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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

भारत! उस समय सत्यपराक्रमी सात्यकि द्रोण, कर्ण और कृपाचार्यके बीचमें होकर रथके मागोंपर विचर रहे थे। उन्हें उस अवस्थामें महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुनने देखा और ‘साधु-साधु’ कहकर सात्यकिकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। वे युद्धमें अविचलभावसे डटे रहकर समस्त विरोधियोंके दिव्यास्त्रोंका निवारण कर रहे थे॥ ४७-४८ १/२॥

अभिपत्य ततः सेनां विष्वक्सेनधनंजयौ ॥ ४९ ॥
धनंजयस्ततः कृष्णमब्रवीत् पश्य केशव ।
आचार्यरथमुख्यानां मध्ये क्रीडन् मधूद्वहः ॥ ५० ॥
तदनन्तर श्रीकृष्ण और अर्जुन शत्रुसेनापर टूट पड़े। उस समय अर्जुनने श्रीकृष्णसे कहा—‘केशव! देखिये, यह मधुवंशशिरोमणि सात्यकि आचार्यकी रक्षा करनेवाले मुख्य महारथियोंके बीचमें खेल रहा है॥ ४९-५०॥

आनन्दयति मां भूयः सात्यकिः परवीरहा ।
माद्रीपुत्रौ च भीमं च राजानं च युधिष्ठिरम् ॥ ५१ ॥
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला सात्यकि मुझे बारंबार आनन्द दे रहा है और नकुल, सहदेव, भीमसेन तथा राजा युधिष्ठिरको भी आनन्दित कर रहा है॥ ५१॥

यच्छिक्षयानुद्धतः सन् रणे चरति सात्यकिः ।
महारथानुपक्रीडन् वृष्णीनां कीर्तिवर्धनः ॥ ५२ ॥
तमेते प्रतिनन्दन्ति सिद्धाः सैन्याश्च विस्मिताः ।
अजय्यं समरे दृष्ट्वा साधु साध्विति सात्यकिम् ।
योधाश्चोभयतः सर्वे कर्मभिः समपूजयन् ॥ ५३ ॥
‘वृष्णिवंशका यश बढ़ानेवाला सात्यकि उत्तम शिक्षासे युक्त होनेपर भी अभिमानशून्य हो महारथियोंके साथ क्रीड़ा करता हुआ रणभूमिमें विचर रहा है। इसलिये ये सिद्धगण और सैनिक आश्चर्यचकित हो समरांगणमें परास्त न होनेवाले सात्यकिकी ओर देखकर ‘साधु-साधु’ कहते हुए इसका अभिनन्दन करते हैं और दोनों दलोंके समस्त योद्धाओंने इसके वीरोचित कर्मोंसे प्रभावित हो इसकी बड़ी प्रशंसा की है’॥ ५२-५३॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि संकुलयुद्धे
एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९१॥


* तलवारको मण्डलाकार घुमाना ‘भ्रान्त’ कहलाता है। वही कार्य बाँह ऊपर उठाकर किया जाय तो उसे ‘उद्भ्रान्त’ कहा गया है। अपने चारों ओर तलवारको घुमाया जाय तो उसे ‘आविद्ध’ कहते हैं। ये तीन कार्य शत्रुके चलाये हुए शस्त्रका निवारण करनेके लिये किये जाते हैं, शत्रुपर आक्रमण करनेके लिये जाना ‘आप्लुत’ माना गया है। तलवारकी

नोकसे शत्रुके शरीरका स्पर्श करना ‘प्रसृत’ कहा गया है। चकमा देकर शत्रुपर शस्त्रका आघात करना ‘सृत’ बताया गया है। शत्रुके दायें-बायें तलवार चलाना ‘परिवृत्त’ कहा गया है। पीछे हटना ‘निवृत्त’ है। दोनों योद्धाओंका परस्पर आघात-प्रत्याघात ‘सम्पात’ कहलाता है। अपनी विशेषता स्थापित करना ‘समुदीर्ण’ है। अंग-प्रत्यंगमें तलवार भाँजना ‘भारत’ माना गया है। विचित्र रीतिसे तलवार चलानेकी कला दिखाना ‘कौशिक’ कहा गया है। अपनेको ढालकी आड़में छिपाकर तलवार चलानेका नाम ‘सात्वत’ है।

१९२-

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द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद

संजय उवाच

सात्वतस्य तु तत् कर्म दृष्ट्वा दुर्योधनादयः ।
शैनेयं सर्वतः क्रुद्धा वारयामासुरोजसा ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! सात्वतवंशी सात्यकिका वह कर्म देखकर दुर्योधन आदि कौरवयोद्धा कुपित हो उठे और उन्होंने अनायास ही शिनिपौत्रको सब ओरसे घेर लिया ॥ १ ॥

कृपकर्णौ च समरे पुत्राश्च तव मारिष ।
शैनेयं त्वरयाभ्येत्य विनिघ्नन् निशितैः शरैः ॥ २ ॥
मान्यवर! समरांगणमें कृपाचार्य, कर्ण और आपके पुत्र तुरंत ही सात्यकिके पास पहुँचकर उन्हें पैने बाणोंसे घायल करने लगे ॥ २ ॥

युधिष्ठिरस्ततो राजा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ।
भीमसेनश्च बलवान् सात्यकिं पर्यवारयन् ॥ ३ ॥
तब राजा युधिष्ठिर, पाण्डुकुमार नकुल-सहदेव तथा बलवान् भीमसेनने सात्यकिकी रक्षाके लिये उन्हें अपने बीचमें कर लिया ॥ ३ ॥

कर्णश्च शरवर्षेण गौतमश्च महारथः ।
दुर्योधनादयस्ते च शैनेयं पर्यवारयन् ॥ ४ ॥
कर्ण, महारथी कृपाचार्य और दुर्योधन आदिने बाणोंकी वर्षा करके चारों ओरसे सात्यकिको अवरुद्ध कर दिया ॥ ४ ॥

तां वृष्टिं सहसा राजन्नुत्थितां घोररूपिणीम् ।
वारयामास शैनेयो योधयंस्तान् महारथान् ॥ ५ ॥
राजन्! उन महारथियोंके साथ युद्ध करते हुए शिनिपौत्र सात्यकिने सहसा उठी हुई उस भयंकर बाण-वर्षाको अपने अस्त्रोंद्वारा रोक दिया ॥ ५ ॥

तेषामस्त्राणि दिव्यानि संहितानि महात्मनाम् ।
वारयामास विधिवद् दिव्यैरस्त्रैर्महामृधे ॥ ६ ॥
उन्होंने उस महासमरमें विधिपूर्वक दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करके उन महामनस्वी वीरोंके छोड़े हुए दिव्य अस्त्रोंका निवारण कर दिया ॥ ६ ॥

