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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।

उमाने पूछा—प्रभो! कुछ मनुष्य सदा मुखके रोगसे व्यथित रहते हैं, दाँत, कण्ठ और

कपोलोंके रोगसे अत्यन्त कष्ट भोगते हैं, कुछ तो जन्मसे ही रोगी होते हैं और कुछ जन्म

लेनेके बाद कारणवश उन रोगोंके शिकार हो जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है?

यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि शृणु देवि समाहिता ।।

कुवक्तारस्तु ये देवि जिह्वया कटुकं भृशम् ।

असत्यं परुषं घोरं गुरून् प्रति परान् प्रति ।।

जिह्वाबाधां तदान्येषां कुर्वते कोपकारणात् ।

प्रायशोऽनृतभूयिष्ठा नराः कार्यवशेन वा ।।

तेषां जिह्वाप्रदेशस्था व्याधयः सम्भवन्ति ते ।।

श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! एकाग्रचित होकर सुनो, मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें सब कुछ

बताता हूँ। जो कुवाक्य बोलनेवाले मनुष्य अपनी जिह्वासे गुरुजनों या दूसरोंके प्रति अत्यन्त

कड़वे, झूठे, रूखे तथा घोर वचन बोलते हैं, जो क्रोधके कारण दूसरोंकी जीभ काट लेते हैं

अथवा जो कार्यवश प्रायः अधिकाधिक झूठ ही बोलते हैं, उनके जिह्वाप्रदेशमें ही रोग होते

हैं।।

कुश्रोतारस्तु ये चार्थं परेषां कर्णनाशकाः ।

कर्णरोगान् बहुविधाँल्लभन्ते ते पुनर्भावे ।।

जो परदोष और निन्दादियुक्त कुवचन सुनते हैं तथा जो दूसरोंके कानोंको हानि

पहुँचाते हैं, वे दूसरे जन्ममें कर्ण-सम्बन्धी नाना प्रकारके रोगोंका कष्ट भोगते हैं ।।

दन्तरोगशिरोरोगकर्णरोगास्तथैव च ।

अन्ये मुखाश्रिताः दोषाः सर्वे चात्मकृतं फलम् ।।

ऐसे ही लोगोंको दन्तरोग, शिरोरोग, कर्णरोग तथा अन्य सभी मुखसम्बन्धी दोष अपनी

करनीके फलरूपसे प्राप्त होते हैं ।।

उमोवाच

पीड्यन्ते सततं देव मानुषेष्वेव केचन ।

कुक्षिपक्षाश्रितैर्दोषैर्व्याधिभिश्चोदराश्रितैः ।।

उमाने पूछा—देव! मनुष्योंमें कुछ लोग सदा कुक्षि और पक्षसम्बन्धी दोषों तथा

उदरसम्बन्धी रोगोंसे पीड़ित रहते हैं ।।

तीक्ष्णशूलैश्च पीड्यन्ते नरा दुःखपरिप्लुताः ।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।

कुछ लोगोंके उदरमें तीखे शूल-से उठते हैं, जिनसे वे बहुत पीड़ित होते और दुःखमें डूब जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये॥

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि कामक्रोधवशा भृशम् ।
आत्मार्थमेव चाहारं भुञ्जन्ते निरपेक्षकाः ॥
अभक्ष्याहारदानैश्च विश्वस्तानां विषप्रदाः ।
अभक्ष्यभक्षदाश्चैव शौचमङ्गवर्जिताः ॥
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
कथंचित् प्राप्य मानुष्यं तत्र ते व्याधिपीडिताः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! पहले जो मनुष्य काम और क्रोधके अत्यन्त वशीभूत हो दूसरोंकी परवा न करके केवल अपने ही लिये आहार जुटाते और खाते हैं, अभक्ष्य भोजनका दान करते हैं, विश्वस्त मनुष्योंको जहर दे देते हैं, न खानेयोग्य वस्तुएँ खिला देते हैं, शौच और मंगलाचारसे रहित होते हैं; शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग पुनर्जन्म लेनेपर किसी तरह मानव-शरीरको पाकर उन्हीं रोगोंसे पीड़ित होते हैं॥
तैस्तैर्बहुविधाकारैर्व्याधिभिर्दुःखसंश्रिताः ।
भवन्त्येव तथा देवि यथा चैव कृतं पुरा ॥
देवि! नाना प्रकारके रूपवाले उन रोगोंसे पीड़ित हो वे दुःखमें निमग्न हो जाते हैं। पूर्वजन्ममें जैसा किया था वैसा भोगते हैं॥

उमोवाच

दृश्यन्ते सततं देव व्याधिभिर्मेहनाश्रितैः ।
पीड्यमानास्तथा मर्त्या अश्मरीशर्करादिभिः ॥
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा— देव! बहुत-से मनुष्य प्रमेहसम्बन्धी रोगोंसे पीड़ित देखे जाते हैं, कितने ही पथरी और शर्करा (पेशाबसे चीनी आना) आदि रोगोंके शिकार हो जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें॥

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि परदारप्रधर्षकाः ।
तिर्यग्योनिषु धूर्ता वै मैथुनार्थं चरन्ति च ॥
कामदोषेण ये धूर्ताः कन्यासु विधवासु च ।
बलात्कारेण गच्छन्ति रूपदर्पसमन्विताः ॥
तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने ।

यदि चेन्मानुषं जन्म लभेरंस्ते तथाविधाः ॥
मेहनस्थैस्ततो घोरैः पीड्यन्ते व्याधिभिः प्रिये ।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य पूर्वजन्ममें परायी स्त्रियोंका सतीत्व नष्ट करनेवाले होते हैं, जो धूर्त मानव पशुयोनिमें मैथुनके लिये चेष्टा करते हैं, रूपके घमंडमें भरे हुए जो धूर्त काम-दोषसे कुमारी कन्याओं और विधवाओंके साथ बलात्कार करते हैं, शोभने! ऐसे मनुष्य मृत्युके पश्चात् जब फिर जन्म लेते हैं, तब मनुष्ययोनिमें आनेके बाद वैसे ही रोगी होते हैं। प्रिये! वे प्रमेहसम्बन्धी भयंकर रोगोंसे पीड़ित रहते हैं ॥

