महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
द्रोणाचार्य बोले— राजन्! यदि वीरवर अर्जुन युद्धमें युधिष्ठिरकी रक्षा न करते हों, तब तुम पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिरको अपने वशमें आया हुआ ही समझो॥ २०॥
न हि शक्यो रणे पार्थः सेन्द्रैर्देवासुरैरपि।
प्रत्युद्द्यातुमदस्तत्तात नैतदामर्षयाम्यहम्॥ २१॥
तात! रणक्षेत्रमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी अर्जुनका सामना नहीं कर सकते हैं। अतः मुझमें भी उन्हें जीतनेका उत्साह नहीं है॥ २१॥
असंशयं स मे शिष्यो मत्पूर्वश्वास्त्रकर्मणि।
तरुणः सुकृतैर्युक्त एकायनगतश्च ह॥ २२॥
अस्त्राणीन्द्राच्च रुद्राच्च भूयः स समवाप्तवान्।
अमर्षितश्च ते राजंस्ततो नामर्षयाम्यहम्॥ २३॥
इसमें संदेह नहीं कि अर्जुन मेरा शिष्य है और उसने पहले मुझसे ही अस्त्रविद्या सीखी है, तथापि वह तरुण है। अनेक प्रकारके पुण्य कर्मोंसे युक्त है। विजय अथवा मृत्यु—इन दोनोंमेंसे एकका वरण करनेका दृढ़ निश्चय कर चुका है। इन्द्र और रुद्र आदि देवताओंसे पुनः बहुत-से दिव्यास्त्रोंकी शिक्षा पा चुका है और तुम्हारे प्रति उसका अमर्ष बढ़ा हुआ है। इसलिये राजन्! मैं अर्जुनसे लड़नेका उत्साह नहीं रखता हूँ॥ २२-२३॥
स चापक्रम्यतां युद्धाद् येनोपायेन शक्यते।
अपनीते ततः पार्थे धर्मराजो जितस्त्वया॥ २४॥
अतः जिस उपायसे भी सम्भव हो, तुम उन्हें युद्धसे दूर हटा दो। कुन्तीकुमार अर्जुनके रणक्षेत्रसे हट जानेपर समझ लो कि तुमने धर्मराजको जीत लिया॥ २४॥
ग्रहणे हि जयस्तस्य न वधे पुरुषर्षभ।
एतेन चाप्युपायेन ग्रहणं समुपैष्यसि॥ २५॥
नरश्रेष्ठ! उनको पकड़ लेनेमें ही तुम्हारी विजय है, उनके वधमें नहीं; परंतु इसी उपायसे तुम उन्हें पकड़ पाओगे॥ २५॥
अहं गृहीत्वा राजानं सत्यधर्मपरायणम्।
आनयिष्यामि ते राजन् वशमद्य न संशयः॥ २६॥
यदि स्थास्यति संग्रामे मुहूर्तमपि मेऽग्रतः।
अपनीते नरव्याघ्रे कुन्तीपुत्रे धनंजये॥ २७॥
राजन्! पुरुषसिंह कुन्तीपुत्र अर्जुनके युद्धसे हट जानेपर यदि वे दो घड़ी भी मेरे सामने संग्राममें खड़े रहेंगे तो मैं आज सत्यधर्मपरायण राजा युधिष्ठिरको पकड़कर तुम्हारे वशमें ला दूँगा, इसमें संशय नहीं है॥
फाल्गुनस्य समीपे तु न हि शक्यो युधिष्ठिरः।
ग्रहीतुं समरे राजन् सेन्द्रैरपि सुरासुरैः॥ २८॥
राजन्! अर्जुनके समीप तो समरभूमिमें इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता और असुर भी युधिष्ठिरको नहीं पकड़ सकते हैं॥ २८॥
संजय उवाच
सान्तरं तु प्रतिज्ञाते राज्ञो द्रोणेन निग्रहे।
गृहीतं तममन्यन्त तव पुत्राः सुबालिशाः॥ २९॥
संजय कहते हैं— राजन्! द्रोणाचार्यने कुछ अन्तर रखकर जब राजा युधिष्ठिरको पकड़ लानेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब आपके मूर्ख पुत्र उन्हें कैद हुआ ही मानने लगे॥ २९॥
पाण्डवेयेषु सापेक्षं द्रोणं जानाति ते सुतः।
ततः प्रतिज्ञास्थैर्यार्थं स मन्त्रो बहुलीकृतः॥ ३०॥
आपका पुत्र दुर्योधन यह जानता था कि द्रोणाचार्य पाण्डवोंके प्रति पक्षपात रखते हैं, अतः उसने उनकी प्रतिज्ञाको स्थिर रखनेके लिये उस गुप्त बातको भी बहुत लोगोंमें फैला दिया॥ ३०॥
ततो दुर्योधनेनापि ग्रहणं पाण्डवस्य तत्।
(स्कन्धावारेषु सर्वेषु यथास्थानेषु मारिष।)
सैन्यस्थानेषु सर्वेषु सुघोषितमरिंदम॥ ३१॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले आर्य धृतराष्ट्र! तदनन्तर दुर्योधनने युद्धकी सारी छावनियोंमें तथा सेनाके विश्राम करनेके प्रायः सभी स्थानोंपर द्रोणाचार्यकी युधिष्ठिरको पकड़ लानेकी उस प्रतिज्ञाको घोषित करवा दिया॥ ३१॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि द्रोणप्रतिज्ञायां द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें द्रोणप्रतिज्ञाविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३३ १/३ श्लोक हैं।)
त्रयोदशोऽध्यायः
अर्जुनका युधिष्ठिरको आश्वासन देना तथा युद्धमें द्रोणाचार्यका पराक्रम
संजय उवाच
सान्तरे तु प्रतिज्ञाते राज्ञो द्रोणेन निग्रहे ।
ततस्ते सैनिकाः श्रुत्वा तं युधिष्ठिरनिग्रहम् ॥ १ ॥
सिंहनादरवांश्चक्रुर्बाहुशब्दांश्च कृत्स्नशः ।
तच्च सर्वं यथान्यायं धर्मराजेन भारत ॥ २ ॥
आप्तैराशु परिज्ञातं भारद्वाजचिकीर्षितम् ।
संजय कहते हैं— राजन्! जब द्रोणाचार्यने कुछ अन्तर रखकर राजा युधिष्ठिरको कैद करनेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब आपके सैनिकोंने युधिष्ठिरके पकड़े जानेका उद्योग सुनकर जोर-जोरसे सिंहनाद करना और भुजाओंपर ताल ठोंकना आरम्भ किया। भरतनन्दन! उस समय धर्मराज युधिष्ठिरने शीघ्र ही अपने विश्वसनीय गुप्तचरोंद्वारा यथायोग्य सारी बातें पूर्णरूपसे जान लीं कि द्रोणाचार्य क्या करना चाहते हैं ।। १-२ १/२ ।।
ततः सर्वान् समानाय्य भ्रातॄनन्यांश्च सर्वशः ॥ ३ ॥
अब्रवीद् धर्मराजस्तु धनंजयमिदं वचः ।
श्रुतं ते पुरुषव्याघ्र द्रोणस्याद्य चिकीर्षितम् ॥ ४ ॥
तब धर्मराज युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंको और दूसरे राजाओंको सब ओरसे बुलवाकर धनंजय अर्जुनसे कहा—‘पुरुषसिंह! आज द्रोण क्या करना चाहते हैं, यह तुमने सुना ही होगा? ।। ३-४ ।।
