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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

कुरुश्रेष्ठ! उस प्रहारसे अपनेको बचाकर आपके पुत्रने भीमसेनपर बड़े वेगसे गदाद्वारा आघात किया ॥ ३८ ॥

तस्य विस्यन्दमानेन रुधिरेणामितौजसः । प्रहारगुरुपाताच्च मूर्च्छेव समजायत ॥ ३९ ॥ उसकी चोटसे अमिततेजस्वी भीमके शरीरसे रक्तकी धारा बह चली। साथ ही उस प्रहारके गहरे आघातसे उन्हें मूर्च्छा-सी आ गयी ॥ ३९ ॥

दुर्योधनो न तं वेद पीडितं पाण्डवं रणे । धारयामास भीमोऽपि शरीरमतिपीडितम् ॥ ४० ॥ उस समय दुर्योधन यह न जान सका कि रणभूमिमें पाण्डुपुत्र भीमसेन अधिक पीड़ित हो गये हैं। यद्यपि उनके शरीरमें अत्यन्त वेदना हो रही थी तो भी भीमसेन उसे सँभाले रहे ॥ ४० ॥

अमन्यत स्थितं ह्येनं प्रहरिष्यन्तमाहवे । अतो न प्राहरत् तस्मै पुनरेव तवात्मजः ॥ ४१ ॥ उसने यही समझा कि रणक्षेत्रमें भीमसेन अब मुझपर प्रहार करनेके लिये खड़े हैं; अतः बचनेकी ही चेष्टामें संलग्न होकर आपके पुत्रने पुनः उनपर प्रहार नहीं किया ॥ ४१ ॥

ततो मुहूर्तमाश्वस्य दुर्योधनमुपस्थितम् । वेगेनाभ्यपतद् राजन् भीमसेनः प्रतापवान् ॥ ४२ ॥ राजन्! तदनन्तर दो घड़ी सुस्ताकर प्रतापी भीमसेनने निकट आये हुए दुर्योधनपर बड़े वेगसे आक्रमण किया ॥

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य संरब्धममितौजसम् । मोघमस्य प्रहारं तं चिकीर्षुर्भरतर्षभ ॥ ४३ ॥ भरतश्रेष्ठ! अमिततेजस्वी भीमको रोषपूर्वक धावा करते देख आपके पुत्रने उनके उस प्रहारको व्यर्थ कर देनेकी इच्छा की ॥ ४३ ॥

अवस्थाने मतिं कृत्वा पुत्रस्तव महामनाः । इयेषोत्पतितुं राजन् छलयिष्यन् वृकोदरम् ॥ ४४ ॥ राजन्! भीमसेनको छलनेके लिये आपके महामनस्वी पुत्रने पहले वहाँ स्थिरतापूर्वक खड़े रहनेका विचार करके फिर उछलकर दूर हट जानेकी इच्छा की ॥ ४४ ॥

अबुद्ध्यद् भीमसेनस्तु राज्ञस्तस्य चिकीर्षितम् । अथास्य समभिद्रुत्य समुत्क्रुश्य च सिंहवत् ॥ ४५ ॥ सृत्या वञ्चयतो राजन् पुनरेवोत्पतिष्यतः । ऊरुभ्यां प्राहिणोद् राजन् गदां वेगेन पाण्डवः ॥ ४६ ॥ भीमसेन समझ गये कि राजा दुर्योधन क्या करना चाहता है। अतः पैंतरेसे छलने और ऊपर उछलनेकी इच्छावाले दुर्योधनके ऊपर आक्रमण करके भीमसेनने सिंहके समान

गर्जना की और उसकी जाँघोंपर बड़े वेगसे गदा चलायी ॥ ४५-४६ ॥ सा वज्रनिष्पेषसमा प्रहिता भीमकर्मणा । ऊरू दुर्योधनस्याथ बभञ्ज प्रियदर्शनौ ॥ ४७ ॥ भयंकर कर्म करनेवाले भीमसेनके द्वारा चलायी हुई वह गदा वज्रपातके समान गिरी और दुर्योधनकी सुन्दर दिखायी देनेवाली जाँघोंको उसने तोड़ दिया ॥ ४७ ॥ स पपात नरव्याघ्रो वसुधामनुनादयन् । भग्नोरुर्भीमसेनेन पुत्रस्तव महीपते ॥ ४८ ॥ पृथ्वीनाथ! इस प्रकार जब भीमसेनने उसकी जाँघें तोड़ डालीं, तब आपका पुत्र पुरुषसिंह दुर्योधन पृथ्वीको प्रतिध्वनित करता हुआ गिर पड़ा ॥ ४८ ॥ ववुर्वाताः सनिर्घाताः पांशुवर्षं पपात च । चचाल पृथिवी चापि सवृक्षक्षुपपर्वता ॥ ४९ ॥ तस्मिन् निपतिते वीरे पत्यौ सर्वमहीक्षिताम् । फिर तो समस्त भूपालोंके स्वामी वीर राजा दुर्योधनके धराशायी होनेपर वहाँ बिजलीकी गड़गड़ाहटके साथ प्रचण्ड हवा चलने लगी, धूलिकी वर्षा होने लगी और वृक्षों, वनों एवं पर्वतोंसहित सारी पृथ्वी काँपने लगी ॥ ४९१/२ ॥ महास्वना पुनर्दीप्ता सनिर्घाता भयंकरी ॥ ५० ॥ पपात चोल्का महती पतिते पृथिवीपतौ । पृथिवीपति दुर्योधनके गिर जानेपर आकाशसे पुनः महान् शब्द और बिजलीकी कड़कके साथ प्रज्वलित, भयंकर एवं विशाल उल्का भूमिपर गिरी ॥ ५०१/२ ॥ तथा शोणितवर्षं च पांशुवर्षं च भारत ॥ ५१ ॥ ववर्ष मधवांस्तत्र तव पुत्रे निपातिते । भरतनन्दन! आपके पुत्रके धराशायी हो जानेपर इन्द्रने वहाँ रक्त और धूलिकी वर्षा की ॥ ५११/२ ॥ यक्षाणां राक्षसानां च पिशाचानां तथैव च ॥ ५२ ॥ अन्तरिक्षे महानादः श्रूयते भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! उस समय आकाशमें यक्षों, राक्षसों तथा पिशाचोंका महान् कोलाहल सुनायी देने लगा ॥ ५२१/२ ॥ तेन शब्देन घोरेण मृगाणामथ पक्षिणाम् ॥ ५३ ॥ जज्ञे घोरतरः शब्दो बहूनां सर्वतोदिशम् । उस घोर शब्दके साथ बहुत-से पशुओं और पक्षियों-की भयानक आवाज भी सम्पूर्ण दिशाओंमें गूँज उठी ॥ ५३१/२ ॥ ये तत्र वाजिनः शेषा गजाश्च मनुजैः सह ॥ ५४ ॥