उमोवाच

भगवन्-मानुषाः केचिद् दृश्यन्ते शोषिणः कृशाः ।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा— भगवन्! कुछ मनुष्य सुखारोग (जिसमें शरीर सूख जाता है) से पीड़ित एवं दुर्बल दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि मांसलुब्धाः सुलोलुपाः ।
आत्मार्थं स्वादुगृद्धाश्च परभोगोपतापिनः ॥
अभ्यसूयापराश्चापि परभोगेषु ये नराः ॥
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
शोषव्याधियुतास्तत्र नरा धमनिसंतताः ॥
भवन्त्येव नरा देवि पापकर्मोपभोगिनः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य मांसपर लुभाये रहते हैं, अत्यन्त लोलुप हैं, अपने लिये स्वादिष्ट भोजन चाहते हैं, दूसरोंकी भोगसामग्री देखकर जलते हैं तथा जो दूसरोंके भोगोंमें दोषद्रष्टि रखते हैं, शोभने! ऐसे आचारवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर सुखारोगसे पीड़ित हो इतने दुर्बल हो जाते हैं कि उनके शरीरमें फैली हुई नस-नाड़ियोंतक दिखायी देती हैं। देवि! वे पापकर्मोंका फल भोगनेवाले मनुष्य वैसे ही होते हैं ॥

उमोवाच

भगवन् मानुषाः केचित् क्लिश्यन्ते कुष्ठरोगिणः ।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा— भगवन्! कुछ मनुष्य कोढ़ी होकर कष्ट पाते हैं, यह किस कर्मविपाकका फल है? यह मुझे बताइये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि परेषां रूपनाशनाः ।

आघातवधबन्धैश्च वृथा दण्डेन मोहिताः ।।
इष्टनाशकरा ये तु अपथ्याहारदा नराः ।
चिकित्सका वा दुष्टाश्च द्वेषलोभसमन्विताः ।।
निर्दयाः प्राणिहिंसायां मलदाश्चित्तनाशनाः ।।
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
यदि वै मानुषं जन्म लभेरंस्तेषु दुःखिताः ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य पहले मोहवश आघात, वध, बन्धन तथा व्यर्थ दण्डके द्वारा दूसरोंके रूपका नाश करते हैं, किसीकी प्रिय वस्तु नष्ट कर देते हैं। चिकित्सक होकर दूसरोंको अपथ्य भोजन देते हैं, द्वेष और लोभके वशीभूत होकर दुष्टता करते हैं, प्राणियोंकी हिंसाके लिये निर्दय बन जाते हैं, मल देते और दूसरोंकी चेतनाका नाश करते हैं, शोभने! ऐसे आचरणवाले पुरुष पुनर्जन्मके समय यदि मनुष्य-जन्म पाते हैं तो मनुष्योंमें सदा दुःखी ही रहते हैं ।।
अत्र ते क्लेशसंयुक्ताः कुष्ठरोगशतैर्वृताः ।।
केचित् त्वग्दोषसंयुक्ता व्रणकुष्ठैश्च संयुताः ।
श्वित्रकुष्ठयुता वापि बहुधा कुष्ठसंयुताः ।।
भवन्त्येव नरा देवि यथा येन कृतं फलम् ।।
उस जन्ममें वे सैकड़ों कुष्ठ रोगोंसे घिरकर क्लेशसे पीड़ित होते हैं। कोई चर्मदोषसे युक्त होते हैं, कोई व्रणकुष्ठ (कोढ़के घाव) से पीड़ित होते हैं अथवा कोई सफेद कोढ़से लांछित दिखायी देते हैं। देवि! जिसने जैसा किया है उसके अनुसार फल पाकर वे सब मनुष्य नाना प्रकारके कुष्ठ रोगोंके शिकार हो जाते हैं ।।

उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचिदङ्गहीनाश्च पङ्गवः ।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
उमाने पूछा— भगवन्! किस कर्मके विपाकसे कुछ मनुष्य अंगहीन एवं पंगु हो जाते हैं, यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मनुजा देवि लोभमोहसमावृताः ।
प्राणिनां प्राणहिंसार्थमङ्गविघ्नं प्रकुर्वते ।।
शस्त्रेणोत्कृत्य वा देवि प्राणिनां चेष्टनाशकाः ।।
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
तदङ्गहीना वै प्रेत्य भवन्त्येव न संशयः ।।
स्वभावतो वा जाता वा पङ्गवस्ते भवन्ति वै ।।

श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य पहले लोभ और मोहसे आच्छादित होकर प्राणियोंके प्राणोंकी हिंसा करनेके लिये उनके अंग-भंग कर देते हैं, शस्त्रोंसे काटकर उन प्राणियोंको निश्चेष्ट बना देते हैं, शोभने! ऐसे आचारवाले पुरुष मरनेके बाद पुनर्जन्म लेनेपर अंगहीन होते हैं; इसमें संशय नहीं है। वे स्वभावतः पंगुरूपमें उत्पन्न होते हैं अथवा जन्म लेनेके बाद पंगु हो जाते हैं ।।

उमोवाच

भगवन् मानुषाः केचिद् ग्रन्थिभिः पिल्लकैस्तथा ।
क्लिश्यमानाः प्रदृश्यन्ते तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
उमाने पूछा— भगवन्! कुछ मनुष्य ग्रन्थि (गठिया), पिल्लक (फीलपाँव) आदि रोगोंसे कष्ट पाते देखे जाते हैं, इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि ग्रन्थिभेदकरा नृणाम् ।
मुष्टिप्रहारपरुषा नृशंसाः पापकारिणः ।।
पाटकास्तोटकाश्चैव शूलतुन्दास्तथैव च ।
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
ग्रन्थिभिः पिल्लकैश्चैव क्लिश्यन्ते भृशदुःखिताः ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य पहले लोगोंकी ग्रंथियोंका भेदन करनेवाले रहे हैं; जो मुष्टि-प्रहार करनेमें निर्दय, नृशंस, पापाचारी, तोड़-फोड़ करनेवाले और शूल चुभाकर पीड़ा देनेवाले रहे हैं, शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग फिर जन्म लेनेपर गठिया और फीलपाँवसे कष्ट पाते तथा अत्यन्त दुःखी होते हैं ।।

उमोवाच

भगवन् मानुषाः केचित् पादरोगसमन्विताः ।
दृश्यन्ते सततं देव तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
उमाने पूछा— भगवन्! देव! कुछ मनुष्य सदा पैरोंके रोगोंसे पीड़ित दिखायी देते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि क्रोधलोभसमन्विताः ।
मनुजा देवतास्थानं स्वपादैर्भ्रंशयन्त्युत ।।
जानुभिः पार्ष्णिभिश्चैव प्राणिहिंसां प्रकुर्वते ।।
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।
पादरोगैर्बहुविधैर्बाध्यन्ते श्वपदादिभिः ।।

श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य पहले क्रोध और लोभके वशीभूत होकर देवताके स्थानको अपने पैरोंसे भ्रष्ट करते, घुटनों और एड़ियोंसे मारकर प्राणियोंकी हिंसा करते हैं; शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग पुनर्जन्म लेनेपर श्वपद आदि नाना प्रकारके पाद-रोगोंसे पीड़ित होते हैं।।