क्रूरमायोधनं जज्ञे तस्मिन् राजसमागमे । रुद्रस्येव हि क्रुद्धस्य निघ्नतस्तान् पशून् पुरा ॥ ७ ॥ राजाओंमें वह संघर्ष छिड़ जानेपर उस युद्ध-स्थलमें क्रूरताका ताण्डव होने लगा। जैसे पूर्व (प्रलय) कालमें क्रोधमें भरे हुए रुद्रदेवके द्वारा पशुओं (प्राणियों)-का संहार होते समय निर्दयताका दृश्य उपस्थित हुआ था ॥ ७ ॥ हस्तानामुत्तमाङ्गानां कार्मुकाणां च भारत । छत्राणां चापविद्धानां चामराणां च संचयैः ॥ ८ ॥ राशयः स्म व्यदृश्यन्त तत्र तत्र रणाजिरे । भारत! कटकर गिरे हुए हाथों, मस्तकों, धनुषों, छत्रों और चँवरोंके संग्रहोंसे उस समरांगणके विभिन्न प्रदेशोंमें उक्त वस्तुओंके ढेर-के-ढेर दिखायी दे रहे थे ॥ भग्नचक्रै रथैश्चापि पातितैश्च महाध्वजैः ॥ ९ ॥ सादिभिश्च हतैः शूरैः संकीर्णा वसुधाभवत् । टूटे पहियेवाले रथों, गिराये हुए विशाल ध्वजों और मारे गये शूरवीर घुड़सवारोंसे वहाँकी भूमि आच्छादित हो गयी थी ॥ ९ १/२ ॥ बाणपातनिकृत्तास्तु योधास्ते कुरुसत्तम ॥ १० ॥ चेष्टन्तो विविधाश्चेष्टा व्यदृश्यन्त महाहवे । कुरुश्रेष्ठ! बाणोंके आघातसे कटे हुए योद्धा उस महासमरमें अनेक प्रकारकी चेष्टाएँ करते और छटपटाते दिखायी देते थे ॥ १० १/२ ॥ वर्तमाने तथा युद्धे घोरे देवासुरोपमे ॥ ११ ॥ अब्रवीत् क्षत्रियांस्तत्र धर्मराजो युधिष्ठिरः । अभिद्रवत संयत्ताः कुम्भयोनिं महारथाः ॥ १२ ॥ देवासुर-संग्रामके समान जब वह घोर युद्ध चल रहा था, उस समय धर्मराज युधिष्ठिरने अपने पक्षके क्षत्रिय योद्धाओंसे इस प्रकार कहा—'महारथियो! तुम सब लोग पूर्णतः सावधान होकर द्रोणाचार्यपर धावा करो ॥ एषो हि पार्षतो वीरो भारद्वाजेन संगतः । घटते च यथाशक्ति भारद्वाजस्य नाशने ॥ १३ ॥ 'ये वीर द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्यके साथ जूझ रहे हैं और उनके विनाशके लिये यथाशक्ति चेष्टा कर रहे हैं ॥ १३ ॥ यादृशानि हि रूपाणि दृश्यन्तेऽस्य महारणे । अद्य द्रोणं रणे क्रुद्धो घातयिष्यति पार्षतः ॥ १४ ॥ ते यूयं सहिता भूत्वा युध्यध्वं कुम्भसम्भवम् ।

'आज महासमरमें इनके जैसे रूप दिखायी देते हैं, उनसे यह ज्ञात होता है कि रणभूमिमें कुपित हुए धृष्टद्युम्न सब प्रकारसे द्रोणाचार्यका वध कर डालेंगे। इसलिये तुम सब लोग एक साथ होकर कुम्भजन्मना द्रोणाचार्यके साथ युद्ध करो' ॥ १४ १/२ ॥
युधिष्ठिरसमाज्ञाप्ताः सृञ्जयानां महारथाः ॥ १५ ॥
अभ्यद्रवन्त संयत्ता भारद्वाजजिघांसवः ।
युधिष्ठिरकी यह आज्ञा पाकर सृंजय महारथी द्रोणाचार्यको मार डालनेकी अभिलाषासे पूर्ण सावधान हो उनपर टूट पड़े ॥ १५ १/२ ॥
तान् समापततः सर्वान् भारद्वाजो महारथः ॥ १६ ॥
अभ्यवर्तत वेगेन मर्तव्यमिति निश्चितः ।
महारथी द्रोणाचार्यने मरनेका निश्चय करके उन समस्त आक्रमणकारियोंका बड़े वेगसे सामना किया ॥
प्रयाते सत्यसंधे तु समकम्पत मेदिनी ॥ १७ ॥
ववुर्वाताः सनिर्घातास्त्रासयाना वरूथिनीम् ।
सत्यप्रतिज्ञ द्रोणाचार्यके आगे बढ़ते ही पृथ्वी काँपने लगी और वज्रपातकी आवाजके साथ ही प्रचण्ड आँधी चलने लगी, जो सारी सेनाको डरा रही थी ॥
पपात महती चोल्का आदित्यान्निश्चरन्त्युत ॥ १८ ॥
दीपयन्ती उभे सेने शंसन्तीव महत् भयम् ।
सूर्यमण्डलसे बड़ी भारी उल्का निकलकर दोनों सेनाओंको प्रकाशित करती और महान् भयकी सूचना-सी देती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ १८ १/२ ॥
जज्वलुश्चैव शस्त्राणि भारद्वाजस्य मारिष ॥ १९ ॥
रथाः स्वनन्ति चात्यर्थं हयाश्चाश्रुण्यवासृजन् ।
माननीय नरेश! द्रोणाचार्यके शस्त्र जलने लगे, रथसे बड़े जोरकी आवाज उठने लगी और घोड़े आँसू बहाने लगे ॥ १९ १/२ ॥
हतौजा इव चाप्यासीद् भारद्वाजो महारथः ॥ २० ॥
प्रास्फुरन्नयनं चास्य वामं बाहुस्तथैव च ।
महारथी द्रोणाचार्य उस समय तेजोहिन-से हो रहे थे। उनकी बायीं आँख और बायीं भुजा फड़क रही थी ॥
विमनाश्चाभवद् युद्धे दृष्ट्वा पार्षतमग्रतः ॥ २१ ॥
ऋषीणां ब्रह्मवादानां स्वर्गस्य गमनं प्रति ।
सुयुद्धेन ततः प्राणानुत्स्रष्टुमुपचक्रमे ॥ २२ ॥
वे युद्धमें अपने सामने धृष्टद्युम्नको देखकर मन-ही-मन उदास हो गये। साथ ही ब्रह्मवादी महर्षियोंके ब्रह्मलोकमें चलनेके सम्बन्धमें कहे हुए वचनोंका स्मरण करके उन्होंने उत्तम युद्धके द्वारा अपने प्राणोंको त्याग देनेका विचार किया ॥ २१-२२ ॥

