महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
कुछ योद्धा लड़नेका उत्साह खो बैठे, कुछ मनस्वी वीर रोषमें भर गये, कितने ही योद्धा उनका पराक्रम देख आश्चर्यचकित हो उठे और कितने ही अमर्षके वशीभूत हो गये ॥ २७ १/२ ॥
हस्तैर्हस्ताग्रमपरे प्रत्यपिंषन् नराधिपाः ॥ २८ ॥
अपरे दशनैरोष्ठानदशन् क्रोधमूर्च्छिताः ।
कोई-कोई नरेश हाथसे हाथ मलने लगे। कुछ क्रोधसे आतुर हो दाँतोंसे ओठ चबाने लगे ॥ २८ १/२ ॥
व्याक्षिपन्नायुधान्यन्ये ममृदुश्चापरे भुजान् ॥ २९ ॥
अन्ये चान्वपतन् द्रोणं त्यक्तात्मानो महौजसः ।
कुछ लोग अपने आयुधोंको उछालने और धनुषकी प्रत्यंचा खींचने लगे। दूसरे योद्धा अपनी भुजाओंको मसलने लगे तथा अन्य बहुत-से महातेजस्वी वीर अपने प्राणोंका मोह छोड़कर द्रोणाचार्यपर टूट पड़े ॥ २९ १/२ ॥
पञ्चालास्तु विशेषेण द्रोणसायकपीड़िताः ॥ ३० ॥
समसज्जन्त राजेन्द्र समरे भृशवेदनाः ।
राजेन्द्र! पांचाल सैनिक द्रोणाचार्यके बाणोंद्वारा विशेषरूपसे पीड़ित हो अधिक वेदना सहते हुए भी समरभूमिमें डटे रहे ॥ ३० १/२ ॥
ततो विराटद्रुपदौ द्रोणं प्रययतू रणे ॥ ३१ ॥
तथा चरन्तं संग्रामे भृशं समरदुर्जयम् ।
इस प्रकार संग्राममें विचरते हुए रणदुर्जय द्रोणाचार्यपर राजा विराट और द्रुपदने एक साथ चढ़ाई की ॥ ३१ १/२ ॥
द्रुपदस्य ततः पौत्रास्त्रय एव विशाम्पते ॥ ३२ ॥
चेदयश्च महेष्वासा द्रोणमेवाभ्ययुर्युधि ।
प्रजानाथ! तदनन्तर राजा द्रुपदके तीनों ही पौत्रों तथा चेदिदेशीय महाधनुर्धर योद्धाओंने भी युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यपर ही आक्रमण किया ॥ ३२ १/२ ॥
तेषां द्रुपदपौत्राणां त्रयाणां निशितैः शरैः ॥ ३३ ॥
त्रिभिर्द्रोणोऽहरत् प्राणांस्ते हता न्यपतन् भुवि ।
तब द्रोणाचार्यने तीन तीखे बाणोंका प्रहार करके द्रुपदके तीनों पौत्रोंके प्राण हर लिये। वे तीनों मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३३ १/२ ॥
ततो द्रोणोऽजयद् युद्धे चेदिकैकेयसृञ्जयान् ॥ ३४ ॥
मत्स्यांश्चैवाजयत् कृत्स्नान् भारद्वाजो महारथान् ।
तत्पश्चात् भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यने युद्धमें चेदि, केकय, सृंजय तथा मत्स्य देशके सम्पूर्ण महारथियोंको परास्त कर दिया ॥ ३४ १/२ ॥
ततस्तु द्रुपदः क्रोधाच्छरवर्षमवासृजत् ।। ३५ ।।
द्रोणं प्रति महाराज विराटश्चैव संयुगे ।
महाराज! इसके बाद राजा द्रुपद और विराट्ने द्रोणाचार्यपर समरांगणमें क्रोधपूर्वक बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।। ३५ १/२ ।।
तं निहत्येषुवर्षं तु द्रोणः क्षत्रियमर्दनः ।। ३६ ।।
तौ शरैश्छादयामास विराटद्रुपदावुभौ ।
क्षत्रियमर्दन द्रोणाचार्यने अपने बाणोंद्वारा उस बाणवर्षाको नष्ट करके विराट और द्रुपद दोनोंको ढक दिया ।। ३६ १/२ ।।
द्रोणेन छाद्यमानौ तु क्रुद्धौ संग्राममूर्धनि ।। ३७ ।।
द्रोणं शरैर्विव्यधतुः परमं क्रोधमास्थितौ ।
द्रोणाचार्यके द्वारा आच्छादित किये जानेपर क्रोधमें भरे हुए वे दोनों नरेश अत्यन्त कुपित हो युद्धके मुहानेपर बाणोंद्वारा द्रोणको घायल करने लगे ।। ३७ १/२ ।।
ततो द्रोणो महाराज क्रोधामर्षसमन्वितः ।। ३८ ।।
भल्लाभ्यां भृशतीक्ष्णाभ्यां चिच्छेद धनुषी तयोः ।
महाराज! तब आचार्य द्रोणने क्रोध और अमर्षसे युक्त हो दो अत्यन्त तीखे भल्लोंद्वारा उन दोनोंके धनुष काट डाले ।। ३८ १/२ ।।
ततो विराटः कुपितः समरे तोमरान् दश ।। ३९ ।।
दश चिक्षेप च शरान् द्रोणस्य वधकाङ्क्षया ।
इससे कुपित हुए विराटने रणभूमिमें द्रोणाचार्यके वधकी इच्छासे दस तोमर और दस बाण चलाये ।। ३९ १/२ ।।
शक्तिं च द्रुपदो घोरामायसीं स्वर्णभूषिताम् ।। ४० ।।
चिक्षेप भुजगेन्द्राभां क्रुद्धो द्रोणरथं प्रति ।
साथ ही क्रोधमें भरे हुए राजा द्रुपदने लोहेकी बनी हुई स्वर्णभूषित भयंकर शक्ति, जो नागराजके समान प्रतीत होती थी, द्रोणाचार्यपर चलायी ।। ४० १/२ ।।
ततो भल्लैः सुनिशितैश्छित्त्वा तांस्तोमरान् दश ।। ४१ ।।
शक्तिं कनकवैडूर्यां द्रोणश्चिच्छेद सायकैः ।
यह देख द्रोणाचार्यने तीखे भल्लोंसे उन दसों तोमरोंको काटकर अपने बाणोंके द्वारा सुवर्ण एवं वैदूर्यमणिसे विभूषित उस शक्तिके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले ।। ४१ १/२ ।।
ततो द्रोणः सुपीताभ्यां भल्लाभ्यामरिमर्दनः ।। ४२ ।।
द्रुपदं च विराटं च प्रेषयामास मृत्यवे ।
तत्पश्चात् शत्रुमर्दन आचार्य द्रोणने दो पानीदार भल्लोंसे मारकर राजा द्रुपद और विराटको यमराजके पास भेज दिया ।। ४२ १/२ ।।
हते विराटे द्रुपदे केकयेषु तथैव च ॥ ४३ ॥ तथैव चेदिमत्स्येषु पञ्चालेषु तथैव च । हतेषु त्रिषु वीरेषु द्रुपदस्य च नप्तृषु ॥ ४४ ॥ द्रोणस्य कर्म तद् दृष्ट्वा कोपदुःखसमन्वितः । शशाप रथिनां मध्ये धृष्टद्युम्नो महामनाः ॥ ४५ ॥ विराट, द्रुपद, केकय, चेदि, मत्स्य और पांचाल योद्धाओं तथा राजा द्रुपदके तीनों वीर पौत्रोंके मारे जानेपर द्रोणाचार्यका वह कर्म देखकर क्रोध और दुःखसे भरे हुए महामनस्वी धृष्टद्युम्नने रथियोंके बीचमें इस प्रकार शपथ खायी ॥ ४३—४५ ॥
इष्टापूर्तात् तथा क्षात्राद् ब्राह्मण्याच्च स नश्यतु । द्रोणो यस्याद्य मुच्येत यं वा द्रोणः पराभवेत् ॥ ४६ ॥ ‘आज जिसके हाथसे द्रोणाचार्य जीवित छूट जायँ अथवा जिसे वे पराजित कर दें, वह यज्ञ करने तथा कुओं-बावली बनवाने एवं बगीचे लगाने आदिके पुण्योंसे वंचित हो जाय। क्षत्रियत्व और ब्राह्मणत्वसे* भी गिर जाय’ ॥ ४६ ॥
