महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
उसमें अच्छे-अच्छे सैकड़ों बाण रखे गये हों' ॥ ३१ ॥ ततः स तं तथेत्युक्त्वा कल्पयित्वा महारथम् । भार्यां वामे धुरि तदा चात्मानं दक्षिणे तथा ॥ ३२ ॥ तब राजा 'जो आज्ञा' कहकर गये और एक विशाल रथ तैयार करके ले आये। उसमें बायीं ओरका बोझ ढोनेके लिये रानीको लगाकर स्वयं वे दाहिनी ओर जुट गये ॥ ३२ ॥ त्रिदण्डं वज्रसूच्यग्रं प्रतोदं तत्र चादधत् । सर्वमेतत् तथा दत्त्वा नृपो वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ३३ ॥ उस रथपर उन्होंने एक ऐसा चाबुक भी रख दिया, जिसमें आगेकी ओर तीन दण्ड थे और जिसका अग्रभाग सूईकी नोंकके समान तीखा था। यह सब सामान प्रस्तुत करके राजाने पूछा— ॥ ३३ ॥ भगवन् क्व रथो यातु ब्रवीतु भृगुनन्दन । यत्र वक्ष्यसि विप्रर्षे तत्र यास्यति ते रथः ॥ ३४ ॥ 'भगवन्! भृगुनन्दन! बताइये, यह रथ कहाँ जाय? ब्रह्मर्षे! आप जहाँ कहेंगे, वहीं आपका रथ चलेगा' ॥ ३४ ॥ एवमुक्तस्तु भगवान् प्रत्युवाचाथ तं नृपम् । इतः प्रभृति यातव्यं पदकं पदकं शनैः ॥ ३५ ॥ श्रमो मम यथा न स्यात् तथा मच्छन्दचारिणौ । सुसुखं चैव वोढव्यो जनः सर्वश्च पश्यतु ॥ ३६ ॥ राजाके ऐसा पूछनेपर भगवान् च्यवन मुनिने उनसे कहा—'यहाँसे तुम बहुत धीरे-धीरे एक-एक कदम उठाकर चलो। यह ध्यान रखो कि मुझे कष्ट न होने पाये। तुम दोनोंको मेरी मर्जीके अनुसार चलना होगा। तुमलोग इस प्रकार इस रथको ले चलो जिससे मुझे अधिक आराम मिले और सब लोग देखें ॥ ३५-३६ ॥ नोत्सार्याः पथिकाः केचित् तेभ्यो दास्ये वसु ह्यहम् । ब्राह्मणेभ्यश्च ये कामानर्थयिष्यन्ति मां पथि ॥ ३७ ॥ 'रास्तेसे किसी राहगीरको हटाना नहीं चाहिये, मैं उन सबको धन दूँगा। मार्गमें जो ब्राह्मण मुझसे जिस वस्तुकी प्रार्थना करेंगे मैं उनको वही वस्तु प्रदान करूँगा ॥ ३७ ॥ सर्वान् दास्याम्यशेषेण धनं रत्नानि चैव हि । क्रियतां निखिलेनैतन्मा विचारय पार्थिव ॥ ३८ ॥ 'मैं सबको उनकी इच्छाके अनुसार धन और रत्न बाँटूँगा। अतः इन सबके लिये पूरा-पूरा प्रबन्ध कर लो। पृथ्वीनाथ! इसके लिये मनमें कोई विचार न करो' ॥ ३८ ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजा भृत्यांस्तथाब्रवीत् । यद् यद् ब्रूयान्मुनिस्तत्तत् सर्वं देयमशङ्कितैः ॥ ३९ ॥
मुनिका यह वचन सुनकर राजाने अपने सेवकोंसे कहा—'ये मुनि जिस-जिस वस्तुके लिये आज्ञा दें, वह सब निःशंक होकर देना' ॥ ३९ ॥
ततो रत्नान्यनेकानि स्त्रियो युग्यमजाविकम् ।
कृताकृतं च कनकं गजेन्द्राश्चाचलोपमाः ॥ ४० ॥
अन्वगच्छन्त तमृषिं राजामात्याश्च सर्वशः ।
हाहाभूतं च तत् सर्वमासीन्नगरमार्तवत् ॥ ४१ ॥
राजाकी इस आज्ञाके अनुसार नाना प्रकारके रत्न, स्त्रियाँ, वाहन, बकरे, भेड़ें, सोनेके अलंकार, सोना और पर्वतोपम गजराज—ये सब मुनिके पीछे-पीछे चले। राजाके सम्पूर्ण मन्त्री भी इन वस्तुओंके साथ थे। उस समय सारा नगर आर्त होकर हाहाकार कर रहा था ॥ ४०-४१ ॥
तौ तीक्ष्णाग्रेण सहसा प्रतोदेन प्रतोदितौ ।
पृष्ठे विद्धौ कटे चैव निर्विकारौ तमूहतुः ॥ ४२ ॥
इतनेहीमें मुनिने सहसा चाबुक उठाया और उन दोनोंकी पीठपर जोरसे प्रहार किया। उस चाबुकका अग्रभाग बड़ा तीखा था। उसकी करारी चोट पड़ते ही राजा-रानीकी पीठ और कमरमें घाव हो गया। फिर भी वे निर्विकारभावसे रथ ढोते रहे ॥ ४२ ॥
वेपमानौ निराहारौ पञ्चाशद्रात्रकर्षितौ ।
कथंचिदूहतुर्वीरौ दम्पती तं रथोत्तमम् ॥ ४३ ॥
पचास राततक उपवास करनेके कारण वे बहुत दुबले हो गये थे, उनका सारा शरीर काँप रहा था; तथापि वे वीर दम्पति किसी प्रकार साहस करके उस विशाल रथका बोझ ढो रहे थे ॥ ४३ ॥
बहुशो भृशविद्धौ तौ स्रवन्तौ च क्षतोद्भवम् ।
ददृशाते महाराज पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ ४४ ॥
महाराज! वे दोनों बहुत घायल हो गये थे। उनकी पीठपर जो अनेक घाव हो गये थे, उनसे रक्त बह रहा था। खूनसे लथपथ होनेके कारण वे खिले हुए पलाशके फूलोंके समान दिखायी देते थे ॥ ४४ ॥
तौ दृष्ट्वा पौरवर्गस्तु भृशं शोकसमाकुलः ।
अभिशापभयत्रस्तो न च किंचिदुवाच ह ॥ ४५ ॥
पुरवासियोंका समुदाय उन दोनोंकी यह दुर्दशा देखकर शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो रहा था। सब लोग मुनिके शापसे डरते थे; इसलिये कोई कुछ बोल नहीं रहा था ॥ ४५ ॥
द्वन्द्वशश्चाब्रुवन् सर्वे पश्यध्वं तपसो बलम् ।
क्रुद्धा अपि मुनिश्रेष्ठं वीक्षितुं नेह शक्नुमः ॥ ४६ ॥
दो-दो आदमी अलग-अलग खड़े होकर आपसमें कहने लगे—'भाइयो! सब लोग मुनिकी तपस्याका बल तो देखो, हमलोग क्रोधमें भरे हुए हैं तो भी मुनिश्रेष्ठकी ओर यहाँ
