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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पहले राजा दुर्योधनकी खोज करते हुए पाण्डुकुमार युधिष्ठिरने दैववश अपने पास पहुँचे हुए उन व्याधोंसे आपके पुत्रका पता पूछा था ॥ २८ ॥

ततस्ते पाण्डुपुत्रस्य स्मृत्वा तद् भाषितं तदा । अन्योन्यमब्रुवन् राजन् मृगव्याधाः शनैरिव ॥ २९ ॥

राजन्! उस समय पाण्डुपुत्रकी कही हुई बात याद करके वे व्याध आपसमें धीरे-धीरे बोले— ॥ २९ ॥

दुर्योधनं ख्यापयामो धनं दास्यति पाण्डवः । सुव्यक्तमिह नः ख्यातो ह्रदे दुर्योधनो नृपः ॥ ३० ॥

'यदि हम दुर्योधनका पता बता दें तो पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर हमें धन देंगे। हमें तो यहाँ यह स्पष्टरूपसे ज्ञात हो गया कि राजा दुर्योधन इसी सरोवरमें छिपा हुआ है ॥ ३० ॥

तस्माद् गच्छामहे सर्वे यत्र राजा युधिष्ठिरः । आख्यातुं सलिले सुप्तं दुर्योधनममर्षणम् ॥ ३१ ॥

अतः जलमें सोये हुए अमर्षशील दुर्योधनका पता बतानेके लिये हम सब लोग उस स्थानपर चलें, जहाँ राजा युधिष्ठिर मौजूद हैं ॥ ३१ ॥

धृतराष्ट्रात्मजं तस्मै भीमसेनाय धीमते । शयानं सलिले सर्वे कथयामो धनुर्भृते ॥ ३२ ॥

'बुद्धिमान् धनुर्धर भीमसेनको हम सब यह बता दें कि धृतराष्ट्रका पुत्र दुर्योधन जलमें सो रहा है ॥ ३२ ॥

स नो दास्यति सुप्रीतो धनानि बहुलान्युत । किं नो मांसेन शुष्केण परिक्लिष्टेन शोषिणा ॥ ३३ ॥

'इससे अत्यन्त प्रसन्न होकर वे हमें बहुत धन देंगे। फिर हमें शरीरका रक्त सुखा देनेवाले इस सूखे मांसको ढोकर व्यर्थ कष्ट उठानेकी क्या आवश्यकता है?' ॥ ३३ ॥

एवमुक्त्वा तु ते व्याधाः सम्प्रहृष्टा धनार्थिनः । मांसभारानुपादाय प्रययुः शिविरं प्रति ॥ ३४ ॥

इस प्रकार परस्पर वार्तालाप करके धनकी अभिलाषा रखनेवाले वे व्याध बड़े प्रसन्न हुए और मांसके बोझ उठाकर पाण्डव-शिविरकी ओर चल दिये ॥ ३४ ॥

पाण्डवापि महाराज लब्धलक्ष्याः प्रहारिणः । अपश्यमानाः समरे दुर्योधनमवस्थितम् ॥ ३५ ॥ निकृतेस्तस्य पापस्य ते पारं गमनेप्सवः । चारान् सम्प्रेषयामासुः समन्तात् तद्रणाजिरे ॥ ३६ ॥

महाराज! प्रहार करनेमें कुशल पाण्डवोंने अपना लक्ष्य सिद्ध कर लिया था; उन्होंने दुर्योधनको समरांगण-में खड़ा न देख उस पापीके किये हुए छल-कपटका बदला चुकाकर वैरके पार जानेकी इच्छासे उस संग्रामभूमिमें चारों ओर गुप्तचर भेज रखे थे ॥ ३५-३६ ॥

आगम्य तु ततः सर्वे नष्टं दुर्योधनं नृपम् ।
न्यवेदयन्त सहिता धर्मराजस्य सैनिकाः ॥ ३७ ॥
धर्मराजके उन सभी गुप्तचर सैनिकोंने एक साथ लौटकर यह निवेदन किया कि 'राजा दुर्योधन लापता हो गया है' ॥ ३७ ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा चाराणां भरतर्षभ ।
चिन्तामभ्यगमत् तीव्रां निःशश्वास च पार्थिवः ॥ ३८ ॥
भरतश्रेष्ठ! उन गुप्तचरोंकी बात सुनकर राजा युधिष्ठिर घोर चिन्तामें पड़ गये और लंबी साँस खींचने लगे ॥ ३८ ॥
अथ स्थितानां पाण्डूनां दीनानां भरतर्षभ ।
तस्माद् देशादपक्रम्य त्वरिता लुब्धका विभो ॥ ३९ ॥
आजग्मुः शिविरं हृष्टा दृष्ट्वा दुर्योधनं नृपम् ।
वार्यमाणाः प्रविशंश्च भीमसेनस्य पश्यतः ॥ ४० ॥
भरतभूषण! नरेश! तदनन्तर जब पाण्डव खिन्न होकर बैठे हुए थे, उसी समय वे व्याध राजा दुर्योधनको अपनी आँखों देखकर तुरंत ही उस स्थानसे हट गये और बड़े हर्षके साथ पाण्डव-शिविरमें जा पहुँचे। द्वारपालोंके रोकनेपर भी वे भीमसेनके देखते-देखते भीतर घुस गये ॥
ते तु पाण्डवमासाद्य भीमसेनं महाबलम् ।
तस्मै तत् सर्वमाचख्युर्यद् वृत्तं यच्च वैश्रुतम् ॥ ४१ ॥
महाबली पाण्डुपुत्र भीमसेनके पास जाकर उन्होंने सरोवरके तटपर जो कुछ हुआ था और जो कुछ सुननेमें आया था, वह सब कह सुनाया ॥ ४१ ॥
ततो वृकोदरो राजन् दत्त्वा तेषां धनं बहु ।
धर्मराजाय तत् सर्वमाचचक्षे परंतपः ॥ ४२ ॥
राजन्! तब शत्रुओंको संताप देनेवाले भीमने उन व्याधोंको बहुत धन देकर धर्मराजसे सारा समाचार कहा ॥
असौ दुर्योधनो राजन् विज्ञातो मम लुब्धकैः ।
संस्तभ्य सलिलं शेते यस्यार्थे परितप्यसे ॥ ४३ ॥
वे बोले—'धर्मराज! मेरे व्याधोंने राजा दुर्योधनका पता लगा लिया है। आप जिसके लिये संतप्त हैं, वह मायासे पानी बाँधकर सरोवरमें सो रहा है' ॥ ४३ ॥
तद् वचो भीमसेनस्य प्रियं श्रुत्वा विशाम्पते ।
अजातशत्रुः कौन्तेयो हृष्टोऽभूत् सह सोदरैः ॥ ४४ ॥
प्रजानाथ! भीमसेनका वह प्रिय वचन सुनकर अजातशत्रु कुन्तीकुमार युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ बड़े प्रसन्न हुए ॥ ४४ ॥
तं च श्रुत्वा महेष्वासं प्रविष्टं सलिलह्रदे ।

क्षिप्रमेव ततोऽगच्छन् पुरस्कृत्य जनार्दनम् ॥ ४५ ॥ महाधनुर्धर दुर्योधनको पानीसे भरे सरोवरमें घुसा सुनकर राजा युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णको आगे करके शीघ्र ही वहाँसे चल दिये ॥ ४५ ॥

ततः किलकिलाशब्दः प्रादुरासीद् विशाम्पते । पाण्डवानां प्रहृष्टानां पञ्चालानां च सर्वशः ॥ ४६ ॥ प्रजानाथ! फिर तो हर्षमें भरे हुए पाण्डव और पांचालोंकी किलकिलाहटका शब्द सब ओर गूँजने लगा ॥ ४६ ॥

सिंहनादांस्ततश्चक्रुः श्वेडांश्च भरतर्षभ । त्वरिताः क्षत्रिया राजन् जग्मुर्द्वैपायनं ह्रदम् ॥ ४७ ॥ भरतभूषण नरेश! वे सभी क्षत्रिय सिंहनाद एवं गर्जना करने लगे तथा तुरंत ही द्वैपायन नामक सरोवरके पास जा पहुँचे ॥ ४७ ॥