इति तेषां प्रतिश्रुत्य मध्ये सर्वधनुष्मताम् । आयाद् द्रोणं सहानीकः पाञ्चाल्यः परवीरहा ॥ ४७ ॥ इस प्रकार उन सम्पूर्ण धनुर्धरोंके बीचमें प्रतिज्ञा करके शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पांचाल-राजकुमार धृष्टद्युम्न अपनी सेनाके साथ द्रोणाचार्यपर चढ़ आये ॥ ४७ ॥
पञ्चालास्त्वेकतो द्रोणमभ्यघ्नन् पाण्डवैः सह । दुर्योधनश्च कर्णश्च शकुनिश्चापि सौबलः ॥ ४८ ॥ सोदर्याश्च यथामुख्यास्तेऽरक्षन् द्रोणमाहवे । एक ओरसे पाण्डवोंसहित पांचाल-सैनिक द्रोणाचार्यको मार रहे थे और दूसरी ओरसे दुर्योधन, कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि तथा दुर्योधनके मुख्य-मुख्य भाई उस युद्धमें आचार्यकी रक्षा कर रहे थे ॥ ४८ १/२ ॥
रक्ष्यमाणं तथा द्रोणं सर्वैस्तैस्तु महारथैः ॥ ४९ ॥ यतमानास्तु पञ्चाला न शेकुः प्रतीवीक्षितुम् । उन सम्पूर्ण महारथियोंद्वारा सुरक्षित हुए द्रोणाचार्यकी ओर पांचाल-सैनिक प्रयत्न करनेपर भी आँख उठाकर देखतक न सके ॥ ४९ १/२ ॥
तत्राक्रुध्यद् भीमसेनो धृष्टद्युम्नस्य मारिष ॥ ५० ॥ स एनं वाग्भिरुग्राभिस्ततक्ष पुरुषर्षभः । आर्य! तब वहाँ पुरुषप्रवर भीमसेन धृष्टद्युम्नपर कुपित हो उठे और उन्हें भयंकर वाग्बाणोंद्वारा छेदने लगे ॥ ५० १/२ ॥
भीमसेन उवाच
द्रुपदस्य कुले जातः सर्वास्त्रेष्वस्त्रवित्तमः ॥ ५१ ॥ कः क्षत्रियो मन्यमानः प्रेक्षेतारिमवस्थितम् । भीमसेन बोले— द्रुपदके कुलमें जन्म लेकर और सम्पूर्ण अस्त्रोंका सबसे बड़ा विद्वान् होकर भी कौन स्वाभिमानी क्षत्रिय शत्रुको सामने खड़ा हुआ देख सकेगा? ॥ ५१ १/२ ॥ पितृपुत्रवधं प्राप्य पुमान् कः परिपालयेत् ॥ ५२ ॥ विशेषतस्तु शपथं शपित्वा राजसंसदि । शत्रुके हाथसे पिता और पुत्रका वध पाकर, विशेषतः राजाओंकी मण्डलीमें शपथ खाकर कौन पुरुष उस शत्रु की रक्षा करेगा? ॥ ५२ १/२ ॥ एष वैश्वानर इव समृद्धः स्वेन तेजसा ॥ ५३ ॥ शरचापेन्धनो द्रोणः क्षत्रं दहति तेजसा । धनुष-बाणरूपी ईंधनसे युक्त हो तेजसे अग्निके समान प्रज्वलित होनेवाले ये द्रोणाचार्य अपने प्रभावसे क्षत्रियोंको दग्ध कर रहे हैं ॥ ५३ १/२ ॥ पुरा करोति निःशेषां पाण्डवानामनीकिनीम् ॥ ५४ ॥ स्थिताः पश्यत मे कर्म द्रोणमेव व्रजाम्यहम् । ये जबतक पाण्डव-सेनाको समाप्त नहीं कर लेते, उसके पहले ही मैं द्रोणपर आक्रमण करता हूँ। वीरो! तुम खड़े होकर मेरा पराक्रम देखो ॥ ५४ १/२ ॥ इत्युक्त्वा प्राविशत् क्रुद्धो द्रोणानीकं वृकोदरः ॥ ५५ ॥ शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैर्द्रावयंस्तव वाहिनीम् । ऐसा कहकर भीमसेनने कुपित हो धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये बाणोंद्वारा आपकी सेनाको खदेड़ते हुए द्रोणाचार्यके सैन्यदलमें प्रवेश किया ॥ ५५ १/२ ॥ धृष्टद्युम्नोऽपि पाञ्चाल्यः प्रविश्य महतीं चमूम् ॥ ५६ ॥ आससादरणे द्रोणं तदाऽऽसीत् तुमुलं महत् । इसी प्रकार पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने भी आपकी विशाल सेनामें घुसकर रणभूमिमें द्रोणाचार्यपर चढ़ाई की। उस समय बड़ा भयंकर युद्ध होने लगा ॥ नैव नस्तादृशं युद्धं दृष्टपूर्वं न च श्रुतम् ॥ ५७ ॥ यथा सूर्योदये राजन् समुत्पिञ्जोऽभवन्महान् । राजन्! उस दिन सूर्योदयके समय जैसा महान् जनसंहारकारी संग्राम हुआ, वैसा हमने पहले न तो कभी देखा था और न सुना ही था ॥ ५७ १/२ ॥ संसक्तान्येव चादृश्यन् रथवृन्दानि मारिष ॥ ५८ ॥ हतानि च विकीर्णानि शरीराणि शरीरिणाम् । माननीय नरेश! उस युद्धमें रथोंके समूह परस्पर सटे हुए ही दिखायी देते थे और देहधारियोंके शरीर मरकर बिखरे हुए थे ॥ ५८ १/२ ॥
केचिदन्यत्र गच्छन्तः पथि चान्यैरुपद्रुताः ॥ ५९ ॥ विमुखाः पृष्ठतश्चान्ये ताड्यन्ते पार्श्वतः परे । कुछ योद्धा अन्यत्र जाते हुए मार्गमें दूसरे योद्धाओंके आक्रमणके शिकार हो जाते थे। कुछ लोग युद्धसे विमुख होकर भागते समय पीठ और पार्श्वभागोंमें विपक्षियोंके बाणोंकी चोट सहते थे ॥ ५९ १/२ ॥
तथा संसक्तयुद्धं तदभवद् भृशदारुणम् । अथ संध्यागतः सूर्यः क्षणेन समपद्यत ॥ ६० ॥ इस प्रकार वह अत्यन्त भयंकर घमासान युद्ध हो ही रहा था कि क्षणभरमें प्रातःसंध्याकी वेलामें सूर्यदेवका पूर्णतः उदय हो गया ॥ ६० ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि संकुलयुद्धे षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक एक सौ छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८६ ॥
* द्रुपदकुलमें उत्पन्न होनेके कारण धृष्टद्युम्नका क्षत्रिय होना तो प्रसिद्ध ही है। परंतु याज और उपयाज नामक दो तपस्वी ब्राह्मणोंकी तपस्यासे उनकी उत्पत्ति हुई थी तथा परमेश्वरके मुखसे प्रकट हुए ब्राह्मणस्वरूप अग्निसे उनका प्रादुर्भाव हुआ था। इससे उनमें ब्राह्मणत्व भी था।
युद्धस्थलकी भीषण अवस्थाका वर्णन और नकुलके द्वारा दुर्योधनकी पराजय
सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
युद्धस्थलकी भीषण अवस्थाका वर्णन और नकुलके द्वारा दुर्योधनकी पराजय
संजय उवाच
ते तथैव महाराज दंशिता रणमूर्धनि ।