यथा तन्न भवेत् सत्यं तथा नीतिर्विधीयताम् ।
सान्तरं हि प्रतिज्ञातं द्रोणेनामित्रकर्षिणा ॥ ५ ॥
‘अतः तुम ऐसी नीति बताओ, जिससे उनकी इच्छा सफल न हो। शत्रुसूदन द्रोणने कुछ अन्तर रखकर प्रतिज्ञा की है ।। ५ ।।
तच्चान्तरं महेष्वास त्वयि तेन समाहितम् ।
स त्वमद्य महाबाहो युध्यस्व मदनन्तरम् ॥ ६ ॥
यथा दुर्योधनः कामं नेमं द्रोणादवाप्नुयात् ।
‘महाधनुर्धर अर्जुन! वह अन्तर उन्होंने तुम्हींपर डाल रखा है। अतः महाबाहो! आज तुम मेरे समीप रहकर ही युद्ध करो, जिससे दुर्योधन द्रोणाचार्यसे अपने इस मनोरथको पूर्ण न करा सके’ ।। ६ १/२ ।।
अर्जुन उवाच
यथा मे न वधः कार्य आचार्यस्य कदाचन ॥ ७ ॥ तथा तव परित्यागो न मे राजंश्चिकीर्षितः । **अर्जुन बोले—**राजन्! जिस प्रकार मेरे लिये आचार्यका कभी वध न करना कर्तव्य है, उसी प्रकार किसी भी दशामें आपका परित्याग करना मुझे अभीष्ट नहीं है ॥
अप्येवं पाण्डव प्राणानुत्सृजेयमहं युधि ॥ ८ ॥ प्रतीपो नाहमाचार्ये भवेयं वै कथंचन । पाण्डुनन्दन! इस नीतिके अनुसार बर्ताव करते हुए मैं युद्धमें अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगा; परंतु किसी प्रकार भी आचार्यका शत्रु नहीं बनूँगा ॥ ८ १/२ ॥
त्वां निगृह्याहवे राज्यं धार्तराष्ट्रोऽयमिच्छति ॥ ९ ॥ न स तं जीवलोकेऽस्मिन् कामं प्राप्स्येत् कथंचन । महाराज! यह धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन जो आपको युद्धमें कैद करके सारा राज्य हथिया लेना चाहता है, वह इस जगत्में अपने उस मनोरथको किसी प्रकार पूर्ण नहीं कर सकता ॥ ९ १/२ ॥
प्रपतेद् द्यौः सनक्षत्रा पृथिवी शकलीभवेत् ॥ १० ॥ न त्वां द्रोणो निगृह्णीयाज्जीवमाने मयि ध्रुवम् । नक्षत्रोंसहित आकाश फट पड़े और पृथ्वीके टुकड़े-टुकड़े हो जायँ, तो भी मेरे जीते-जी द्रोणाचार्य आपको पकड़ नहीं सकते; यह ध्रुव सत्य है ॥ १० १/२ ॥
यदि तस्य रणे साह्यं कुरुते वज्रभृत् स्वयम् ॥ ११ ॥ विष्णुर्वा सहितो देवैर्न त्वां प्राप्स्यत्यसौ मृधे । मयि जीवति राजेन्द्र न भयं कर्तुमर्हसि ॥ १२ ॥ द्रोणादस्त्रभृतां श्रेष्ठात् सर्वशस्त्रभृतामपि । राजेन्द्र! यदि रणक्षेत्रमें साक्षात् वज्रधारी इन्द्र अथवा भगवान् विष्णु सम्पूर्ण देवताओंके साथ आकर दुर्योधनकी सहायता करें, तो भी मेरे जीते-जी वह आपको पकड़ नहीं सकेगा; अतः आपको सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यसे भय नहीं करना चाहिये ॥ ११-१२ १/२ ॥
अन्यच्च ब्रूयां राजेन्द्र प्रतिज्ञां मम निश्चलाम् ॥ १३ ॥ न स्मराम्यनृतं तावन्न स्मरामि पराजयम् । न स्मरामि प्रतिश्रुत्य किंचिदप्यनृतं कृतम् ॥ १४ ॥ महाराज! मैं अपनी दूसरी भी निश्चल प्रतिज्ञा आपको सुनाता हूँ। मैंने कभी झूठ कहा हो, इसका स्मरण नहीं है। मेरी कहीं पराजय हुई हो, इसकी भी याद नहीं है और मैंने
प्रतिज्ञा करके उसे तनिक भी झूठी कर दिया हो, इसका भी मुझे स्मरण नहीं है॥ १३-१४॥
संजय उवाच
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च मृदङ्गाश्चानकैः सह ।
प्रावाद्यन्त महाराज पाण्डवानां निवेशने ॥ १५ ॥
सिंहनादश्च संजज्ञे पाण्डवानां महात्मनाम् ।
धनुर्ज्यातालशब्दश्च गगनस्पृक् सुभैरवः ॥ १६ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! तदनन्तर पाण्डवोंके शिविरमें शंख, भेरी, मृदंग और आनक आदि बाजे बजने लगे। महात्मा पाण्डवोंका सिंहनाद सहसा प्रकट हुआ। धनुषकी टंकारका भयंकर शब्द आकाशमें गूँजने लगा ॥ १५-१६ ॥
श्रुत्वा शङ्खस्य निर्घोषं पाण्डवस्य महौजसः ।
त्वदीयेष्वप्यनीकेषु वादित्राण्यभिजघ्निरे ॥ १७ ॥
महातेजस्वी पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी सेनामें वह शंखध्वनि सुनकर आपकी सेनाओंमें भी भाँति-भाँतिके बाजे बजने लगे ॥ १७ ॥
ततो व्यूढान्यनीकानि तव तेषां च भारत ।
शनैरुपेयुरन्योन्यं योध्यमानानि संयुगे ॥ १८ ॥
भारत! तदनन्तर आपकी और उनकी भी सेनाएँ व्यूहबद्ध होकर धीरे-धीरे युद्धके लिये एक-दूसरीके समीप आने लगीं ॥ १८ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
पाण्डवानां कुरूणां च द्रोणपाञ्चाल्ययोरपि ॥ १९ ॥
तदनन्तर कौरवों तथा पाण्डवोंमें और द्रोणाचार्य तथा धृष्टद्युम्नमें रोमांचकारी भयंकर युद्ध होने लगा ॥ १९ ॥
यत्नमानाः प्रयत्नेन द्रोणानीकविशातने ।
न शेकुः सृञ्जया युद्धे तद्धि द्रोणेन पालितम् ॥ २० ॥
सृंजय योद्धा उस युद्धमें द्रोणाचार्यकी सेनाका विनाश करनेके लिये बड़े यत्नके साथ चेष्टा करने लगे, परंतु सफल न हो सके; क्योंकि वह सेना आचार्य द्रोणके द्वारा भली-भाँति सुरक्षित थी ॥ २० ॥
तथैव तव पुत्रस्य रथोदाराः प्रहारिणः ।
न शेकुः पाण्डवीं सेनां पाल्यमानां किरीटिना ॥ २१ ॥
इसी प्रकार आपके पुत्रकी सेनाके उदार महारथी, जो प्रहार करनेमें कुशल थे, पाण्डव-सेनाको परास्त न कर सके; क्योंकि किरीटधारी अर्जुन उसकी रक्षा कर रहे थे ॥ २१ ॥
आस्तां ते स्तिमिते सेने रक्ष्यमाणे परस्परम् ।
सम्प्रसुप्ते यथा नक्तं वनराज्यौ सुपुष्पिते ॥ २२ ॥