आँख उठाकर देख भी नहीं सकते ॥ ४६ ॥ अहो भगवतो वीर्यं महर्षेर्भावितात्मनः । राज्ञश्चापि सभार्यस्य धैर्यं पश्यत यादृशम् ॥ ४७ ॥ 'इन विशुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षि भगवान् च्यवनकी तपस्याका बल अद्भुत है। तथा महाराज और महारानीका धैर्य भी कैसा अनूठा है। यह अपनी आँखों देख लो ॥ ४७ ॥ श्रान्तावपि हि कृच्छ्रेण रथमेनं समूहतुः । न चैतयोर्विकारं वै ददर्श भृगुनन्दनः ॥ ४८ ॥ 'ये इतने थके होनेपर भी कष्ट उठाकर इस रथको खींचे जा रहे हैं। भृगुनन्दन च्यवन अभीतक इनमें कोई विकार नहीं देख सके हैं' ॥ ४८ ॥
भीष्म उवाच
ततः स निर्विकारौ तु दृष्ट्वा भृगुकुलोद्वहः । वसु विश्राणयामास यथा वैश्रवणस्तथा ॥ ४९ ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! भृगुकुलशिरोमणि मुनिवर च्यवनने जब इतनेपर भी राजा और रानीके मनमें कोई विकार नहीं देखा तब वे कुबेरकी तरह उनका सारा धन लुटाने लगे ॥ ४९ ॥ तत्रापि राजा प्रीतात्मा यथादिष्टमथाकरोत् । ततोऽस्य भगवान् प्रीतो बभूव मुनिसत्तमः ॥ ५० ॥ परंतु इस कार्यमें भी राजा कुशिक बड़ी प्रसन्नताके साथ ऋषिकी आज्ञाका पालन करने लगे। इससे मुनिश्रेष्ठ भगवान् च्यवन बहुत संतुष्ट हुए ॥ ५० ॥ अवतीर्य रथश्रेष्ठाद् दम्पती तौ मुमोच ह । विमोच्य चैतौ विधिवत् ततो वाक्यमुवाच ह ॥ ५१ ॥ उस उत्तम रथसे उतरकर उन्होंने दोनों पति-पत्नीको भार ढोनेके कार्यसे मुक्त कर दिया। मुक्त करके इन दोनोंसे विधिपूर्वक वार्तालाप किया ॥ ५१ ॥ स्निग्धगम्भीरया वाचा भार्गवः सुप्रसन्नया । ददानि वां वरं श्रेष्ठं तं ब्रूतामिति भारत ॥ ५२ ॥ भारत! भृगुपुत्र च्यवन उस समय स्नेह और प्रसन्नतासे युक्त गम्भीर वाणीमें बोले—'मैं तुम दोनोंको उत्तम वर देना चाहता हूँ, बतलाओ क्या दूँ?' ॥ ५२ ॥ सुकुमारौ च तौ विद्धौ कराभ्यां मुनिसत्तमः । पस्पर्शामृतकल्पाभ्यां स्नेहाद् भरतसत्तम ॥ ५३ ॥ भरतभूषण! यह कहते-कहते मुनिश्रेष्ठ च्यवन चाबुकसे घायल हुए उन दोनों सुकुमार राजदम्पतिकी पीठपर स्नेहवश अमृतके समान कोमल हाथ फेरने लगे ॥ ५३ ॥ अथाब्रवीन्नृपो वाक्यं श्रमो नास्त्यावयोरिह ।
विश्रान्तौ च प्रभावात् ते ऊचतुस्तौ तु भार्गवम् ॥ ५४ ॥
अथ तौ भगवान् प्राह प्रहृष्टश्च्यवनस्तदा ।
न वृथा व्याहृतं पूर्वं यन्मया तद् भविष्यति ॥ ५५ ॥
उस समय राजाने भृगुपुत्र च्यवनसे कहा—'अब हम दोनोंको यहाँ तनिक भी थकावटका अनुभव नहीं हो रहा है। हम दोनों आपके प्रभावसे पूर्ण विश्राम-सुखका अनुभव करने लगे हैं।' जब दोनोंने इस प्रकार कहा, तब भगवान् च्यवन पुनः हर्षमें भरकर बोले—'मैंने पहले जो कुछ कहा है, वह व्यर्थ नहीं होगा, पूर्ण होकर ही रहेगा ॥ ५४-५५ ॥
रमणीयः समुद्देशो गंगातीरमिदं शुभम् ।
किंचित्कालं व्रतपरो निवत्स्यामीह पार्थिव ॥ ५६ ॥
'पृथ्वीनाथ! यह गंगाका सुन्दर तट बड़ा ही रमणीय स्थान है। मैं कुछ कालतक व्रतपरायण होकर यहीं रहूँगा ॥ ५६ ॥
गम्यतां स्वपुरं पुत्र विश्रान्तः पुनरेष्यसि ।
इहस्थं मां सभार्यस्त्वं द्रष्टासि श्वो नराधिप ॥ ५७ ॥
'बेटा! इस समय तुम अपने नगरमें जाओ और अपनी थकावट दूर करके कल सबेरे अपनी पत्नीके साथ फिर यहाँ आना। नरेश्वर! कल पत्नीसहित तुम मुझे यहीं देखोगे ॥ ५७ ॥
न च मन्युस्त्वया कार्यः श्रेयस्ते समुपस्थितम् ।
यत् काङ्क्षितं हृदिस्थं ते तत् सर्वं हि भविष्यति ॥ ५८ ॥
'तुम्हें अपने मनमें खेद नहीं करना चाहिये। अब तुम्हारे कल्याणका समय उपस्थित हुआ है। तुम्हारे मनमें जो-जो अभिलाषा होगी वह सब पूर्ण हो जायगी' ॥ ५८ ॥
इत्येवमुक्तः कुशिकः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
प्रोवाच मुनिशार्दूलमिदं वचनमर्थवत् ॥ ५९ ॥
न मे मन्युर्महाभाग पूतौ स्वो भगवंस्त्वया ।
संवृत्तौ यौवनस्थौ स्वो वपुष्मन्तौ बलान्वितौ ॥ ६० ॥
मुनिके ऐसा कहनेपर राजा कुशिकने मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न होकर उन मुनिश्रेष्ठसे यह अर्थयुक्त वचन कहा—'भगवन्! महाभाग! आपने हमलोगोंको पवित्र कर दिया। हमारे मनमें तनिक भी खेद या रोष नहीं है। हम दोनोंकी तरुण अवस्था हो गयी तथा हमारा शरीर सुन्दर और बलवान् हो गया ॥ ५९-६० ॥
प्रतोदेन व्रणा ये मे सभार्यस्य त्वया कृताः ।
तान् न पश्यामि गात्रेषु स्वस्थोऽस्मि सह भार्यया ॥ ६१ ॥
'आपने पत्नीसहित मेरे शरीरपर चाबुक मार-मारकर जो घावकर दिये थे, उन्हें भी अब मैं अपने अंगोंमें नहीं देख रहा हूँ। मैं पत्नीसहित पूर्ण स्वस्थ हूँ ॥ ६१ ॥
इमां च देवीं पश्यामि वपुषाप्सरसोपमाम् ।