संध्यागतं सहस्रांशुमादित्यमुपतस्थिरे ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! वे समस्त योद्धा पूर्ववत् कवच बाँधे हुए ही युद्धके मुहानेपर प्रातः-संध्याके समय सहस्रों किरणोंसे सुशोभित भगवान् सूर्यका उपस्थान करने लगे ॥ १ ॥
उदिते तु सहस्रांशौ तप्तकाञ्चनसप्रभे ।
प्रकाशितेषु लोकेषु पुनर्युद्धमवर्तत ॥ २ ॥
तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् सूर्यदेवका उदय होनेपर जब सम्पूर्ण लोकोंमें प्रकाश छा गया, तब पुनः युद्ध होने लगा ॥ २ ॥
द्वन्द्वानि तत्र यान्यासन् संसक्तानि पुरोदयात् ।
तान्येवाभ्युदिते सूर्ये समसज्जन्त भारत ॥ ३ ॥
भरतनन्दन! सूर्योदयसे पहले जिन लोगोंमें द्वन्द्व-युद्ध चल रहा था, सूर्योदयके बाद भी पुनः वे ही लोग परस्पर जूझने लगे ॥ ३ ॥
रथैर्हया हयैर्नागाः पादातैश्चापि कुञ्जराः ।
हयैर्हयाः समाजग्मुः पादाताश्च पदातिभिः ॥ ४ ॥
रथोंसे घोड़े, घोड़ोंसे हाथी, पैदलोंसे हाथीसवार, घोड़ोंसे घोड़े तथा पैदलोंसे पैदल भिड़ गये ॥ ४ ॥
रथा रथैरिभैर्नागास्तथैव भरतर्षभ ।
संसक्ताश्च वियुक्ताश्च योधाः संन्यपतन् रणे ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! रथोंसे रथ और हाथियोंसे हाथी गुँथ जाते थे। इस प्रकार कभी सटकर और कभी विलग होकर वे योद्धा रणभूमिमें गिरने लगे ॥ ५ ॥
ते रात्रौ कृतकर्माणः श्रान्ताः सूर्यस्य तेजसा ।
क्षुत्पिपासापरीताङ्गा विसंज्ञा बहवोऽभवन् ॥ ६ ॥
वे सभी रातमें युद्ध करके थक गये थे। फिर सबेरे सूर्यकी धूप लगनेसे उनके अंग-अंगमें भूख-प्यास व्याप्त हो गयी, जिससे बहुतेरे सैनिक अपनी सुध-बुध खो बैठे ॥ ६ ॥
शङ्खभेरीमृदङ्गानां कुञ्जराणां च गर्जताम् ।
विस्फारितविकृष्टानां कार्मुकाणां च कूजताम् ।। ७ ।। शब्दः समभवद् राजन् दिविस्पृग् भरतर्षभ । राजन्! भरतश्रेष्ठ! उस समय शंख, भेरी और मृदंगोंकी ध्वनि, गरजते हुए गजराजोंका चीत्कार और फैलाये तथा खींचे गये धनुषोंकी टंकार—इन सबका सम्मिलित शब्द आकाशमें गूँज उठा था ।। ७ १/२ ।। द्रवतां च पदातीनां शस्त्राणां पततामपि ।। ८ ।। हयानां हेषतां चापि रथानां च निवर्तताम् । क्रोशतां गर्जतां चैव तदाऽऽसीत् तुमुलं महत् ।। ९ ।। दौड़ते हुए पैदलों, गिरते हुए शस्त्रों, हिनहिनाते हुए घोड़ों, लौटते हुए रथों तथा चीखते-चिल्लाते और गरजते हुए शूरवीरोंका मिला हुआ महाभयंकर शब्द वहाँ गूँज रहा था ।। ८-९ ।। विवृद्धस्तुमुलः शब्दो द्यामगच्छन्महांस्तदा । नानायुधनिकृत्तानां चेष्टतामातुरः स्वनः ।। १० ।। भूमावश्रूयत महांस्तदाऽऽसीत् कृपणं महत् । पततां पात्यमानानां पत्त्यश्वरथदन्तिनाम् ।। ११ ।। वह बढ़ा हुआ अत्यन्त भयानक शब्द उस समय स्वर्गलोकतक जा पहुँचा था। नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे कटकर छटपटाते हुए योद्धाओंका महान् आर्तनाद धरतीपर सुनायी दे रहा था। गिरते और गिराये जाते हुए पैदल, घोड़े, रथ और हाथियोंकी अत्यन्त दयनीय दशा दिखायी देती थी ।। १०-११ ।। तेषु सर्वेष्वनीकेषु व्यतिषक्तेष्वनेकशः । स्वे स्वाञ्जघ्नुः परे स्वांश्च स्वान् परेषां परे परान् ।। १२ ।। उन सभी सेनाओंमें बारंबार मुठभेड़ होती थी और उसमें अपने ही पक्षके लोग अपने ही पक्षवालोंको मार डालते थे। शत्रुपक्षके लोग भी अपने पक्षके लोगोंको मारते थे। शत्रुपक्षके जो स्वजन थे उनको तथा शत्रुओंको भी शत्रुपक्षके योद्धा मार डालते थे ।। १२ ।। वीरबाहुविमृष्टाश्च योधेषु च गजेषु च । राशयः प्रत्यदृश्यन्त वाससां नेजनेष्विव ।। १३ ।। जैसे कपड़े धोनेके घाटोंपर ढेर-के-ढेर वस्त्र दिखायी देते हैं, उसी प्रकार योद्धाओं और हाथियोंपर वीरोंकी भुजाओंद्वारा छोड़े गये अस्त्र-शस्त्रोंकी राशियाँ दिखायी देती थीं ।। १३ ।। उद्यतप्रतिपिष्टानां खड्गानां वीरबाहुभिः । स एव शब्दस्तद्रूपो वाससां निज्यतामिव ।। १४ ।।
शूरवीरोंके हाथोंमें उठकर विपक्षी योद्धाओंके शस्त्रोंसे टकराये हुए खड्गोंका शब्द वैसा ही जान पड़ता था, जैसे धोबियोंके पटहोंपर पीटे जानेवाले कपड़ोंका शब्द होता है ।। १४ ।। अर्धासिभिस्तथा खड्गैस्तोमरैः सपरश्वधैः । निकृष्टयुद्धं संसक्तं महदासीत् सुदारुणम् ।। १५ ।। एक ओर धारवाली और दुधारी तलवारों, तोमरों तथा फरसोंद्वारा जो अत्यन्त निकटसे युद्ध चल रहा था, वह भी बहुत ही क्रूरतापूर्ण एवं भयंकर था ।। १५ ।। गजाश्वकायप्रभवां नरदेहप्रवाहिनीम् । शस्त्रमत्स्यसुसम्पूर्णां मांसशोणितकर्दमाम् ।। १६ ।। आर्तनादस्वनवतीं पताकाशस्त्रफेनिलाम् । नदीं प्रावर्तयन् वीराः परलोकौघगामिनीम् ।। १७ ।। वहाँ युद्ध करनेवाले वीरोंने खूनकी नदी बहा दी, जिसका प्रवाह परलोककी ओर ले जानेवाला था। वह रक्तकी नदी हाथी और घोड़ोंकी लाशोंसे प्रकट हुई थी। मनुष्योंके शरीरोंको बहाये लिये जाती थी। उसमें शस्त्ररूपी मछलियाँ भरी थीं। मांस और रक्त ही उसकी कीचड़ थे। पीड़ितोंके आर्तनाद ही उसकी कलकल ध्वनि थे तथा पताका और शस्त्र उसमें फेनके समान जान पड़ते थे ।। १६-१७ ।। शरशक्त्यर्दिताः क्लान्ता रात्रिमूढाल्पचेतसः । विष्टभ्य सर्वगात्राणि व्यतिष्ठन् गजवाजिनः ।। १८ ।। रात्रिके युद्धसे मोहित, अल्प चेतनावाले, बाणों और शक्तियोंसे पीड़ित तथा थके-माँदे हाथी एवं घोड़े आदि वाहन अपने सारे अंगोंको स्तब्ध करके वहाँ खड़े थे ।। १८ ।। बाहुभिः कवचैश्चित्रैः शिरोभिश्चारुकुण्डलैः । युद्धोपकरणैश्चान्यैस्तत्र तत्र चकाशिरे ।। १९ ।। योद्धाओंकी कटी हुई भुजाओं, विचित्र कवचों, मनोहर कुण्डलमण्डित मस्तकों तथा इधर-उधर बिखरी हुई अन्यान्य युद्ध-सामग्रियोंसे रणभूमिके विभिन्न प्रदेश प्रकाशित हो रहे थे ।। १९ ।। क्रव्यादासङ्घैराकीर्णं मृतैरर्धमृतैरपि । नासीद् रथपथस्तत्र सर्वमायोधनं प्रति ।। २० ।। कहीं कच्चा मांस खानेवाले प्राणियोंका समुदाय भरा था, कहीं मरे और अधमरे जीव पड़े थे। इन सबके कारण उस सारी युद्धभूमिमें कहीं भी रथ जानेके लिये रास्ता नहीं मिलता था ।। २० ।। मज्जत्सु चक्रेषु रथान् सत्त्वमास्थाय वाजिनः । कथंचिदवहञ्छ्रान्ता वेपमानाः शरार्दिताः ।। २१ ।। कुलसत्त्वबलोपेता वाजिनो वारणोपमाः ।