ज्ञातः पापो धार्तराष्ट्रो दृष्टश्चेत्यसकृद्रणे । प्राक्रोशन् सोमकास्तत्र हृष्टरूपाः समन्ततः ॥ ४८ ॥ हर्षमें भरे हुए सोमकवीर रणभूमिमें सब ओर पुकार-पुकारकर कहने लगे ‘धृतराष्ट्रके पापी पुत्रका पता लग गया और उसे देख लिया गया’ ॥ ४८ ॥

तेषामाशु प्रयातानां रथानां तत्र वेगिनाम् । बभूव तुमुलः शब्दो दिविस्पृक् पृथिवीपते ॥ ४९ ॥ पृथ्वीनाथ! वहाँ शीघ्रतापूर्वक यात्रा करनेवाले उनके वेगशाली रथोंका घोर घर्घर शब्द आकाशमें व्याप्त हो गया ॥ ४९ ॥

दुर्योधनं परीप्सन्तस्तत्र तत्र युधिष्ठिरम् । अन्वयुस्त्वरितास्ते वै राजानं श्रान्तवाहनाः ॥ ५० ॥ अर्जुनो भीमसेनश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । धृष्टद्युम्नश्च पाञ्चाल्यः शिखण्डी चापराजितः ॥ ५१ ॥ उत्तमौजा युधामन्युः सात्यकिश्च महारथः । पञ्चालानां च ये शिष्टा द्रौपदेयाश्च भारत ॥ ५२ ॥ हयाश्च सर्वे नागाश्च शतशश्च पदातयः । भारत! उस समय अर्जुन, भीमसेन, माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेव, पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न, अपराजित वीर शिखण्डी, उत्तमौजा, युधामन्यु, महारथी सात्यकि, द्रौपदीके पाँचों पुत्र तथा पांचालोंमेंसे जो जीवित बच गये थे, वे वीर दुर्योधनको पकड़नेकी इच्छासे अपने वाहनोंके थके होनेपर भी बड़ी उतावलीके साथ राजा युधिष्ठिरके पीछे-पीछे गये। उनके साथ सभी घुड़सवार, हाथीसवार और सैकड़ों पैदल सैनिक भी थे ॥ ५०—५२ १/२ ॥

ततः प्राप्तो महाराज धर्मराजः प्रतापवान् ॥ ५३ ॥

द्वैपायनं ह्रदं घोरं यत्र दुर्योधनोऽभवत् ।
महाराज! तत्पश्चात् प्रतापी धर्मराज युधिष्ठिर उस भयंकर द्वैपायनह्रदके तटपर जा पहुँचे, जिसके भीतर दुर्योधन छिपा हुआ था ॥ ५३ १/२ ॥
शीतामलजलं हृद्यं द्वितीयमिव सागरम् ॥ ५४ ॥
मायया सलिलं स्तभ्य यत्राभूत् ते स्थितः सुतः ।
अत्यद्भुतेन विधिना दैवयोगेन भारत ॥ ५५ ॥
उसका जल शीतल और निर्मल था। वह देखनेमें मनोरम और दूसरे समुद्रके समान विशाल था। भारत! उसीके भीतर मायाद्वारा जलको स्तम्भित करके दैवयोग एवं अद्भुत विधिसे आपका पुत्र विश्राम कर रहा था ॥ ५४-५५ ॥
सलिलान्तर्गतः शेते दुर्दर्शः कस्यचित् प्रभो ।
मानुषस्य मनुष्येन्द्र गदाहस्तो जनाधिपः ॥ ५६ ॥
प्रभो! नरेन्द्र! हाथमें गदा लिये राजा दुर्योधन जलके भीतर सोया था। उस समय किसी भी मनुष्यके लिये उसको देखना कठिन था ॥ ५६ ॥
ततो दुर्योधनो राजा सलिलान्तर्गतो वसन् ।
शुश्रुवे तुमुलं शब्दं जलदोपमनिःस्वनम् ॥ ५७ ॥
तदनन्तर पानीके भीतर बैठे हुए राजा दुर्योधनने मेघकी गर्जनाके समान भयंकर शब्द सुना ॥ ५७ ॥
युधिष्ठिरश्च राजेन्द्र तं ह्रदं सह सोदरैः ।
आजगाम महाराज तव पुत्रवधाय वै ॥ ५८ ॥
राजेन्द्र! महाराज! आपके पुत्रका वध करनेके लिये राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ उस सरोवरके तटपर आ पहुँचे ॥ ५८ ॥
महता शङ्खनादेन रथनेमिस्वनेन च ।
ऊर्ध्वं धुन्वन् महारेणुं कम्पयंश्चापि मेदिनीम् ॥ ५९ ॥
यौधिष्ठिरस्य सैन्यस्य श्रुत्वा शब्दं महारथाः ।
कृतवर्मा कृपो द्रौणि राजानमिदमब्रुवन् ॥ ६० ॥
वे महान् शंखनाद तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटसे पृथ्वीको कँपाते और धूलका महान् ढेर ऊपर उड़ाते हुए वहाँ आये थे। युधिष्ठिरकी सेनाका कोलाहल सुनकर कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा तीनों महारथी राजा दुर्योधनसे इस प्रकार बोले— ॥ ५९-६० ॥
इमे ह्यायान्ति संहृष्टाः पाण्डवा जितकाशिनः ।
अपयास्यामहे तावदनुजानातु नो भवान् ॥ ६१ ॥
‘ये विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डव बड़े हर्षमें भरकर इधर ही आ रहे हैं। अतः हमलोग यहाँसे हट जायँगे। इसके लिये तुम हमें आज्ञा प्रदान करो’ ॥ ६१ ॥
दुर्योधनस्तु तच्छ्रुत्वा तेषां तत्र तरस्विनाम् ।

तथेत्युक्त्वा हृदं तं वै माययास्तम्भयत् प्रभो ॥ ६२ ॥ प्रभो! उन वेगशाली वीरोंकी वह बात सुनकर दुर्योधनने 'तथास्तु' कहकर उस सरोवरके जलको पुनः मायाद्वारा स्तम्भित कर दिया ॥ ६२ ॥ ते त्वनुज्ञाप्य राजानं भृशं शोकपरायणाः । जग्मुर्दूरे महाराज कृपप्रभृतयो रथाः ॥ ६३ ॥ महाराज! राजाकी आज्ञा लेकर अत्यन्त शोकमें डूबे हुए कृपाचार्य आदि महारथी वहाँसे दूर चले गये ॥ ६३ ॥ ते गत्वा दूरमध्वानं न्यग्रोधं प्रेक्ष्य मारिष । न्यविशन्त भृशं श्रान्ताश्चिन्तयन्तो नृपं प्रति ॥ ६४ ॥ मान्यवर! दूरके मार्गपर जाकर उन्हें एक बरगदका वृक्ष दिखायी दिया। वे अत्यन्त थके होनेके कारण राजा दुर्योधनके विषयमें चिन्ता करते हुए उसीके नीचे बैठ गये ॥ ६४ ॥ विष्टभ्य सलिलं सुप्तो धार्तराष्ट्रो महाबलः । पाण्डवाश्चापि सम्प्राप्तास्तं देशं युद्धमीप्सवः ॥ ६५ ॥ इधर महाबली धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन पानी बाँधकर सो गया। इतनेहीमें युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले पाण्डव भी वहाँ आ पहुँचे ॥ ६५ ॥ कथं नु युद्धं भविता कथं राजा भविष्यति । कथं नु पाण्डवा राजन् प्रतिपत्स्यन्ति कौरवम् ॥ ६६ ॥ इत्येवं चिन्तयानास्तु रथेभ्योऽश्वान् विमुच्य ते । तत्रासांचक्रिरे राजन् कृपप्रभृतयो रथाः ॥ ६७ ॥ राजन्! उधर कृपाचार्य आदि महारथी रथोंसे घोड़ोंको खोलकर यह सोचने लगे कि 'अब युद्ध किस तरह होगा? राजा दुर्योधनकी क्या दशा होगी और पाण्डव किस प्रकार कुरुराज दुर्योधनका पता पायेंगे' ऐसी चिन्ता करते हुए वे वहाँ बैठकर आराम करने लगे ॥ ६६-६७ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥

पाण्डवोंका द्वैपायनसरोवरपर जाना, वहाँ युधिष्ठिर और श्रीकृष्णकी बातचीत तथा तालाबमें छिपे हुए दुर्योधनके साथ युधिष्ठिरका संवाद

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एकत्रिंशोऽध्यायः

पाण्डवोंका द्वैपायनसरोवरपर जाना, वहाँ युधिष्ठिर और श्रीकृष्णकी बातचीत तथा तालाबमें छिपे हुए दुर्योधनके साथ युधिष्ठिरका संवाद

संजय उवाच

ततस्तेष्वपयातेषु रथेषु त्रिषु पाण्डवाः ।
ते ह्रदं प्रत्यपद्यन्त यत्र दुर्योधनोऽभवत् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! उन तीनों रथियोंके हट जानेपर पाण्डव उस सरोवरके तटपर आये, जिसमें दुर्योधन छिपा हुआ था ॥ १ ॥

आसाद्य च कुरुश्रेष्ठ तदा द्वैपायनं ह्रदम् ।
स्तम्भितं धार्तराष्ट्रेण दृष्ट्वा तं सलिलाशयम् ॥ २ ॥
वासुदेवमिदं वाक्यमब्रवीत् कुरुनन्दनः ।
पश्येमां धार्तराष्ट्रेण मायामप्सु प्रयोजिताम् ॥ ३ ॥
कुरुश्रेष्ठ! द्वैपायन-कुण्डपर पहुँचकर युधिष्ठिरने देखा कि दुर्योधनने इस जलाशयके जलको स्तम्भित कर दिया है। यह देखकर कुरुनन्दन युधिष्ठिरने भगवान् वासुदेवसे इस प्रकार कहा—'प्रभो! देखिये तो सही, दुर्योधनने जलके भीतर इस मायाका कैसा प्रयोग किया है? ॥ २-३ ॥

विष्टभ्य सलिलं शेते नास्य मानुषतो भयम् ।
दैवीं मायामिमां कृत्वा सलिलान्तर्गतो ह्ययम् ॥ ४ ॥
'यह पानीको रोककर सो रहा है। इसे यहाँ मनुष्यसे किसी प्रकारका भय नहीं है; क्योंकि यह इस दैवी मायाका प्रयोग करके जलके भीतर निवास करता है ॥

निकृत्या निकृतिप्रज्ञो न मे जीवन् विमोक्ष्यते ।
यद्यस्य समरे साह्यं कुरुते वज्रभृत् स्वयम् ॥ ५ ॥
तथाप्येनं हतं युद्धे लोका द्रक्ष्यन्ति माधव ।
'माधव! यद्यपि यह छल-कपटकी विद्यामें बड़ा चतुर है, तथापि कपट करके मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकता। यदि समरांगणमें साक्षात् वज्रधारी इन्द्र इसकी सहायता करें तो भी युद्धमें इसे सब लोग मरा हुआ ही देखेंगे' ॥ ५ १/२ ॥

वासुदेव उवाच

मायाविन इमां मायां मायया जहि भारत ॥ ६ ॥
मायावी मायया वध्यः सत्यमेतद् युधिष्ठिर ।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—भारत! मायावी दुर्योधनकी इस मायाको आप मायाद्वारा ही नष्ट कर डालिये! युधिष्ठिर! मायावीका वध मायासे ही करना चाहिये, यह सच्ची नीति है॥ ६ १/२॥ क्रियाभ्युपायैर्बहुभिर्मायामप्सु प्रयोज्य च॥ ७॥ जहि त्वं भरतश्रेष्ठ मायात्मानं सुयोधनम्। भरतश्रेष्ठ! आप बहुत-से रचनात्मक उपायोंद्वारा जलमें मायाका प्रयोग करके मायामय दुर्योधनका वध कीजिये॥ ७ १/२॥ क्रियाभ्युपायैरिन्द्रेण निहता दैत्यदानवाः॥ ८॥ क्रियाभ्युपायैर्बहुभिर्बलिर्बद्धो महात्मना। क्रियाभ्युपायैर्बहुभिर्हिरण्याक्षो महासुरः॥ ९॥ रचनात्मक उपायोंसे ही इन्द्रने बहुत-से दैत्य और दानवोंका संहार किया, नाना प्रकारके रचनात्मक उपायोंसे ही महात्मा श्रीहरिने बलिको बाँधा और बहुसंख्यक रचनात्मक उपायोंसे ही उन्होंने महान् असुर हिरण्याक्षका वध किया था॥ ८-९॥ हिरण्यकशिपुश्चैव क्रिययैव निष्षूदितौ। वृत्रश्च निहतो राजन् क्रिययैव न संशयः॥ १०॥ क्रियात्मक प्रयत्नके द्वारा ही भगवान्‌ने हिरण्यकशिपु-को भी मारा था। राजन्! वृत्रासुरका वध भी क्रियात्मक उपायसे ही हुआ था, इसमें संशय नहीं है॥ १०॥ तथा पौलस्त्यतनयो रावणो नाम राक्षसः। रामेण निहतो राजन् सानुबन्धः सहानुगः॥ ११॥ क्रिया योगमास्थाय तथा त्वमपि विक्रम। राजन्! पुलस्त्यकुमार विश्रवाका पुत्र रावण नामक राक्षस श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा क्रियात्मक उपाय और युक्तिकौशलके सहारे ही सम्बन्धियों और सेवकोंसहित मारा गया, उसी प्रकार आप भी पराक्रम प्रकट करें॥ ११ १/२॥ क्रियाभ्युपायैर्निहतौ मया राजन् पुरातनौ॥ १२॥ तारकश्च महादैत्यो विप्रचित्तिश्च वीर्यवान्। नरेश्वर! पूर्वकालके महादैत्य तारक और पराक्रमी विप्रचित्तिको मैंने क्रियात्मक उपायोंसे ही मारा था॥ १२ १/२॥ वातापिरिल्वलश्चैव त्रिशिराश्च तथा विभो॥ १३॥ सुन्दोपसुन्दावसुरौ क्रिययैव निष्षूदितौ। क्रियाभ्युपायैरिन्द्रेण त्रिदिवं भुज्यते विभो॥ १४॥ प्रभो! वातापि, इल्वल, त्रिशिरा तथा सुन्द-उपसुन्द नामक असुर भी कार्यकौशलसे ही मारे गये हैं। क्रियात्मक उपायोंसे ही इन्द्र स्वर्गका राज्य भोगते हैं॥ १३-१४॥ क्रिया बलवती राजन् नान्यत् किंचिद् युधिष्ठिर।

दैत्याश्च दानवाश्चैव राक्षसाः पार्थिवास्तथा ॥ १५ ॥ क्रियाभ्युपायैर्निहताः क्रियां तस्मात् समाचर । राजन्! कार्यकौशल ही बलवान् है, दूसरी कोई वस्तु नहीं। युधिष्ठिर! दैत्य, दानव, राक्षस तथा बहुत-से भूपाल क्रियात्मक उपायोंसे ही मारे गये हैं; अतः आप भी क्रियात्मक उपायका ही आश्रय लें ॥ १५ १/२ ॥

संजय उवाच

इत्युक्तो वासुदेवेन पाण्डवः संशितव्रतः ॥ १६ ॥ जलस्थं तं महाराज तव पुत्रं महाबलम् । अभ्यभाषत कौन्तेयः प्रहसन्निव भारत ॥ १७ ॥ संजय कहते हैं—महाराज! भरतनन्दन! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर उत्तम एवं कठोर व्रतका पालन करनेवाले पाण्डुकुमार कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने जलमें स्थित हुए आपके महाबली पुत्रसे हँसते हुए-से कहा— ॥ १६-१७ ॥

सुयोधन किमर्थोऽयमारम्भोऽप्सु कृतस्त्वया । सर्वं क्षत्रं घातयित्वा स्वकुलं च विशाम्पते ॥ १८ ॥ जलाशयं प्रविष्टोऽद्य वाञ्छञ्जीवितमात्मनः । उत्तिष्ठ राजन् युध्यस्व सहास्माभिः सुयोधन ॥ १९ ॥ ‘प्रजानाथ सुयोधन! तुमने किसलिये पानीमें यह अनुष्ठान आरम्भ किया है। सम्पूर्ण क्षत्रियों तथा अपने कुलका संहार कराकर आज अपनी जान बचानेकी इच्छासे तुम जलाशयमें घुसे बैठे हो। राजा सुयोधन! उठो और हम लोगोंके साथ युद्ध करो ॥ १८-१९ ॥