ततश्चतुर्दिशं सैन्यैर्द्रुपदस्याभिसंवृतः । निर्दहन् क्षत्रियव्रातान् द्रोणः पर्यचरद् रणे ॥ २३ ॥ तदनन्तर द्रुपदकी सेनाओंद्धारा चारों ओरसे घिरे हुए द्रोणाचार्य क्षत्रियसम्मूहोंको दग्ध करते हुए रणभूमिमें विचरने लगे ॥ २३ ॥ हत्वा विंशतिसाहस्रान् क्षत्रियानरिमर्दनः । दशायुतानि करिणामवधीद् विशिखैः शितैः ॥ २४ ॥ शत्रुमर्दन द्रोणने वहाँ बीस हजार क्षत्रियोंका संहार करके अपने तीखे बाणोंद्धारा एक लाख हाथियोंका वध कर डाला ॥ २४ ॥ सोऽतिष्ठदाहवे यत्तो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् । क्षत्रियाणामभावाय ब्राह्ममस्त्रं समास्थितः ॥ २५ ॥ फिर वे क्षत्रियोंका विनाश करनेके लिये ब्रह्मास्त्रका सहारा ले बड़ी सावधानीके साथ युद्धभूमिमें खड़े हो गये और धूमरहित प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होने लगे ॥ २५ ॥ पाञ्चाल्यं विरथं भीमो हतसर्वायुधं बली । सुविषण्णं महात्मानं त्वरमाणः समभ्ययात् ॥ २६ ॥ ततः स्वरथमारोप्य पाञ्चाल्यमरिमर्दनः । अब्रवीदभिसम्प्रेक्ष्य द्रोणमस्यन्तमन्तिकात् ॥ २७ ॥ पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न रथहीन हो गये थे। उनके सारे अस्त्र-शस्त्र नष्ट हो चुके थे और वे भारी विषादमें डूब गये थे। उस अवस्थामें शत्रुमर्दन बलवान् भीमसेन उन महामनस्वी पांचालवीरके पास तुरंत आ पहुँचे और उन्हें अपने रथपर बिठाकर द्रोणाचार्यको निकटसे बाण चलाते देख इस प्रकार बोले— ॥ २६-२७ ॥ न त्वदन्य इहाचार्यं योद्धुमुत्सहते पुमान् । त्वरस्व प्राग् वधायैव त्वयि भारः समाहितः ॥ २८ ॥ 'धृष्टद्युम्न! यहाँ तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो आचार्यके साथ जूझनेका साहस कर सके। अतः तुम पहले उनके वधके लिये ही शीघ्रतापूर्वक प्रयत्न करो। तुमपर ही इसका सारा भार रखा गया है' ॥ स तथोक्तो महाबाहुः सर्वभारसहं धनुः । अभिपत्याददे क्षिप्रमायुधप्रवरं दृढम् ॥ २९ ॥ भीमसेनके ऐसा कहनेपर महाबाहु धृष्टद्युम्नने उछलकर शीघ्रतापूर्वक सारा भार सहन करनेमें समर्थ सुदृढ़ एवं श्रेष्ठ आयुध धनुषको उठा लिया ॥ २९ ॥ संरब्धश्च शरानस्यन् द्रोणं दुर्वारणं रणे । निवारयिषुराचार्यं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ३० ॥

फिर क्रोधमें भरकर बाण चलाते हुए उन्होंने रणभूमिमें कठिनतासे रोके जानेवाले द्रोणाचार्यको रोक देनेकी इच्छासे उन्हें बाणोंकी वर्षाद्वारा ढक दिया ॥ ३० ॥ तौ न्यवारयतां श्रेष्ठौ संरब्धौ रणशोभिनौ । उदीरयेतां ब्रह्माणि दिव्यान्यस्त्राण्यनेकशः ॥ ३१ ॥ संग्रामभूमिमें शोभा पानेवाले वे दोनों श्रेष्ठ वीर कुपित हो नाना प्रकारके दिव्यास्त्र एवं ब्रह्मास्त्र प्रकट करते हुए एक-दूसरेको आगे बढ़नेसे रोकने लगे ॥ ३१ ॥ स महास्त्रैर्महाराज द्रोणमाच्छादयद् रणे । निहत्य सर्वाण्यस्त्राणि भारद्वाजस्य पार्षतः ॥ ३२ ॥ महाराज! धृष्टद्युम्नने रणभूमिमें द्रोणाचार्यके सभी अस्त्रोंको नष्ट करके उन्हें अपने महान् अस्त्रोंद्वारा आच्छादित कर दिया ॥ ३२ ॥ सवसातीञ्शिबींश्चैव बाह्लीकान् कौरवानपि । रक्षिष्यमाणान् संग्रामे द्रोणं व्यधमदच्युतः ॥ ३३ ॥ कभी विचलित न होनेवाले पांचालवीरने संग्राममें द्रोणाचार्यकी रक्षा करनेवाले बसाति, शिबि, बाह्लीक और कौरवयोध्दाओंका भी संहार कर डाला ॥ ३३ ॥ धृष्टद्युम्नस्तथा राजन् गभस्तिभिरिवांशुमान् । बभौ प्रच्छादयन्नाशाः शरजालैः समन्ततः ॥ ३४ ॥ राजन्! अपने बाणोंके समूहसे सम्पूर्ण दिशाओंको सब ओरसे आच्छादित करते हुए धृष्टद्युम्न किरणोंद्वारा अंशुमाली सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ३४ ॥ तस्य द्रोणो धनुश्छित्त्वा विद्ध्वा चैनं शिलीमुखैः । मर्माण्यभ्यहनद् भूयः स व्यथां परमामगात् ॥ ३५ ॥ तदनन्तर द्रोणाचार्यने धृष्टद्युम्नका धनुष काटकर उन्हें बाणोंद्वारा घायल कर दिया और पुनः उनके मर्मस्थानोंको गहरी चोट पहुँचायी; इससे उन्हें बड़ी व्यथा हुई ॥ ३५ ॥ ततो भीमो दृढक्रोधो द्रोणस्याश्लिष्य तं रथम् । शनकैरिव राजेन्द्र द्रोणं वचनमब्रवीत् ॥ ३६ ॥ राजेन्द्र! तब अपने क्रोधको दृढ़तापूर्वक बनाये रखनेवाले भीमसेन द्रोणाचार्यके उस रथसे सटकर उनसे धीरे-धीरे इस प्रकार बोले— ॥ ३६ ॥ यदि नाम न युध्येरन् शिक्षिता ब्रह्मबान्धवाः । स्वकर्मभिरसंतुष्टा न स्म क्षत्रं क्षयं व्रजेत् ॥ ३७ ॥ ‘यदि शिक्षित ब्राह्मण अपने कर्मोंसे असंतुष्ट हो परधर्मका आश्रय ले युद्ध न करते तो क्षत्रियोंका यह संहार न होता ॥ ३७ ॥ अहिंसां सर्वभूतेषु धर्मं ज्यायस्तरं विदुः । तस्य च ब्राह्मणो मूलं भवांश्च ब्रह्मवित्तमः ॥ ३८ ॥

