महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
लेनेवाले तथा दृष्टिको बरबस अपनी ओर आकृष्ट कर लेनेवाले थे। उन मंगलमय भवनोंसे घिरा और ऋषि-मुनियोंसे भरा हुआ वह आश्रम बड़ा मनोहर जान पड़ता था ॥ ६४-६५ ॥
ततस्तस्याभवच्चिन्ता कुत्र वासो भवेदिति ।
अथ द्वारं समभितो गत्वा स्थित्वा ततोऽब्रवीत् ॥ ६६ ॥
वहाँ पहुँचकर अष्टावक्रके मनमें यह चिन्ता हुई कि अब कहाँ ठहरा जाय। यह विचार उठते ही वे प्रमुख द्वारके समीप गये और खड़े होकर बोले— ॥ ६६ ॥
अतिथिं समनुप्राप्तमभिजानन्तु येऽत्र वै ।
अथ कन्याः परिवृता गृहात् तस्माद् विनिर्गताः ॥ ६७ ॥
नानारूपाः सप्त विभो कन्याः सर्वा मनोहराः ।
यां यामपश्यत् कन्यां वै सा सा तस्य मनोऽहरत् ॥ ६८ ॥
'इस घरमें जो लोग रहते हों, उन्हें यह विदित होना चाहिये कि मैं एक अतिथि यहाँ आया हूँ।' उनके इस प्रकार कहते ही उस घरसे एक साथ सात कन्याएँ निकलीं। वे सब-की-सब भिन्न-भिन्न रूपवाली तथा बड़ी मनोहर थीं। विभो! अष्टावक्र मुनि उनमेंसे जिस-जिस कन्याकी ओर देखते, वही-वही उनका मन हर लेती थी ॥ ६७-६८ ॥
न च शक्तो वारयितुं मनोऽस्याथावसीदति ।
ततो धृतिः समुत्पन्ना तस्य विप्रस्य धीमतः ॥ ६९ ॥
वे अपने मनको रोक नहीं पाते थे। बलपूर्वक रोकनेपर उनका मन शिथिल होता जाता था। तदनन्तर उन बुद्धिमान् ब्राह्मणके हृदयमें किसी तरह धैर्य उत्पन्न हुआ ॥ ६९ ॥
अथ तं प्रमदाः प्राहुर्भगवान् प्रविशत्विति ।
स च तासां सुरूपाणां तस्यैव भवनस्य हि ॥ ७० ॥
कौतूहलं समाविष्टः प्रविवेश गृहं द्विजः ।
तत्पश्चात् वे सातों तरुणी स्त्रियाँ बोलीं—'भगवन्! आप घरके भीतर प्रवेश करें।' ऋषिके मनमें उन सुन्दरियोंके तथा उस घरके विषयमें कौतूहल पैदा हो गया था; अतः उन्होंने उस घरमें प्रवेश किया ॥ ७० १/२ ॥
तत्रापश्यज्जरायुक्तामरजोऽम्बरधारिणीम् ॥ ७१ ॥
वृद्धां पर्यङ्कमासीनां सर्वाभरणभूषिताम् ।
वहाँ उन्होंने एक जराजीर्ण वृद्धा स्त्रीको देखा, जो निर्मल वस्त्र धारण किये समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो पलँगपर बैठी हुई थी ॥ ७१ १/२ ॥
स्वस्तीति तेन चैवोक्ता सा स्त्री प्रत्यवदत् तदा ॥ ७२ ॥
प्रत्युत्थाय च तं विप्रमास्यतामित्युवाच ह ।
अष्टावक्रने 'स्वस्ति' कहकर उसे आशीर्वाद दिया। वह स्त्री उनके स्वागतके लिये पलँगसे उठकर खड़ी हो गयी और इस प्रकार बोली—'विप्रवर! बैठिये' ॥ ७२ १/२ ॥
अष्टावक्र उवाच
सर्वाः स्वानालयान् यान्तु एका मामुपतिष्ठतु ॥ ७३ ॥
प्रज्ञाता या प्रशान्ता या शेषा गच्छन्तु च्छन्दतः ।
अष्टावक्रने कहा—'सारी स्त्रियाँ अपने-अपने घरको चली जायें। केवल एक ही मेरे पास रह जाय। जो ज्ञानवती तथा मन और इन्द्रियोंको शान्त रखनेवाली हो, उसीको यहाँ रहना चाहिये। शेष स्त्रियाँ अपनी इच्छाके अनुसार जा सकती हैं' ॥ ७३ १/२ ॥
ततः प्रदक्षिणीकृत्य कन्यास्तास्तमृषिं तदा ॥ ७४ ॥
निश्चक्रमुर्गृहात् तस्मात् सा वृद्धाथ व्यतिष्ठत ।
तदनन्तर वे सब कन्याएँ उस समय ऋषिकी परिक्रमा करके उस घरसे निकल गयीं। केवल वह वृद्धा ही वहाँ ठहरी रही ॥ ७४ १/२ ॥
अथ तां संविशन् प्राह शयने भास्वरे तदा ॥ ७५ ॥
त्वयापि सुप्यतां भद्रे रजनी ह्यतिवर्तते ।
तत्पश्चात् उज्ज्वल एवं प्रकाशमान शय्यापर सोते हुए ऋषिने उस वृद्धासे कहा—'भद्रे! अब तुम भी सो जाओ। रात अधिक बीत चली है' ॥ ७५ १/२ ॥
संलापात् तेन विप्रेण तथा सा तत्र भाषिता ॥ ७६ ॥
द्वितीये शयने दिव्ये संविवेश महाप्रभे ।
बातचीतके प्रसङ्गमें उस ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर वह भी दूसरे अत्यन्त प्रकाशमान दिव्य पलँगपर सो रही ॥ ७६ १/२ ॥
अथ सा वेपमानाङ्गी निमित्तं शीतजं तदा ॥ ७७ ॥
व्यपदिश्य महर्षेर्वै शयनं व्यवरोहत ।
स्वागतेनागतां तां तु भगवानभ्यभाषत ॥ ७८ ॥
थोड़ी ही देरमें वह सरदी लगनेका बहाना करके थरथर काँपती हुई आयी और महर्षिकी शय्यापर आरूढ़ हो गयी। पास आनेपर भगवान् अष्टावक्रने 'आइये, स्वागत है' ऐसा कहकर उसके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया ॥ ७७-७८ ॥
सोपगूढद् भुजाभ्यां तु ऋषिं प्रीत्या नरर्षभ ।
निर्विकारमृषिं चापि काष्ठकुड्योपमं तदा ॥ ७९ ॥
नरश्रेष्ठ! उसने प्रेमपूर्वक दोनों भुजाओंसे ऋषिका आलिंगन कर लिया तो भी उसने देखा, ऋषि अष्टावक्र सूखे काठ और दीवारके समान विकारशून्य हैं ॥ ७९ ॥
दुःखिता प्रेक्ष्य संजल्पमकार्षीदृषिणा सह ।
ब्रह्मन्नकामतऽन्यास्ति स्त्रीणां पुरुषतो धृतिः ॥ ८० ॥
कामेन मोहिता चाहं त्वां भजन्तीं भजस्व माम् ।
प्रहृष्टो भव विप्रर्षे समागच्छ मया सह ॥ ८१ ॥
