महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
जैसे दुर्भेद्य पर्वतके पास पहुँचकर जलका महान् प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है तथा जिस प्रकार सम्पूर्ण जलाशय (समुद्र) अपनी तटभूमिको नहीं लाँघ पाते, उसी प्रका
महौघः सलिलस्येव गिरिमासाद्य दुर्भिदम् ।
द्रोणं ते नाभ्यवर्तन्त वेलामिव जलाशयाः ॥ ८ ॥
जैसे दुर्भेद्य पर्वतके पास पहुँचकर जलका महान् प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है तथा जिस प्रकार सम्पूर्ण जलाशय (समुद्र) अपनी तटभूमिको नहीं लाँघ पाते, उसी प्रकार वे पाण्डव-सैनिक द्रोणाचार्यके अत्यन्त निकट न पहुँच सके ॥ ८ ॥
पीड्यमानाः शरै राजन् द्रोणचापविनिःसृतैः ।
न शेकुः प्रमुखे स्थातुं भारद्वाजस्य पाण्डवाः ॥ ९ ॥
राजन्! द्रोणाचार्यके धनुषसे छूटे हुए बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित होकर पाण्डववीर उनके सामने नहीं ठहर सके ॥ ९ ॥
तदद्भुतमपश्याम द्रोणस्य भुजयोर्बलम् ।
यदेनं नाभ्यवर्तन्त पञ्चालाः सृञ्जयैः सह ॥ १० ॥
उस समय हमलोगोंने द्रोणाचार्यकी भुजाओंका वह अद्भुत बल देखा, जिससे कि सृञ्जयोंसहित सम्पूर्ण पांचालवीर उनके सामने टिक न सके ॥ १० ॥
चक्रव्यूह
तमायान्तमभिक्रुद्धं द्रोणं दृष्ट्वा युधिष्ठिरः । बहुधा चिन्तयामास द्रोणस्य प्रतिवारणम् ॥ ११ ॥ क्रोधमें भरे हुए उन्हीं द्रोणाचार्यको आते देख राजा युधिष्ठिरने उन्हें रोकनेके उपायपर बारंबार विचार किया ॥ ११ ॥ अशक्यं तु तमन्येन द्रोणं मत्वा युधिष्ठिरः । अविषह्यं गुरुं भारं सौभद्रं समवासृजत् ॥ १२ ॥ इस समय द्रोणाचार्यका सामना करना दूसरेके लिये असम्भव जानकर युधिष्ठिरने वह दुःसह एवं महान् भार सुभद्राकुमार अभिमन्युपर रख दिया ॥ १२ ॥ वासुदेवादवरं फाल्गुनाच्चामितौजसम् । अब्रवीत् परवीरघ्नमभिमन्युमिदं वचः ॥ १३ ॥ अमिततेजस्वी अभिमन्यु वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण तथा अर्जुनसे किसी बातमें कम नहीं था, वह शत्रुवीरोंका संहार करनेमें समर्थ था; अतः उससे युधिष्ठिरने इस प्रकार कहा — ॥ १३ ॥ एत्य नो नार्जुनो गर्हेद् यथा तात तथा कुरु । चक्रव्यूहस्य न वयं विद्मो भेदं कथंचन ॥ १४ ॥ ‘तात संशप्तकोंके साथ युद्ध करके लौटनेपर अर्जुन जिस प्रकार हमलोगोंकी निन्दा न करें (हमें असमर्थ न बतावें), वैसा कार्य करो। हमलोग तो किसी तरह भी चक्रव्यूहके भेदनकी प्रक्रियाको नहीं जानते हैं ॥ त्वं वार्जुनो वा कृष्णो वा भिन्द्यात् प्रद्युम्न एव वा । चक्रव्यूहं महाबाहो पञ्चमो नोपपद्यते ॥ १५ ॥ ‘महाबाहो! तुम, अर्जुन, श्रीकृष्ण अथवा प्रद्युम्न—ये चार पुरुष ही चक्रव्यूहका भेदन कर सकते हो। पाँचवाँ कोई योद्धा इस कार्यके योग्य नहीं है ॥ १५ ॥ अभिमन्यो वरं तात याचतां दातुमर्हसि । पितॄणां मातुलानां च सैन्यानां चैव सर्वशः ॥ १६ ॥ ‘तात अभिमन्यु! तुम्हारे पिता और मामाके पक्षके समस्त योद्धा तथा सम्पूर्ण सैनिक तुमसे याचना कर रहे हैं। तुम्हीं इन्हें वर देनेके योग्य हो ॥ १६ ॥ धनंजयो हि नस्तात गर्हयेदेत्य संयुगात् । क्षिप्रमस्त्रं समादाय द्रोणानीकं विशातय ॥ १७ ॥ ‘तात! यदि हम विजयी नहीं हुए तो युद्धसे लौटनेपर अर्जुन निश्चय ही हमलोगोंको कोसेंगे, अतः शीघ्र अस्त्र लेकर तुम द्रोणाचार्यकी सेनाका विनाश कर डालो’ ॥ १७ ॥ अभिमन्युरुवाच द्रोणस्य दृढमत्युग्रमनीकप्रवरं युधि ।
पितॄणां जयमाकाङ्क्षन्नवगाहेऽविलम्बितम् ॥ १८ ॥
अभिमन्युने कहा—महाराज! मैं अपने पितृ-वर्गकी विजयकी अभिलाषासे युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यकी अत्यन्त भयंकर, सुदृढ़ एवं श्रेष्ठ सेनामें शीघ्र ही प्रवेश करता हूँ ॥ १८ ॥
उपदिष्टो हि मे पित्रा योगोऽनीकविशातने ।
नोत्सहे हि विनिर्गन्तुमहं कस्यांचिदापदि ॥ १९ ॥
पिताजीने मुझे चक्रव्यूहको भेदनकी विधि तो बतायी है; परंतु किसी आपत्तिमें पड़ जानेपर मैं उस व्यूहसे बाहर नहीं निकल सकता ॥ १९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
भिन्ध्यनीकं युधां श्रेष्ठ द्वारं संजनयस्व नः ।
वयं त्वानुगमिष्यामो येन त्वं तात यास्यसि ॥ २० ॥
युधिष्ठिर बोले—योद्धाओंमें श्रेष्ठ वीर! तुम व्यूहका भेदन करो और हमारे लिये द्वार बना दो! तात! फिर तुम जिस मार्गसे जाओगे, उसीके द्वारा हम भी तुम्हारे पीछे-पीछे चले चलेंगे ॥ २० ॥
धनंजयसमं युद्धे त्वां वयं तात संयुगे ।
प्रणिधायानुयास्यामो रक्षन्तः सर्वतोमुखाः ॥ २१ ॥