'प्राणियोंकी हिंसा न करनेको ही सबसे श्रेष्ठ धर्म माना गया है। उसकी जड़ है ब्राह्मण और आप तो उन ब्राह्मणोंमें भी सबसे उत्तम ब्रह्मवेत्ता हैं।। ३८ ।। श्वपाकवन्म्लेच्छगणान् हत्वा चान्यान् पृथग्विधान् । अज्ञानान्मूढवद् ब्रह्मन् पुत्रदारधनेप्सया ।। ३९ ।। 'ब्रह्मन्! ब्रह्मवेत्ता होकर भी आपने स्त्री, धन और पुत्रकी लिप्सासे मूर्ख चाण्डालोंके समान कितने ही म्लेच्छों तथा अन्य नाना प्रकारके क्षत्रियसम्मूहोंका संहार कर डाला है ।। ३९ ।। एकस्यार्थे बहून् हत्वा पुत्रस्याधर्मविद्यया । स्वकर्मस्थान् विकर्मस्थो न व्यपत्रपसे कथम् ।। ४० ।। 'आप अपने एक पुत्रकी जीविकाके लिये विपरीत कर्मका आश्रय ले इस पाप-विद्याके द्वारा स्वधर्मपरायण बहुसंख्यक क्षत्रियोंका वध करके लज्जित कैसे नहीं हो रहे हैं? ।। ४० ।। यस्यार्थे शस्त्रमादाय यमपेक्ष्य च जीवसि । स चाद्य पतितः शेते पृष्ठे नावेदितस्तव ।। ४१ ।। धर्मराजस्य तद् वाक्यं नाभिशङ्कितुमर्हसि । 'जिसके लिये आपने शस्त्र उठाया, जिसके जीवनकी अभिलाषा रखकर आप जी रहे हैं, वह तो आज पीछे समरभूमिमें गिरकर चिरनिद्रामें सो रहा है और आपको इसकी सूचनातक नहीं दी गयी। धर्मराज युधिष्ठिरके उस कथनपर तो आपको संदेह या अविश्वास नहीं करना चाहिये' ।। ४१ ½ ।। एवमुक्तस्ततो द्रोणो भीमेनोत्सृज्य तद् धनुः ।। ४२ ।। सर्वाण्यस्त्राणि धर्मात्मा हातुकामोऽभ्यभाषत । भीमसेनके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा द्रोणाचार्य वह धनुष फेंककर अन्य सब अस्त्र-शस्त्रोंको भी त्याग देनेकी इच्छासे इस प्रकार बोले— ।। ४२ ½ ।। कर्ण कर्ण महेष्वास कृप दुर्योधनेति च ।। ४३ ।। संग्रामे क्रियतां यत्नो ब्रवीम्येष पुनः पुनः । पाण्डवेभ्यः शिवं वोऽस्तु शस्त्रमभ्युत्सृजाम्यहम् ।। ४४ ।। 'कर्ण! कर्ण! महाधनुर्धर कृपाचार्य! और दुर्योधन! अब तुमलोग स्वयं ही युद्धमें विजय पानेके लिये प्रयत्न करो, यही मैं तुमसे बारंबार कहता हूँ। पाण्डवोंसे तुम-लोगोंका कल्याण हो। अब मैं अस्त्र-शस्त्रोंका त्याग कर रहा हूँ' ।। ४३-४४ ।। इति तत्र महाराज प्राक्रोशद् द्रौणिमेव च । उत्सृज्य च रणे शस्त्रं रथोपस्थे निविश्य च ।। ४५ ।। अभयं सर्वभूतानां प्रददौ योगमीयिवान् ।

महाराज! यह कहकर उन्होंने वहाँ अश्वत्थामाका नाम ले-लेकर पुकारा। फिर सारे अस्त्र-शस्त्रोंको रणभूमिमें फेंककर वे रथके पिछले भागमें जा बैठे। फिर उन्होंने सम्पूर्ण भूतोंको अभयदान दे दिया और समाधि लगा ली ॥ ४५½ ॥

तस्य तच्छिद्रमाज्ञाय धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् ॥ ४६ ॥ सशरं तद् धनुर्घोरं संन्यस्याथ रथे ततः । खड्गी रथादवप्लुत्य सहसा द्रोणमभ्ययात् ॥ ४७ ॥ उनपर प्रहार करनेका वह अच्छा अवसर हाथ लगा जान प्रतापी धृष्टद्युम्न बाणसहित अपने भयंकर धनुषको रथपर ही रखकर तलवार हाथमें ले उस रथसे उछलकर सहसा द्रोणाचार्यके पास जा पहुँचा ॥ ४६-४७ ॥

हाहाकृतानि भूतानि मानुषाणीतराणि च । द्रोणं तथागतं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नवशं गतम् ॥ ४८ ॥ उस अवस्थामें द्रोणाचार्यको धृष्टद्युम्नके अधीन हुआ देख मनुष्य तथा अन्य प्राणी भी हाहाकार कर उठे ॥

हाहाकारं भृशं चक्रुरहो धिगिति चाब्रुवन् । द्रोणोऽपि शस्त्राण्युत्सृज्य परं सांख्यमास्थितः ॥ ४९ ॥ वहाँ सबने भारी हाहाकार मचाया और सभी कहने लगे, ‘अहो! धिक्कार है, धिक्कार है’। इधर आचार्य द्रोण भी शस्त्रोंका परित्याग करके परम ज्ञानस्वरूपमें स्थित हो गये ॥ ४९ ॥

तथोक्त्वा योगमास्थाय ज्योतिर्भूतो महातपाः । पुराणं पुरुषं विष्णुं जगाम मनसा परम् ॥ ५० ॥ वे महातपस्वी द्रोण पूर्वोक्त बात कहकर योगका आश्रय ले ज्योतिःस्वरूप परब्रह्मसे अभिन्नताका अनुभव करते हुए मन-ही-मन सर्वोत्कृष्ट पुराणपुरुष भगवान् विष्णुका ध्यान करने लगे ॥ ५० ॥

मुखं किंचित् समुन्नाम्य विष्टभ्य उरमग्रतः । निमीलिताक्षः सत्त्वस्थो निक्षिप्य हृदि धारणाम् ॥ ५१ ॥