श्रिया परमया युक्तां यथा दृष्टा पुरा मया ॥ ६२ ॥ 'मैं अपनी इन महारानीको परम उत्तम कान्तिसे युक्त तथा अप्सराके समान मनोहर देख रहा हूँ। ये पहले मुझे जैसी दिखायी देती थीं वैसी ही हो गयी हैं' ॥ ६२ ॥ तव प्रसादसंवृत्तमिदं सर्वं महामुने । नैतच्चित्रं तु भगवंस्त्वयि सत्यपराक्रम ॥ ६३ ॥ 'महामुने! यह सब आपके कृपाप्रसादसे सम्भव हुआ है। भगवन्! आप सत्यपराक्रमी हैं। आप-जैसे तपस्वियोंमें ऐसी शक्तिका होना आश्चर्यकी बात नहीं है' ॥ ६३ ॥ इत्युक्तः प्रत्युवाचैनं कुशिकं च्यवनस्तदा । आगच्छेथाः सभार्यश्च त्वमिहेति नराधिप ॥ ६४ ॥ उनके ऐसा कहनेपर मुनिवर च्यवन पुनः राजा कुशिकसे बोले—'नरेश्वर! तुम पुनः अपनी पत्नीके साथ कल यहाँ आना' ॥ ६४ ॥ इत्युक्तः समनुज्ञातो राजर्षिरभिवाद्य तम् । प्रययौ वपुषा युक्तो नगरं देवराजवत् ॥ ६५ ॥ महर्षिकी यह आज्ञा पाकर राजर्षि कुशिक उन्हें प्रणाम करके विदा ले देवराजके समान तेजस्वी शरीरसे युक्त हो अपने नगरकी ओर चल दिये ॥ ६५ ॥ तत एनमुपाजग्मुरमात्याः सपुरोहिताः । बलस्था गणिकायुक्ताः सर्वाः प्रकृतयस्तथा ॥ ६६ ॥ तदनन्तर उनके पीछे-पीछे मन्त्री, पुरोहित, सेनापति, नर्तकियाँ तथा समस्त प्रजावर्गके लोग चले ॥ ६६ ॥ तैर्वृतः कुशिको राजा श्रिया परमया ज्वलन् । प्रविवेश पुरं हृष्टः पूज्यमानोऽथ बन्दिभिः ॥ ६७ ॥ उनसे घिरे हुए राजा कुशिक उत्कृष्ट तेजसे प्रकाशित हो रहे थे। उन्होंने बड़े हर्षके साथ नगरमें प्रवेश किया। उस समय वन्दीजन उनके गुण गा रहे थे ॥ ६७ ॥ ततः प्रविश्य नगरं कृत्वा पौर्वाह्निकीः क्रियाः । भुक्त्वा सभार्यो रजनीमुवास स महाद्युतिः ॥ ६८ ॥ नगरमें प्रवेश करके उन्होंने पूर्वाह्नकालकी सम्पूर्ण क्रियाएँ सम्पन्न कीं। फिर पत्नीसहित भोजन करके उन महातेजस्वी नरेशने रातको महलमें निवास किया ॥ ६८ ॥ ततस्तु तौ नवमभिवीक्ष्य यौवनं परस्परं विगतरुजाविवामरौ । ननन्दतुः शयनगतौ वपुर्धरौ श्रिया युतौ द्विजवरदत्तया तदा ॥ ६९ ॥ वे दोनों पति-पत्नी नीरोग देवताओंके समान दिखायी देते थे। वे एक दूसरेके शरीरमें नयी जवानीका प्रवेश हुआ देखकर शय्यापर सोये-सोये बड़े आनन्दका अनुभव करने लगे।
द्विजश्रेष्ठ च्यवनकी दी हुई उत्तम शोभासे सम्पन्न नूतन शरीर धारण किये वे दोनों दम्पति बहुत प्रसन्न थे॥ ६९॥
अथाप्यृषिर्भृगुकुलकीर्तिवर्धन- स्तपोधनो वनमभिराममृद्धिमत् । मनीषया बहुविधरत्नभूषितं ससर्ज यन्न पुरि शतक्रतोरपि ॥ ७० ॥
इधर भृगुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले, तपस्याके धनी महर्षि च्यवनने गंगातटके तपोवनको अपने संकल्पद्वारा नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित करके समृद्धिशाली एवं नयनाभिराम बना दिया। वैसा कमनीय कानन इन्द्रपुरी अमरावतीमें भी नहीं था॥ ७०॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनकुशिकसंवादे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५३॥
अध्याय (पृष्ठ 537)
चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना
भीष्म उवाच
ततः स राजा रात्र्यन्ते प्रतिबुद्धो महामनाः ।
कृतपूर्वाह्निकः प्रायात् सभार्यस्तद् वनं प्रति ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तत्पश्चात् रात्रि व्यतीत होनेपर महामना राजा कुशिक जागे और पूर्वाह्नकालके नैत्यिक नियमोंसे निवृत्त होकर अपनी रानीके साथ उस तपोवनकी ओर चल दिये ॥ १ ॥
ततो ददर्श नृपतिः प्रासादं सर्वकाञ्चनम् ।
मणिस्तम्भसहस्राढ्यं गन्धर्वनगरोपमम् ॥ २ ॥
वहाँ पहुँचकर नरेशने एक सुन्दर महल देखा, जो सारा-का-सारा सोनेका बना हुआ था। उसमें मणियोंके हजारों खम्भे लगे हुए थे और वह अपनी शोभासे गन्धर्वनगरके समान जान पड़ता था ॥ २ ॥
तत्र दिव्यानभिप्रायान् ददर्श कुशिकस्तदा ।
पर्वतान् रूप्यसानूंश्च नलिनीश्च सपङ्कजाः ॥ ३ ॥
चित्रशालाश्च विविधास्तोरणानि च भारत ।
शाद्वलोपचितां भूमिं तथा काञ्चनकुट्टिमाम् ॥ ४ ॥
भारत! उस समय राजा कुशिकने वहाँ शिल्पियोंके अभिप्रायके अनुसार निर्मित और भी बहुत-से दिव्य पदार्थ देखे। कहीं चाँदीके शिखरोंसे सुशोभित पर्वत, कहीं कमलोंसे भरे सरोवर, कहीं भाँति-भाँतिकी चित्रशालाएँ तथा तोरण शोभा पा रहे थे। भूमिपर कहीं सोनेसे मढ़ा हुआ पक्का फर्श और कहीं हरी-हरी घासकी बहार थी ॥
सहकारान् प्रफुल्लांश्च केतकोद्दालकान् वरान् ।
अशोकान् सहकुन्दांश्च फुल्लांश्चैवातिमुक्तकान् ॥ ५ ॥
चम्पकांस्तिलकान् भव्यान् पनसान् वञ्जुलानपि ।
पुष्पितान् कर्णिकारांश्च तत्र तत्र ददर्श ह ॥ ६ ॥