बेटा! हमलोग युद्धस्थलमें तुम्हें अर्जुनके समान मानते हैं। हम अपना ध्यान तुम्हारी ही ओर रखकर सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करते हुए तुम्हारे साथ ही चलेंगे ॥ २१ ॥
भीम उवाच
अहं त्वानुगमिष्यामि धृष्टद्युम्नोऽथ सात्यकिः । पञ्चालाः केकया मत्स्यास्तथा सर्वे प्रभद्रकाः ॥ २२ ॥ भीमसेन बोले— बेटा! मैं तुम्हारे साथ चलूँगा। धृष्टद्युम्न, सात्यकि, पांचालदेशीय योद्धा, केकय-राजकुमार, मत्स्य देशके सैनिक तथा समस्त प्रभद्रकगण भी तुम्हारा अनुसरण करेंगे ॥ २२ ॥
सकृद् भिन्नं त्वया व्यूहं तत्र तत्र पुनः पुनः । वयं प्रध्वंसयिष्यामो निघ्नमाना वरान् वरान् ॥ २३ ॥ तुम जहाँ-जहाँ एक बार भी व्यूह तोड़ दोगे, वहाँ-वहाँ हमलोग मुख्य-मुख्य योद्धाओंका वध करके उस व्यूहको बारंबार नष्ट करते रहेंगे ॥ २३ ॥
अभिमन्युरुवाच
अहमेतत् प्रवेक्ष्यामि द्रोणानीकं दुरासदम् । पतङ्ग इव संक्रुद्धो ज्वलितं जातवेदसम् ॥ २४ ॥ अभिमन्युने कहा— जैसे पतंग जलती हुई आगमें कूद पड़ता है, उसी प्रकार मैं भी कुपित हो द्रोणाचार्यके दुर्गम सैन्य-व्यूहमें प्रवेश करूँगा ॥ २४ ॥
तत् कर्माद्य करिष्यामि हितं यद् वंशयोर्द्वयोः । मातुलस्य च यत् प्रीतिं करिष्यति पितुश्च मे ॥ २५ ॥ आज मैं वह पराक्रम करूँगा, जो पिता और माता दोनोंके कुलोंके लिये हितकर होगा तथा वह मामा श्रीकृष्ण तथा पिता अर्जुन दोनोंको प्रसन्न करेगा ॥ २५ ॥
शिशुनैकेन संग्रामे काल्यमानानि संघशः । द्रक्ष्यन्ति सर्वभूतानि द्विषत्सैन्यानि वै मया ॥ २६ ॥ यद्यपि मैं अभी बालक हूँ तो भी आज समस्त प्राणी देखेंगे कि मैंने अकेले ही समूह-के-समूह शत्रुसैनिकोंका युद्धमें संहार कर डाला है ॥ २६ ॥
नाहं पार्थेन जातः स्यां न च जातः सुभद्रया । यदि मे संयुगे कश्चिज्जीवितो नाद्य मुच्यते ॥ २७ ॥ यदि आज मेरे साथ युद्ध करके कोई भी सैनिक जीवित बच जाय तो मैं अर्जुनका पुत्र नहीं और सुभद्राकी कोखसे मेरा जन्म नहीं ॥ २७ ॥
यदि चैकरथेनाहं समग्रं क्षत्रमण्डलम् । न करोम्यष्टधा युद्धे न भवाम्यर्जुनात्मजः ॥ २८ ॥ यदि मैं युद्धमें एकमात्र रथकी सहायतासे सम्पूर्ण क्षत्रियमण्डलके आठ टुकड़े न कर दूँ तो अर्जुनका पुत्र नहीं ॥
युधिष्ठिर उवाच
एवं ते भाषमाणस्य बलं सौभद्र वर्धताम् ।
यत् समुत्सहसे भेत्तुं द्रोणानीकं दुरासदम् ॥ २९ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**सुभद्रानन्दन! ऐसी ओजस्वी बातें कहते हुए तुम्हारा बल निरन्तर बढ़ता रहे; क्योंकि तुम द्रोणाचार्यके दुर्गम सैन्यमें प्रवेश करनेका उत्साह रखते हो ॥ २९ ॥
रक्षितं पुरुषव्याघ्रैर्महेष्वासैर्महाबलैः ।
साध्यरुद्रमरुत्तुल्यैर्वस्वग्न्यादित्यविक्रमैः ॥ ३० ॥
द्रोणाचार्यकी सेना उन महाबली महाधनुर्धर पुरुषसिंह वीरों द्वारा सुरक्षित है, जो कि साध्य, रुद्र तथा मरुद्गणोंके समान बलवान् और वसु, अग्नि एवं सूर्यके समान पराक्रमी हैं ॥ ३० ॥
संजय उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा स यन्तारमचोदयत् ।
सुमित्राश्वांन् रणे क्षिप्रं द्रोणानीकाय चोदय ॥ ३१ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! महाराज युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर अभिमन्युने अपने सारथिको यह आज्ञा दी—‘सुमित्र! तुम शीघ्र ही घोड़ोंको रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर हाँक ले चलो ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि अभिमन्युप्रतिज्ञायां पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें अभिमन्युकी प्रतिज्ञाविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 293)
षट्त्रिंशोऽध्यायः
अभिमन्युका उत्साह तथा उसके द्वारा कौरवोंकी चतुरंगिणी सेनाका संहार
संजय उवाच
सौभद्रस्तद् वचः श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः ।
अचोदयत यन्तारं द्रोणानीकाय भारत ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**भारत! बुद्धिमान् युधिष्ठिरका पूर्वोक्त वचन सुनकर सुभद्रकुमार अभिमन्युने अपने सारथि-को द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर चलनेका आदेश दिया ॥ १ ॥
तेन संचोद्यमानस्तु याहि याहीति सारथिः ।
प्रत्युवाच ततो राजन्नभिमन्युमिदं वचः ॥ २ ॥
राजन्! ‘चलो, चलो’ ऐसा कहकर अभिमन्युके बारंबार प्रेरित करनेपर सारथिने उससे इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
अतिभारोऽयमायुष्मन्नाहितस्त्वयि पाण्डवैः ।
