महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
'जो मनुष्य मुझे जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहारका कारण समझकर मेरी शरण लेता है, उसके ऊपर कृपा करके मैं उसे संसार-बन्धनसे मुक्त कर देता हूँ ।। अहमादिर्हि देवानां सृष्टा ब्रह्मादयो मया । प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य जगत् सर्वं सृजाम्यहम् ।। 'मैं ही देवताओंका आदि हूँ। ब्रह्मा आदि देवताओंकी मैंने ही सृष्टि की है। मैं ही अपनी प्रकृतिका आश्रय लेकर सम्पूर्ण संसारकी सृष्टि करता हूँ ।। तमोमूलोऽहमव्यक्तो रजोमध्ये प्रतिष्ठितः । ऊर्ध्वं सत्त्वं विना लोभं ब्रह्मादिस्तम्बपर्यतः ।। 'मैं अव्यक्त परमेश्वर ही तमोगुणका आधार, रजोगुणके भीतर स्थित और उत्कृष्ट सत्त्वगुणमें भी व्याप्त हूँ। मुझे लोभ नहीं है। ब्रह्मासे लेकर छोटेसे कीड़ेतक सबमें मैं व्याप्त हो रहा हूँ ।। मूर्द्धानं मे विद्धि दिवं चन्द्रादित्यौ च लोचने । गावोऽग्निर्ब्राह्मणो वक्त्रं मारुतः श्वसनं च मे ।। 'द्युलोकको मेरा मस्तक समझो। सूर्य और चन्द्रमा मेरी आँखें हैं। गौ, अग्नि और ब्राह्मण मेरे मुख हैं और वायु मेरी साँस है ।। दिशो मे बाहवश्चाष्टौ नक्षत्राणि च भूषणम् । अन्तरिक्षमुरो विद्धि सर्वभूतावकाशकम् । मार्गों मेघानिलाभ्यां तु यन्ममोदरमव्ययम् ।। 'आठ दिशाएँ मेरी बाँहें, नक्षत्र मेरे आभूषण और सम्पूर्ण भूतोंको अवकाश देनेवाला अन्तरिक्ष मेरा वक्षःस्थल है। बादलों और हवाके चलनेका जो मार्ग है, उसे मेरा अविनाशी उदर समझो ।। पृथिवीमण्डलं यद् वै द्वीपार्णववनैर्युतम् । सर्वसंधारणोपेतं पादौ मम युधिष्ठिर ।। 'युधिष्ठिर! द्वीप, समुद्र और जंगलोंसे भरा हुआ यह सबको धारण करनेवाला भूमण्डल मेरे दोनों पैरोंके स्थानमें है ।। स्थितो ह्येकगुणः खेऽहं द्विगुणश्चास्मि मारुते । त्रिगुणोऽग्नौ स्थितोऽहं वै सलिले च चतुर्गुणः ।। शब्दाद्या ये गुणाः पञ्च महाभूतेषु पञ्चसु । तन्मात्रासंस्थितः सोऽहं पृथिव्यां पञ्चधा स्थितः ।। 'आकाशमें मैं एक गुणवाला हूँ, वायुमें दो गुणवाला हूँ, अग्निमें तीन गुणवाला हूँ और जलमें चार गुणवाला हूँ। पृथिवीमें पाँच गुणोंसे स्थित हूँ। वही मैं तन्मात्रारूप पञ्चमहाभूतोंमें शब्दादि पाँच गुणोंसे स्थित हूँ ।। अहं सहस्रशीर्षस्तु सहस्रवदनेक्षणः ।
सहस्रबाहूदरधृक् सहस्रोरु सहस्रपात् ।।
‘मेरे हजारों मस्तक, हजारों मुख, हजारों नेत्र, हजारों भुजाएँ, हजारों उदर, हजारों ऊरु और हजारों पैर हैं ।।
धृत्वोर्वीं सर्वतः सम्यगत्यतिष्ठं दशाङ्गुलम् ।
सर्वभूतात्मभूतस्थः सर्वव्यापी ततोऽस्म्यहम् ।।
‘मैं पृथ्वीको सब ओरसे धारण करके नाभिसे दस अंगुल ऊँचे सबके हृदयमें विराजमान हूँ। सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्मरूपसे स्थित हूँ, इसलिये सर्वव्यापी कहलाता हूँ ।।
अचिन्त्योऽहमनन्तोऽहमजरोऽहमजो ह्यहम् ।
अनाद्योऽहमवध्योऽहमप्रमेयोऽहमव्ययः ।।
निर्गुणोऽहं निगूढात्मा निर्द्वन्द्वो निर्ममो नृप ।
निष्कलो निर्विकारोऽहं निदानममृतस्य तु ।।
सुधा चाहं स्वधा चाहं स्वाहा चाहं नराधिप ।
‘राजन्! मैं अचिन्त्य, अनन्त, अजर, अजन्मा, अनादि, अवध्य, अप्रमेय, अव्यय, निर्गुण, गुह्यस्वरूप, निर्द्वन्द्व, निर्मम, निष्कल, निर्विकार और मोक्षका आदि कारण हूँ। नरेश्वर! सुधा, स्वधा और स्वाहा भी मैं ही हूँ ।।
तेजसा तपसा चाहं भूतग्रामं चतुर्विधम् ।।
स्नेहपाशैर्गुणैर्बद्ध्वा धारयाम्यात्ममायया ।
‘मैंने ही अपने तेज और तपसे चार प्रकारके प्राणिसमुदायको स्नेहपाशरूप रज्जुसे बाँधकर अपनी मायासे धारण कर रखा है ।।
चातुराश्रमधर्मोऽहं चातुर्होत्रफलाशनः ।
चतुर्मूर्तिश्चतुर्यज्ञश्चतुराश्रमभावनः ।।
‘मैं चारों आश्रमोंका धर्म, चार प्रकारके होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका फल भोगनेवाला चतुर्व्यूह, चतुर्यज्ञ और चारों आश्रमोंको प्रकट करनेवाला हूँ ।।
संहृत्याहं जगत् सर्वं कृत्वा वै गर्भमात्मनः ।
शयामि दिव्ययोगेन प्रलयेषु युधिष्ठिर ।।
‘युधिष्ठिर! प्रलयकालमें समस्त जगत्का संहार करके उसे अपने उदरमें स्थापित कर दिव्य योगका आश्रय ले मैं एकार्णवके जलमें शयन करता हूँ ।।
सहस्रयुगपर्यन्तां ब्राह्मीं रात्रिं महार्णवे ।
स्थित्वा सृजामि भूतानि जङ्गमानि स्थिराणि च ।।
‘एक हजार युगोंतक रहनेवाली ब्रह्माकी रात पूर्ण होनेतक महार्णवमें शयन करनेके पश्चात् स्थावर-जंगम प्राणियोंकी सृष्टि करता हूँ ।।
कल्पे कल्पे च भूतानि संहरामि सृजामि च ।
न च मां तानि जानन्ति मायया मोहितानि मे ।।