अमराइयोंमें बौर लगे थे। जहाँ-तहाँ केतक, उद्दालक, अशोक, कुन्द, अतिमुक्तक, चम्पा, तिलक, कटहल, बेंत और कनेर आदिके सुन्दर वृक्ष खिले हुए थे। राजा और रानीने उन सबको देखा ॥ ५-६ ॥
श्यामान् वारणपुष्पांश्च तथाष्टपदिका लताः । तत्र तत्र परिक्लृप्ता ददर्श स महीपतिः ॥ ७ ॥ राजाने विभिन्न स्थानोंमें निर्मित श्याम तमाल, वारणपुष्प तथा अष्टपदिका लताओंका दर्शन किया ॥ ७ ॥
रम्यान् पङ्कजोत्पलधरान् सर्वर्तुकुसुमांस्तथा । विमानप्रतिमांश्चापि प्रासादान् शैलसंनिभान् ॥ ८ ॥ कहीं कमल और उत्पलसे भरे हुए रमणीय सरोवर शोभा पाते थे। कहीं पर्वत-सदृश ऊँचे-ऊँचे महल दिखायी देते थे जो विमानके आकारमें बने हुए थे। वहाँ सभी ऋतुओंके फूल खिले हुए थे ॥ ८ ॥
शीतलानि च तोयानि क्वचिदुष्णानि भारत । आसनानि विचित्राणि शयनप्रवराणि च ॥ ९ ॥ भरतनन्दन! कहीं शीतल जल थे तो कहीं उष्ण, उन महलोंमें विचित्र आसन और उत्तमोत्तम शय्याएँ बिछी हुई थीं ॥ ९ ॥
पर्यङ्कान् रत्नसौवर्णान् परार्घ्यास्तरणावृतान् । भक्ष्यं भोज्यमनन्तं च तत्र तत्रोपकल्पितम् ॥ १० ॥ सोनेके बने हुए रत्नजटित पलंगोंपर बहुमूल्य बिछौने बिछे हुए थे। विभिन्न स्थानोंमें अनन्त भक्ष्य, भोज्य पदार्थ रखे गये थे ॥ १० ॥
वाणीवादान् शुकांश्चैव सारिकान् भृङ्गराजकान् । कोकिलान् शतपत्रांश्च सकोयष्टिककुक्कुभान् ॥ ११ ॥ मयूरान् कुक्कुटांश्चापि दात्यूहान् जीवजीवकान् । चकोरान् वानरान् हंसान् सारसांश्चक्रसाह्वयान् ॥ १२ ॥ समन्ततः प्रमुदितान् ददर्श सुमनोहरान् । राजाने देखा, मनुष्योंकी-सी वाणी बोलनेवाले तोते और सारिकाएँ चहक रही हैं। भृंगराज, कोयल, शतपत्र, कोयष्टि, कुक्कुभ, मोर, मुर्गे, दात्यूह, जीवजीवक, चकोर, वानर, हंस, सारस और चक्रवाक आदि मनोहर पशु-पक्षी चारों ओर सानन्द विचर रहे हैं ॥ ११-१२½ ॥
क्वचिदप्सरसां संघान् गन्धर्वाणां च पार्थिव ॥ १३ ॥ कान्ताभिरपरांस्तत्र परिष्वक्तान् ददर्श ह । न ददर्श च तान् भूयो ददर्श च पुनर्नृपः ॥ १४ ॥ पृथ्वीनाथ! कहीं झुंड-की-झुंड अप्सराएँ विहार कर रही थीं। कहीं गन्धर्वोंके समुदाय अपनी प्रियतमाओंके आलिंगन-पाशमें बँधे हुए थे। उन सबको राजाने देखा। वे कभी उन्हें देख पाते थे और कभी नहीं देख पाते थे ॥ १३-१४ ॥
गीतध्वनिं सुमधुरं तथैवाध्यापनध्वनिम् ।
हंसान् सुमधुरांश्चापि तत्र शुश्राव पार्थिवः ।। १५ ।। राजा कभी संगीतकी मधुर ध्वनि सुनते, कभी वेदोंके स्वाध्यायका गम्भीर घोष उनके कानोंमें पड़ता और कभी हंसोंकी मीठी वाणी उन्हें सुनायी देती थी ।। १५ ।।
तं दृष्ट्वात्यद्भुतं राजा मनसाचिन्तयत् तदा । स्वप्नोऽयं चित्तविभ्रंश उताहो सत्यमेव तु ।। १६ ।। उस अति अद्भुत दृश्यको देखकर राजा मन-ही-मन सोचने लगे—'अहो! यह स्वप्न है या मेरे चित्तमें भ्रम हो गया है अथवा यह सब कुछ सत्य ही है ।। १६ ।।
अहो सह शरीरेण प्राप्तोऽस्मि परमां गतिम् । उत्तरान् वा कुरून् पुण्यानथवाप्यमरावतीम् ।। १७ ।। 'अहो! क्या मैं इसी शरीरसे परम गतिको प्राप्त हो गया हूँ अथवा पुण्यमय उत्तरकुरु या अमरावतीपुरीमें-आ पहुँचा हूँ ।। १७ ।।
किंचेदं महदाश्चर्यं सम्पश्यामीत्यचिन्तयत् । एवं संचिन्तयन्नेव ददर्श मुनिपुंगवम् ।। १८ ।। 'यह महान् आश्चर्यकी बात जो मुझे दिखायी दे रही है, क्या है?' इस तरह वे बारंबार विचार करने लगे। राजा इस प्रकार सोच ही रहे थे कि उनकी दृष्टि मुनिप्रवर च्यवनपर पड़ी ।। १८ ।।
तस्मिन् विमाने सौवर्णे मणिस्तम्भसमाकुले । महार्हे शयने दिव्ये शयानं भृगुनन्दनम् ।। १९ ।। मणिमय खम्भोंसे युक्त सुवर्णमय विमानके भीतर बहुमूल्य दिव्य पर्यंकपर वे भृगुनन्दन च्यवन लेटे हुए थे ।।
तमभ्ययात् प्रहर्षेण नरेन्द्रः सह भार्यया । अन्तर्हितस्ततो भूयश्च्यवनः शयनं च तत् ।। २० ।। उन्हें देखते ही पत्नीसहित महाराज कुशिक बड़े हर्षके साथ आगे बढ़े। इतनेहीमें फिर महर्षि च्यवन अन्तर्धान हो गये। साथ ही उनका वह पलंग भी अदृश्य हो गया ।। २० ।।
ततोऽन्यस्मिन् वनोद्देशे पुनरेव ददर्श तम् । कौश्यां बृस्यां समासीनं जपमानं महाव्रतम् ।। २१ ।। तदनन्तर वनके दूसरे प्रदेशमें राजाने फिर उन्हें देखा, उस समय वे महान् व्रतधारी महर्षि कुशकी चटाईपर बैठकर जप कर रहे थे ।। २१ ।।
एवं योगबलाद् विप्रो मोहयामास पार्थिवम् । क्षणेन तद् वनं चैव ते चैवाप्सरसां गणाः ।। २२ ।। गन्धर्वाः पादपाश्चैव सर्वमन्तरधीयत । निःशब्दमभवच्चापि गंगाकूलं पुनर्नृप ।। २३ ।।