उनकी ऐसी स्थिति देख वह बहुत दुखी हो गयी और मुनिसे इस प्रकार बोली—'ब्रह्मन्! पुरुषको अपने समीप पाकर उसके काम-व्यवहारको छोड़कर और किसी बातसे स्त्रीको धैर्य नहीं रहता। मैं कामसे मोहित होकर आपकी सेवामें आयी हूँ। आप मुझे स्वीकार कीजिये। ब्रह्मर्षे! आप प्रसन्न हों और मेरे साथ समागम करें।।
उपगूह च मां विप्र कामार्तां भृशं त्वयि । एतद्धि तव धर्मात्मंस्तपसः पूज्यते फलम् ॥ ८२ ॥
'विप्रवर! आप मेरा आलिंगन कीजिये। मैं आपके प्रति अत्यन्त कामातुर हूँ। धर्मात्मन्! यही आपकी तपस्याका प्रशस्त फल है ॥ ८२ ॥
प्रार्थितं दर्शनादेव भजमानां भजस्व माम् । मम चेदं धनं सर्वं यच्चान्यदपि पश्यसि ॥ ८३ ॥ प्रभुस्त्वं भव सर्वत्र मयि चैव न संशयः । सर्वान् कामान् विधास्यामि रमस्व सहितो मया ॥ ८४ ॥
'मैं आपको देखते ही आपके प्रति अनुरक्त हो गयी हूँ; अतः आप मुझ सेविकाको अपनाइये। मेरा यह सारा धन तथा और जो कुछ आप देख रहे हैं, उस सबके तथा मेरे भी आप ही स्वामी हैं—इसमें संशय नहीं है। आप मेरे साथ रमण कीजिये। मैं आपकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करूँगी ॥ ८३-८४ ॥
रमणीये वने विप्र सर्वकामफलप्रदे । त्वद्वशाहं भविष्यामि रंस्यसे च मया सह ॥ ८५ ॥
'ब्रह्मन्! सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलको देनेवाले इस रमणीय वनमें मैं आपके अधीन होकर रहूँगी। आप मेरे साथ रमण कीजिये ॥ ८५ ॥
सर्वान् कामानुपाश्नीमो ये दिव्या ये च मानुषाः । नातः परं हि नारीणां विद्यते च कदाचन ॥ ८६ ॥ यथा पुरुषसंसर्गः परमेतद्धि नः फलम् ।
'हमलोग यहाँ दिव्य और मनुष्यलोक-सम्बन्धी सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करेंगे। स्त्रियोंके लिये पुरुषसंसर्ग जितना प्रिय है, उससे बढ़कर दूसरा कोई फल कदापि प्रिय नहीं होता। यही हमारे लिये सर्वोत्तम फल है ।।
आत्मच्छन्देन वर्तन्ते नार्यो मन्मथचोदिताः ॥ ८७ ॥ न च दह्यन्ति गच्छन्त्यः सुतप्तैरपि पांसुभिः ।
'कामसे प्रेरित हुई नारियाँ सदा अपनी इच्छाके अनुसार बर्ताव करती हैं। कामसे संतप्त होनेपर वे तपी हुई धूलमें भी चलती हैं; परंतु इससे उनके पैर नहीं जलते' ॥ ८७ ॥
अष्टावक्र उवाच
परदारानहं भद्रे न गच्छेयं कथंचन ॥ ८८ ॥ दूषितं धर्मशास्त्रज्ञैः परदाराभिमर्शनम् । अष्टावक्र बोले— भद्रे! मैं परायी स्त्रीके साथ किसी तरह संसर्ग नहीं कर सकता; क्योंकि धर्मशास्त्रके विद्वानोंने परस्त्रीसमागमकी निन्दा की है ॥ ८८ १/२ ॥ भद्रे निर्वेष्टुकामं मां विद्धि सत्येन वै शपे ॥ ८९ ॥ विषयेष्वनभिज्ञोऽहं धर्मार्थं किल संततिः । एवं लोकान् गमिष्यामि पुत्रैरिति न संशयः ॥ ९० ॥ भद्रे धर्मं विजानीहि ज्ञात्वा चोपरमस्व ह । भद्रे! मैं सत्यकी सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि एक मनोनीत मुनिकुमारीके साथ विवाह करना चाहता हूँ। तुम इसे ठीक समझो। मैं विषयोंसे अनभिज्ञ हूँ। केवल धर्मके लिये संतानकी प्राप्ति मुझे अभीष्ट है; अतः यही मेरे विवाहका उद्देश्य है। ऐसा होनेपर मैं पुत्रोंद्वारा अभीष्ट लोकोंमें जाऊँगा। इसमें संशय नहीं है। भद्रे! तुम धर्मको समझो और उसे समझकर इस स्वेच्छाचारसे निवृत्त हो जाओ ॥ ८९-९० १/२ ॥
स्त्र्युवाच
नानिलोऽग्निर्न वरुणो न चान्ये त्रिदशा द्विज ॥ ९१ ॥ प्रियाः स्त्रीणां यथा कामो रतिशीला हि योषितः । सहस्रे किल नारीणां प्राप्यैतैका कदाचन ॥ ९२ ॥ तथा शतसहस्रेषु यदि काचित् पतिव्रता । स्त्री बोली— ब्रह्मन्! वायु, अग्नि, वरुण तथा अन्य देवता भी स्त्रियोंको वैसे प्रिय नहीं हैं, जैसा उन्हें काम प्रिय लगता है; क्योंकि स्त्रियाँ स्वभावतः रतिकी इच्छुक होती हैं। सहस्रों नारियोंमें कभी कोई एक ऐसी स्त्री मिलती है जो रतिलोलुप न हो तथा लाखों स्त्रियोंमें शायद ही कोई एक पतिव्रता मिल सके ॥ ९१-९२ १/२ ॥ नैता जानन्ति पितरं न कुलं न च मातरम् ॥ ९३ ॥ न भ्रातॄन् न च भर्तारं न च पुत्रान् न देवरान् । लीलायन्त्यः कुलं घ्नन्ति कूलानीव सरिद्वराः । दोषान् सर्वांश्च मत्वाऽऽशु प्रजापतिरभाषत ॥ ९४ ॥ ये स्त्रियाँ न पिताको जानती हैं न माताको, न कुलको समझती हैं न भाइयोंको। पति, पुत्र तथा देवरोंकी भी ये परवाह नहीं करती हैं। अपने लिये रतिकी इच्छा रखकर ये समस्त कुलकी मर्यादाका नाश कर डालती हैं, ठीक उसी तरह जैसे बड़ी-बड़ी नदियाँ अपने तटोंको ही तोड़-फोड़ देती हैं। इन सब दोषोंको समझकर ही प्रजापतिने स्त्रियोंके विषयमें उपर्युक्त बातें कही हैं ॥
भीष्म उवाच