मुमुचुस्ते महानादं तव पुत्रे निपातिते । वहाँ जो घोड़े, हाथी और मनुष्य शेष रह गये थे, वे सभी आपके पुत्रके मारे जानेपर महान् कोलाहल करने लगे ।। भेरीशङ्खमृदङ्गानामभवच्च स्वनो महान् ॥ ५५ ॥ अन्तर्भूमिगतश्चैव तव पुत्रे निपातिते । राजन्! जब आपका पुत्र मार गिराया गया, उस समय इस भूतलपर भेरी, शंखों और मृदंगोंका गम्भीर घोष होने लगा ।। ५५ १/२ ।। बहुपादैर्बहुभुजैः कबन्धैर्घोरदर्शनैः ॥ ५६ ॥ नृत्यद्भिर्भयदैर्व्याप्ता दिशस्तत्राभवन् नृप । नरेश्वर! वहाँ सम्पूर्ण दिशाओंमें नाचते हुए अनेक पैर और अनेक बाँहवाले घोर एवं भयंकर कबन्ध व्याप्त हो रहे थे ।। ५६ १/२ ।। ध्वजवन्तोऽस्त्रवन्तश्च शस्त्रवन्तस्तथैव च ॥ ५७ ॥ प्राकम्पन्त ततो राजंस्तव पुत्रे निपातिते । राजन्! आपके पुत्रके धराशायी हो जानेपर वहाँ अस्त्र-शस्त्र और ध्वजावाले सभी वीर काँपने लगे ।। ५७ १/२ ।। ह्रदाः कूपाश्च रुधिरमुद्वेमुर्नृपसत्तम ॥ ५८ ॥ नद्यश्च सुमहावेगाः प्रतिस्रोतोवहाभवन् । नृपश्रेष्ठ! तालाबों और कूपोंमें रक्तका उफान आने लगा और महान् वेगशालिनी नदियाँ उलटी अपने उद्गमकी ओर बहने लगीं ।। ५८ १/२ ।। पुँल्लिङ्गा इव नार्यस्तु स्त्रीलिङ्गा पुरुषाभवन् ॥ ५९ ॥ दुर्योधने तदा राजन् पतिते तनये तव । राजन्! आपके पुत्र दुर्योधनके धराशायी होनेपर स्त्रियोंमें पुरुषत्व और पुरुषोंमें स्त्रीत्वके सूचक लक्षण प्रकट होने लगे ।। ५९ १/२ ।। दृष्ट्वा तानद्भुतोत्पातान् पञ्चालाः पाण्डवैः सह ॥ ६० ॥ आविग्नमनसः सर्वे बभूवुर्भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! उन अद्भुत उत्पातोंको देखकर पाण्डवोंसहित समस्त पाञ्चाल मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठे ।। ६० १/२ ।। ययुर्देवा यथाकामं गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ ६१ ॥ कथयन्तोऽद्भुतं युद्धं सुतयोस्तव भारत । भारत! तदनन्तर देवता, गन्धर्व और अप्सराओंके समूह आपके दोनों पुत्रोंके अद्भुत युद्धकी चर्चा करते हुए अपने अभीष्ट स्थानको चले गये ।। ६१ १/२ ।। तथैव सिद्धा राजेन्द्र तथा वातिकचारणाः ।

नरसिंहौ प्रशंसन्तौ विप्रजग्मुर्यथागतम् ॥ ६२ ॥
राजेन्द्र! उसी प्रकार सिद्ध, वातिक (वायुचारी) और चारण उन दोनों पुरुषसिंहोंकी प्रशंसा करते हुए जैसे आये थे, वैसे चले गये ॥ ६२ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि दुर्योधनवधेऽष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें दुर्योधनका वधविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2916)

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एकोनषष्टितमोऽध्यायः

भीमसेनके द्वारा दुर्योधनका तिरस्कार, युधिष्ठिरका भीमसेनको समझाकर अन्यायसे रोकना और दुर्योधनको सान्त्वना देते हुए खेद प्रकट करना

संजय उवाच

तं पातितं ततो दृष्ट्वा महाशालमिवोद्गतम् ।
प्रहृष्टमनसः सर्वे ददृशुस्तत्र पाण्डवाः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! दुर्योधनको ऊँचे एवं विशाल शालवृक्षके समान गिराया गया देख समस्त पाण्डव मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और निकट जाकर उसे देखने लगे ॥

उन्मत्तमिव मातङ्गं सिंहेन विनिपातितम् ।
ददृशुर्हृष्टरोमाणः सर्वे ते चापि सोमकाः ॥ २ ॥
समस्त सोमकोंने भी सिंहके द्वारा गिराये गये मदमत्त गजराजके समान जब दुर्योधनको धराशायी हुआ देखा तो हर्षसे उनके अंगोंमें रोमांच हो आया ॥ २ ॥

ततो दुर्योधनं हत्वा भीमसेनः प्रतापवान् ।
पातितं कौरवेन्द्रं तमुपगम्येदमब्रवीत् ॥ ३ ॥
इस प्रकार दुर्योधनका वध करके प्रतापी भीमसेन उस गिराये गये कौरवराजके पास जाकर बोले— ॥ ३ ॥

गौर्गौरिति पुरा मन्द द्रौपदीमेकवाससम् ।
यत् सभायां हसन्नस्मांस्तदा वदसि दुर्मते ॥ ४ ॥
तस्यावहासस्य फलमद्य त्वं समवाप्नुहि ।
'खोटी बुद्धिवाले मूर्ख! तूने पहले मुझे 'बैल, बैल' कहकर और एक वस्त्रधारिणी रजस्वला द्रौपदीको सभामें लाकर जो हमलोगोंका उपहास किया था तथा हम सबके प्रति कटुवचन सुनाये थे, उस उपहासका फल आज तू प्राप्त कर ले' ॥ ४ १/२ ॥

एवमुक्त्वा स वामेन पदा मौलिमुपास्पृशत् ॥ ५ ॥
शिरश्च राजसिंहस्य पादेन समलोडयत् ।
ऐसा कहकर भीमसेनने अपने बायें पैरसे उसके मुकुटको ठुकराया और उस राजसिंहके मस्तकपर भी पैरसे ठोकर मारा ॥ ५ १/२ ॥

तथैव क्रोधसंरक्तो भीमः परबलार्दनः ॥ ६ ॥
पुनरेवाब्रवीद् वाक्यं यत् तच्छृणु नराधिप ।

नरेश्वर! इसी प्रकार शत्रुसेनाका संहार करनेवाले भीमसेनने क्रोधसे लाल आँखें करके फिर जो बात कही, उसे भी सुन लीजिये ॥ ६ १/२ ॥
येऽस्मान् पुरोपनृत्यन्त मूढा गौरिति गौरिति ॥ ७ ॥
तान् वयं प्रतिनृत्यामः पुनर्गौरिति गौरिति ।
जिन मूर्खोंने पहले हमें 'बैल-बैल' कहकर नृत्य किया था, आज उन्हें 'बैल-बैल' कहकर उस अपमानका बदला लेते हुए हम भी प्रसन्नतासे नाच रहे हैं ॥ ७ १/२ ॥
नास्माकं निकृतिर्वह्निर्नाक्षद्यूतं न वञ्चना ।
स्वबाहुबलमाश्रित्य प्रबाधामो वयं रिपून् ॥ ८ ॥
छल-कपट करना, घरमें आग लगाना, जूआ खेलना अथवा ठगी करना हमारा काम नहीं है। हम तो अपने बाहुबलका भरोसा करके शत्रुओंको संताप देते हैं ॥ ८ ॥
सोऽवाप्य वैरस्य परस्य पारं
वृकोदरः प्राह शनैः प्रहस्य ।
युधिष्ठिरं केशवमृञ्जयांश्च
धनंजयं माद्रवतीसुतौ च ॥ ९ ॥
इस प्रकार भारी वैरसे पार होकर भीमसेन धीरे-धीरे हँसते हुए युधिष्ठिर, श्रीकृष्ण, सृंजयगण, अर्जुन तथा माद्रीकुमार नकुल-सहदेवसे बोले— ॥ ९ ॥
रजस्वलां द्रौपदीमानयन् ये
ये चाप्यकुर्वन्त सदस्यवस्त्राम् ।
तान् पश्यध्वं पाण्डवैर्धार्तराष्ट्रान्
रणे हतांस्तपसा याज्ञसेन्याः ॥ १० ॥
'जिन लोगोंने रजस्वला द्रौपदीको सभामें बुलाया, जिन्होंने उसे भरी सभामें नंगी करनेका प्रयत्न किया, उन्हीं धृतराष्ट्रपुत्रोंको द्रौपदीकी तपस्यासे पाण्डवोंने रणभूमिमें मार गिराया, यह सब लोग देख लो ॥ १० ॥
ये नः पुरा षण्ढतिलानवोचन्
क्रूरा राज्ञो धृतराष्ट्रस्य पुत्राः ।
ते नो हताः सगणाः सानुबन्धाः
कामं स्वर्गं नरकं वा पतामः ॥ ११ ॥
'राजा धृतराष्ट्रके जिन क्रूर पुत्रोंने पहले हमें थोथे तिलोंके समान नपुंसक कहा था, वे अपने सेवकों और सम्बन्धियोंसहित हमारे हाथसे मार डाले गये। अब हम भले ही स्वर्गमें जायें या नरकमें गिरें, इसकी चिन्ता नहीं है' ॥ ११ ॥
पुनश्च राज्ञः पतितस्य भूमौ
स तां गदां स्कन्धगतां प्रगृह्य ।
वामेन पादेन शिरः प्रमृद्य