सम्प्रधार्य क्षणं बुद्ध्या ततस्त्वं योद्धुमर्हसि ॥ ३ ॥
‘आयुष्मन्! पाण्डवोंने आपके ऊपर यह बहुत बड़ा भार रख दिया है। पहले आप क्षणभर रुककर बुद्धिपूर्वक अपने कर्तव्यका निश्चय कर लीजिये। उसके बाद युद्ध कीजिये ॥ ३ ॥
आचार्यो हि कृती द्रोणः परमास्त्रे कृतश्रमः ।
अत्यन्तसुखसंवृद्धस्त्वं चायुद्धविशारदः ॥ ४ ॥
‘द्रोणाचार्य अस्त्रविद्याके विद्वान् हैं और उत्तम अस्त्रोंके अभ्यासके लिये उन्होंने विशेष परिश्रम किया है। इधर आप अत्यन्त सुख एवं लाड़-प्यारमें पले हैं। युद्धकी कलामें आप उनके-जैसे विज्ञ नहीं हैं’ ॥ ४ ॥
ततोऽभिमन्युः प्रहसन् सारथिं वाक्यमब्रवीत् । सारथे को न्वयं द्रोणः समग्रं क्षत्रमेव वा ।। ५ ।। ऐरावतगतं शक्रं सहामरगणैरहम् । अथवा रुद्रमीशानं सर्वभूतगणार्चितम् । योधयेयं रणमुखे न मे क्षत्रेऽद्य विस्मयः ।। ६ ।। तब अभिमन्युने हँसते-हँसते सारथिसे इस प्रकार कहा—‘सारथे! इन द्रोणाचार्य अथवा सम्पूर्ण क्षत्रिय-मण्डलकी तो बात ही क्या, मैं तो ऐरावत पर चढ़े हुए सम्पूर्ण देवगणों-सहित इन्द्रके अथवा समस्त प्राणियोंद्वारा पूजित एवं सबके ईश्वर रुद्रदेवके साथ भी सामने खड़ा होकर युद्ध कर सकता हूँ। अतः इस समय इस क्षत्रियसमूहके साथ युद्ध करनेमें मुझे आज कोई आश्चर्य नहीं हो रहा है ।। ५-६ ।। न ममैतद् द्विषत्सैन्यं कलामर्हति षोडशीम् । अपि विश्वजितं विष्णुं मातुलं प्राप्य सूतज ।। ७ ।। पितरं चार्जुनं युद्धे न भीर्मामुपयास्यति । ‘शत्रुओंकी यह सारी सेना मेरी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है। सूतनन्दन! विश्वविजयी विष्णुस्वरूप मामा श्रीकृष्णको तथा पिता अर्जुनको भी युद्धमें विपक्षीके रूपमें सामने पाकर मुझे भय नहीं होगा’ ।। ७ १/२ ।। अभिमन्युश्च तां वाचं कदर्थीकृत्य सारथेः ।। ८ ।। याहीत्येवाब्रवीदेनं द्रोणानीकाय मा चिरम् । अभिमन्युने सारथिके पूर्वोक्त कथनकी अवहेलना करके उससे यही कहा—‘तुम शीघ्र द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर चलो’ ।। ८ १/२ ।।
ततः संनोदयामास हयानाशु त्रिहायनान् ॥ ९ ॥
नातिहृष्टमनाः सूतो हेमभाण्डपरिच्छदान् ।
तब सारथिने सुवर्णमय आभूषणोंसे भूषित तथा तीन वर्षकी अवस्थावाले घोड़ोंको शीघ्र आगे बढ़ाया। उस समय उसका मन अधिक प्रसन्न नहीं था ॥ ९½ ॥
ते प्रेषिताः सुमित्रेण द्रोणानीकाय वाजिनः ॥ १० ॥
द्रोणमभ्यद्रवन् राजन् महावेगपराक्रमम् ।
राजन्! सारथि सुमित्रद्वारा द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर हाँके हुए वे घोड़े महान् वेगशाली और पराक्रमी द्रोणकी ओर दौड़े ॥ १०½ ॥
तमुदीक्ष्य तथाऽऽयान्तं सर्वे द्रोणपुरोगमाः ।
अभ्यवर्तन्त कौरव्याः पाण्डवाश्च तमन्वयुः ॥ ११ ॥
अभिमन्युको इस प्रकार आते देख द्रोणाचार्य आदि कौरव-वीर उनके सामने आकर खड़े हो गये और पाण्डव-योद्धा उनका अनुसरण करने लगे ॥ ११ ॥
स कर्णिकारप्रवरोच्छ्रितध्वजः
सुवर्णवर्माऽर्जुनिरर्जुनाद् वरः ।
युयुत्सया द्रोणमुखान् महारथान्
समासदत् सिंहशिशुर्यथा द्विपान् ॥ १२ ॥
अभिमन्युके ऊँचे एवं श्रेष्ठ ध्वजपर कर्णिकारका चिह्न बना हुआ था। उसने सुवर्णका कवच धारण कर रखा था। वह अर्जुनकुमार अपने पिता अर्जुनसे भी श्रेष्ठ वीर था। जैसे सिंहका बच्चा हाथियोंपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार अभिमन्युने युद्धकी इच्छासे द्रोण आदि महारथियोंपर धावा किया ॥ १२ ॥
ते विंशतिपदे यत्ताः सम्प्रहारं प्रचक्रिरे ।
आसीद् गाङ्ग इवावर्तो मुहूर्तमुदधाविव ॥ १३ ॥
अभिमन्यु बीस पग ही आगे बढ़े थे कि सामना करनेके लिये उद्यत हुए द्रोणाचार्य आदि योद्धा उनपर प्रहार करने लगे। उस समय उस सैन्यसागरमें अभिमन्युके प्रवेश करनेसे दो घड़ीतक सेनाकी वही दशा रही, जैसी कि समुद्रमें गङ्गाकी भँवरोंसे युक्त जलराशिके मिलनेसे होती है ॥ १३ ॥
शूराणां युध्यमानानां निघ्नतामितरेतरम् ।
संग्रामस्तुमुलो राजन् प्रावर्तत सुदारुणः ॥ १४ ॥
राजन्! युद्धमें तत्पर हो एक-दूसरेपर घातक प्रहार करते हुए उन शूरवीरोंमें अत्यन्त दारुण एवं भयंकर संघर्ष होने लगा ॥ १४ ॥
प्रवर्तमाने संग्रामे तस्मिन्नतिभयंकरे ।
द्रोणस्य मिषतो व्यूहं भित्त्वा प्राविशदार्जुनः ॥ १५ ॥
वह अति भयंकर संग्राम चल ही रहा था कि द्रोणाचार्यके देखते-देखते अर्जुनकुमार अभिमन्यु व्यूह तोड़कर भीतर घुस गया ।। १५ ।।
(तदभेद्यमनाधृष्यं द्रोणानीकं सुदुर्जयम् ।
भित्त्वाऽऽर्जुनिरसम्भ्रान्तो विवेशाचिन्त्यविक्रमः ॥)