उमोवाच भगवन् मानुषाः केचिद् दृश्यन्ते बहवो भुवि । वातजैः पित्तजै रोगैर्युगपत् संनिपातजैः ।। रोगैर्बहुविधैर्देव क्लिश्यमानाः सुदुःखिताः । उमाने पूछा— भगवन्! देव! इस भूतलपर कुछ ऐसे लोगोंकी बहुत बड़ी संख्या दिखायी देती है, जो वात, पित्त और कफजनित रोगोंसे तथा एक ही साथ इन तीनोंके संनिपातसे तथा दूसरे-दूसरे अनेक रोगोंसे कष्ट पाते हुए बहुत दुःखी रहते हैं ।। असमस्तैः समस्तैश्च आढ्या वा दुर्गतास्तथा ।। केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।। वे धनी हों या दरिद्र, पूर्वोक्त रोगोंमेंसे कुछके द्वारा अथवा समस्त रोगोंके द्वारा कष्ट पाते रहते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ।। ये पुरा मनुजा देवि त्वासुरं भावमाश्रिताः । स्ववशाः कोपनपरा गुरुविद्वेषिणस्तथा ।। परेषां दुःखजनका मनोवाक्कायकर्मभिः । छिन्दन् भिन्दंस्तुदन्नेव नित्यं प्राणिषु निर्दयाः ।। एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने । यदि वै मानुषं जन्म लभेरंस्ते तथाविधाः ।। श्रीमहेश्वरने कहा— कल्याणि! इसका कारण मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो। देवि! जो मनुष्य पूर्वजन्ममें असुरभावका आश्रय ले स्वच्छन्दचारी, क्रोधी और गुरुद्रोही हो जाते हैं, मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा दूसरोंको दुःख देते हैं, काटते, विदीर्ण करते और पीड़ा देते हुए सदा ही प्राणियोंके प्रति निर्दयता दिखाते हैं। शोभने! ऐसे आचरणवाले लोग पुनर्जन्मके समय यदि मनुष्य-जन्म पाते हैं तो वे वैसे ही होते हैं ।। तत्र ते बहुभिर्घोरैस्तप्यन्ते व्याधिभिः प्रिये ।। केचिच्च छर्दिसंयुक्ताः केचित्काससमन्विताः । ज्वरातिसारतृष्णाभिः पीड्यमानास्तथा परे ।। पादगुल्मैश्च बहुभिः श्लेष्मदोषसमन्विताः ।

पादरोगैश्च विविधैर्व्रणकुष्ठभगन्दरैः ॥ आढ्या वा दुर्गता वापि दृश्यन्ते व्याधिपीडिताः ॥ प्रिये! उस शरीरमें वे बहुतेरे भयंकर रोगोंसे संतप्त होते हैं। किसीको उलटी होती है तो कोई खाँसीसे कष्ट पाते हैं। दूसरे बहुत-से मनुष्य ज्वर, अतिसार और तृष्णासे पीड़ित रहते हैं। किन्हींको अनेक प्रकारके पादगुल्म सताते हैं। कुछ लोग कफदोषसे पीड़ित होते हैं। कितने ही नाना प्रकारके पादरोग, व्रणकुष्ठ और भगन्दर रोगोंसे रुग्ण रहते हैं। वे धनी हों या दरिद्र सब लोग रोगोंसे पीड़ित दिखायी देते हैं ॥ एवमात्मकृतं कर्म भुञ्जते तत्र तत्र ते । ग्रहीतुं न च शक्यं हि केनचिद्ध्यकृतं फलम् ॥ इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥ इस प्रकार उन-उन शरीरोंमें वे अपने किये हुए कर्मका ही फल भोगते हैं। कोई भी बिना किये हुए कर्मके फलको नहीं पा सकता। देवि! इस प्रकार यह विषय मैंने तुम्हें बताया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥

उमोवाच भगवन् देवदेवेश भूतपाल नमोऽस्तु ते । ह्रस्वाङ्गाश्चैव वक्राङ्गा कुब्जा वामनकास्तथा ॥ अपरे मानुषा देव दृश्यन्ते कुणिबाहवः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ **उमाने पूछा—**भगवन्! देवदेवेश्वर! भूतनाथ! आपको नमस्कार है। देव! दूसरे मनुष्य छोटे शरीरवाले, टेढ़े-मेढ़े अंगोंवाले, कुबड़े, बौने और लूले दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच ये पुरा मनुजा देवि लोभमोहसमन्विताः । धान्यमानान् विकुर्वन्ति क्रयविक्रयकारणात् ॥ तुलादोषं तदा देवि धृतमानेषु नित्यशः । अर्धापकर्षणाच्चैव सर्वेषां क्रयविक्रये ॥ अङ्गदोषकरा ये तु परेषां कोपकारणात् । मांसादाश्चैव ये मूर्खा अयथावत्प्रथाः सदा ॥ एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने । ह्रस्वाङ्गा वामनाश्चैव कुब्जाश्चैव भवन्ति ते ॥ **श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! जो मनुष्य पहले लोभ और मोहसे युक्त हो खरीद-बिक्रीके लिये अनाज तौलनेके बाटोंको तोड़-फोड़कर छोटे कर देते हैं, तराजूमें भी कुछ दोष रख

लेते हैं और प्रतिदिन क्रय-विक्रयके समय जब उन बाटोंको रखकर अनाज तौलते हैं, तब

सभीके मालमेंसे आधेकी चोरी कर लेते हैं। जो क्रोध करते, दूसरोंके शरीरपर चोट करके

उसके अंगोंमें दोष उत्पन्न कर देते हैं, जो मूर्ख मांस खाते और सदा झूठ बोलते हैं, शोभने!

ऐसे आचरणवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर छोटे शरीरवाले बौने और कुबड़े होते हैं ।।

उमोवाच

भगवन् मानुषाः केचिद् दृश्यन्ते मानुषेषु वै ।

उन्मत्ताश्च पिशाचाश्च पर्यटन्तो यतस्ततः ।।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।

उमाने पूछा- भगवन्! मनुष्योंमेंसे कुछ लोग उन्मत्त और पिशाचोंके समान इधर-

उधर घूमते दिखायी देते हैं। उनकी ऐसी अवस्थामें कौन-सा कर्म-फल कारण है? यह मुझे

बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि दर्पाहङ्कारसंयुताः ।

बहुधा प्रलपन्त्येव हसन्ति च परान् भृशम् ।।

मोहयन्ति परान् भोगैर्मदनैर्लोभकारणात् ।

वृद्धान् गुरूंश्च ये मूर्खा वृथैवापहसन्ति च ।।

शौण्डा विदग्धाः शास्त्रेषु तथैवानृतवादिनः ।।

एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।

उन्मत्ताश्च पिशाचाश्च भवन्त्येव न संशयः ।।

श्रीमहेश्वरने कहा- देवि! जो मनुष्य पहले दर्प और अहंकारसे युक्त हो नाना

प्रकारकी अंटशंट बातें करते हैं, दूसरोंकी खूब हँसी उड़ाते हैं, लोभवश, उन्मत्त बना

देनेवाले भोगोंद्वारा दूसरोंको मोहित करते हैं, जो मूर्ख वृद्धों और गुरुजनोंका व्यर्थ ही

उपहास करते हैं तथा शास्त्रज्ञानमें चतुर एवं प्रवीण होनेपर भी सदा झूठ बोलते हैं, शोभने!