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ज्योतिर्भूतो महातपाः ।
स्मरित्वा देवदेवेशमक्षरं परमं प्रभुम् ।। ५२ ।।
दिवमाक्रामदाचार्यः साक्षात् सद्भिर्दुराक्रमाम् ।
उन्होंने मुँहको कुछ ऊपर उठाकर छातीको आगेकी ओर स्थिर किया। फिर विशुद्ध सत्त्वमें स्थित हो नेत्र बंद करके हृदयमें धारणाको दृढ़तापूर्वक धारण किया। साथ ही 'ओम्' इस एकाक्षर ब्रह्मका जप करते हुए वे महातपस्वी आचार्य द्रोण प्रणवके अर्थभूत देवदेवेश्वर अविनाशी परम प्रभु परमात्माका चिन्तन करते-करते ज्योतिःस्वरूप हो साक्षात् उस ब्रह्मलोकको चले गये, जहाँ पहुँचना बड़े-बड़े संतोंके लिये भी दुर्लभ है ।। ५१-५२ ½ ।।
द्वौ सूर्याविति नो बुद्धिरासीत् तस्मिंस्तथागते ।। ५३ ।।
आचार्य द्रोणके उस प्रकार उत्क्रमण करनेपर हमें ऐसा भान होने लगा, मानो आकाशमें दो सूर्य उदित हो गये हों ।। ५३ ।।
एकाग्रमिव चासीच्च ज्योतिर्भिः पूरितं नभः ।
समपद्यत चार्काभे भारद्वाजदिवाकरे ।। ५४ ।।
सूर्यके समान तेजस्वी द्रोणाचार्यरूपी दिवाकरके उदित होनेपर सारा आकाश तेजसे परिपूर्ण हो उस ज्योतिके साथ एकाग्र-सा हो रहा था ।। ५४ ।।

निमेषमात्रेण च तज्ज्योतिरन्तरधीयत । आसीत् किलकिलाशब्दः प्रहृष्टानां दिवौकसाम् ॥ ५५ ॥ ब्रह्मलोकगते द्रोणे धृष्टद्युम्ने च मोहिते । पलक मारते-मारते वह ज्योति आकाशमें जाकर अदृश्य हो गयी। द्रोणाचार्यके ब्रह्मलोक चले जाने और धृष्टद्युम्नके अपमानसे मोहित हो जानेपर हर्षोल्लाससे भरे हुए देवताओंका कोलाहल सुनायी देने लगा ॥ ५५ १/२ ॥ वयमेव तदाद्राक्ष्म पञ्च मानुषयोनयः ॥ ५६ ॥ योगयुक्तं महात्मानं गच्छन्तं परमां गतिम् । अहं धनंजयः पार्थो कृपः शारद्वतस्तथा ॥ ५७ ॥ वासुदेवश्च वार्ष्णेयो धर्मपुत्रश्च पाण्डवः । उस समय मैं, कुन्तीपुत्र अर्जुन, शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्य, वृष्णिवंशी भगवान् श्रीकृष्ण तथा धर्मपुत्र पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर—इन पाँच मनुष्योंने ही योगयुक्त महात्मा द्रोणको परम धामकी ओर जाते देखा था ॥ अन्ये तु सर्वे नापश्यन् भारद्वाजस्य धीमतः ॥ ५८ ॥ महिमानं महाराज योगयुक्तस्य गच्छतः । महाराज! अन्य सब लोगोंने योगयुक्त हो ऊर्ध्वगतिको जाते हुए बुद्धिमान् द्रोणाचार्यकी महिमाका साक्षात्कार नहीं किया ॥ ५८ १/२ ॥ ब्रह्मलोकं महत् दिव्यं देवगुह्यं हि तत् परम् ॥ ५९ ॥ गतिं परमिकां प्राप्तमजानन्तो नृयोनयः । नापश्यन् गच्छमानं हि तं सार्धमृषिपुङ्गवैः ॥ ६० ॥ आचार्यं योगमास्थाय ब्रह्मलोकमरिंदमम् । ब्रह्मलोक महान्, दिव्य, देवगुह्य, उत्कृष्ट तथा परम गतिस्वरूप है। शत्रुदमन आचार्य द्रोण योगका आश्रय लेकर श्रेष्ठ महर्षियोंके साथ उसी ब्रह्मलोकको प्राप्त हुए हैं। अज्ञानी मनुष्योंने उन्हें वहाँ जाते समय नहीं देखा था ॥ वितुन्नाङ्गं शरव्रातैर्न्यस्तायुधमसृक्क्षरम् ॥ ६१ ॥ धिक्कृतः पार्षदस्तं तु सर्वभूतैः परामृशत् । उनका सारा शरीर बाणसमूहोंसे क्षत-विक्षत हो गया था। उससे रक्तकी धारा बह रही थी और वे अपना अस्त्र-शस्त्र नीचे डाल चुके थे। उस दशामें धृष्टद्युम्नने उनके शरीरका स्पर्श किया। उस समय सारे प्राणी उन्हें धिक्कार रहे थे ॥ ६१ १/२ ॥ तस्य मूर्धानमालम्ब्य गतसत्त्वस्य देहिनः ॥ ६२ ॥ किंचिदब्रुवतः कायाद् विचकर्तासिना शिरः ।

देहधारी द्रोणके शरीरसे प्राण निकल गये थे, अतः वे कुछ भी बोल नहीं रहे थे। इस अवस्थामें उनके मस्तकका बाल पकड़कर धृष्टद्युम्नने तलवारसे उनके सिरको धड़से काट लिया ।। ६२ १/२ ।। हर्षेण महता युक्तो भारद्वाजे निपातिते ।। ६३ ।। सिंहनादरवं चक्रे भ्रामयन् खड्गमाहवे । इस प्रकार द्रोणाचार्यको मार गिरानेपर धृष्टद्युम्नको महान् हर्ष हुआ और वे रणभूमिमें तलवार घुमाते हुए जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ।। ६३ १/२ ।।

अध्याय (पृष्ठ 1458)

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द्रोणाचार्यका ध्यानावस्थामें देहत्याग एवं तेजस्वी-स्वरूपसे ऊर्ध्वलोक-गमन