जैसे रातमें सुन्दर पुष्पोंसे सुशोभित दो वनश्रेणियाँ प्रसुप्त (सिकुड़े हुए पत्तोंसे युक्त) देखी जाती हैं, उसी प्रकार वे सुरक्षित हुई दोनों सेनाएँ आमने-सामने निश्चलभावसे खड़ी थीं ॥ २२ ॥
ततो रुक्मरथो राजन्नर्केणेव विराजता ।
वरूथिना विनिष्पत्य व्यचरत् पृतनामुखे ॥ २३ ॥
राजन्! तदनन्तर सुवर्णमय रथवाले द्रोणाचार्य सूर्यके समान प्रकाशमान आवरणयुक्त रथके द्वारा आगे बढ़कर सेनाके प्रमुख भागमें विचरने लगे ॥ २३ ॥
तमुद्यतं रथेनैकमाशुकारिणमाहवे ।
अनेकमिव संत्रासान्मेनिरे पाण्डुसृञ्जयाः ॥ २४ ॥
द्रोणाचार्य युद्धस्थलमें केवल रथके द्वारा उद्यत होकर अकेले ही शीघ्रतापूर्वक अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग कर रहे थे। उस समय पाण्डव तथा सृंजय भयके मारे उन्हें अनेक-सा मान रहे थे ॥ २४ ॥
तेन मुक्ताः शरा घोरा विचेरुः सर्वतोदिशम् ।
त्रासयन्तो महाराज पाण्डवेयस्य वाहिनीम् ॥ २५ ॥
महाराज! उनके द्वारा छोड़े हुए भयंकर बाण पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी सेनाको भयभीत करते हुए चारों ओर विचर रहे थे ॥ २५ ॥
मध्यंदिनमनुप्राप्तो गभस्तिशतसंवृतः ।
यथा दृश्येत धर्मांशुस्तथा द्रोणोऽप्यदृश्यत ॥ २६ ॥
दोपहरके समय सहस्रों किरणोंसे व्याप्त प्रचण्ड तेजवाले भगवान् सूर्य जैसे दिखायी देते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्य भी दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ २६ ॥
न चैनं पाण्डवेयानां कश्चिच्छक्नोति भारत ।
वीक्षितुं समरे क्रुद्धं महेन्द्रमिव दानवाः ॥ २७ ॥
भरतनन्दन! जैसे दानवदल क्रोधमें भरे हुए देवराज इन्द्रकी ओर देखनेका साहस नहीं करता है, उसी प्रकार पाण्डव-सेनाका कोई भी वीर समरभूमिमें द्रोणाचार्यकी ओर आँख उठाकर देख न सका ॥ २७ ॥
मोहयित्वा ततः सैन्यं भारद्वाजः प्रतापवान् ।
धृष्टद्युम्नबलं तूर्णं व्यधमन्निशितैः शरैः ॥ २८ ॥
इस प्रकार प्रतापी द्रोणाचार्यने पाण्डव-सेनाको मोहित करके पैने बाणोंद्वारा तुरंत ही धृष्टद्युम्नकी सेनाका संहार आरम्भ कर दिया ॥ २८ ॥
स दिशः सर्वतो रुद्ध्वा संवृत्य खमजिह्मगैः ।
पार्षतो यत्र तत्रैव ममृदे पाण्डुवाहिनीम् ॥ २९ ॥
उन्होंने अपने सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको अवरुद्ध करके आकाशको भी आच्छादित कर दिया और जहाँ धृष्टद्युम्न खड़ा था, वहीं वे पाण्डव-सेनाका मर्दन करने लगे ।। २९ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि अर्जुनकृतयुधिष्ठिराश्वासने त्रयोदशोऽध्यायः ।। १३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें अर्जुनके द्वारा युधिष्ठिरको आश्वासनविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३ ।।
चतुर्दशोऽध्यायः
द्रोणका पराक्रम, कौरव-पाण्डववीरोंका द्वन्द्वयुद्ध, रणनदीका वर्णन तथा अभिमन्युकी वीरता
संजय उवाच
ततः स पाण्डवानीके जनयन् सुमहद् भयम् ।
व्यचरत् पृतनां द्रोणो दहन् कक्षमिवानलः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! जैसे आग घास-फूसके समूहको जला देती है, उसी प्रकार द्रोणाचार्य पाण्डव-दलमें महान् भय उत्पन्न करते और सारी सेनाको चलाते हुए सब ओर विचरने लगे ॥ १ ॥
निर्दहन्तमनीकानि साक्षादग्निमिवोत्थितम् ।
दृष्ट्वा रुक्मरथं क्रुद्धं समकम्पन्त सृञ्जयाः ॥ २ ॥
सुवर्णमय रथवाले द्रोणको वहाँ प्रकट हुए साक्षात् अग्निदेवके समान क्रोधमें भरकर सम्पूर्ण सेनाओंको दग्ध करते देख समस्त सृंजयवीर काँप उठे ॥ २ ॥
सततं कृष्यतः संख्ये धनुषोऽस्याशुकारिणः ।
ज्याघोषः शुश्रुवेऽत्यर्थं विस्फूर्जितमिवाशनेः ॥ ३ ॥
बाण चलानेमें शीघ्रता करनेवाले द्रोणाचार्यके युद्धमें निरन्तर खींचे जाते हुए धनुषकी प्रत्यंचाका टंकार-घोष वज्रकी गड़गड़ाहटके समान बड़े जोर-जोरसे सुनायी दे रहा था ॥ ३ ॥
रथिनः सादिनश्चैव नागानश्वांन् पदातिनः ।
रौद्रा हस्तवता मुक्ताः सम्मृद्नन्ति स्म सायकाः ॥ ४ ॥
शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले द्रोणाचार्यके छोड़े हुए भयंकर बाण पाण्डव-सेनाके रथियों, घुड़सवारों, हाथियों, घोड़ों और पैदल योद्धाओंको गर्दमें मिला रहे थे ॥ ४ ॥
नानद्यमानः पर्जन्यः प्रवृद्धः शुचिसंक्षये ।
अश्मवर्षमिवावर्षत् परेषामावहद् भयम् ॥ ५ ॥
आषाढ़ मास बीत जानेपर वर्षाके प्रारम्भमें जैसे मेघ अत्यन्त गर्जन-तर्जनके साथ फैलकर आकाशमें छा जाता और पत्थरोंकी वर्षा करने लगता है, उसी प्रकार द्रोणाचार्य भी बाणोंकी वर्षा करके शत्रुओंके मनमें भय उत्पन्न करने लगे ॥ ५ ॥
विचरन् स तदा राजन् सेनां संक्षोभयन् प्रभुः ।
वर्धयामास संत्रासं शात्रवाणाममानुषम् ॥ ६ ॥
