महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
किं नु ते तत्र वक्ष्यन्ति सचिवेषु सुहृत्सु च । अयुध्यमानं धर्मज्ञमेकं हत्वानपत्रपाः ॥ ४ ॥ वे निर्लज्ज राजकुमार युद्धसे दूर रहनेवाले आप-जैसे धर्मज्ञ एवं असहाय पुरुषको मारकर अपने सुहृदों और मन्त्रियोंके सामने क्या कहेंगे? ॥ ४ ॥ विलप्यैवं सकरुणं बहु नानाविधं नृप । प्रेतकार्याणि सर्वाणि पितुश्चक्रे महातपाः ॥ ५ ॥ ददाह पितरं चाग्नौ रामः परपुरंजयः । प्रतिजज्ञे वधं चापि सर्वक्षत्रस्य भारत ॥ ६ ॥ राजन्! इस प्रकार भाँति-भाँतिसे अत्यन्त करुणा-जनक विलाप करके शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले महातपस्वी परशुरामजीने अपने पिताके समस्त प्रेतकर्म किये। भारत! पहले तो उन्होंने विधिपूर्वक अग्निमें पिताका दाह-संस्कार किया, तत्पश्चात् सम्पूर्ण क्षत्रियोंके वधकी प्रतिज्ञा की ॥ ५-६ ॥ संक्रुद्धोऽतिबलः संख्ये शस्त्रमादाय वीर्यवान् । जघ्निवान् कार्तवीर्यस्य सुतानेकोऽन्तकोपमः ॥ ७ ॥
अत्यन्त बलवान् एवं पराक्रमी परशुरामजी क्रोधके आवेशमें साक्षात् यमराजके समान हो गये। उन्होंने युद्धमें शस्त्र लेकर अकेले ही कार्तवीर्यके सब पुत्रोंको मार डाला ।। ७ ।।
तेषां चानुगता ये च क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ।
तांश्च सर्वानवामृद्नाद् रामः प्रहरतां वरः ।। ८ ।।
क्षत्रियशिरोमणे! उस समय जिन-जिन क्षत्रियोंने उनका साथ दिया, उन सबको भी योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने मिट्टीमें मिला दिया ।। ८ ।।
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः ।
समन्तपञ्चके पञ्च चकार रुधिरह्रदान् ।। ९ ।।
इस प्रकार भगवान् परशुरामने इस पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियोंसे सूनी करके उनके रक्तसे समन्तपञ्चक क्षेत्रमें पाँच रुधिर-कुण्ड भर दिये ।। ९ ।।
स तेषु तर्पयामास भृगून् भृगुकुलोद्वहः ।
साक्षाद् ददर्श चर्चीकं स च रामं न्यवारयत् ।। १० ।।
भृगुकुलभूषण रामने उन कुण्डोंमें भृगुवंशी पितरोंका तर्पण किया और उस समय साक्षात् प्रकट हुए महर्षि ऋचीकको देखा। उन्होंने परशुरामको इस घोर कर्मसे रोका ।। १० ।।
ततो यज्ञेन महता जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
तर्पयामास देवेन्द्रमृत्विग्भ्यः प्रददौ महीम् ।। ११ ।।
तदनन्तर प्रतापी जमदग्निकुमारने एक महान् यज्ञ करके देवराज इन्द्रको तृप्त किया तथा ऋत्विजोंको दक्षिणारूपमें भूमि दी ।। ११ ।।
वेदीं चाप्यददद्धैमीं कश्यपाय महात्मने ।
दशव्यामायतां कृत्वा नवोत्सेधां विशाम्पते ॥ १२ ॥
युधिष्ठिर! उन्होंने महात्मा कश्यपको एक सोनेकी वेदी प्रदान की, जिसकी लम्बाई-चौड़ाई दस-दस व्याम (चालीस-चालीस हाथ)-की थी। ऊँचाईमें भी वह वेदी नौ व्याम (छत्तीस हाथ)-की थी ॥ १२ ॥
तां कश्यपस्यानुमते ब्राह्मणाः खण्डशस्तदा ।
व्यभजंस्ते तदा राजन् प्रख्याताः खाण्डवायनाः ॥ १३ ॥
राजन्! उस समय कश्यपजीकी आज्ञासे ब्राह्मणोंने उस स्वर्णवेदीको खण्ड-खण्ड करके बाँट लिया, अतः वे खाण्डवायन नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ १३ ॥
स प्रदाय महीं तस्मै कश्यपाय महात्मने ।
अस्मिन् महेन्द्रे शैलेन्द्रे वसत्यमितविक्रमः ॥ १४ ॥
इस प्रकार सारी पृथ्वी महात्मा कश्यपको देकर अमित पराक्रमी परशुरामजी इस पर्वतराज महेन्द्रपर निवास करते हैं ॥ १४ ॥
एवं वैरमभूत् तस्य क्षत्रियैर्लोकवासिभिः ।
पृथिवी चापि विजिता रामेणामिततेजसा ॥ १५ ॥
इस तरह उनका सम्पूर्ण जगत्के क्षत्रियोंके साथ वैर हुआ था और उसी समय अमित तेजस्वी परशुरामजीने सारी पृथ्वी जीती थी ।। १५ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततश्चतुर्दशीं रामः समयेन महामनाः ।