दुर्योधनं नैकृतिकं न्यवोचत् ।। १२ ।।
यों कहकर भीमसेनने पृथ्वीपर पड़े हुए राजा दुर्योधनके कंधेसे लगी हुई उसकी गदा ले ली और बायें पैरसे उसका सिर कुचलकर उसे छलिया और कपटी कहा ।। १२ ।।
हृष्टेन राजन् कुरुसत्तमस्य
क्षुद्रात्मना भीमसेनेन पादम् ।
दृष्ट्वा कृतं मूर्धनि नाभ्यनन्दन्
धर्मात्मानः सोमकानां प्रबर्हाः ।। १३ ।।
राजन्! क्षुद्र बुद्धिवाले भीमसेनने हर्षमें भरकर जो कुरुश्रेष्ठ राजा दुर्योधनके मस्तकपर पैर रखा, उनके इस कार्यको देखकर सोमकोंमें जो श्रेष्ठ एवं धर्मात्मा पुरुष थे, वे प्रसन्न नहीं हुए और न उन्होंने उनके इस कुकृत्यका अभिनन्दन ही किया ।। १३ ।।
तव पुत्रं तथा हत्वा कत्थमानं वृकोदरम् ।
नृत्यमानं च बहुशो धर्मराजोऽब्रवीदिदम् ।। १४ ।।
आपके पुत्रको मारकर बहुत बढ़-बढ़कर बातें बनाते और बारंबार नाचते-कूदते हुए भीमसेनसे धर्मराज युधिष्ठिरने इस प्रकार कहा— ।। १४ ।।
गतोऽसि वैरस्यातृण्यं प्रतिज्ञा पूरिता त्वया ।
शुभेनाथाशुभेनैव कर्मणा विरमाधुना ।। १५ ।।
‘भीम! तुम वैरसे उऋण हुए। तुमने शुभ या अशुभ कर्मसे अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली। अब तो इस कार्यसे विरत हो जाओ ।। १५ ।।
मा शिरोऽस्य पदा मार्दीर्मा धर्मस्तेऽतिगो भवेत् ।
राजा ज्ञातिर्हतश्चायं नैतन्न्याय्यं तवानघ ।। १६ ।।
‘तुम इसके मस्तकको पैरसे न ठुकराओ। तुम्हारे द्वारा धर्मका उल्लंघन नहीं होना चाहिये। अनघ! दुर्योधन राजा और हमारा भाई-बन्धु है; यह मार डाला गया, अब तुम्हें इसके साथ ऐसा बर्ताव करना उचित नहीं है ।। १६ ।।
एकादशचमूनाथं कुरूणामधिपं तथा ।
मा स्प्राक्षीर्भीम पादेन राजानं ज्ञातिमेव च ।। १७ ।।
‘भीम! ग्यारह अक्षौहिणी सेनाके स्वामी तथा अपने ही बान्धव कुरुराज राजा दुर्योधनको पैरसे न ठुकराओ ।। १७ ।।
हतबन्धुर्हतामात्यो भ्रष्टसैन्यो हतो मृधे ।
सर्वाकारेण शोच्योऽयं नावहास्योऽयमीश्वरः ।। १८ ।।
‘इसके भाई और मन्त्री मारे गये, सेना नष्ट-भ्रष्ट हो गयी और यह स्वयं भी युद्धमें मारा गया। ऐसी दशामें राजा दुर्योधन सर्वथा शोकके योग्य है, उपहासका पात्र नहीं है ।। १८ ।।
विध्वस्तोऽयं हतामात्यो हतभ्राता हतप्रजः ।
उत्सन्नपिण्डो भ्राता च नैतन्न्याय्यं कृतं त्वया ।। १९ ।।

‘इसका सर्वथा विध्वंस हो गया, इसके मन्त्री, भाई और पुत्र भी मार डाले गये। अब इसे पिण्ड देनेवाला भी कोई नहीं रह गया है। इसके सिवा यह हमारा ही भाई है। तुमने इसके साथ यह न्यायोचित बर्ताव नहीं किया है।। १९ ।।

धार्मिको भीमसेनोऽसावित्याहुस्त्वां पुरा जनाः।
स कस्माद् भीमसेन त्वं राजानमधितिष्ठसि ॥ २० ॥
‘तुम्हारे विषयमें लोग पहले कहा करते थे कि भीमसेन बड़े धर्मात्मा हैं। भीम! वही तुम आज राजा दुर्योधनको क्यों पैरसे ठुकराते हो?’ ॥ २० ॥

इत्युक्त्वा भीमसेनं तु साश्रुकण्ठो युधिष्ठिरः।
उपसृत्याब्रवीद् दीनो दुर्योधनमरिंदमम् ॥ २१ ॥
भीमसेनसे ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिर दीनभावसे शत्रुदमन दुर्योधनके पास गये और अश्रुगद्गद कण्ठसे इस प्रकार बोले— ॥ २१ ॥

तात मन्युर्न ते कार्यो नात्मा शोच्यस्त्वया तथा।
नूनं पूर्वकृतं कर्म सुघोरमनुभूयते ॥ २२ ॥
‘तात! तुम्हें खेद या क्रोध नहीं करना चाहिये। साथ ही अपने लिये शोक करना भी उचित नहीं है। निश्चय ही सब लोग अपने पहलेके किये हुए अत्यन्त भयंकर कर्मोंका ही परिणाम भोगते हैं॥ २२ ॥

धात्रोपदिष्टं विषमं नूनं फलमसंस्कृतम्।
यद् वयं त्वां जिघांसामस्त्वं चास्मान् कुरुसत्तम ॥ २३ ॥
‘कुरुश्रेष्ठ! इस समय जो हमलोग तुम्हें और तुम हमें मार डालना चाहते थे, यह अवश्य ही विधाताका दिया हुआ हमारे ही अशुद्ध कर्मोंका विषम फल है॥ २३ ॥

आत्मनो ह्यपराधेन महद् व्यसनमीदृशम्।
प्राप्तवानसि यल्लोभान्मदाद् बाल्याच्च भारत ॥ २४ ॥
‘भरतनन्दन! तुमने लोभ, मद और अविवेकके कारण अपने ही अपराधसे ऐसा भारी संकट प्राप्त किया है॥ २४ ॥

घातयित्वा वयस्यांश्च भ्रातृनथ पितूंस्तथा।
पुत्रान् पौत्रांस्तथा चान्यांस्ततोऽसि निधनं गतः ॥ २५ ॥
‘तुम अपने मित्रों, भाइयों, पितृतुल्य पुरुषों, पुत्रों और पौत्रोंका वध कराकर फिर स्वयं भी मारे गये॥ २५ ॥

तवापराधादस्माभिर्भ्रातरस्ते निपातिताः।
निहता ज्ञातयश्चापि दिष्टं मन्ये दुरत्ययम् ॥ २६ ॥
‘तुम्हारे अपराधसे ही हमलोगोंने तुम्हारे भाइयोंको मार गिराया और कुटुम्बीजनोंका वध किया है, मैं इसे दैवका दुर्लङ्घ्य विधान ही मानता हूँ॥ २६ ॥