स ते दर्पो नरश्रेष्ठ स च मानः क्व ते गतः । यस्त्वं संस्तभ्य सलिलं भीतो राजन् व्यवस्थितः ॥ २० ॥ ‘राजन्! नरश्रेष्ठ! तुम्हारा वह पहलेका दर्प और अभिमान कहाँ चला गया, जो डरके मारे जलका स्तम्भन करके यहाँ छिपे हुए हो? ॥ २० ॥

सर्वे त्वां शूर इत्येवं जना जल्पन्ति संसदि । व्यर्थं तद् भवतो मन्ये शौर्यं सलिलशायिनः ॥ २१ ॥ ‘सभामें सब लोग तुम्हें शूरवीर कहा करते हैं। जब तुम भयभीत होकर पानीमें सो रहे हो, तब तुम्हारे उस तथाकथित शौर्यको मैं व्यर्थ समझता हूँ ॥ २१ ॥

उत्तिष्ठ राजन् युध्यस्व क्षत्रियोऽसि कुलोद्भवः । कौरवेयो विशेषेण कुलं जन्म च संस्मर ॥ २२ ॥ ‘राजन्! उठो, युद्ध करो; क्योंकि तुम कुलीन क्षत्रिय हो, विशेषतः कुरुकुलकी संतान हो। अपने कुल और जन्मका स्मरण तो करो ॥ २२ ॥

स कथं कौरवे वंशे प्रशंसन् जन्म चात्मनः ।
युद्धाद् भीतस्ततस्तोयं प्रविश्य प्रतितिष्ठसि ॥ २३ ॥
‘तुम तो कौरववंशमें उत्पन्न होनेके कारण अपने जन्मकी प्रशंसा करते थे। फिर आज युद्धसे डरकर पानीके भीतर कैसे घुसे बैठे हो? ॥ २३ ॥
अयुद्धमव्यवस्थानं नैष धर्मः सनातनः ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यं रणे राजन् पलायनम् ॥ २४ ॥
‘नरेश्वर! युद्ध न करना अथवा युद्धमें स्थिर न रहकर वहाँसे पीठ दिखाकर भागना यह सनातन धर्म नहीं है। नीच पुरुष ही ऐसे कुमार्गका आश्रय लेते हैं। इससे स्वर्गकी प्राप्ति नहीं होती ॥ २४ ॥
कथं पारमगत्वा हि युद्धे त्वं वै जिजीविषुः ।
इमान् निपतितान् दृष्ट्वा पुत्रान् भ्रातॄन् पितॄंस्तथा ॥ २५ ॥
सम्बन्धिनो वयस्यांश्च मातुलान् बान्धवांस्तथा ।
घातयित्वा कथं तात ह्रदे तिष्ठसि साम्प्रतम् ॥ २६ ॥
‘युद्धसे पार पाये बिना ही तुम्हें जीवित रहनेकी इच्छा कैसे हो गयी? तात! रणभूमिमें गिरे हुए इन पुत्रों, भाइयों और चाचे-ताउओंको देखकर सम्बन्धियों, मित्रों, मामाओं और बन्धु-बान्धवोंका वध कराकर इस समय तालाबमें क्यों छिपे बैठे हो? ॥ २५-२६ ॥
शूरमानी न शूरस्त्वं मृषा वदसि भारत ।
शूरोऽहमिति दुर्बुद्धे सर्वलोकस्य शृण्वतः ॥ २७ ॥
‘तुम अपनेको शूर तो मानते हो, परंतु शूर हो नहीं। भरतवंशके खोटी बुद्धिवाले नरेश! तुम सब लोगोंके सुनते हुए व्यर्थ ही कहा करते हो कि ‘मैं शूरवीर हूँ’ ॥ २७ ॥
न हि शूराः पलायन्ते शत्रून् दृष्ट्वा कथञ्चन ।
ब्रूहि वा त्वं यया वृत्त्या शूर त्यजसि संगरम् ॥ २८ ॥
‘जो वास्तवमें शूरवीर हैं, वे शत्रुओंको देखकर किसी तरह भागते नहीं हैं। अपनेको शूर कहनेवाले सुयोधन! बताओ तो सही, तुम किस वृत्तिका आश्रय लेकर युद्ध छोड़ रहे हो ॥ २८ ॥
स त्वमुत्तिष्ठ युध्यस्व विनीय भयमात्मनः ।
घातयित्वा सर्वसैन्यं भ्रातॄंश्चैव सुयोधन ॥ २९ ॥
नेदानीं जीविते बुद्धिः कार्या धर्मचिकीर्षया ।
क्षत्रधर्ममुपाश्रित्य त्वद्विधेन सुयोधन ॥ ३० ॥
‘अतः तुम अपना भय दूर करके उठो और युद्ध करो। सुयोधन! भाइयों तथा सम्पूर्ण सेनाको मरवाकर क्षत्रियधर्मका आश्रय लिये हुए तुम्हारे-जैसे पुरुषको धर्मसम्पादनकी इच्छासे इस समय केवल अपनी जान बचानेका विचार नहीं करना चाहिये ॥ २९-३० ॥
यत् तु कर्णमुपाश्रित्य शकुनिं चापि सौबलम् ।

अमर्त्य इव सम्मोहात् त्वमात्मानं न बुद्धवान् ।। ३१ ।। तत् पापं सुमहत् कृत्वा प्रतियुध्यस्व भारत । कथं हि त्वद्विधो मोहाद् रोचयेत पलायनम् ।। ३२ ।। 'तुम जो कर्ण और सुबलपुत्र शकुनिका सहारा लेकर मोहवश अपने-आपको अजर-अमर-सा मान बैठे थे, अपनेको मनुष्य समझते ही नहीं थे, वह महान् पाप करके अब युद्ध क्यों नहीं करते? भारत! उठो, हमारे साथ युद्ध करो। तुम्हारे-जैसा वीर पुरुष मोहवश पीठ दिखाकर भागना कैसे पसंद करेगा? ।। ३१-३२ ।।

क्व ते तत् पौरुषं यातं क्व च मानः सुयोधन । क्व च विक्रान्तता याता क्व च विस्फूर्जितं महत् ।। ३३ ।। क्व ते कृतास्त्रता याता किञ्च शेषे जलाशये । स त्वमुत्तिष्ठ युध्यस्व क्षत्रधर्मेण भारत ।। ३४ ।। 'सुयोधन! तुम्हारा वह पौरुष कहाँ चला गया? कहाँ है वह तुम्हारा अभिमान? कहाँ गया पराक्रम? कहाँ है वह महान् गर्जन-तर्जन? और कहाँ गया वह अस्त्रविद्याका ज्ञान? इस समय इस तालाबमें तुम्हें कैसे नींद आ रही है? भारत! उठो और क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध करो ।। ३३-३४ ।।

अस्मांस्तु वा पराजित्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम् । अथवा निहतोऽस्माभिर्भूभौ स्वप्स्यसि भारत ।। ३५ ।। 'भरतनन्दन! हम सब लोगोंको परास्त करके इस पृथ्वीका शासन करो अथवा हमारे हाथों मारे जाकर सदाके लिये रणभूमिमें सो जाओ ।। ३५ ।।

एष ते परमो धर्मः सृष्टो धात्रा महात्मना । तं कुरुष्व यथातथ्यं राजा भव महारथ ।। ३६ ।। 'भगवान् ब्रह्माने तुम्हारे लिये यही उत्तम धर्म बनाया है। उस धर्मका यथार्थरूपसे पालन करो। महारथी वीर! वास्तवमें राजा बनो (राजोचित पराक्रम प्रकट करो)' ।। ३६ ।।

संजय उवाच

एवमुक्तो महाराज धर्मपुत्रेण धीमता । सलिलस्थस्तव सुत इदं वचनमब्रवीत् ।। ३७ ।। संजय कहते हैं— महाराज! बुद्धिमान् धर्मपुत्र युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर जलके भीतर स्थित हुए तुम्हारे पुत्रने यह बात कही ।। ३७ ।।

