महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
कर्ण और युधिष्ठिरका संग्राम, कर्णकी मूर्च्छा, कर्णद्वारा युधिष्ठिरकी पराजय और तिरस्कार तथा पाण्डवोंके हजारों योद्धाओंका वध और रक्त-नदीका वर्णन तथा पाण
एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
कर्ण और युधिष्ठिरका संग्राम, कर्णकी मूर्च्छा, कर्णद्वारा युधिष्ठिरकी पराजय और तिरस्कार तथा पाण्डवोंके हजारों योद्धाओंका वध और रक्त-नदीका वर्णन तथा पाण्डव महारथियोंद्वारा कौरव-सेनाका विध्वंस और उसका पलायन
संजय उवाच
विदार्य कर्णस्तां सेनां युधिष्ठिरमथाद्रवत् ।
रथहस्त्यश्वपत्तीनां सहस्रैः परिवारितः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! सहस्रों रथ, हाथी, घोड़े और पैदलोंसे घिरे हुए कर्णने उस सेनाको विदीर्ण करके युधिष्ठिरपर धावा किया ॥ १ ॥
नानायुधसहस्राणि प्रेरितान्यरिभिर्वृषः ।
छित्त्वा बाणशतैरुग्रैस्तानविध्यदसम्भ्रमात् ॥ २ ॥
धर्मात्मा कर्णने शत्रुओंके चलाये हुए नाना प्रकारके हजारों अस्त्र-शस्त्रोंको काटकर उन सबको सैकड़ों उग्र बाणोंद्वारा बिना किसी घबराहटके बींध डाला ॥ २ ॥
निचकर्त शिरांस्येषां बाहूनूरूंश्च सूतजः ।
ते हता वसुधां पेतुर्भग्नाश्चान्ये विदुद्रुवुः ॥ ३ ॥
सूतपुत्रने पाण्डव-सैनिकोंके मस्तकों, भुजाओं और जाँघोंको काट डाला। वे मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े और दूसरे बहुत-से योद्धा घायल होकर भाग गये ॥ ३ ॥
द्राविडास्तु निषादास्तु पुनः सात्यकिचोदिताः ।
अभ्यद्रवञ्जिघांसन्तः पत्तयः कर्णमाहवे ॥ ४ ॥
तब सात्यकिसे प्रेरित होकर द्रविड और निषाद देशोंके पैदल सैनिक कर्णको युद्धमें मार डालनेकी इच्छासे पुनः उसपर टूट पड़े ॥ ४ ॥
ते विबाहुशिरस्त्राणाः प्रहताः कर्णसायकैः ।
पेतुः पृथिव्यां युगपच्छिन्नं शालवनं यथा ॥ ५ ॥
परंतु कर्णके बाणोंसे घायल होकर बाहु, मस्तक और कवच आदिसे रहित हो वे कटे हुए शालवनके समान एक साथ ही पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ५ ॥
एवं योधशतान्याजौ सहस्राण्ययुतानि च ।
हतानीयुर्महीं देहैर्यशसा पूरयन् दिशः ॥ ६ ॥
इस प्रकार युद्धस्थलमें मारे गये सैकड़ों, हजार और दस हजार योद्धा शरीरसे तो इस पृथ्वीपर गिर पड़े, किंतु अपने यशसे उन्होंने सम्पूर्ण दिशाओंको पूर्ण कर दिया ।।
अथ वैकर्तनं कर्णं रणे क्रुद्धमिवान्तकम् ।
रुरुधुः पाण्डुपाञ्चाला व्याधिं मन्त्रौषधैरिव ।। ७ ।।
तदनन्तर रणक्षेत्रमें कुपित हुए यमराजके समान वैकर्तन कर्णको पाण्डवों और पांचालोंने अपने बाणोंद्वारा उसी प्रकार रोक दिया, जैसे चिकित्सक मन्त्रों और औषधोंसे रोगोंकी रोकथाम कर लेते हैं ।। ७ ।।
स तान् प्रमृद्याभ्यपतत् पुनरेव युधिष्ठिरम् ।
मन्त्रौषधिक्रियातीतो व्याधिरत्युल्बणो यथा ।। ८ ।।
परंतु मन्त्र और ओषधियोंकी क्रियासे असाध्य भयानक रोगकी भाँति कर्णने उन सबको रौंदकर पुनः युधिष्ठिरपर ही आक्रमण किया ।। ८ ।।
स राजगृद्धिभी रुद्धः पाण्डुपाञ्चालकेकयैः ।
नाशकत् तानतिक्रान्तुं मृत्युर्ब्रह्मविदो यथा ।। ९ ।।
राजाकी रक्षा चाहनेवाले पाण्डवों, पांचालों और केकयोंने पुनः कर्णको रोक दिया। जैसे मृत्यु ब्रह्मवेत्ताओंको नहीं लाँघ सकती, उसी प्रकार कर्ण उन सबको लाँघकर आगे न बढ़ सका ।। ९ ।।
ततो युधिष्ठिरः कर्णमदूरस्थं निवारितम् ।
अब्रवीत् परवीरघ्नं क्रोधसंरक्तलोचनः ।। १० ।।
उस समय युधिष्ठिरने क्रोधसे लाल आँखें करके शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कर्णसे जो पास ही रोक दिया गया था, इस प्रकार कहा— ।। १० ।।
कर्ण कर्ण वृथादृष्टे सूतपुत्र वचः शृणु ।
सदा स्पर्धसि संग्रामे फाल्गुनेन तरस्विना ।। ११ ।।
तथास्मान् बाधसे नित्यं धार्तराष्ट्रमते स्थितः ।
‘कर्ण! कर्ण! मिथ्यादर्शी सूतपुत्र! मेरी बात सुनो। तुम संग्राममें वेगशाली वीर अर्जुनके साथ सदा डाह रखते और दुर्योधनके मतमें रहकर सर्वदा हमें बाधा पहुँचाते हो ।। ११ १/२ ।।
यद् बलं यच्च ते वीर्यं प्रद्वेषो यस्तु पाण्डुषु ।। १२ ।।
तत् सर्वं दर्शयस्वाद्य पौरुषं महदास्थितः ।
युद्धश्रद्धां च तेऽद्याहं विनेष्यामि महाहवे ।। १३ ।।
‘परंतु आज तुम्हारे पास जितना बल हो, जो पराक्रम हो तथा पाण्डवोंके प्रति तुम्हारे मनमें जो विद्वेष हो, वह सब महान् पुरुषार्थका आश्रय लेकर दिखाओ। आज महासमरमें मैं तुम्हारा युद्धका हौसला मिटा दूँगा’ ।। १२-१३ ।।
एवमुक्त्वा महाराज कर्णं पाण्डुसुतस्तदा ।
सुवर्णपुङ्खैर्दशभिर्विद्ध्वाधायस्मयैः शरैः ।। १४ ।।
महाराज! ऐसा कहकर पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने लोहेके बने हुए सुवर्णपंखयुक्त दस बाणोंद्वारा कर्णको बींध डाला ॥ तं सूतपुत्रो दशभिः प्रत्यविध्यदरिंदमः । वत्सदन्तैर्महेष्वासः प्रहसन्निव भारत ॥ १५ ॥ भारत! तब शत्रुओंका दमन करनेवाले महाधनुर्धर सूतपुत्रने हँसते हुए-से वत्सदन्त नामक दस बाणोंद्वारा युधिष्ठिरको घायल कर दिया ॥ १५ ॥ सोऽवज्ञाय तु निर्विद्धः सूतपुत्रेण मारिष । प्रजज्वाल ततः क्रोधाद्धविषेव हुताशनः ॥ १६ ॥ माननीय नरेश! सूतपुत्रके द्वारा अवज्ञापूर्वक घायल किये जानेपर फिर राजा युधिष्ठिर घीकी आहुतिसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान क्रोधसे जल उठे ॥ १६ ॥ ज्वालामालापरिक्षिप्तो राज्ञो देहो व्यदृश्यत । युगान्ते दग्धुकामस्य संवर्ताग्नेरिवापरः ॥ १७ ॥ ज्वालामालाओंसे घिरा हुआ युधिष्ठिरका शरीर प्रलयकालमें जगत्को दग्ध करनेकी इच्छावाले द्वितीय संवर्तक अग्निके समान दिखायी देता था ॥ १७ ॥ ततो विस्फार्य सुमहच्चापं हेमपरिष्कृतम् । समाधत्त शितं बाणं गिरीणामपि दारणम् ॥ १८ ॥ तदनन्तर उन्होंने अपने सुवर्णभूषित विशाल धनुषको फैलाकर उसपर पर्वतोंको भी विदीर्ण कर देनेवाले तीखे बाणका संधान किया ॥ १८ ॥ ततः पूर्णायतोत्कृष्टं यमदण्डनिभं शरम् । मुमोच त्वरितो राजा सूतपुत्रजिघांसया ॥ १९ ॥ तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने सूतपुत्रको मार डालनेकी इच्छासे तुरंत ही धनुषको पूर्णरूपसे खींचकर वह यमदण्डके समान बाण उसके ऊपर छोड़ दिया ॥ १९ ॥ स तु वेगवता मुक्तो बाणो वज्राशनिस्वनः । विवेश सहसा कर्णं सव्ये पार्श्वे महारथम् ॥ २० ॥ वेगवान् युधिष्ठिरका छोड़ा हुआ वज्र और बिजलीके समान शब्द करनेवाला वह बाण सहसा महारथी कर्णकी बायीं पसलीमें घुस गया ॥ २० ॥ स तु तेन प्रहारेण पीडितः प्रमुमोह वै । स्रस्तगात्रो महाबाहुर्धनुरुत्सृज्य स्यन्दने ॥ २१ ॥ उस प्रहारसे पीड़ित हो महाबाहु कर्ण धनुष छोड़कर रथपर ही मूर्च्छित हो गया। उसका सारा शरीर शिथिल हो गया था ॥ २१ ॥ गतासुरिव निश्चेष्टः शल्यस्याभिमुखोऽपतत् । राजापि भूयो नाजघ्ने कर्णं पार्थहितेप्सया ॥ २२ ॥
वह शल्यके सामने ही अचेत होकर ऐसे गिर पड़ा, मानो उसके प्राण निकल गये हों। राजा युधिष्ठिरने अर्जुनके हितकी इच्छासे कर्णपर पुनः प्रहार नहीं किया ॥ २२ ॥
ततो हाहाकृतं सर्वं धार्तराष्ट्रबलं महत् ।
विवर्णमुखभूयिष्ठं कर्णं दृष्ट्वा तथागतम् ॥ २३ ॥
तब कर्णको उस अवस्थामें देखकर दुर्योधनकी सारी विशाल सेनामें हाहाकार मच गया और अधिकांश सैनिकोंके मुखका रंग विषादसे फीका पड़ गया ॥ २३ ॥
सिंहनादश्च संजज्ञे क्ष्वेलाः किलकिलास्तथा ।
पाण्डवानां महाराज दृष्ट्वा राज्ञः पराक्रमम् ॥ २४ ॥
महाराज! राजाका वह पराक्रम देखकर पाण्डव-सैनिकोंमें सिंहनाद, आनन्द, कलरव और किलकिल शब्द होने लगा ॥ २४ ॥
प्रतिलभ्य तु राधेयः संज्ञां नातिचिरादिव ।
दध्रे राजविनाशाय मनः क्रूरपराक्रमः ॥ २५ ॥
तब क्रूर पराक्रमी राधापुत्र कर्णने थोड़ी ही देरमें होशमें आकर राजा युधिष्ठिरको मार डालनेका विचार किया ॥ २५ ॥
स हेमविकृतं चापं विस्फार्य विजयं महत् ।
अवाकिरदमेयात्मा पाण्डवं निशितैः शरैः ॥ २६ ॥
उस अमेय आत्मबलसे सम्पन्न वीरने विजय नामक अपने विशाल सुवर्णजटित धनुषको खींचकर पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको पैने बाणोंसे ढक दिया ॥ २६ ॥
ततः क्षुराभ्यां पाञ्चाल्यौ चक्ररक्षौ महात्मनः ।
जघान चन्द्रदेवं च दण्डधारं च संयुगे ॥ २७ ॥
तत्पश्चात् दो क्षुरोंसे महात्मा युधिष्ठिरके चक्ररक्षक दो पांचाल वीर चन्द्रदेव और दण्डधारको युद्धस्थलमें मार डाला ॥ २७ ॥
तावुभौ धर्मराजस्य प्रवीरौ परिपार्श्वतः ।
रथाभ्याशे चकाशेते चन्द्रस्येव पुनर्वसू ॥ २८ ॥
धर्मराजके रथके समीप पार्श्वभागमें वे दोनों प्रमुख पांचाल वीर चन्द्रमाके पास रहनेवाले दो पुनर्वसु नामक नक्षत्रोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २८ ॥
युधिष्ठिरः पुनः कर्णमविध्यत् त्रिंशता शरैः ।
सुषेणं सत्यसेनं च त्रिभिस्त्रिभिरताडयत् ॥ २९ ॥
युधिष्ठिरने पुनः तीस बाणोंसे कर्णको बींध डाला तथा सुषेण और सत्यसेनको भी तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २९ ॥
शल्यं नवत्या विव्याध त्रिसप्तत्या च सूतजम् ।
तांस्तस्य गोप्तॄन् विव्याध त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ॥ ३० ॥
उन्होंने शल्यको नब्बे और सूतपुत्र कर्णको तिहत्तर बाण मारे। साथ ही उनके रक्षकोंको सीधे जानेवाले तीन-तीन बाणोंसे बेध दिया ।। ३० ।।
ततः प्रहस्याधिरथिर्विधुन्वानः स कार्मुकम् ।
भित्त्वा भल्लेन राजानं विद्ध्वा षष्ट्यानदत्तदा ।। ३१ ।।
तब अधिरथपुत्र कर्णने अपने धनुषको हिलाते हुए हँसकर एक भल्लद्वारा राजा युधिष्ठिरके धनुषको काट दिया और उन्हें भी साठ बाणोंसे घायल करके सिंहके समान गर्जना की ।। ३१ ।।
ततः प्रवीराः पाण्डूनामभ्यधावन्नमर्षिताः ।
युधिष्ठिरं परीप्सन्तः कर्णमभ्यर्दयञ्छरैः ।। ३२ ।।
तदनन्तर अमर्षमें भरे हुए प्रमुख पाण्डव वीर युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये दौड़े आये और कर्णको अपने बाणोंसे पीड़ित करने लगे ।। ३२ ।।
सात्यकिश्चेकितानश्च युयुत्सुः पाण्ड्य एव च ।
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः ।। ३३ ।।
यमौ च भीमसेनश्च शिशुपालस्य चात्मजः ।
कारूषा मत्स्यशेषाश्च केकयाः काशिकोसलाः ।। ३४ ।।
एते च त्वरिता वीरा वसुषेणमताडयन् ।
सात्यकि, चेकितान, युयुत्सु, पाण्ड्य, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, प्रभद्रकगण, नकुल-सहदेव, भीमसेन और शिशुपालपुत्र एवं करूष, मत्स्य, केकय, काशि और कोसल-देशोंके योद्धा—ये सभी वीर सैनिक तुरंत ही वसुषेण (कर्ण)-को घायल करने लगे ।। ३३-३४ ½ ।।
जनमेजयश्च पाञ्चाल्यः कर्णं विव्याध सायकैः ।। ३५ ।।
वाराहकर्णनाराचैर्नालीकैर्निशितैः शरैः ।
वत्सदन्तैर्विपाठैश्च क्षुरप्रैश्चटकामुखैः ।। ३६ ।।
नानाप्रहरणैश्चोग्रै रथहस्त्यश्वसादिभिः ।
सर्वतोऽभ्यद्रवत् कर्णं परिवार्य जिघांसया ।। ३७ ।।