इस प्रकार ब्रह्मर्षि च्यवनने अपनी योगशक्तिसे राजा कुशिकको मोहमें डाल दिया। एक ही क्षणमें वह वन, वे अप्सराओंके समुदाय, गन्धर्व और वृक्ष सब-के-सब अदृश्य हो गये। नरेश्वर! गंगाका वह तट पुनः शब्द-रहित हो गया ॥ २२-२३ ॥ कुशवल्मीकभूयिष्ठं बभूव च यथा पुरा । ततः स राजा कुशिकः सभार्यस्तेन कर्मणा ॥ २४ ॥ विस्मयं परमं प्राप्तस्तद् दृष्ट्वा महदद्भुतम् । ततः प्रोवाच कुशिको भार्यां हर्षसमन्वितः ॥ २५ ॥ वहाँ पहलेके ही समान कुश और बाँबीकी अधिकता हो गयी। तत्पश्चात् पत्नीसहित राजा कुशिक ऋषिका वह महान् अद्भुत प्रभाव देखकर उनके उस कार्यसे बड़े विस्मयको प्राप्त हुए। इसके बाद हर्षमग्न हुए कुशिकने अपनी पत्नीसे कहा— ॥ २४-२५ ॥ पश्य भद्रे यथा भावाश्चित्रा दृष्टाः सुदुर्लभाः । प्रसादाद् भृगुमुख्यस्य किमन्यत्र तपोबलात् ॥ २६ ॥ ‘कल्याणी! देखो, हमने भृगुकुलतिलक च्यवन मुनिकी कृपासे कैसे-कैसे अद्भुत और परम दुर्लभ पदार्थ देखे हैं। भला, तपोबलसे बढ़कर और कौन-सा बल है? ॥ तपसा तदवाप्यं हि यत् तु शक्यं मनोरथैः । त्रैलोक्यराज्यादपि हि तप एव विशिष्यते ॥ २७ ॥ ‘जिसकी मनके द्वारा कल्पना मात्र की जा सकती है, वह वस्तु तपस्यासे साक्षात् सुलभ हो जाती है। त्रिलोकीके राज्यसे भी तप ही श्रेष्ठ है ॥ २७ ॥ तपसा हि सुतप्तेन शक्यो मोक्षस्तपोबलात् । अहो प्रभावो ब्रह्मर्षेश्च्यवनस्य महात्मनः ॥ २८ ॥ ‘अच्छी तरह तपस्या करनेपर उसकी शक्तिसे मोक्षतक मिल सकता है। इन ब्रह्मर्षि महात्मा च्यवनका प्रभाव अद्भुत है ॥ २८ ॥ इच्छयैष तपोवीर्यादन्याँल्लोकान् सृजेदपि । ब्राह्मणा एव जायेरन् पुण्यवाग्बुद्धिकर्मणः ॥ २९ ॥ ‘ये इच्छा करते ही अपनी तपस्याकी शक्तिसे दूसरे लोकोंकी सृष्टि कर सकते हैं। इस पृथ्वीपर ब्राह्मण ही पवित्रवाक्, पवित्रबुद्धि और पवित्र कर्मवाले होते हैं ॥ उत्सहेदिह कृत्वैव कोऽन्यो वै च्यवनादृते । ब्राह्मण्यं दुर्लभं लोके राज्यं हि सुलभं नरैः ॥ ३० ॥ ‘महर्षि च्यवनके सिवा दूसरा कौन है, जो ऐसा महान् कार्य कर सके? संसारमें मनुष्योंको राज्य तो सुलभ हो सकता है, परंतु वास्तविक ब्राह्मणत्व परम दुर्लभ है ॥ ३० ॥ ब्राह्मण्यस्य प्रभावाद्धि रथे युक्तौ स्वधुर्यवत् । इत्येवं चिन्तयानः स विदितश्च्यवनस्य वै ॥ ३१ ॥
‘ब्राह्मणत्वके प्रभावसे ही महर्षिने हम दोनोंको अपने वाहनोंकी भाँति रथमें जोत दिया था।’ इस तरह राजा सोच-विचार कर ही रहे थे कि महर्षि च्यवनको उनका आना ज्ञात हो गया ॥ ३१ ॥ सम्प्रेक्ष्योवाच नृपतिं क्षिप्रमागम्यतामिति । इत्युक्तः सहभार्यस्तु सोऽभ्यगच्छन्महामुनिम् ॥ ३२ ॥ शिरसा वन्दनीयं तमवन्दत च पार्थिवः । उन्होंने राजाकी ओर देखकर कहा—‘भूपाल! शीघ्र यहाँ आओ।’ उनके इस प्रकार आदेश देनेपर पत्नीसहित राजा उनके पास गये तथा उन वन्दनीय महामुनिको उन्होंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया ॥ तस्याशिषः प्रयुज्याथ स मुनिस्तं नराधिपम् ॥ ३३ ॥ निषीदेत्यब्रवीद् धीमान् सान्त्वयन् पुरुषर्षभः । तब उन पुरुषप्रवर बुद्धिमान् मुनिने राजाको आशीर्वाद देकर सान्त्वना प्रदान करते हुए कहा—‘आओ बैठो’ ॥ ३३ १/२ ॥ ततः प्रकृतिमापन्नो भार्गवो नृपते नृपम् ॥ ३४ ॥ उवाच श्लक्ष्णया वाचा तर्पयन्निव भारत । भरतवंशी नरेश! तदनन्तर स्वस्थ होकर भृगुपुत्र च्यवन मुनि अपनी स्निग्ध मधुर वाणीद्वारा राजाको तृप्त करते हुए-से बोले— ॥ ३४ १/२ ॥ राजन् सम्यग् जितानीह पञ्च पञ्च स्वयं त्वया ॥ ३५ ॥ मनःषष्ठानीन्द्रियाणि कृच्छ्रान्मुक्तोऽसि तेन वै । ‘राजन्! तुमने पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों और छठे मनको अच्छी तरह जीत लिया है। इसीलिये तुम महान् संकटसे मुक्त हुए हो ॥ ३५ १/२ ॥ सम्यगाराधितः पुत्र त्वया प्रवदतां वर ॥ ३६ ॥ न हि ते वृजिनं किंचित् सुसूक्ष्ममपि विद्यते । ‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ पुत्र! तुमने भलीभाँति मेरी आराधना की है। तुम्हारे द्वारा कोई छोटे-से-छोटा या सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अपराध भी नहीं हुआ है ॥ ३६ १/२ ॥ अनुजानीहि मां राजन् गमिष्यामि यथागतम् ॥ ३७ ॥ प्रीतोऽस्मि तव राजेन्द्र वरश्च प्रतिगृह्यताम् । ‘राजन्! अब मुझे विदा दो। मैं जैसे आया था, वैसे ही लौट जाऊँगा। राजेन्द्र! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ; अतः तुम कोई वर माँगो’ ॥ ३७ १/२ ॥
कुशिक उवाच
अग्निमध्ये गतेनेव भगवन् संनिधौ मया ॥ ३८ ॥
वर्तितं भृगुशार्दूल यन्न दग्धोऽस्मि तद् बहु ।
एष एव वरो मुख्यः प्राप्तो मे भृगुनन्दन ॥ ३९ ॥
कुशिक बोले— भगवन्! भृगुश्रेष्ठ! मैं आपके निकट उसी प्रकार रहा हूँ, जैसे कोई प्रज्वलित अग्निके बीचमें खड़ा हो। उस अवस्थामें रहकर भी मैं जलकर भस्म नहीं हुआ, यही मेरे लिये बहुत बड़ी बात है। भृगुनन्दन! यही मैंने महान् वर प्राप्त कर लिया ।।