'प्रत्येक कल्पमें मेरे द्वारा जीवोंकी सृष्टि और संहारका कार्य होता है, किंतु मेरी मायासे मोहित होनेके कारण वे जीव मुझे नहीं जान पाते ।। मम चैवान्धकारस्य मार्गितव्यस्य नित्यशः। प्रशान्तस्येव दीपस्य गतिर्नैवोपलभ्यते ।। 'प्रलयकालमें जब दीपकके शान्त होनेकी भाँति समस्त व्यक्त सृष्टि लुप्त हो जाती है, तब खोज करने योग्य मुझ अदृश्यरूपकी गतिका उनको पता नहीं लगता ।। न तदस्ति क्वचिद् राजन् यत्राहं न प्रतिष्ठितः। न च तद् विद्यते भूतं मयि यन्न प्रतिष्ठितम् ।। 'राजन्! कहीं कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जिसमें मेरा निवास न हो तथा कोई ऐसा जीव नहीं है, जो मुझमें स्थित न हो ।। यावन्मात्रं भवेद् भूतं स्थूलं सूक्ष्ममिदं जगत् । जीवभूतो ह्यहं तस्मिंस्तावन्मात्रं प्रतिष्ठितः ।। 'जो कुछ भी स्थूल-सूक्ष्मरूप यह जगत् हो चुका है और होनेवाला है, उन सबमें उसी प्रकार मैं ही जीवरूपसे स्थित हूँ ।। किं चात्र बहुनोक्तेन सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । यद् भूतं यद् भविष्यच्च तत् सर्वमहमेव तु ।। 'अधिक कहनेसे क्या लाभ, मैं तुमसे यह सच्ची बात बता रहा हूँ कि भूत और भविष्य जो कुछ है, वह सब मैं ही हूँ ।। मया सृष्टानि भूतानि मन्मयानि च भारत । मामेव न विजानन्ति मायया मोहितानि वै ।। 'भरतनन्दन! सम्पूर्ण भूत मुझसे ही उत्पन्न होते हैं और मेरे ही स्वरूप हैं। फिर भी मेरी मायासे मोहित रहते हैं, इसलिये मुझे नहीं जान पाते ।। एवं सर्व जगदिदं सदेवासुरमानुषम् । मत्तः प्रभवते राजन् मय्येव प्रविलीयते ।। 'राजन्! इस प्रकार देवता, असुर और मनुष्योंसहित समस्त संसारका मुझसे ही जन्म और मुझमें ही लय होता है' ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[चारों वर्णोंके कर्म और उनके फलोंका वर्णन तथा धर्मकी वृद्धि और पापके क्षय होनेका उपाय]
[चारों वर्णोंके कर्म और उनके फलोंका वर्णन तथा धर्मकी वृद्धि और पापके क्षय होनेका उपाय]
वैशम्पायन उवाच
एवमात्मोद्भवं सर्वं जगदुद्दिश्य केशवः ।
धर्मान् धर्मात्मजस्याथ पुण्यानकथयत् प्रभुः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने सम्पूर्ण जगत्को अपनेसे उत्पन्न बतलाकर धर्मनन्दन युधिष्ठिरसे पवित्र धर्मोंका इस प्रकार वर्णन आरम्भ किया— ॥
शृणु पाण्डव तत्त्वेन पवित्रं पापनाशनम् ।
कथ्यमानं मया पुण्यं धर्मशास्त्रफलं महत् ॥
‘पाण्डुनन्दन! मेरे द्वारा कहे हुए धर्मशास्त्रका पुण्यमय, पापनाशक, पवित्र और महान् फल यथार्थ-रूपसे सुनो ॥
यः शृणोति शुचिर्भूत्वा एकचित्तस्तपोयुतः ।
स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं धर्मं ज्ञेयं युधिष्ठिर ॥
श्रद्दधानस्य तस्येह यत् पापं पूर्वसंचितम् ।
विनश्यत्याशु तत् सर्वं मद्भक्तस्य विशेषतः ॥
‘युधिष्ठिर! जो मनुष्य पवित्र और एकाग्रचित्त होकर तपस्यामें संलग्न हो स्वर्ग, यश और आयु प्रदान करनेवाले जाननेयोग्य धर्मका श्रवण करता है, उस श्रद्धालु पुरुषके—विशेषतः मेरे भक्तके पूर्वसंचित जितने पाप होते हैं, वे सब तत्काल नष्ट हो जाते हैं’ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं श्रुत्वा वचः पुण्यं सत्यं केशवभाषितम् ।
प्रहृष्टमनसो भूत्वा चिन्तयन्तोऽद्भुतं परम् ॥
देवब्रह्मर्षयः सर्वे गन्धर्वाप्सरसस्तथा ।
भूता यक्षग्रहाश्चैव गुह्यका भुजगास्तथा ॥
बालखिल्या महात्मानो योगिनस्तत्त्वदर्शिनः ।
तथा भागवताश्चापि पञ्चकालमुपासकाः ॥
कौतूहलसमाविष्टाः प्रहृष्टेन्द्रियमानसाः ।
श्रोतुकामाः परं धर्मं वैष्णवं धर्मशासनम् ।
हृदि कर्तुं च तद्वाक्यं प्रणेमुः शिरसा नताः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! श्रीकृष्णका यह परम पवित्र और सत्य वचन सुनकर मन-ही-मन प्रसन्न हो धर्मके अद्भुत रहस्यका चिन्तन करते हुए सम्पूर्ण देवर्षि, ब्रह्मर्षि, गन्धर्व, अप्सराएँ, भूत, यक्ष, ग्रह, गुह्यक, सर्प, महात्मा बालखिल्यगण, तत्त्वदर्शी
योगी तथा पाँचों उपासना करनेवाले भगवद्भक्त पुरुष उत्तम वैष्णव-धर्मका उपदेश सुनने तथा भगवान्की बात हृदयमें धारण करनेके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित होकर वहाँ आये। उनके इन्द्रिय और मन अत्यन्त हर्षित हो रहे थे। आनेके बाद उन सबने मस्तक झुकाकर भगवान्को प्रणाम किया॥
ततस्तान् वासुदेवेन दृष्टान् दिव्येन चक्षुषा।
विमुक्तपापानालोक्य प्रणम्य शिरसा हरिम्।
पप्रच्छ केशवं धर्मं धर्मपुत्रः प्रतापवान्॥
भगवान्की दिव्य दृष्टि पड़नेसे वे सब निष्पाप हो गये। उन्हें उपस्थित देखकर महाप्रतापी धर्मपुत्र युधिष्ठिरने भगवान्को प्रणाम करके इस प्रकार धर्मविषयक प्रश्न किया॥
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशी ब्राह्मणस्याथ क्षत्रियस्यापि कीदृशी।
वैश्यस्य कीदृशी देव गतिः शूद्रस्य कीदृशी॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**देवेश्वर! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रकी पृथक्-पृथक् कैसी गति होती है?॥
श्रीभगवानुवाच
शृणु वर्णक्रमेणैव धर्मं धर्मभृतां वर।
नास्ति किंचिन्नरश्रेष्ठ ब्राह्मणस्य तु दुष्कृतम्॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**नरश्रेष्ठ धर्मराज! ब्राह्मणादि वर्णोंके क्रमसे धर्मका वर्णन सुनो। ब्राह्मणके लिये कुछ भी दुष्कर नहीं है॥
शिखायज्ञोपवीता ये संध्यां ये चाप्युपासते।
यैश्च पूर्णाहुतिः प्राप्ता विधिवज्जुह्वते च ये॥
वैश्वदेवं च ये चक्रुः पूजयन्त्यतिथींश्च ये।
नित्यं स्वाध्यायशीलाश्च जपयज्ञपराश्च ये॥
सायं प्रातर्हुताशाश्च शूद्रभोजनवर्जिताः।
दम्भानृतविमुक्ताश्च स्वदारनिरताश्च ये।
पञ्चयज्ञपरा ये च येऽग्निहोत्रमुपासते॥
दहन्ति दुष्कृतं येषां हूयमानास्त्रयोऽग्नयः।
नष्टदुष्कृतकर्माणो ब्रह्मलोकं व्रजन्ति ते॥
जो ब्राह्मण शिखा और यज्ञोपवीत धारण करते हैं, संध्योपासना करते हैं, पूर्णाहुति देते हैं, विधिवत् अग्निहोत्र करते हैं, बलिवैश्वदेव और अतिथियोंका पूजन करते हैं, नित्य स्वाध्यायमें लगे रहते हैं तथा जप-यज्ञके परायण हैं; जो प्रातःकाल और सायंकाल होम