अभिमन्युका पराक्रम अचिन्त्य था। उसने बिना किसी घबराहट के द्रोणाचार्यके अत्यन्त दुर्जय एवं दुर्धर्ष सैन्य-व्यूहको भंग करके उसके भीतर प्रवेश किया।
तं प्रविष्टं विनिघ्नन्तं शत्रुसंघान् महाबलम् ।
हस्त्यश्वरथपत्त्यौघाः परिवव्रुरुदायुधाः ॥ १६ ॥
व्यूहके भीतर घुसकर शत्रुसमूहोंका विनाश करते हुए महाबली अभिमन्युको हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये गजारोही, अश्वारोही, रथी और पैदल योद्धाओंके भिन्न-भिन्न दलोंने चारों ओरसे घेर लिया ।। १६ ।।
नानावादित्रनिनदैः क्ष्वेडितोत्कृष्टगर्जितैः ।
हुंकारैः सिंहनादैश्च तिष्ठ तिष्ठेति निःस्वनैः ॥ १७ ॥
घोरैर्हलहलाशब्दैर्मा गास्तिष्ठेहि मामिति ।
असावहममुत्रेति प्रवदन्तो मुहुर्मुहुः ॥ १८ ॥
बृंहितैः सिंजितैर्हासैः करनेमिस्वनैरपि ।
संनादयन्तो वसुधामभिदुद्रुवुरार्जुनम् ॥ १९ ॥
नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि, कोलाहल, ललकार, गर्जना, हुंकार, सिंहनाद, 'ठहरो, ठहरो' की आवाज और घोर हलहला शब्दके साथ 'न जाओ, खड़े रहो, मेरे पास आओ, तुम्हारा शत्रु मैं तो यहाँ हूँ' इत्यादि बातें बारंबार कहते हुए वीर सैनिक हाथियोंके चिग्घाड़, घुँघुरुओंकी रुनझुन, अट्टाहस, हाथोंकी तालीके शब्द तथा पहियोंकी घर्घराहटसे सारी वसुधाको गुँजाते हुए अर्जुनकुमारपर टूट पड़े ।। १७—१९ ।।
तेषामापततां वीरः शीघ्रयोधी महाबलः ।
क्षिप्राम्रो न्यवधीद् राजन् मर्मज्ञो मर्मभेदिभिः ॥ २० ॥
राजन्! महाबली वीर अभिमन्यु शीघ्रतापूर्वक युद्ध करनेमें कुशल, जल्दी-जल्दी अस्त्र चलानेवाला और शत्रुओंके मर्मस्थानोंको जाननेवाला था। वह अपनी ओर आते हुए शत्रु-सैनिकोंका मर्मभेदी बाणोंद्वारा वध करने लगा ।। २० ।।
ते हन्यमाना विवशा नानालिङ्गैः शितैः शरैः ।
अभिपेतूः सुबहुशः शलभा इव पावकम् ॥ २१ ॥
नाना प्रकारके चिह्नोंसे सुशोभित पैने बाणोंकी मार खाकर वे बहुसंख्यक कौरववीर विवश हो धरतीपर गिर पड़े, मानो ढेर-के-ढेर फतिंगे जलती आगमें पड़ गये हों ।। २१ ।।
ततस्तेषां शरीरैश्च शरीरावयवैश्च सः ।
संतस्तार क्षितिं क्षिप्रं कुशैर्वेदिमिवाध्वरे ॥ २२ ॥
जैसे यज्ञमें वेदीके ऊपर कुश बिछाये जाते हैं, उसी प्रकार अभिमन्युने तुरंत ही शत्रुओंके शरीरों तथा विभिन्न अवयवोंके द्वारा सारी रणभूमिको पाट दिया ॥ २२ ॥
बद्धगोधाङ्गुलित्राणान् सशरासनसायकान् ।
सासिचर्माङ्कुशाभीषून् सतोमरपरश्वधान् ॥ २३ ॥
सगदायोगुडप्रासान् सर्ष्टितोमरपट्टिशान् ।
सभिन्दिपालपरिघान् सशक्तिवरकम्पनान् ॥ २४ ॥
सप्रतोदमहाशङ्खान् सकुन्तान् सकचग्रहान् ।
समुद्गरक्षेपणीयान् सपाशपरिघोपलान् ॥ २५ ॥
सकेयूराङ्गदान् बाहून् हृद्यगन्धानुलेपनान् ।
संचिच्छेचार्जुनितूर्णं त्वदीयानां सहस्रशः ॥ २६ ॥
महाराज! अर्जुनकुमार अभिमन्युने आपके सहस्रों सैनिकोंकी उन भुजाओंको तुरंत काट डाला, जिनमें मनोहर सुगन्धयुक्त चन्दनका लेप लगा हुआ था। वीरोंकी उन भुजाओंमें गोहके चमड़ेसे बने हुए दस्ताने बँधे हुए थे। धनुष और बाण शोभा पाते थे। किन्हीं भुजाओंमें ढाल, तलवार, अंकुश और बागडोर दिखायी देती थीं। किन्हींमें तोमर और फरसे शोभा पाते थे। किन्हींमें गदा, लोहेकी गोलियाँ, प्रास, ऋष्टि, तोमर, पट्टिश, भिन्दिपाल, परिघ, श्रेष्ठ शक्ति, कम्पन, प्रतोद, महाशंख और कुन्त दृष्टिगोचर हो रहे थे। किन्हीं-किन्हीं भुजाओंने शत्रुओंकी चोटियाँ पकड़ रखी थीं। किन्हींमें मुद्गर फेंकनेयोग्य अन्यान्य अस्त्र, पाश, परिघ तथा प्रस्तरखण्ड दिखायी देते थे। वीरोंकी वे सभी भुजाएँ केयूर और अंगद आदि आभूषणोंसे विभूषित थीं ॥ २३—२६ ॥
तैः स्फुरद्भिर्महाराज शुशुभे भूः सुलोहितैः ।
पञ्चास्यैः पन्नगैश्छिन्नैर्गरुडेनेव मारिष ॥ २७ ॥
आदरणीय महाराज! खूनसे लथपथ होकर तड़पती हुई उन भुजाओंसे इस पृथ्वीकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे गरुड़के द्वारा छिन्न-भिन्न किये हुए पाँच मुखवाले सर्पोंके शरीरोंसे आच्छादित हुई वसुधा सुशोभित होती है ॥ २७ ॥
सुनासाननकेशान्तैरव्रणैश्चारुकुण्डलैः ।
संदष्टौष्ठपुटैः क्रोधात् क्षरद्भिः शोणितं बहु ॥ २८ ॥
स चारुमुकुटोष्णीषैर्मणिरत्नविभूषितैः ।
विनालनलिनाकारैर्दिवाकरशशिप्रभैः ॥ २९ ॥
हितप्रियंवदैः काले बहुभिः पुण्यगन्धिभिः ।
द्विषच्छिरोभिः पृथिवीं स वै तस्तार फाल्गुनिः ॥ ३० ॥