यत् प्रीतोऽसि मया ब्रह्मन् कुलं त्रातं च मेऽनघ ।
एष मेऽनुग्रहो विप्र जीविते च प्रयोजनम् ॥ ४० ॥
निष्पाप ब्रह्मर्षे! आप जो प्रसन्न हुए हैं तथा आपने जो मेरे कुलको नष्ट होनेसे बचा दिया, यही मुझपर आपका भारी अनुग्रह है। और इतनेसे ही मेरे जीवनका सारा प्रयोजन सफल हो गया ।। ४० ।।
एतद् राज्यफलं चैव तपसश्च फलं मम ।
यदि त्वं प्रीतिमान् विप्र मयि वै भृगुनन्दन ॥ ४१ ॥
अस्ति मे संशयः कश्चित् तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ४२ ॥
भृगुनन्दन! यही मेरे राज्यका और यही मेरी तपस्याका भी फल है। विप्रवर! यदि आपका मुझपर प्रेम हो तो मेरे मनमें एक संदेह है, उसका समाधान करनेकी कृपा करें ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनकुशिकसंवादे चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५४ ।।
अध्याय (पृष्ठ 544)
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
च्यवनका कुशिकके पूछनेपर उनके घरमें अपने निवासका कारण बताना और उन्हें वरदान देना
च्यवन उवाच
वरंश्च गृह्यतां मत्तो यश्च ते संशयो हृदि ।
तं प्रब्रूहि नरश्रेष्ठ सर्वं सम्पादयामि ते ॥ १ ॥
च्यवन बोले— नरश्रेष्ठ! तुम मुझसे वर भी माँग लो और तुम्हारे मनमें जो संदेह हो, उसे भी कहो। मैं तुम्हारा सब कार्य पूर्ण कर दूँगा ॥ १ ॥
कुशिक उवाच
यदि प्रीतोऽसि भगवंस्ततो मे वद भार्गव ।
कारणं श्रोतुमिच्छामि मद्गृहे वासकारितम् ॥ २ ॥
कुशिकने कहा— भगवन्! भृगुनन्दन! यदि आप मुझपर प्रसन्न हों तो मुझे यह बताइये कि आपने इतने दिनोंतक मेरे घरपर क्यों निवास किया था? मैं इसका कारण सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥
शयनं चैकपार्श्वेन दिवसानेकविंशतिम् ।
अकिंचिदुक्त्वा गमनं बहिश्च मुनिपुंगव ॥ ३ ॥
अन्तर्धानमकस्माच्च पुनरेव च दर्शनम् ।
पुनश्च शयनं विप्र दिवसानेकविंशतिम् ॥ ४ ॥
तैलाभ्यक्तस्य गमनं भोजनं च गृहे मम ।
समुपानीय विविधं यद् दग्धं जातवेदसा ॥ ५ ॥
निर्याणं च रथेनाशु सहसा यत् कृतं त्वया ।
धनानां च विसर्गस्य वनस्यापि च दर्शनम् ॥ ६ ॥
प्रासादानां बहूनां च काञ्चनानां महामुने ।
मणिविद्रुपादानां पर्यङ्काणां च दर्शनम् ॥ ७ ॥
पुनश्चादर्शनं तस्य श्रोतुमिच्छामि कारणम् ।
अतीव ह्यत्र मुह्यामि चिन्तयानो भृगूद्वह ॥ ८ ॥
मुनिपुंगव! इक्कीस दिनोंतक एक करवटसे सोते रहना, फिर उठनेपर बिना कुछ बोले बाहर चल देना, सहसा अन्तर्धान हो जाना, पुनः दर्शन देना, फिर इक्कीस दिनोंतक दूसरी करवटसे सोते रहना, उठनेपर तेलकी मालिश कराना, मालिश कराकर चल देना, पुनः मेरे महलमें जाकर नाना प्रकारके भोजनको एकत्र करना और उसमें आग लगाकर जला देना,
फिर सहसा रथपर सवार हो बाहर नगरकी यात्रा करना, धन लुटाना, दिव्य वनका दर्शन कराना, वहाँ बहुत-से सुवर्णमय महलोंको प्रकट करना, मणि और मूँगोंके पायेवाले पलंगोंको दिखाना और अन्तमें सबको पुनः अदृश्य कर देना—महामुने! आपके इन कार्योंका यथार्थ कारण मैं सुनना चाहता हूँ। भृगुकुलरत्न! इस बातपर जब मैं विचार करने लगता हूँ तब मुझपर अत्यन्त मोह छा जाता है॥
न चैवात्राधिगच्छामि सर्वस्यास्य विनिश्चयम्।
एतदिच्छामि कात्स्न्येन सत्यं श्रोतुं तपोधन ॥ ९ ॥
तपोधन! इन सब बातोंपर विचार करके भी मैं किसी निश्चयपर नहीं पहुँच पाता हूँ, अतः इन बातोंको मैं पूर्ण एवं यथार्थ रूपसे सुनना चाहता हूँ॥ ९ ॥
च्यवन उवाच
शृणु सर्वमशेषेण यदिदं येन हेतुना।
न हि शक्यमनाख्यातुमेवं पृष्टेन पार्थिव ॥ १० ॥
च्यवनने कहा— भूपाल! जिस कारणसे मैंने यह सब कार्य किया था, वह सारा वृत्तान्त तुम पूर्णरूपसे सुनो। तुम्हारे इस प्रकार पूछनेपर मैं इस रहस्यको बताये बिना नहीं रह सकता॥ १० ॥
पितामहस्य वदतः पुरा देवसमागमे।
श्रुतवानस्मि यद् राजंस्तन्मे निगदतः शृणु ॥ ११ ॥
राजन्! पूर्वकालकी बात है, एक दिन देवताओंकी सभामें ब्रह्माजी एक बात कह रहे थे जिसे मैंने सुना था, उसे बता रहा हूँ, सुनो॥ ११ ॥
ब्रह्मक्षत्रविरोधेन भविता कुलसंकरः।
पौत्रस्ते भविता राजंस्तेजोवीर्यसमन्वितः ॥ १२ ॥
नरेश्वर! ब्रह्माजीने कहा था कि ब्राह्मण और क्षत्रियमें विरोध होनेके कारण दोनों कुलोंमें संकरता आ जायगी। (उन्हींके मुँहसे मैंने यह भी सुना था कि तुम्हारे वंशकी कन्यासे मेरे वंशमें क्षत्रिय तेजका संचार होगा और) तुम्हारा एक पौत्र ब्राह्मण-तेजसे सम्पन्न तथा पराक्रमी होगा॥ १२ ॥
ततस्ते कुलनाशार्थमहं त्वां समुपागतः।
चिकीर्षन् कुशिकोच्छेदं संदिधक्षुः कुलं तव ॥ १३ ॥
