यपपुत्र सूर्यदेवके पौत्र थे (क्योंकि उनकी उत्पत्ति सूर्यकुमार धर्मसे हुई थी)। वे भाइयोंसहित उन तीर्थोंमें स्नान करके समुद्रगामिनी पुण्यमयी प्रशस्ता नदीके तटपर गये ॥ २ ॥
तत्रापि चाप्लुत्य महानुभावः
संतर्पयामास पितॄन् सुरांश्च ।
द्विजातिमुख्येषु धनं विसृज्य
गोदावरीं सागरगामगच्छत् ॥ ३ ॥
महानुभाव युधिष्ठिरने वहाँ भी स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण किया तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धन दान करके सागरगामिनी गोदावरी नदीकी ओर प्रस्थान किया ॥ ३ ॥
ततो विपाप्मा द्रविडेषु राजन्
समुद्रमासाद्य च लोकपुण्यम् ।
अगस्त्यतीर्थं च महापवित्रं
नारीतीर्थान्यथ वीरो ददर्श ॥ ४ ॥
जनमेजय! गोदावरीमें स्नान करके पवित्र हो वे वहाँसे द्रविड़देशमें घूमते हुए संसारके पुण्यमय तीर्थ समुद्रके तटपर गये। वहाँ स्नानादि करनेके पश्चात् वीर पाण्डुकुमारने आगे