दर्शयामास तान् विप्रान् धर्मराजं च सानुजम् ।। १६ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर चतुर्दशी तिथिको निश्चित समयपर महामना परशुरामजीने उस पर्वतपर रहनेवाले उन ब्राह्मणों तथा भाइयोंसहित युधिष्ठिरको दर्शन दिया ।। १६ ।।
स तमानर्च राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितः प्रभुः ।
द्विजानां च परां पूजां चक्रे नृपतिसत्तमः ।। १७ ।।
राजेन्द्र! उस समय प्रभावशाली नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरने भाइयोंके साथ श्रद्धापूर्वक भगवान् परशुरामजीकी पूजा की तथा अन्य ब्राह्मणोंका भी बहुत आदर-सत्कार किया ।। १७ ।।
अर्चित्वा जामदग्न्यं स पूजितस्तेन चोदितः ।
महेन्द्र उष्य तां रात्रिं प्रययौ दक्षिणामुखः ।। १८ ।।
जमदग्निनन्दन परशुरामजीकी पूजा करके स्वयं भी उनके द्वारा सम्मानित हो वे उन्हींकी आज्ञासे उस रातको महेन्द्रपर्वतपर ही रहे, फिर सबेरे उठकर दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये ।। १८ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कार्तवीर्योपाख्याने सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें कार्तवीर्योपाख्यानविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११७ ।।
११८-
अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका विभिन्न तीर्थोंमें होते हुए प्रभासक्षेत्रमें पहुँचकर तपस्यामें प्रवृत्त होना और यादवोंका पाण्डवोंसे मिलना
वैशम्पायन उवाच
गच्छन् स तीर्थानि महानुभावः
पुण्यानि रम्याणि ददर्श राजा ।
सर्वाणि विप्रैरुपशोभितानि
क्वचित् क्वचिद् भारत सागरस्य ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! आगे जाते हुए महानुभाव राजा युधिष्ठिरने समुद्रतटके समस्त पुण्य तीर्थोंका दर्शन किया। वे सभी तीर्थ परम मनोहर थे। उनमें कहीं-कहीं ब्राह्मणलोग निवास करते थे, जिससे उन तीर्थोंकी बड़ी शोभा होती थी ॥ १ ॥
स वृत्तवांस्तेषु कृताभिषेकः
सहानुजः पार्थिवपुत्रपौत्रः ।
समुद्रगां पुण्यतमां प्रशस्तां
जगाम पारिक्षित पाण्डुपुत्रः ॥ २ ॥
परीक्षितनन्दन! सदाचारी पाण्डुकुमार युधिष्ठिर कश्यपपुत्र सूर्यदेवके पौत्र थे (क्योंकि उनकी उत्पत्ति सूर्यकुमार धर्मसे हुई थी)। वे भाइयोंसहित उन तीर्थोंमें स्नान करके समुद्रगामिनी पुण्यमयी प्रशस्ता नदीके तटपर गये ॥ २ ॥
तत्रापि चाप्लुत्य महानुभावः
संतर्पयामास पितॄन् सुरांश्च ।
द्विजातिमुख्येषु धनं विसृज्य
गोदावरीं सागरगामगच्छत् ॥ ३ ॥
महानुभाव युधिष्ठिरने वहाँ भी स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण किया तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धन दान करके सागरगामिनी गोदावरी नदीकी ओर प्रस्थान किया ॥ ३ ॥
ततो विपाप्मा द्रविडेषु राजन्
समुद्रमासाद्य च लोकपुण्यम् ।
अगस्त्यतीर्थं च महापवित्रं
नारीतीर्थान्यथ वीरो ददर्श ॥ ४ ॥
जनमेजय! गोदावरीमें स्नान करके पवित्र हो वे वहाँसे द्रविड़देशमें घूमते हुए संसारके पुण्यमय तीर्थ समुद्रके तटपर गये। वहाँ स्नानादि करनेके पश्चात् वीर पाण्डुकुमारने आगे