यह सुनकर मैं तुम्हारे कुलका विनाश करनेके लिये तुम्हारे यहाँ आया था। मैं कुशिकका मूलोच्छेद कर डालना चाहता था। मेरी प्रबल इच्छा थी कि तुम्हारे कुलको जलाकर भस्म कर डालूँ॥ १३ ॥
ततोऽहमागम्य पुरे त्वामवोचं महीपते।
नियमं कंचिदारप्स्ये शुश्रूषा क्रियतामिति ॥ १४ ॥
न च ते दुष्कृतं किंचिदहमासाद्यं गृहे । तेन जीवसि राजर्षे न भवेथास्त्वमन्यथा ॥ १५ ॥ भूपाल! इसी उद्देश्यसे तुम्हारे नगरमें आकर मैंने तुमसे कहा कि मैं एक व्रतका आरम्भ करूँगा। तुम मेरी सेवा करो (इसी अभिप्रायसे मैं तुम्हारा दोष ढूँढ़ रहा था); किंतु तुम्हारे घरमें रहकर भी मैंने आजतक तुममें कोई दोष नहीं पाया। राजर्षे! इसीलिये तुम जीवित हो, अन्यथा तुम्हारी सत्ता मिट गयी होती ॥ १४-१५ ॥ एवं बुद्धिं समास्थाय दिवसानेकविंशतिम् । सुप्तोऽस्मि यदि मां कश्चिद् बोधयेदिति पार्थिव ॥ १६ ॥ भूपते! यही विचार मनमें लेकर मैं इक्कीस दिनोंतक एक करवटसे सोता रहा कि कोई मुझे बीचमें आकर जगावे ॥ १६ ॥ यदा त्वया सभार्येण संसुप्तो न प्रबोधितः । अहं तदैव ते प्रीतो मनसा राजसत्तम ॥ १७ ॥ नृपश्रेष्ठ! जब पत्नीसहित तुमने मुझे सोते समय नहीं जगाया, तभी मैं तुम्हारे ऊपर मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुआ था ॥ १७ ॥ उत्थाय चास्मि निष्क्रान्तो यदि मां त्वं महीपते । पृच्छेः क्व यास्यसीत्येवं शपेयं त्वामिति प्रभो ॥ १८ ॥ भूपते! प्रभो! जिस समय मैं उठकर घरसे बाहर जाने लगा उस समय यदि तुम मुझसे पूछ देते कि 'कहाँ जाइयेगा' तो इतनेसे ही मैं तुम्हें शाप दे देता ॥ १८ ॥ अन्तर्हितः पुनश्चास्मि पुनरेव च ते गृहे । योगमास्थाय संसुप्तो दिवसानेकविंशतिम् ॥ १९ ॥ फिर मैं अन्तर्धान हुआ और पुनः तुम्हारे घरमें आकर योगका आश्रय ले इक्कीस दिनोंतक सोया ॥ क्षुधितौ मामसूयेथां श्रमाद् वेति नराधिप । एवं बुद्धिं समास्थाय कर्शितौ वां क्षुधा मया ॥ २० ॥ नरेश्वर! मैंने सोचा था कि तुम दोनों भूखसे पीड़ित होकर या परिश्रमसे थककर मेरी निन्दा करोगे। इसी उद्देश्यसे मैंने तुमलोगोंको भूखे रखकर क्लेश पहुँचाया ॥ २० ॥ न च तेऽभूत् सुसूक्ष्मोऽपि मन्युर्मनसि पार्थिव । सभार्यस्य नरश्रेष्ठ तेन ते प्रीतिमानहम् ॥ २१ ॥ भूपते! नरश्रेष्ठ! इतनेपर भी स्त्रीसहित तुम्हारे मनमें तनिक भी क्रोध नहीं हुआ। इससे मैं तुमलोगोंपर बहुत संतुष्ट हुआ ॥ २१ ॥ भोजनं च समानाय्य यत् तदा दीपितं मया । क्रुद्ध्येथा यदि मात्सर्यादिति तन्मर्षितं च मे ॥ २२ ॥
इसके बाद जो मैंने भोजन मँगाकर जला दिया, उसमें भी यही उद्देश्य छिपा था कि तुम डाहके कारण मुझपर क्रोध करोगे; परंतु मेरे उस बर्तावको भी तुमने सह लिया ॥ २२ ॥ ततोऽहं रथमारुह्य त्वामवोचं नराधिप । सभार्यो मां वहस्वेति तच्च त्वं कृतवांस्तथा ॥ २३ ॥ अविशङ्को नरपते प्रीतोऽहं चापि तेन ह । नरेन्द्र! इसके बाद मैं रथपर आरूढ़ होकर बोला, तुम स्त्रीसहित आकर मेरा रथ खींचो। नरेश्वर! इस कार्यको भी तुमने निःशंक होकर पूर्ण किया। इससे भी मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हुआ ॥ २३ १/२ ॥ धनोत्सर्गेऽपि च कृते न त्वां क्रोधः प्रधर्षयत् ॥ २४ ॥ ततः प्रीतेन ते राजन् पुनरेतत् कृतं तव । सभार्यस्य वनं भूयस्तद् विद्धि मनुजाधिप ॥ २५ ॥ प्रीत्यर्थं तव चैतन्मे स्वर्गसंदर्शनं कृतम् । फिर जब मैं तुम्हारा धन लुटाने लगा, उस समय भी तुम क्रोधके वशीभूत नहीं हुए। इन सब बातोंसे मुझे तुम्हारे ऊपर बड़ी प्रसन्नता हुई। राजन्! मनुजेश्वर! अतः मैंने पत्नीसहित तुम्हें संतुष्ट करनेके लिये ही इस वनमें स्वर्गका दर्शन कराया है। पुनः यह सब कार्य करनेका उद्देश्य तुम्हें प्रसन्न करना ही था, इस बातको अच्छी तरह जान लो ॥ २४-२५ १/२ ॥ यत् ते वनेऽस्मिन् नृपते दृष्टं दिव्यं निदर्शनम् ॥ २६ ॥ स्वर्गोद्देशस्त्वया राजन् सशरीरेण पार्थिव । मुहूर्तमनुभूतोऽसौ सभार्येण नृपोत्तम ॥ २७ ॥ नरेश्वर! राजन्! इस वनमें तुमने जो दिव्य दृश्य देखे हैं, वह स्वर्गकी एक झाँकी थी। नृपश्रेष्ठ! भूपाल! तुमने अपनी रानीके साथ इसी शरीरसे कुछ देरतक स्वर्गीय सुखका अनुभव किया है ॥ २६-२७ ॥ निदर्शनार्थं तपसो धर्मस्य च नराधिप । तत्र याऽऽसीत् स्पृहा राजंस्तच्चापि विदितं मया ॥ २८ ॥ नरेश्वर! यह सब मैंने तुम्हें तप और धर्मका प्रभाव दिखलानेके लिये ही किया है। राजन्! इन सब बातोंको देखनेपर तुम्हारे मनमें जो इच्छा हुई है, वह भी मुझे ज्ञात हो चुकी है ॥ २८ ॥ ब्राह्मण्यं काङ्क्षसे हि त्वं तपश्च पृथिवीपते । अवमन्य नरेन्द्रत्वं देवेन्द्रत्वं च पार्थिव ॥ २९ ॥ पृथ्वीनाथ! तुम सम्राट् और देवराजके पदकी भी अवहेलना करके ब्राह्मणत्व पाना चाहते हो और तपकी भी अभिलाषा रखते हो ॥ २९ ॥ एवमेतद् यथाऽऽत्थ त्वं ब्राह्मण्यं तात दुर्लभम् । ब्राह्मणे सति चर्षित्वमृषित्वे च तपस्विता ॥ ३० ॥