पांचालवीर जनमेजयने रथ, हाथी और घुड़सवारोंकी सेना साथ लेकर सब ओरसे कर्णपर धावा किया और उसे मार डालनेकी इच्छासे घेरकर बाण, वाराहकर्ण, नाराच, नालीक, पैने बाण, वत्सदन्त, विपाठ, क्षुरप्र, चटकामुख तथा नाना प्रकारके भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा चोट पहुँचाना आरम्भ किया ।। ३५—३७ ।।
स पाण्डवानां प्रवरैः सर्वतः समभिद्रुतः ।
उदीरयन् ब्राह्ममस्त्रं शरैरापूरयद् दिशः ।। ३८ ।।
पाण्डवपक्षके प्रमुख वीरोंद्वारा सब ओरसे आक्रान्त होनेपर कर्णने ब्रह्मास्त्र प्रकट करके बाणोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित कर दिया ।। ३८ ।।
(ततः पुनरमेयात्मा चेदीनां प्रवरान् दश । न्यहनद् भरतश्रेष्ठ कर्णो वैकर्तनस्तदा ॥ भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर अप्रमेय आत्मबलसे सम्पन्न वैकर्तन कर्णने चेदिदेशके दस प्रधान वीरोंको पुनः मार डाला। तस्य बाणसहस्राणि सम्प्रपन्नानि मारिष । दृश्यन्ते दिक्षु सर्वासु शलभानामिव व्रजाः ॥ माननीय नरेश! कर्णके गिरते हुए सहस्रों बाण सम्पूर्ण दिशाओंमें टिड्डीदलोंके समान दिखायी देते थे। कर्णनामाङ्किता बाणाः स्वर्णपुङ्खाः सुतेजनाः । नराश्वकायान् निर्भिद्य पेतुरुर्व्यां समन्ततः ॥ उसके नामसे अंकित सुवर्णमय पंखवाले तेज बाण मनुष्यों और घोड़ोंके शरीरोंको विदीर्ण करके सब ओरसे पृथ्वीपर गिरने लगे। कर्णेनैकेन समरे चेदीनां प्रवरा रथाः । संजयानां च सर्वेषां शतशो निहता रणे ॥ समरांगणमें अकेले कर्णने चेदिदेशके प्रधान रथियोंका तथा सम्पूर्ण सृंजयोंके सैकड़ों योद्धाओंका भी संहार कर डाला। कर्णस्य शरसंछन्नं बभूव विपुलं तमः । नाज्ञायत ततः किञ्चित् परेषामात्मनोऽपि वा ॥ कर्णके बाणोंसे सारी दिशाएँ ढक जानेके कारण वहाँ महान् अन्धकार छा गया। उस समय शत्रुपक्षकी तथा अपने पक्षकी भी कोई वस्तु पहचानी नहीं जाती थी। तस्मिंस्तमसि भूते च क्षत्रियाणां भयंकरे । विचचार महाबाहुर्निर्दहन् क्षत्रियान् बहून् ॥) शत्रुओंके लिये भयदायक उस घोर अन्धकारमें महाबाहु कर्ण बहुसंख्यक राजपूतोंको दग्ध करता हुआ विचरने लगा। ततः शरमहाज्वालो वीर्योष्मा कर्णपावकः । निर्दहन् पाण्डववनं वीरः पर्यचरद् रणे ॥ ३९ ॥ उस समय वीर कर्ण अग्निके समान हो रहा था। बाण ही उसकी ऊँचेतक उठती हुई ज्वालाओंके समान थे, पराक्रम ही उसका ताप था और वह पाण्डवरूपी वनको दग्ध करता हुआ रणभूमिमें विचर रहा था ।। ३९ ।। (ततस्तेषां महाराज पाण्डवानां महारथाः । सृञ्जयानां च सर्वेषां शतशोऽथ सहस्रशः ॥ अस्त्रैः कर्णं महेष्वासं समन्तात् पर्यवारयन् ।)
महाराज! तब सम्पूर्ण संजयों और पाण्डवोंके सैकड़ों-हजारों महारथियोंने महाधनुर्धर कर्णपर बाणोंकी वर्षा करते हुए उसे चारों ओरसे घेर लिया।
स संधाय महास्त्राणि महेष्वासा महामनाः ।
प्रहस्य पुरुषेन्द्रस्य शरैश्चिच्छेद कार्मुकम् ॥ ४० ॥
महाधनुर्धर महामना कर्णने हँसकर महान् अस्त्रोंका संधान किया और अपने बाणोंसे महाराज युधिष्ठिरका धनुष काट दिया ॥ ४० ॥
ततः संधाय नवतिं निमेषान्तरपर्वणाम् ।
बिभेद कवचं राज्ञो रणे कर्णः शितैः शरैः ॥ ४१ ॥
तत्पश्चात् पलक मारते-मारते झुकी हुई गाँठवाले नब्बे बाणोंका संधान करके कर्णने उन पैने बाणोंद्वारा रणभूमिमें राजा युधिष्ठिरके कवचको छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ ४१ ॥
तद् वर्म हेमविकृतं रत्नचित्रं बभौ पतत् ।
सविद्युदभ्रं सवितुः श्लिष्टं वातहतं यथा ॥ ४२ ॥
उनका वह सुवर्णभूषित रत्नजटित कवच गिरते समय ऐसी शोभा पा रहा था, मानो सूर्यसे सटा हुआ बिजलीसहित बादल वायुका आघात पाकर नीचे गिर रहा हो ॥ ४२ ॥
तदङ्गात् पुरुषेन्द्रस्य भ्रष्टं वर्म व्यरोचत ।
रत्नैरलंकृतं चित्रैर्व्यभ्रं निशि यथा नभः ॥ ४३ ॥
छिन्नवर्मा शरैः पार्थो रुधिरेण समुक्षितः ।
जैसे रात्रिमें बिना बादलका आकाश नक्षत्रमण्डलसे विचित्र शोभा धारण करता है, उसी प्रकार नरेन्द्र युधिष्ठिरके शरीरसे गिरा हुआ वह कवच विभिन्न रत्नोंसे अलंकृत होनेके कारण अद्भुत शोभा पा रहा था। बाणोंसे कवच कट जानेपर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर रक्तसे भीग गये ॥ ४३ ½ ॥
(बभासे पुरुषश्रेष्ठ उद्यन्निव दिवाकरः ।
स शराचितसर्वाङ्गश्छिन्नवर्माथ संयुगे ॥
क्षत्रधर्मं समास्थाय सिंहनादमकुर्वत ।)
उस समय युद्धस्थलमें पुरुषश्रेष्ठ युधिष्ठिर उगते हुए सूर्यके समान लाल दिखायी देते थे। उनके सारे अंगोंमें बाण धँसे हुए थे और कवच छिन्न-भिन्न हो गया था, तो भी वे क्षत्रिय-धर्मका आश्रय लेकर वहाँ सिंहके समान दहाड़ रहे थे।
ततः सर्वायसीं शक्तिं चिक्षेपाधिरथिं प्रति ॥ ४४ ॥
तां ज्वलन्तीमिवाकाशे शरैश्चिच्छेद सप्तभिः ।
सा छिन्ना भूमिमगमन्महेष्वासस्य सायकैः ॥ ४५ ॥
उन्होंने अधिरथपुत्र कर्णपर सम्पूर्णतः लोहेकी बनी हुई शक्ति चलायी, परंतु उसने सात बाणोंद्वारा उस प्रज्वलित शक्तिको आकाशमें ही काट डाला। महाधनुर्धर कर्णके सायकोंसे कटी हुई वह शक्ति पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ४४-४५ ॥