ऐसे आचरणवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर उन्मत्तों और पिशाचोंके समान भटकते फिरते हैं;

इसमें संशय नहीं है ।।

उमोवाच

भगवन् मानुषाः केचिन्तिरपत्याः सुदुःखिताः ।

यतन्तो न लभन्त्येव अपत्यानि यतस्ततः ।।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।

उमाने पूछा- भगवन्! कुछ मनुष्य संतानहीन होनेके कारण अत्यन्त दुःखी रहते हैं।

वे जहाँ-तहाँसे प्रयत्न करनेपर भी संतानलाभसे वंचित ही रह जाते हैं। किस कर्मविपाकसे

ऐसा होता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि सर्वप्राणिषु निर्दयाः ।

घ्नन्ति बालांश्च भुञ्जन्ते मृगाणां पक्षिणामपि ।।

गुरुविद्वेषिणश्चैव परपुत्राभ्यसूयकाः ।

पितृपूजां न कुर्वन्ति यथोक्तां चाष्टकादिभिः ।।

एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ।

मानुष्यं सुचिरात् प्राप्य निरपत्या भवन्ति ते ।

पुत्रशोकयुताश्चापि नास्ति तत्र विचारणा ।।

श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! जो मनुष्य पहले समस्त प्राणियोंके प्रति निर्दयताका बर्ताव

करते हैं, मृगों और पक्षियोंके भी बच्चोंको मारकर खा जाते हैं, गुरुसे द्वेष रखते, दूसरोंके

पुत्रोंके दोष देखते हैं, पार्वण आदि श्राद्धोंके द्वारा शास्त्रोक्त रीतिसे पितरोंकी पूजा नहीं

करते; शोभने! ऐसे आचरणवाले जीव फिर जन्म लेनेपर दीर्घकालके पश्चात् मानवयोनिको

पाकर संतानहीन तथा पुत्रशोकसे संतप्त होते हैं; इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं

है ।।

उमोवाच

भगवन् मानुषाः केचित् प्रदृश्यन्ते सुदुःखिताः ।

उद्वेगवासनिरताः सोद्वेगाश्च यतव्रताः ।।

नित्यं शोकसमाविष्टा दुर्गताश्च तथैव च ।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।

उमाने कहा—भगवन्! मनुष्योंमें कुछ लोग अत्यन्त दुःखी दिखायी देते हैं। उनके

निवासस्थानमें उद्वेगका वातावरण छाया रहता है। वे उद्विग्न रहकर संयमपूर्वक व्रतका

पालन करते हैं। नित्य शोकमग्न तथा दुर्गतिग्रस्त रहते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता

है? यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा नित्यमुत्कोचनपरायणाः ।

भीषयन्ति परान् नित्यं विकुर्वन्ति तथैव च ।।

ऋणवृद्धिकराश्चैव दरिद्रेभ्यो यथेष्टतः ।

ये श्वभिः क्रीडमानाश्च त्रासयन्ति वने मृगान् ।

प्राणिहिंसां तथा देवि कुर्वन्ति च यतस्ततः ।।

येषां गृहेषु वै श्वानः त्रासयन्ति वृथा नरान् ।।

एवंयुक्तसमाचाराः कालधर्मगताः पुनः ।

पीडिता यमदण्डेन निरयस्थाश्चिरं प्रिये ।।

कथंचित् प्राप्य मानुष्यं तत्र ते दुःखसंयुताः ।।

कुदेशे दुःखभूयिष्ठे व्याघातशतसंकुले ।

जायन्ते तत्र शोचन्तः सोद्वेगाश्च यतस्ततः ।।

श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! जो मनुष्य पहले प्रतिदिन घूस लेते हैं, दूसरोंको डराते और

उनके मनमें विकार उत्पन्न कर देते हैं, अपने इच्छानुसार दरिद्रोंका ऋण बढ़ाते हैं, जो

कुत्तोंसे खेलते और वनमें मृगोंको त्रास पहुँचाते हैं, जहाँ-तहाँ प्राणियोंकी हिंसा करते हैं,

जिनके घरोंमें पले हुए कुत्ते व्यर्थ ही लोगोंको डराते रहते हैं, प्रिये! ऐसे आचरणवाले मनुष्य

मृत्युको प्राप्त होकर यमदण्डसे पीड़ित हो चिरकालतक नरकमें पड़े रहते हैं। फिर किसी

प्रकार मनुष्यका जन्म पाकर अधिक दुःखसे भरे हुए सैकड़ों बाधाओंसे व्याप्त कुत्सित

देशमें उत्पन्न हो वहाँ दुःखी, शोकमग्न और सब ओरसे उद्विग्न बने रहते हैं ।।

उमोवाच

भगवन् भगनेत्रघ्न मानुषेषु च केचन ।

क्लीबा नपुंसकाश्चैव दृश्यन्ते षण्ढकास्तथा ।।

नीचकर्मरता नीचा नीचसख्यास्तथा भुवि ।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।

उमाने पूछा—भगवन्! भगदेवताके नेत्रको नष्ट करनेवाले महादेव! मनुष्योंमें कुछ

लोग कायर, नपुंसक और हिजड़े देखे जाते हैं, जो इस भूतलपर स्वयं तो नीच हैं ही, नीच

कर्मोंमें तत्पर रहते और नीचोंका ही साथ करते हैं। उनके नपुंसक होनेमें कौन-सा

कर्मविपाक कारण होता है? यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ।

ये पुरा मनुजा भूत्वा घोरकर्मरतास्तथा ।

पशुपुंस्त्वोपघातेन जीवन्ति च रमन्ति च ।।

एवंयुक्तसमाचाराः कालधर्मं गतास्तु ते ।।

दण्डिता यमदण्डेन निरयस्थाश्चिरं प्रिये ।।

यदि चेन्मानुषं जन्म लभेरंस्ते तथाविधाः ।

क्लीबा वर्षवराश्चैव षण्ढकाश्च भवन्ति ते ।।

श्रीमहेश्वरने कहा— कल्याणि! मैं वह कारण तुम्हें बताता हूँ, सुनो! जो मनुष्य पहले

भयंकर कर्ममें तत्पर होकर पशुके पुरुषत्वका नाश करने अर्थात् पशुओंको बधिया करनेके

कार्यद्वारा जीवननिर्वाह करते और उसीमें सुख मानते हैं, प्रिये! ऐसे आचरणवाले मनुष्य