बढ़कर परम पवित्र अगस्त्यतीर्थ तथा *नारीतीर्थोंका दर्शन किया ।। ४ ।। तत्रार्जुनस्याग्र्यधनुर्धरस्य निशम्य तत् कर्म नरैरशक्यम् । सम्पूज्यमानः परमर्षिसङ्घैः परां मुदं पाण्डुसुतः स लेभे ।। ५ ।। स तेषु तीर्थेष्वभिषिक्तगात्रः कृष्णासहायः सहितोऽनुजैश्च । सम्पूजयन् विक्रममर्जुनस्य रेमे महीपाल पतिः पृथिव्याः ।। ६ ।। वहाँ श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुनके उस पराक्रमको, जो दूसरे मनुष्योंके लिये असम्भव था, सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई। उन तीर्थोंमें बड़े-बड़े ऋषिगण भी उनका सत्कार करते थे। जनमेजय! द्रौपदी तथा भाइयोंके साथ राजा युधिष्ठिरने उन पाँचों तीर्थोंमें स्नान करके अर्जुनके पराक्रमकी प्रशंसा करते हुए बड़े हर्षका अनुभव किया ।। ५-६ ।। ततः सहस्राणि गवां प्रदाय तीर्थेषु तेष्वम्बुधरोत्तमस्य । हृष्टः सह भ्रातृभिरर्जुनस्य संकीर्तयामास गवां प्रदानम् ।। ७ ।। तदनन्तर समुद्रतटवर्ती उन सभी तीर्थोंमें सहस्रों गोदान करके भाइयोंसहित युधिष्ठिरने प्रसन्नतापूर्वक अर्जुनके द्वारा किये हुए गोदानका बारंबार वर्णन किया ।। ७ ।। स तानि तीर्थानि च सागरस्य पुण्यानि चान्यानि बहूनि राजन् । क्रमेण गच्छन् परिपूर्णकामः शूर्पारकं पुण्यतमं ददर्श ।। ८ ।। राजन्! समुद्रसम्बन्धी तथा अन्य बहुत-से पुण्य तीर्थोंमें क्रमशः भ्रमण करते हुए पूर्णकाम राजा युधिष्ठिरने अत्यन्त पुण्यमय शूर्पारकतीर्थका दर्शन किया ।। ८ ।। तत्रोदधेः कंचिदतीत्य देशं ख्यातं पृथिव्यां वनमाससाद । तप्तं सुरैस्तत्र तपः पुरस्ता- दिष्टं तथा पुण्यपरैर्नरेन्द्रैः ।। ९ ।। वहाँ समुद्रके कुछ भागको लाँघकर वे एक ऐसे वनमें आये जो भूमण्डलमें सर्वत्र विख्यात था। वहाँ पूर्वकालमें देवताओंने तपस्या की थी और पुण्यात्मा नरेशोंने यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ।। ९ ।।
स तत्र तामग्र्यधनुर्धरस्य वेदीं ददर्शायतपीनबाहुः । ऋचीकपुत्रस्य तपस्विसङ्घैः समावृतां पुण्यकृदर्चनीयाम् ॥ १० ॥ लम्बी और मोटी भुजाओंवाले युधिष्ठिरने उस वनमें धनुर्धरशिरोमणि ऋचीकवंशी परशुरामजीकी वेदी देखी, जो पुण्यात्मा पुरुषोंके लिये पूजनीय थी तथा तपस्वियोंके समुदाय उसे सदा घेरे रहते थे ॥ १० ॥
ततो वसूनां वसुधाधिपः स मरुद्गणानां च तथाश्विनोश्च । वैवस्वतादित्यधनेश्वराणा- मिन्द्रस्य विष्णोः सवितुर्विभोश्च ॥ ११ ॥ भवस्य चन्द्रस्य दिवाकरस्य पतेरपां साध्यगणस्य चैव । धातुः पितॄणां च तथा महात्मा रुद्रस्य राजन् सगणस्य चैव ॥ १२ ॥ सरस्वत्याः सिद्धगणस्य चैव पुण्यांश्च ये चाप्यमरास्तथान्ये । पुण्यानि चाप्यायतनानि तेषां ददर्श राजा सुमनोहराणि ॥ १३ ॥ राजन्! तत्पश्चात् उन महात्मा नरेशने वसु, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, यम, आदित्य, कुबेर, इन्द्र, विष्णु, भगवान् सविता, शिव, चन्द्रमा, सूर्य, वरुण, साध्यगण, धाता, पितृगण, अपने गणोंसहित रुद्र, सरस्वती, सिद्धसमुदाय तथा अन्य पुण्यमय देवताओंके परम पवित्र और मनोहर मन्दिरोंके दर्शन किये ॥ ११—१३ ॥
तेषूपवासान् विबुधानुपोष्य दत्त्वा च रत्नानि महान्ति राजा । तीर्थेषु सर्वेषु परिप्लुताङ्गः पुनः स शूर्पारकमाजगाम ॥ १४ ॥ उन तीर्थोंके निकट निवास करनेवाले विद्वान् ब्राह्मणोंको वस्त्राभूषणोंसे आच्छादित एवं विभूषित करके उन्हें बहुमूल्य रत्नोंकी भेंट दे वहाँके सभी तीर्थोंमें स्नान करके महाराज युधिष्ठिर पुनः शूर्पारक-क्षेत्रमें लौट आये ॥ १४ ॥
स तेन तीर्थेन तु सागरस्य पुनः प्रयाततः सह सोदरीयैः । द्विजैः पृथिव्यां प्रथितं महद्भि-
स्तीर्थं प्रभासं समुपाजगाम ॥ १५ ॥ वहाँसे प्रस्थित हो वे भाइयोंसहित सागरतटवर्ती तीर्थोंके मार्गसे होते हुए फिर प्रभासक्षेत्र आये जो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके कारण भूमण्डलमें अधिक प्रसिद्ध है ॥ १५ ॥ तत्राभिषिक्तः पृथुलोहिताक्षः सहानुजैर्देवगणान् पितॄंश्च । संतर्पयामास तथैव कृष्णा ते चापि विप्राः सह लोमशेन ॥ १६ ॥ वहाँ भाइयोंसहित स्नान करके विशाल एवं लाल नेत्रोंवाले राजा युधिष्ठिरने देवताओं और पितरोंका तर्पण किया। इसी प्रकार द्रौपदीने, साथ आये हुए उन ब्राह्मणोंने तथा महर्षि लोमशने भी वहाँ स्नान एवं तर्पण किये ॥ १६ ॥ स द्वादशाहं जलवायुभक्षः कुर्वन् क्षपाहःसु तदाभिषेकम् । समन्ततोऽग्नीनुपदीपयित्वा तेपे तपो धर्मभृतां वरिष्ठः ॥ १७ ॥ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर वहाँ बारह दिनोंतक केवल जल और वायु पीकर रहते हुए दिनमें और रातमें भी स्नान करते तथा अपने चारों ओर आग जलाकर तपस्यामें लगे रहते थे ॥ १७ ॥ तमुग्रमास्थाय तपश्चरन्तं शुश्राव रामश्च जनार्दनश्च । तौ सर्ववृष्णिप्रवरौ ससैन्यौ युधिष्ठिरं जग्मतुराजमीढम् ॥ १८ ॥ इसी समय वृष्णिवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामने सुना कि महाराज युधिष्ठिर प्रभासक्षेत्रमें उग्र तपस्या कर रहे हैं; तब वे अपने सैनिकोंसहित अजमीढकुलभूषण युधिष्ठिरसे मिलनेके लिये गये ॥ १८ ॥ ते वृष्णयः पाण्डुसुतान् समीक्ष्य भूमौ शयानान् मलदिग्धगात्रान् । अनर्हतीं द्रौपदीं चापि दृष्ट्वा सुदुःखिताश्चक्रुरार्तनादम् ॥ १९ ॥ वहाँ जाकर वृष्णिवंशियोंने देखा, पाण्डवलोग पृथ्वीपर सो रहे हैं, उनके सारे अंग धूलसे सने हुए हैं तथा कष्टसहनके अयोग्य द्रौपदी भी भारी दुर्दशा भोग रही है। यह सब देखकर वे बड़े दुःखी हुए और आर्त स्वरसे रोने लगे ॥ १९ ॥ ततः स रामं च जनार्दनं च कार्ष्णिं च साम्बं च शिनेश्च पौत्रम् ।
अन्यांश्च वृष्णीनुपगम्य पूजां
चक्रे यथाधर्ममहीनसत्त्वः ॥ २० ॥
(उस महान् संकटमें भी) महाराज युधिष्ठिरने अपना धैर्य नहीं छोड़ा था। उन्होंने बलराम, श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न, साम्ब, सात्यकि तथा अन्यान्य वृष्णिवंशियोंके पास जा-जाकर धर्मानुसार उन सबका आदर-सत्कार किया ॥ २० ॥
ते चापि सर्वान् प्रतिपूज्य पार्थां-
स्तैः सत्कृताः पाण्डुसुतैस्तथैव ।
युधिष्ठिरं सम्परिवार्य राज-
न्नुपाविशन् देवगणा यथेन्द्रम् ॥ २१ ॥
राजन्! पाण्डुपुत्रोंद्वारा सत्कृत होकर यादवोंने भी उन सबका यथोचित सत्कार किया और फिर देवता जैसे इन्द्रके चारों ओर बैठ जाते हैं उसी प्रकार वे धर्मराज युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ २१ ॥
तेषां स सर्वं चरितं परेषां
वने च वासं परमप्रतीतः ।
अस्त्रार्थमिन्द्रस्य गतं च पार्थं
निवेशनं हृष्टमनाः शशंस ॥ २२ ॥
तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने अत्यन्त विश्वस्त होकर यादवोंसे शत्रुओंकी सारी करतूतें कह सुनायीं और अपने वनवासका भी सब समाचार बताया। साथ ही बड़ी प्रसन्नताके साथ यह भी सूचित किया कि अर्जुन दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिके लिये इन्द्रलोकमें गये हैं ॥ २२ ॥
श्रुत्वा तु ते तस्य वचः प्रतीता-
स्तांश्चापि दृष्ट्वा सुकृशानतीव ।
नेत्रोद्भवं सम्मुमुचुर्महार्हा
दुःखार्तिजं वारि महानुभावाः ॥ २३ ॥
युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर उन्हें कुछ सान्त्वना मिली। परंतु पाण्डवोंको अत्यन्त दुर्बल देखकर वे परम पूजनीय महानुभाव यादव वीर दुःख और वेदनासे पीड़ित हो आँसू बहाने लगे ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां प्रभासे
यादवपाण्डवसमागमे अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें प्रभासक्षेत्रके भीतर यादव-पाण्डव-समागमविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११८ ॥
* पाँच अप्सराओंके तीर्थ।
अध्याय (पृष्ठ 827)
किमकुर्वन् कथाश्चैषां कास्तत्रासंस्तपोधन ॥ १ ॥
एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
प्रभासतीर्थमें बलरामजीके पाण्डवोंके प्रति सहानुभूतिसूचक दुःखपूर्ण उद्गार
जनमेजय उवाच
प्रभासतीर्थमासाद्य पाण्डवा वृष्णयस्तथा ।