ततो बाह्वोर्ललाटे च हृदि चैव युधिष्ठिरः । चतुर्भिस्तोमरैः कर्णं ताडयित्वानदन्मुदा ॥ ४६ ॥ तत्पश्चात् युधिष्ठिरने कर्णकी दोनों भुजाओं, ललाट और छातीमें चार तोमरोंका प्रहार करके सानन्द सिंहनाद किया ॥ ४६ ॥ उद्भिन््नरुधिरः कर्णः क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् । ध्वजं चिच्छेद भल्लेन त्रिभिर्विव्याध पाण्डवम् ॥ ४७ ॥ इषुधी चास्य चिच्छेद रथं च तिलशोऽच्छिनत् । कर्णके शरीरसे रक्त बहने लगा। फिर तो क्रोधमें भरे हुए सर्पके समान फुफकारते हुए कर्णने एक भल्लसे युधिष्ठिरकी ध्वजा काट डाली और तीन बाणोंसे उन पाण्डुपुत्रको भी घायल कर दिया। उनके दोनों तरकस काट दिये और रथके भी तिल-तिल करके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ४७ १/२ ॥ (एतस्मिन्नन्तरे शूराः पाण्डवानां महारथाः । ववृषुः शरवर्षाणि राधेयं प्रति भारत ॥ भारत! इसी बीचमें शूरवीर पाण्डव महारथी राधापुत्र कर्णपर बाणोंकी वर्षा करने लगे। सात्यकिः पञ्चविंशत्या शिखण्डी नवभिः शरैः । अवर्षतां महाराज राधेयं शत्रुकर्शनम् ॥ महाराज! सात्यकिने शत्रुसूदन राधापुत्रपर पचीस और शिखण्डीने नौ बाणोंकी वर्षा की। शैनेयं तु ततः क्रुद्धः कर्णः पञ्चभिरायसैः । विव्याध समरे राजंस्त्रिभिश्चान्यैः शिलीमुखैः ॥ राजन्! तब क्रोधमें भरे हुए कर्णने समरांगणमें सात्यकिको पहले लोहेके बने हुए पाँच बाणोंसे घायल करके फिर दूसरे तीन बाणोंद्वारा उन्हें बींध डाला। दक्षिणं तु भुजं तस्य त्रिभिः कर्णोऽप्यविध्यत । सव्यं षोडशभिर्बाणैर्यन्तारं चास्य सप्तभिः ॥ इसके बाद कर्णने सात्यकिकी दाहिनी भुजाको तीन, बायीं भुजाको सोलह और सारथिको सात बाणोंसे क्षत-विक्षत कर दिया। अथास्य चतुरो वाहांश्चतुर्भिर्निशितैः शरैः । सूतपुत्रोऽनयत् क्षिप्रं यमस्य सदनं प्रति ॥ तदनन्तर चार पैने बाणोंसे सूतपुत्रने सात्यकिके चारों घोड़ोंको भी तुरंत ही यमलोक पहुँचा दिया। अपरेणाथ भल्लेन धनुश्छित्त्वा महारथः । सारथेः सशिरस्त्राणं शिरः कायादपाहरत् ॥
फिर दूसरे भल्लसे महारथी कर्णने उनका धनुष काटकर उनके सारथिके
शिरस्त्राणसहित मस्तकको शरीरसे अलग कर दिया।
हताश्वसूते तु रथे स्थितः स शिनिपुङ्गवः ।
शक्तिं चिक्षेप कर्णाय वैडूर्यमणिभूषिताम् ॥
जिसके घोड़े और सारथि मारे गये थे, उसी रथपर खड़े हुए शिनिप्रवर सात्यकिने
कर्णके ऊपर वैदूर्यमणिसे विभूषित शक्ति चलायी।
तामापतन्तीं सहसा द्विधा चिच्छेद भारत ।
कर्णो वै धन्विनां श्रेष्ठस्तांश्च सर्वानवारयत् ॥
ततस्तान् निशितैर्बाणैः पाण्डवानां महारथान् ।
न्यवारयदमेयात्मा शिक्षया च बलेन च ॥
भारत! धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ कर्णने अपने ऊपर आती हुई उस शक्तिके सहसा दो टुकड़े कर
डाले और उन सब महारथियोंको आगे बढ़नेसे रोक दिया, फिर अमेय आत्मबलसे सम्पन्न
कर्णने अपनी शिक्षा और बलके प्रभावसे तीखे बाणोंद्वारा उन सभी पाण्डव-महारथियोंकी
गति अवरुद्ध कर दी।
अर्दयित्वा शरैस्तांस्तु सिंहः क्षुद्रमृगानिव ।
पीडयन् धर्मराजानं शरैः संनतपर्वभिः ॥
अभ्यद्रवत राधेयो धर्मपुत्रं शितैः शरैः ।)
जैसे सिंह छोटे मृगोंको पीड़ा देता है, उसी प्रकार राधापुत्र कर्णने उन महारथियोंको
बाणोंसे पीड़ित करके झुकी हुई गाँठवाले तीखे बाणोंसे चोट पहुँचाते हुए वहाँ धर्मराज
धर्मपुत्र युधिष्ठिरपर पुनः आक्रमण किया।
कालवालास्तु ये पार्थ दन्तवर्णावहन् हयाः ।। ४८ ।।
तैर्युक्तं रथमास्थाय प्रायाद् राजा पराङ्मुखः ।
उस समय दाँतोंके समान सफेद रंग और काली पूँछवाले जो घोड़े युधिष्ठिरकी सवारीमें
थे, उन्हींसे जुते हुए दूसरे रथपर बैठकर राजा युधिष्ठिर रणभूमिसे विमुख हो शिविरकी ओर
चल दिये ।। ४८ १/२ ।।
एवं पार्थोऽभ्यपायात् स निहतः पार्ष्णिसारथिः ।। ४९ ।।
अशक्नुवन् प्रमुखतः स्थातुं कर्णस्य दुर्मनाः ।
युधिष्ठिरका पृष्ठरक्षक पहले ही मार दिया गया था। उनका मन बहुत दुःखी था,
इसलिये वे कर्णके सामने ठहर न सके और युद्धस्थलसे हट गये ।। ४९ १/२ ।।
अभिद्रुत्य तु राधेयः पाण्डुपुत्रं युधिष्ठिरम् ।। ५० ।।
वज्रच्छत्रांकुशैर्मत्स्यैर्ध्वजकूर्माम्बुजादिभिः ।
लक्षणैरुपपन्नेन पाण्डुना पाण्डुनन्दनम् ।। ५१ ।।
पवित्रीकर्तुमात्मानं स्कन्धे संस्पृश्य पाणिना ।
ग्रहीतुमिच्छन् स बलात् कुन्तीवाक्यं च सोऽस्मरत् ॥ ५२ ॥ उस समय राधापुत्र कर्ण पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरका पीछा करके वज्र, छत्र, अंकुश, मत्स्य, ध्वज, कूर्म और कमल आदि शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न गोरे हाथसे उनका कंधा छूकर, मानो अपने-आपको पवित्र करनेके लिये उन्हें बलपूर्वक पकड़नेकी इच्छा करने लगा। उसी समय उसे कुन्तीदेवीको दिये हुए अपने वचनका स्मरण हो आया ॥ ५०—५२ ॥
तं शल्यः प्राह मा कर्ण गृहीथाः पार्थिवोत्तमम् । गृहीतमात्रो हत्वा त्वां मा करिष्यति भस्मसात् ॥ ५३ ॥ उस समय राजा शल्यने कहा—'कर्ण! इन नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिरको हाथ न लगाना, अन्यथा वे पकड़ते ही तुम्हारा वध करके अपनी क्रोधाग्निसे तुम्हें भस्म कर डालेंगे' ॥
अब्रवीत् प्रहसन् राजन् कुत्सयन्निव पाण्डवम् । कथं नाम कुले जातः क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः ॥ ५४ ॥ प्रजह्यात् समरं भीतः प्राणान् रक्षन् महाहवे । न भवान् क्षत्रधर्मेषु कुशलो हीति मे मतिः ॥ ५५ ॥ राजन्! तब कर्ण जोर-जोरसे हँस पड़ा और पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी निन्दा-सा करता हुआ बोला—'युधिष्ठिर! जो क्षत्रिय-कुलमें उत्पन्न हो, क्षत्रिय-धर्ममें तत्पर रहता हो, वह महासमरमें प्राणोंकी रक्षाके लिये भयभीत हो युद्ध छोड़कर भाग कैसे सकता है? मेरा तो ऐसा विश्वास है कि तुम क्षत्रिय-धर्ममें निपुण नहीं हो ॥ ५४-५५ ॥