आकर्णपलितः श्यामो वयसाशीतिपञ्चकः ।। ६४ ।।
त्वत्कृते व्यचरत् संख्ये स तु षोडशवर्षवत् ।
आचार्यके शरीरका रंग साँवला था। उनकी अवस्था चार सौ वर्षकी हो चुकी थी और उनके ऊपरसे लेकर कानतकके बाल सफेद हो गये थे, तो भी आपके हितके लिये वे संग्राममें सोलह वर्षकी उम्रवाले तरुणके समान विचरते थे ।। ६४ १/२ ।।
उक्तवांश्च महाबाहुः कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।। ६५ ।।
जीवन्तमानयाचार्यं मा वधीर्द्रुपदात्मज ।
न हन्तव्यो न हन्तव्य इति ते सैनिकाश्च ह ।। ६६ ।।
यद्यपि उस समय महाबाहु कुन्तीकुमार अर्जुनने बहुत कहा—'ओ द्रुपदकुमार! तुम आचार्यको जीते-जी ले आओ। उनका वध न करना।' आपके सैनिक भी बारंबार कहते ही रह गये कि 'न मारो, न मारो' ।। ६५-६६ ।।
उत्क्रोशन्नर्जुनश्चैव सानुक्रोशस्तमाव्रजत् ।
क्रोशमानेऽर्जुने चैव पार्थिवेषु च सर्वशः ।। ६७ ।।
धृष्टद्युम्नोऽवधीद् द्रोणं रथतल्पे नरर्षभम् ।
अर्जुन तो दयावश चिल्लाते हुए धृष्टद्युम्नके पास आने लगे। परंतु उनके तथा अन्य सब राजाओंके पुकारते रहनेपर भी धृष्टद्युम्नने रथकी बैठकमें नरश्रेष्ठ द्रोणका वध कर ही डाला ।। ६७ १/२ ।।
शोणितेन परिक्लिन्नो रथाद् भूमिमथापतत् ।। ६८ ।।
लोहिताङ्ग इवादित्यो दुर्धर्षः समपद्यत ।
दुर्धर्ष द्रोणाचार्यका शरीर खूनसे लथपथ हो रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो लाल अंगकान्तिवाले सूर्य डूब गये हों ।। ६८ १/२ ।।
एवं तं निहतं संख्ये ददृशे सैनिको जनः ।। ६९ ।।
धृष्टद्युम्नस्तु तद् राजन् भारद्वाजशिरोऽहरत् ।
तावकानां महेष्वासः प्रमुखे तत् समाक्षिपत् ।। ७० ।।
इस प्रकार सब सैनिकोंने द्रोणाचार्यका मारा जाना अपनी आँखोंसे देखा। राजन्! महाधनुर्धर धृष्टद्युम्नने द्रोणाचार्यका वह सिर उठा लिया और उसे आपके पुत्रोंके सामने फेंक दिया ।। ६९-७० ।।
ते तु दृष्ट्वा शिरो राजन् भारद्वाजस्य तावकाः ।
पलायनकृतोत्साहा दुद्रुवुः सर्वतो दिशम् ।। ७१ ।।
महाराज! द्रोणाचार्यके उस कटे हुए सिरको देखकर आपके सारे सैनिकोंने केवल भागनेमें ही उत्साह दिखाया और वे सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ।। ७१ ।।
द्रोणस्तु दिवमास्थाय नक्षत्रपथमाविशत् ।
अहमेव तदाद्राक्षं द्रोणस्य निधनं नृप ।। ७२ ।।

ऋषेः प्रसादात् कृष्णस्य सत्यवत्याः सुतस्य च । नरेश्वर! द्रोणाचार्य आकाशमें पहुँचकर नक्षत्रोंके पथमें प्रविष्ट हो गये। उस समय सत्यवतीनन्दन महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायनके प्रसादसे मैंने भी द्रोणाचार्यकी वह दिव्य मृत्यु प्रत्यक्ष देख ली ।। ७२ ½ ।। विधूममिह संयान्तीमुल्कां प्रज्वलितामिव ।। ७३ ।। अपश्याम दिवं स्तब्ध्वा गच्छन्तं तं महाद्युतिम् । महातेजस्वी द्रोण जब आकाशको स्तब्ध करके ऊपरको जा रहे थे, उस समय हमलोगोंनें यहाँसे उन्हें एक स्थानसे दूसरे स्थानको जाती हुई धूमरहित प्रज्वलित उल्काके समान देखा था ।। ७३ ½ ।। हते द्रोणे निरुत्साहान् कुरून् पाण्डवसृञ्जयाः ।। ७४ ।। अभ्यद्रवन् महावेगास्ततः सैन्यं व्यदीर्यत । द्रोणाचार्यके मारे जानेपर कौरव-सैनिक युद्धका उत्साह खो बैठे, फिर पाण्डवों और सृञ्जयोंने उनपर बड़े वेगसे आक्रमण कर दिया। इससे कौरव-सेनामें भगदड़ मच गयी ।। ७४ ½ ।। निहता हतभूयिष्ठाः संग्रामे निशितैः शरैः ।। ७५ ।। तावका निहते द्रोणे गतासव इवाभवन् । युद्धमें आपके बहुत योद्धा तीखे बाणोंद्वारा मारे गये थे और बहुत-से अधमरे हो रहे थे। द्रोणाचार्यके मारे जानेपर वे सभी निष्प्राण-से हो गये ।। ७५ ½ ।। पराजयमथावाप्य परत्र च महद् भयम् ।। ७६ ।। उभयेनैव ते हीना नाविन्दन् धृतिमात्मनः । इस लोकमें पराजय और परलोकमें महान् भय पाकर दोनों ही लोकोंसे वंचित हो वे अपने भीतर धैर्य न धारण कर सके ।। ७६ ½ ।। अन्विच्छन्तः शरीरं तु भारद्वाजस्य पार्थिवाः ।। ७७ ।। नान्वगच्छन् महाराज कबन्धायुतसंकुले । महाराज! हमारे पक्षके राजाओंने द्रोणाचार्यके शरीरको बहुत खोजा, परंतु हजारों लाशोंसे भरे हुए युद्धस्थलमें वे उसे पा न सके ।। ७७ ½ ।। पाण्डवास्तु जयं लब्ध्वा परत्र च महद् यशः ।। ७८ ।। बाणशङ्खरवांश्चक्रुः सिंहनादांश्च पुष्कलान् । पाण्डव इस लोकमें विजय और परलोकमें महान् यश पाकर वे धनुषपर बाण रखकर उसकी टंकार करने, शंख बजाने और बारंबार सिंहनाद करने लगे ।। भीमसेनस्ततो राजन् धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।। ७९ ।। वरूथिन्यामन्नृत्येतां परिष्वज्य परस्परम् ।

राजन्! तदनन्तर भीमसेन और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न एक-दूसरेको हृदयसे लगाकर सेनाके बीचमें हर्षके मारे नाचने लगे ॥ ७९ १/२ ॥ अब्रवीच्च तदा भीमः पार्षतं शत्रुतापनम् ॥ ८० ॥ भूयोऽहं त्वां विजयिनं परिष्वक्ष्यामि पार्षत । सूतपुत्रे हते पापे धार्तराष्ट्रे च संयुगे ॥ ८१ ॥ उस समय भीमसेनने शत्रुओंको संताप देनेवाले धृष्टद्युम्नसे कहा—'द्रुपदनन्दन! जब सूतपुत्र कर्ण और पापी दुर्योधन मारे जायँगे, उस समय विजयी हुए तुमको मैं फिर इसी प्रकार छातीसे लगाऊँगा' ॥ ८०-८१ ॥ एतावदुक्त्वा भीमस्तु हर्षेण महता युतः । बाहुशब्देन पृथिवीं कम्पयामास पाण्डवः ॥ ८२ ॥ इतना कहकर अत्यन्त हर्षमें भरे हुए पाण्डुनन्दन भीमसेन अपनी भुजाओंपर ताल ठोककर पृथ्वीको कम्पित-सी करने लगे ॥ ८२ ॥ तस्य शब्देन वित्रस्ताः प्राद्रवंस्तावका युधि । क्षत्रधर्मं समुत्सृज्य पलायनपरायणाः ॥ ८३ ॥ उनके उस शब्दसे भयभीत हो आपके सारे सैनिक युद्धसे भाग चले। वे क्षत्रियधर्मको छोड़कर पीठ दिखाने लग गये ॥ ८३ ॥ पाण्डवास्तु जयं लब्ध्वा हृष्टा ह्यासन् विशाम्पते । अरिक्षयं च संग्रामे तेन ते सुखमाप्नुवन् ॥ ८४ ॥ प्रजानाथ! पाण्डव विजय पाकर हर्षसे खिल उठे। संग्राममें जो शत्रुओंका भारी संहार हुआ था, उससे उन्हें बड़ा सुख मिला ॥ ८४ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि द्रोणवधे द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें द्रोणवधविषयक एक सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९२ ॥