दुर्योधन उवाच

नैतच्चित्रं महाराज यद्भीः प्राणिनमाविशेत् । न च प्राणभयाद् भीतो व्यपयातोऽस्मि भारत ।। ३८ ।।

दुर्योधन बोला—महाराज! किसी भी प्राणीके मनमें भय समा जाय, यह आश्चर्यकी बात नहीं है; परंतु भरत-नन्दन! मैं प्राणोंके भयसे भागकर यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ३८ ॥ अरथश्चानिषङ्गी च निहतः पाष्णिसारथिः । एकश्चाप्यगणः संख्ये प्रत्याश्वासमरोचयम् ॥ ३९ ॥ मेरे पास न तो रथ है और न तरकस। मेरे पार्श्वरक्षक भी मारे जा चुके हैं। मेरी सेना नष्ट हो गयी और मैं युद्धस्थलमें अकेला रह गया था; इस दशामें मुझे कुछ देरतक विश्राम करनेकी इच्छा हुई ॥ ३९ ॥ न प्राणहेतोर्न भयान्न विषादाद् विशाम्पते । इदमम्भः प्रविष्टोऽस्मि श्रमात् त्विदमनुष्ठितम् ॥ ४० ॥ प्रजानाथ! मैं न तो प्राणोंकी रक्षाके लिये, न किसी भयसे और न विषादके ही कारण इस जलमें आ घुसा हूँ। केवल थक जानेके कारण मैंने ऐसा किया है ॥ ४० ॥ त्वं चाश्वसिहि कौन्तेय ये चाप्यनुगतास्तव । अहमुत्थाय वः सर्वान् प्रतियोत्स्यामि संयुगे ॥ ४१ ॥ कुन्तीकुमार! तुम भी कुछ देरतक विश्राम कर लो। तुम्हारे अनुगामी सेवक भी सुस्ता लें। फिर मैं उठकर समरांगणमें तुम सब लोगोंके साथ युद्ध करूँगा ॥ ४१ ॥

युधिष्ठिर उवाच

आश्वस्ता एव सर्वे स्म चिरं त्वां मृगयामहे । तदिदानीं समुत्तिष्ठ युध्यस्वेह सुयोधन ॥ ४२ ॥ युधिष्ठिरने कहा—सुयोधन! हम सब लोग तो सुस्ता ही चुके हैं और बहुत देरसे तुम्हें खोज रहे हैं; इसलिये अब तुम उठो और यहीं युद्ध करो ॥ ४२ ॥ हत्वा वा समरे पार्थान् स्फीतं राज्यमवाप्नुहि । निहतो वा रणेऽस्माभिर्वीरलोकमवाप्स्यसि ॥ ४३ ॥ संग्राममें समस्त पाण्डवोंको मारकर समृद्धिशाली राज्य प्राप्त करो अथवा रणभूमिमें हमारे हाथों मारे जाकर वीरोंको मिलनेयोग्य पुण्यलोकोंमें चले जाओ ॥ ४३ ॥

दुर्योधन उवाच

यदर्थं राज्यमिच्छामि कुरूणां कुरुनन्दन । त इमे निहताः सर्वे भ्रातरो मे जनेश्वर ॥ ४४ ॥ क्षीणरत्नां च पृथिवीं हतक्षत्रियपुङ्गवाम् । न ह्युत्सहाम्यहं भोक्तुं विधवामिव योषितम् ॥ ४५ ॥ दुर्योधन बोला—कुरुनन्दन नरेश्वर! मैं जिनके लिये कौरवोंका राज्य चाहता था, वे मेरे सभी भाई मारे जा चुके हैं। भूमण्डलके सभी क्षत्रियशिरोमणियोंका संहार हो गया है।

यहाँके सभी रत्न नष्ट हो गये हैं; अतः विधवा स्त्रीके समान श्रीहीन हुई इस पृथ्वीका उपभोग करनेके लिये मेरे मनमें तनिक भी उत्साह नहीं है ॥ ४४-४५ ॥ अद्यापि त्वहमाशंसे त्वां विजेतुं युधिष्ठिर । भङ्क्त्वा पाञ्चालपाण्डूनामुत्साहं भरतर्षभ ॥ ४६ ॥ भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! मैं आज भी पांचालों और पाण्डवोंका उत्साह भंग करके तुम्हें जीतनेका हौसला रखता हूँ ॥ ४६ ॥ न त्विदानीमहं मन्ये कार्यं युद्धेन कर्हिचित् । द्रोणे कर्णे च संशान्ते निहते च पितामहे ॥ ४७ ॥ किंतु जब द्रोण और कर्ण शान्त हो गये तथा पितामह भीष्म मार डाले गये तो अब मेरी रायमें कभी भी इस युद्धकी कोई आवश्यकता नहीं रही ॥ ४७ ॥ अस्त्विदानीमियं राजन् केवला पृथिवी तव । असहायो हि को राजा राज्यमिच्छेत् प्रशासितुम् ॥ ४८ ॥ राजन्! अब यह सूनी पृथ्वी तुम्हारी ही रहे। कौन राजा सहायकोंसे रहित होकर राज्य-शासनकी इच्छा करेगा? ॥ ४८ ॥ सुहृदस्तादृशान् हित्वा पुत्रान् भ्रातॄन् पितॄनपि । भवद्भिश्च हृते राज्ये को नु जीवेन्मादृशः ॥ ४९ ॥ वैसे हितैषी सुहृदों, पुत्रों, भाइयों और पिताओंको छोड़कर तुमलोगोंके द्वारा राज्यका अपहरण हो जानेपर कौन मेरे-जैसा पुरुष जीवित रहेगा? ॥ ४९ ॥ अहं वनं गमिष्यामि ह्यजिनैः प्रतिवासितः । रतिर्हि नास्ति मे राज्ये हतपक्षस्य भारत ॥ ५० ॥ भरतनन्दन! मैं मृगचर्म धारण करके वनमें चला जाऊँगा। अपने पक्षके लोगोंके मारे जानेसे अब इस राज्यमें मेरा तनिक भी अनुराग नहीं है ॥ ५० ॥ हतबान्धवभूयिष्ठा हताश्वा हतकुञ्जरा । एषा ते पृथिवी राजन् भुङ्क्ष्वैनां विगतज्वरः ॥ ५१ ॥ राजन्! यह पृथ्वी, जहाँ मेरे अधिक-से-अधिक भाई-बन्धु, घोड़े और हाथी मारे गये हैं, अब तुम्हारे ही अधिकारमें रहे। तुम निश्चिन्त होकर इसका उपभोग करो ॥ ५१ ॥ वनमेव गमिष्यामि वसानो मृगचर्मणी । न हि मे निर्जनस्यास्ति जीवितेऽद्य स्पृहा विभो ॥ ५२ ॥ प्रभो! मैं तो दो मृगछाला धारण करके वनमें ही चला जाऊँगा, जब मेरे स्वजन ही नहीं रहे, तब मुझे भी इस जीवनको सुरक्षित रखनेकी इच्छा नहीं है ॥ ५२ ॥ गच्छ त्वं भुङ्क्ष्व राजेन्द्र पृथिवीं निहतेश्वराम् । हतयोधां नष्टरत्नां क्षीणवृत्तैर्यथासुखम् ॥ ५३ ॥

राजेन्द्र! जाओ, जिसके स्वामीका नाश हो गया है, योद्धा मारे गये हैं और सारे रत्न नष्ट हो गये हैं, उस पृथ्वीका आनन्दपूर्वक उपभोग करो; क्योंकि तुम्हारी जीविका क्षीण हो गयी थी ॥ ५३ ॥

संजय उवाच

दुर्योधनं तव सुतं सलिलस्थं महायशाः । श्रुत्वा तु करुणं वाक्यमभाषत युधिष्ठिरः ॥ ५४ ॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! महायशस्वी युधिष्ठिरने वह करुणायुक्त वचन सुनकर पानीमें स्थित हुए आपके पुत्र दुर्योधनसे इस प्रकार कहा ॥ ५४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

आर्तप्रलापान्मा तात सलिलस्थः प्रभाषिथाः । नैतन्मनसि मे राजन् वाशितं शकुनेरिव ॥ ५५ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**नरेश्वर! तुम जलमें स्थित होकर आर्त पुरुषोंके समान प्रलाप न करो। तात! चिड़ियोंके चहचहानेके समान तुम्हारी यह बात मेरे मनमें कोई अर्थ नहीं रखती है ॥ ५५ ॥