आत्मा न शोचनीयस्ते श्लाघ्यो मृत्युस्तवानघ।

वयमेवाधुना शोच्याः सर्वावस्थासु कौरव ।। २७ ।।
कृपणं वर्तयिष्यामस्तैर्हीना बन्धुभिः प्रियैः ।
‘अनघ! तुम्हें अपने लिये शोक नहीं करना चाहिये, तुम्हारी प्रशंसनीय मृत्यु हो रही है। कुरुराज! अब तो सभी अवस्थाओंमें इस समय हमलोग ही शोचनीय हो गये हैं; क्योंकि उन प्रिय बन्धु-बान्धवोंसे रहित होकर हमें दीनतापूर्ण जीवन व्यतीत करना पड़ेगा ।। २७ १/२ ।।
भ्रातॄणां चैव पुत्राणां तथा वै शोकविह्वलाः ।। २८ ।।
कथं द्रक्ष्यामि विधवा वधूः शोकपरिप्लुताः ।
‘भला, मैं भाइयों और पुत्रोंकी उन शोकविह्वला और दुःखमें डूबी हुई विधवा बहुओंको कैसे देख सकूँगा ।। २८ १/२ ।।
त्वमेकः सुस्थितो राजन् स्वर्गे ते निलयो ध्रुवः ।। २९ ।।
वयं नरकसंज्ञं वै दुःखं प्राप्स्याम दारुणम् ।
‘राजन्! तुम अकेले सुखी हो। निश्चय ही स्वर्गमें तुम्हें स्थान प्राप्त होगा और हमें यहाँ नरकतुल्य दारुण दुःख भोगना पड़ेगा ।। २९ १/२ ।।
स्नुषाश्च प्रस्नुषाश्चैव धृतराष्ट्रस्य विह्वलाः ।
गर्हयिष्यन्ति नो नूनं विधवाः शोककर्शिताः ।। ३० ।।
‘धृतराष्ट्रकी वे शोकातुर एवं व्याकुल विधवा पुत्रवधुएँ और पौत्रवधुएँ भी निश्चय ही हमलोगोंकी निन्दा करेंगी’ ।। ३० ।।

संजय उवाच
एवमुक्त्वा सुदुःखार्तो निश्श्वास स पार्थिवः ।
विललाप चिरं चापि धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।। ३१ ।।
**संजय कहते हैं—**राजन्! ऐसा कहकर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर अत्यन्त दुःखसे आतुर हो लंबी साँस छोड़ते हुए बहुत देरतक विलाप करते रहे ।। ३१ ।।

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि युधिष्ठिरविलापे एकोनषष्टितमोऽध्यायः ।। ५९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें युधिष्ठिरका विलापविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५९ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2921)

⬅ विषय-सूची (TOC)

षष्टितमोऽध्यायः

क्रोधमें भरे हुए बलरामको श्रीकृष्णका समझाना और युधिष्ठिरके साथ श्रीकृष्णकी तथा भीमसेनकी बातचीत

धृतराष्ट्र उवाच

अधर्मेण हतं दृष्ट्वा राजानं माधवोत्तमः ।
किमब्रवीत् तदा सूत बलदेवो महाबलः ॥ १ ॥

**धृतराष्ट्रने पूछा—**सूत! उस समय राजा दुर्योधनको अधर्मपूर्वक मारा गया देख महाबली मधुकुलशिरोमणि बलदेवजीने क्या कहा था? ॥ १ ॥

गदायुद्धविशेषज्ञो गदायुद्धविशारदः ।
कृतवान् रौहिणेयो यत् तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ २ ॥

संजय! गदायुद्धके विशेषज्ञ तथा उसकी कलामें कुशल रोहिणीनन्दन बलरामजीने वहाँ जो कुछ किया हो, वह मुझे बताओ ॥ २ ॥

संजय उवाच

शिरस्यभिहतं दृष्ट्वा भीमसेनेन ते सुतम् ।
रामः प्रहरतां श्रेष्ठश्चुक्रोध बलवद्बली ॥ ३ ॥

**संजयने कहा—**राजन्! भीमसेनके द्वारा आपके पुत्रके मस्तकपर पैरका प्रहार हुआ देख योद्धाओंमें श्रेष्ठ बलवान् बलरामको बड़ा क्रोध हुआ ॥ ३ ॥

ततो मध्ये नरेन्द्राणामूर्ध्वबाहुर्हलायुधः ।
कुर्वन्नार्तस्वरं घोरं धिग् धिग् भीमेत्युवाच ह ॥ ४ ॥

फिर वहाँ राजाओंकी मण्डलीमें अपनी दोनों बाँहें ऊपर उठाकर हलधर बलरामने भयंकर आर्तनाद करते हुए कहा—'भीमसेन! तुम्हें धिक्कार है! धिक्कार है!! ॥

अहो धिग्यदधो नाभेः प्रहृतं धर्मविग्रहे ।
नैतद् दृष्टं गदायुद्धे कृतवान् यद् वृकोदरः ॥ ५ ॥

'अहो! इस धर्मयुद्धमें नाभिसे नीचे जो प्रहार किया गया है और जिसे भीमसेनने स्वयं किया है, यह गदायुद्धमें कभी नहीं देखा गया ॥ ५ ॥

अधो नाभ्या न हन्तव्यमिति शास्त्रस्य निश्चयः ।
अयं त्वशास्त्रविन्मूढः स्वच्छन्दात् सम्प्रवर्तते ॥ ६ ॥

'नाभिसे नीचे आघात नहीं करना चाहिये। यह गदा-युद्धके विषयमें शास्त्रका सिद्धान्त है। परंतु यह शास्त्रज्ञानसे शून्य मूर्ख भीमसेन यहाँ स्वेच्छाचार कर रहा है' ॥ ६ ॥

तस्य तत् तद् ब्रुवाणस्य रोषः समभवन्महान् ।

ततो राजानमालोक्य रोषसंरक्तलोचनः ॥ ७ ॥ ये सब बातें कहते हुए बलदेवजीका रोष बहुत बढ़ गया। फिर राजा दुर्योधनकी ओर दृष्टिपात करके उनकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं ॥ ७ ॥

बलदेवो महाराज ततो वचनमब्रवीत् । न चैष पतितः कृष्ण केवलं मत्समोऽसमः ॥ ८ ॥ आश्रितस्य तु दौर्बल्यादाश्रयः परिभर्त्स्यते । महाराज! फिर बलदेवजीने कहा—'श्रीकृष्ण! राजा दुर्योधन मेरे समान बलवान् था। गदायुद्धमें उसकी समानता करनेवाला कोई नहीं था। यहाँ अन्याय करके केवल दुर्योधन ही नहीं गिराया गया है, (मेरा भी अपमान किया गया है) शरणागतकी दुर्बलताके कारण शरण देनेवालेका तिरस्कार किया जा रहा है' ॥ ८ ॥

ततो लाङ्गलमुद्यम्य भीममभ्यद्रवद् बली ॥ ९ ॥ तस्योर्ध्वबाहोः सदृशं रूपमासीन्महात्मनः । बहुधातुविचित्रस्य श्‍वेतस्येव महागिरेः ॥ १० ॥ ऐसा कहकर महाबली बलराम अपना हल उठाकर भीमसेनकी ओर दौड़े। उस समय अपनी भुजाएँ ऊपर उठाये हुए महात्मा बलरामजीका रूप अनेक धातुओंके कारण विचित्र शोभा पानेवाले महान् श्‍वेतपर्वतके समान जान पड़ता था ॥ ९-१० ॥

(भ्रातृभिः सहितो भीमः सार्जुनैरस्त्रकोविदैः । न विव्यथे महाराज दृष्ट्वा हलधरं बली ॥) महाराज! हलधरको आक्रमण करते देख अर्जुनसहित अस्त्रवेत्ता भाइयोंके साथ खड़े हुए बलवान् भीमसेन तनिक भी व्यथित नहीं हुए।