जिनमें सुन्दर नासिका, सुन्दर मुख और सुन्दर केशान्त भागकी अद्भुत शोभा हो रही थी, जिनमें फोड़े-फुंसी या घावके चिह्न नहीं थे, जो मनोहर कुण्डलोंसे प्रकाशित हो रहे थे, जिनके ओष्ठपुट क्रोधके कारण दाँतों तले दबे हुए थे, जो अधिकाधिक रक्तकी धारा बहा
अध्याय (पृष्ठ 298)
रहे थे, जिनके ऊपर मनोहर मुकुट और पगड़ीकी शोभा होती थी, जो मणिरत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थे, जिनकी प्रभा सूर्य और चन्द्रमाके समान जान पड़ती थी, जो बिना नालके प्रफुल्ल कमलके समान प्रतीत होते थे, जो समय-समयपर हित एवं प्रियकी बातें बताते थे, जिनकी संख्या बहुत अधिक थी तथा जो पवित्र सुगन्धसे सुवासित थे, शत्रुओंके उन मस्तकोंद्वारा अभिमन्युने वहाँकी सारी पृथ्वीको पाट दिया ।। २८—३० ।।
अभिमन्युके द्वारा कौरव-सेनाके प्रमुख वीरोंका संहार
गन्धर्वनगराकारान् विधिवत् कल्पितान् रथान् ।
वीषामुखान् द्वित्रिवेणून् न्यस्तदण्डकबन्धरान् ।। ३१ ।।
विजङ्घाकूबरांस्तत्र विनेमिदशनानपि ।
विचक्रोपस्करोपस्थान् भग्नोपकरणानपि ।। ३२ ।।
प्रपातितोपस्तरणान् हतयोधान् सहस्रशः ।
शरैर्विशकलीकुर्वन् दिक्षु सर्वासुअदृश्यत ।। ३३ ।।
इसी प्रकार अभिमन्यु अपने बाणोंसे शत्रुओंके गन्धर्वनगरके समान विशाल तथा विधिपूर्वक सुसज्जित बहुसंख्यक रथोंके टुकड़े-टुकड़े करता हुआ सम्पूर्ण दिशाओंमें दृष्टिगोचर हो रहा था। उन रथोंके प्रधान ईषादण्ड नष्ट हो गये थे। त्रिवेणु चूर-चूर हो गये थे। स्तम्भदण्ड उखड़ गये थे। उसके बन्धन टूट गये थे। जंघा (नीचेका स्थान) और कूबर (जूएका आधारभूत काष्ठ) टूट-फूट गये थे। पहियोंके ऊपरी भाग और अरे चौपट कर दिये गये थे। पहिये, रथकी सजावटके समान और बैठकें नष्ट-भ्रष्ट हो गयी थीं। सारी सामग्री तथा रथके अवयव चूर-चूर हो गये थे। रथकी छतरी और आवरणको गिरा दिया गया था तथा उन रथोंके समस्त योद्धा मार डाले गये थे। इस तरह सहस्रों रथोंकी धज्जियाँ उड़ गयी थीं ॥ ३१—३३ ॥
पुनर्द्विपान् द्विपारोहान् वैजयन्त्यङ्कुशध्वजान् ।
तूणान् वर्माण्यथो कक्ष्या ग्रैवेयांश्च सकम्बलान् ॥ ३४ ॥
घण्टाःशुण्डाविषाणाग्रान् छत्रमालाः पदानुगान् ।
शरैर्निशितधाराग्रैः शात्रवाणामशातयत् ॥ ३५ ॥
रथोंका संहार करके अभिमन्युने पुनः तीखी धारवाले बाणोंद्वारा शत्रुओंके हाथियों, गजारोहियों, उनके झंडों, अंकुशों, ध्वजाओं, तूणीरों, कवचों, रस्सों, कण्ठाभूषणों, झूलों, घंटों, सूँडों, दाँतों, छत्रों, मालाओं और पादरक्षकों को भी काट डाला ॥ ३४-३५ ॥
वनायुजान् पर्वतीयान् काम्बोजानथ बाह्लिकान् ।
स्थिरबालधिकर्णाक्षाञ्जवनान् साधुवाहिनः ॥ ३६ ॥
आरूढाञ्शिक्षितैर्योधैः शक्त्यृष्टिप्रासयोधिभिः ।
विध्वस्तचामरमुखान् विप्रविद्धप्रकीर्णकान् ॥ ३७ ॥
निरस्तजिह्वानयनान् निष्कीर्णान्त्रयकृद्घनान् ।
हतारोहांश्छिन्नघण्टान् क्रव्यादगणमोदकान् ॥ ३८ ॥
निकृत्तचर्मकवचान् शकृन्मूत्रासृगाप्लुतान् ।
निपातयन्नश्ववरांस्तावकान् स व्यरोचत ॥ ३९ ॥
एको विष्णु रिवाचिन्त्यं कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ।
राजन्! आपके वनायुज, पर्वतीय, काम्बोज तथा बाह्निक देशीय श्रेष्ठ घोड़ोंको, जो पूँछ, कान और नेत्रोंको निश्चल करके दौड़नेवाले, वेगवान् और अच्छी तरह सवारीका काम देनेवाले थे तथा जिनके ऊपर शक्ति, ऋष्टि एवं प्रासद्वारा युद्ध करनेवाले सुशिक्षित योद्धा सवार थे, धराशायी करता हुआ अकेला वीर अभिमन्यु एकमात्र भगवान् विष्णुकी भाँति अचिन्त्य एवं दुष्कर कर्म करके बड़ी शोभा पा रहा था। उन घोड़ोंके मस्तक और गर्दनके चँवरके समान बड़े-बड़े बाल और मुख बाणोंके आघातसे नष्ट हो गये थे। वे सब-के-सब घायल हो गये थे। कितने ही अश्वोंके सिर छिन्न-भिन्न होकर बिखर गये थे। कितनोंकी जिह्वा और नेत्र बाहर निकल आये थे। आँत और जिगरके टुकड़े-टुकड़े हो गये थे। उन सबके सवार मार डाले गये थे। उनके गलेके घुँघुरू कटकर गिर गये थे। वे घोड़े मृत्युके अधीन होकर मांसभक्षी प्राणियोंका हर्ष बढ़ा रहे थे। उनके चमड़े और कवच टूक-टूक हो गये थे और वे मल-मूत्र तथा रक्तमें डूबे हुए थे॥ ३६—३९ १/२॥
तथा निर्मथितं तेन त्र्यङ्गं तव बलं महत् ॥ ४० ॥
यथासुरबलं घोरं त्र्यम्बकेण महौजसा।
जैसे महान् तेजस्वी त्रिनेत्रधारी भगवान् रुद्रने असुरोंकी सेनाको मथ डाला था, उसी प्रकार अभिमन्युने रथ, हाथी और घोड़े—इन तीन अंगोंसे युक्त आपकी विशाल सेनाको रौंद डाला॥ ४० १/२॥
कृत्वा कर्म रणेऽसह्यं परैरार्जुनिराहवे ॥ ४१ ॥
अभिनच्च पदात्योघांस्त्वदीयानेव सर्वशः।