ब्राह्मे बले भवान् युक्तः स्वाध्याये यज्ञकर्मणि । मा स्म युध्यस्व कौन्तेय मा स्म वीरान् समासदः ॥ ५६ ॥ 'कुन्तीकुमार! तुम ब्राह्मबल, स्वाध्याय एवं यज्ञ-कर्ममें ही कुशल हो; अतः न तो युद्ध किया करो और न वीरोंके सामने ही जाओ ॥ ५६ ॥
मा चैतानप्रियं ब्रूहि मा वै व्रज महार णम् । वक्तव्या मारिषान्ये तु न वक्तव्यास्तु मादृशाः ॥ ५७ ॥ 'माननीय नरेश! न इन वीरोंसे कभी अप्रिय वचन बोलो और न महान् युद्धमें पैर ही रखो। यदि अप्रिय वचन बोलना ही हो तो दूसरोंसे बोलना; मेरे-जैसे वीरोंसे नहीं ॥
मादृशान् विब्रुवन् युद्धे एतदन्यच्च लप्स्यसे । स्वगृहं गच्छ कौन्तेय यत्र तौ केशवार्र्जुनौ ॥ ५८ ॥ न हि त्वां समरे राजन् हन्यात् कर्णः कथञ्चन । 'युद्धमें मेरे-जैसे लोगोंसे अप्रिय वचन बोलनेपर तुम्हें यही तथा दूसरा कुफल भी भोगना पड़ेगा। अतः कुन्तीनन्दन! अपने घर चले जाओ अथवा जहाँ श्रीकृष्ण और अर्जुन हों वहीं पधारो। राजन्! कर्ण समरांगणमें किसी तरह भी तुम्हारा वध नहीं करेगा' ॥ ५८ १/२ ॥ ॥
एवमुक्त्वा ततः पार्थं विसृज्य च महाबलः ॥ ५९ ॥
न्यहनत् पाण्डवीं सेनां वज्रहस्त इवासुरीम् । महाबली कर्णने युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर फिर उन्हें छोड़ दिया और जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरसेनाका संहार करते हैं, उसी प्रकार पाण्डव-सेनाका विनाश आरम्भ कर दिया ।। ५९ १/२ ।।
ततोऽपायाद् द्रुतं राजन् व्रीडन्निव नरेश्वरः ।। ६० ।। अथापयातं राजानं मत्वान्वीयूस्तमच्युतम् । चेदिपाण्डवपाञ्चालाः सात्यकिश्च महारथः ।। ६१ ।। द्रौपदेयास्तथा शूरा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । राजन्! तब राजा युधिष्ठिर लजाते हुए-से तुरंत रणभूमिसे भाग गये। राजाको रणक्षेत्रसे हटा हुआ जानकर चेदि, पाण्डव और पांचाल वीर, महारथी सात्यकि, द्रौपदीके शूरवीर पुत्र तथा पाण्डुनन्दन माद्रीकुमार नकुल-सहदेव भी धर्म-मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले युधिष्ठिरके पीछे-पीछे चल दिये ।। ६०-६१ १/२ ।।
ततो युधिष्ठिरानीकं दृष्ट्वा कर्णः पराङ्मुखम् ।। ६२ ।। कुरुभिः सहितो वीरः प्रहृष्टः पृष्ठतोऽन्वगात् । तदनन्तर युधिष्ठिरकी सेनाको युद्धसे विमुख हुई देख हर्षमें भरे हुए वीर कर्णने कौरव-सैनिकोंको साथ लेकर कुछ दूरतक उसका पीछा किया ।। ६२ १/२ ।।
भेरीशङ्खमृदङ्गानां कार्मुकाणां च निःस्वनः ।। ६३ ।। बभूव धार्तराष्ट्राणां सिंहनादरवस्तथा । उस समय भेरी, शंख, मृदंग और धनुषोंकी ध्वनि सब ओर फैल रही थी तथा दुर्योधनके सैनिक सिंहके समान दहाड़ रहे थे ।। ६३ १/२ ।।
युधिष्ठिरस्तु कौरव्य रथमारुह्य सत्वरम् ।। ६४ ।। श्रुतकीर्तेर्महाराज दृष्टवान् कर्णविक्रमम् । कुरुवंशी महाराज! युधिष्ठिरके घोड़े थक गये थे; अतः उन्होंने तुरंत ही श्रुतकीर्तिके रथपर आरूढ़ हो कर्णके पराक्रमको देखा ।। ६४ १/२ ।।
काल्यमानं बलं दृष्ट्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।। ६५ ।। स्वान् योधानब्रवीत् क्रुद्धो निघ्नतैतान् किमासत । अपनी सेनाको खदेड़ी जाती हुई देख धर्मराज युधिष्ठिरने कुपित हो अपने पक्षके योद्धाओंसे कहा—‘अरे! क्यों चुप बैठे हो? इन शत्रुओंको मार डालो’ ।।
ततो राज्ञाभ्यनुज्ञाताः पाण्डवानां महारथाः ।। ६६ ।। भीमसेनमुखाः सर्वे पुत्रांस्ते प्रत्युपाद्रवन् । राजाकी यह आज्ञा पाते ही भीमसेन आदि समस्त पाण्डव महारथी आपके पुत्रोंपर टूट पड़े ।। ६६ १/२ ।।
अभवत् तुमुलः शब्दो योधानां तत्र भारत ।। ६७ ।। रथहस्त्यश्वपत्तीनां शस्त्राणां च ततस्ततः । भारत! फिर तो वहाँ इधर-उधर सब ओर रथी, हाथीसवार, घुड़सवार और पैदल योद्धाओं एवं अस्त्र-शस्त्रोंका भयंकर शब्द गूँजने लगा ।। ६७ १/२ ।। उत्तिष्ठत प्रहरत प्रैताभिपततेति च ।। ६८ ।। इति ब्रुवाणा ह्यन्योन्यं जघ्नुर्योधा महारणे । ‘उठो, मारो, आगे बढ़ो, टूट पड़ो’ इत्यादि वाक्य बोलते हुए सब योद्धा उस महासमरमें एक-दूसरेको मारने लगे ।। ६८ १/२ ।। अभ्रच्छायेव तत्रासीच्छरवॄष्टिभिरम्बरे ।। ६९ ।। समावृत्तैर्नरवरैर्निघ्नद्भिरितरेतरम् । उस समय वहाँ अस्त्रोंसे आवृत हो परस्पर आघात करनेवाले नरश्रेष्ठ वीरोंके चलाये हुए बाणोंकी वृष्टिसे आकाशमें मेघोंकी छाया-सी छा रही थी ।। ६९ १/२ ।। विपताकध्वजच्छत्रा व्यश्वसूतायुधा रणे ।। ७० ।। व्यङ्गाङ्गावयवाः पेतुः क्षितौ क्षीणाः क्षितीश्वराः । कितने ही घायल नरेश पताका, ध्वज, छत्र, अश्व, सारथि, आयुध, शरीर तथा उसके अवयवोंसे रहित हो रणभूमिमें गिर पड़े ।। ७० १/२ ।। प्रवणादिव शैलानां शिखराणि द्विपोत्तमाः ।। ७१ ।। सारोहा निहताः पेतुर्वज्रभिन्ना इवाद्रयः । जैसे पर्वतोंके शिखर टूटकर निम्न देशसे लुढ़कते हुए नीचे गिर पड़ते हैं तथा जैसे वज्रसे विदीर्ण किये हुए पर्वत धराशायी हो जाते हैं, उसी प्रकार वहाँ मारे गये हाथी अपने सवारोंसहित पृथ्वीपर गिर पड़े ।। ७१ १/२ ।। छिन्नभिन्नविपर्यस्तैर्वर्मलङ्कारभूषणैः ।। ७२ ।। सारोहास्तुरगाः पेतुर्हतवीराः सहस्रशः । टूटे-फूटे और अस्त-व्यस्त हुए कवच, अलंकार एवं आभूषणोंसहित सहस्रों घोड़े अपने बहादुर सवारोंके मारे जानेपर उनके साथ ही गिर पड़ते थे ।। ७२ १/२ ।। विप्रविद्धायुधाङ्गाश्च द्विरदाश्वरथैर्हताः ।। ७३ ।। प्रतिवीरैश्च सम्मर्दे पत्तिसंघाः सहस्रशः । उस संघर्षमें विपक्षी वीरों, हाथियों, घोड़ों तथा रथोंद्वारा मारे गये सहस्रों पैदल योद्धाओंके समुदाय रणभूमिमें सो रहे थे। उनके अस्त्र-शस्त्र और शरीरके अवयव क्षत-विक्षत होकर बिखर गये थे ।। ७३ १/२ ।। विशालायतताम्राक्षैः पद्मेन्दुसदृशाननैः ।। ७४ ।। शिरोभिर्युद्धशौण्डानां सर्वतः संवृता मही ।