करनेके बाद ही अन्न ग्रहण करते हैं, शूद्रका अन्न नहीं खाते हैं, दम्भ और मिथ्याभाषणसे दूर रहते हैं, अपनी ही स्त्रीसे प्रेम रखते हैं तथा पञ्चयज्ञ और अग्निहोत्र करते रहते हैं, जिनके सब पापोंको हवन की जानेवाली तीनों अग्नियाँ भस्म कर देती हैं, वे ब्राह्मण पापरहित होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं ॥ क्षत्रियोऽपि स्थितो राज्ये स्वधर्मपरिपालकः । सम्यक् प्रजापालयिता षड्भागनिरतः सदा ॥ यज्ञदानरतो धीरः स्वदारनिरतः सदा । शास्त्रानुसारी तत्त्वज्ञः प्रजाकार्यपरायणः ॥ विप्रेभ्यः कामदो नित्यं भृत्यानां भरणे रतः । सत्यसन्धः शुचिर्नित्यं लोभदम्भविवर्जितः । क्षत्रियोऽप्युत्तमां याति गतिं देवनिषेविताम् ॥ क्षत्रियमें भी जो राज्यसिंहासनपर आसीन होनेके बाद अपने धर्मका पालन और प्रजाकी भलीभाँति रक्षा करता है, लगानके रूपमें प्रजाकी आमदनीका छठा भाग लेकर सदा उतनेसे ही संतोष करता है, यज्ञ और दान करता रहता है, धैर्य रखता है, अपनी स्त्रीसे संतुष्ट रहता है, शास्त्रके अनुसार चलता है, तत्त्वको जानता है और प्रजाकी भलाईके कार्यमें संलग्न रहता है तथा ब्राह्मणोंकी इच्छा पूर्ण करता है, पोष्यवर्गके पालनमें तत्पर रहता है, प्रतिज्ञाको सत्य करके दिखाता है, सदा पवित्र रहता है एवं लोभ और दम्भको त्याग देता है, उस क्षत्रियको भी देवताओंद्वारा सेवित उत्तम गतिकी प्राप्ति होती है ॥ कृषिगोपालनिरतो धर्मान्वेषणतत्परः । दानधर्मेऽपि निरतो विप्रशुश्रूषकस्तथा । सत्यसंधः शुचिर्नित्यं लोभदम्भविवर्जितः । ऋजुः स्वदारनिरतो हिंसाद्रोहविवर्जितः ॥ वणिग्धर्मान्न मुञ्चन् वै देवब्राह्मणपूजकः । वैश्यः स्वर्गतिमाप्नोति पूज्यमानोऽप्सरोगणैः ॥ जो वैश्य कृषि और गोपालनमें लगा रहता है, धर्मका अनुसंधान किया करता है, दान, धर्म और ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहता है तथा सत्यप्रतिज्ञ, नित्य पवित्र, लोभ और दम्भसे रहित, सरल, अपनी ही स्त्रीसे प्रेम रखनेवाला और हिंसा-द्रोहसे दूर रहनेवाला है, जो कभी भी वैश्यधर्मका त्याग नहीं करता और देवता तथा ब्राह्मणोंकी पूजामें लगा रहता है, वह अप्सराओंसे सम्मानित होकर स्वर्गलोकमें गमन करता है ॥ त्रयाणामपि वर्णानां शुश्रूषानिरतः सदा । विशेषतस्तु विप्राणां दासवद् यस्तु तिष्ठति ॥ अयाचितप्रदाता च सत्यशौचसमन्वितः । गुरुदेवार्चनरतः परदारविवर्जितः ॥
परपीडामकृत्वैव भृत्यवर्गं बिभर्ति यः ।
शूद्रोऽपि स्वर्गमाप्नोति जीवानांमभयप्रदः ॥
शूद्रोंमेंसे जो सदा तीनों वर्णोंकी सेवा करता और विशेषतः ब्राह्मणोंकी सेवामें दासकी भाँति खड़ा रहता है; जो बिना माँगे ही दान देता है, सत्य और शौचका पालन करता है, गुरु और देवताओंकी पूजामें प्रेम रखता है, परस्त्रीके संसर्गसे दूर रहता है, दूसरोंको कष्ट न पहुँचाकर अपने कुटुम्बका पालन-पोषण करता है और सब जीवोंको अभय-दान कर देता है, उस शूद्रको भी स्वर्गकी प्राप्ति होती है ॥
एवं धर्मात् परं नास्ति महत्संसारमोक्षणम् ।
न च धर्मात्परं किंचित् पापकर्मव्यपोहनम् ॥
इस प्रकार धर्मसे बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है। वही निष्कामभावसे आचरण करनेपर संसार-बन्धनसे मुक्ति दिलाता है। धर्मसे बढ़कर पाप-नाशका और कोई उपाय नहीं है ॥
तस्माद् धर्मः सदा कार्यो मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम् ।
न हि धर्मानुरक्तानां लोके किंचन दुर्लभम् ॥
इसलिये इस दुर्लभ मनुष्य-जीवनको पाकर सदा धर्मका पालन करते रहना चाहिये। धर्मानुरागी पुरुषोंके लिये संसारमें कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है ॥
स्वयम्भूविहितो धर्मो यो यस्येह नरेश्वर ।
स तेन क्षपयेत् पापं सम्यगाचरितेन च ॥
नरेश्वर! ब्रह्माजीने इस जगत्में जिस वर्णके लिये जैसे धर्मका विधान किया है, वह वैसे ही धर्मका भलीभाँति आचरण करके अपने पापोंको नष्ट कर सकता है ॥
सहजं यद् भवेत् कर्म न तत् त्याज्यं हि केनचित् ।
स एव तस्य धर्मो हि तेन सिद्धिं स गच्छति ॥
मनुष्यका जो जातिगत कर्म हो, उसका किसीको त्याग नहीं करना चाहिये। वही उसके लिये धर्म होता है और उसीका निष्काम भावसे आचरण करनेपर मनुष्यको सिद्धि (मुक्ति) प्राप्त हो जाती है ॥
विगुणोऽपि स्वधर्मस्तु पापकर्म व्यपोहति ।
एवमेव तु धर्मोऽपि क्षीयते पापवर्धनात् ॥
अपना धर्म गुणरहित होनेपर भी पापको नष्ट करता है। इसी प्रकार यदि मनुष्यके पापकी वृद्धि होती है तो वह उसके धर्मको क्षीण कर डालता है ॥
युधिष्ठिर उवाच
भगवन् देवदेवेश श्रोतुं कौतूहलं हि मे ।
शुभस्याप्यशुभस्यापि क्षयवृद्धी यथाक्रमम् ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भगवन्! देवदेवेश्वर! शुभ और अशुभकी वृद्धि और ह्रास क्रमसे किस प्रकार होते हैं, इसे सुननेकी मेरी बड़ी उत्कण्ठा है॥
श्रीभगवानुवाच
शृणु पार्थिव तत्सर्वं धर्मसूक्ष्मं सनातनम् ।
दुर्विज्ञेयतमं नित्यं यत्र मग्ना महाजनाः ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**राजन्! तुमने जो धर्मका तत्त्व पूछा है, वह सूक्ष्म, सनातन, अत्यन्त दुर्विज्ञेय और नित्य है, बड़े-बड़े लोग भी उसमें मग्न हो जाते हैं, वह सब तुम सुनो॥