तमुत्पतन्तं जग्राह केशवो विनयान्वितः । बाहुभ्यां पीनवृत्ताभ्यां प्रयत्नाद् बलवद्बली ॥ ११ ॥ उस समय विनयशील, बलवान् श्रीकृष्णने आक्रमण करते हुए बलरामजीको अपनी मोटी एवं गोल-गोल भुजाओं‌द्वारा बड़े प्रयत्नसे पकड़ा ॥ ११ ॥

सितासितौ यदुवरौ शुशुभातेऽधिकं तदा । (संगताविव राजेन्द्र कैलासाञ्जनपर्वतौ ॥) नभोगतौ यथा राजंश्चन्द्रसूर्यौ दिनक्षये ॥ १२ ॥ राजेन्द्र! वे श्याम-गौर यदुकुलतिलक दोनों भाई परस्पर मिले हुए कैलास और कज्जल पर्वतोंके समान शोभा पा रहे थे। राजन्! संध्याकालके आकाशमें जैसे चन्द्रमा और सूर्य उदित हुए हों, वैसे ही उस रणक्षेत्रमें वे दोनों भाई सुशोभित हो रहे थे ॥ १२ ॥

उवाच चैनं संरब्धं शमयन्निव केशवः । आत्मवृद्धिमित्रवृद्धिमित्रमित्रोदयस्तथा ॥ १३ ॥ विपरीतं द्विषत्स्वेतत् षड्‍विधा वृद्धिरात्मनः ।

उस समय श्रीकृष्णने रोषसे भरे हुए बलरामजीको शान्त करते हुए-से कहा—'भैया! अपनी उन्नति छः प्रकारकी होती है—अपनी वृद्धि, मित्रकी वृद्धि और मित्रके मित्रकी वृद्धि तथा शत्रुपक्षमें इसके विपरीत स्थिति अर्थात् शत्रुकी हानि, शत्रुके मित्रकी हानि तथा शत्रुके मित्रके मित्रकी हानि ।।

आत्मन्यपि च मित्रे च विपरीतं यदा भवेत् ।। १४ ।।
तदा विद्यान्मनोग्लानिमाशु शान्तिकरो भवेत् ।
'अपनी और अपने मित्रकी यदि इसके विपरीत परिस्थिति हो तो मन-ही-मन ग्लानिका अनुभव करना चाहिये और मित्रोंकी उस हानिके निवारणके लिये शीघ्र प्रयत्नशील होना चाहिये ।। १४½ ।।

अस्माकं सहजं मित्रं पाण्डवाः शुद्धपौरुषाः ।। १५ ।।
स्वकाः पितृष्वसुः पुत्रास्ते परैर्निकृता भृशम् ।
'शुद्ध पुरुषार्थका आश्रय लेनेवाले पाण्डव हमारे सहज मित्र हैं। बुआके पुत्र होनेके कारण सर्वथा अपने हैं। शत्रुओंने इनके साथ बहुत छल-कपट किया था ।।

प्रतिज्ञापालनं धर्मः क्षत्रियस्येह वेद्यहम् ।। १६ ।।
सुयोधनस्य गदया भङ्क्तास्म्यूरू महाहवे ।
इति पूर्वं प्रतिज्ञातं भीमेन हि सभातले ।। १७ ।।
'मैं समझता हूँ कि इस जगत्में अपनी प्रतिज्ञाका पालन करना क्षत्रियके लिये धर्म ही है। पहले सभामें भीमसेनने यह प्रतिज्ञा की थी कि 'मैं महायुद्धमें अपनी गदासे दुर्योधनकी दोनों जाँघें तोड़ डालूँगा' ।। १६-१७ ।।

मैत्रेयेणाभिशप्तश्च पूर्वमेव महर्षिणा ।
ऊरू ते भेत्स्यते भीमो गदयेति परंतप ।। १८ ।।
'शत्रुओंको संताप देनेवाले बलरामजी! महर्षि मैत्रेयने भी दुर्योधनको पहलेसे ही यह शाप दे रखा था कि 'भीमसेन अपनी गदासे तेरी दोनों जाँघें तोड़ डालेंगे' ।।

अतो दोषं न पश्यामि मा क्रुद्ध्यस्व प्रलम्बहन् ।
यौनः स्वैः सुखहार्दैश्च सम्बन्धः सह पाण्डवैः ।। १९ ।।
तेषां वृद्ध्या हि वृद्धिन्नौ मा क्रुधः पुरुषर्षभ ।
'अतः प्रलम्बहन्ता बलभद्रजी! मैं इसमें भीमसेनका कोई दोष नहीं देखता; इसलिये आप क्रोध न कीजिये। हमारा पाण्डवोंके साथ यौन-सम्बन्ध तो है ही। परस्पर सुख देनेवाले सौहार्दसे भी हमलोग बँधे हुए हैं। पुरुषप्रवर! इन पाण्डवोंकी वृद्धिसे हमारी भी वृद्धि है, अतः आप क्रोध न करें' ।। १९½ ।।

वासुदेववचः श्रुत्वा सीरभृत् प्राह धर्मवित् ।। २० ।।
धर्मः सुचरितः सद्भिः स च द्वाभ्यां नियच्छति ।

श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर धर्मज्ञ हलधरने इस प्रकार कहा—'श्रीकृष्ण! श्रेष्ठ पुरुषोंने धर्मका अच्छी तरह आचरण किया है; किंतु वह अर्थ और काम—इन दो वस्तुओंसे संकुचित हो जाता है॥ २० १/२ ॥ अर्थश्चात्यर्थलुब्धस्य कामश्चातिप्रसङ्गिनः॥ २१॥ धर्मार्थौ धर्मकामौ च कामार्थौ चाप्यपीडयन्। धर्मार्थकामान् योऽभ्येति सोऽत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २२॥ 'अत्यन्त लोभीका अर्थ और अधिक आसक्ति रखनेवालेका काम—ये दोनों ही धर्मको हानि पहुँचाते हैं! जो मनुष्य कामसे धर्म और अर्थको, अर्थसे धर्म और कामको तथा धर्मसे अर्थ और कामको हानि न पहुँचाकर धर्म, अर्थ और काम तीनोंका यथोचित रूपसे सेवन करता है, वह अत्यन्त सुखका भागी होता है॥ तदिदं व्याकुलं सर्वं कृतं धर्मस्य पीडनात्। भीमसेनेन गोविन्द कामं त्वं तु यथाऽऽत्थ माम् ॥ २३॥ 'गोविन्द! भीमसेनने (अर्थके लोभसे) धर्मको हानि पहुँचाकर इन सबको विकृत कर डाला है। तुम मुझसे जिस प्रकार इस कार्यको धर्मसंगत बता रहे हो वह सब तुम्हारी मनमानी कल्पना है'॥ २३॥

श्रीकृष्ण उवाच

अरोषणो हि धर्मात्मा सततं धर्मवत्सलः। भवान् प्रख्यायते लोके तस्मात् संशाम्य मा क्रुधः ॥ २४॥ श्रीकृष्णने कहा— भैया! आप संसारमें क्रोधरहित, धर्मात्मा और निरन्तर धर्मपर अनुग्रह रखनेवाले सत्पुरुषके रूपमें विख्यात हैं; अतः शान्त हो जाइये, क्रोध न कीजिये॥ प्राप्तं कलियुगं विद्धि प्रतिज्ञां पाण्डवस्य च। आनृण्यं यातु वैरस्य प्रतिज्ञायाश्च पाण्डवः ॥ २५॥ समझ लीजिये कि कलियुग आ गया। पाण्डुपुत्र भीमसेनकी प्रतिज्ञापर भी ध्यान दीजिये। आज पाण्डुकुमार भीम वैर और प्रतिज्ञाके ऋणसे मुक्त हो जायँ॥ २५॥ (गतः पुरुषशार्दूलो हत्वा नैकृतिकं रणे। अधर्मो विद्यते नात्र यद् भीमो हतवान् रिपुम् ॥ पुरुषसिंह भीम रणभूमिमें कपटी दुर्योधनको मारकर चले गये। उन्होंने जो अपने शत्रुका वध किया है, इसमें कोई अधर्म नहीं है। युध्यन्तं समरे वीरं कुरुवृष्णियशस्करम्। अनेन कर्णः संदिष्टः पृष्ठतो धनुराच्छिनत् ॥ इसी दुर्योधनने कर्णको आज्ञा दी थी, जिससे उसने कुरु और वृष्णि दोनों कुलोंके सुयशकी वृद्धि करनेवाले, युद्धपरायण, वीर अभिमन्युके धनुषको समरांगणमें पीछेसे