ततः स ऋषिरैकाग्रस्तां स्त्रियं प्रत्यभाषत । आस्यतां रुचितश्छन्दः किं च कार्यं ब्रवीहि मे ॥ ९५ ॥ भीष्मजी कहते हैं— राजन्! तब ऋषिने एकाग्रचित्त होकर उस स्त्रीसे कहा—'चुप रहो। मनमें भोगकी रुचि होनेपर स्वेच्छाचार होता है। मेरी रुचि नहीं है, अतः मुझसे यह काम नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त यदि मुझसे कोई काम हो तो बताओ' ॥ ९५ ॥
सा स्त्री प्रोवाच भगवन् द्रक्ष्यसे देशकालतः । वस तावन्महाभाग कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ ९६ ॥ उस स्त्रीने कहा—'भगवन्! महाभाग! देश और कालके अनुसार आपको अनुभव हो जायगा। आप यहाँ रहिये, कृतकृत्य हो जाइयेगा' ॥ ९६ ॥
ब्रह्मर्षिस्तामथोवाच स तथेति युधिष्ठिर । वत्स्येऽहं यावदुत्साहो भवत्या नात्र संशयः ॥ ९७ ॥ युधिष्ठिर! तब ब्रह्मर्षिने उससे कहा—'ठीक है, जबतक मेरे मनमें यहाँ रहनेका उत्साह होगा तबतक आपके साथ रहूँगा, इसमें संशय नहीं है' ॥ ९७ ॥
अथर्षिरभिसम्प्रेक्ष्य स्त्रियं तां जरयार्दिताम् । चिन्तां परमिकां भेजे संतप्त इव चाभवत् ॥ ९८ ॥ इसके बाद ऋषि उस स्त्रीको जरावस्थासे पीड़ित देख बड़ी चिन्तामें पड़ गये और संतप्त-से हो उठे ॥ ९८ ॥
यद् यदङ्गं हि सोऽपश्यत् तस्या विप्रर्षभस्तदा । नारमत् तत्र तत्रास्य दृष्टी रूपविरागिता ॥ ९९ ॥ विप्रवर अष्टावक्र उसका जो-जो अंग देखते थे वहाँ-वहाँ उनकी दृष्टि रमती नहीं थी, अपितु उसके रूपसे विरक्त हो उठती थी ॥ ९९ ॥
देवतेयं गृहस्यास्य शापात् किं नु विरूपिता । अस्याश्च कारणं वेत्तुं न युक्तं सहसा मया ॥ १०० ॥ वे सोचने लगे 'यह नारी तो इस घरकी अधिष्ठात्री देवी है। फिर इसे इतना कुरूप किसने बना दिया? इसकी कुरूपताका कारण क्या है? इसे किसीका शाप तो नहीं लग गया। इसकी कुरूपताका कारण जाननेके लिये सहसा चेष्टा करना मेरे लिये उचित नहीं है' ॥ १०० ॥
इति चिन्ताविविक्तस्य तमर्थं ज्ञातुमिच्छतः । व्यगच्छत् तदहःशेषं मनसा व्याकुलेन तु ॥ १०१ ॥ इस प्रकार व्याकुल चित्तसे एकान्तमें बैठकर चिन्ता करते और उसकी कुरूपताका कारण जाननेकी इच्छा रखते हुए महर्षिका वह सारा दिन बीत चला ॥
अथ सा स्त्री तथोवाच भगवन् पश्य वै रवेः । रूपं संध्याभ्रसंरक्तं किमुपस्थाप्यतां तव ॥ १०२ ॥
तब उस स्त्रीने कहा—‘भगवन्! देखिये, सूर्यका रूप संध्याकी लालीसे लाल हो गया है। इस समय आपके लिये कौन-सी वस्तु प्रस्तुत की जाय?’ ॥ १०२ ॥
स उवाच ततस्तां स्त्रीं स्नानोदकमिहानय । उपासिष्ये ततः संध्यां वाग्यतो नियतेन्द्रियः ॥ १०३ ॥
तब ऋषिने उस स्त्रीसे कहा—‘मेरे नहानेके लिये यहाँ जल ले आओ। स्नानके पश्चात् मैं मौन होकर इन्द्रियसयंमपूर्वक संध्योपासना करूँगा’ ॥ १०३ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टावक्रदिक्संवादे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें अष्टावक्र और उत्तर दिशाका संवादविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १०५ श्लोक हैं)
विंशोऽध्यायः
अष्टावक्र और उत्तर दिशाका संवाद
भीष्म उवाच
अथ सा स्त्री तमुवाच बाढमेवं भवत्विति ।
तैलं दिव्यमुपादाय स्नानशाटीमुपानयत् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! ऋषिकी बात सुनकर उस स्त्रीने कहा—‘बहुत अच्छा, ऐसा ही हो’ यों कहकर वह दिव्य तेल और स्नानोपयोगी वस्त्र ले आयी ॥ १ ॥
अनुज्ञाता च मुनिना सा स्त्री तेन महात्मना ।
अथास्य तैलेनाङ्गानि सर्वाण्येवाभ्यमृक्षत ॥ २ ॥
फिर उन महात्मा मुनिकी आज्ञा लेकर उस स्त्रीने उनके सारे अंगोंमें तेलकी मालिश की ॥ २ ॥
शनैश्चोत्सादितस्तत्र स्नानशालामुपागमत् ।
भद्रासनं ततश्चित्रमृषिरन्वगमन्नवम् ॥ ३ ॥
फिर उसके उठानेपर वे धीरेसे वहाँ स्नानगृहमें गये। वहाँ ऋषिको एक विचित्र एवं नूतन चौकी प्राप्त हुई ॥ ३ ॥
अथोपविष्टश्च यदा तस्मिन् भद्रासने तदा ।
स्नापयामास शनकैस्तमृषिं सुखहस्तवत् ॥ ४ ॥
जब वे उस सुन्दर चौकीपर बैठ गये तब उस स्त्रीने धीरे-धीरे हाथोंके कोमल स्पर्शसे उन्हें नहलाया ॥ ४ ॥
दिव्यं च विधिवच्चक्रे सोपचारं मुनेस्तदा ।
स तेन सुसुखोष्णेन तस्या हस्तसुखेन च ॥ ५ ॥
व्यतीतां रजनीं कृत्स्नां नाजानात् स महाव्रतः ।
उसने मुनिके लिये विधिपूर्वक सम्पूर्ण दिव्य सामग्री प्रस्तुत की। वे महाव्रतधारी मुनि उसके दिये हुए कुछ-कुछ गरम होनेके कारण सुखदायक जलसे नहाकर उसके हाथोंके सुखद स्पर्शसे सेवित होकर इतने आनन्दविभोर हो गये कि कब सारी रात बीत गयी? इसका उन्हें ज्ञान ही नहीं हुआ ॥ ५ १/२ ॥
तत उत्थाय स मुनिस्तदा परमविस्मितः ॥ ६ ॥
पूर्वस्यां दिशि सूर्यं च सोऽपश्यदुदितं दिवि ।