यथैव शीतमुदकमुष्णेन बहुना वृतम् ।
भवेत्तु तत्क्षणादुष्णं शीतत्वं च विनश्यति ॥
जिस प्रकार थोड़े-से ठंडे जलको बहुत गरम जलमें मिला दिया जाता है तो वह तत्क्षण गरम हो जाता है और उसका ठंडापन नष्ट हो जाता है॥
यथोष्णं वा भवेदल्पं शीतेन बहुना वृतम् ।
शीतलं च भवेत् सर्वमुष्णत्वं च विनश्यति ॥
जब थोड़ा-सा गरम जल बहुत शीतल जलमें मिला दिया जाता है, तब वह सब-का-सब शीतल हो जाता है और उसकी उष्णता नष्ट हो जाती है॥
एवं च यद् भवेद् भूरि सुकृतं वापि दुष्कृतम् ।
तदल्पं क्षपयेच्छीघ्रं नाज कार्या विचारणा ॥
इसी प्रकार जो पुण्य या पाप बहुत अधिक होता है, वह थोड़े पाप-पुण्यको शीघ्र ही नष्ट कर देता है, इसमें कोई संशय नहीं है॥
समत्वे सति राजेन्द्र तयोः सुकृतपापयोः ।
गूहितस्य भवेद् वृद्धिः कीर्तितस्य भवेत् क्षयः ॥
राजेन्द्र! जब वे पुण्य-पाप दोनों समान होते हैं, तब जिसको गुप्त रखा जाता है, उसकी वृद्धि होती है और जिसका वर्णन कर दिया जाता है, उसका क्षय हो जाता है॥
ख्यापनेनानुतापेन प्रायः पापं विनश्यति ।
तथा कृतस्तु राजेन्द्र धर्मो नश्यति मानद ॥
सम्मान देनेवाले नरेश्वर! पापको दूसरोंसे कहने और उसके लिये पश्चात्ताप करनेसे प्रायः उसका नाश हो जाता है। इसी प्रकार धर्म भी अपने मुँहसे दूसरोंके सम्मुख प्रकट करनेपर नष्ट होता है॥
तावुभौ गूहितौ सम्यग् वृद्धिं यातो न संशयः ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन न पापं गूहयेद् बुधः ॥
तस्मादेतत् प्रयत्नेन कीर्तयेत् क्षयकारणात् ॥
तस्मात् संकीर्तयेत् पापं नित्यं धर्मं च गूहयेत् ॥
छिपानेपर निःसंदेह ये दोनों ही अधिक बढ़ते हैं। इसलिये समझदार मनुष्यको चाहिये कि सर्वथा उद्योग करके अपने पापको प्रकट कर दे, उसे छिपानेकी कोशिश न करे। पापका कीर्तन पापके नाशका कारण होता है, इसलिये हमेशा पापको प्रकट करना और धर्मको गुप्त रखना चाहिये ॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[व्यर्थ जन्म, दान और जीवनका वर्णन, सात्त्विक दानोंका लक्षण, दानका योग्य पात्र और ब्राह्मणकी महिमा]
[व्यर्थ जन्म, दान और जीवनका वर्णन, सात्त्विक दानोंका लक्षण, दानका योग्य पात्र और ब्राह्मणकी महिमा]
वैशम्पायन उवाच
एवं श्रुत्वा वचस्तस्य धर्मपुत्रोऽच्युतस्य तु ।
पप्रच्छ पुनरप्यन्यं धर्मं धर्मात्मजो हरिम् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर इस प्रकार भगवान् अच्युतके वचन सुनकर फिर भी श्रीहरिसे अन्य धर्म पूछने लगे— ॥
वृथा च कति जन्मानि वृथा दानानि कानि च ।
वृथा च जीवितं केषां नराणां पुरुषोत्तम ॥
'पुरुषोत्तम! कितने जन्म व्यर्थ समझे जाते हैं? कितने प्रकारके दान निष्फल होते हैं? और किन-किन मनुष्योंका जीवन निरर्थक माना गया है? ॥
कीदृशासु ह्यवस्थासु दानं दत्तं जनार्दन ।
इह लोकेऽनुभवति पुरुषः पुरुषोत्तम ॥
गर्भस्थः किं समश्नाति किं बाल्ये वापि केशव ।
यौवनस्थेऽपि किं कृष्ण वार्धके वापि किं भवेत् ॥
'पुरुषोत्तम! जनार्दन! मनुष्य किस अवस्थामें दिये हुए दानके फलका इस लोकमें अनुभव करता है। केशव! गर्भमें स्थित हुआ मनुष्य किस दानका फल भोगता है? श्रीकृष्ण! बाल, युवा और वृद्ध-अवस्थाओंमें मनुष्य किस-किस दानका फल भोगता है? ॥
सात्त्विकं कीदृशं दानं राजसं कीदृशं भवेत् ।
तामसं कीदृशं देव तर्पयिष्यति किं प्रभो ॥
'भगवन्! सात्त्विक, राजस और तामस दान कैसे होते हैं? प्रभो! उनसे किसकी तृप्ति होती है? ॥
उत्तमं कीदृशं दानं तेषां वा किं फलं भवेत् ।
किं दानं नयति ह्यूर्ध्वं किं गतिं मध्यमां नयेत् ।
गतिं जघन्यामथ वा देवदेव वदस्व मे ॥
'उत्तम दानका स्वरूप क्या है? और उससे मनुष्योंको किस फलकी प्राप्ति होती है? कौन-सा दान ऊर्ध्वगतिको ले जाता है? कौन-सा मध्यम गतिको और कौन-सा नीच गतिको ले जाता है? देवाधिदेव! यह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये ॥
एतदिच्छामि विज्ञातुं परं कौतूहलं हि मे ।
त्वदीयं वचनं सत्यं पुण्यं च मधुसूदन ॥
'मधुसूदन! मैं इस विषयको जानना चाहता हूँ और इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है; क्योंकि आपके वचन सत्य और पुण्यमय हैं' ॥
श्रीभगवानुवाच
शृणु राजन् यथान्यायं वचनं तथ्यमुत्तमम् । कथ्यमानं मया पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ श्रीभगवान्ने कहा— राजन्! मैं तुम्हें न्यायके अनुसार यथार्थ एवं उत्तम उपदेश सुनाता हूँ, ध्यान देकर सुनो। यह विषय परम पवित्र और सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला है॥
वृथा च दश जन्मानि चत्वारि च नराधिप । वृथा दानानि पञ्चाशत्पञ्चैव च यथाक्रमम् ॥ वृथा च जीवितं येषां ते च षट् परिकीर्तिताः । अनुक्रमेण वक्ष्यामि तानि सर्वाणि पार्थिव ॥ नरेश्वर! चौदह जन्म व्यर्थ समझे जाते हैं। क्रमशः पचपन प्रकारके दान निष्फल होते हैं और जिन-जिन मनुष्योंका जीवन निरर्थक होता है, उनकी संख्या छः बतलायी गयी है। भूपाल! इन सबका मैं क्रमशः वर्णन करूँगा॥
धर्मघ्नानां वृथा जन्म लुब्धानां पापिनां तथा । वृथा पाकं च येऽश्नन्ति परदाररताश्च ये । पाकभेदकरा ये च ये च स्युः सत्यवर्जिताः ॥ जो धर्मका नाश करनेवाले, लोभी, पापी, बलिवैश्वदेव किये बिना भोजन करनेवाले, परस्त्रीगामी, भोजनमें भेद करनेवाले और असत्यभाषी हैं, उनका जन्म वृथा है॥