राजन्! शक्तिशाली द्रोणाचार्य उस समय रणभूमिमें विचरते और पाण्डव-सेनाको क्षुब्ध करते हुए शत्रुओंके मनमें लोकोत्तर भयकी वृद्धि करने लगे ॥ ६ ॥ तस्य विद्युदिवाभ्रेषु चापं हेमपरिष्कृतम् । भ्रमद्रथाम्बुदे चास्मिन् दृश्यते स्म पुनः पुनः ॥ ७ ॥ उनके घूमते हुए रथरूपी मेघमण्डलमें सुवर्णभूषित धनुष विद्युत्के समान बारंबार प्रकाशित दिखायी देता था ॥ स वीरः सत्यवान् प्राज्ञो धर्मनित्यः सदा पुनः । युगान्तकालवद् घोरां रौद्रां प्रावर्तयन्नदीम् ॥ ८ ॥ उन सत्यपरायण परम बुद्धिमान् तथा नित्य धर्ममें तत्पर रहनेवाले वीर द्रोणाचार्यने उस रणक्षेत्रमें प्रलय-कालके समान अत्यन्त भयंकर रक्तकी नदी प्रवाहित कर दी ॥ ८ ॥ अमर्षवेगप्रभवां क्रव्यादगणसंकुलाम् । बलौघैः सर्वतः पूर्णां ध्वजवृक्षापहारिणीम् ॥ ९ ॥ उस नदीका प्राकट्य क्रोधके आवेगसे हुआ था। मांसभक्षी जन्तुओंसे वह घिरी हुई थी। सेनारूपी प्रवाहद्वारा वह सब ओरसे परिपूर्ण थी और ध्वजरूपी वृक्षोंको तोड़-फोड़कर बहा रही थी ॥ ९ ॥ शोणितोदां रथावर्तां हस्त्यश्वकृतरोधसम् । कवचोडुपसंयुक्तां मांसपङ्कसमाकुलाम् ॥ १० ॥ उस नदीमें जलकी जगह रक्तराशि भरी हुई थी, रथोंकी भँवरें उठ रही थीं, हाथी और घोड़ोंकी ऊँची-ऊँची लाशें उस नदीके ऊँचे किनारोंके समान प्रतीत होती थीं। उसमें कवच नावकी भाँति तैर रहे थे तथा वह मांसरूपी कीचड़से भरी हुई थी ॥ १० ॥ मेदोमज्जास्थिसिकतामुष्णीषचयफेनिलाम् । संग्रामजलदापूर्णां प्रासमत्स्यसमाकुलाम् ॥ ११ ॥ मेद, मज्जा और हड्डियाँ वहाँ बालुकाराशिके समान प्रतीत होती थीं। पगड़ियोंका समूह उसमें फेनके समान जान पड़ता था। संग्रामरूपी मेघ उस नदीको रक्तकी वर्षाद्वारा भर रहा था। वह नदी प्रासरूपी मत्स्योंसे भरी हुई थी ॥ नरनागाश्वकलिलां शरवेगौघवाहिनीम् । शरीरदारुसंघट्टां रथकच्छपसंकुलाम् ॥ १२ ॥ वहाँ पैदल, हाथी और घोड़े ढेर-के-ढेर पड़े हुए थे। बाणोंका वेग ही उस नदीका प्रखर प्रवाह था, जिसके द्वारा वह प्रवाहित हो रही थी। शरीररूपी काष्ठसे ही मानो उसका घाट बनाया गया था। रथरूपी कछुओंसे वह नदी व्याप्त हो रही थी ॥ १२ ॥ उत्तमाङ्गैः पङ्कजिनीं निस्त्रिंशझषसंकुलाम् । रथनागह्रदोपेतां नानाभरणभूषिताम् ॥ १३ ॥
योद्धाओंके कटे हुए मस्तक कमल-पुष्पके समान जान पड़ते थे, जिनके कारण वह कमलवनसे सम्पन्न दिखायी देती थी। उसके भीतर असंख्य डूबती-बहती तलवारोंके कारण वह नदी मछलियोंसे भरी हुई-सी जान पड़ती थी। रथ और हाथियोंसे यत्र-तत्र घिरकर वह नदी गहरे कुण्डके रूपमें परिणत हो गयी थी। वह भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे विभूषित-सी प्रतीत होती थी ॥ १३ ॥
महारथशतावर्तां भूमिरेणूर्मिमालिनीम् ।
महावीर्यवतां संख्ये सुतरां भीरुदुस्तराम् ॥ १४ ॥
सैकड़ों विशाल रथ उसके भीतर उठती हुई भँवरोंके समान प्रतीत होते थे। वह धरतीकी धूल और तरंगमालाओंसे व्याप्त हो रही थी। उस युद्धस्थलमें वह नदी महापराक्रमी वीरोंके लिये सुगमतासे पार करने-योग्य और कायरोंके लिये दुस्तर थी ॥ १४ ॥
शरीरशतसम्बाधां गृध्रकङ्कनिषेविताम् ।
महारथसहस्राणि नयन्तीं यमसादनम् ॥ १५ ॥
उसके भीतर सैकड़ों लाशें पड़ी हुई थीं। गीध और कंक उस नदीका सेवन करते थे। वह सहस्रों महारथियोंको यमराजके लोकमें ले जा रही थी ॥ १५ ॥
शूलव्यालसमाकीर्णां प्राणिवाजिनिषेविताम् ।
छिन्नक्षत्रमहाहंसां मुकुताण्डजसेविताम् ॥ १६ ॥
उसके भीतर शूल सर्पोंके समान व्याप्त हो रहे थे। विभिन्न प्राणी ही वहाँ चल-पक्षीके रूपमें निवास करते थे। कटे हुए क्षत्रिय-समुदाय उसमें विचरनेवाले बड़े-बड़े हंसोंके समान प्रतीत होते थे। वह नदी राजाओंके मुकुटरूपी जलपक्षियोंसे सेवित दिखायी देती थी ॥ १६ ॥
चक्रकूर्मां गदानक्रां शरक्षुद्रझषाकुलाम् ।
बकगृध्रसृगालानां घोरसंघैर्निषेविताम् ॥ १७ ॥
उसमें रथोंके पहिये कछुओंके समान, गदाएँ नाकोंके समान और बाण छोटी-छोटी मछलियोंके समान भरे हुए थे। बगलों, गीधों और गीदड़ोंके भयानक समुदाय उसके तटपर निवास करते थे ॥ १७ ॥
निहतान् प्राणिनः संख्ये द्रोणेन बलिना रणे ।
वहन्तीं पितृलोकाय शतशो राजसत्तम ॥ १८ ॥
नृपश्रेष्ठ! बलवान् द्रोणाचार्यके द्वारा रणभूमिमें मारे गये सैकड़ों प्राणियोंको वह पितृलोकमें पहुँचा रही थी ॥
शरीरशतसम्बाधां केशशैवलशाद्वलाम् ।
नदीं प्रावर्तयद् राजन् भीरूणां भयवर्धिनीम् ॥ १९ ॥
उसके भीतर सैकड़ों लाशें बह रही थीं। केश सेवार तथा घासोंके समान प्रतीत होते थे। राजन्! इस प्रकार द्रोणाचार्यने वहाँ खूनकी नदी बहायी थी, जो कायरोंका भय बढ़ानेवाली थी ॥ १९ ॥ तर्जयन्तमनीकानि तानि तानि महारथम् । सर्वतोऽभ्यद्रवन् द्रोणं युधिष्ठिरपुरोगमाः ॥ २० ॥ उस समय समस्त सेनाओंको अपने गर्जन-तर्जनसे डराते हुए महारथी द्रोणाचार्यपर युधिष्ठिर आदि योद्धा सब ओरसे टूट पड़े ॥ २० ॥ तानभिद्रवतः शूरांस्तावका दृढविक्रमाः । सर्वतः प्रत्यगृह्णन्त तदभूल्लोमहर्षणम् ॥ २१ ॥ उन आक्रमण करनेवाले पाण्डव वीरोंको आपके सुदृढ़ पराक्रमी सैनिकोंने सब ओरसे रोक दिया। उस समय दोनों दलोंमें रोमांचकारी युद्ध होने लगा ॥ २१ ॥ शतमायस्तु शकुनिः सहदेवं समाद्रवत् । सनियन्तृध्वजरथं विव्याध निशितैः शरैः ॥ २२ ॥ सैकड़ों मायाओंको जाननेवाले शकुनिने सहदेवपर धावा किया और उनके सारथि, ध्वज एवं रथसहित उन्हें अपने पैने बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २२ ॥ तस्य माद्रीसुतः केतुं धनुः सूतं हयानपि । नातिक्रुद्धः शरैश्छित्त्वा षष्ट्या विव्याध सौबलम् ॥ २३ ॥ तब माद्रीकुमार सहदेवने अधिक कुपित न होकर शकुनिके ध्वज, धनुष, सारथि और घोड़ोंको अपने बाणोंद्वारा छिन्न-भिन्न करके साठ बाणोंसे सुबलपुत्र शकुनिको भी बींध डाला ॥ २३ ॥ सौबलस्तु गदां गृह्य प्रचस्कन्द रथोत्तमात् । स तस्य गदया राजन् रथात् सूतमपातयत् ॥ २४ ॥ यह देख सुबलपुत्र शकुनि गदा हाथमें लेकर उस श्रेष्ठ रथसे कूद पड़ा। राजन्! उसने अपनी गदाद्वारा सहदेवके रथसे उनके सारथिको मार गिराया ॥ २४ ॥ ततस्तौ विरथौ राजन् गदाहस्तौ महाबलौ । चिक्रीडतू रणे शूरौ सशृङ्गाविव पर्वतौ ॥ २५ ॥ महाराज! उस समय वे दोनों महाबली शूरवीर रथहीन हो गदा हाथमें लेकर रणक्षेत्रमें खेल-सा करने लगे, मानो शिखरवाले दो पर्वत परस्पर टकरा रहे हों ॥ २५ ॥ द्रोणः पाञ्चालराजानं विद्ध्वा दशभिराशुगैः । बहुभिस्तेन चाभ्यस्तस्तं विव्याध ततोऽधिकैः ॥ २६ ॥ द्रोणाचार्यने पांचालराज द्रुपदको दस शीघ्रगामी बाणोंसे बींध डाला। फिर द्रुपदने भी बहुत-से बाणोंद्वारा उन्हें घायल कर दिया। तब द्रोणने भी और अधिक सायकोंद्वारा द्रुपदको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ २६ ॥
विविंशतिं भीमसेनो विंशत्या निशितैः शरैः ।
विद्ध्वा नाकम्पयद् वीरस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २७ ॥
वीर भीमसेन बीस तीखे बाणोंद्वारा विविंशतिको घायल करके भी उन्हें विचलित न कर सके। यह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ २७ ॥
विविंशतिस्तु सहसा व्यश्वकेतुशरासनम् ।
भीमं चक्रे महाराज ततः सैन्यान्यपूजयन् ॥ २८ ॥
महाराज! फिर विविंशतिने भी सहसा आक्रमण करके भीमसेनके घोड़े, ध्वज और धनुष काट डाले; यह देख सारी सेनाओंने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ २८ ॥
स तन्न ममृषे वीरः शत्रोर्विक्रममाहवे ।
ततोऽस्य गदया दान्तान् हयान् सर्वानपातयत् ॥ २९ ॥
वीर भीमसेन युद्धमें शत्रुके इस पराक्रमको न सह सके। उन्होंने अपनी गदाद्वारा उसके समस्त सुशिक्षित घोड़ोंको मार डाला ॥ २९ ॥
हताश्वात् सरथाद् राजन् गृह्य चर्म महाबलः ।
अभ्यायाद् भीमसेनं तु मत्तो मत्तमिव द्विपम् ॥ ३० ॥
राजन्! घोड़ोंके मारे जानेपर महाबली विविंशति ढाल और तलवार लिये रथसे कूद पड़ा और जैसे एक मतवाला हाथी दूसरे मदोन्मत्त गजराजपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार उसने भीमसेनपर चढ़ाई की ॥ ३० ॥
शल्यस्तु नकुलं वीरः स्वस्त्रीयं प्रियमात्मनः ।
विव्याध प्रहसन् बाणैर्लालयन् कोपयन्निव ॥ ३१ ॥
वीर राजा शल्यने अपने प्यारे भानजे नकुलको हँसकर लाड़ लड़ाते और कुपित करते हुए-से अनेक बाणोंद्वारा बींध डाला ॥ ३१ ॥
तस्याश्वानासपत्रं च ध्वजं सूतमथो धनुः ।
निपात्य नकुलः संख्ये शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥ ३२ ॥
तब प्रतापी नकुलने उस युद्धस्थलमें शल्यके घोड़ों, छत्र, ध्वज, सारथि और धनुषको काट गिराया और विजयी होकर अपना शंख बजाया ॥ ३२ ॥
धृष्टकेतुः कृपेणास्तान् छित्त्वा बहुविधाञ्छरान् ।
कृपं विव्याध सप्तत्या लक्ष्म चास्याहरत् त्रिभिः ॥ ३३ ॥
धृष्टकेतुने कृपाचार्यके चलाये हुए अनेक बाणोंको काटकर उन्हें सत्तर बाणोंसे घायल कर दिया और तीन बाणोंद्वारा उनके चिह्नस्वरूप ध्वजको भी काट गिराया ॥ ३३ ॥
तं कृपः शरवर्षेण महता समवारयत् ।
विव्याध च रणे विप्रो धृष्टकेतुममर्षणम् ॥ ३४ ॥
तब ब्राह्मण कृपाचार्यने भारी बाण-वर्षाके द्वारा अमर्षशील धृष्टकेतुको युद्धमें आगे बढ़नेसे रोका और घायल कर दिया ॥ ३४ ॥
सात्यकिः कृतवर्माणं नाराचेन स्तनान्तरे । विद्ध्वा विव्याध सप्तत्या पुनरन्यैः स्मयन्निव ॥ ३५ ॥ सात्यकिने मुसकराते हुए-से एक नाराचद्वारा कृतवर्माकी छातीमें चोट की और पुनः अन्य सत्तर बाणोंद्वारा उसे क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ३५ ॥
तं भोजः सप्तसप्तत्या विद्ध्वाऽऽशु निशितैः शरैः । नाकम्पयत शैनेयं शीघ्रो वायुरिवाचलम् ॥ ३६ ॥ तब भोजवंशी कृतवर्माने तुरंत ही सतहत्तर पैने बाणोंद्वारा सात्यकिको बींध डाला, तथापि वह उन्हें विचलित न कर सका। जैसे तेज चलनेवाली वायु पर्वतको नहीं हिला पाती है ॥ ३६ ॥
सेनापतिः सुशर्माणं भृशं मर्मस्वताडयत् । स चापि तं तोमरेण जत्रुदेशेऽभ्यताडयत् ॥ ३७ ॥ दूसरी ओर सेनापति धृष्टद्युम्नने त्रिगर्तराज सुशर्माको उसके मर्मस्थानोंमें अत्यन्त चोट पहुँचायी। यह देख सुशर्माने भी तोमरद्वारा धृष्टद्युम्नके गलेकी हँसलीपर प्रहार किया ॥ ३७ ॥
वैकर्तनं तु समरे विराटः प्रत्यवारयत् । सह मत्स्यैर्महावीर्यैस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ३८ ॥ समरभूमिमें महापराक्रमी मत्स्यदेशीय वीरोंके साथ विराटने विकर्तनपुत्र कर्णको रोका। वह अद्भुत-सी बात थी ॥ ३८ ॥
तत् पौरुषमभूत् तत्र सूतपुत्रस्य दारुणम् । यत् सैन्यं वारयामास शरैः संनतपर्वभिः ॥ ३९ ॥ वहाँ सूतपुत्र कर्णका भयंकर पुरुषार्थ प्रकट हुआ। उसने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उनकी समस्त सेनाकी प्रगति रोक दी ॥ ३९ ॥
द्रुपदस्तु स्वयं राजा भगदत्तेन संगतः । तयोर्युद्धं महाराज चित्ररूपमिवाभवत् ॥ ४० ॥ महाराज! तदनन्तर राजा द्रुपद स्वयं जाकर भगदत्तसे भिड़ गये। महाराज! फिर उन दोनोंमें विचित्र-सा युद्ध होने लगा ॥ ४० ॥