इस प्रकार अर्जुनकुमार अभिमन्युने रणक्षेत्रमें शत्रुओंके लिये असह्य पराक्रम करके आपके पैदल योद्धाओंके समूहोंका सभी प्रकारसे विनाश आरम्भ किया॥ ४१ १/२॥
एवमेकेन तां सेनां सौभद्रेण शितैः शरैः ॥ ४२ ॥
भृशं विप्रहतां दृष्ट्वा स्कन्देनेवासुरीं चमूम्।
त्वदीयास्तव पुत्राश्च वीक्षमाणा दिशो दश ॥ ४३ ॥
संशुष्कास्याश्चलन्नेत्राः प्रस्विन्ना रोमहर्षिणः।
पलायनकृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जये ॥ ४४ ॥
जैसे कार्तिकेयने असुरोंकी सेनाको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था, उसी प्रकार एकमात्र सुभद्राकुमार अभिमन्युने अपने तीखे बाणोंद्वारा समस्त कौरव-सेनाको अत्यन्त छिन्न-भिन्न कर डाला है; यह देखकर आपके पुत्र और सैनिक भयभीत हो दसों दिशाओंकी ओर देखने लगे। उनके मुख सूख गये थे, नेत्र चंचल हो उठे थे, सारे अंगोंमें पसीना हो आया था और उनके रोंगटे खड़े हो गये थे। अब वे भागनेमें उत्साह दिखाने लगे। शत्रुओंको जीतनेके लिये उनके मनमें तनिक भी उत्साह नहीं रह गया था॥ ४२—४४॥
गोत्रनामभिरन्योन्यं क्रन्दन्तो जीवितैषिणः।
हतान् पुत्रान् पितॄन् भ्रातॄन् बन्धून् सम्बन्धिनस्तथा ॥ ४५ ॥
प्रातिष्ठन्त समुत्सृज्य त्वरयन्तो हयद्विपान् ।। ४६ ।। वे जीवनकी इच्छा रखकर अपने-अपने सगे-सम्बन्धियोंके गोत्र और नामका उच्चारण करके एक-दूसरेके लिये क्रन्दन कर रहे थे। उस समय आपके सैनिक इतने डर गये थे कि वहाँ मारे गये अपने पुत्रों, पितृतुल्य सम्बन्धियों, भाई-बन्धुओं तथा नातेदारोंको भी छोड़कर अपने घोड़ों और हाथियोंको उतावलीके साथ हाँकते हुए रणभूमिसे पलायन कर गये ।। ४५-४६ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि अभिमन्युपराक्रमे षट्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें अभिमन्युका पराक्रमविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३६ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४७ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 302)
सप्तत्रिंशोऽध्यायः
अभिमन्युका पराक्रम, उसके द्वारा अश्मकपुत्रका वध, शल्यका मूर्च्छित होना और कौरव-सेनाका पलायन
संजय उवाच
तां प्रभग्नां चमूं दृष्ट्वा सौभद्रेणामितौजसा ।
दुर्योधनो भृशं क्रुद्धः स्वयं सौभद्रमभ्ययात् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! अमिततेजस्वी सुभद्राकुमार अभिमन्युने कौरव-सेनाको मार भगाया है, यह देखकर अत्यन्त क्रोधमें भरा हुआ दुर्योधन स्वयं सुभद्राकुमारका सामना करनेके लिये आया ॥ १ ॥
ततो राजानमावृत्तं सौभद्रं प्रति संयुगे ।
दृष्ट्वा द्रोणोऽब्रवीद् योधान् परीप्सध्वं नराधिपम् ॥ २ ॥
उस युद्धस्थलमें राजा दुर्योधनको अभिमन्युकी ओर लौटते देख द्रोणाचार्यने समस्त योद्धाओंसे कहा—‘वीरो! कौरव-नरेशकी सब ओरसे रक्षा करो ॥ २ ॥
पुराभिमन्युर्लक्ष्यं नः पश्यतां हन्ति वीर्यवान् ।
तमाद्रवत मा भैष्ट क्षिप्रं रक्षत कौरवम् ॥ ३ ॥
‘बलवान् अभिमन्यु हमारे देखते-देखते अपने लक्ष्यभूत राजा दुर्योधनको पहले ही मार डालेगा; अतः तुम सब लोग दौड़ो, भय न करो, शीघ्र ही कुरुवंशी दुर्योधनकी रक्षा करो’ ॥ ३ ॥
ततः कृतज्ञा बलिनः सुहृदो जितकाशिनः ।
त्रास्यमाना भयाद् वीरं परिवव्रुस्तवात्मजम् ॥ ४ ॥
महाराज! तदनन्तर अस्त्र-शिक्षामें निपुण, बलवान्, हितैषी और विजयशाली योद्धाओंने (रक्षाके लिये) आपके वीर पुत्रको चारों ओरसे घेर लिया; यद्यपि वे अभिमन्युके भयसे बहुत डरते थे ॥ ४ ॥
द्रोणो द्रौणिः कृपः कर्णः कृतवर्मा च सौबलः ।
बृहद्वलो मद्रराजो भूरिर्भूरिश्रवाः शलः ॥ ५ ॥
पौरवो वृषसेनश्च विसृजन्तः शिताञ्छरान् ।
सौभद्रं शरवर्षेण महता समवाकिरन् ॥ ६ ॥
द्रोण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कर्ण, कृतवर्मा, सुबलपुत्र शकुनि, बृहद्वल, मद्रराज शल्य, भूरि, भूरिश्रवा, शल, पौरव तथा वृषसेन—ये अभिमन्युपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगे। इन्होंने महान् बाण-वर्षाद्वारा अभिमन्युको आच्छादित कर दिया ॥ ५-६ ॥