मृष्टमश्नाति यश्चैकः क्लिश्यमानैस्तु बान्धवैः । पितरं मातरं चैव उपाध्यायं गुरुं तथा । मातुलं मातुलानीं च यो निहन्याच्छपेत वा ॥ ब्राह्मणश्चैव यो भूत्वा संध्योपासनवर्जितः । निःस्वाहो निःस्वधश्चैव शूद्राणामन्नभुग् द्विजः ॥ मम वा शंकरस्याथ ब्रह्मणो वा युधिष्ठिर । अथवा ब्राह्मणानां तु ये न भक्ता नराधमाः । वृथा जन्मान्यथैतेषां पापिनां विद्धि पाण्डव ॥ पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! जो बन्धु-बान्धवोंको क्लेश देकर अकेले ही मिठाई खानेवाले हैं, जो माता-पिता, अध्यापक, गुरु और मामा-मामीको मारते या गाली देते हैं, जो ब्राह्मण होकर भी संध्योपासनसे रहित हैं, जो अग्निहोत्रका त्याग करनेवाले हैं, जो श्राद्ध-तर्पणसे दूर रहनेवाले हैं, जो ब्राह्मण होकर शूद्रका अन्न खानेवाले हैं तथा जो मेरे, शंकरजीके, ब्रह्माजीके अथवा ब्राह्मणोंके भक्त नहीं हैं—ये चौदह प्रकारके मनुष्य अधम होते हैं। इन्हीं पापियोंके जन्मको व्यर्थ समझना चाहिये॥
अश्रद्धयापि यद् दत्तमवमानेन वापि यत् ।
दम्भार्थमपि यद् दत्तं यत् पाखण्डिहितं नृप ।। शूद्राचाराय यद् दत्तं यद् दत्त्वा चानुकीर्तितम् । रोषयुक्तं च यद् दत्तं यद् दत्तमनुशोचितम् ।। दम्भार्जितं च यद् दत्तं यच्च वाप्यनृतार्जितम् । ब्राह्मणस्वं च यद् दत्तं चौर्येणाप्यर्जितं च यत् ।। अभिशस्ताहृतं यत्तु यद् दत्तं पतिते द्विजे । निर्ब्रह्माभिहृतं यत्तु यद् दत्तं सर्वयाचकैः ।। व्रात्यैस्तु यद्धृतं दानमारूढपतितैश्च यत् । यद् दत्तं स्वैरिणीभर्त्तुः श्वशुराननुवर्त्तिने ।। यद् ग्रामयाचकहृतं यत् कृतघ्नहृतं तथा । उपपातकिने दत्तं वेदविक्रयिणे च यत् ।। स्त्रीजिताय च यद् दत्तं यद् दत्तं राजसेविने । गणकाय च यद् दत्तं यच्च कारणिकाय च ।। वृषलीपतये दत्तं यद् दत्तं शस्त्रजीविने । भृतकाय च यद् दत्तं व्यालग्राहिहृतं च यत् ।। पुरोहिताय यद् दत्तं चिकित्सकहृतं च यत् । यद् वणिक्कर्मिणे दत्तं क्षुद्रमन्त्रोपजीविने ।। यच्छूद्रजीविने दत्तं यच्च देवलकाय च । देवद्रव्याशिने दत्तं यद् दत्तं चित्रकर्मिणे ।। रङ्गोपजीविने दत्तं यच्च मांसोपजीविने । सेवकाय च यद् दत्तं यद् दत्तं ब्राह्मणब्रुवे ।। अद्देशिने च यद् दत्तं दत्तं वार्धुशिकाय च । यदनाचारिणे दत्तं यत्तु दत्तमनग्नये ।। असंध्योपासिने दत्तं यच्छूद्रग्रामवासिने । यन्मिथ्यालिङ्गिने दत्तं दत्तं सर्वाशिने च यत् ।। नास्तिकाय च यद् दत्तं धर्मविक्रयिणे च यत् । वराकाय च यद् दत्तं यद् दत्तं कूटसाक्षिणे ।। ग्रामकूटाय यद् दत्तं दानं पार्थिवपुङ्गव । वृथा भवति तत्सर्वं नात्र कार्या विचारणा ।।
राजन्! जो दान अश्रद्धा या अपमानके साथ दिया जाता है, जिसे दिखावेके लिये दिया जाता है, जो पाखण्डीको प्राप्त हुआ है, जो शूद्रके समान आचरणवाले पुरुषको दिया जाता है, जिसे देकर अपने ही मुँहसे बारंबार बखान किया गया है, जिसे रोषपूर्वक दिया गया है तथा जिसको देकर पीछेसे उसके लिये शोक किया जाता है, जो दम्भसे उपार्जित
अन्नका, झूठ बोलकर लाये हुए अन्नका, ब्राह्मणके धनका, चोरी करके लाये हुए द्रव्यका तथा कलंकी पुरुषके घरसे लाये हुए धनका दान किया गया है, जो पतित ब्राह्मणको दिया गया है, जो दान वेदविहीन पुरुषोंको और सबके यहाँ याचना करनेवालोंको दिया जाता है तथा जो संस्कारहीन पतितोंको तथा एक बार संन्यास लेकर फिर गृहस्थ-आश्रममें प्रवेश करनेवाले पुरुषोंको दिया जाता है, जो दान वेश्यागामीको और ससुरालमें रहकर गुजारा करनेवाले ब्राह्मणको दिया गया है, जिस दानको समूचे गाँवसे याचना करनेवाले और कृतघ्नने ग्रहण किया है एवं जो दान उपपातकीको, वेद बेचनेवालेको, स्त्रीके वशमें रहनेवालेको, राजसेवकको, ज्योतिषीको, तान्त्रिकको, शूद्रजातिकी स्त्रीके साथ सम्बन्ध रखनेवालेको, अस्त्र-शस्त्रसे जीविका चलानेवालेको, नौकरी करनेवालेको, साँप पकड़नेवालेको और पुरोहिती करनेवालेको दिया जाता है, जिस दानको वैद्यने ग्रहण किया है, राजश्रेष्ठ! जो दान बनियेका काम करनेवालेको, क्षुद्र मन्त्र जपकर जीविका चलानेवालेको, शूद्रके यहाँ गुजारा करनेवालेको, वेतन लेकर मन्दिरमें पूजा करनेवालेको, देवोत्तर सम्पत्तिको खा जानेवालेको, तस्वीर बनानेका काम करनेवालेको, रंगभूमिमें नाच-कूदकर जीविका चलानेवालेको, मांस बेचकर जीवन-निर्वाह करनेवालेको, सेवाका काम करनेवालेको, ब्राह्मणोचित आचारसे हीन होकर भी अपनेको ब्राह्मण बतलानेवालेको, उपदेश देनेकी शक्तिसे रहितको, ब्याजखोरको, अनाचारीको, अग्निहोत्र न करनेवालेको, संध्योपासनासे अलग रहनेवालेको, शूद्रके गाँवमें निवास करनेवालेको, झूठे वेश धारण करनेवालेको, सबके साथ और सब कुछ खानेवालेको, नास्तिकको, धर्मविक्रेताको, नीच वृत्तिवालेको, झूठी गवाही देनेवालेको तथा कूटनीतिका आश्रय लेकर गाँवके लोगोंमें लड़ाई-झगड़ा करानेवाले ब्राह्मणको दिया जाता है, वह सब निष्फल होता है, इसमें कोई विचारणीय बात नहीं है ॥
विप्रनामधरा एते लोलुपा ब्राह्मणाधमाः ।
नात्मानं तारयन्त्येते न दातारं युधिष्ठिर ॥
युधिष्ठिर! ये सब विषयलोलुप, विप्रनामधारी ब्राह्मण अधम हैं, ये न तो अपना उद्धार कर सकते हैं और न दाताका ही ॥