भगदत्तस्तु राजानं द्रुपदं नतपर्वभिः । सनियन्तृध्वजरथं विव्याध पुरुषर्षभः ॥ ४१ ॥ पुरुषश्रेष्ठ भगदत्तने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे राजा द्रुपदको उनके सारथि, रथ और ध्वजसहित बींध डाला ॥
द्रुपदस्तु ततः क्रुद्धो भगदत्तं महारथम् । आजघानोरसि क्षिप्रं शरेणानतपर्वणा ॥ ४२ ॥
यह देख द्रुपदने कुपित हो शीघ्र ही झुकी हुई गाँठवाले बाणके द्वारा महारथी भगदत्तकी छातीमें प्रहार किया ॥ ४२ ॥ युद्धं योधवरौ लोके सौमदत्तिशिखण्डिनौ । भूतानां त्रासजननं चक्रातेऽस्त्रविशारदौ ॥ ४३ ॥ भूरिश्रवा और शिखण्डी—ये दोनों संसारके श्रेष्ठ योद्धा और अस्त्रविद्याके विशेषज्ञ थे। उन दोनोंने सम्पूर्ण भूतोंको त्रास देनेवाला युद्ध किया ॥ ४३ ॥ भूरिश्रवा रणे राजन् याज्ञसेनिं महारथम् । महता सायकौघेन छादयामास वीर्यवान् ॥ ४४ ॥ राजन्! पराक्रमी भूरिश्रवाने रणक्षेत्रमें द्रुपदपुत्र महारथी शिखण्डीको सायकसमूहोंकी भारी वर्षा करके आच्छादित कर दिया ॥ ४४ ॥ शिखण्डी तु ततः क्रुद्धः सौमदत्तिं विशाम्पते । नवत्या सायकानां तु कम्पयामास भारत ॥ ४५ ॥ प्रजानाथ! भरतनन्दन! तब क्रोधमें भरे हुए शिखण्डीने नब्बे बाण मारकर सोमदत्तकुमार भूरिश्रवाको कम्पित कर दिया ॥ ४५ ॥ राक्षसौ रौद्रकर्माणौ हैडिम्बालम्बुषावुभौ । चक्रातेऽत्यद्भुतं युद्धं परस्परजयैषिणौ ॥ ४६ ॥ भयंकर कर्म करनेवाले राक्षस घटोत्कच और अलम्बुष—ये दोनों एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे अत्यन्त अद्भुत युद्ध करने लगे ॥ ४६ ॥ मायाशतसृजौ दृप्तौ मायाभिरितरेतरम् । अन्तर्हितौ चेरतुस्तौ भृशं विस्मयकारिणौ ॥ ४७ ॥ वे घमंडमें भरे हुए निशाचर सैकड़ों मायाओंकी सृष्टि करते और मायाद्वारा ही एक-दूसरेको परास्त करना चाहते थे। वे लोगोंको अत्यन्त आश्चर्यमें डालते हुए अदृश्यभावसे विचर रहे थे ॥ ४७ ॥ चेकितानोऽनुविन्देन युयुधे चातिभैरवम् । यथा देवासुरे युद्धे बलशक्रौ महाबलौ ॥ ४८ ॥ चेकितान अनुविन्दके साथ अत्यन्त भयंकर युद्ध करने लगे, मानो देवासुर-संग्राममें महाबली बल और इन्द्र लड़ रहे हों ॥ ४८ ॥ लक्ष्मणः क्षत्रदेवेन विमर्दमकरोद् भृशम् । यथा विष्णुः पुरा राजन् हिरण्याक्षेण संयुगे ॥ ४९ ॥ राजन्! जैसे पूर्वकालमें भगवान् विष्णु हिरण्याक्षके साथ युद्ध करते थे, उसी प्रकार उस रणक्षेत्रमें लक्ष्मण क्षत्रदेवके साथ भारी संग्राम कर रहा था ॥ ४९ ॥ ततः प्रचलिताश्वेन विधिवत्कल्पितेन च । रथेनाभ्यपतद् राजन् सौभद्रं पौरवो नदन् ॥ ५० ॥
राजन्! तदनन्तर विधिपूर्वक सजाये हुए चंचल घोड़ोंवाले रथपर आरूढ़ हो गर्जना करते हुए राजा पौरवने सुभद्रकुमार अभिमन्युपर आक्रमण किया ॥ ५० ॥
ततोऽभ्ययात् सत्वरितो युद्धाकाङ्क्षी महाबलः । तेन चक्रे महत् युद्धमभिमन्युररिंदमः ॥ ५१ ॥ तब शत्रुओंका दमन और युद्धकी अभिलाषा करनेवाले महाबली अभिमन्यु भी तुरंत सामने आया और उनके साथ महान् युद्ध करने लगा ॥ ५१ ॥
पौरवस्त्वथ सौभद्रं शरव्रातैरवाकिरत् । तस्यार्जुनिर्ध्वजं छत्रं धनुश्चोर्व्यामपातयत् ॥ ५२ ॥ पौरवने सुभद्राकुमारपर बाणसमूहोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। यह देख अर्जुनपुत्र अभिमन्युने उनके ध्वज, छत्र और धनुषको काटकर धरतीपर गिरा दिया ॥ ५२ ॥
सौभद्रः पौरवं त्वन्यैर्विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः । पञ्चभिस्तस्य विव्याध हयान् सूतं च सायकैः ॥ ५३ ॥ फिर अन्य सात शीघ्रगामी बाणोंद्वारा पौरवको घायल करके अभिमन्युने पाँच बाणोंसे उनके घोड़ों और सारथिको भी क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ५३ ॥
ततः प्रहर्षयन् सेनां सिंहवद् विनदन् मुहुः । समादत्तार्जुनस्तूर्णं पौरवान्तकरं शरम् ॥ ५४ ॥ तत्पश्चात् अपनी सेनाका हर्ष बढ़ाते और बारंबार सिंहके समान गर्जना करते हुए अर्जुनकुमार अभिमन्युने तुरंत ही एक ऐसा बाण हाथमें लिया, जो राजा पौरवका अन्त कर डालनेमें समर्थ था ॥ ५४ ॥
तं तु संधितमाज्ञाय सायकं घोरदर्शनम् । द्वाभ्यां शराभ्यां हार्दिक्यश्छिच्छेद सशरं धनुः ॥ ५५ ॥ उस भयानक दिखायी देनेवाले सायकको धनुषपर चढ़ाया हुआ जान कृतवर्माने दो बाणोंद्वारा अभिमन्युके सायकसहित धनुषको काट डाला ॥ ५५ ॥
तदुत्सृज्य धनुश्छिन्नं सौभद्रः परवीरहा । उद्धबर्ह सितं खड्गमाददानः शरावरम् ॥ ५६ ॥ तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुभद्राकुमारने उस कटे हुए धनुषको फेंककर चमचमाती हुई तलवार खींच ली और ढाल हाथमें ले ली ॥ ५६ ॥
स तेनानेकतारेण चर्मणा कृतहस्तवत् । भ्रान्तासिर्व्यचरन्मार्गान् दर्शयन् वीर्यमात्मनः ॥ ५७ ॥ उसने अपनी शक्तिका परिचय देते हुए सुशिक्षित हाथोंवाले पुरुषकी भाँति अनेक ताराओंके चिह्नोंसे युक्त ढालके साथ अपनी तलवारको घुमाते और अनेक पैंतरे दिखाते हुए रणभूमिमें विचरना आरम्भ किया ॥ ५७ ॥
भ्रामितं पुनरुद्भ्रान्तमाधूतं पुनरुत्थितम् ।
चर्मनिस्त्रिंशयो राजन् निर्विशेषमदृश्यत ॥ ५८ ॥
राजन्! उस समय नीचे घुमाने, ऊपर घुमाने, अगल-बगलमें चारों ओर घुमाने और फिर ऊपर उठानेकी क्रियाएँ इतनी तेजीसे हो रही थीं कि ढाल और तलवारमें कोई अन्तर ही नहीं दिखायी देता था ॥ ५८ ॥