आकर काट दिया था। ततः सच्छिन्नधन्वानं विरथं पौरुषे स्थितम् ।
व्यायुधीकृत्य हतवान् सौभद्रमपलायिनम् ॥
इस प्रकार धनुष कट जाने और रथसे हीन हो जानेपर भी जो पुरुषार्थमें ही तत्पर था, रणभूमिमें पीठ न दिखानेवाले उस सुभद्राकुमार अभिमन्युको इसने निहत्था करके मार डाला था।
जन्मप्रभृतिलुब्धश्च पापश्चैव दुरात्मवान् ।
निहतो भीमसेनेन दुर्बुद्धिः कुलपांसनः ॥
यह दुरात्मा, दुर्बुद्धि एवं पापी दुर्योधन जन्मसे ही लोभी तथा कुरुकुलका कलंक रहा है, जो भीमसेनके हाथसे मारा गया है।
प्रतिज्ञां भीमसेनस्य त्रयोदशसमार्जिताम् ।
किमर्थं नाभिजानाति युद्ध्यमानोऽपि विश्रुताम् ॥
भीमसेनकी प्रतिज्ञा तेरह वर्षोंसे चल रही थी और सर्वत्र प्रसिद्ध हो चुकी थी। युद्ध करते समय दुर्योधनने उसे याद क्यों नहीं रखा?।
ऊर्ध्वमुत्क्रम्य वेगेन जिघांसन्तं वृकोदरः ।
बभञ्ज गदया चोरू न स्थाने न च मण्डले ॥)
यह वेगसे ऊपर उछलकर भीमसेनको मार डालना चाहता था। उस अवस्थामें भीमने अपनी गदासे इसकी दोनों जाँघें तोड़ डाली थीं। उस समय न तो यह किसी स्थानमें था और न मण्डलमें ही।

संजय उवाच
धर्मच्छलमपि श्रुत्वा केशवात् स विशाम्पते ।
नैव प्रीतमना रामो वचनं प्राह संसदि ॥ २६ ॥
**संजय कहते हैं—**प्रजानाथ! भगवान् श्रीकृष्णसे यह छलरूप धर्मका विवेचन सुनकर बलदेवजीके मनको संतोष नहीं हुआ। उन्होंने भरी सभामें कहा— ॥ २६ ॥
हत्वाधर्मेण राजानं धर्मात्मानं सुयोधनम् ।
जिह्मयोधीति लोकेऽस्मिन् ख्यातिं यास्यति पाण्डवः ॥ २७ ॥
‘धर्मात्मा राजा दुर्योधनको अधर्मपूर्वक मारकर पाण्डुपुत्र भीमसेन इस संसारमें कपटपूर्ण युद्ध करनेवाले योद्धाके रूपमें विख्यात होंगे ॥ २७ ॥
दुर्योधनोऽपि धर्मात्मा गतिं यास्यति शाश्वतीम् ।
ऋजुयोधी हतो राजा धार्तराष्ट्रो नराधिपः ॥ २८ ॥
‘धृतराष्ट्रपुत्र धर्मात्मा राजा दुर्योधन सरलतासे युद्ध कर रहा था, उस अवस्थामें मारा गया है; अतः वह सनातन सद्गतिको प्राप्त होगा ॥ २८ ॥

युद्धदीक्षां प्रविश्याजौ रणयज्ञं वितत्य च । हुत्वाऽऽत्मानममित्राग्नौ प्राप चावभृथं यशः ॥ २९ ॥ 'युद्धकी दीक्षा ले संग्रामभूमिमें प्रविष्ट हो रणयज्ञका विस्तार करके शत्रुरूपी प्रज्वलित अग्निमें अपने शरीरकी आहुति दे दुर्योधनने सुयशरूपी अवभृथ-स्नानका शुभ अवसर प्राप्त किया है' ॥ २९ ॥

इत्युक्त्वा रथमास्थाय रौहिणेयः प्रतापवान् । श्वेताभ्रशिखराकारः प्रययौ द्वारकां प्रति ॥ ३० ॥ यह कहकर प्रतापी रोहिणीनन्दन बलरामजी, जो श्वेत बादलोंके अग्रभागकी भाँति गौर-कान्तिसे सुशोभित हो रहे थे, रथपर आरूढ़ हो द्वारकाकी ओर चल दिये ॥ ३० ॥

पञ्चालाश्च सवार्ष्णेयाः पाण्डवाश्च विशाम्पते । रामे द्वारावतीं याते नातिप्रमनसोऽभवन् ॥ ३१ ॥ प्रजानाथ! बलरामजीके इस प्रकार द्वारका चले जानेपर पांचाल, वृष्णिवंशी तथा पाण्डववीर उदास हो गये। उनके मनमें अधिक उत्साह नहीं रह गया ॥ ३१ ॥

ततो युधिष्ठिरं दीनं चिन्तापरमधोमुखम् । शोकोपहतसंकल्पं वासुदेवोऽब्रवीदिदम् ॥ ३२ ॥ उस समय युधिष्ठिर बहुत दुःखी थे। वे नीचे मुख किये चिन्तामें डूब गये थे। शोकसे उनका मनोरथ भंग हो गया था। उस अवस्थामें उनसे भगवान् श्रीकृष्ण बोले ॥ ३२ ॥

वासुदेव उवाच

धर्मराज किमर्थं त्वमधर्ममनुमन्यसे । हतबन्धोर्यदेतस्य पतितस्य विचेतसः ॥ ३३ ॥ दुर्योधनस्य भीमेन मृद्यमानं शिरः पदा । उप्रेक्षसि कस्मात् त्वं धर्मज्ञः सन्नराधिप ॥ ३४ ॥ श्रीकृष्णने पूछा—धर्मराज! आप चुप होकर अधर्मका अनुमोदन क्यों कर रहे हैं? नरेश्वर दुर्योधनके भाई और सहायक मारे जा चुके हैं। यह पृथ्वीपर गिरकर अचेत हो रहा है। ऐसी दशामें भीमसेन इसके मस्तकको पैरसे कुचल रहे हैं। आप धर्मज्ञ होकर समीपसे ही यह सब कैसे देख रहे हैं ॥ ३३-३४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

न ममैतत् प्रियं कृष्ण यद् राजानं वृकोदरः । पदा मूर्ध्यस्पृशत् क्रोधान्न च हृष्ये कुलक्षये ॥ ३५ ॥ युधिष्ठिरने कहा—श्रीकृष्ण! भीमसेनने क्रोधमें भरकर जो राजा दुर्योधनके मस्तकको पैरोंसे ठुकराया है, यह मुझे भी अच्छा नहीं लगा। अपने कुलका संहार हो जानेसे मैं प्रसन्न नहीं हूँ ॥ ३५ ॥

निकृत्या निकृता नित्यं धृतराष्ट्रसुतैर्वयम् । बहूनि परुषाण्युक्त्वा वनं प्रस्थापिताः स्म ह ॥ ३६ ॥ परंतु क्या करूँ, धृतराष्ट्रके पुत्रोंने सदा ही हमें अपने कपटजालका शिकार बनाया और बहुत-से कटुवचन सुनाकर वनमें भेज दिया ॥ ३६ ॥