तस्य बुद्धिरियं किं नु मोहस्तत्त्वमिदं भवेत् ॥ ७ ॥
तदनन्तर वे मुनि अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर उठ बैठे। उन्होंने देखा कि पूर्व-दिशाके आकाशमें सूर्यदेवका उदय हो गया है। वे सोचने लगे, क्या यह मेरा मोह है या वास्तवमें सूर्योदय हो गया है ।। ६-७ ।।
अथोपास्य सहस्त्रांशुं किं करोमीत्युवाच ताम् ।
सा चामृतरसप्रख्यं ऋषेरन्नमुपाहरत् ।। ८ ।।
फिर तो तत्काल स्नान, संध्योपासना और सूर्योपस्थान करके उससे बोले, ‘अब क्या करूँ?’ तब उस स्त्रीने ऋषिके समक्ष अमृतरसके समान मधुर अन्न परोसकर रखा ।। ८ ।।
तस्य स्वादुतयान्नस्य न प्रभूतं चकार सः ।
व्यगमच्चाप्यहःशेषं ततः संध्यागमत् पुनः ।। ९ ।।
उस अन्नके स्वादसे वे इतने आकृष्ट हो गये कि उसे पर्याप्त न मान सके—‘बस अब पूरा हो गया’ यह बात न कह सके। इसीमें सारा दिन निकल गया और पुनः संध्याकाल आ पहुँचा ।। ९ ।।
अथ सा स्त्री भगवन्तं सुप्यतामित्यचोदयत् ।
तत्र वै शयने दिव्ये तस्य तस्याश्च कल्पिते ।। १० ।।
इसके बाद उस स्त्रीने भगवान् अष्टावक्रसे कहा—‘अब आप सो जाइये।’ फिर वहीं उनके और उस स्त्रीके लिये दो शय्याएँ बिछायी गयीं ।। १० ।।
पृथक् चैव तथा सुप्तौ सा स्त्री स च मुनिस्तदा ।
तथार्धरात्रे सा स्त्री तु शयनं तदुपागमत् ।। ११ ।।
उस समय वह स्त्री और मुनि दोनों अलग-अलग सो गये। जब आधी रात हुई तब वह स्त्री उठकर मुनिकी शय्यापर आ बैठी ।। ११ ।।
अष्टावक्र उवाच
न भद्रे परदारेषु मनो मे सम्प्रसज्जति ।
उत्तिष्ठ भद्रे भद्रं ते स्वयं वै विरमस्व च ।। १२ ।।
**अष्टावक्र बोले—**भद्रे! मेरा मन परायी स्त्रियोंमें आसक्त नहीं होता है। तुम्हारा भला हो, यहाँसे उठो और स्वयं ही इस पापकर्मसे विरत हो जाओ ।। १२ ।।
भीष्म उवाच
सा तदा तेन विप्रेण तथा तेन निवर्तिता ।
स्वतन्त्रास्मीत्युवाचर्षिं न धर्मच्छलमस्ति ते ।। १३ ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार उन ब्रह्मर्षिके लौटानेपर उसने कहा—‘मैं स्वतन्त्र हूँ; अतः मेरे साथ समागम करनेसे आपके धर्मकी छलना नहीं होगी’ ।। १३ ।।
अष्टावक्र उवाच
नास्ति स्वतन्त्रता स्त्रीणामस्वतन्त्रा हि योषितः । प्रजापतिमतं ह्येतन्न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ १४ ॥ अष्टावक्र बोले— भद्रे! स्त्रियोंकी स्वतन्त्रता नहीं सिद्ध होती; क्योंकि वे परतन्त्र मानी गयी हैं। प्रजापतिका यह मत है कि स्त्री स्वतन्त्र रहनेयोग्य नहीं है ॥ १४ ॥
स्त्र्युवाच बाधते मैथुनं विप्र मम भक्तिं च पश्य वै । अधर्मं प्राप्स्यसे विप्र यन्मां त्वं नाभिनन्दसि ॥ १५ ॥ स्त्री बोली— ब्रह्मन्! मुझे मैथुनकी भूख सता रही है। आपके प्रति जो मेरी भक्ति है, इसपर भी तो दृष्टिपात कीजिये। विप्रवर! यदि आप मुझे संतुष्ट नहीं करते हैं तो आपको पाप लगेगा ॥ १५ ॥
अष्टावक्र उवाच हरन्ति दोषजातानि नरं जातं यथेच्छकम् । प्रभवामि सदा धृत्या भद्रे स्वशयनं व्रज ॥ १६ ॥ अष्टावक्रने कहा— भद्रे! स्वेच्छाचारी मनुष्यको ही सब प्रकारके पापसमूह अपनी ओर खींचते हैं। मैं धैर्यके द्वारा सदा अपने मनको काबूमें रखता हूँ; अतः तुम अपनी शय्यापर लौट जाओ ॥ १६ ॥
स्त्र्युवाच शिरसा प्रणमे विप्र प्रसादं कर्तुमर्हसि । भूमौ निपतमानायाः शरणं भव मेऽनघ ॥ १७ ॥ स्त्री बोली— अनघ! विप्रवर! मैं सिर झुकाकर प्रणाम करती हूँ और आपके सामने पृथ्वीपर पड़ी हूँ। आप मुझपर कृपा करें और मुझे शरण दें ॥ १७ ॥ यदि वा दोषजातं त्वं परदारेषु पश्यसि । आत्मानं स्पर्शयाम्यद्य पाणिं गृह्णीष्व मे द्विज ॥ १८ ॥ ब्रह्मन्! यदि आप परायी स्त्रियोंके साथ समागममें दोष देखते हैं तो मैं स्वयं आपको अपना दान करती हूँ। आप मेरा पाणिग्रहण कीजिये ॥ १८ ॥ न दोषो भविता चैव सत्येनैतद् ब्रवीम्यहम् । स्वतन्त्रां मां विजानीहि योऽधर्मः सोऽस्तु वै मयि । त्वय्यावेशितचित्ता च स्वतन्त्रास्मि भजस्व माम् ॥ १९ ॥ मैं सच कहती हूँ, आपको कोई दोष नहीं लगेगा। आप मुझे स्वतन्त्र समझिये। इसमें जो पाप होता है, वह मुझे ही लगे। मेरा चित्त आपके ही चिन्तनमें लगा है। मैं स्वतन्त्र हूँ; अतः मुझे स्वीकार कीजिये ॥ १९ ॥
अष्टावक्र उवाच
स्वतन्त्रा त्वं कथं भद्रे ब्रूहि कारणमत्र वै ।
नास्ति त्रिलोके स्त्री काचिद् या वै स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ २० ॥
अष्टावक्रने कहा— भद्रे! तुम स्वतन्त्र कैसे हो? इसमें जो कारण हो, वह बताओ! तीनों लोकोंमें कोई ऐसी स्त्री नहीं है जो स्वतन्त्र रहने योग्य हो ॥ २० ॥