किमकुर्वन् कथाश्चैषां कास्तत्रासंस्तपोधन ॥ १ ॥
ते हि सर्वे महात्मानः सर्वशास्त्रविशारदाः ।
वृष्णयः पाण्डवाश्चैव सुहृदश्च परस्परम् ॥ २ ॥
जनमेजयने पूछा— तपोधन! प्रभासतीर्थमें पहुँचकर पाण्डवों तथा वृष्णिवंशियोंने क्या किया? वहाँ उनमें कैसी बातचीत हुई? वे सब महात्मा यादव और पाण्डव सम्पूर्ण शास्त्रोंके विद्वान् और एक-दूसरेका हित चाहनेवाले थे, (अतः उनमें क्या बात हुई? यह मैं जानना चाहता हूँ) ॥ १-२ ॥
वैशम्पायन उवाच
प्रभासतीर्थं सम्प्राप्य पुण्यं तीर्थं महोदधेः ।
वृष्णयः पाण्डवान् वीराः परिवार्योपतस्थिरे ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! प्रभासक्षेत्र समुद्र-तटवर्ती एक पुण्यमय तीर्थ है। वहाँ जाकर वृष्णिवंशी वीर पाण्डवोंको चारों ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ ३ ॥
ततो गोक्षीरकुन्देन्दुमृणालरजतप्रभः ।
वनमाली हली रामो बभाषे पुष्करेक्षणम् ॥ ४ ॥
तदनन्तर गोदुग्ध, कुन्दकुसुम, चन्द्रमा, मृणाल (कमलनाल) तथा चाँदीकी-सी कान्तिवाले वनमाला-विभूषित हलधर बलरामने कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णसे कहा ॥ ४ ॥
बलदेव उवाच
न कृष्ण धर्मश्चरितो भवाय
जन्तोर्धर्मश्च पराभवाय ।
युधिष्ठिरो यत्र जटी महात्मा
वनाश्रयः क्लिश्यति चीरवासाः ॥ ५ ॥
बलदेवजी बोले— श्रीकृष्ण! जान पड़ता है आचरणमें लाया हुआ धर्म भी प्राणियोंके अभ्युदयका कारण नहीं होता; और उनका किया हुआ अधर्म भी पराजयकी प्राप्ति
करानेवाला नहीं होता, क्योंकि महात्मा युधिष्ठिरको (जो सदा धर्मका ही पालन करते हैं) जटाधारी होकर वल्कल वस्त्र पहने वनमें रहते हुए महान् क्लेश भोगना पड़ रहा है ।। ५ ।। दुर्योधनश्चापि महीं प्रशास्ति ** न चास्य भूमिविवरं ददाति ।** धर्मादधर्मश्चरितो वरीया- ** नितीव मन्येत नरोऽल्पबुद्धिः ।। ६ ।।** दुर्योधने चापि विवर्धमाने ** युधिष्ठिरे चासुखमात्तराज्ये ।** किं त्वत्र कर्तव्यमिति प्रजाभिः ** शङ्का मिथः संजनिता नराणाम् ।। ७ ।।**
उधर, दुर्योधन (अधर्मपरायण होनेपर भी) पृथ्वीका शासन कर रहा है। उसके लिये यह पृथ्वी भी नहीं फटती है। इससे तो मन्द बुद्धिवाले मनुष्य यही समझेंगे कि धर्माचरणकी अपेक्षा अधर्मका आचरण ही श्रेष्ठ है। दुर्योधन निरन्तर उन्नति कर रहा है और युधिष्ठिर छलसे राज्य छिन जानेके कारण दुःख उठा रहे हैं। (युधिष्ठिर और दुर्योधनके दृष्टान्तको
सामने रखकर) मनुष्योंमें परस्पर महान् संदेह खड़ा हो गया है। प्रजा यह सोचने लगी है कि हमें क्या करना चाहिये—हमें धर्मका आश्रय लेना चाहिये या अधर्मका? ।। ६-७ ।। अयं स धर्मप्रभवो नरेन्द्रो धर्मे धृतः सत्यधृतिः प्रदाता । चलेद्धि राज्याच्च सुखाच्च पार्थो धर्मादपेतस्तु कथं विवर्धेत् ।। ८ ।। ये राजा युधिष्ठिर साक्षात् धर्मके पुत्र हैं। धर्म ही इनका आधार है। ये सदा सत्यका आश्रय लेते और दान देते रहते हैं। कुन्तीकुमार युधिष्ठिर राज्य और सुख छोड़ सकते हैं, (परंतु धर्मका त्याग नहीं कर सकते) भला, धर्मसे दूर होकर कोई कैसे अभ्युदयका भागी हो सकता है? ।। ८ ।। कथं नु भीष्मश्च कृपश्च विप्रो द्रोणश्च राजा च कुलस्य वृद्धः । प्रव्राज्य पार्थान् सुखमाप्नुवन्ति धिक् पापबुद्धीन् भरतप्रधानान् ।। ९ ।। पितामह भीष्म, ब्राह्मण कृपाचार्य, द्रोण तथा कुलके बड़े-बूढ़े राजा धृतराष्ट्र—ये कुन्तीके पुत्रोंको राज्यसे निकालकर कैसे सुख पाते हैं? भरतकुलके इन प्रधान व्यक्तियोंको धिक्कार है! क्योंकि इनकी बुद्धि पापमें लगी हुई है ।। ९ ।। किं नाम वक्ष्यत्यवनिप्रधानः पितॄन् समागम्य परत्र पापः । पुत्रेषु सम्यक् चरितं मयेति पुत्रानपापान् व्यपरोप्य