रथोंके पहिये रक्तकी कीचमें डूब जाते थे, तो भी उन रथोंको बाणोंसे पीड़ित हो काँपते हुए और परिश्रमसे थके-माँदे घोड़े किसी प्रकार धैर्य धारण करके ढोते थे। वे सभी घोड़े उत्तम कुल, साहस और बलसे सम्पन्न तथा हाथियोंके समान विशालकाय थे (इसीलिये ऐसा पराक्रम कर पाते थे) ॥ २१ १/२ ॥
विह्वलं तूर्णमुद्भ्रान्तं सभयं भारतातुरम् ॥ २२ ॥
बलमासीत् तदा सर्वमृते द्रोणार्जुनावुभौ ।
तावेवास्तां निलयनं तावार्त्तायनमेव च ॥ २३ ॥
तावेवान्ये समासाद्य जग्मुर्वैवस्वतक्षयम्।
भारत! उस समय द्रोणाचार्य और अर्जुन—इन दो वीरोंको छोड़कर शेष सारी सेना तुरंत विह्वल, उद्भ्रान्त, भयभीत और आतुर हो गयी। वे ही दोनों अपने-अपने पक्षके योद्धाओंके लिये छिपनेके स्थान थे और वे ही पीड़ितोंके आश्रय बने हुए थे। परंतु विपक्षी योद्धा इन्हीं दोनोंके समीप जाकर यमलोक पहुँच जाते थे ॥ २२-२३ १/२ ॥
आविग्नमभवत् सर्वं कौरवाणां महत् बलम् ॥ २४ ॥
पञ्चालानां च संसक्तं न प्राज्ञायत किंचन ।
अन्तकाक्रीडसदृशं भीरूणां भयवर्धनम् ॥ २५ ॥
कौरवों तथा पांचालोंके सारे विशाल सैन्य परस्पर मिलकर व्यग्र हो उठे थे। उस समय उनमेंसे किसी दलको अलग-अलग पहचाना नहीं जाता था। वह समरांगण यमराजका क्रीडास्थल-सा हो रहा था और कायरोंका भय बढ़ा रहा था ॥ २४-२५ ॥
पृथिव्यां राजवंश्यानामुत्थिते महति क्षये ।
न तत्र कर्णं द्रोणं वा नार्जुनं न युधिष्ठिरम् ॥ २६ ॥
न भीमसेनं न यमौ न पाञ्चाल्यं न सात्यकिम् ।
न च दुःशासनं द्रौणिं न दुर्योधनसौबलौ ॥ २७ ॥
न कृपं मद्रराजं च कृतवर्माणमेव च ।
न चान्यान् नैव चात्मानं न क्षितिं न दिशस्तथा ॥ २८ ॥
पश्याम राजन् संसक्तान् सैन्येन रजसाऽऽवृतान् ।
राजन्! भूमण्डलके राजवंशमें उत्पन्न हुए क्षत्रियोंका वह महान् संहार उपस्थित होनेपर वहाँ युद्धमें तत्पर हुए सब लोग सेनाद्वारा उड़ायी हुई धूलसे ढक गये थे। इसीलिये हमलोग वहाँ न तो कर्णको देख पाते थे, न द्रोणाचार्यको। न अर्जुन दिखायी देते थे, न युधिष्ठिर। भीमसेन, नकुल, सहदेव, धृष्टद्युम्न और सात्यकिको भी हम नहीं देख पाते थे। दुःशासन, अश्वत्थामा, दुर्योधन, शकुनि, कृपाचार्य, शल्य, कृतवर्मा तथा अन्य महारथी भी हमारी दृष्टिमें नहीं आते थे। औरोंकी तो बात ही क्या? हम अपने शरीरको भी नहीं देख पाते थे, पृथिवी और दिशाएँ भी नहीं सूझती थीं ॥ २६—२८ १/२ ॥
सम्भ्रान्ते तुमुले घोरे रजोमेघे समुत्थिते ॥ २९ ॥
द्वितीयामिव सम्प्राप्ताममन्यन्त निशां तदा ।
वहाँ धूलरूपी मेघकी भयंकर एवं घोर घटा घुमड़-घुमड़कर घिर आयी थी, जिससे सब लोगोंको उस समय ऐसा मालूम होता था, मानो दूसरी रात्रि आ पहुँची हो ॥ २९ १/२ ॥
न ज्ञायन्ते कौरवेया न पञ्चाला न पाण्डवाः ॥ ३० ॥
न दिशो द्यौर्न चोर्वी च न समं विषमं तथा ।
उस अन्धकारमें न तो कौरव पहचाने जाते थे और न पांचाल तथा पाण्डव ही। दिशा, आकाश, भूमण्डल और सम-विषम स्थान आदिका भी पता नहीं चलता था ॥ ३० १/२ ॥
हस्तसंस्पर्शमापन्नान् परानप्यथवा स्वकान् ॥ ३१ ॥
न्यपातयंस्तदा युद्धे नराः स्म विजयैषिणः ।
जो हाथकी पकड़में आ गये या छू गये, वे अपने हों या पराये, विजयकी इच्छा रखनेवाले मनुष्य उन्हें तत्काल युद्धमें मार गिराते थे ॥ ३१ १/२ ॥
उद्धृतत्वात् तु रजसः प्रसेकाच्छोणितस्य च ॥ ३२ ॥
प्राशाम्यत रजो भौमं शीघ्रत्वादिनलस्य च ।
उस समय तेज हवा चलनेसे कुछ धूल तो ऊपर उड़ गयी और कुछ योद्धाओंके रक्तसे सिंचकर नीचे बैठ गयी। इससे भूतलकी वह सारी धूलराशि शान्त हो गयी ॥ ३२ १/२ ॥
तत्र नागा हया योधा रथिनोऽथ पदातयः ॥ ३३ ॥
पारिजातवनानीव व्यरोचन् रुधिरोक्षिताः ।
तदनन्तर वहाँ खूनसे लथपथ हुए हाथी, घोड़े, रथी और पैदल सैनिक पारिजातके जंगलोंके समान सुशोभित होने लगे ॥ ३३ १/२ ॥
ततो दुर्योधनः कर्णो द्रोणो दुःशासनस्तथा ॥ ३४ ॥
पाण्डवैः समसज्जन्त चतुर्भिंश्चतुरो रथाः ।
उस समय दुर्योधन, कर्ण, द्रोणाचार्य और दुःशासन—ये चार महारथी चार पाण्डवोंके साथ युद्ध करने लगे ॥
दुर्योधनः सह भ्रात्रा यमाभ्यां समसज्जत ॥ ३५ ॥
वृकोदरेण राधेयो भारद्वाजेन चार्जुनः ।
दुर्योधन अपने भाई दुःशासनको साथ लेकर नकुल और सहदेवसे भिड़ गया। राधापुत्र कर्ण भीमसेनके साथ और अर्जुन आचार्य द्रोणके साथ युद्ध करने लगे ॥ ३५ १/२ ॥
तद् घोरं महदाश्चर्यं सर्वे प्रैक्षन्त सर्वतः ॥ ३६ ॥
रथर्षभाणामुग्राणां संनिपातममानुषम् ।
उन उग्र महारथियोंका वह घोर, अत्यन्त आश्चर्यजनक और अमानुषिक संग्राम वहाँ सब लोग सब ओरसे देखने लगे ॥ ३६ १/२ ॥