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
पुत्राश्च स्थाविरे काले नास्ति स्त्रीणां स्वतन्त्रता ॥ २१ ॥
कुमारावस्थामें पिता इसकी रक्षा करते हैं, जवानीमें वह पतिके संरक्षणमें रहती है और बुढ़ापेमें पुत्र उसकी देखभाल करते हैं। इस प्रकार स्त्रियोंके लिये स्वतन्त्रता नहीं है ॥ २१ ॥
स्त्र्युवाच
कौमारं ब्रह्मचर्यं मे कन्यैवास्मि न संशयः ।
पत्नीं कुरुष्व मां विप्र श्रद्धां विजहि मा मम ॥ २२ ॥
स्त्री बोली— विप्रवर! मैं कुमारावस्थासे ही ब्रह्मचारिणी हूँ; अतः कन्या ही हूँ—इसमें संशय नहीं है। अब आप मुझे पत्नी बनाइये। मेरी श्रद्धाका नाश न कीजिये ॥
अष्टावक्र उवाच
यथा मम तथा तुभ्यं यथा तुभ्यं तथा मम ।
जिज्ञासेयमृषेस्तस्य विघ्नः सत्यं न किं भवेत् ॥ २३ ॥
अष्टावक्रने कहा— जैसी मेरी दशा है, वैसी तुम्हारी है और जैसी तुम्हारी दशा है, वैसी मेरी है। यह वास्तवमें वदान्य ऋषिके द्वारा परीक्षा ली जा रही है या सचमुच यह कोई विघ्न तो नहीं है? ॥ २३ ॥
आश्चर्यं परमं हीदं किं नु श्रेयो हि मे भवेत् ।
दिव्याभरणवस्त्रा हि कन्येयं मामुपस्थिता ॥ २४ ॥
(वे मन-ही-मन सोचने लगे—) यह पहले वृद्धा थी और अब दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कन्यारूप होकर मेरी सेवामें उपस्थित है। यह बड़े ही आश्चर्यकी बात है। क्या यह मेरे लिये कल्याणकारी होगा? ॥ २४ ॥
किं त्वस्याः परमं रूपं जीर्णमासीत् कथं पुनः ।
कन्यारूपमिहाद्यैवं किमिवात्रोत्तरं भवेत् ॥ २५ ॥
परंतु इसका यह परम सुन्दर रूप पहले जराजीर्ण कैसे हो गया था और अब यहाँ यह कन्यारूप कैसे प्रकट हो गया? ऐसी दशामें यहाँ उसके लिये क्या उत्तर हो सकता है? ॥ २५ ॥
यथा परं शक्तिधृतेर्न व्युत्थास्ये कथंचन ।
न रोचते हि व्युत्थानं सत्येनासादयाम्यहम् ॥ २६ ॥
मुझमें कामको दमन करनेकी शक्ति है और पूर्वप्राप्त मुनि-कन्याको किसी तरह भी प्राप्त करनेका धैर्य बना हुआ है। इस शक्ति और धृतिके ही सहारे मैं किसी तरह विचलित नहीं होऊँगा। मुझे धर्मका उल्लंघन अच्छा नहीं लगता। मैं सत्यके सहारेसे ही पत्नीको प्राप्त करूँगा ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टावक्रदिक्संवादे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें अष्टावक्र और उत्तरदिशाका संवादविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥
एकविंशोऽध्यायः
अष्टावक्र और उत्तरदिशाका संवाद, अष्टावक्रका अपने घर लौटकर वदान्य ऋषिकी कन्याके साथ विवाह करना
युधिष्ठिर उवाच
न बिभेति कथं सा स्त्री शापाच्च परमद्युतेः।
कथं निवृत्तो भगवांस्तद् भवान् प्रब्रवीतु मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! वह स्त्री उन महातेजस्वी ऋषिके शापसे डरती कैसे नहीं थी; और वे भगवान् अष्टावक्र किस तरह वहाँसे लौटे थे? यह सब मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अष्टावक्रोऽन्वपृच्छत् तां रूपं विकुरुषे कथम्।
न चानृतं ते वक्तव्यं ब्रूहि ब्राह्मणकाम्यया ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! सुनो, अष्टावक्रने उस स्त्रीसे पूछा, 'तुम अपना रूप बदलती क्यों रहती हो? बताओ, यदि मुझ-जैसे ब्राह्मणसे सम्मान पानेकी इच्छा हो तो झूठ न बोलना' ॥ २ ॥
स्त्र्युवाच
द्यावापृथिव्योर्यत्रैषा काम्या ब्राह्मणसत्तम।
शृणुष्वावहितः सर्वं यदिदं सत्यविक्रम ॥ ३ ॥
स्त्री बोली— ब्राह्मणशिरोमणे! स्वर्गलोक हो या मर्त्यलोक, जिस किसी भी स्थानमें स्त्री और पुरुष निवास करते हैं, वहाँ उनमें परस्पर संयोगकी यह कामना सदा बनी रहती है। सत्यपराक्रमी विप्र! यह सब जो रूपपरिवर्तनकी लीला की गयी है, उसका कारण बताती हूँ, सावधान होकर सुनिये ॥ ३ ॥
जिज्ञासेयं प्रयुक्ता मे स्थिरीकर्तुं तवानघ।
अव्युत्थानेन ते लोका जिताः सत्यपराक्रम ॥ ४ ॥
निर्दोष ब्राह्मण! आपको दृढ़ करनेके लिये आपकी परीक्षा लेनेके उद्देश्यसे ही मैंने यह कार्य किया है। सत्यपराक्रमी द्विज! आपने अपने धर्मसे विचलित न होकर समस्त पुण्यलोकोंको जीत लिया है ॥ ४ ॥
उत्तरां मां दिशं विद्धि दृष्टं स्त्रीचापलं च ते।
स्थविराणामपि स्त्रीणां बाधते मैथुनज्वरः ॥ ५ ॥
आप मुझे उत्तरदिशा समझें। स्त्रीमें कितनी चपलता होती है—यह आपने प्रत्यक्ष देखा है। बूढ़ी स्त्रियोंको भी मैथुनके लिये होनेवाला कामजनित संताप कष्ट देता रहता है ॥ ५ ॥