भीमसेनस्य तद् दुःखमतीव हृदि वर्तते । इति संचिन्त्य वार्ष्णेय मयैतत् समुपेक्षितम् ॥ ३७ ॥ वृष्णिनन्दन! भीमसेनके हृदयमें इन सब बातोंके लिये बड़ा दुःख था। यही सोचकर मैंने उनके इस कार्यकी उपेक्षा की है ॥ ३७ ॥

तस्माद्धत्वाकृतप्रज्ञं लुब्धं कामवशानुगम् । लभतां पाण्डवः कामं धर्मेऽधर्मे च वा कृते ॥ ३८ ॥ इसलिये मैंने विचार किया कि कामके वशीभूत हुए लोभी और अजितात्मा दुर्योधनको मारकर धर्म या अधर्म करके पाण्डुपुत्र भीम अपनी इच्छा पूरी कर लें ॥ ३८ ॥

संजय उवाच

इत्युक्ते धर्मराजेन वासुदेवोऽब्रवीदिदम् । काममस्त्वेतदिति वै कृच्छ्राद् यदुकुलोद्वहः ॥ ३९ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! धर्मराजके ऐसा कहनेपर यदुकुलश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णने बड़े कष्टसे यह कहा कि 'अच्छा, ऐसा ही सही' ॥ ३९ ॥

इत्युक्तो वासुदेवेन भीमप्रियहितैषिणा । अन्वमोदत तत् सर्वं यद् भीमेन कृतं युधि ॥ ४० ॥ भीमसेनका प्रिय और हित चाहनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर युधिष्ठिरने भीमसेनके द्वारा युद्धस्थलमें जो कुछ किया गया था, उस सबका अनुमोदन किया ॥ ४० ॥

(अर्जुनोऽपि महाबाहुरप्रीतेनान्तरात्मना । नोवाच वचनं किंचिद् भ्रातरं, साध्वसाधु वा ॥) महाबाहु अर्जुन भी अप्रसन्नचित्तसे अपने भाईके प्रति भला-बुरा कुछ नहीं बोले।

भीमसेनोऽपि हत्वाऽऽजौ तव पुत्रममर्षणः । अभिवाद्याग्रतः स्थित्वा सम्प्रहृष्टः कृताञ्जलिः ॥ ४१ ॥ अमर्षशील भीमसेन युद्धस्थलमें आपके पुत्रका वध करके बड़े प्रसन्न हुए और युधिष्ठिरको प्रणाम करके उनके आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ ४१ ॥

प्रोवाच सुमहातेजा धर्मराजं युधिष्ठिरम् । हर्षादुत्फुल्लनयनो जितकाशी विशाम्पते ॥ ४२ ॥ प्रजानाथ! उस समय महातेजस्वी भीमसेन विजयश्रीसे प्रकाशित हो रहे थे। उनके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे, उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ४२ ॥

तवाद्य पृथिवी सर्वा क्षेमा निहतकण्टका । तां प्रशाधि महाराज स्वधर्ममनुपालय ॥ ४३ ॥ ‘महाराज! आज यह सारी पृथिवी आपकी हो गयी, इसके काँटे नष्ट कर दिये गये, अतः यह मंगलमयी हो गयी है। आप इसका शासन तथा अपने धर्मका पालन कीजिये ॥ ४३ ॥ यस्तु कर्तास्य वैरस्य निकृत्या निकृतिप्रियः । सोऽयं विनिहतः शेते पृथिव्यां पृथिवीपते ॥ ४४ ॥ ‘पृथिवीनाथ! जिसे छल और कपट ही प्रिय था तथा जिसने कपटसे ही इस वैरकी नींव डाली थी, वही यह दुर्योधन आज मारा जाकर पृथ्वीपर सो रहा है ॥ दुःशासनप्रभृतयः सर्वे ते चोग्रवादिनः । राधेयः शकुनिश्चैव हताश्च तव शत्रवः ॥ ४५ ॥ ‘वे भयंकर कटुवचन बोलनेवाले दुःशासन आदि धृतराष्ट्रपुत्र तथा कर्ण और शकुनि आदि आपके सभी शत्रु मार डाले गये ॥ ४५ ॥ सेयं रत्नसमाकीर्णा मही सवनपर्वता । उपावृत्ता महाराज त्वामद्य निहतद्विषम् ॥ ४६ ॥ ‘महाराज! आपके शत्रु नष्ट हो गये। आज यह रत्नोंसे भरी हुई वन और पर्वतोंसहित सारी पृथ्वी आपकी सेवामें प्रस्तुत है’ ॥ ४६ ॥

युधिष्ठिर उवाच

गतो वैरस्य निधनं हतो राजा सुयोधनः । कृष्णस्य मतमास्थाय विजितेयं वसुन्धरा ॥ ४७ ॥ युधिष्ठिर बोले— भीमसेन! सौभाग्यकी बात है कि तुमने वैरका अन्त कर दिया, राजा दुर्योधन मारा गया और श्रीकृष्णके मतका आश्रय लेकर हमने यह सारी पृथ्वी जीत ली ॥ ४७ ॥ दिष्ट्या गतस्त्वमानृण्यं मातुः कोपस्य चोभयोः । दिष्ट्या जयति दुर्धर्ष दिष्ट्या शत्रुनिपातितः ॥ ४८ ॥ सौभाग्यसे तुम माता तथा क्रोध दोनोंके ऋणसे उऋण हो गये। दुर्धर्ष वीर! भाग्यवश तुम विजयी हुए और सौभाग्यसे ही तुमने अपने शत्रुको मार गिराया ॥ ४८ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवसान्त्वने षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें श्रीकृष्णका बलदेवजीको सान्त्वना देनाविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६० ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ५६ १/३ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 2929)

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकषष्टितमोऽध्यायः

पाण्डव-सैनिकोंद्वारा भीमकी स्तुति, श्रीकृष्णका दुर्योधनपर आक्षेप, दुर्योधनका उत्तर तथा श्रीकृष्णके द्वारा पाण्डवोंका समाधान एवं शंखध्वनि

धृतराष्ट्र उवाच
हतं दुर्योधनं दृष्ट्वा भीमसेनेन संयुगे ।
पाण्डवाः सृञ्जयाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा— संजय! रणभूमिमें भीमसेनके द्वारा दुर्योधनको मारा गया देख पाण्डवों तथा सृञ्जयोंने क्या किया? ॥ १ ॥

संजय उवाच
हतं दुर्योधनं दृष्ट्वा भीमसेनेन संयुगे ।
सिंहेनेव महाराज मत्तं वनगजं यथा ॥ २ ॥
प्रहृष्टमनसस्तत्र कृष्णेन सह पाण्डवाः ।
संजयने कहा— महाराज! जैसे कोई मतवाला जंगली हाथी सिंहके द्वारा मारा गया हो, उसी प्रकार दुर्योधनको भीमसेनके हाथसे रणभूमिमें मारा गया देख श्रीकृष्णसहित पाण्डव मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए ॥ २ १/२ ॥
पञ्चाला सृञ्जयाश्चैव निहते कुरुनन्दने ॥ ३ ॥
आविद्धयन्नुत्तरीयाणि सिंहनादांश्च नेदिरे ।
नैतान् हर्षसमाविष्टानियं सेहे वसुन्धरा ॥ ४ ॥
कुरुनन्दन दुर्योधनके मारे जानेपर पांचाल और सृंजय तो अपने दुपट्टे उछालने और सिंहनाद करने लगे। हर्षमें भरे हुए इन पाण्डववीरोंका भार यह पृथ्वी सहन नहीं कर पाती थी ॥ ३-४ ॥

धनूंष्यन्ये व्याक्षिपन्त ज्याश्चाप्यन्ये तथाक्षिपन् ।
दध्धुरन्ये महाशङ्खानन्ये जघ्नुश्च दुन्दुभीन् ॥ ५ ॥
किसीने धनुष टंकारा, किसीने प्रत्यंचा खींची, कुछ लोग बड़े-बड़े शंख बजाने लगे और दूसरे बहुत-से सैनिक डंके पीटने लगे ॥ ५ ॥