मृत्युको पाकर यमदण्डसे दण्डित हो चिरकालतक नरकमें निवास करते हैं। यदि मनुष्यजन्म धारण करते हैं तो वैसे ही कायर, नपुंसक और हिजड़े होते हैं ।। स्त्रीणामपि तथा देवि यथा पुंसां तु कर्मजम् । इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ।। देवि! जैसे पुरुषोंको कर्मजनित फल प्राप्त होता है, उसी प्रकार स्त्रियोंको भी अपने-अपने कर्मोंका फल भोगना पड़ता है। यह विषय मैंने तुम्हें बता दिया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[उमा-महेश्वर-संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन]

⬅ विषय-सूची (TOC)

[उमा-महेश्वर-संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन]

उमोवाच

भगवन् देवदेवेश प्रमदा विधवा भृशम् ।

दृश्यन्ते मानुषे लोके सर्वकल्याणवर्जिताः ॥

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।

उमाने पूछा—भगवन्! देवदेवेश्वर! मनुष्यलोकमें बहुत-सी युवती स्त्रियाँ समस्त

कल्याणोंसे रहित विधवा दिखायी देती हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे

बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

याः पुरा मनुजा देवि बुद्धिमोहसमन्विताः ।

कुटुम्बं तत्र वै पत्युर्नाशयन्ति वृथा तथा ॥

विषदाश्चाग्निदाश्चैव पतीन् प्रति सुनिर्दयाः ।

अन्यासां हि पतीन् यान्ति स्वपतीन् द्वेष्यकारणात् ॥

एवंयुक्तसमाचारा यमलोके सुदण्डिताः ॥

निरयस्थाश्चिरं कालं कथंचित् प्राप्य मानुषम् ॥

तत्र ता भोगरहिता विधवाश्च भवन्ति वै ॥

श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! जो स्त्रियाँ पहले जन्ममें बुद्धिमें मोह छा जानेके कारण

पतिके कुटुम्बका व्यर्थ नाश करती हैं, विष देती, आग लगाती और पतियोंके प्रति अत्यन्त

निर्दय होती हैं, अपने पतियोंसे द्वेष रखनेके कारण दूसरी स्त्रियोंके पतियोंसे सम्बन्ध

स्थापित कर लेती हैं, ऐसे आचरणवाली नारियाँ यमलोकमें भलीभाँति दण्डित हो

चिरकालतक नरकमें पड़ी रहती हैं। फिर किसी तरह मनुष्य-योनि पाकर वे भोगरहित

विधवा हो जाती हैं ॥

उमोवाच

भगवन् देवदेवेश मानुषेष्वेव केचन ।

दासभूताः प्रदृश्यन्ते सर्वकर्मपरा भृशम् ॥

आघातभर्त्सनसहाः पीड्यमानाश्च सर्वशः ।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा—भगवन्! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमें ही कोई दासभावको प्राप्त दिखायी देते

हैं, जो सब प्रकारके कर्मोंमें सर्वथा संलग्न रहते हैं। वे पीटे जाते हैं, डाँट-फटकार सहते हैं

और सब तरहसे सताये जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ।।
ये पुरा मनुजा देवि परेषां वित्तहारकाः ।।
ऋणवृद्धिकरं क्रौर्यान्न्यासदत्तं तथैव च ।
निक्षेपकारणाद् दत्तपरद्रव्यापहारिणः ।।
प्रमादाद् विस्मृतं नष्टं परेषां धनहारकाः ।
वधबन्धपरिक्लेशैर्दासत्वं कुर्वते परान् ।।
तादृशा मरणं प्राप्ता दण्डिता यमशासनैः ।
कथंचित् प्राप्य मानुष्यं तत्र ते देवि सर्वथा ।।
दासभूता भविष्यन्ति जन्मप्रभृति मानवाः ।।
तेषां कर्माणि कुर्वन्ति येषां ते धनहारकाः ।
आसमाप्तेः स्वपापस्य कुर्वन्तीति विनिश्चयः ।।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**कल्याणि! वह कारण मैं बताता हूँ, सुनो। देवि! जो मनुष्य पहले दूसरोंके धनका अपहरण करते हैं, जो क्रूरतावश किसीके ऐसे धनको हड़प लेते हैं, जिसके कारण उसके ऊपर ऋण बढ़ जाता है, जो रखनेके लिये दिये हुए या धरोहरके तौरपर रखे हुए पराये धनको दबा लेते हैं अथवा प्रमादवश दूसरोंके भूले या खोये हुए धनको हर लेते हैं, दूसरोंको वध-बन्धन और क्लेशमें डालकर उनसे अपनी दासता कराते हैं; देवि! ऐसे लोग मृत्युको प्राप्त हो यमदण्डसे दण्डित होकर जब किसी तरह मनुष्य-योनिमें जन्म लेते हैं, तब जन्मसे ही दास होते हैं और उन्हींकी सेवा करते हैं, जिनका धन उन्होंने पूर्वजन्ममें हर लिया है। जबतक उनके पापका भोग समाप्त नहीं हो जाता, तबतक वे दासकर्म ही करते रहते हैं, यही शास्त्रका निश्चय है ।।
पशुभूतास्तथा चान्ये भवन्ति धनहारकाः ।
तत् तथा क्षीयते कर्म तेषां पूर्वापराधजम् ।।
पराये धनका अपहरण करनेवाले दूसरे लोग पशु होकर भी धनीकी सेवा करते हैं। ऐसा करनेसे उनका पूर्वापराधजनित कर्म क्षीण होता है ।।
किंतु मोक्षविधिस्तेषां सर्वथा तत्प्रसादनम् ।
अयथावन्मोक्षकामः पुनर्जन्मनि चेष्यते ।।
सब प्रकारसे उस धनके स्वामीको प्रसन्न कर लेना ही उसके ऋणसे छुटकारा पानेका उपाय है, किंतु जो यथावत् रूपसे उस ऋणसे छूटना नहीं चाहता, उसे पुनर्जन्म लेकर उसकी सेवा करनी पड़ती है ।।
मोक्षकामी यथान्यायं कुर्वन् कर्माणि सर्वशः ।
भर्तुः प्रसादमाकांक्षेदायासान् सर्वथा सहन् ।।
जो उस बन्धनसे छूटना चाहता हो, वह यथोचित रूपसे सारे काम करता और परिश्रमको सर्वथा सहता हुआ स्वामीको प्रसन्न करनेकी आकांक्षा रखे ।।