(अविश्वासान्न व्यसनी नातिसक्तोऽप्रवासकः । विद्वान् सुशीलः पुरुषः सदारः सुखमश्नुते ॥) जो कहीं भी विश्वास न करनेके कारण किसी व्यसनमें नहीं फँसता, कहीं भी अधिक आसक्त नहीं होता, परदेशमें नहीं रहता तथा जो विद्वान् और सुशील है, वही पुरुष स्त्रीके साथ रहकर सुख भोगता है ॥ तुष्टः पितामहस्तेऽद्य तथा देवाः सवासवाः । स त्वं येन च कार्येण सम्प्राप्तो भगवानिह ॥ ६ ॥ प्रेषितस्तेन विप्रेण कन्यापित्रा द्विजर्षभ । तवोपदेशं कर्तुं वै तच्च सर्वं कृतं मया ॥ ७ ॥ आज आपके ऊपर ब्रह्माजी तथा इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हैं। भगवन् द्विजश्रेष्ठ! आप यहाँ जिस कार्यसे आये हैं, वह सफल हो गया। उस कन्याके पिता वदान्य ऋषिने मेरे पास आपको उपदेश देनेके लिये भेजा था। वह सब मैंने कर दिया ॥ ६-७ ॥ क्षेमैर्गमिष्यसि गृहं श्रमश्च न भविष्यति । कन्यां प्राप्स्यसि तां विप्र पुत्रिणी च भविष्यति ॥ ८ ॥ विप्रवर! अब आप कुशलपूर्वक अपने घरको जायँगे और मार्गमें आपको कोई श्रम अथवा कष्ट नहीं होगा। उस मनोनीत कन्याको आप प्राप्त कर लेंगे और आपके द्वारा वह पुत्रवती भी होगी ही ॥ ८ ॥ काम्यया पृष्टवांस्त्वं मां ततो व्याहृतमुत्तमम् । अनतिक्रमणीया सा कृत्स्नैर्लोकैस्त्रिभिः सदा ॥ ९ ॥ आपने जाननेकी इच्छासे मुझसे यह बात पूछी थी, इसलिये मैंने अच्छे ढंगसे सब कुछ बता दिया। तीनों लोकोंके सम्पूर्ण निवासियोंके लिये भी ब्राह्मणकी आज्ञा कदापि उल्लंघनीय नहीं होती ॥ ९ ॥ गच्छस्व सुकृतं कृत्वा किं चान्यच्छ्रोतुमिच्छसि । यावद् ब्रवीमि विप्रर्षे अष्टावक्र यथातथम् ॥ १० ॥ ब्रह्मर्षि अष्टावक्र! आप पुण्यका उपार्जन करके जाइये। और क्या सुनना चाहते हैं? कहिये, मैं वह सब कुछ यथार्थरूपसे बताऊँगी ॥ १० ॥ ऋषिणा प्रसादिता चास्मि तव हेतोर्द्विजर्षभ । तस्य सम्माननार्थं मे त्वयि वाक्यं प्रभाषितम् ॥ ११ ॥ द्विजश्रेष्ठ! वदान्य मुनिने आपके लिये मुझे प्रसन्न किया था; अतः उनके सम्मानके लिये ही मैंने ये सारी बातें कही हैं ॥ ११ ॥ भीष्म उवाच श्रुत्वा तु वचनं तस्याः स विप्रः प्राञ्जलिः स्थितः ।
अनुज्ञातस्तया चापि स्वगृहं पुनराव्रजत् ॥ १२ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**भारत! उस स्त्रीकी बात सुनकर विप्रवर अष्टावक्र उसके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये। फिर उसकी आज्ञा ले पुनः अपने घरको लौट आये ॥ १२ ॥ गृहमागत्य विश्रान्तः स्वजनं परिपृच्छ्य च । अभ्यगच्छच्च तं विप्रं न्यायतः कुरुनन्दन ॥ १३ ॥ कुरुनन्दन! घर आकर उन्होंने विश्राम किया और स्वजनोंसे पूछकर वे न्यायानुसार फिर ब्राह्मण वदान्यके घर गये ॥ १३ ॥ पृष्टश्च तेन विप्रेण दृष्टं त्वेतन्निदर्शनम् । प्राह विप्रं तदा विप्रः सुप्रीतेनान्तरात्मना ॥ १४ ॥ ब्राह्मणने उनकी यात्राके विषयमें पूछा, तब उन्होंने प्रसन्नचित्तसे जो कुछ वहाँ देखा था, सब बताना आरम्भ किया— ॥ १४ ॥ भवता समनुज्ञातः प्रास्थितो गन्धमादनम् । तस्य चोत्तरतो देशे दृष्टं मे दैवतं महत् ॥ १५ ॥ तया चाहमनुज्ञातो भवांश्चापि प्रकीर्तितः । श्रावितश्चापि तद्वाक्यं गृहं चाभ्यागतः प्रभोः ॥ १६ ॥ 'महर्षे! आपकी आज्ञा पाकर मैं उत्तर दिशामें गन्ध-मादनपर्वतकी ओर चल दिया। उससे भी उत्तर जानेपर मुझे एक महती देवीका दर्शन हुआ। उसने मेरी परीक्षा ली और आपका भी परिचय दिया। प्रभो! फिर उसने अपनी बात सुनायी और उसकी आज्ञा लेकर मैं अपने घर आ गया' ॥ तमुवाच तदा विप्रः सुतां प्रतिगृहाण मे । नक्षत्रविधियोगेन पात्रं हि परमं भवान् ॥ १७ ॥ तब ब्राह्मण वदान्यने कहा—'आप उत्तम नक्षत्रमें विधिपूर्वक मेरी पुत्रीका पाणिग्रहण कीजिये; क्योंकि आप अत्यन्त सुयोग्य पात्र हैं' ॥ १७ ॥
भीष्म उवाच
अष्टावक्रस्तथेत्युक्त्वा प्रतिगृह्य च तां प्रभो । कन्यां परमधर्मात्मा प्रीतिमांश्चाभवत् तदा ॥ १८ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**प्रभो! तदनन्तर 'तथास्तु' कहकर परम धर्मात्मा अष्टावक्रने उस कन्याका पाणिग्रहण किया। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १८ ॥ कन्यां तां प्रतिगृह्यैव भार्यां परमशोभनाम् । उवास मुदितस्तत्र स्वाश्रमे विगतज्वरः ॥ १९ ॥ उस परम सुन्दरी कन्याका पत्नीरूपमें दान पाकर अष्टावक्र मुनिकी सारी चिन्ता दूर हो गयी और वे अपने आश्रममें उसके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टावक्रदिक्संवादे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें अष्टावक्र और उत्तरदिशाका संवादविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २१ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २० श्लोक हैं)
द्वाविंशोऽध्यायः