स पौरवरथस्येषामप्लुत्य सहसा नदन् ।
पौरवं रथमास्थाय केशपक्षे परामृशत् ॥ ५९ ॥
तब अभिमन्यु सहसा गर्जता हुआ उछलकर पौरवके रथके ईषादण्डपर चढ़ गया। फिर उसने पौरवकी चुटिया पकड़ ली ॥ ५९ ॥
जघानास्य पदा सूतमसिनापातयद् ध्वजम् ।
विक्षोभ्याम्भोनिधिं तार्क्ष्यस्तं नागमिव चाक्षिपत् ॥ ६० ॥
उसने पैरोंके आघातसे पौरवके सारथिको मार डाला और तलवारसे उनके ध्वजको काट गिराया। फिर जैसे गरुड़ समुद्रको क्षुब्ध करके नागको पकड़कर दे मारते हैं, उसी प्रकार उसने भी पौरवको रथसे नीचे पटक दिया ॥ ६० ॥
तमाग़लितकेशान्तं ददृशुः सर्वपार्थिवाः ।
उक्षाणमिव सिंहेन पात्यमानमचेतसम् ॥ ६१ ॥
उस समय सम्पूर्ण राजाओंने देखा, जैसे सिंहने किसी बैलको गिराकर अचेत कर दिया हो, उसी प्रकार अभिमन्युने पौरवको गिरा दिया है। वे अचेत पड़े हैं और उनके सिरके बाल कुछ उखड़ गये हैं ॥ ६१ ॥
तमार्जुनवशं प्राप्तं कृष्यमाणमनाथवत् ।
पौरवं पातितं दृष्ट्वा नामृष्यत जयद्रथः ॥ ६२ ॥
पौरव अभिमन्युके वशमें पड़कर अनाथकी भाँति खींचे जा रहे हैं और गिरा दिये गये हैं। यह देखकर जयद्रथ सहन न कर सका ॥ ६२ ॥
स बर्हिबर्हावततं किंकिणीशतजालवत् ।
चर्म चादाय खड्गं च नदन् पर्यपतद् रथात् ॥ ६३ ॥
वह मोरकी पाँखसे आच्छादित और सैकड़ों क्षुद्र घंटिकाओंके समूहसे अलंकृत ढाल और खड्ग लेकर गर्जता हुआ अपने रथसे कूद पड़ा ॥ ६३ ॥
ततः सैन्धवमालोक्य कार्ष्णिरुत्सृज्य पौरवम् ।
उत्पपात रथात् तूर्णं श्येनवन्निपपात च ॥ ६४ ॥
तब अर्जुनपुत्र अभिमन्यु जयद्रथको आते देख पौरवको छोड़कर तुरंत ही पौरवके रथसे कूद पड़ा और बाजके समान जयद्रथपर झपटा ॥ ६४ ॥
प्रासपट्टिशनिस्त्रिंशाञ्छत्रुभिः सम्प्रचोदितान् ।
चिच्छेद चासिना कार्ष्णिर्श्चर्मणा संरुरोध च ॥ ६५ ॥
अभिमन्यु शत्रुओंके चलाये हुए प्रास, पट्टिश और तलवारोंको अपनी तलवारसे काट देते और अपनी ढालपर भी रोक लेते थे ।। ६५ ।।
स दर्शयित्वा सैन्यानां स्वबाहुबलमात्मनः । तमुद्यम्य महाखड्गं चर्म चाथ पुनर्बली ॥ ६६ ॥ वृद्धक्षत्रस्य दायादं पितुरत्यन्तवैरिणम् । ससाराभिमुखः शूरः शार्दूल इव कुञ्जरम् ॥ ६७ ॥ शूर एवं बलवान् अभिमन्यु सैनिकोंको अपना बाहुबल दिखाकर पुनः विशाल खड्ग और ढाल हाथमें ले अपने पिताके अत्यन्त वैरी वृद्धक्षत्रके पुत्र जयद्रथके सम्मुख उसी प्रकार चला, जैसे सिंह हाथीपर आक्रमण करता है ।। ६६-६७ ।।
तौ परस्परमासाद्य खड्गदन्तनखायुधौ । हृष्टवत् सम्प्रजह्राते व्याघ्रकेसरिणाविव ॥ ६८ ॥ वे दोनों खड्ग, दन्त और नखका आयुधके रूपमें उपयोग करते थे और बाघ तथा सिंहोंके समान एक-दूसरेसे भिड़कर बड़े हर्ष और उत्साहके साथ परस्पर प्रहार कर रहे थे ।। ६८ ।।
सम्पातेष्वभिघातेषु निपातेष्वसिचर्मणोः । न तयोरन्तरं कश्चिद् ददर्श नरसिंहयोः ॥ ६९ ॥ ढाल और तलवारके सम्पात (प्रहार), अविघात (बदलेके लिये प्रहार) और निपात (ऊपर-नीचे तलवार चलाने)-की कलामें उन दोनों पुरुषसिंह अभिमन्यु और जयद्रथमें किसीको कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था ।। ६९ ।।
अवक्षेपोऽसिनिर्ह्रादः शस्त्रान्तरनिदर्शनम् । बाह्यान्तरनिपातश्च निर्विशेषमदृश्यत ॥ ७० ॥ खड्गका प्रहार, खड्ग-संचालनके शब्द, अन्यान्य शस्त्रोंके प्रदर्शन तथा बाहर-भीतरकी चोटें करनेमें उन दोनों वीरोंकी समान योग्यता दिखायी देती थी ।। ७० ।।
बाह्यमाभ्यन्तरं चैव चरन्तौ मार्गमुत्तमम् । ददृशाते महात्मानौ सपक्षाविव पर्वतौ ॥ ७१ ॥ वे दोनों महामनस्वी वीर बाहर और भीतर चोट करनेके उत्तम पैंतरे बदलते हुए पंखयुक्त दो पर्वतोंके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे ।। ७१ ।।
ततो विक्षिप्तः खड्गं सौभद्रस्य यशस्विनः । शरावरपणपक्षान्ते प्रजहार जयद्रथः ॥ ७२ ॥ इसी समय तलवार चलाते हुए यशस्वी सुभद्रकुमारकी ढालपर जयद्रथने प्रहार किया ।। ७२ ।।
रुक्मपत्रान्तरे सक्तस्तस्मिंश्चर्मणि भास्वरे । सिन्धुराजबलोद्धूतः सोऽभज्यत महानसिः ॥ ७३ ॥
उस चमकीली ढालपर सोनेका पत्र जड़ा हुआ था। उसके ऊपर जयद्रथने जब बलपूर्वक प्रहार किया, तब उससे टकराकर उसका वह विशाल खड्ग टूट गया ॥ ७३ ॥
भग्नमाज्ञाय निस्त्रिंशमवप्लुत्य पदानि षट् ।
अदृश्यत निमेषेण स्वरथं पुनरास्थितः ॥ ७४ ॥
अपनी तलवार टूटी हुई जानकर जयद्रथ छः पग उछल पड़ा और पलक मारते-मारते पुनः अपने रथपर बैठा हुआ दिखायी दिया ॥ ७४ ॥
तं कार्ष्णिं समरान्मुक्तमास्थितं रथमुत्तमम् ।
सहिताः सर्वराजानः परिवव्रुः समन्ततः ॥ ७५ ॥
उस समय अर्जुनपुत्र अभिमन्यु युद्धसे मुक्त होकर अपने उत्तम रथपर जा बैठा। इतनेहीमें सब राजाओंने एक साथ आकर उसे सब ओरसे घेर लिया ॥ ७५ ॥
ततश्चर्म च खड्गं च समुत्क्षिप्य महाबलः ।
ननादार्जुनदायादः प्रेक्षमाणो जयद्रथम् ॥ ७६ ॥
तब महाबली अर्जुनकुमारने ढाल और तलवार ऊपर उठाकर जयद्रथकी ओर देखते हुए बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ७६ ॥
सिन्धुराजं परित्यज्य सौभद्रः परवीरहा ।
तापयामास तत् सैन्यं भुवनं भास्करो यथा ॥ ७७ ॥