प्रीतिपूर्वं तु यो भर्त्रा मुक्तो मुक्तः स पावनः ।
तथाभूतान् कर्मकरान् सदा संतोषयेत् पतिः ॥
जिसे स्वामी प्रसन्नतापूर्वक दासताके बन्धनसे मुक्त कर देता है, वह मुक्त एवं शुद्ध हो जाता है। स्वामीको भी चाहिये कि वह ऐसे सेवकोंको सदा संतुष्ट रखे ॥
यथार्हं कारयेत् कर्म दण्डं कारणतः क्षिपेत् ।
वृद्धान् बालांस्तथा क्षीणान् पालयन् धर्ममाप्नुयात् ।
इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
उनसे यथायोग्य कार्य कराये और विशेष कारणसे ही उन्हें दण्ड दे। जो वृद्धों, बालकों और दुर्बल मनुष्योंका पालन करता है, वह धर्मका भागी होता है। देवि! यह विषय तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहती हो ॥

उमोवाच

भगवन् भुवि मर्त्यानां दण्डितानां नरेश्वरैः ।
दण्डेनैव कृतेनेह पापनाशो भवेन्न वा ॥
एतन्मया संशयितं तद् भवांश्छेत्तुमर्हति ॥
उमाने पूछा— भगवन्! इस भूतलपर राजा लोग जिन मनुष्योंको दण्ड दे देते हैं, अब उस दण्डसे ही उनके पापोंका नाश हो जाता है या नहीं? यह मेरा संदेह है। आप इसका निवारण करें ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

स्थाने संशयितं देवि शृणु तत्त्वं समाहिता ॥
ये नृपैर्दण्डिता भूमावपराधापदेशतः ।
यमलोके न दण्ड्यन्ते तत्र ते यमदण्डनैः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! तुम्हारा संदेह ठीक है, तुम एकाग्रचित्त होकर इसका यथार्थ उत्तर सुनो। इस भूमिपर राजालोग जिस अपराधका नाम लेकर जिन मनुष्योंको दण्ड दे देते हैं, उसके लिये वे यमलोकमें यमराजके दण्डद्वारा दण्डित नहीं होते हैं ॥
अदण्डिता वा ये तथ्या मिथ्या वा दण्डिता भुवि ।
तान् यमो दण्डयत्येव स हि वेद कृताकृतम् ॥
इस पृथ्वीपर जो वास्तविक अपराधी बिना दण्ड पाये रह जाते हैं अथवा झूठे ही दूसरे लोग दण्डित हो जाते हैं, उस दशामें यमराज उन वास्तविक अपराधियोंको अवश्य दण्ड देते हैं; क्योंकि वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि किसने अपराध किया है और किसने नहीं किया है ॥
नातिक्रमेद् यमं कश्चित् कर्म कृत्वेह मानुषः ।
राजा यमश्च कुर्वाते दण्डमात्रं तु शोभने ॥

कोई भी मनुष्य इस लोकमें कर्म करके यमराजको नहीं लाँघ सकता, उसे अवश्य दण्ड भोगना पड़ता है। शोभने! राजा और यम सबको भरपूर दण्ड देते हैं।। नास्ति कर्मफलच्छेत्ता कश्चिल्लोकत्रयेऽपि च।
इति ते कथितं सर्वं निर्विशङ्का भव प्रिये॥
तीनों लोकोंमें कोई भी ऐसा पुरुष नहीं है, जो कर्मोंके फलका बिना भोगे नाश कर सके। प्रिये! इस विषयमें तुम्हें सारी बातें बता दीं। अब संदेहरहित हो जाओ।।

उमोवाच

किमर्थं दुष्कृतं कृत्वा मानुषा भुवि नित्यशः।
पुनस्तत्कर्मनाशाय प्रायश्चित्तानि कुर्वते॥
उमाने पूछा— भगवन्! यदि ऐसी बात है तो भूमण्डलके मनुष्य पाप-कर्म करके उसके निवारणके लिये प्रायश्चित्त क्यों करते हैं?।।
सर्वपापहरं चेति हयमेधं वदन्ति च।
प्रायश्चित्तानि चान्यानि पापनाशाय कुर्वते॥
तस्मान्मया संशयितं त्वं तच्छेत्तुमिहार्हसि।
कहते हैं कि अश्वमेधयज्ञ सम्पूर्ण पापोंको हर लेनेवाला है। लोग दूसरे-दूसरे प्रायश्चित्त भी पापोंका नाश करनेके लिये ही करते हैं (इधर आप कहते हैं कि तीनों लोकोंमें कोई कर्मफलका नाश करनेवाला है ही नहीं) अतः इस विषयमें मुझे संदेह हो गया है। आप मेरे इस संदेहका निवारण करें।।

श्रीमहेश्वर उवाच

स्थाने संशयितं देवि शृणु तत्त्वं समाहिता।
संशयो हि महानेव पूर्वेषां च मनीषिणाम्॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! तुमने ठीक संशय उपस्थित किया है। अब एकाग्रचित्त होकर इसका वास्तविक उत्तर सुनो। पहलेके महर्षियोंके मनमें भी यह महान् संदेह बना रहा है।।
द्विधा तु क्रियते पापं सद्भिश्वासद्भिरेव च।
अभिसंधाय वा नित्यमन्यथा वा यदृच्छया॥
सज्जन हों या असज्जन, सभीके द्वारा दो प्रकारका पाप बनता है, एक तो वह पाप है, जिसे सदा किसी उद्देश्यको मनमें लेकर जान-बूझकर किया जाता है और दूसरा वह है, जो अकस्मात् दैवेच्छासे बिना जाने ही बन जाता है।।
केवलं चाभिसंधाय संरम्भाच्च करोति यत्।
कर्मणस्तस्य नाशस्तु न कथंचन विद्यते॥

जो उद्देश्य-सिद्धिकी कामना रखकर क्रोधपूर्वक कोई असत् कर्म करता है, उसके उस

कर्मका किसी तरह नाश नहीं होता है ।।

अभिसंधिकृतस्यैव नैव नाशोऽस्ति कर्मणः ।

अश्वमेधसहस्रैश्च प्रायश्चित्तशतैरपि ।।

अन्यथा यत् कृतं पापं प्रमादाद् वा यदृच्छया ।

प्रायश्चित्ताश्वमेधाभ्यां श्रेयसा तत् प्रणश्यति ।।

फलाभिसन्धिपूर्वक किये गये कर्मोंका नाश सहस्रों अश्वमेधयज्ञों और सैकड़ों

प्रायश्चित्तोंसे भी नहीं होता। इसके सिवा और प्रकारसे—असावधानी या दैवेच्छासे जो पाप

बन जाता है, वह प्रायश्चित्त और अश्वमेधयज्ञसे तथा दूसरे किसी श्रेष्ठ कर्मसे नष्ट हो जाता

है ।।

विद्ध्येवं पापके कार्ये निर्विशंका भव प्रिये ।

इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ।।

प्रिये! इस प्रकार पाप कर्मके विषयमें तुम्हारा यह संदेह अब दूर हो जाना चाहिये।

देवि! यह विषय मैंने तुम्हें बताया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।

उमोवाच

भगवन् देवदेवेश मानुषाश्चेतरा अपि ।

म्रियन्ते मानुषा लोके कारणाकारणादपि ।।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।

उमाने पूछा—भगवन्! देवदेवेश्वर! जगत्के मनुष्य तथा दूसरे प्राणी, जो किसी

कारणसे या अकारण भी मृत्युको प्राप्त हो जाते हैं, इसमें कौन-सा कर्मविपाक कारण है?

यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि कारणाकारणादपि ।

यथासुभिर्वियुज्यन्ते प्राणिनः प्राणिनिर्दयाः ।।

तथैव ते प्राप्नुवन्ति यथैवात्मकृतं फलम् ।

विषदास्तु विषेणैव शस्त्रैः शस्त्रेण घातकाः ।।

श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! जो निर्दयी मनुष्य पहले किसी कारणसे या अकारण भी

दूसरे प्राणियोंके प्राण लेते हैं, वे उसी प्रकार अपनी करनीका फल पाते हैं। विष देनेवाले

विषसे ही मरते हैं और शस्त्रद्वारा दूसरोंकी हत्या करनेवाले लोग स्वयं भी जन्मान्तरमें

शस्त्रोंके आघातसे ही मारे जाते हैं ।।

इति सत्यं प्रजानीहि लोके तत्र विधिं प्रति ।

कर्मकर्ता नरोऽभोक्ता स नास्ति दिवि वा भुवि ।

तुम इसीको सत्य समझो। कर्म करनेवाला मनुष्य उन कर्मोंका फल न भोगे, ऐसा कोई पुरुष न इस पृथ्वीपर है न स्वर्गमें ।। न शक्यं कर्म चाभोक्तुं सदेवासुरमानुषैः ।। कर्मणा ग्रथितो लोक आदिप्रभृति वर्तते । देवता, असुर और मनुष्य कोई भी अपने कर्मोंका फल भोगे बिना नहीं रह सकता। आदिकालसे ही यह संसार कर्मसे गूँथा हुआ है ।। एतदुद्देशतः प्रोक्तं कर्मपाकफलं प्रति ।। यदन्यच्च मया नोक्तं यस्मिंस्ते कर्मसंग्रहे । बुद्धितर्केण तत् सर्वं तथा वेदितुमर्हसि ।। कथितं श्रोतुकामाया भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ।। कर्मोंके परिणामके विषयमें ये बातें संक्षेपसे बतायी गयी हैं। कर्मसंचयके विषयमें जो बात मैंने अबतक नहीं कही हो, उसे भी तुम्हें अपनी बुद्धिद्वारा तर्क—ऊहापोह करके जान लेना चाहिये। तुम्हें सुननेकी इच्छा थी, इसलिये मैंने ये सारी बातें बतायीं। अब तुम और क्या सुनना चाहती हो? ।।

उमोवाच

भगवन् भगनेत्रघ्न मानुषाणां विचेष्टितम् । सर्वमात्मकृतं चेति श्रुतं मे भगवन्मतम् ।। लोके ग्रहकृतं सर्वं मत्वा कर्म शुभाशुभम् । तदेव ग्रहनक्षत्रं प्रायशः पर्युपासते ।। एष मे संशयो देव तं मे त्वं छेत्तुमर्हसि । **उमाने पूछा—**भगवन्! भगनेत्रनाशन! आपका मत है कि मनुष्योंकी जो भली-बुरी अवस्था है, वह सब उनकी अपनी ही करनीका फल है। आपके इस मतको मैंने अच्छी तरह सुना; परंतु लोकमें यह देखा जाता है कि लोग समस्त शुभाशुभ कर्मफलको ग्रहजनित मानकर प्रायः उन ग्रहनक्षत्रोंकी ही आराधना करते रहते हैं। क्या उनकी यह मान्यता ठीक है? देव! यही मेरा संशय है। आप मेरे इस संदेहका निवारण कीजिये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

स्थाने संशयितं देवि शृणु तत्त्वविनिश्चयम् ।। नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव शुभाशुभनिवेदकाः । मानवानां महाभागे न तु कर्मकराः स्वयम् ।। **श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! तुमने उचित संदेह उपस्थित किया है। इस विषयमें जो सिद्धान्त मत है, उसे सुनो। महाभागे! ग्रह और नक्षत्र मनुष्योंके शुभ और अशुभकी सूचनामात्र देनेवाले हैं। वे स्वयं कोई काम नहीं करते हैं ।।

प्रजानां तु हितार्थाय शुभाशुभविधिं प्रति । अनागतमतिक्रान्तं ज्योतिश्चक्रेण बोध्यते ॥ प्रजाके हितके लिये ज्यौतिषचक्र (ग्रह-नक्षत्र मण्डल)-के द्वारा भूत और भविष्यके शुभाशुभ फलका बोध कराया जाता है ॥ किंतु तत्र शुभं कर्म सुग्रहैस्तु निवेद्यते । दुष्कृतस्याशुभैरेव समवायो भवेदिति ॥ किंतु वहाँ शुभ कर्मफलकी सूचना (उत्तम) शुभ ग्रहोंद्वारा प्राप्त होती है और दुष्कर्मके फलकी सूचना अशुभ ग्रहोंद्वारा ॥ केवलं ग्रहनक्षत्रं न करोति शुभाशुभम् । सर्वमात्मकृतं कर्म लोकवादो ग्रहा इति ॥ केवल ग्रह और नक्षत्र ही शुभाशुभ कर्मफलको उपस्थित नहीं करते हैं। सारा अपना ही किया हुआ कर्म शुभाशुभ फलका उत्पादक होता है। ग्रहोंने कुछ किया है—यह कथन लोगोंका प्रवादमात्र है ॥

उमोवाच

भगवन् विविधं कर्म कृत्वा जन्तुः शुभाशुभम् । किं तयोः पूर्वतरं भुङ्क्ते जन्मान्तरे पुनः ॥ एष मे संशयो देव तं मे त्वं छेत्तुमर्हसि । **उमाने पूछा—**भगवन्! जीव नाना प्रकारके शुभाशुभ कर्म करके जब दूसरा जन्म धारण करता है, तब दोनोंमेंसे पहले किसका फल भोगता है, शुभका या अशुभका? देव! यह मेरा संशय है। आप इसे मिटा दीजिये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