रथमार्गैर्विचित्रैस्तैर्विचित्ररथसंकुलम् ॥ ३७ ॥
अपश्यन् रथिनो युद्धं विचित्रं चित्रयोधिनाम् । रथके विचित्र पैंतरोंसे विचरनेवाले तथा विचित्र युद्ध करनेवाले उन महारथियोंका विचित्र रथोंसे व्याप्त वह विचित्र युद्ध वहाँ सब रथी दर्शककी भाँति देखने लगे ॥ ३७ १/२ ॥ यतमानाः पराक्रान्ताः परस्परजिगीषवः ॥ ३८ ॥ जीमूता इव घर्मान्ते शरवर्षैरवाकिरन् । एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छावाले वे वीर योद्धा प्रयत्नपूर्वक पराक्रममें तत्पर हो वर्षाकालके मेघोंकी भाँति बाणरूपी जलकी वर्षा कर रहे थे ॥ ३८ १/२ ॥ ते रथान् सूर्यसंकाशानास्थिताः पुरुषर्षभाः ॥ ३९ ॥ अशोभन्त यथा मेघाः शारदाश्चलविद्युतः । सूर्यके समान तेजस्वी रथोंपर बैठे हुए वे पुरुषप्रवर योद्धा चंचल चपलाओंकी चमकसे युक्त शरत्कालके मेघोंकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ३९ १/२ ॥ योधास्ते तु महाराज क्रोधामर्षसमन्विताः ॥ ४० ॥ स्पर्धिनश्च महेष्वासाः कृतयत्ना धनुर्धराः । अभ्यगच्छंस्तथान्योन्यं मत्ता गजवृषा इव ॥ ४१ ॥ महाराज! क्रोध और अमर्षमें भरे हुए वे परस्पर स्पर्धा रखनेवाले, विजयके लिये प्रयत्नशील और विशाल धनुष धारण करनेवाले धनुर्धर योद्धा मतवाले गजराजोंके समान एक-दूसरेसे जूझ रहे थे ॥ ४०-४१ ॥ न नूनं देहभेदोऽस्ति काले राजन्ननागते । यत्र सर्वे न युगपद् व्यशीर्यन्त महारथाः ॥ ४२ ॥ राजन्! निश्चय ही अन्तकाल आये बिना किसीके शरीरका नाश नहीं होता है, तभी तो उस संग्राममें क्षत-विक्षत हुए वे समस्त महारथी एक साथ ही नष्ट नहीं हो गये ॥ ४२ ॥ बाहुभिश्चरणैश्छिन्नैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः । कार्मुकैर्विशिखैः प्रासैः खड्गैः परशुपट्टिशैः ॥ ४३ ॥ नालीकैः क्षुद्रनाराचैर्नखरैः शक्तितोमरैः । अन्यैश्च विविधाकारैर्धौतैः प्रहरणोत्तमैः ॥ ४४ ॥ विचित्रैर्विविधाकारैः शरीरावरणैरपि । विचित्रैश्च रथैर्भग्नैर्हतैश्च गजवाजिभिः ॥ ४५ ॥ शून्यैश्च नगराकारैर्हतयोधध्वजै रथैः । अमनुष्यैर्हयैस्त्रस्तैः कृष्यमाणैस्ततस्ततः ॥ ४६ ॥ वातायमानैरसकृद्गतवीरैरलंकृतैः । व्यजनैः कङ्कटैश्चैव ध्वजैश्च विनिपातितैः ॥ ४७ ॥ छत्रैराभरणैर्वस्त्रैर्माल्यैश्च ससुगन्धिभिः । हारैः किरीटैर्मुकुटैरुष्णीषैः किङ्किणीगणैः ॥ ४८ ॥
उरस्थैर्मणिभिर्निष्कैश्चूडामणिभिरेव च ।
आसीदायोधनं तत्र नभस्तारागणैरिव ॥ ४९ ॥
उस समय योद्धाओंके कटे हुए हाथ, पैर, कुण्डलमण्डित मस्तक, धनुष, बाण, प्रास, खड्ग, परशु, पट्टिश, नालीक, छोटे नाराच, नखर, शक्ति, तोमर, अन्यान्य नाना प्रकारके साफ किये हुए उत्तम आयुध, भाँति-भाँतिके विचित्र कवच, टूटे हुए विचित्र रथ तथा मारे गये हाथी, घोड़े, इधर-उधर पड़े थे। वायुके समान वेगशाली, सारथिशून्य, भयभीत घोड़े जिन्हें बारंबार इधर-उधर खींच रहे थे, जिनके रथी योद्धा और ध्वज नष्ट हो गये थे, ऐसे नगराकार सुनसान रथ भी वहाँ दृष्टिगोचर हो रहे थे। आभूषणोंसे विभूषित वीरोंके मृतशरीर यत्र-तत्र गिरे हुए थे, काटकर गिराये हुए व्यजन, कवच, ध्वज, छत्र, आभूषण, वस्त्र, सुगन्धित फूलोंके हार, रत्नोंके हार, किरीट, मुकुट, पगड़ी, किंकिणीसमूह, छातीपर धारण की जानेवाली मणि, सोनेके निष्क और चूड़ामणि आदि वस्तुएँ भी इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं। इन सबसे भरा हुआ वह युद्धस्थल वहाँ नक्षत्रोंसे व्याप्त आकाशके समान सुशोभित हो रहा था ॥ ४३—४९ ॥
ततो दुर्योधनस्यासीन्नकुलेन समागमः ।
अमर्षितेन क्रुद्धस्य क्रुद्धेनामर्षितस्य च ॥ ५० ॥
इसी समय क्रुद्ध और असहिष्णु दुर्योधनका रोष और अमर्षसे भरे हुए नकुलके साथ युद्ध आरम्भ हुआ ॥ ५० ॥
अपसव्यं चकाराथ माद्रीपुत्रस्तवात्मजम् ।
किरन् शरशतैर्हृष्टस्तत्र नादो महानभूत् ॥ ५१ ॥
माद्रीपुत्र नकुलने आपके पुत्र दुर्योधनको दाहिने कर दिया और हर्षमें भरकर उसपर सैकड़ों बाणोंकी झड़ी लगा दी; फिर तो वहाँ महान् कोलाहल हुआ ॥
अपसव्यं कृतं संख्ये भ्रातृव्येनात्यमर्षिणा ।
नामृष्यत तमप्याजी प्रतिचक्रेऽपसव्यतः ॥ ५२ ॥
पुत्रस्तव महाराज राजा दुर्योधनो द्रुतम् ।
अमर्षशील शत्रुके द्वारा युद्धस्थलमें अपने-आपको दाहिने किया हुआ देख दुर्योधन इसे सहन न कर सका। महाराज! फिर आपके पुत्र राजा दुर्योधनने भी तुरंत ही रणभूमिमें नकुलको भी अपने दाहिने ला देनेका प्रयत्न किया ॥ ५२ १/२ ॥
ततः प्रतिचिकीर्षन्तमपसव्यं तु ते सुतम् ॥ ५३ ॥
न्यवारयत तेजस्वी नकुलश्चित्रमार्गवित् ।
तेजस्वी नकुल युद्धकी विचित्र प्रणालियोंके ज्ञाता थे। उन्होंने यह देखकर कि धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन मुझे दाहिने लानेकी चेष्टा कर रहा है, उसे सहसा रोक दिया ॥ ५३ १/२ ॥
स सर्वतो निवार्यैनं शरजालेन पीडयन् ॥ ५४ ॥
विमुखं नकुलश्चक्रे तत् सैन्याः समपूजयन् ।
नकुलने दुर्योधनको अपने बाणसमूहोंद्वारा पीड़ित करते हुए उसे सब ओरसे रोककर युद्धसे विमुख कर दिया। उनके इस पराक्रमकी समस्त सैनिक सराहना करने लगे ।। ५४ १/२ ।।
तिष्ठ तिष्ठेति नकुलो बभाषे तनयं तव ।
संस्मृत्य सर्वदुःखानि तव दुर्मन्त्रितं च तत् ॥ ५५ ॥
उस समय आपकी कुमन्त्रणा तथा अपनेको प्राप्त हुए सम्पूर्ण दुःखोंको स्मरण करके नकुलने आपके पुत्रको ललकारते हुए कहा—'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह' ।। ५५ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि नकुलयुद्धे
सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें नकुलका युद्धविषयक एक सौ सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८७ ।।
१८८-
अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
दुःशासन और सहदेवका, कर्ण और भीमसेनका तथा द्रोणाचार्य और अर्जुनका घोर युद्ध
संजय उवाच
ततो दुःशासनः क्रुद्धः सहदेवमुपाद्रवत् ।
रथवेगेन तीव्रेण कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर अपने रथके तीव्र वेगसे पृथ्वीको कँपाते हुए-से दुःशासनने कुपित होकर सहदेवपर आक्रमण किया ॥ १ ॥
तस्यापतत एवाशु भल्लेनामित्रकर्शनः ।
माद्रीपुत्रः शिरो यन्तुः सशिरस्त्राणमच्छिनत् ॥ २ ॥
उसके आते ही शत्रुसूदन माद्रीकुमार सहदेवने शीघ्र ही एक भल्ल मारकर दुःशासनके सारथिका मस्तक शिरस्त्राणसहित काट डाला ॥ २ ॥
नैनं दुःशासनः सूतं नापि कश्चन सैनिकः ।
कृत्तोत्तमाङ्गमाशुत्वात् सहदेवेन बुद्धवान् ॥ ३ ॥
इस कार्यमें उन्होंने ऐसी फुर्ती दिखायी कि न तो दुःशासन और न दूसरा ही कोई सैनिक इस बातको जान सका कि सहदेवने सारथिका सिर काट डाला है ॥ ३ ॥
यदा त्वसंगृहीतत्वात् प्रयान्त्यश्वा यथासुखम् ।
ततो दुःशासनः सूतं बुबुधे गतचेतसम् ॥ ४ ॥
जब रास छूट जानेके कारण घोड़े अपनी मौजसे इधर-उधर भागने लगे, तब दुःशासनको यह ज्ञात हुआ कि मेरा सारथि मारा गया ॥ ४ ॥
स हयान् संनिगृह्याजौ स्वयं हयविशारदः ।
युयुधे रथिनां श्रेष्ठो लघु चित्रं च सुष्ठु च ॥ ५ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ दुःशासन अश्व-संचालनकी कलामें निपुण था। वह रणभूमिमें स्वयं ही घोड़ोंको काबूमें करके शीघ्रतापूर्वक विचित्र रीतिसे अच्छी तरह युद्ध करने लगा ॥ ५ ॥
तदस्यापूजयन् कर्म स्वे परे चापि संयुगे ।
हतसूतरथेनाजौ व्यचरद् यदभीतवत् ॥ ६ ॥
सारथिके मारे जानेपर भी दुःशासन उस रथके द्वारा युद्धभूमिमें निर्भय-सा विचरता रहा; उसके इस कर्मकी अपने और शत्रुपक्षके लोगोंने भी प्रशंसा की ॥ ६ ॥
सहदेवस्तु तानश्वांस्तीक्ष्णैर्बाणैरवाकिरत् ।
पीड्यमानाः शरैश्चाशु प्राद्रवंस्ते ततस्ततः ॥ ७ ॥
सहदेव उन घोड़ोंपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगे। उन बाणोंसे पीड़ित हुए वे घोड़े शीघ्र ही इधर-उधर भागने लगे ॥ ७ ॥
स रश्मिषु विषक्तत्वादुत्ससर्ज शरासनम् । धनुषा कर्म कुर्वंस्तु रश्मींश्च पुनरुत्सृजत् ॥ ८ ॥
दुःशासन जब घोड़ोंकी रास सँभालने लगता तो धनुष छोड़ देता और जब धनुषसे काम लेता तो विवश होकर घोड़ोंकी रास छोड़ देता था ॥ ८ ॥
छिद्रेष्वेतेषु तं बाणैर्माद्रीपुत्रोऽभ्यवाकिरत् । परीप्संस्त्वत्सुतं कर्णस्तदन्तरमवाप तत् ॥ ९ ॥
उसकी दुर्बलताके इन्हीं अवसरोंपर माद्रीकुमार सहदेव उसे बाणोंसे ढक देते थे। उस समय आपके पुत्रकी रक्षाके लिये कर्ण बीचमें कूद पड़ा ॥ ९ ॥
वृकोदरस्ततः कर्णं त्रिभिर्भल्लैः समाहितः । आकर्णपूर्णैरभ्यघ्नद् बाह्वोरुरसि चानदत् ॥ १० ॥
तब भीमसेनने भी सावधान होकर धनुषको कानतक खींचकर छोड़े गये तीन भल्लोंद्वारा कर्णकी दोनों भुजाओं और छातीमें गहरी चोट पहुँचायी। फिर वे जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ १० ॥
स निवृत्तस्ततः कर्णः संघट्टित इवोरगः । भीममावारयामास विकिरन् निशितान् शरान् ॥ ११ ॥
तदनन्तर पैरोंसे कुचले गये सर्पके समान कुपित हो कर्ण लौट पड़ा और तीखे बाणोंकी वर्षा करके भीमको रोकने लगा ॥ ११ ॥
ततोऽभूत् तुमुलं युद्धं भीमराधेययोस्तदा । तौ वृषाविव नर्दन्तौ विवृत्तनयनावुभौ ॥ १२ ॥
फिर तो भीमसेन और राधापुत्र कर्णमें घोर युद्ध होने लगा। दोनों ही एक-दूसरेकी ओर विकृत दृष्टिसे देखते हुए साँड़ोंके समान गर्जने लगे ॥ १२ ॥
वेगेन महतान्योन्यं संरब्धावभिपेततुः । अभिसंश्लिष्टयोस्तत्र तयोराहवशौण्डयोः ॥ १३ ॥ विच्छिन्नशरपातत्वाद् गदायुद्धमवर्तत ।
फिर दोनों परस्पर अत्यन्त कुपित हो बड़े वेगसे टूट पड़े। उन युद्धकुशल योद्धाओंके परस्पर अत्यन्त निकट आ जानेके कारण उनके बाण चलानेका क्रम टूट गया; इसलिये उनमें गदायुद्ध आरम्भ हो गया ॥ १३ १/२ ॥
गदया भीमसेनस्तु कर्णस्य रथकूबरम् ॥ १४ ॥ बिभेद शतधा राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ।
राजन्! भीमसेनने अपनी गदासे कर्णके रथका कूबर तोड़कर उसके सौ टुकड़े कर दिये, वह अद्भुत-सा कार्य हुआ ॥ १४ १/२ ॥
ततो भीमस्य राधेयो गदामाविध्य वीर्यवान् ॥ १५ ॥
अवासृजद् रथे तां तु बिभेद गदया गदाम् ।
फिर पराक्रमी राधापुत्र कर्णने भीमकी ही गदा उठा ली और उसे घुमाकर उन्हींके रथपर फेंका; किंतु भीमने दूसरी गदासे उस गदाको तोड़ डाला ॥ १५ १/२ ॥
ततो भीमः पुनर्गुर्वीं चिक्षेपाधिरथेर्गदाम् ॥ १६ ॥
तां गदां बहुभिः कर्णः सुपुङ्खैः सुप्रवेजितैः ।
प्रत्यविध्यत् पुनश्चान्यैः सा भीमं पुनराव्रजत् ॥ १७ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने अधिरथपुत्र कर्णपर पुनः एक भारी गदा छोड़ी। परंतु कर्णने तेज किये हुए सुन्दर पंखवाले दूसरे-दूसरे बहुत-से बाण मारकर उस गदाको बींध डाला। इससे वह पुनः भीमपर ही लौट आयी ॥
व्यालीव मन्त्राभिहता कर्णबाणैरभिद्रुता ।
तस्याः प्रतिनिपातेन भीमस्य विपुलो ध्वजः ॥ १८ ॥