तात! तप और ब्राह्मणत्वके सम्बन्धमें तुम जैसा उद्गार प्रकट कर रहे थे, वह बिलकुल ठीक है। वास्तवमें ब्राह्मणत्व दुर्लभ है। ब्राह्मण होनेपर भी ऋषि होना और ऋषि होनेपर भी तपस्वी होना तो और भी कठिन है ॥ ३० ॥
भविष्यत्येष ते कामः कुशिकात् कौशिको द्विजः ।
तृतीयं पुरुषं तुभ्यं ब्राह्मणत्वं गमिष्यति ॥ ३१ ॥
तुम्हारी यह इच्छा पूर्ण होगी। कुशिकसे कौशिक नामक ब्राह्मणवंश प्रचलित होगा तथा तुम्हारी तीसरी पीढ़ी ब्राह्मण हो जायगी ॥ ३१ ॥
वंशस्ते पार्थिवश्रेष्ठ भृगूणामेव तेजसा ।
पौत्रस्ते भविता विप्रस्तपस्वी पावकद्युतिः ॥ ३२ ॥
नृपश्रेष्ठ! भृगुवंशियोंके ही तेजसे तुम्हारा वंश ब्राह्मणत्वको प्राप्त होगा। तुम्हारा पौत्र अग्निके समान तेजस्वी और तपस्वी ब्राह्मण होगा ॥ ३२ ॥
यः स देवमनुष्याणां भयमुत्पादयिष्यति ।
त्रयाणामेव लोकानां सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ३३ ॥
तुम्हारा वह पौत्र अपने तपके प्रभावसे देवताओं, मनुष्यों तथा तीनों लोकोंके लिये भय उत्पन्न कर देगा। मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ ॥ ३३ ॥
वरं गृहाण राजर्षे यत् ते मनसि वर्तते ।
तीर्थयात्रां गमिष्यामि पुरा कालोऽभिवर्तते ॥ ३४ ॥
राजर्षे! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसे वरके रूपमें माँग लो। मैं तीर्थयात्राको जाऊँगा। अब देर हो रही है ॥ ३४ ॥
कुशिक उवाच
एष एव वरो मेऽद्य यस्त्वं प्रीतो महामुने ।
भवत्वेतद् यथाऽऽत्थ त्वं भवेत् पौत्रो ममानघ ॥ ३५ ॥
कुशिकने कहा— महामुने! आज आप प्रसन्न हैं, यही मेरे लिये बहुत बड़ा वर है। अनघ! आप जैसा कह रहे हैं, वह सत्य हो—मेरा पौत्र ब्राह्मण हो जाय ॥ ३५ ॥
ब्राह्मण्यं मे कुलस्यास्तु भगवन्नेष मे वरः ।
पुनश्चाख्यातुमिच्छामि भगवन् विस्तरेण वै ॥ ३६ ॥
भगवन्! मेरा कुल ब्राह्मण हो जाय, यही मेरा अभीष्ट वर है। प्रभो! मैं इस विषयको पुनः विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ ॥ ३६ ॥
कथमेष्यति विप्रत्वं कुलं मे भृगुनन्दन ।
कश्चासौ भविता बन्धुर्मम कश्चापि सम्मतः ॥ ३७ ॥
भृगुनन्दन! मेरा कुल किस प्रकार ब्राह्मणत्वको प्राप्त होगा? मेरा वह बन्धु, वह सम्मानित पौत्र कौन होगा जो सर्वप्रथम ब्राह्मण होनेवाला है? ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनकुशिकसंवादो नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 550)
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
च्यवन ऋषिका भृगुवंशी और कुशिकवंशियोंके सम्बन्धका कारण बताकर तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान
च्यवन उवाच
अवश्यं कथनीयं मे तवैतन्नरपुंगव ।
यदर्थं त्वामहमुच्छेत्तुं सम्प्राप्तो मनुजाधिप ॥ १ ॥
**च्यवन कहते हैं—**नरपुंगव! मनुजेश्वर! मैं जिस उद्देश्यसे तुम्हारा मूलोच्छेद करनेके लिये यहाँ आया था, वह मुझे तुमसे अवश्य बता देना चाहिये ॥ १ ॥
भृगूणां क्षत्रिया याज्या नित्यमेतज्जनाधिप ।
ते च भेदं गमिष्यन्ति दैवयुक्तेन हेतुना ॥ २ ॥
क्षत्रियाश्च भृगून् सर्वान् वधिष्यन्ति नराधिप ।
आ गर्भादनुकृन्तन्तो दैवदण्डनिपीडिताः ॥ ३ ॥
जनेश्वर! क्षत्रियलोग सदासे ही भृगुवंशी ब्राह्मणोंके यजमान हैं; किंतु प्रारब्धवश आगे चलकर उनमें फूट हो जायगी। इसलिये वे दैवकी प्रेरणासे समस्त भृगुवंशियोंका संहार कर डालेंगे। नरेश्वर! वे दैवदण्डसे पीड़ित हो गर्भके बच्चेतकको काट डालेंगे ॥
तत उत्पत्स्यतेऽस्माकं कुले गोत्रविवर्धनः ।
ऊर्वो नाम महातेजा ज्वलनार्कसमद्युतिः ॥ ४ ॥
तदनन्तर मेरे वंशमें ऊर्व नामक एक महातेजस्वी बालक उत्पन्न होगा, जो भार्गव गोत्रकी वृद्धि करेगा। उसका तेज अग्नि और सूर्यके समान दुर्धर्ष होगा ॥ ४ ॥
स त्रैलोक्यविनाशाय कोपाग्निं जनयिष्यति ।
महीं सपर्वतवनां यः करिष्यति भस्मसात् ॥ ५ ॥
वह तीनों लोकोंका विनाश करनेके लिये क्रोधजनित अग्निकी सृष्टि करेगा। वह अग्नि पर्वतों और वनोंसहित सारी पृथ्वीको भस्म कर डालेगी ॥ ५ ॥
कंचित् कालं तु वह्निं च स एव शमयिष्यति ।
समुद्रे वडवावक्त्रे प्रक्षिप्य मुनिसत्तमः ॥ ६ ॥
कुछ कालके बाद मुनिश्रेष्ठ और्व ही उस अग्निको समुद्रमें स्थित हुई बड़वानलमें डालकर बुझा देंगे ॥ ६ ॥
पुत्रं तस्य महाराज ऋचीकं भृगुनन्दनम् ।
साक्षात् कृत्स्नो धनुर्वेदः समुपस्थास्यतेऽनघ ॥ ७ ॥