(नारायणास्त्रमोक्षपर्व)

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(नारायणास्त्रमोक्षपर्व)

त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

कौरव-सैनिकों तथा सेनापतियोंका भागना, अश्वत्थामाके पूछनेपर कृपाचार्यका उसे द्रोणवधका वृत्तान्त सुनाना

संजय उवाच

ततो द्रोणे हते राजन् कुरवः शस्त्रपीडिताः ।
हतप्रवीरा विध्वस्ता भृशं शोकपरायणाः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! द्रोणाचार्यके मारे जानेपर शस्त्रोंके आघातसे पीड़ित हुए कौरव अपने प्रमुख वीरोंके मारे जानेसे भारी विध्वंसको प्राप्त हो अत्यन्त शोकमग्न हो गये ॥ १ ॥

उदीर्णांश्च परान् दृष्ट्वा कम्पमानाः पुनः पुनः ।
अश्रुपूर्णेक्षणास्त्रस्ता दीनास्त्वासन् विशाम्पते ॥ २ ॥
प्रजानाथ! शत्रुओंको उत्कर्ष प्राप्त करते देख वे दीन और भयभीत हो बारंबार काँपने और नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे ॥ २ ॥

विचेतसो हतोत्साहाः कश्मलाभिहतौजसः ।
आर्तस्वरेण महता पुत्रं ते पर्यवारयन् ॥ ३ ॥
उनकी चेतना लुप्त-सी हो गयी थी। मोहवश उनका तेज और बल नष्ट हो चला था। वे हतोत्साह होकर अत्यन्त आर्तस्वरसे विलाप करते हुए आपके पुत्रको घेरकर खड़े हो गये ॥ ३ ॥

रजस्वला वेपमाना वीक्षमाणा दिशो दश ।
अश्रुकण्ठा यथा दैत्या हिरण्याक्षे पुरा हते ॥ ४ ॥
पूर्वकालमें हिरण्याक्षके मारे जानेपर दैत्योंकी जैसी अवस्था हुई थी, वैसी ही उनकी भी हो गयी। वे धूल-धूसर शरीरसे काँपते हुए दसों दिशाओंकी ओर देख रहे थे। आँसुओंसे उनका गला भर आया ॥ ४ ॥

स तैः परिवृतो राजा त्रस्तैः क्षुद्रमृगैरिव ।
अशक्नुवन्नवस्थातुमपायात् तनयस्तव ॥ ५ ॥
डरे हुए क्षुद्र मृगोंके समान उन सैनिकोंसे घिरा हुआ आपका पुत्र राजा दुर्योधन वहाँ खड़ा न रह सका। वह भागकर अन्यत्र चला गया ॥ ५ ॥

क्षुत्पिपासापरम्लानास्ते योधास्तव भारत।
आदित्येनेव संतप्ता भृशं विमनसोऽभवन् ॥ ६ ॥
भारत! आपके सभी सैनिक भूख-प्याससे व्याकुल एवं मलिन हो रहे थे, मानो सूर्यने उन्हें अपनी प्रचण्ड किरणोंसे झुलस दिया हो। वे अत्यन्त उदास हो गये थे ॥ ६ ॥
भास्करस्येव पतनं समुद्रस्येव शोषणम्।
विपर्यासं यथा मेरोर्वासवस्येव निर्जयम् ॥ ७ ॥
अमर्षणीयं तद् दृष्ट्वा भारद्वाजस्य पातनम्।
त्रस्तरूपतरा राजन् कौरवाः प्राद्रवन् भयात् ॥ ८ ॥
राजन्! जैसे सूर्यका पृथ्वीपर गिर पड़ना, समुद्रका सूख जाना, मेरुपर्वतका उलटी दिशामें चला जाना और इन्द्रका पराजित हो जाना असम्भव है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यका मारा जाना भी असम्भव समझा जाता था; परंतु द्रोणाचार्यके उस असहनीय वधको सम्भव हुआ देख सारे कौरव थर्रा उठे और भयके मारे भागने लगे ॥ ७-८ ॥
गान्धारराजः शकुनिस्त्रस्तस्त्रस्ततरैः सह ।
हतं रुक्मरथं श्रुत्वा प्राद्रवत् सहितो रथैः ॥ ९ ॥
सुवर्णमय रथवाले आचार्य द्रोणके मारे जानेका समाचार सुनकर गान्धारराज शकुनि त्रस्त हो उठा और अत्यन्त डरे हुए अपने रथियोंके साथ युद्धभूमिसे भाग चला ॥
वरूथिनीं वेगवतीं विद्रुतां सपताकिनीम्।
परिगृह्य महासेनां सूतपुत्रोऽपयाद् भयात् ॥ १० ॥
सूतपुत्र कर्ण भी ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित एवं बड़े वेगसे भागी हुई अपनी विशाल सेनाको साथ ले भयके मारे वहाँसे भाग खड़ा हुआ ॥ १० ॥
रथनागाश्वकलिलां पुरस्कृत्य तु वाहिनीम्।
मद्राणामीश्वरः शल्यो वीक्षमाणोऽपयाद् भयात् ॥ ११ ॥
मद्रराज शल्य भी रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरी हुई अपनी सेनाको आगे करके भयके मारे इधर-उधर देखते हुए भागने लगे ॥ ११ ॥
हतप्रवीरैर्भूयिष्ठैर्ध्वजैर्बहुपताकिभिः ।
वृतः शारद्वतोऽगच्छत् कष्टं कष्टमिति ब्रुवन् ॥ १२ ॥
शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्य बहुसंख्यक ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित बहुत-से सैनिकोंद्वारा घिरे हुए थे। उनकी सेनाके प्रमुख वीर मारे गये थे। वे भी 'हाय! बड़े कष्टकी बात है, बड़े कष्टकी बात है' ऐसा कहते हुए युद्धभूमिसे खिसक गये ॥ १२ ॥
भोजानीकेन शिष्टेन कलिङ्गारट्टबाह्लिकैः ।
कृतवर्मा वृतो राजन् प्रायात् सुजवनैर्हयैः ॥ १३ ॥
राजन्! कृतवर्मा भी भोजवंशियोंकी अवशिष्ट सेना तथा कलिंग, अरट्ट और बाह्लिकोंकी विशाल वाहिनी साथ ले अत्यन्त वेगशाली घोड़ोंसे जुते हुए रथके द्वारा भाग