यदि वापि समर्थः स्यास्त्वं दानाय सुयोधन । नाहमिच्छेयमवनिं त्वया दत्तां प्रशासितुम् ॥ ५६ ॥ सुयोधन! यदि तुम इसे देनेमें समर्थ होते तो भी मैं तुम्हारी दी हुई इस पृथ्वीपर शासन करनेकी इच्छा नहीं रखता ॥

अधर्मेण न गृह्णीयां त्वया दत्तां महीमिमाम् । न हि धर्मः स्मृतो राजन् क्षत्रियस्य प्रतिग्रहः ॥ ५७ ॥ राजन्! तुम्हारी दी हुई इस भूमिको मैं अधर्मपूर्वक नहीं ले सकता; क्षत्रियके लिये दान लेना धर्म नहीं बताया गया है ॥ ५७ ॥

त्वया दत्तां न चेच्छेयं पृथिवीमखिलामहम् । त्वां तु युद्धे विनिर्जित्य भोक्तास्मि वसुधामिमाम् ॥ ५८ ॥ तुम्हारे देनेपर इस सम्पूर्ण पृथ्वीको भी मैं नहीं लेना चाहता। तुम्हें युद्धमें परास्त करके ही इस वसुधाका उपभोग करूँगा ॥ ५८ ॥

अनीश्वरश्च पृथिवीं कथं त्वं दातुमिच्छसि । त्वयेयं पृथिवी राजन् किन्न दत्ता तदैव हि ॥ ५९ ॥ धर्मतो याचमानानां प्रशमार्थं कुलस्य नः । अब तो तुम स्वयं ही इस पृथ्वीके स्वामी नहीं रहे; फिर इसका दान कैसे करना चाहते हो? राजन्! जब हम लोग कुलमें शान्ति बनाये रखनेके लिये पहले धर्मके अनुसार अपना ही राज्य माँग रहे थे, उसी समय तुमने हमें यह पृथ्वी क्यों नहीं दे दी ॥ ५९१/२ ॥

वार्ष्णेयं प्रथमं राजन् प्रत्याख्याय महाबलम् ॥ ६० ॥
किमिदानीं ददासि त्वं को हि ते चित्तविभ्रमः ।
नरेश्वर! पहले महाबली भगवान् श्रीकृष्णको हमारे लिये राज्य देनेसे इनकार करके इस समय क्यों दे रहे हो? तुम्हारे चित्तमें यह कैसा भ्रम छा रहा है? ॥ ६० १/२ ॥
अभियुक्तस्तु को राजा दातुमिच्छेद्वि मेदिनीम् ॥ ६१ ॥
न त्वमद्य महीं दातुमीशः कौरवनन्दन ।
आच्छेत्तुं वा बलाद् राजन् स कथं दातुमिच्छसि ॥ ६२ ॥
जो शत्रुओंसे आक्रान्त हो, ऐसा कौन राजा किसीको भूमि देनेकी इच्छा करेगा? कौरवनन्दन नरेश! अब न तो तुम किसीको पृथ्वी दे सकते हो और न बलपूर्वक उसे छीन ही सकते हो। ऐसी दशामें तुम्हें भूमि देनेकी इच्छा कैसे हो गयी? ॥ ६१-६२ ॥
मां तु निर्जित्य संग्रामे पालयेमां वसुन्धराम् ।
सूच्यग्रेणापि यद् भूमेरपि भिद्येत भारत ॥ ६३ ॥
तन्मात्रमपि तन्मह्यं न ददाति पुरा भवान् ।
स कथं पृथिवीमेतां प्रददासि विशाम्पते ॥ ६४ ॥
मुझे संग्राममें जीतकर इस पृथ्वीका पालन करो। भारत! पहले तो तुम सूईकी नोकसे जितना छिद सके, भूमिका उतना-सा भाग भी मुझे नहीं दे रहे थे। प्रजानाथ! फिर आज यह सारी पृथ्वी कैसे दे रहे हो? ॥ ६३-६४ ॥
सूच्यग्रं नात्यजः पूर्वं स कथं त्यजसि क्षितिम् ।
एवमैश्वर्यमासाद्य प्रशास्य पृथिवीमिमाम् ॥ ६५ ॥
को हि मूढो व्यवस्येत शत्रोर्दातुं वसुन्धराम् ।
पहले तो तुम सूईकी नोक बराबर भी भूमि नहीं छोड़ रहे थे, अब सारी पृथ्वी कैसे त्याग रहे हो? इस प्रकार ऐश्वर्य पाकर इस वसुधाका शासन करके कौन मूर्ख शत्रुके हाथमें अपनी भूमि देना चाहेगा? ॥ ६५ १/२ ॥
त्वं तु केवलमौर्ख्येण विमूढो नावबुद्ध्यसे ॥ ६६ ॥
पृथिवीं दातुकामोऽपि जीवितेन विमोक्ष्यसे ।
तुम तो केवल मूर्खतावश विवेक खो बैठे हो; इसीलिये यह नहीं समझते कि आज भूमि देनेकी इच्छा करनेपर भी तुम्हें अपने जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा ॥ ६६ १/२ ॥
अस्मान् वा त्वं पराजित्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम् ॥ ६७ ॥
अथवा निहतोऽस्माभिर्व्रज लोकाननुत्तमान् ।
या तो हमलोगोंको परास्त करके तुम्हीं इस पृथ्वीका शासन करो या हमारे हाथों मारे जाकर परम उत्तम लोकोंमें चले जाओ ॥ ६७ १/२ ॥
आवयोर्जीवतो राजन् मयि च त्वयि च ध्रुवम् ॥ ६८ ॥
संशयः सर्वभूतानां विजये नौ भविष्यति ।

राजन्! मेरे और तुम्हारे दोनोंके जीते-जी हमारी विजयके विषयमें समस्त प्राणियोंको संदेह बना रहेगा।।

जीवितं तव दुष्प्रज्ञ मयि सम्प्रति वर्तते ।। ६९ ।।
जीवयेयमहं कामं न तु त्वं जीवितुं क्षमः ।

दुर्मते! इस समय तुम्हारा जीवन मेरे हाथमें है। मैं इच्छानुसार तुम्हें जीवनदान दे सकता हूँ; परंतु तुम स्वेच्छापूर्वक जीवित रहनेमें समर्थ नहीं हो ।। ६९½ ।।

दहने हि कृतो यत्नस्त्वयास्मासु विशेषतः ।। ७० ।।
आशीविषैर्विषैश्चापि जले चापि प्रवेशनैः ।
त्वया विनिकृता राजन् राज्यस्य हरणेन च ।। ७१ ।।
अप्रियाणां च वचनैर्द्रौपद्याः कर्षणेन च ।
एतस्मात् कारणात् पाप जीवितं ते न विद्यते ।। ७२ ।।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ युध्यस्व युद्धे श्रेयो भविष्यति ।

याद है न, तुमने हमलोगोंको जला डालनेके लिये विशेष प्रयत्न किया था। भीमको विषधर सर्पोंसे डसवाया, विष खिलाकर उन्हें पानीमें डुबाया, हमलोगोंका राज्य छीनकर हमें अपने कपटजालका शिकार बनाया, द्रौपदीको कटु वचन सुनाये और उसके केश खींचे। पापी! इन सब कारणोंसे तुम्हारा जीवन नष्ट-सा हो चुका है। उठो-उठो, युद्ध करो; इसीसे तुम्हारा कल्याण होगा ।। ७०—७२½ ।।

एवं तु विविधा वाचो जययुक्ताः पुनः पुनः ।
कीर्तयन्ति स्म ते वीरास्तत्र तत्र जनाधिप ।। ७३ ।।

नरेश्वर! वे विजयी वीर पाण्डव इस प्रकार वहाँ बारंबार नाना प्रकारकी बातें कहने लगे ।। ७३ ।।

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वान्तर्गतगदापर्वणि सुयोधनयुधिष्ठिरसंवादे
एकत्रिंशोऽध्यायः ।। ३१ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें दुर्योधन-युधिष्ठिरसंवादविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३१ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2700)