राज्यात् ।। १० ।। पापी राजा धृतराष्ट्र परलोकमें पितरोंसे मिलनेपर उनके सामने कैसे यह कह सकेगा कि 'मैंने अपने और भाई पाण्डुके पुत्रोंके साथ न्याययुक्त बर्ताव किया है।' जबकि उसने इन निर्दोष पुत्रोंको राज्यसे वञ्चित कर दिया है ।। १० ।। नासौ धिया सम्प्रति पश्यति स्म किं नाम कृत्वाह मचक्षुरेवम् । जातः पृथिव्यामिति पार्थिवेषु प्रव्राज्य कौन्तेयमिति स्म राज्यात् ।। ११ ।। वह अब भी अपने बुद्धिरूप नेत्रोंसे यह नहीं देख पाता कि कौन-सा पाप करनेके कारण मुझे इस प्रकार अन्धा होना पड़ा है और आगे कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको राज्यसे निकालकर जब मैं भूतलके राजाओंमें फिरसे जन्म लूँगा, तब मेरी दशा कैसी होगी? ।। ११ ।। नूनं समृद्धान् पितृलोकभूमौ
चामीकराभान् क्षितिजान् प्रफुल्लान् । विचित्रवीर्यस्य सुतः सपुत्रः कृत्वा नृशंसं बत पश्यति स्म ॥ १२ ॥ विचित्रवीर्यका पुत्र धृतराष्ट्र और उसके पुत्र दुर्योधन आदि यह क्रूर कर्म करके (स्वप्नमें) निश्चय ही पितृलोककी भूमिमें सुवर्णके समान चमकनेवाले समृद्धिशाली एवं पुष्पित वृक्षोंको देख रहे हैं* ॥ १२ ॥
व्यूढोत्तरांसान् पृथुलोहिताक्षान् नेमान् स्म पृच्छन् स शृणोति नूनम् । प्रास्थापयद् यत् सवनं सशङ्को युधिष्ठिरं सानुजमात्तशस्त्रम् ॥ १३ ॥ धृतराष्ट्र सुदृढ़ कंधे तथा विशाल एवं लाल नेत्रोंवाले इन भीष्म आदिसे कोई बात पूछता तो है, परंतु निश्चय ही उनकी बात सुनकर मानता नहीं है, तभी तो भाइयोंसहित शस्त्रधारी युधिष्ठिरके प्रति भी मनमें शंका रखकर इन्हें उसने वनमें भेज दिया है ॥ १३ ॥
योऽयं परेषां पृतनां समृद्धां निरायुधो दीर्घभुजो निहन्यात् । श्रुत्वैव शब्दं हि वृकोदरस्य मुञ्चन्ति सैन्यानि शकृत् समूत्रम् ॥ १४ ॥ (भला! वे कौरव इन पाण्डवोंका सामना कैसे कर सकते हैं?) ये बड़ी-बड़ी भुजाओंवाले भीमसेन बिना अस्त्र-शस्त्रोंके ही शत्रुओंकी शक्तिशाली सेनाका संहार कर सकते हैं। भीमका तो सिंहनाद सुनकर ही विरोधी दलके सैनिक मल-मूत्र करने लगते हैं ॥ १४ ॥
स क्षुत्पिपासाध्वकृशस्तरस्वी समेत्य नानायुधबाणपाणिः । वने स्मरन् वासमिमं सुघोरं शेषं न कुर्यादिति निश्चितं मे ॥ १५ ॥ वे ही वेगशाली भीम इन दिनों भूख-प्यास और रास्ता चलनेकी थकावटसे दुर्बल हो गये हैं। इस भयंकर वनवासका स्मरण करते हुए जब ये हाथोंमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र एवं धनुष-बाण लिये शत्रुओंपर आक्रमण करेंगे, उस समय किसीको भी जीता न छोड़ेंगे—यह मेरा निश्चय है ॥ १५ ॥
न ह्यस्य वीर्येण बलेन कश्चित् समः पृथिव्यामपि विद्यतेऽन्यः । स शीतवातातपकर्शिताङ्गो न शेषमाजावसुहृत्सु कुर्यात् ॥ १६ ॥
इनके समान पराक्रमी और बलवान् वीर इस पृथ्वीपर कोई नहीं है। इस समय सर्दी-गरमी और वायुके कष्टसे यद्यपि इनका शरीर दुबला हो गया है तो भी समरमें शत्रुओंमेंसे किसीको भी ये शेष नहीं रहने देंगे ॥ १६ ॥
प्राच्यां नृपानेकरथेन जित्वा
वृकोदरः सानुचरान् रणेषु ।
स्वस्त्यागमद् योऽतिरथस्तरस्वी
सोऽयं वने क्लिश्यति चीरवासाः ॥ १७ ॥
यः सिन्धुकूले व्यजयन्नृदेवान्
समागतान् दाक्षिणात्यान् महीपान् ।
तं पश्यतेमं सहदेवमद्य
तरस्विनं तापसवेषरूपम् ॥ १८ ॥
जो पूर्वदिशामें (दिग्विजयकी यात्राके समय) केवल एक रथ लेकर युद्धमें बहुत-से राजाओंको सेवकोंसहित परास्त करके सकुशल लौट आये थे, वे ही अतिरथी और वेगशाली वीर वृकोदर आज वनमें वल्कल वस्त्र पहनकर कष्ट भोग रहे हैं। जिसने समुद्र-तटपर सामना करनेके लिये आये हुए दक्षिण दिशाके सम्पूर्ण राजाओंपर विजय पायी थी, उसी वेगवान् वीर इस सहदेवको देखो—यह आज तपस्वीकी-सी वेषभूषा धारण किये हुए दुःख पा रहा है ॥ १७-१८ ॥