युधिष्ठिरके विविध धर्मयुक्त प्रश्नोंका उत्तर तथा श्राद्ध और दानके उत्तम पात्रोंका लक्षण
[मार्कण्डेयजीके द्वारा विविध प्रश्न और नारदजीके द्वारा उनका उत्तर]
(युधिष्ठिर उवाच)
पुत्रैः कथं महाराज पुरुषस्तरिता भवेत् ।
यावन्न लब्धवान् पुत्रमफलः पुरुषो नृप ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**नरेश्वर! महाराज! पुत्रोंद्वारा पुरुषका कैसे उद्धार होता है? जबतक पुत्रकी प्राप्ति न हो तबतक पुरुषका जीवन निष्फल क्यों माना जाता है? ।।
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
नारदेन पुरा गीतं मार्कण्डेयाय पृच्छते ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! इस विषयमें इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है। पूर्वकालमें मार्कण्डेयके पूछनेपर देवर्षि नारदने जो उपदेश दिया था, उसीका इस इतिहासमें उल्लेख हुआ है ।।
पर्वतं नारदं चैवमसितं देवलं च तम् ।
आरुणेयं च रैभ्यं च एतानत्रागतान् पुरा ॥
गङ्गायमुनयोर्मध्ये भोगवत्याः समागमे ।
दृष्ट्वा पूर्वसमासीनान् मार्कण्डेयोऽभ्यगच्छत ॥
पहलेकी बात है, गंगा-यमुनाके मध्यभागमें जहाँ भोगवतीका समागम हुआ है वहीं पर्वत, नारद, असित, देवल, आरुणेय और रैभ्य—ये ऋषि एकत्र हुए थे। इन सब ऋषियोंको वहाँ पहलेसे विराजमान देख मार्कण्डेयजी भी गये ।।
ऋषयस्तु मुनिं दृष्ट्वा समुत्थायोन्मुखाः स्थिताः ।
अर्चयित्वार्हतो विप्रं किं कुर्म इति चाब्रुवन् ॥
ऋषियोंने जब मुनिको आते देखा, तब वे सब-के-सब उठकर उनकी ओर मुख करके खड़े हो गये और उन ब्रह्मर्षिकी उनके योग्य पूजा करके सबने पूछा—'हम आपकी क्या सेवा करें?' ।।
मार्कण्डेय उवाच
अयं समागमः सद्भिर्यत्नेनासादितो मया ।
अत्र प्राप्स्यामि धर्माणामाचारस्य च निश्चयम् ।। **मार्कण्डेयजीने कहा—**मैंने बड़े यत्नसे सत्पुरुषोंका यह संग प्राप्त किया है। मुझे आशा है, यहाँ धर्म और आचारका निर्णय प्राप्त होगा ।। ऋजुः कृतयुगे धर्मस्तस्मिन् क्षीणे विमुह्यति । युगे युगे महर्षिभ्यो धर्ममिच्छामि वेदितुम् ।। सत्ययुगमें धर्मका अनुष्ठान सरल होता है। उस युगके समाप्त हो जानेपर धर्मका स्वरूप मनुष्योंके मोहसे आच्छन्न हो जाता है; अतः प्रत्येक युगके धर्मका क्या स्वरूप है? इसे मैं आप सब महर्षियोंसे जानना चाहता हूँ ।।
भीष्म उवाच
ऋषिभिर्नारदः प्रोक्तो ब्रूहि यत्रास्य संशयः । धर्माधर्मेषु तत्त्वज्ञ त्वं विच्छेत्तासि संशयान् ।। **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तब सब ऋषियोंने मिलकर नारदजीसे कहा—'तत्त्वज्ञ देवर्षे! मार्कण्डेयजीको जिस विषयमें संदेह है उसका आप निरूपण कीजिये। क्योंकि धर्म और अधर्मके विषयमें होनेवाले समस्त संशयोंका निवारण करनेमें आप समर्थ हैं' ।। ऋषिभ्योऽनुमतो वाक्यं नियोगान्नारदोऽब्रवीत् । सर्वधर्मार्थतत्त्वज्ञं मार्कण्डेयं ततोऽब्रवीत् ।। ऋषियोंकी यह अनुमति और आदेश पाकर नारदजीने सम्पूर्ण धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले मार्कण्डेयजीसे पूछा ।।
नारद उवाच
दीर्घायो तपसा दीप्त वेदवेदाङ्गतत्त्ववित् । यत्र ते संशयो ब्रह्मन् समुत्पन्नः स उच्यताम् ।। **नारदजी बोले—**तपस्यासे प्रकाशित होनेवाले दीर्घायु मार्कण्डेयजी! आप तो स्वयं ही वेदों और वेदांगोंके तत्त्वको जाननेवाले हैं, तथापि ब्रह्मन्! जहाँ आपको संशय उत्पन्न हुआ हो वह विषय उपस्थित कीजिये ।। धर्मं लोकोपकारं वा यच्चान्यच्छ्रोतुमिच्छसि । तदहं कथयिष्यामि ब्रूहि त्वं सुमहातपाः ।। महातपस्वी महर्षे! धर्म, लोकोपकार अथवा और जिस किसी विषयमें आप सुनना चाहते हों उसे कहिये। मैं उस विषयका निरूपण करूँगा ।।
मार्कण्डेय उवाच
युगे युगे व्यतीतेऽस्मिन् धर्मसेतुः प्रणश्यति । कथं धर्मच्छलेनाहं प्राप्नुयामिति मे मतिः ।।
**मार्कण्डेयजी बोले—**प्रत्येक युगके बीत जानेपर धर्मकी मर्यादा नष्ट हो जाती है। फिर धर्मके बहानेसे अधर्म करनेपर मैं उस धर्मका फल कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? मेरे मनमें यही प्रश्न उठता है ।।
नारद उवाच