एतेभ्यो दत्तमात्राणि दानानि सुबहून्यपि ।
वृथा भवन्ति राजेन्द्र भस्मन्याज्याहुतिर्यथा ॥
राजेन्द्र! उपर्युक्त ब्राह्मणोंको दिये हुए दान बहुत हों तो भी राखमें डाली हुई घीकी आहुतिके समान व्यर्थ हो जाते हैं ॥
एतेषु यत् फलं किंचिद् भविष्यति कथंचन ।
राक्षसाश्च पिशाचाश्च तद् विलुम्पन्ति हर्षिताः ॥
उन्हें दिये गये दानका जो कुछ फल होनेवाला होता है, उसे राक्षस और पिशाच प्रसन्नताके साथ लूट ले जाते हैं ॥
वृथा ह्येतानि दत्तानि कथितानि समासतः । जीवितं तु तथा ह्येषां तच्छृणुष्व युधिष्ठिर ।। युधिष्ठिर! ये सब वृथा दान संक्षेपमें बताये गये। अब जिन-जिन मनुष्योंका जीवन व्यर्थ है, उनका परिचय दे रहा हूँ; सुनो ।।
ये मां न प्रतिपद्यन्ते शङ्करं वा नराधमाः । ब्राह्मणान् वा महीदेवान् वृथा जीवन्ति ते नराः ।। जो नराधम मेरी, भगवान् शंकरकी अथवा भूमण्डलके देवता ब्राह्मणोंकी शरण नहीं लेते, वे मनुष्य व्यर्थ ही जीते हैं ।।
हेतुशास्त्रेषु ये सक्ताः कुदृष्टिपथमाश्रिताः । देवान् निन्दन्त्यनाचारा वृथा जीवन्ति ते नराः ।। जिनकी कोरे तर्कशास्त्रमें ही आसक्ति है, जो नास्तिक-पथका अवलम्बन करते हैं, जिन्होंने आचार त्याग दिया है तथा जो देवताओंकी निन्दा करते हैं, वे मनुष्य व्यर्थ ही जी रहे हैं ।।
कुशलैः कृतशास्त्राणि पठित्वा ये नराधमाः । विप्रान् निन्दन्ति यज्ञांश्च वृथा जीवन्ति ते नराः ।। जो नराधम नास्तिकोंके शास्त्र पढ़कर ब्राह्मण और यज्ञोंकी निन्दा करते हैं, वे व्यर्थ ही जीवन धारण करते हैं ।।
ये दुर्गां वा कुमारं वा वायुमग्निं जलं रविम् । पितरं मातरं चैव गुरुमिन्द्रं निशाकरम् । मूढा निन्दन्त्यनाचारा वृथा जीवन्ति ते नराः ।। जो मूढ़ दुर्गा, स्वामी कार्तिकेय, वायु, अग्नि, जल, सूर्य, माता-पिता, गुरु, इन्द्र तथा चन्द्रमाकी निन्दा करते और आचारका पालन नहीं करते, वे मनुष्य भी निरर्थक ही जीवन व्यतीत करते हैं ।।
विद्यमाने धने यस्तु दानधर्मविवर्जितः । मृष्टमश्नाति यश्चैको वृथा जीवति सोऽपि च । वृथा जीवितमाख्यातं दानकालं ब्रवीमि ते ।। जो धन होनेपर भी दान और धर्म नहीं करता तथा दूसरोंको न देकर अकेले ही मिठाई खाया करता है, वह भी व्यर्थ ही जीता है। इस प्रकार व्यर्थ जीवनकी बात बतायी गयी। अब दानका समय बताता हूँ ।।
तमोनिविष्टचित्तेन दत्तं दानं तु यद् भवेत् । तदस्य फलमश्नाति नरो गर्भगतो नृप ।। राजन्! तमोगुणमें आविष्ट हुए चित्तवाले मनुष्यके द्वारा जो दान दिया जाता है, उसका फल मनुष्य गर्भावस्थामें भोगता है ।।
ईर्ष्यामत्सरसंयुक्तो दम्भार्थं चार्थकारणात् । ददाति दानं यो मर्त्यो बालभावे तदश्नुते ।। ईर्ष्या और मत्सरतासे युक्त मनुष्य अर्थलोभसे और दम्भपूर्वक जिस दानको देता है, उसका फल वह बाल्यावस्थामें भोगता है ।।
भोक्तुं भोगमशक्तस्तु व्याधिभिः पीडितो भृशम् । ददाति दानं यो मर्त्यो वृद्धभावे तदश्नुते ।। भोगोंको भोगनेमें अशक्त, अत्यन्त व्याधिसे पीड़ित मनुष्य जिस दानको देता है, उसके फलका उपभोग वह वृद्धावस्थामें करता है ।।
श्रद्धायुक्तः शुचिः स्नातः प्रसन्नेन्द्रियमानसः । ददाति दानं यो मर्त्यो यौवने स तदश्नुते ।। जो मनुष्य स्नान करके पवित्र हो मन और इन्द्रियोंको प्रसन्न रखकर श्रद्धाके साथ दान करता है, उसके फलको वह यौवनावस्थामें भोगता है ।।
स्वयं नीत्वा तु यद् दानं भक्त्या पात्रे प्रदीयते । तत्सार्वकालिकं विद्धि दानमामरणान्तिकम् ।। जो स्वयं देने योग्य वस्तु ले जाकर भक्तिपूर्वक सत्पात्रको दान करता है, उसको मरणपर्यन्त हर समय उस दानका फल प्राप्त होता है, ऐसा समझो ।।
राजसं सात्त्विकं चापि तामसं च युधिष्ठिर । दानं दानफलं चैव गतिं च त्रिविधां शृणु ।। युधिष्ठिर! दान और उसका फल सात्त्विक, राजस और तामस भेदसे तीन-तीन प्रकारका होता है तथा उसकी गति भी तीन प्रकारकी होती है, इसे सुनो ।।
दानं दातव्यमित्येव मतिं कृत्वा द्विजाय वै । उपकारवियुक्ताय यद् दत्तं तद्धि सात्त्विकम् ।। दान देना कर्तव्य है—ऐसा समझकर अपना उपकार न करनेवाले ब्राह्मणको जो दान दिया जाता है, वही सात्त्विक है ।।
श्रोत्रियाय दरिद्राय बहुभृत्याय पाण्डव । दीयते यत् प्रहृष्टेन तत् सात्त्विकमुदाहृतम् ।। पाण्डुनन्दन! जिसका कुटुम्ब बहुत बड़ा हो तथा जो दरिद्र और वेदका विद्वान् हो, ऐसे ब्राह्मणको प्रसन्नतापूर्वक जो कुछ दिया जाता है, वह भी सात्त्विक कहा जाता है ।।
वेदाक्षरविहीनाय यत्तु पूर्वोपकारिणे । समृद्धाय च यद् दत्तं तद् दानं राजसं स्मृतम् ।। परंतु जो वेदका एक अक्षर भी नहीं जानता, जिसके घरमें काफी सम्पत्ति मौजूद है तथा जो पहले कभी अपना उपकार कर चुका है, ऐसे ब्राह्मणको दिया हुआ दान राजस माना गया है ।।
सम्बन्धिने च यद् दत्तं प्रमत्ताय च पाण्डव । फलार्थिभिरपात्राय तद् दानं राजसं स्मृतम् ॥ पाण्डव! अपने सम्बन्धी और प्रमादीको दिया हुआ, फलकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंके द्वारा दिया हुआ तथा अपात्रको दिया हुआ दान भी राजस ही है ॥
वैश्वदेवविहीनाय दानमश्रोत्रियाय च । दीयते तस्करायापि तद् दानं तामसं स्मृतम् ॥ जो ब्राह्मण बलिवैश्वदेव नहीं करता, वेदका ज्ञान नहीं रखता तथा चोरी किया करता है, उसको दिया हुआ दान तामस है ॥