स्थाने संशयितं देवि तत् ते वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥ अशुभं पूर्वमित्याहुरपरे शुभमित्यपि । मिथ्या तदुभयं प्रोक्तं केवलं तद् ब्रवीमि ते ॥ **श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! तुम्हारा संदेह उचित ही है, अब मैं तुम्हें इसका यथार्थ उत्तर देता हूँ। कुछ लोगोंका कहना है कि पहले अशुभ कर्मका फल मिलता है, दूसरे कहते हैं कि पहले शुभ कर्मका फल प्राप्त होता है। परंतु ये दोनों ही बातें मिथ्या कही गयी हैं। सच्ची बात क्या है? यह मैं तुम्हें बता रहा हूँ ॥ भुञ्जानाश्चापि दृश्यन्ते क्रमशो भुवि मानवाः । ऋद्धिं हानिं सुखं दुःखं तत् सर्वमभयं भयम् ॥ इस पृथ्वीपर मनुष्य क्रमशः दोनों प्रकारके फल भोगते देखे जाते हैं। कभी धनकी वृद्धि होती है कभी हानि, कभी सुख मिलता है कभी दुःख, कभी निर्भयता रहती है और कभी

भय प्राप्त होता है। इस प्रकार सभी फल क्रमशः भोगने पड़ते हैं ।।
दुःखान्यनुभवन्त्याढ्या दरिद्राश्च सुखानि च ।
यौगपद्याद्धि भुञ्जाना दृश्यन्ते लोकसाक्षिकम् ॥
कभी धनाढ्य लोग दुःखका अनुभव करते हैं और कभी दरिद्र भी सुख भोगते हैं। इस प्रकार एक ही साथ लोग शुभ और अशुभका भोग करते देखे जाते हैं। सारा जगत् इस बातका साक्षी है ।।
नरके स्वर्गलोके च न तथा संस्थितिः प्रिये ।
नित्यं दुःखं हि नरके स्वर्गे नित्यं सुखं तथा ॥
प्रिये! किंतु नरक और स्वर्गलोकमें ऐसी स्थिति नहीं है। नरकमें सदा दुःख ही दुःख है और स्वर्गमें सदा सुख ही सुख ।।
तत्रापि सुमहद् भुक्त्वा पूर्वमल्पं पुनः शुभे ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
शुभे! वहाँ भी शुभ या अशुभमेंसे जो बहुत अधिक होता है, उसका भोग पहले और जो बहुत कम होता है, उसका भोग पीछे होता है। ये सब बातें मैंने तुम्हें बता दीं, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।

उमोवाच

भगवन् प्राणिनो लोके म्रियन्ते केन हेतुना ।
जाता जाता न तिष्ठन्ति तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा— भगवन्! इस लोकमें प्राणी किस कारणसे मर जाते हैं? जन्म ले-लेकर वे यहीं बने क्यों नहीं रहते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु सत्यं समाहिता ।
आत्मा कर्मक्षयाद् देहं यथा मुञ्चति तच्छृणु ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! इस विषयमें जो यथार्थ बात है, वह मैं तुम्हें बता रहा हूँ। कर्मोंका भोग समाप्त होनेपर आत्मा इस शरीरको कैसे छोड़ता है? यह एकाग्रचित्त होकर सुनो ।।
शरीरात्मसमाहारो जन्तुरित्यभिधीयते ।
तत्रात्मानं नित्यमाहुरनित्यं क्षेत्रमुच्यते ॥
शरीर और आत्माका (जड और चेतनका) जो संयोग है, उसीको जीव या प्राणी कहते हैं। इनमें आत्माको नित्य और शरीरको अनित्य बताया जाता है ।।
एवं कालेन संक्रान्तं शरीरं जर्जरीकृतम् ।
अकर्मयोग्यं संशीर्णं त्यक्त्वा देही ततो व्रजेत् ॥

जब कालसे आक्रान्त होकर शरीर जरावस्थासे जर्जर हो जाता है, कोई कर्म करने योग्य नहीं रह जाता और सर्वथा गल जाता है, तब देहधारी जीव उसे त्यागकर चल देता है॥

नित्यस्यानित्यसंत्यागाल्लोके तन्मरणं विदुः ।
कालं नातिक्रमेरेन् हि सदेवासुरमानवाः ॥
नित्य जीवात्मा जब अनित्य शरीरको त्यागकर चला जाता है, तब लोकमें उस प्राणीकी मृत्यु हुई मानी जाती है। देवता, असुर और मनुष्य कोई भी कालका उल्लंघन नहीं कर सकते॥

यथाऽऽकाशे न तिष्ठेत द्रव्यं किंचिदचेतनम् ।
तथा धावति कालोऽयं क्षणं किंचिन्न तिष्ठति ॥
जैसे आकाशमें कोई भी जड द्रव्य स्थिर नहीं रह सकता, उसी प्रकार यह काल निरन्तर दौड़ लगाता रहता है। एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता॥

स पुनर्जायतेऽन्यत्र शरीरं नवमाविशन् ।
एवं लोकगतिर्नित्यमादिप्रभृति वर्तते ॥
वह जीव फिर किसी दूसरे शरीरमें प्रवेश करके अन्यत्र जन्म लेता है। इस प्रकार आदि कालसे ही लोककी सदा ऐसी ही गति चल रही है॥

उमोवाच

भगवन् प्राणिनो बाला दृश्यन्ते मरणं गताः ।
अतिवृद्धाश्च जीवन्तो दृश्यन्ते चिरजीविनः ॥
उमाने पूछा— भगवन्! इस संसारमें बाल्यावस्थामें भी प्राणियोंकी मृत्यु होती देखी जाती है और अत्यन्त वृद्ध मनुष्य भी चिरजीवी होकर जीवित दिखायी देते हैं॥

केवलं कालमरणं न प्रमाणं महेश्वर ।
तस्मान्मे संशयं ब्रूहि प्राणिनां जीवकारणम् ॥
महेश्वर! केवल काल-मृत्यु अर्थात् वृद्धावस्थामें ही मृत्यु होनेकी बात प्रमाणभूत नहीं रह गयी है; अतः प्राणियोंके जीवनके लिये उठे हुए मेरे इस संदेहका आप निवारण कीजिये॥

श्रीमहेश्वर उवाच

शृणु तत् कारणं देवि निर्णयस्त्वेक एव सः ।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! इसका कारण सुनो। इस विषयमें एक ही निर्णय है॥

यावत् पूर्वकृतं कर्म तावज्जीवति मानवः ।
तत्र कर्मवशाद् बाला म्रियन्ते कालसंक्षयात् ॥
चिरं जीवन्ति वृद्धाश्च तथा कर्मप्रमाणतः ।