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द्वात्रिंशोऽध्यायः

युधिष्ठिरके कहनेसे दुर्योधनका तालाबसे बाहर होकर किसी एक पाण्डवके साथ गदायुद्धके लिये तैयार होना

धृतराष्ट्र उवाच

एवं संतर्ज्यमानस्तु मम पुत्रो महीपतिः ।
प्रकृत्या मन्युमान् वीरः कथमासीत् परंतपः ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! शत्रुओंको संताप देनेवाला मेरा वीर पुत्र राजा दुर्योधन स्वभावसे ही क्रोधी था। जब युधिष्ठिरने उसे इस प्रकार फटकारा, तब उसकी कैसी दशा हुई? ॥ १ ॥

न हि संतर्जना तेन श्रुतपूर्वा कथञ्चन ।
राजभावेन मान्यश्च सर्वलोकस्य सोऽभवत् ॥ २ ॥
उसने पहले कभी किसी तरह ऐसी फटकार नहीं सुनी थी; क्योंकि राजा होनेके कारण वह सब लोगोंके सम्मानका पात्र था ॥ २ ॥

यस्यातपत्रच्छायापि स्वका भानोस्तथा प्रभा ।
खेदायैवाभिमानित्वात् सहेत् सैवं कथं गिरः ॥ ३ ॥
अभिमानी होनेके कारण जिसके मनमें अपने छत्रकी छाया और सूर्यकी प्रभा भी खेद ही उत्पन्न करती थी, वह ऐसी कठोर बातें कैसे सह सकता था? ॥

इयं च पृथिवी सर्वा सम्लेच्छाटविका भृशम् ।
प्रसादाद् ध्रियते यस्य प्रत्यक्षं तव संजय ॥ ४ ॥
संजय! तुमने तो प्रत्यक्ष ही देखा था कि म्लेच्छों तथा जंगली जातियोंसहित यह सारी पृथ्वी दुर्योधनकी कृपासे ही जीवन धारण करती थी ॥ ४ ॥

स तथा तर्ज्यमानस्तु पाण्डुपुत्रैर्विशेषतः ।
विहीनश्च स्वकैर्भृत्यैर्निर्जने चावृतो भृशम् ॥ ५ ॥
स श्रुत्वा कटुका वाचो जययुक्ताः पुनः पुनः ।
किमब्रवीत् पाण्डवेयांस्तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ६ ॥
इस समय वह अपने सेवकोंसे हीन हो चुका था और एकान्त स्थानमें घिर गया था। उस दशामें विशेषतः पाण्डवोंने जब उसे वैसी कड़ी फटकार सुनायी, तब शत्रुओंके विजयसे युक्त उन कटुवचनोंको बारंबार सुनकर दुर्योधनने पाण्डवोंसे क्या कहा? यह मुझे बताओ ॥

संजय उवाच

तर्ज्यमानस्तदा राजन्नुदकस्थस्तवात्मजः ।

युधिष्ठिरेण राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितेन ह ॥ ७ ॥
श्रुत्वा स कटुका वाचो विषमस्थो नराधिपः ।
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य सलिलस्थः पुनः पुनः ॥ ८ ॥
सलिलान्तर्गतो राजा धुन्वन् हस्तौ पुनः पुनः ।
मनश्चकार युद्धाय राजानं चाभ्यभाषत ॥ ९ ॥

**संजयने कहा—**राजाधिराज! राजन्! उस समय भाइयोंसहित युधिष्ठिरने जब इस प्रकार फटकारा, तब जलमें खड़े हुए आपके पुत्रने उन कठोर वचनोंको सुनकर गरम-गरम लंबी साँस छोड़ी। राजा दुर्योधन विषम परिस्थितिमें पड़ गया था और पानीमें स्थित था; इसलिये बारंबार उच्छ्वास लेता रहा। उसने जलके भीतर ही अनेक बार दोनों हाथ हिलाकर मन-ही-मन युद्धका निश्चय किया और राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा— ॥ ७—९ ॥

यूयं ससुहृदः पार्थाः सर्वे सरथवाहनाः ।
अहमेकः परिद्यूनो विरथो हतवाहनः ॥ १० ॥

'तुम सभी पाण्डव अपने हितैषी मित्रोंको साथ लेकर आये हो। तुम्हारे रथ और वाहन भी मौजूद हैं। मैं अकेला थका-माँदा, रथहीन और वाहनशून्य हूँ ॥ १० ॥

आत्तशस्त्रै रथोपेत्तैर्बहुभिः परिवारितः ।
कथमेकः पदातिः सन्नशस्त्रो योद्धुमुत्सहे ॥ ११ ॥

'तुम्हारी संख्या अधिक है। तुमने रथपर बैठकर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर मुझे घेर रखा है। फिर तुम्हारे साथ मैं अकेला पैदल और अस्त्र-शस्त्रोंसे रहित होकर कैसे युद्ध कर सकता हूँ? ॥ ११ ॥

एकैकेन तु मां यूयं योधयध्वं युधिष्ठिर ।
न ह्येको बहुभिर्वीरैर्न्याय्यो योधयितुं युधि ॥ १२ ॥

'युधिष्ठिर! तुमलोग एक-एक करके मुझसे युद्ध करो। युद्धमें बहुत-से वीरोंके साथ किसी एकको लड़नेके लिये विवश करना न्यायोचित नहीं है ॥ १२ ॥

विशेषतो विकवचः श्रान्तश्चापत्समाश्रितः ।
भृशं विक्षतगात्रश्च श्रान्तवाहनसैनिकः ॥ १३ ॥

'विशेषतः उस दशामें जिसके शरीरपर कवच नहीं हो, जो थका-माँदा, आपत्तिमें पड़ा और अत्यन्त घायल हो तथा जिसके वाहन और सैनिक भी थक गये हों, उसे युद्धके लिये विवश करना न्यायसंगत नहीं है ॥ १३ ॥

न मे त्वत्तो भयं राजन् न च पार्थाद् वृकोदरात् ।
फाल्गुनाद् वासुदेवाद् वा पञ्चालेभ्योऽथवा पुनः ॥ १४ ॥
यमाभ्यां युयुधानाद् वा ये चान्ये तव सैनिकाः ।
एकः सर्वानहं क्रुद्धो वारयिष्ये युधि स्थितः ॥ १५ ॥

'राजन्! मुझे न तो तुमसे, न कुन्तीके बेटे भीमसेनसे, न अर्जुनसे, न श्रीकृष्णसे अथवा पांचालोंसे ही कोई भय है। नकुल-सहदेव, सात्यकि तथा अन्य जो-जो तुम्हारे सैनिक हैं, उनसे भी मैं नहीं डरता। युद्धमें क्रोधपूर्वक स्थित होनेपर मैं अकेला ही तुम सब लोगोंको आगे बढ़नेसे रोक दूँगा।। १४-१५।। धर्ममूला सतां कीर्तिर्मनुष्याणां जनाधिप। धर्मं चैवेह कीर्तिं च पालयन् प्रब्रवीम्यहम्।। १६।। 'नरेश्वर! साधु पुरुषोंकी कीर्तिका मूल कारण धर्म ही है। मैं यहाँ उस धर्म और कीर्तिका पालन करता हुआ ही यह बात कह रहा हूँ।। १६।। अहमुत्थाय सर्वान् वै प्रतियोत्स्यामि संयुगे। अनुगम्यागतान् सर्वानृतून् संवत्सरो यथा।। १७।। 'मैं उठकर रणभूमिमें एक-एक करके आये हुए तुम सब लोगोंके साथ युद्ध करूँगा, ठीक उसी तरह, जैसे संवत्सर बारी-बारीसे आये हुए सम्पूर्ण ऋतुओंको ग्रहण करता है।। १७।। अद्य वः सरथान् साश्वानशस्त्रो विरथोऽपि सन्। नक्षत्राणीव सर्वाणि सविता रात्रिसंक्षये।। १८।। तेजसा नाशयिष्यामि स्थिरीभवत पाण्डवाः। 'पाण्डवो! स्थिर होकर खड़े रहो। आज मैं अस्त्र-शस्त्र एवं रथसे हीन होकर भी घोड़ों और रथोंपर चढ़कर आये हुए तुम सब लोगोंको उसी तरह अपने तेजसे नष्ट कर दूँगा, जैसे रात्रिके अन्तमें सूर्यदेव सम्पूर्ण नक्षत्रोंको अपने तेजसे अदृश्य कर देते हैं।। १८ १/२।। अद्यानृण्यं गमिष्यामि क्षत्रियाणां यशस्विनाम्।। १९।। बाह्लीकद्रोणभीष्माणां कर्णस्य च महात्मनः। जयद्रथस्य शूरस्य भगदत्तस्य चोभयोः।। २०।। मद्रराजस्य शल्यस्य भूरिश्रवस एव च। पुत्राणां भरतश्रेष्ठ शकुनेः सौबलस्य च।। २१।। मित्राणां सुहृदां चैव बान्धवानां तथैव च। आनृण्यमद्य गच्छामि हत्वा त्वां भ्रातृभिः सह।। २२।। एतावदुक्त्वा वचनं विरराम जनाधिपः। 'भरतश्रेष्ठ! आज मैं भाइयोंसहित तुम्हारा वध करके उन यशस्वी क्षत्रियोंके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा। बाह्लीक, द्रोण, भीष्म, महामना कर्ण, शूरवीर जयद्रथ, भगदत्त, मद्रराजशल्य, भूरिश्रवा, सुबलकुमार शकुनि तथा पुत्रों, मित्रों, सुहृदों एवं बन्धु-बान्धवोंके ऋणसे भी उऋण हो जाऊँगा।' राजा दुर्योधन इतना कहकर चुप हो गया।। १९—२२ १/२।।