चिक्रीडुश्च तथैवान्ये जहसुश्च तवाहिताः ।
अब्रुवंश्चासकृद् वीरा भीमसेनमिदं वचः ॥ ६ ॥
आपके बहुत-से शत्रु भाँति-भाँतिके खेल खेलने और हास-परिहास करने लगे। कितने ही वीर भीमसेनके पास जाकर इस प्रकार कहने लगे— ॥ ६ ॥

दुष्करं भवता कर्म रणेऽद्य सुमहत् कृतम् । कौरवेन्द्रं रणे हत्वा गदयातिकृतश्रमम् ॥ ७ ॥ ‘कौरवराज दुर्योधनने गदायुद्धमें बड़ा भारी परिश्रम किया था। आज रणभूमिमें उसका वध करके आपने महान् एवं दुष्कर पराक्रम कर दिखाया है ॥ ७ ॥ इन्द्रेणेव हि वृत्रस्य वधं परमसंयुगे । त्वया कृतममन्यन्त शत्रोर्वधमिमं जनाः ॥ ८ ॥ ‘जैसे महासमरमें इन्द्रने वृत्रासुरका वध किया था, आपके द्वारा किया हुआ यह शत्रुको संहार भी उसी कोटिका है—ऐसा सब लोग समझने लगे हैं ॥ ८ ॥ चरन्तं विविधान् मार्गान् मण्डलानि च सर्वशः । दुर्योधनमिमं शूरं कोऽन्यो हन्याद् वृकोदरात् ॥ ९ ॥ ‘भला, नाना प्रकारके पैंतरे बदलते और सब तरहकी मण्डलाकार गतियोंसे चलते हुए इस शूरवीर दुर्योधनको भीमसेनके सिवा दूसरा कौन मार सकता था? ॥ ९ ॥ वैरस्य च गतः पारं त्वमिहान्यैः सुदुर्गमम् । अशक्यमेतदन्येन सम्पादयितुमीदृशम् ॥ १० ॥ ‘आप वैरके समुद्रसे पार हो गये, जहाँ पहुँचना दूसरे लोगोंके लिये अत्यन्त कठिन है। दूसरे किसीके लिये ऐसा पराक्रम कर दिखाना सर्वथा असम्भव है ॥ कुञ्जरेणेव मत्तेन वीर संग्राममूर्धनि । दुर्योधनशिरो दिष्ट्या पादेन मृदितं त्वया ॥ ११ ॥ ‘वीर! मतवाले गजराजकी भाँति आपने युद्धके मुहानेपर अपने पैरसे दुर्योधनके मस्तकको कुचल दिया है, यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ ११ ॥ सिंहेन महिषस्येव कृत्वा सङ्गरमुत्तमम् । दुःशासनस्य रुधिरं दिष्ट्या पीतं त्वयानघ ॥ १२ ॥ ‘अनघ! जैसे सिंहने भैंसेका खून पी लिया हो, उसी प्रकार आपने महान् युद्ध ठानकर दुःशासनके रक्तका पान किया है, यह भी सौभाग्यकी ही बात है ॥ ये विप्रकुर्वन् राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । मूर्ध्नि तेषां कृतः पादो दिष्ट्या ते स्वेन कर्मणा ॥ १३ ॥ ‘जिन लोगोंने धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरका अपराध किया था, उन सबके मस्तकपर आपने अपने पराक्रमद्वारा पैर रख दिया, यह कितने हर्षका विषय है ॥ १३ ॥ अमित्राणामधिष्ठानाद् वधाद् दुर्योधनस्य च । भीम दिष्ट्या पृथिव्यां ते प्रथितं सुमहद् यशः ॥ १४ ॥ ‘भीम! शत्रुओंपर अपना प्रभुत्व स्थापित करने और दुर्योधनको मार डालनेसे भाग्यवश इस भूमण्डलमें आपका महान् यश फैल गया है ॥ १४ ॥ एवं नूनं हते वृत्रे शक्रं नन्दन्ति वन्दिनः ।

तथा त्वां निहतामित्रं वयं नन्दाम भारत ॥ १५ ॥ ‘भारत! निश्चय ही वृत्रासुरके मारे जानेपर वन्दीजनोंने जिस प्रकार इन्द्रका अभिनन्दन किया था, उसी प्रकार हम शत्रुओंका वध करनेवाले आपका अभिनन्दन करते हैं ॥ १५ ॥

दुर्योधनवधे यानि रोमाणि हृषितानि नः । अद्यापि न विकृष्यन्ते तानि तद् विद्धि भारत ॥ १६ ॥ ‘भरतनन्दन! दुर्योधनके वधके समय हमारे शरीरमें जो रोंगटे खड़े हुए थे, वे अब भी ज्यों-के-त्यों हैं, गिर नहीं रहे हैं। इन्हें आप देख लें’ ॥ १६ ॥

इत्यब्रुवन् भीमसेनं वातिकास्तत्र सङ्गताः । तान् हृष्टान् पुरुषव्याघ्रान् पञ्चालान् पाण्डवैः सह ॥ १७ ॥ ब्रुवतोऽसदृशं तत्र प्रोवाच मधुसूदनः । प्रशंसा करनेवाले वीरगण वहाँ एकत्र होकर भीमसेनसे उपर्युक्त बातें कह रहे थे। भगवान् श्रीकृष्णने जब देखा कि पुरुषसिंह पांचाल और पाण्डव अयोग्य बातें कह रहे हैं, तब वे वहाँ उन सबसे बोले— ॥

न न्याय्यं निहतं शत्रुं भूयो हन्तुं नराधिपाः ॥ १८ ॥ असकृद् वाग्भिरुग्राभिर्निहतो ह्येष मन्दधीः । ‘नरेश्वरो! मरे हुए शत्रुको पुनः मारना उचित नहीं है। तुमलोगोंने इस मन्दबुद्धि दुर्योधनको बारंबार कठोर वचनोंद्वारा घायल किया है ॥ १८ १/२ ॥

तदैवैष हतः पापो यदैव निरपत्रपः ॥ १९ ॥ लुब्धः पापसहायश्च सुहृदां शासनातिगः । ‘यह निर्लज्ज पापी तो उसी समय मर चुका था जब लोभमें फँसा और पापियोंको अपना सहायक बनाकर सुहृदोंके शासनसे दूर रहने लगा ॥ १९ १/२ ॥

बहुशो विदुरद्रोणकृपगाङ्गेयसञ्जयैः ॥ २० ॥ पाण्डुभ्यः प्रार्थ्यमानोऽपि पित्र्यमंशं न दत्तवान् । ‘विदुर, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म तथा संजयोंके बारंबार प्रार्थना करनेपर भी इसने पाण्डवोंको उनका पैतृक भाग नहीं दिया ॥ २० १/२ ॥

नैष योग्योऽद्य मित्रं वा शत्रुुर्वा पुरुषाधमः ॥ २१ ॥ किमनेनातिभुग्नेन वाग्भिः काष्ठसधर्मणा । रथेष्वारोहत क्षिप्रं गच्छामो वसुधाधिपाः ॥ २२ ॥ दिष्ट्या हतोऽयं पापात्मा सामात्यज्ञातिबान्धवः । ‘यह नराधम अब किसी योग्य नहीं है। न यह किसीका मित्र है और न शत्रु। राजाओ! यह तो सूखे काठके समान कठोर है। इसे कटुवचनोंद्वारा अधिक झुकानेकी चेष्टा करनेसे क्या लाभ? अब शीघ्र अपने रथोंपर बैठो। हम सब लोग छावनीकी ओर चलें। सौभाग्यसे यह पापात्मा अपने मन्त्री, कुटुम्ब और भाई-बन्धुओंसहित मार डाला गया’ ॥ २१-२२ १/२ ॥