पपात सारथिश्चास्य मुमोह च गदाहतः ।
कर्णके बाणोंसे आहत हो वह गदा मन्त्रसे मारी गयी सर्पिणीके समान लौटकर भीमसेनके ही रथपर गिरी। उसके गिरनेसे भीमसेनकी विशाल ध्वजा धराशायी हो गयी और उस गदाकी चोट खाकर उनका सारथि भी मूर्च्छित हो गया ॥ १८ १/२ ॥
स कर्णं सायकानष्टौ व्यसृजत् क्रोधमूर्च्छितः ॥ १९ ॥
तैस्तस्य निशितैस्तीक्ष्णैर्भीमसेनो महाबलः ।
चिच्छेद परवीरघ्नः प्रहसन्निव भारत ॥ २० ॥
ध्वजं शरासनं चैव शरावापं च भारत ।
तब क्रोधसे व्याकुल हुए भीमसेनने कर्णको आठ बाण मारे। भारत! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाबली भीमसेनने हँसते हुए-से उन तेज धारवाले तीखे बाणोंद्वारा कर्णके ध्वज, धनुष और तरकसको काट गिराया ॥ १९-२० १/२ ॥
कर्णोऽप्यन्यद् धनुर्गृह्य हेमपृष्ठं दुरासदम् ॥ २१ ॥
ततः पुनस्तु राधेयो हयानस्य रथेषिभिः ।
ऋक्षवर्णान्जघानाशु तथोभौ पार्ष्णिसारथी ॥ २२ ॥
तत्पश्चात् राधापुत्र कर्णने पुनः सोनेकी पीठवाला दूसरा दुर्जय धनुष हाथमें लेकर रथपर रखे हुए बाणोंद्वारा भीमसेनके रीछके समान रंगवाले काले घोड़ों और दोनों पार्श्वरक्षकोंको शीघ्र ही मार डाला ॥ २१-२२ ॥
स विपन्नरथो भीमो नकुलस्याप्लुतो रथम् ।
हरिर्यथा गिरेः शृङ्गं समाक्रामदरिंदमः ॥ २३ ॥
इस तरह रथ नष्ट हो जानेसे शत्रुदमन भीमसेन जैसे सिंह पर्वतके शिखरपर चढ़ जाता है, उसी प्रकार उछलकर नकुलके रथपर जा बैठे ॥ २३ ॥
तथा द्रोणार्जुनौ चित्रमयुध्येतां महारथौ ।
आचार्यशिष्यौ राजेन्द्र कृतप्रहरणौ युधि ॥ २४ ॥
राजेन्द्र! इसी प्रकार उस युद्धस्थलमें आचार्य और शिष्य महारथी द्रोण तथा अर्जुन परस्पर प्रहार करते हुए विचित्र रीतिसे युद्ध कर रहे थे ॥ २४ ॥
लघुसंधानयोगाभ्यां रथयोश्च रणेन च ।
मोहयन्तौ मनुष्याणां चक्षूंषि च मनांसि च ॥ २५ ॥
शीघ्रतापूर्वक बाणोंके संधान और रथोंके योगसे अपने संग्रामद्वारा वे दोनों वीर लोगोंके नेत्रों और मनको भी मोह लेते थे ॥ २५ ॥
उपारमन्त ते सर्वे योधा भरतसत्तम ।
अदृष्टपूर्वं पश्यन्तस्तद् युद्धं गुरुशिष्ययोः ॥ २६ ॥
भरतश्रेष्ठ! गुरु और शिष्यके उस अपूर्व युद्धको देखते हुए सब योद्धा संग्रामसे विरत हो गये ॥ २६ ॥
विचित्रान् पृतनामध्ये रथमार्गानुदीर्य तौ ।
अन्योन्यमपसव्यं च कर्तुं वीरौ तदेषतुः ॥ २७ ॥
वे दोनों वीर सेनाके बीचमें रथके विचित्र पैंतरे प्रकट करते हुए उस समय एक-दूसरेको दायें कर देनेकी चेष्टा करने लगे ॥ २७ ॥
पराक्रमं तयोर्योधा ददृशुस्ते सुविस्मिताः ।
तयोः समभवद् युद्धं द्रोणपाण्डवयोर्महत् ॥ २८ ॥
आमिषार्थे महाराज गगने श्येनयोरिव ।
उन द्रोणाचार्य और पाण्डुपुत्र अर्जुनके पराक्रमको वे सब सैनिक अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर देख रहे थे। महाराज! जैसे मांसके टुकड़ेके लिये आकाशमें दो बाज लड़ रहे हों, उसी प्रकार राज्यके लिये उन दोनों गुरु-शिष्योंमें बड़ा भारी युद्ध हो रहा था ॥ २८ १/२ ॥
यद् यच्चकार द्रोणस्तु कुन्तीपुत्रजिगीषया ॥ २९ ॥
तत् तत् प्रतिजघानाशु प्रहसंस्तस्य पाण्डवः ।
द्रोणाचार्य कुन्तीपुत्र अर्जुनको जीतनेकी इच्छासे जिस-जिस अस्त्रका प्रयोग करते थे, उस-उसको पाण्डुपुत्र अर्जुन हँसते हुए तत्काल काट देते थे ॥ २९ १/२ ॥
यदा द्रोणो न शक्नोति पाण्डवं स्म विशेषितुम् ॥ ३० ॥
ततः प्रादुश्चकारास्त्रमस्त्रमार्गविशारदः ।
जब द्रोणाचार्य पाण्डुपुत्र अर्जुनकी अपेक्षा अपनी विशेषता न सिद्ध कर सके, तब अस्त्रमार्गोंके ज्ञाता गुरुदेवने दिव्यास्त्रोंको प्रकट किया ॥ ३० १/२ ॥
ऐन्द्रं पाशुपतं त्वाष्ट्रं वायव्यमथ वारुणम् ॥ ३१ ॥
मुक्तं मुक्तं द्रोणचापात् तज्जघान धनंजयः ।
द्रोणाचार्यके धनुषसे क्रमशः छूटे हुए ऐन्द्र, पाशुपत, त्वाष्ट्र, वायव्य तथा वारुण नामक अस्त्रको अर्जुनने तत्काल शान्त कर दिया ॥ ३१ १/२ ॥ अस्त्राण्यस्त्रैर्यदा तस्य विधिवद्धन्ति पाण्डवः ॥ ३२ ॥ ततोऽस्त्रैः परमैर्दिव्यैर्द्रोणः पार्थमवाकिरत् । जब पाण्डुकुमार अर्जुन आचार्यके सभी अस्त्रोंको अपने अस्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक नष्ट करने लगे, तब द्रोणने परम दिव्य अस्त्रोंद्वारा अर्जुनको ढक दिया ॥ ३२ १/२ ॥ यद् यदस्त्रं स पार्थाय प्रयुङ्क्ते विजिगीषया ॥ ३३ ॥ तस्य तस्य विघाताय तत् तद्धि कुरुतेऽर्जुनः । परंतु विजयकी इच्छासे वे पार्थपर जिस-जिस अस्त्रका प्रयोग करते थे, उस-उसके विनाशके लिये अर्जुन वैसे ही अस्त्रोंका प्रयोग करते थे ॥ ३३ १/२ ॥ स वध्यमानेष्वस्त्रेषु दिव्येष्वपि यथाविधि ॥ ३४ ॥ अर्जुनेनार्जुनं द्रोणो मनसैवाभ्यपूजयत् । जब अर्जुनके द्वारा उनके विधिपूर्वक चलाये हुए दिव्यास्त्र भी प्रतिहत होने लगे, तब द्रोणने अर्जुनकी मन-ही-मन सराहना की ॥ ३४ १/२ ॥ मेने चात्मानमधिकं पृथिव्यामधि भारत ॥ ३५ ॥ तेन शिष्येण सर्वेभ्यः शस्त्रविद्भ्यः परंतपः । भारत! शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोणाचार्य उस शिष्यके द्वारा अपने-आपको भूमण्डलके सभी शस्त्रवेत्ताओंसे श्रेष्ठ मानने लगे ॥ ३५ १/२ ॥ वार्यमाणस्तु पार्थेन तथा मध्ये महात्मनाम् ॥ ३६ ॥ यतमानोऽर्जुनं प्रीत्या प्रत्यवारयदत्स्मयन् । महामनस्वी वीरोंके बीचमें अर्जुनके द्वारा इस प्रकार रोके जाते हुए द्रोणाचार्य प्रयत्न करके प्रसन्नतापूर्वक मुसकराते हुए स्वयं भी अर्जुनको आगे बढ़नेसे रोकने लगे ॥ ३६ १/२ ॥ ततोऽन्तरिक्षे देवाश्च गन्धर्वाश्च सहस्रशः ॥ ३७ ॥ ऋषयः सिद्धसंघाश्च व्यतिष्ठन्त दिदृक्षया । तदनन्तर वह युद्ध देखनेकी इच्छासे आकाशमें बहुत-से देवता, सहस्रों गन्धर्व, ऋषि और सिद्धसमुदाय खड़े हो गये ॥ ३७ १/२ ॥ तदप्सरोभिराकीर्णं यक्षगन्धर्वसंकुलम् ॥ ३८ ॥ श्रीमदाकाशमभवद् भूयो मेघाकुलं यथा । अप्सराओं, यक्षों और गन्धर्वोंसे भरा हुआ आकाश ऐसी विशिष्ट शोभा पा रहा था, मानो उसमें मेघोंकी घटा घिर आयी हो ॥ ३८ १/२ ॥ तत्र स्मान्तर्हिता वाचो व्यचरन्त पुनः पुनः ॥ ३९ ॥ द्रोणपार्थस्तवोपेता व्यश्रूयन्त नराधिप ।