युधिष्ठिर उवाच

दिष्ट्या त्वमपि जानीषे क्षत्रधर्मं सुयोधन ॥ २३ ॥ दिष्ट्या ते वर्तते बुद्धिर्युद्धायैव महाभुज । दिष्ट्या शूरोऽसि कौरव्य दिष्ट्या जानासि संगरम् ॥ २४ ॥ युधिष्ठिर बोले— सुयोधन! सौभाग्यकी बात है कि तुम भी क्षत्रिय-धर्मको जानते हो। महाबाहो! यह जानकर प्रसन्नता हुई कि अभी तुम्हारा विचार युद्ध करनेका ही है। कुरुनन्दन! तुम शूरवीर हो और युद्ध करना जानते हो—यह हर्ष और सौभाग्यकी बात है ॥ यस्त्वमेको हि नः सर्वान् संगरे योद्धुमिच्छसि । एक एकेन संगम्य यत् ते सम्मतमायुधम् ॥ २५ ॥ तत् त्वमादाय युध्यस्व प्रेक्षकास्ते वयं स्थिताः । तुम रणभूमिमें अकेले ही एक-एकके साथ भिड़कर हम सब लोगोंसे युद्ध करना चाहते हो तो ऐसा ही सही। जो हथियार तुम्हें पसंद हो, उसीको लेकर हमलोगोंमेंसे एक-एकके साथ युद्ध करो। हम सब लोग दर्शक बनकर खड़े रहेंगे ॥ २५ १/२ ॥ स्वयमिष्टं च ते कामं वीर भूयो ददाम्यहम् ॥ २६ ॥ हत्वैकं भवतो राज्यं हतो वा स्वर्गमाप्नुहि । वीर! मैं स्वयं ही पुनः तुम्हें यह अभीष्ट वर देता हूँ कि ‘हममेंसे एकका भी वध कर देनेपर सारा राज्य तुम्हारा हो जायगा अथवा यदि तुम्हीं मारे गये तो स्वर्गलोक प्राप्त करोगे' ॥ २६ १/२ ॥

दुर्योधन उवाच

एकश्चेद् योद्धुमाक्रन्दे शूरोऽद्य मम दीयताम् ॥ २७ ॥ आयुधानामियं चापि वृता त्वत्सम्मते गदा । दुर्योधन बोला— राजन्! यदि ऐसी बात है तो इस महासमरमें मेरे साथ लड़नेके लिये आज किसी भी एक शूरवीरको दे दो और तुम्हारी सम्मतिके अनुसार हथियारोंमें मैंने एकमात्र इस गदाका ही वरण किया है ॥ २७ १/२ ॥ हन्तैकं भवतामेकः शक्यं मां योऽभिमन्यते ॥ २८ ॥ पदातिर्गदया संख्ये स युध्यतु मया सह । मैं हर्षके साथ कह रहा हूँ कि 'तुममेंसे कोई भी एक वीर जो मुझ अकेलेको जीत सकनेका अभिमान रखता हो, वह रणभूमिमें पैदल ही गदाद्वारा मेरे साथ युद्ध करे' ॥ वृत्तानि रथयुद्धानि विचित्राणि पदे पदे ॥ २९ ॥ इदमीकं गदायुद्धं भवत्वद्याद्भुतं महत् । रथके विचित्र युद्ध तो पग-पगपर हुए हैं। आज यह एक अत्यन्त अद्भुत गदायुद्ध भी हो जाय ॥ २९ १/२ ॥ अस्त्राणामपि पर्यायं कर्तुमिच्छन्ति मानवाः ॥ ३० ॥

युद्धानामपि पर्यायो भवत्वनुमते तव ।
मनुष्य बारी-बारीसे एक-एक अस्त्रका प्रयोग करना चाहते हैं; परंतु आज तुम्हारी अनुमतिसे युद्ध भी क्रमशः एक-एक योद्धाके साथ ही हो ।। ३० १/२ ।।
गदया त्वां महाबाहो विजेष्यामि सहानुजम् ।। ३१ ।।
पञ्चालान् सृञ्जयांश्चैव ये चान्ये तव सैनिकाः ।
न हि मे सम्भ्रमो जातु शक्रादपि युधिष्ठिर ।। ३२ ।।
महाबाहो! मैं गदाके द्वारा भाइयोंसहित तुमको, पांचालों और सृंजयोंको तथा जो तुम्हारे दूसरे सैनिक हैं, उनको भी जीत लूँगा। युधिष्ठिर! मुझे इन्द्रसे भी कभी घबराहट नहीं होती ।। ३१-३२ ।।

युधिष्ठिर उवाच

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गान्धारे मां योधय सुयोधन ।
एक एकेन संगम्य संयुगे गदया बली ।। ३३ ।।
पुरुषो भव गान्धारे युध्यस्व सुसमाहितः ।
अद्य ते जीवितं नास्ति यदीन्द्रोऽपि तवाश्रयः ।। ३४ ।।
**युधिष्ठिर बोले—**गान्धारीनन्दन! सुयोधन! उठो-उठो और मेरे साथ युद्ध करो। बलवान् तो तुम हो ही। युद्धमें गदाके द्वारा अकेले किसी एक वीरके साथ ही भिड़कर अपने पुरुषत्वका परिचय दो। एकाग्रचित्त होकर युद्ध करो। यदि इन्द्र भी तुम्हारे आश्रयदाता हो जायँ तो भी आज तुम्हारे प्राण नहीं बच सकते ।। ३३-३४ ।।

संजय उवाच

एतत् स नरशार्दूलो नामृष्यत तवात्मजः ।
सलिलान्तर्गतः श्वभ्रे महानाग इव श्वसन् ।। ३५ ।।
**संजय कहते हैं—**राजन्! युधिष्ठिरके इस कथनको जलमें स्थित हुआ आपका पुत्र पुरुषसिंह दुर्योधन नहीं सह सका। वह बिलमें बैठे हुए विशाल सर्पके समान लंबी साँस खींचने लगा ।। ३५ ।।
तथासौ वाक्प्रतोदेन तुद्यमानः पुनः पुनः ।
वचो न ममृषे राजन्नुत्तमाश्वः कशामिव ।। ३६ ।।
राजन्! जैसे अच्छा घोड़ा कोड़ेकी मार नहीं सह सकता है, उसी प्रकार वचनरूपी चाबुकसे बार-बार पीड़ित किया जाता हुआ दुर्योधन युधिष्ठिरकी उस बातको सहन न कर सका ।। ३६ ।।
संक्षोभ्य सलिलं वेगाद् गदामादाय वीर्यवान् ।
अद्रिसारमयीं गुर्वीं काञ्चनाङ्गदभूषणाम् ।। ३७ ।।
अन्तर्जलात् समुत्तस्थौ नागेन्द्र इव निःश्वसन् ।