यः पार्थिवानेकरथेन जिग्ये
दिशं प्रतीचीं प्रति युद्धशौण्डः ।
सोऽयं वने मूलफलेन जीव-
ञ्जटी चरत्यद्य मलाचिताङ्गः ॥ १९ ॥
जिस युद्धकुशल नकुलने एकमात्र रथकी सहायतासे पश्चिम दिशाके समस्त भूपालोंको जीत लिया था, वही आज वनमें फल-मूलसे जीवन-निर्वाह करता हुआ सिरपर जटा धारण किये मलिन शरीरसे विचर रहा है ॥ १९ ॥
सत्रे समृद्धेऽतिरथस्य राज्ञो
वेदीतलादुत्पतिता सुता या ।
सेयं वने वासमिमं सुदुःखं
कथं सहत्यद्य सती सुखार्हा ॥ २० ॥
जो अतिरथी राजा द्रुपदके समृद्धिशाली यज्ञमें वेदीसे प्रकट हुई थी, वही यह सुख भोगनेके योग्य सती-साध्वी द्रौपदी वनवासके इस महान् दुःखको कैसे सहन करती है? ॥ २० ॥
त्रिवर्गमुख्यस्य समीरणस्य
देवेश्वरस्याप्यथवाश्विनोश्च ।
एषां सुराणां तनयाः कथं नु वनेऽचरन् ह्यस्तसुखाः सुखार्हाः ॥ २१ ॥ धर्म, वायु, इन्द्र और अश्विनीकुमारों-जैसे देवताओंके ये पुत्र सुख भोगनेके योग्य होते हुए भी आज सब प्रकारके सुखोंसे वञ्चित हो वनमें कैसे विचरण कर रहे हैं? ॥ २१ ॥
जिते हि धर्मस्य सुते सभार्ये सभ्रातृके सानुचरे निरस्ते । दुर्योधने चापि विवर्धमाने कथं न सीदत्यवनिः सशैला ॥ २२ ॥ पत्नीसहित धर्मराज युधिष्ठिर जुएमें हार गये और भाइयों एवं सेवकोंसहित राज्यसे बाहर कर दिये गये, उधर दुर्योधन (अनीतिपरायण होकर भी दिनोदिन) बढ़ रहा है, ऐसी दशामें पर्वतोंसहित यह पृथ्वी क्यों नहीं फट जाती? ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां बलरामवाक्ये एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें बलरामवाक्यविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११९ ॥
* इस प्रकारके वृक्षोंको प्रत्यक्ष देखना मृत्युसूचक माना गया है।
१२०-
विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकिके शौर्यपूर्ण उद्गार तथा युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णके वचनोंका अनुमोदन एवं पाण्डवोंका पयोष्णी नदीके तटपर निवास
सात्यकिरुवाच
न राम कालः परिदेवनाय
यदुत्तरं त्वत्र तदेव सर्वे ।
समाचरामो ह्यनतीतकालं
युधिष्ठिरो यद्यपि नाह किंचित् ॥ १ ॥
सात्यकिने कहा— बलरामजी! यह समय बैठकर विलाप करनेका नहीं है। अब आगे जो कुछ करना है उसीको हम सब लोग मिलकर करें। यद्यपि महाराज युधिष्ठिर हमसे कुछ नहीं कहते हैं तो भी हमें अब व्यर्थ समय न बिताकर कौरवोंको उचित उत्तर देना चाहिये ॥ १ ॥
ये नाथवन्तोऽद्य भवन्ति लोके
ते नात्मना कर्म समारभन्ते ।
तेषां तु कार्येषु भवन्ति नाथाः
शिब्यादयो राम यथा ययातेः ॥ २ ॥
इस संसारमें जो लोग सनाथ हैं—जिनके बहुत-से सहायक हैं—वे स्वयं कोई कार्य आरम्भ नहीं करते हैं। उनके सभी कार्योंमें वे सहायक एवं सुहृद् ही सहयोगी होते हैं, जैसे ययातिके उद्धार-कार्यमें शिबि आदि उनके नातियोंने योगदान किया था ॥ २ ॥
येषां तथा राम समारभन्ते
कार्याणि नाथाः स्वमतेन लोके ।
ते नाथवन्तः पुरुषप्रवीरा
नानाथवत् कृच्छ्रमवाप्नुवन्ति ॥ ३ ॥
बलरामजी! जगत्में जिनके कार्य उनके सहायक अपने ही विचारसे प्रारम्भ करते हैं, वे पुरुषश्रेष्ठ सनाथ माने जाते हैं। वे अनाथकी भाँति कभी कष्टमें नहीं पड़ते ॥ ३ ॥
कस्मादिमौ रामजनार्दनौ च
प्रद्युम्नसाम्बौ च मया समेतौ ।
वसन्त्यरण्ये सहसोदरीयै-
स्त्रैलोक्यनाथानभिगम्य पार्थाः ॥ ४ ॥
आप दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्ण, मेरेसहित ये प्रद्युम्न और साम्ब सब-के-सब मौजूद हैं। इन त्रिभुवनपतियोंसे मिलकर भी ये कुन्तीके पुत्र अभीतक अपने भाइयोंके साथ वनमें क्यों निवास करते हैं? ॥ ४ ॥
निर्यातु साध्वद्य दशार्हसेना
प्रभूतनानायुधचित्रवर्मा ।
यमक्षयं गच्छतु धार्तराष्ट्रः