यथा भुवि तथा व्योम्नि निःस्वनं शुश्रुवुर्जनाः ।। ७५ ।। विमानैरप्सरःसङ्गैर्गीतवादित्रनिःस्वनैः । युद्धकुशल वीरोंके विशाल, विस्तृत एवं लाल-लाल आँखों और कमल तथा चन्द्रमाके समान मुखवाले मस्तकोंसे सारी युद्धभूमि सब ओरसे ढक गयी थी। भूतलपर जैसा कोलाहल हो रहा था, वैसा ही आकाशमें भी लोगोंको सुनायी देता था। वहाँ विमानोंपर बैठी हुई झुंड-की-झुंड अप्सराएँ गीत और वाद्योंकी मधुर ध्वनि फैला रही थीं ।। ७४-७५ १/२ ।। हतानभिमुखान् वीरान् वीरैः शतसहस्रशः ।। ७६ ।। आरोप्यारोप्य गच्छन्ति विमानेष्वप्सरोगणाः । वीरोंके द्वारा सम्मुख लड़कर मारे गये लाखों वीरोंको अप्सराएँ विमानोंपर बिठा-बिठाकर स्वर्गलोकमें ले जाती थीं ।। ७६ १/२ ।। तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं प्रत्यक्षं स्वर्गलिप्सया ।। ७७ ।। प्रहृष्टमनसः शूराः क्षिप्रं जघ्नुः परस्परम् । यह महान् आश्चर्यकी बात प्रत्यक्ष देखकर हर्ष और उत्साहमें भरे हुए शूरवीर स्वर्गकी लिप्सासे एक-दूसरेको शीघ्रतापूर्वक मारने लगे ।। ७७ १/२ ।। रथिनो रथिभिः सार्धं चित्रं युयुधुराहवे ।। ७८ ।। पत्तयः पत्तिभिर्नागाः सह नागैर्हयैर्हयाः । युद्धस्थलमें रथियोंके साथ रथी, पैदलोंके साथ पैदल, हाथियोंके साथ हाथी और घोड़ोंके साथ घोड़े विचित्र युद्ध करते थे ।। ७८ १/२ ।। एवं प्रवृत्ते संग्रामे गजवाजिनरक्षये ।। ७९ ।। सैन्येन रजसा व्याप्ते स्वे स्वाञ्जघ्नुः परे परान् । इस प्रकार हाथी, घोड़ों और मनुष्योंका संहार करनेवाले उस संग्रामके आरम्भ होनेपर सैनिकोंद्वारा उड़ायी हुई धूलसे वहाँका सारा प्रदेश आच्छादित हो जानेपर अपने और शत्रुपक्षके योद्धा अपने ही पक्षवालोंका संहार करने लगे ।। ७९ १/२ ।। कचाकचि युद्धमासीद् दन्तादन्ति नखानखि ।। ८० ।। मुष्टियुद्धं नियुद्धं च देहपाप्मासुनाशनम् । दोनों दलोंके सैनिक एक-दूसरेके केश पकड़कर खींचते, दाँतोंसे काटते, नखोंसे बखोटते, मुक्कोंसे मारते और परस्पर मल्लयुद्ध करने लगते थे। इस प्रकार वह युद्ध सैनिकोंके शरीर, प्राण और पापोंका विनाश करनेवाला हो रहा था ।। ८० १/२ ।। तथा वर्तति संग्रामे गजवाजिनरक्षये ।। ८१ ।। नराश्वनागदेहेभ्यः प्रसृता लोहितापगा । गजाश्वनरदेहान् सा व्युवाह पतितान् बहून् ।। ८२ ।।
हाथी, घोड़े और मनुष्योंका विनाश करनेवाला वह संग्राम उसी रूपमें चलने लगा। मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके शरीरोंसे खूनकी नदी बह चली, जो अपने भीतर पड़े हुए हाथी, घोड़े और मनुष्योंकी बहुसंख्यक लाशोंको बहाये जा रही थी ॥ ८१-८२ ॥
नराश्वगजसम्बाधे नराश्वगजसादिनाम् ।
लोहितोदा महाघोरा मांसशोणितकर्दमा ॥ ८३ ॥
नराश्वगजदेहान् सा वहन्ती भीरुभीषणा ।
मनुष्य, घोड़े और हाथियोंसे भरे हुए युद्धस्थलमें मनुष्य, अश्व, हाथी और सवारोंके रक्त ही उस नदीके जल थे। उनका मांस और गाढ़ा खून उस नदीकी कीचड़के समान जान पड़ता था। मनुष्य, घोड़े और हाथियोंके शरीरोंको बहाती हुई वह महाभयंकर नदी भीरु मनुष्योंको भयभीत कर रही थी ॥ ८३ ½ ॥
तस्याः पारमपारं च व्रजन्ति विजयैषिणः ॥ ८४ ॥
गाधेन चाप्लवन्तश्च निमज्ज्योन्मज्य चापरे ।
विजयकी अभिलाषा रखनेवाले कितने ही वीर जहाँ थोड़ा रक्तमय जल था वहाँ तैरकर और जहाँ अथाह था वहाँ गोते लगा-लगाकर उसके दूसरे पार पहुँच जाते थे ॥ ८४ ½ ॥
ते तु लोहितदिग्धाङ्गा रक्तवर्मायुधाम्बराः ॥ ८५ ॥
सस्नुस्तस्यां पपुश्चास्यां मम्लुश्च भरतर्षभ ।
उन सबके शरीर रक्तसे रँग गये थे। कवच, आयुध और वस्त्र भी रक्तरंजित हो गये थे। भरतश्रेष्ठ! कितने ही योद्धा उसमें नहा लेते, कितनोंके मुँहमें रक्तकी घूँट चली जाती और कितने ही ग्लानिसे भर जाते थे ॥ ८५ ½ ॥
रथानश्वान् नरान् नागानायुधाभरणानि च ॥ ८६ ॥
वसनान्यथ वर्माणि वध्यमानान् हतानपि ।
भूमिं खं द्यां दिशश्चैव प्रायः पश्याम लोहिताः ॥ ८७ ॥
मारे गये तथा मारे जाते हुए हाथी, घोड़े, रथ, मनुष्य, अस्त्र-शस्त्र, आभूषण, वस्त्र, कवच, पृथ्वी, आकाश, द्युलोक और सम्पूर्ण दिशाएँ—ये सब हमें प्रायः लाल-ही-लाल दिखायी देते थे ॥ ८६-८७ ॥
लोहितस्य तु गन्धेन स्पर्शेन च रसेन च ।
रूपेण चातिरक्तेन शब्देन च विसर्पता ॥ ८८ ॥
विषादः सुमहानासीत् प्रायः सैन्यस्य भारत ।
भारत! सब ओर फैली और बढ़ी हुई उस रक्त-राशिकी गन्धसे, स्पर्शसे, रससे, रूपसे और शब्दसे भी प्रायः सारी सेनाके मनमें बड़ा विषाद हो रहा था ॥ ८८ ½ ॥
तत् तु विप्रहतं सैन्यं भीमसेनमुखास्तदा ॥ ८९ ॥
भूयः समाद्रवन् वीराः सात्यकिप्रमुखास्तदा ।
भीमसेन तथा सात्यकि आदि वीरोंने विशेषरूपसे विनष्ट हुई उस कौरव-सेनापर पुनः बड़े वेगसे आक्रमण किया॥ ८९ १/२ ॥
तेषामापततां वेगमविषह्यं निरीक्ष्य च ॥ ९० ॥
पुत्राणां ते महासैन्यमासीद् राजन् पराङ्मुखम्।
राजन्! उन आक्रमणकारी वीरोंके असह्य वेगको देखकर आपके पुत्रोंकी विशाल सेना युद्धसे विमुख होकर भाग चली॥ ९० १/२ ॥
तत् प्रकीर्णरथाश्वेभं नरवाजिसमाकुलम् ॥ ९१ ॥
विध्वस्तवर्मकवचं प्रविद्धायुधकार्मुकम्।
व्यद्रवत् तावकं सैन्यं लोड्यमानं समन्ततः।
सिंहार्दितमिवारण्ये यथा गजकुलं तथा ॥ ९२ ॥