सम्मोहयित्वा तमथ दुर्योधनममोचयन् । आस्याद् ग्रासमिवाक्षिप्तं ममृषे नार्जुनात्मजः ॥ ७ ॥ इस प्रकार उसे मोहित करके इन वीरोंने दुर्योधनको छुड़ा लिया। तब मानो मुँहसे ग्रास छिन गया हो, यह मानकर अर्जुनकुमार अभिमन्यु इसे सहन न कर सका ॥ ७ ॥ ताञ्छरौघेण महता साश्वसूतान् महारथान् । विमुखीकृत्य सौभद्रः सिंहनादमथानदत् ॥ ८ ॥ अतः अपनी भारी बाण-वर्षासे उन महारथियोंको उनके सारथि और घोड़ोंसहित युद्धसे विमुख करके सुभद्राकुमारने सिंहके समान गर्जना की ॥ ८ ॥ तस्य नादं ततः श्रुत्वा सिंहस्येवामिषैषिणः । नामृष्यन्त सुसंरब्धाः पुनद्रोणमुखा रथाः ॥ ९ ॥ मांस चाहनेवाले सिंहके समान अभिमन्युकी वह गर्जना सुनकर अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए द्रोण आदि महारथी न सह सके ॥ ९ ॥ त एनं कोष्ठकीकृत्य रथवंशेन मारिष । व्यसृजन्निषुजालानि नानालिङ्गानि सङ्घशः ॥ १० ॥ आर्य! तब उन महारथियोंने रथसेनाद्वारा उसे कोष्ठमें आबद्ध-सा करके उसके ऊपर नाना प्रकारके चिह्नवाले समूह-के-समूह बाण बरसाने आरम्भ किये ॥ १० ॥ तान्यन्तरिक्षे चिच्छेद पौत्रस्ते निशितैः शरैः । तांश्चैव प्रतिविव्याध तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ११ ॥ परंतु आपके उस वीर पौत्रने अपने पैने बाणोंद्वारा शत्रुओंके उन सायकसमूहोंको आकाशमें ही काट दिया और उन सभी महारथियोंको घायल भी कर डाला—यह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ ११ ॥ ततस्ते कोपितास्तेन शरैराशीविषोपमैः । परिवव्रुर्जिघांसन्तः सौभद्रमपराजितम् ॥ १२ ॥ तब अभिमन्युसे चिढ़े हुए उन योद्धाओंने विषधर सर्पके समान भयंकर बाणोंद्वारा किसीसे परास्त न होनेवाले सुभद्राकुमारको मार डालनेकी इच्छा रखकर उसे घेर लिया ॥ १२ ॥ समुद्रमिव पर्यस्तं त्वदीयं तं बलार्णवम् । दधारैकोऽर्जुनिर्बाणैर्वेलेव भरतर्षभ ॥ १३ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस समय जैसे सब ओरसे उछलते हुए समुद्रको तटभूमि रोक लेती है, उसी प्रकार आपके सैन्य-सागरको एकमात्र अर्जुनकुमारने आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ १३ ॥ शूराणां युध्यमानानां निघ्नतामितरेतरम् । अभिमन्योः परेषां च नासीत् कश्चित् पराङ्मुखः ॥ १४ ॥
उस समय एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए युद्धपरायण विपक्षी वीरों तथा अभिमन्युमें कोई भी युद्धसे विमुख नहीं हुआ ॥ १४ ॥
तस्मिंस्तु घोरे संग्रामे वर्तमाने भयंकरे ।
दुःसहो नवभिर्बाणैरभिमन्युमविध्यत ॥ १५ ॥
दुःशासनो द्वादशभिः कृपः शारद्वतस्त्रिभिः ।
द्रोणस्तु सप्तदशभिः शरैराशीविषोपमैः ॥ १६ ॥
इस प्रकार वह भयंकर एवं घोर संग्राम चल रहा था। उसमें आपके पुत्र दुःसहने नौ, दुःशासनने बारह, शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने तीन और द्रोणाचार्यने विषधर सर्पके समान भयंकर सत्रह बाणोंसे अभिमन्युको बींध डाला ॥
विविंशतिस्तु सप्तत्या कृतवर्मा च सप्तभिः ।
बृहद्बलस्तथाष्टाभिरश्वत्थामा च सप्तभिः ॥ १७ ॥
भूरिश्रवास्त्रिभिर्बाणैर्मद्रेशः षड्भिराशुगैः ।
द्वाभ्यां शराभ्यां शकुनिस्त्रिभिर्दुर्योधनो नृपः ॥ १८ ॥
इसी प्रकार विविंशतिने सत्तर, कृतवर्माने सात, बृहद्बलने आठ, अश्वत्थामाने सात, भूरिश्रवाने तीन, मद्रराज शल्यने छः, शकुनिने दो और राजा दुर्योधनने तीन बाणोंसे अभिमन्युको घायल कर दिया ॥ १७-१८ ॥
स तु तान् प्रतिविव्याध त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ।
नृत्यन्निव महाराज चापहस्तः प्रतापवान् ॥ १९ ॥
महाराज! उस समय धनुष हाथमें लिये प्रतापी अभिमन्युने जैसे नाच रहा हो, इस प्रकार सब ओर घूम-घूमकर उन सब महारथियोंको तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १९ ॥
ततोऽभिमन्युः संक्रुद्धस्त्रास्यमानस्तवात्मजैः ।
विदर्शयन् वै सुमहच्छिक्षौरसकृतं बलम् ॥ २० ॥
तब आपके सभी पुत्रोंने मिलकर अभिमन्युको त्रास देना आरम्भ किया, फिर तो वह क्रोधसे जल उठा और अपनी अस्त्र-शिक्षा तथा हृदयका महान् बल दिखाने लगा ॥
गरुडानिलरंहोभिर्यन्तुर्वाक्यकरैर्हयैः ।
दान्तैरश्मकदायादस्त्वरमाणो ह्यवारयत् ॥ २१ ॥
विव्याध दशभिर्बाणैस्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ।
इतनेमें ही अश्मकके पुत्रने सारथिके आदेशका पालन करनेवाले, गरुड और वायुके समान वेगशाली सुशिक्षित घोड़ोंद्वारा बड़ी तेजीसे वहाँ आकर अभिमन्युको रोका और दस बाण मारकर उसे घायल कर दिया, साथ ही इस प्रकार कहा—'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ २१ ½ ॥
तस्याभिमन्युर्दशभिर्हयान् सूतं ध्वजं शरैः ॥ २२ ॥
बाहु धनुः शिरश्चोर्व्यां स्मयमानोऽभ्यपातयत् ।
तब अभिमन्युने मुसकराकर अश्मकपुत्रके घोड़ों, सारथि, ध्वज, भुजाओं, धनुष तथा मस्तकको भी दस बाणोंसे पृथ्वीपर काट गिराया ।। २२ ½ ।।
ततस्तस्मिन् हते वीरे सौभद्रेणाश्मकेश्वरे ।। २३ ।।