सरोषमवधूतं च क्लेशयुक्तमवज्ञया । सेवकाय च यद् दत्तं तत् तामसमुदाहृतम् ॥ क्रोध, तिरस्कार, क्लेश और अवहेलनापूर्वक तथा सेवकको दिया हुआ दान भी तामस ही बतलाया गया है ॥
देवा पितृगणाश्चैव मुनयश्चाग्नयस्तथा । सात्त्विकं दानमश्नन्ति तुष्यन्ति च नरेश्वर ॥ नरेश्वर! सात्त्विक दानको देवता, पितर, मुनि और अग्नि ग्रहण करते हैं तथा उससे इन्हें बड़ा संतोष होता है ॥
दानवा दैत्यसंघाश्च ग्रहा यक्षाः सराक्षसाः । राजसं दानमश्नन्ति वर्जितं पितृदैवतैः ॥ राजस दानका दानव, दैत्य, ग्रह, यक्ष और राक्षस उपभोग करते हैं, पितर और देवता नहीं करते ॥
पिशाचाः प्रेतसंघाश्च कश्मला ये मलीमसाः । तामसं दानमश्नन्ति गतिं च त्रिविधां शृणु ॥ तामस दानका फल पापी और मलिन कर्म करनेवाले प्रेत एवं पिशाच भोगते हैं। अब त्रिविध गतिका वर्णन सुनो ॥
सात्त्विकानां तु दानानामुत्तमं फलमश्रुते । मध्यमं राजसानां तु तामसानां तु पश्चिमम् ॥ सात्त्विक दानोंका फल उत्तम, राजस दानोंका मध्यम और तामस दानोंका फल अधम होता है ॥
अभिगम्योपनीतानां दानानां फलमुत्तमम् । मध्यमं तु समाहूय जघन्यं याचते फलम् ॥ जो दान सामने जाकर दिया जाता है, उसका फल उत्तम होता है; जो दानपात्रको बुलाकर दिया जाता है, उसका फल मध्यम होता है और जो याचना करनेवालेको दिया जाता है, उसका फल जघन्य होता है ॥
अयाचितप्रदाता यः स याति गतिमुत्तमाम्। समाहूय तु यो दद्यान्मध्यमां स गतिं व्रजेत् । याचितो यश्च वै दद्याज्जघन्यां स गतिं व्रजेत् ॥ जो याचना न करनेवालेको देता है, वह उत्तम गतिको प्राप्त करता है; जो बुलाकर देता है, वह मध्यम गतिको जाता है और जो याचना करनेवालेको देता है, वह नीची गति पाता है ॥
उत्तमा दैविकी ज्ञेया मध्यमा मानुषी गतिः । गतिर्जघन्या तिर्यक्षु गतिरेषा त्रिधा स्मृता ॥ दैवी गतिको उत्तम समझना चाहिये। मानुषी गति मध्यम है और तिर्यग्योनियाँ नीच गति है—यह इनका तीन प्रकार माना गया है ॥
पात्रभूतेषु विप्रेषु संस्थितेष्वाहिताग्निषु । यत्तु निक्षिप्यते दानमक्षयं सम्प्रकीर्तितम् ॥ दानके उत्तम पात्र अग्निहोत्री ब्राह्मणको जो दान दिया जाता है, वह अक्षय बतलाया गया है ॥
श्रोत्रियाणां दरिद्राणां भरणं कुरु पार्थिव । समृद्धानां द्विजातीनां कुर्यास्तेषां तु रक्षणम् ॥ अतः भूपाल! जो वेदके विद्वान् होते हुए दरिद्र हों, उनके भरण-पोषणका तुम स्वयं प्रबन्ध करो और सम्पत्तिशाली द्विजोंकी रक्षा करते रहो ॥
दरिद्रान् वित्तहीनांश्च प्रदानैः सुष्ठु पूजय । आतुरस्यौषधैः कार्यं नीरुजस्य किमौषधैः ॥ धनहीन दरिद्र ब्राह्मणोंको दान देकर उनकी भलीभाँति पूजा करो; क्योंकि रोगीको ही ओषधिकी आवश्यकता है, नीरोगको ओषधिसे क्या प्रयोजन? ॥
पापं प्रतिग्रहीतारं प्रदातुरुपगच्छति । प्रतिग्रहीतुर्यत् पुण्यं प्रदातारमुपैति तत् । तस्माद् दानं सदा कार्यं परत्र हितमिच्छता ॥ दाताका पाप दानके साथ ही दान लेनेवालेके पास चला जाता है और उसका पुण्य दाताको प्राप्त हो जाता है, अतः परलोकमें अपना हित चाहनेवाले पुरुषको सदा दान करते रहना चाहिये ॥
वेदविद्यावदातेषु सदा शूद्रान्नवर्जिषु । प्रयत्नेन विधातव्यो महादानमयो निधिः ॥ जो वेद-विद्या पढ़कर अत्यन्त शुद्ध आचार-विचारसे रहते हों और शूद्रोंका अन्न कभी नहीं ग्रहण करते हों, ऐसे विद्वानोंको प्रयत्नपूर्वक बड़े-बड़े दानोंका भाण्डार बनाना चाहिये ॥
येषां दाराः प्रतीक्ष्यन्ते सहस्रस्येव लम्भनम् । भुक्तशेषस्य भक्तस्य तान् निमन्त्रय पाण्डव ।। पाण्डुनन्दन! जिनकी स्त्रियाँ अपने पतिके भोजनसे बचे हुए अन्नको हजारों गुना लाभ समझकर उसके मिलनेकी प्रतीक्षा किया करती हैं, ऐसे ब्राह्मणोंको तुम भोजनके लिये निमन्त्रित करना ।।
आमन्त्र्य तु निराशानि न कर्तव्यानि भारत । कुलानि सुदरिद्राणि तेषामाशा हता भवेत् ।। भारत! दरिद्रकुलके ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करके उन्हें निराश न लौटाना, अन्यथा उनकी आशा मारी जायगी ।।
मद्भक्ता ये नरश्रेष्ठ मद्गता मत्परायणाः । मद्याजिनो मन्नियमास्तान् प्रयत्नेन पूजयेत् ।। नरश्रेष्ठ! जो मेरे भक्त हों, मेरेमें मन लगानेवाले हों, मेरी शरणमें हों, मेरा पूजन करते हों और नियमपूर्वक मुझमें ही लगे रहते हों, उनका यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये ।।
तेषां तु पावनायाहं नित्यमेव युधिष्ठिर । उभे संध्येऽधितिष्ठामि ह्यस्कन्नं तद् व्रतं मम ।। युधिष्ठिर! अपने उन भक्तोंको पवित्र करनेके लिये मैं प्रतिदिन दोनों समय संध्यामें व्याप्त रहता हूँ। मेरा यह नियम कभी खण्डित नहीं होता ।।
तस्मादष्टाक्षरं मन्त्रं मद्भक्तैर्वीतकल्मषैः । संध्याकाले तु जप्तव्यं सततं चात्मशुद्धये ।। इसलिये मेरे निष्पाप भक्तजनोंको चाहिये कि वे आत्मशुद्धिके लिये संध्याके समय निरन्तर अष्टाक्षर मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय)-का जप करते रहें ।।
अन्येषामपि विप्राणां किल्बिषं हि विनश्यति । उभे संध्येऽप्युपासीत तस्माद् विप्रो विशुद्धये ।। संध्या और अष्टाक्षर-मन्त्रका जप करनेसे दूसरे ब्राह्मणोंके भी पाप नष्ट हो जाते हैं, अतः चित्तशुद्धिके लिये प्रत्येक ब्राह्मणको दोनों कालकी संध्या करनी चाहिये ।।