जैसे जंगलमें सिंहसे पीड़ित हुआ हाथियोंका यूथ व्याकुल होकर भागता है, उसी प्रकार शत्रुओंद्वारा सब ओरसे रौंदी जाती हुई मनुष्यों और घोड़ोंसे परिपूर्ण आपकी विशाल सेना भाग चली। उसके रथ, हाथी और घोड़े तितर-बितर हो गये, आवरण और कवच नष्ट हो गये तथा अस्त्र-शस्त्र और धनुष छिन्न-भिन्न होकर पृथ्वीपर पड़े थे॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ४९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४९॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १९ १/२ श्लोक मिलाकर कुल १११ १/२ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 1969)
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
कर्ण और भीमसेनका युद्ध तथा कर्णका पलायन
संजय उवाच
तानभिद्रवतो दृष्ट्वा पाण्डवांस्तावकं बलम् ।
दुर्योधनो महाराज वारयामास सर्वशः ॥ १ ॥
योधांश्च स्वबलं चैव समन्ताद् भरतर्षभ ।
क्रोशतस्तव पुत्रस्य न स्म राजन् न्यवर्तत ॥ २ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! पाण्डवोंको आपकी सेनापर आक्रमण करते देख दुर्योधनने सब ओरसे सब प्रकारके प्रयत्नोंद्वारा उन योद्धाओंको रोकने तथा अपनी सेनाको भी स्थिर करनेका प्रयत्न किया। भरतश्रेष्ठ! नरेश्वर! आपके पुत्रके बहुत चीखने-चिल्लानेपर भी भागती हुई सेना पीछे न लौटी ॥ १-२ ॥
ततः पक्षः प्रपक्षश्च शकुनिश्चापि सौबलः ।
तदा सशस्त्राः कुरवो भीममभ्यद्रवन् रणे ॥ ३ ॥
तदनन्तर व्यूहके पक्ष और प्रपक्षभागमें खड़े हुए सैनिक, सुबलपुत्र शकुनि तथा सशस्त्र कौरववीर उस समय रणक्षेत्रमें भीमसेनपर टूट पड़े ॥ ३ ॥
कर्णोऽपि दृष्ट्वा द्रवतो धार्तराष्ट्रान् सराजकान् ।
मद्रराजमुवाचेदं याहि भीमरथं प्रति ॥ ४ ॥
उधर कर्णने भी राजा दुर्योधन और उसके सैनिकोंको भागते देख मद्रराज शल्यसे कहा—‘भीमसेनके रथके समीप चलो’ ॥ ४ ॥
एवमुक्तश्च कर्णेन शल्यो मद्राधिपस्तदा ।
हंसवर्णान् हयानग्र्यान् प्रैषीद् यत्र वृकोदरः ॥ ५ ॥
कर्णके ऐसा कहनेपर मद्रराज शल्यने हंसके समान श्वेत वर्णवाले श्रेष्ठ घोड़ोंको उधर ही हाँक दिया, जहाँ भीमसेन खड़े थे ॥ ५ ॥
ते प्रेरिता महाराज शल्येनाहवशौभिना ।
भीमसेनरथं प्राप्य समसज्जन्त वाजिनः ॥ ६ ॥
महाराज! संग्राममें शोभा पानेवाले शल्यसे संचालित हो वे घोड़े भीमसेनके रथके समीप जाकर पाण्डव-सेनामें मिल गये ॥ ६ ॥
दृष्ट्वा कर्णं समायान्तं भीमः क्रोधसमन्वितः ।
मतिं चक्रे विनाशाय कर्णस्य भरतर्षभ ॥ ७ ॥
भरतश्रेष्ठ! कर्णको आते देख क्रोधमें भरे हुए भीमसेनने उसके विनाशका विचार किया ॥ ७ ॥
सोऽब्रवीत् सात्यकिं वीरं धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् । यूयं रक्षत राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ॥ ८ ॥ संशयान्महतो मुक्तं कथंचित् प्रेक्षतो मम । उन्होंने वीर सात्यकि तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नसे कहा—'तुमलोग धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करो। वे अभी-अभी मेरे देखते-देखते किसी प्रकार महान् प्राण-संकटसे मुक्त हुए हैं ॥ ८ १/२ ॥ अग्रतो मे कृतो राजा छिन्नसर्वपरिच्छदः ॥ ९ ॥ दुर्योधनस्य प्रीत्यर्थं राधेयेन दुरात्मना । 'दुरात्मा राधापुत्र कर्णने दुर्योधनकी प्रसन्नताके लिये मेरे सामने ही धर्मराजकी समस्त युद्ध-सामग्रीको छिन्न-भिन्न कर डाला है ॥ ९ १/२ ॥ अन्तमद्य गमिष्यामि तस्य दुःखस्य पार्षत ॥ १० ॥ हन्तास्म्यद्य रणे कर्णं स वा मां निहनिष्यति । संग्रामेण सुघोरेण सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ११ ॥ 'द्रुपदकुमार! इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ है; अतः अब मैं उसका बदला लूँगा। आज रणभूमिमें अत्यन्त घोर संग्राम करके या तो मैं ही कर्णको मार डालूँगा या वही मेरा वध करेगा; यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ १०-११ ॥ राजानमद्य भवतां न्यासभूतं ददानि वै । तस्य संरक्षणे सर्वे यतध्वं विगतज्वराः ॥ १२ ॥ 'इस समय राजाको धरोहरके रूपमें मैं तुम्हें सौंप रहा हूँ। तुम सब लोग निश्चिन्त होकर इनकी रक्षाके लिये पूर्ण प्रयत्न करना' ॥ १२ ॥ एवमुक्त्वा महाबाहुः प्रायादाधिरथिं प्रति । सिंहनादेन महता सर्वाः संनादयन् दिशः ॥ १३ ॥ ऐसा कहकर महाबाहु भीमसेन अपने महान् सिंहनादसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए सूतपुत्र कर्णकी ओर बढ़े ॥ १३ ॥ दृष्ट्वा त्वरितमायान्तं भीमं युद्धाभिनन्दिनम् । सूतपुत्रमथोवाच मद्राणामीश्वरो विभुः ॥ १४ ॥ युद्धका अभिनन्दन करनेवाले भीमसेनको बड़ी उतावलीके साथ आते देख मद्रदेशके स्वामी शक्तिशाली शल्यने सूतपुत्र कर्णसे कहा ॥ १४ ॥
शल्य उवाच
पश्य कर्ण महाबाहुं संक्रुद्धं पाण्डुनन्दनम् । दीर्घकालार्जितं क्रोधं मोक्तुकामं त्वयि ध्रुवम् ॥ १५ ॥
**शल्य बोले—**कर्ण! क्रोधमें भरे हुए पाण्डुनन्दन महाबाहु भीमसेनको देखो, जो दीर्घकालसे संचित किये हुए क्रोधको आज तुम्हारे ऊपर छोड़नेका दृढ़ निश्चय किये हुए हैं॥ १५॥ ईदृशं नास्य रूपं मे दृष्टपूर्वं कदाचन । अभिमन्यौ हते कर्ण राक्षसे च घटोत्कचे ॥ १६ ॥ कर्ण! अभिमन्यु तथा घटोत्कच राक्षसके मारे जानेपर भी पहले कभी मैंने इनका ऐसा रूप नहीं देखा था॥ १६॥ त्रैलोक्यस्य समस्तस्य शक्तः क्रुद्धो निवारणे । बिभर्ति सदृशं रूपं युगान्ताग्निसमप्रभम् ॥ १७ ॥ ये इस समय कुपित हो समस्त त्रिलोकीको रोक देनेमें समर्थ हैं; क्योंकि प्रलयकालके अग्निके समान तेजस्वी रूप धारण कर रहे हैं॥ १७॥
संजय उवाच