निकला ॥ १३ ॥ पदातिगणसंयुक्तस्त्रस्तो राजन् भयार्दितः । उलूकः प्राद्रवत् तत्र दृष्ट्वा द्रोणं निपातितम् ॥ १४ ॥ नरेश्वर! द्रोणाचार्यको वहाँ मारा गया देख उलूक भी भयसे पीड़ित हो थर्रा उठा और पैदल योद्धाओंके साथ जोर-जोरसे भागने लगा ॥ १४ ॥ दर्शनीयो युवा चैव शौर्येण कृतलक्षणः । दुःशासनो भृशोद्विग्नः प्राद्रवद् गजसंवृतः ॥ १५ ॥ जिसके शरीरमें शौर्यके चिह्न बन गये थे, वह दर्शनीय युवक दुःशासन भी भयसे अत्यन्त उद्विग्न हो अपनी गजसेनाके साथ भाग खड़ा हुआ ॥ १५ ॥ रथानामयुतं गृह्य त्रिसाहस्रं च दन्तिनाम् । वृषसेनो ययौ तूर्णं दृष्ट्वा द्रोणं निपातितम् ॥ १६ ॥ द्रोणाचार्य धराशायी हो गये, यह देखकर वृषसेन भी दस हजार रथों और तीन हजार हाथियोंकी सेना साथ ले तुरंत वहाँसे चल दिया ॥ १६ ॥ गजाश्वरथसंयुक्तो वृतश्चैव पदातिभिः । दुर्योधनो महाराज प्रायात् तत्र महारथः ॥ १७ ॥ महाराज! हाथी, घोड़े और रथोंकी सेनासे युक्त तथा पैदल सैनिकोंसे घिरा हुआ महारथी दुर्योधन भी रणभूमिसे भाग चला ॥ १७ ॥ संशप्तकगणान् गृह्य हतशेषान् किरीटिना । सुशर्मा प्राद्रवद् राजन् दृष्ट्वा द्रोणं निपातितम् ॥ १८ ॥ राजन्! द्रोणाचार्यको रणभूमिमें गिराया गया देख अर्जुनके मारनेसे बचे हुए संशप्तकोंको साथ ले सुशर्मा वहाँसे भाग निकला ॥ १८ ॥ गजान् रथान् समारुह्य व्युदस्य च हयाञ्जनाः । प्राद्रवन् सर्वतः संख्ये दृष्ट्वा रुक्मरथं हतम् ॥ १९ ॥ युद्धस्थलमें सुवर्णमय रथवाले द्रोणका वध हुआ देख बहुतेरे सैनिक हाथियों और रथोंपर आरूढ़ हो तथा कितने ही योद्धा अपने घोड़ोंको भी छोड़कर सब ओरसे पलायन करने लगे ॥ १९ ॥ त्वरयन्तः पितृनन्ये भ्रातॄनन्येऽथ मातुलान् । पुत्रानन्ये वयस्यांश्च प्राद्रवन् कुरवस्तदा ॥ २० ॥ कुछ कौरव पिता, ताऊ और चाचा आदिको, कुछ भाइयोंको, कुछ मामाओंको तथा कितने ही पुत्रों और मित्रोंको जल्दीसे भागनेकी प्रेरणा देते हुए उस समय मैदान छोड़कर चल दिये ॥ २० ॥ चोदयन्तश्च सैन्यानि स्वस्रीयांश्च तथापरे । सम्बन्धिनस्तथान्ये च प्राद्रवन्त दिशो दश ॥ २१ ॥

कितने ही योद्धा अपनी सेनाओंको, दूसरे लोग भानजोंको और कितने ही अपने सगे-सम्बन्धियोंको भागनेकी आज्ञा देते हुए दसों दिशाओंकी ओर भाग खड़े हुए ॥ २१ ॥

प्रकीर्णकेशा विध्वस्ता न द्वावेकत्र धावतः ।
नेदमस्तीति मन्वाना हतोत्साहा हतौजसः ॥ २२ ॥
उन सबके बाल बिखरे हुए थे। वे गिरते-पड़ते भाग रहे थे। दो सैनिक एक साथ या एक ओर नहीं भागते थे। उन्हें विश्वास हो गया था कि अब यह सेना नहीं बचेगी; इसीलिये उनके उत्साह और बल नष्ट हो गये थे ॥ २२ ॥

उत्सृज्य कवचानन्ये प्राद्रवंस्तावका विभो ।
अन्योन्यं ते समाक्रोशन् सैनिका भरतर्षभ ॥ २३ ॥
भरतश्रेष्ठ! प्रभो! आपके कितने ही सैनिक कवच उतारकर एक-दूसरेको पुकारते हुए भाग रहे थे ॥ २३ ॥

तिष्ठ तिष्ठेति न च ते स्वयं तत्रावतस्थिरे ।
धुर्यानुन्मुच्य च रथाद्धतसूतात् स्वलंकृतान् ।
अधिरुह्य हयान् योधाः क्षिप्रं पद्भिरचोदयन् ॥ २४ ॥
कुछ योद्धा दूसरोंसे 'ठहरो, ठहरो' कहते, परंतु स्वयं नहीं ठहरते थे। कितने ही योद्धा सारथिशून्य रथसे सजे-सजाये घोड़ोंको खोलकर उनपर सवार हो जाते और पैरोंसे ही शीघ्रतापूर्वक उन्हें हाँकने लगते थे ॥ २४ ॥

द्रवमाणे तथा सैन्ये त्रस्तरूपे हतौजसि ।
प्रतिस्रोत इव ग्राहो द्रोणपुत्रः परानियात् ॥ २५ ॥
इस प्रकार जब सारी सेना भयभीत हो बल और उत्साह खोकर भाग रही थी, उसी समय द्रोणपुत्र अश्वत्थामा शत्रुओंकी ओर बढ़ा आ रहा था, मानो कोई ग्राह नदीके प्रवाहके प्रतिकूल जा रहा हो ॥ २५ ॥

तस्यासीत् सुमहद् युद्धं शिखण्डिप्रमुखैर्गणैः ।
प्रभद्रकैश्च पाञ्चालैश्चेदिभिश्च सकेकयैः ॥ २६ ॥
इससे पहले अश्वत्थामाका उन प्रभद्रक, पांचाल, चेदि और केकय आदि गणोंके साथ महान् युद्ध हो रहा था, जिनका प्रधान नेता शिखण्डी था (इसीलिये उसे पिताकी मृत्युका समाचार नहीं ज्ञात हुआ।) ॥ २६ ॥

हत्वा बहुविधाः सेनाः पाण्डूनां युद्धदुर्मदः ।
कथंचित् संकटान्मुक्तो मत्तद्विरदविक्रमः ॥ २७ ॥
मतवाले हाथीके समान पराक्रमी रणदुर्मद अश्वत्थामा पाण्डवोंकी विविध सेनाओंका संहार करके किसी प्रकार उस युद्ध-संकटसे मुक्त हुआ था ॥ २७ ॥

द्रवमाणं बलं दृष्ट्वा पलायनकृतक्षणम् ।
दुर्योधनं समासाद्य द्रोणपुत्रोऽब्रवीदिदम् ॥ २८ ॥