दैवे श्राद्धेऽपि विप्रः स नियोक्तव्योऽजुगुप्सया । जुगुप्सितस्तु यः श्राद्धं दहत्यग्निरिवेन्धनम् ।। जो ब्राह्मण इस प्रकार संध्योपासन और जप करता हो, उसे देवकार्य और श्राद्धमें नियुक्त करना चाहिये। उसकी निन्दा कदापि नहीं करनी चाहिये; क्योंकि निन्दा करनेपर ब्राह्मण उस श्राद्धको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे आग ईंधनको जला डालती है ।।
भारतं मानवो धर्मो वेदाः साङ्गाश्चिकित्सितम् । आज्ञासिद्धानि चत्वारि न हन्तव्यानि हेतुभिः ।।
महाभारत, मनुस्मृति, अंगोंसहित चारों वेद और आयुर्वेद शास्त्र—ये चारों सिद्ध उपदेश देनेवाले हैं, अतः तर्कद्वारा इनका खण्डन नहीं करना चाहिये ।। न ब्राह्मणान् परीक्षेत दैवे कर्मणि धर्मवित् । महान् भवेत् परीवादो ब्राह्मणानां परीक्षणे ।। धर्मको जाननेवाले पुरुषको देवसम्बन्धी कार्यमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि ब्राह्मणोंकी परीक्षा करनेसे यजमानकी बड़ी निन्दा होती है ।। श्वत्वं प्राप्नोति निन्दित्वा परीवादात् खरो भवेत् । कृमिर्भवत्यभिभवात् कीटो भवति मत्सरात् ।। ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला मनुष्य कुत्तेकी योनिमें जन्म लेता है, उसपर दोषारोपण करनेसे गदहा होता है और उसका तिरस्कार करनेसे कृमि होता है तथा उसके साथ द्वेष करनेसे वह कीड़ेकी योनिमें जन्म पाता है ।। दुर्वृत्ता वा सुवृत्ता वा प्राकृता वा सुसंस्कृताः । ब्राह्मणा नावमन्तव्या भस्मच्छन्ना इवाग्नयः ।। ब्राह्मण चाहे दुराचारी हों या सदाचारी, संस्कारहीन हों या संस्कारोंसे सम्पन्न, उनका अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे भस्मसे ढकी हुई आगके तुल्य हैं ।। क्षत्रियं चैव सर्पं च ब्राह्मणं च बहुश्रुतम् । नावमन्येत मेधावी कृशानपि कदाचन ।। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि क्षत्रिय, साँप और विद्वान् ब्राह्मण यदि कमजोर हों तो भी कभी उनका अपमान न करे ।। एतत् त्रयं हि पुरुषं निर्दहेदवमानितम् । तस्मादेतत् प्रयत्नेन नावमन्येत बुद्धिमान् ।। क्योंकि वे तीनों अपमानित होनेपर मनुष्यको भस्म कर डालते हैं। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको प्रयत्नपूर्वक उनके अपमानसे बचना चाहिये ।। यथा सर्वास्ववस्थासु पावको दैवतं महत् । तथा सर्वास्ववस्थासु ब्राह्मणो दैवतं महत् ।। जिस प्रकार सभी अवस्थाओंमें अग्नि महान् देवता हैं, उसी प्रकार सभी अवस्थाओंमें ब्राह्मण महान् देवता हैं ।। व्यङ्गाः काणाश्च कुब्जाश्च वामनाङ्गास्तथैव च । सर्वे दैवे नियोक्तव्या व्यामिश्रा वेदपारगैः ।। अंगहीन, काने, कुबड़े और बौने—इन सब ब्राह्मणोंको देवकार्यमें वेदके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ नियुक्त करना चाहिये ।। मन्युं नोत्पादयेत् तेषां न चारिष्टं समाचरेत् । मन्युप्रहरणा विप्रा न विप्राः शस्त्रपाणयः ।।
उनपर क्रोध न करे, न उनका अनिष्ट ही करे; क्योंकि ब्राह्मण क्रोधरूपी शस्त्रसे ही प्रहार करते हैं, वे शस्त्र हाथमें रखनेवाले नहीं हैं।। मन्युना घ्नन्ति ते शत्रून् वज्रेणेन्द्र इवासुरान् । ब्राह्मणो हि महत् दैवं जातिमात्रेण जायते ।। जैसे इन्द्र असुरोंका वज्रसे नाश करते हैं, वैसे ही वे ब्राह्मण क्रोधसे शत्रुक्का नाश करते हैं; क्योंकि ब्राह्मण जातिमात्रसे ही महान् देवभावको प्राप्त हो जाता है ।। ब्राह्मणाः सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये । किं पुनर्ये च कौन्तेय संध्यां नित्यमुपासते ।। कुन्तीनन्दन! सारे प्राणियोंके धर्मरूपी खजानेकी रक्षा करनेके लिये साधारण ब्राह्मण भी समर्थ हैं, फिर जो नित्य संध्योपासन करते हैं, उनके विषयमें तो कहना ही क्या है? ।। यस्यास्येन समश्नन्ति हव्यानि त्रिदिवौकसः । कव्यानि चैव पितरः किं भूतमधिकं ततः ।। जिसके मुखसे स्वर्गवासी देवगण हविष्यका और पितर कव्यका भक्षण करते हैं, उससे बढ़कर कौन प्राणी हो सकता है? ।। उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्तिर्धर्मस्य शाश्वती । स हि धर्मार्थमुत्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते ।। ब्राह्मण जन्मसे ही धर्मकी सनातन मूर्ति है। वह धर्मके ही लिये उत्पन्न हुआ है और वह ब्रह्मभावको प्राप्त होनेमें समर्थ है ।। स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वयं वस्ते ददाति च । आनृशंस्याद् ब्राह्मणस्य भुञ्जते हीतरे जनाः । तस्मात् ते नावमन्तव्या मद्भक्ता हि द्विजाः सदा ।। ब्राह्मण अपना ही खाता, अपना ही पहनता और अपना ही देता है। दूसरे मनुष्य ब्राह्मणकी दयासे ही भोजन पाते हैं। अतः ब्राह्मणोंका कभी अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे सदा ही मुझमें भक्ति रखनेवाले होते हैं ।। आरण्यकोपनिषदि ये तु पश्यन्ति मां द्विजाः । निगूढं निष्कलावस्थं तान् प्रयत्नेन पूजय ।। जो ब्राह्मण बृहदारण्यक-उपनिषदमें वर्णित मेरे गूढ़ और निष्कल स्वरूपका ज्ञान रखते हैं, उनका यत्नपूर्वक पूजन करना ।। स्वगृहे वा प्रवासे वा दिवारात्रमथापि वा । श्रद्धया ब्राह्मणाः पूज्या मद्भक्ता ये च पाण्डव ।। पाण्डुनन्दन! घरपर या विदेशमें, दिनमें या रातमें मेरे भक्त ब्राह्मणोंकी निरन्तर श्रद्धाके साथ पूजा करते रहना चाहिये ।। नास्ति विप्रसमं दैवं नास्ति विप्रसमो गुरुः ।