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुभद्राकुमारने सिन्धुराज जयद्रथको छोड़कर, जैसे सूर्य सम्पूर्ण जगत्को तपाते हैं, उसी प्रकार उस सेनाको संताप देना आरम्भ किया ॥ ७७ ॥
तस्य सर्वांयसीं शक्तिं शल्यः कनकभूषणाम् ।
चिक्षेप समरे घोरां दीप्तामग्निशिखामिव ॥ ७८ ॥
तब शल्यने समरभूमिमें अभिमन्युपर सम्पूर्णतः लोहेकी बनी हुई एक स्वर्णभूषित भयंकर शक्ति छोड़ी, जो अग्निशिखाके समान प्रज्वलित हो रही थी ॥ ७८ ॥
तामवप्लुत्य जग्राह विकोशं चाकरोदसिम् ।
वैनतेयो यथा कार्ष्णिः पतन्तमुरगोत्तमम् ॥ ७९ ॥
जैसे गरुड़ उड़ते हुए श्रेष्ठ नागको पकड़ लेते हैं, उसी प्रकार अभिमन्युने उछलकर उस शक्तिको पकड़ लिया और म्यानसे तलवार खींच ली ॥ ७९ ॥
तस्य लाघवमाज्ञाय सत्त्वं चामिततेजसः ।
सहिताः सर्वराजानः सिंहनादमथानदन् ॥ ८० ॥
अमिततेजस्वी अभिमन्युकी वह फुर्ती और शक्ति देखकर सब राजा एक साथ सिंहनाद करने लगे ॥ ८० ॥
ततस्तामेव शल्यस्य सौभद्रः परवीरहा ।
मुमोच भुजवीर्येण वैदूर्यविकृतां शिताम् ॥ ८१ ॥
उस समय शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुभद्रा-कुमारने वैदूर्यमणिकी बनी हुई तीखी धारवाली उसी शक्तिको अपने बाहुबलसे शल्यपर चला दिया ।। ८१ ।।
सा तस्य रथमासाद्य निर्मुक्तभुजगोपमा ।
जघान सूतं शल्यस्य रथाच्चैनमपातयत् ।। ८२ ।।
केंचुलसे छूटकर निकले हुए सर्पके समान प्रतीत होनेवाली उस शक्तिने शल्यके रथपर पहुँचकर उनके सारथिको मार डाला और उसे रथसे नीचे गिरा दिया ।।
ततो विराटद्रुपदौ धृष्टकेतुर्युधिष्ठिरः ।
सात्यकिः केकया भीमो धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ ।। ८३ ।।
यमौ च द्रौपदेयाश्च साधु साध्विति चुक्रुशुः ।
यह देखकर विराट, द्रुपद, धृष्टकेतु, युधिष्ठिर, सात्यकि, केकयराजकुमार, भीमसेन, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, नकुल, सहदेव तथा द्रौपदीके पाँचों पुत्र 'साधु, साधु' (बहुत अच्छा, बहुत अच्छा) कहकर कोलाहल करने लगे ।।
बाणशब्दाश्च विविधाः सिंहनादाश्च पुष्कलाः ।। ८४ ।।
प्रादुरासन् हर्षयन्तः सौभद्रमपलायिनम् ।
उस समय युद्धभूमिमें पीठ न दिखानेवाले सुभद्राकुमार अभिमन्युका हर्ष बढ़ाते हुए नाना प्रकारके बाण-संचालनजनित शब्द और महान् सिंहनाद प्रकट होने लगे ।। ८४ १/२ ।।
तन्नामृष्यन्त पुत्रास्ते शत्रोर्विजयलक्षणम् ।। ८५ ।।
अथैनं सहसा सर्वे समन्तान्निशितैः शरैः ।
अभ्याकिरन् महाराज जलदा इव पर्वतम् ।। ८६ ।।
महाराज! उस समय आपके पुत्र शत्रु की विजयकी सूचना देनेवाले उस सिंहनादको नहीं सह सके। वे सब-के-सब सहसा सब ओरसे अभिमन्युपर पैने बाणोंकी वर्षा करने लगे, मानो मेघ पर्वतपर जलकी धाराएँ बरसा रहे हों ।। ८५-८६ ।।
तेषां च प्रियमन्विच्छन् सूतस्य च पराभवरम् ।
आर्तायनिरमित्रघ्नः क्रुद्धः सौभद्रमभ्ययात् ।। ८७ ।।
अपने सारथिको मारा गया देख कौरवोंका प्रिय करनेकी इच्छावाले शत्रुसूदन शल्यने कुपित होकर सुभद्राकुमारपर पुनः आक्रमण किया ।। ८७ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि अभिमन्युपराक्रमे चतुर्दशोऽध्यायः
।। १४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें अभिमन्युका पराक्रमविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४ ।।
पञ्चदशोऽध्यायः
शल्यके साथ भीमसेनका युद्ध तथा शल्यकी पराजय
धृतराष्ट्र उवाच
बहूनि सुविचित्राणि द्वन्द्वयुद्धानि संजय ।
त्वयोक्तानि निशम्याहं स्पृहयामि सचक्षुषाम् ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! तुमने बहुत-से अत्यन्त विचित्र द्वन्द्वयुद्धोंका वर्णन किया है, उनकी कथा सुनकर मैं नेत्रवाले लोगोंके सौभाग्यकी स्पृहा करता हूँ ॥ १ ॥
आश्चर्यभूतं लोकेषु कथयिष्यन्ति मानवाः ।
कुरूणां पाण्डवानां च युद्धं देवासुरोपमम् ॥ २ ॥
देवताओं और असुरोंके समान इस कौरव-पाण्डव-युद्धको संसारके मनुष्य अत्यन्त आश्चर्यकी वस्तु बतायेंगे ॥ २ ॥
न हि मे तृप्तिरस्तीह शृण्वतो युद्धमुत्तमम् ।
तस्मादार्तायनेर्युद्धं सौभद्रस्य च शंस मे ॥ ३ ॥
इस समय इस उत्तम युद्ध-वृत्तान्तको सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है; अतः शल्य और सुभद्राकुमारके युद्धका वृत्तान्त मुझसे कहो ॥ ३ ॥
संजय उवाच
सादितं प्रेक्ष्य यन्तारं शल्यः सर्वायसीं गदाम् ।
समुत्क्षिप्य नदन् क्रुद्धः प्रचस्कन्द रथोत्तमात् ॥ ४ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! राजा शल्य अपने सारथिको मारा गया देख कुपित हो उठे और पूर्णतः लोहेकी बनी हुई गदा उठाकर गर्जते हुए अपने उत्तम रथसे कूद पड़े ॥
तं दीप्तमिव कालाग्निं दण्डहस्तमिवान्तकम् ।
जवेनाभ्यपतद् भीमः प्रगृह्य महतीं गदाम् ॥ ५ ॥
उन्हें प्रलयकालकी प्रज्वलित अग्नि तथा दण्डधारी यमराजके समान आते देख भीमसेन विशाल गदा हाथमें लेकर बड़े वेगसे उनकी ओर दौड़े ॥ ५ ॥
सौभद्रोऽप्यशनिप्रख्यां प्रगृह्य महतीं गदाम् ।
एह्येहीत्यब्रवीच्छल्यं यत्नाद् भीमेन वारितः ॥ ६ ॥
उधरसे अभिमन्यु भी वज्रके समान विशाल गदा हाथमें लेकर आ पहुँचा और 'आओ, आओ' कहकर शल्यको ललकारने लगा। उस समय भीमसेनने बड़े प्रयत्नसे उसको रोका ॥ ६ ॥
वारयित्वा तु सौभद्रं भीमसेनः प्रतापवान् ।