नरेश्वर! वहाँ द्रोणाचार्य और अर्जुनकी स्तुतिसे युक्त अदृश्य व्यक्तियोंके मुखोंसे निकली हुई बातें बारंबार सुनायी देने लगीं ।। ३९ १/२ ।।
विसृज्यमानेष्वस्त्रेषु ज्वालयत्सु दिशो दश ।। ४० ।।
अब्रुवंस्तत्र सिद्धाश्च ऋषयश्च समागताः ।
जब दिव्यास्त्रोंके प्रयोग होने लगे और उनके तेजसे दसों दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं, उस समय आकाशमें एकत्र हुए सिद्ध और ऋषि इस प्रकार वार्तालाप करने लगे— ।। ४० १/२ ।।
नैवेदं मानुषं युद्धं नासुरं न च राक्षसम् ।। ४१ ।।
न दैवं न च गान्धर्वं ब्राह्मं ध्रुवमिदं परम् ।
विचित्रमिदमाश्चर्यं न नो दृष्टं न च श्रुतम् ।। ४२ ।।
‘यह युद्ध न तो मनुष्योंका है, न असुरोंका, न राक्षसोंका है और न देवताओं एवं गन्धर्वोंका ही। निश्चय ही यह परम उत्तम ब्राह्म युद्ध है। ऐसा विचित्र एवं आश्चर्यजनक संग्राम हमलोगोंने न तो कभी देखा था और न सुना ही था ।। ४१-४२ ।।
अति पाण्डवमाचार्यो द्रोणं चाप्यति पाण्डवः ।
नानयोरन्तरं शक्यं द्रष्टुमन्येन केनचित् ।। ४३ ।।
‘आचार्य द्रोण पाण्डुपुत्र अर्जुनसे बढ़कर हैं और पाण्डुपुत्र अर्जुन भी आचार्य द्रोणसे बढ़कर हैं। इन दोनोंमें कितना अन्तर है, इसे दूसरा कोई नहीं देख सकता ।।
यदि रुद्रो द्विधाकृत्य युध्येतात्मानमात्मना ।
तत्र शक्योपमा कर्तुमन्यत्र तु न विद्यते ।। ४४ ।।
‘यदि भगवान् शंकर अपने दो रूप बनाकर स्वयं ही अपने साथ युद्ध करें तो उसी युद्धसे इनकी उपमा दी जा सकती है और कहीं इन दोनोंकी समता नहीं है ।। ४४ ।।
ज्ञानमेकस्थमाचार्ये ज्ञानं योगश्च पाण्डवे ।
शौर्यमेकस्थमाचार्ये बलं शौर्यं च पाण्डवे ।। ४५ ।।
‘आचार्य द्रोणमें सारा ज्ञान एकत्र संचित है; परंतु पाण्डुपुत्र अर्जुनमें ज्ञानके साथ-साथ योग भी है। इसी प्रकार आचार्य द्रोणमें सारा शौर्य एक स्थानपर आ गया है; परंतु पाण्डुनन्दन अर्जुनमें शौर्यके साथ बल भी है ।। ४५ ।।
नेमौ शक्यौ महेष्वासौ युद्धे क्षपयितुं परैः ।
इच्छमानौ पुनरिमौ हन्येतां सामरं जगत् ।। ४६ ।।
‘ये दोनों महाधनुर्धर वीर युद्धमें दूसरे किन्हीं योद्धाओंके द्वारा नहीं मारे जा सकते। परंतु यदि ये दोनों चाहें तो देवताओंसहित सम्पूर्ण जगत्का विनाश कर सकते हैं’ ।। ४६ ।।
इत्यब्रुवन् महाराज दृष्ट्वा तौ पुरुषर्षभौ ।
अन्तर्हितानि भूतानि प्रकाशानि च सर्वशः ।। ४७ ।।
महाराज! उन दोनों पुरुषप्रवर वीरोंको देखकर आकाशमें छिपे हुए तथा प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले प्राणी भी सब ओर यही बातें कह रहे थे ॥ ४७ ॥ ततो द्रोणो ब्राह्ममस्त्रं प्रादुश्चक्रे महामतिः । संतापयन् रणे पार्थं भूतान्यन्तर्हितानि च ॥ ४८ ॥ तत्पश्चात् परम बुद्धिमान् द्रोणाचार्यने रणभूमिमें अर्जुनको तथा आकाशवर्ती अदृश्य प्राणियोंको संताप देते हुए ब्रह्मास्त्र प्रकट किया ॥ ४८ ॥ ततश्चचाल पृथिवी सपर्वतवनद्रुमा । ववौ च विषमो वायुः सागराश्चापि चुक्षुभुः ॥ ४९ ॥ फिर तो पर्वत, वन और वृक्षोंसहित धरती डोलने लगी, आँधी उठ गयी और समुद्रोंमें ज्वार आ गया ॥ ४९ ॥ ततस्त्रासो महानासीत् कुरुपाण्डवसेनयोः । सर्वेषां चैव भूतानामुद्यतेऽस्त्रे महात्मना ॥ ५० ॥ महामना द्रोणके द्वारा ब्रह्मास्त्रके उठाये जाते ही कौरवों और पाण्डवोंकी सेनाओंपर तथा समस्त प्राणियोंमें बड़ा भारी आतंक छा गया ॥ ५० ॥ ततः पार्थोऽप्यसम्भ्रान्तस्तदस्त्रं प्रतिजघ्निवान् । ब्रह्मास्त्रेणैव राजेन्द्र ततः सर्वमशीशमत् ॥ ५१ ॥ राजेन्द्र! तब अर्जुनने भी बिना किसी घबराहटके ब्रह्मास्त्रसे ही द्रोणाचार्यके उस अस्त्रको दबा दिया; फिर सारा उपद्रव शान्त हो गया ॥ ५१ ॥ यदा न गम्यते पारं तयोरन्यतरस्य वा । ततः संकुलयुद्धेन तद् युद्धं व्याकुलीकृतम् ॥ ५२ ॥ जब द्रोणाचार्य और अर्जुनमेंसे कोई भी किसीको परास्त न कर सका, तब सामूहिक युद्धके द्वारा उस संग्रामको व्यापक बना दिया गया ॥ ५२ ॥ नाज्ञायत ततः किंचित् पुनरेव विशाम्पते । प्रवृत्ते तुमुले युद्धे द्रोणपाण्डवयोर्मृधे ॥ ५३ ॥ प्रजानाथ! रणभूमिमें द्रोणाचार्य और अर्जुनमें घमासान युद्ध छिड़ जानेपर फिर किसीको कुछ सूझ नहीं रहा था ॥ ५३ ॥ (द्रोणो मुक्त्वा रणे पार्थं पञ्चालानन्वधावत । अर्जुनोऽपि रणे द्रोणं त्यक्त्वा प्राद्रावयत् कुरून् ॥ द्रोणाचार्यने युद्धस्थलमें अर्जुनको छोड़कर पांचालोंपर धावा किया और अर्जुनने भी वहाँ द्रोणाचार्यका मुकाबला छोड़कर कौरव-सैनिकोंको वेगपूर्वक खदेड़ना आरम्भ किया। शरौघैरथ ताभ्यां तु छायाभूतं महामृधे । तुमुलं प्रबभौ राजन् सर्वस्य जगतो भयम् ॥)