इति ब्रुवति राधेयं मद्राणामीश्वरे नृप । अभ्यवर्तत वै कर्णं क्रोधदीप्तो वृकोदरः ॥ १८ ॥ **संजय कहते हैं—**नरेश्वर! मद्रराज शल्य राधापुत्र कर्णसे ऐसी बातें कह ही रहे थे कि क्रोधसे प्रज्वलित हुए भीमसेन उसके सामने आ पहुँचे॥ १८॥ अथागतं तु सम्प्रेक्ष्य भीमं युद्धाभिनन्दिनम् । अब्रवीद् वचनं शल्यं राधेयः प्रहसन्निव ॥ १९ ॥ युद्धका अभिनन्दन करनेवाले भीमसेनको सामने आया देख हँसते हुए-से राधापुत्र कर्णने शल्यसे इस प्रकार कहा— ॥ १९॥ यदुक्तं वचनं मेऽद्य त्वया मद्रजनेश्वर । भीमसेनं प्रति विभो तत् सत्यं नात्र संशयः ॥ २० ॥ 'मद्रराज! प्रभो! आज तुमने भीमसेनके विषयमें मेरे सामने जो बात कही है, वह सर्वथा सत्य है—इसमें संशय नहीं है॥ २०॥ एष शूरश्च वीरश्च क्रोधनश्च वृकोदरः । निरपेक्षः शरीरे च प्राणतश्च बलाधिकः ॥ २१ ॥ 'ये भीमसेन शूरवीर, क्रोधी, अपने शरीर और प्राणों-का मोह न करनेवाले तथा अधिक बलशाली हैं॥ २१॥ अज्ञातवासं वसता विराटनगरे तदा । द्रौपद्याः प्रियकामेन केवलं बाहुसंश्रयात् ॥ २२ ॥ गूढभावं समाश्रित्य कीचकः सगणो हतः ।
‘विराटनगरमें अज्ञातवास करते समय इन्होंने द्रौपदीका प्रिय करनेकी इच्छासे छिपे-छिपे जाकर केवल बाहुबलसे कीचकको उसके साथियोंसहित मार डाला था ।। २२१/२ ।।
सोऽद्य संग्रामशिरसि संनद्धः क्रोधमूर्च्छितः ।। २३ ।।
किं करोद्यतदण्डेन मृत्युनापि व्रजेद् रणम् ।
‘वे ही आज क्रोधसे आतुर हो कवच बाँधकर युद्धके मुहानेपर उपस्थित हैं; परंतु क्या ये दण्ड धारण किये यमराजके साथ भी युद्धके लिये रणभूमिमें उतर सकते हैं?’ ।। २३१/२ ।।
चिरकालाभिलषितो मामयं तु मनोरथः ।। २४ ।।
अर्जुनं समरे हन्यां मां वा हन्याद् धनंजयः ।
स मे कदाचिदद्यैव भवेद् भीमसमागमात् ।। २५ ।।
‘मेरे हृदयमें दीर्घकालसे यह अभिलाषा बनी हुई है कि समरांगणमें अर्जुनका वध करूँ अथवा वे ही मुझे मार डालें। कदाचित् भीमसेनके साथ समागम होनेसे मेरी वह इच्छा आज ही पूरी हो जाय ।। २४-२५ ।।
निहते भीमसेने वा यदि वा विरथीकृते ।
अभियास्यति मां पार्थस्तन्मे साधु भविष्यति ।। २६ ।।
अत्र यन्मन्यसे प्राप्तं तच्छीघ्रं सम्प्रधारय ।
‘यदि भीमसेन मारे गये अथवा रथहीन कर दिये गये तो अर्जुन अवश्य मुझपर आक्रमण करेंगे, जो मेरे लिये अधिक अच्छा होगा। तुम जो यहाँ उचित समझते हो, वह शीघ्र निश्चय करके बताओ’ ।। २६१/२ ।।
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं राधेयस्यामितौजसः ।। २७ ।।
उवाच वचनं शल्यः सूतपुत्रं तथागतम् ।
अमित शक्तिशाली राधापुत्र कर्णका यह वचन सुनकर राजा शल्यने सूतपुत्रसे उस अवसरके लिये उपयुक्त वचन कहा— ।। २७१/२ ।।
अभियाहि महाबाहो भीमसेनं महाबलम् ।। २८ ।।
निरस्य भीमसेनं तु ततः प्राप्स्यसि फाल्गुनम् ।
‘महाबाहो! तुम महाबली भीमसेनपर चढ़ाई करो। भीमसेनको परास्त कर देनेपर निश्चय ही अर्जुनको अपने सामने पा जाओगे ।। २८१/२ ।।
यस्ते कामोऽभिलषितश्चिरात् प्रभृति हृद्गतः ।। २९ ।।
स वै सम्पत्स्यते कर्ण सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।
‘कर्ण! तुम्हारे हृदयमें चिरकालसे जो अभीष्ट मनोरथ संचित है, वह निश्चय ही सफल होगा, यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ’ ।। २९१/२ ।।
एवमुक्ते ततः कर्णः शल्यं पुनरभाषत ।। ३० ।।
हन्ताहमर्जुनं संख्ये मां वा हन्याद् धनंजयः । युद्धे मनः समाधाय याहि यत्र वृकोदरः ॥ ३१ ॥ उनके ऐसा कहनेपर कर्णने शल्यसे फिर कहा—'मद्रराज! मैं युद्धमें अर्जुनको मारूँ या अर्जुन ही मुझे मार डालें। इस उद्देश्यसे युद्धमें मन लगाकर जहाँ भीमसेन हैं, उधर ही चलो' ॥ ३०-३१ ॥
संजय उवाच
ततः प्रायाद् रथेनाशु शल्यस्तत्र विशाम्पते । यत्र भीमो महेष्वासो व्यद्रावयत वाहिनीम् ॥ ३२ ॥ **संजय कहते हैं—**प्रजानाथ! तदनन्तर शल्य रथके द्वारा तुरंत ही वहाँ जा पहुँचे, जहाँ महाधनुर्धर भीमसेन आपकी सेनाको खदेड़ रहे थे ॥ ३२ ॥ ततस्तूर्यनिनादश्च भेरीणां च महास्वनः । उदतिष्ठच्च राजेन्द्र कर्णभीमसमागमे ॥ ३३ ॥ राजेन्द्र! कर्ण और भीमसेनका संघर्ष उपस्थित होनेपर फिर तूर्य और भेरियोंकी गम्भीर ध्वनि होने लगी ॥ ३३ ॥ भीमसेनोऽथ संक्रुद्धस्तस्य सैन्यं दुरासदम् । नाराचैर्विमलैस्तीक्ष्णैर्दिशः प्राद्रावयद् बली ॥ ३४ ॥ बलवान् भीमसेनने अत्यन्त कुपित होकर चमचमाते हुए तीखे नाराचोंसे आपकी दुर्जय सेनाको सम्पूर्ण दिशाओंमें खदेड़ दिया ॥ ३४ ॥ स संनिपातस्तुमुलो घोररूपो विशाम्पते । आसीद् रौद्रो महाराज कर्णपाण्डवयोधें ॥ ३५ ॥ प्रजानाथ! महाराज! कर्ण और भीमसेनके उस युद्धमें बड़ी भयंकर, भीषण और घोर मार-काट हुई ॥ ततो मुहूर्ताद् राजेन्द्र पाण्डवः कर्णमाद्रवत् । समापतन्तं सम्प्रेक्ष्य कर्णो वैकर्तनो वृषः ॥ ३६ ॥ आजघान सुसंक्रुद्धो नाराचेन स्तनान्तरे । पुनश्चैनममेयात्मा शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ३७ ॥ राजेन्द्र! पाण्डुपुत्र भीमसेनने दो ही घड़ीमें कर्णपर आक्रमण कर दिया। उन्हें अपनी ओर आते देख अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए धर्मात्मा वैकर्तन कर्णने एक नाराचद्वारा उनकी छातीमें प्रहार किया। फिर अमेय आत्मबलसे सम्पन्न उस वीरने उन्हें अपने बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ॥ ३६-३७ ॥ स विद्धः सूतपुत्रेण छादयामास पत्रिभिः । विव्याध निशितैः कर्णं नवभिर्नतपर्वभिः ॥ ३८ ॥