सबान्धवो वृष्णिबलाभिभूतः ॥ ५ ॥
त्वं ह्येव कोपात् पृथिवीमपीमां
संवेष्टयेस्तिष्ठतु शार्ङ्गधन्वा ।
स धार्तराष्ट्रं जहि सानुबन्धं
वृत्रं यथा देवपतिर्महेन्द्रः ॥ ६ ॥
उत्तम तो यह है कि आज ही यदुवंशियोंकी सेना नाना प्रकारके प्रचुर अस्त्र-शस्त्र और विचित्र कवच धारण करके युद्धके लिये प्रस्थान करे। धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन वृष्णिवंशियोंके पराक्रमसे पराजित हो बन्धु-बान्धवोंसहित यमलोक चला जाय। बलरामजी! भगवान् श्रीकृष्ण अलग खड़े रहें, केवल आप ही चाहें तो इस समूची पृथिवीको भी अपनी क्रोधाग्निकी लपटोंमें लपेट सकते हैं। जैसे देवराज इन्द्रने वृत्रासुरका वध किया था उसी प्रकार आप भी दुर्योधनको उसके सगे-सम्बन्धियों-सहित मार डालिये ॥ ५-६ ॥
भ्राता च मे यः स सखा गुरुश्च
जनार्दनस्यात्मसमश्च पार्थः ।
यदर्थमैच्छन् मनुजाः सुपुत्रं
शिष्यं गुरुश्चाप्रतिकूलवादम् ॥ ७ ॥
जो मेरे भाई, सखा और गुरु हैं, जो भगवान् श्रीकृष्णके आत्मतुल्य सुहृद् हैं, वे कुन्तीकुमार अर्जुन भी अलग रहें। मनुष्य जिस उद्देश्यसे अच्छे पुत्रकी और गुरु प्रतिकूल न बोलनेवाले शिष्यकी कामना करते हैं, उसे सफल करनेका समय आ गया है ॥ ७ ॥
यदर्थमभ्युद्यतमुत्तमं तत्
करोति कर्माग्र्यमपारणीयम् ।
तस्यास्त्रवर्षाण्यहमुत्तमास्त्रै-
र्विहत्य सर्वाणि रणेऽभिभूय ॥ ८ ॥
जिसके लिये सुयोग्य शिष्य या पुत्र उत्तम अस्त्र-शस्त्र उठाता है तथा युद्धमें श्रेष्ठ एवं अपार पराक्रम कर दिखाता है, उसकी पूर्तिक यही अवसर है। मैं संग्रामभूमिमें अपने उत्तम आयुधोंद्वारा शत्रुओंकी सारी अस्त्र-वर्षाको नष्ट करके उनके समस्त सैनिकोंको परास्त कर दूँगा ॥ ८ ॥
कायाच्छिरः सर्पविषाग्निकल्पैः
शरोत्तमैरुन्मथितास्मि राम । खड्गेन चाहं निशितेन संख्ये कायाच्छिरस्तस्य बलात् प्रमथ्य ॥ ९ ॥ बलरामजी! सर्प, विष एवं अग्निके समान भयंकर उत्तम बाणोंद्वारा शत्रुके सिरको धड़से अलग कर दूँगा, साथ ही उस समरांगणमें शत्रुमण्डलीको मैं बलपूर्वक रौंदकर तीखी तलवारद्वारा उसका मस्तक उड़ा दूँगा ॥ ९ ॥
ततोऽस्य सर्वाननुगान् हनिष्ये दुर्योधनं चापि कुरूँश्च सर्वान् । आत्तायुधं मामिह रौहिणेय पश्यन्तु भैमा युधि जातहर्षाः ॥ १० ॥ तदनन्तर उसके समस्त सेवकोंसहित दुर्योधन और समस्त कौरवोंको भी मार डालूँगा। रोहिणीनन्दन! युद्धमें भयानक पराक्रम दिखानेवाले योद्धा हर्ष और उत्साहमें भरकर आज मुझे हाथमें अस्त्र लिये पूर्वोक्त पराक्रम करते हुए प्रत्यक्ष देखें ॥ १० ॥
निघ्नन्तमेकं कुरुयोधमुख्या- नग्निं महाकक्षमिवान्तकाले । प्रद्युम्नमुक्तान् निशितान् न शक्ताः सोढुं कृपद्रोणविकर्णकर्णाः ॥ ११ ॥ जैसे प्रलयकालीन अग्नि सूखे घासकी राशिको जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार मैं अकेला ही कौरवदलके प्रधान वीरोंका संहार कर डालूँगा और ऐसा करते हुए सब लोग मुझे प्रत्यक्ष देखेंगे। प्रद्युम्नके छोड़े हुए तीखे बाणोंको सहन करनेकी शक्ति कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, विकर्ण और कर्ण—किसीमें नहीं है ॥ ११ ॥
जानामि वीर्यं च जयात्मजस्य कार्ष्णिर्भवत्येष यथा रणस्थः । साम्बः ससूतं सरथं भुजाभ्यां दुःशासनं शास्तु बलात् प्रमथ्य ॥ १२ ॥ मैं अर्जुनकुमार अभिमन्युके भी पराक्रमको जानता हूँ। वह समरभूमिमें खड़ा होनेपर साक्षात् श्रीकृष्णनन्दन प्रद्युम्नके ही समान जान पड़ता है। वीरवर साम्ब बलपूर्वक शत्रुसेनाको मथकर अपनी दोनों भुजाओंसे रथ और सारथिसहित दुःशासनका दमन करें ॥ १२ ॥
न विद्यते जाम्बवतीसुतस्य रणे विषह्यं हि रणोत्कटस्य । एतेन बालेन हि शम्बरस्य दैत्यस्य सैन्यं सहसा प्रणुन्नम् ॥ १३ ॥