संचचाल बलं सर्वं पलायनपरायणम् ।
सुभद्राकुमार अभिमन्युके द्वारा वीर अश्मक-राजकुमारके मारे जानेपर सारी सेना विचलित हो भागने लगी ।।
ततः कर्णः कृपो द्रोणो द्रौणिर्गान्धारराट्शलः ।। २४ ।।
शल्यो भूरिश्रवाः क्राथः सोमदत्तो विविंशतिः ।
वृषसेनः सुषेणश्च कुण्डभेदी प्रतर्दनः ।। २५ ।।
वृन्दारको ललित्थश्च प्रबाहुर्दीर्घलोचनः ।
दुर्योधनश्च संक्रुद्धः शरवर्षैरवाकिरन् ।। २६ ।।
तदनन्तर कर्ण, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, गान्धारराज शकुनि, शल, शल्य, भूरिश्रवा, क्राथ, सोमदत्त, विविंशति, वृषसेन, सुषेण, कुण्डभेदी, प्रतर्दन, वृन्दारक, ललित्थ, प्रबाहु, दीर्घलोचन तथा अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए दुर्योधनने अभिमन्युपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।।
सोऽतिविद्धो महेष्वासैरभिमन्युरजिह्मगैः ।
शरमादत्त कर्णाय वर्मकायावभेदिनम् ।। २७ ।।
इन महाधनुर्धर वीरोंके चलाये हुए बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर अभिमन्युने कर्णको लक्ष्य करके एक ऐसा बाण हाथमें लिया, जो उसके कवच और कायाको विदीर्ण कर डालनेवाला था ।। २७ ।।
तस्य भित्त्वा तनुत्राणं देहं निर्भिद्य चाशुगः ।
प्राविशद् धरणीं वेगाद् वल्मीकमिव पन्नगः ।। २८ ।।
जैसे सर्प बाँबीमें घुस जाता है, उसी प्रकार अभिमन्युका छोड़ा हुआ वह बाण कर्णके शरीर और कवचको विदीर्ण करके बड़े वेगसे धरतीमें समा गया ।। २८ ।।
स तेनातिप्रहारेण व्यथितो विह्वलन्निव ।
संचचाल रणे कर्णः क्षितिकम्पे यथाचलः ।। २९ ।।
जैसे भूकम्प होनेपर पर्वत भी हिलने लगता है, उसी प्रकार उस अत्यन्त गहरे आघातसे व्यथित एवं विह्वल-सा होकर कर्ण उस रणभूमिमें विचलित हो उठा ।। २९ ।।
तथान्यैर्निशितैर्बाणैः सुषेणं दीर्घलोचनम् ।
कुण्डभेदिं च संक्रुद्धस्त्रिभिस्त्रीनवधीद् बली ।। ३० ।।
फिर बलवान् अभिमन्युने अत्यन्त कुपित होकर दूसरे तीन पैने बाणोंद्वारा सुषेण, दीर्घलोचन तथा कुण्डभेदी—इन तीन वीरोंको घायल कर दिया ।। ३० ।।
कर्णस्तं पञ्चविंशत्या नाराचानां समर्पयत् ।
अश्वत्थामा च विंशत्या कृतवर्मा च सप्तभिः ॥ ३१ ॥
तब कर्णने पचीस, अश्वत्थामाने बीस तथा कृतवर्माने सात नाराचोंद्वारा अभिमन्युको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३१ ॥
स शराचितसर्वाङ्गः क्रुद्धः शक्रात्मजात्मजः ।
विचरन् ददृशे सैन्ये पाशहस्त इवान्तकः ॥ ३२ ॥
उस समय इन्द्रकुमार अर्जुनके पुत्र अभिमन्युके सम्पूर्ण अंगोंमें बाण-ही-बाण व्याप्त हो रहे थे, वह क्रोधमें भरे हुए पाशधारी यमराजके समान शत्रुसेनामें विचरता दिखायी देता था ॥ ३२ ॥
शल्यं च शरवर्षेण समीपस्थमवाकिरत् ।
उदक्रोशन्महाबाहुस्तव सैन्यानि भीषयन् ॥ ३३ ॥
राजा शल्य अभिमन्युके पास ही खड़े थे, अतः वह महाबाहु वीर उनपर बाणोंकी वर्षा करने लगा। उसने आपकी सेनाको भयभीत करते हुए बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ३३ ॥
ततः स विद्धोऽस्त्रविदा मर्मभिद्भिरजिह्मगैः ।
शल्यो राजन् रथोपस्थे निषसाद मुमोह च ॥ ३४ ॥
राजन्! अस्त्रवेत्ता अभिमन्युके चलाये हुए मर्मभेदी बाणोंद्वारा घायल होकर राजा शल्य रथकी बैठकमें धम्मसे बैठ गये और मूर्च्छित हो गये ॥ ३४ ॥
तं हि दृष्ट्वा तथा विद्धं सौभद्रेण यशस्विना ।
सम्प्राद्रवच्चमूः सर्वा भारद्वाजस्य पश्यतः ॥ ३५ ॥
यशस्वी सुभद्राकुमारके द्वारा घायल किये हुए शल्यको इस प्रकार भय हुआ देख द्रोणाचार्यके देखते-देखते उनकी सारी सेना रणभूमिसे भाग चली ॥ ३५ ॥
सम्प्रेक्ष्य तं महाबाहुं रुक्मपुङ्खैः समावृतम् ।
त्वदीयाः प्रपलायन्ते मृगाः सिंहार्दिता इव ॥ ३६ ॥
महाबाहु शल्यको अभिमन्युके सुवर्णमय पंखवाले बाणोंसे व्याप्त हुआ देख आपके सभी सैनिक सिंहके सताये हुए मृगोंकी भाँति जोर-जोरसे भागने लगे ॥ ३६ ॥
स तु रणयशसाभिपूज्यमानः
पितृसुरचारणसिद्धयक्षसंघैः ।
अवनितलगतैश्च भूतसङ्घै-
रतिविबभौ हुतभुग्यथाऽऽज्यसिक्तः ॥ ३७ ॥
देवताओं, पितरों, चारणों, सिद्धों तथा यक्षसमूहों एवं भूतलवर्ती भूतसमुदायोंसे प्रशंसित होकर युद्धविषयक सुयशसे प्रकाशित होनेवाला अभिमन्यु घृतकी धारासे अभिषिक्त हुए अग्निदेवके समान अत्यन्त शोभा पाने लगा ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि अभिमन्युपराक्रमे
सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें अभिमन्युपराक्रमविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