आसीद् धर्मः पुरा विप्र चतुष्पादः कृते युगे । ततो ह्यधर्मः कालेन प्रवृत्तः किञ्चिदुन्नतः ।। **नारदजीने कहा—**विप्रवर! पहले सत्ययुगमें धर्म अपने चारों पैरोंसे युक्त होकर सबके द्वारा पालित होता था। तदनन्तर समयानुसार अधर्मकी प्रवृत्ति हुई और उसने अपना सिर कुछ ऊँचा किया ।। ततस्त्रेतायुगं नाम प्रवृत्तं धर्मदूषणम् । तस्मिन् व्यतीते सम्प्राप्तं तृतीयं द्वापरं युगम् ।। तदा धर्मस्य द्वौ पादावधर्मो नाशयिष्यति । तदनन्तर धर्मको अंशतः दूषित करनेवाले त्रेतानामक दूसरे युगकी प्रवृत्ति हुई। जब वह भी बीत गया तब तीसरे युग द्वापरका पदार्पण हुआ। उस समय धर्मके दो पैरोंको अधर्म नष्ट कर देता है ।। द्वापरे तु परिक्षीणे नन्दिके समुपस्थिते ।। लोकवृत्तं च धर्मं च उच्यमानं निबोध मे । द्वापरके नष्ट होनेपर जब नन्दिक (कलियुग) उपस्थित होता है उस समय लोकाचार और धर्मका जैसा स्वरूप रह जाता है, उसे बताता हूँ, सुनिये ।। चतुर्थं नन्दिकं नाम धर्मः पादावशेषितः ।। ततः प्रभृति जायन्ते क्षीणप्रज्ञायुषो नराः । क्षीणप्राणधना लोके धर्माचारबहिष्कृताः ।। चौथे युगका नाम है नन्दिक। उस समय धर्मका एक ही पाद (अंश) शेष रह जाता है। तभीसे मन्दबुद्धि और अल्पायु मनुष्य उत्पन्न होने लगते हैं। लोकमें उनकी प्राणशक्ति बहुत कम हो जाती है। वे निर्धन तथा धर्म और सदाचारसे बहिष्कृत होते हैं ।।
मार्कण्डेय उवाच
एवं विलुलिते धर्मे लोके चाधर्मसंयुते । किं चतुर्वर्णनियतं हव्यं कव्यं न नश्यति ।। **मार्कण्डेयजीने पूछा—**जब इस प्रकार धर्मका लोप होकर जगत्में अधर्म छा जाता है तब चारों वर्णोंके लिये नियत हव्य और कव्यका नाश क्यों नहीं हो जाता है? ।।
नारद उवाच
मन्त्रपूतं सदा हव्यं कव्यं चैव न नश्यति । प्रतिगृह्णन्ति तद् देवा दातुर्न्यायात् प्रयच्छतः ॥ **नारदजीने कहा—**वेदमन्त्रसे सदा पवित्र होनेके कारण हव्य और कव्य नहीं नष्ट होते हैं। यदि दाता न्यायपूर्वक उनका दान करते हैं तो देवता और पितर उन्हें सादर ग्रहण करते हैं॥ सत्त्वयुक्तश्च दाता च सर्वान् कामानवाप्नुयात् । अवाप्तकामः स्वर्गे च महीयेत यथेप्सितम् ॥ जो दाता सात्त्विक भावसे युक्त होता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। यहाँ आप्तकाम होकर वह स्वर्गमें भी अपनी इच्छाके अनुसार सम्मानित होता है॥
मार्कण्डेय उवाच
चत्वारो ह्यथ ये वर्णा हव्यं कव्यं प्रदास्यते । मन्त्रहीनमवज्ञातं तेषां दत्तं क्व गच्छति ॥ **मार्कण्डेयजीने पूछा—**यहाँ जो चार वर्णके लोग हैं, उनके द्वारा यदि मन्त्ररहित और अवहेलना-पूर्वक हव्य-कव्यका दान दिया जाय तो उनका वह दान कहाँ जाता है? ॥
नारद उवाच
असुरान् गच्छते दत्तं विप्रै रक्षांसि क्षत्रियैः । वैश्यैः प्रेतानि वै दत्तं शूद्रैर्भूतानि गच्छति ॥ **नारदजीने कहा—**यदि ब्राह्मणोंने वैसा दान किया है तो वह असुरोंको प्राप्त होता है, क्षत्रियोंने किया है तो उसे राक्षस ले जाते हैं, वैश्योंद्वारा किये गये वैसे दानको प्रेत ग्रहण करते हैं और शूद्रोंद्वारा किया गया अवज्ञापूर्वक दान भूतोंको प्राप्त होता है॥
मार्कण्डेय उवाच
अथ वर्णावरे जाताश्चातुर्वर्ण्योपदेशिनः । दास्यन्ति हव्यकव्यानि तेषां दत्तं क्व गच्छति ॥ **मार्कण्डेयजीने पूछा—**जो नीच वर्णमें उत्पन्न होकर चारों वर्णोंको उपदेश देते और हव्य-कव्यका दान देते हैं, उनका दिया हुआ दान कहाँ जाता है? ॥
नारद उवाच
वर्णावराणां भूतानां हव्यकव्यप्रदातृणाम् । नैव देवा न पितरः प्रतिगृह्णन्ति तत् स्वयम् ॥ **नारदजीने कहा—**जब नीच वर्णके लोग हव्य-कव्यका दान करते हैं, तब उनके उस दानको न देवता ग्रहण करते हैं न पितर॥
यातुधानाः पिशाचाश्च भूता ये चापि नैर्ऋताः ।
तेषां सा विहिता वृत्तिः पितृदैवतनिर्गता ॥
जो यातुधान, पिशाच, भूत और राक्षस हैं, उन्हींके लिये उस वृत्तिका विधान किया गया है। पितरों और देवताओंने वैसी वृत्तिका परित्याग कर दिया है ॥
तेषां सर्वप्रदातॄणां हव्यकव्यं समाहिताः ।
यत् प्रयच्छन्ति विधिवत् तद् वै भुञ्जन्ति देवताः ॥
जो सब कुछ देनेवाले और उस कर्मके अधिकारी हैं, वे एकाग्रचित्त होकर विधिपूर्वक जो हव्य और कव्य समर्पित करते हैं, उसे देवता और पितर ग्रहण करते हैं ॥
मार्कण्डेय उवाच
श्रुतं वर्णावरैर्दत्तं हव्यं कव्यं च नारद ।
सम्प्रयोगे च पुत्राणां कन्यानां च ब्रवीहि मे ॥
**मार्कण्डेयजीने पूछा—**नारदजी! नीच वर्णके दिये हुए हव्य और कव्योंकी जो दशा होती है, उसे मैंने सुन ली। अब पुत्रों और कन्याओंके विषयमें एवं इनके संयोगके विषयमें मुझे कुछ बातें बताइये ॥
नारद उवाच
कन्याप्रदानं पुत्राणां स्त्रीणां संयोगमेव च ।
आनुपूर्व्यान्मया सम्यगुच्यमानं निबोध मे ॥
**नारदजीने कहा—**अब मैं कन्या-विवाहके और पुत्रोंके विषयमें एवं स्त्रियोंके संयोगके विषयमें क्रमशः बता रहा हूँ, उसे सुनो ॥
जातमात्रा तु दातव्या कन्यका सदृशे वरे ।
काले दत्तासु कन्यासु पिता धर्मेण युज्यते ॥
जो कन्या उत्पन्न हो जाती है, उसे किसी योग्य वरको सौंप देना आवश्यक होता है। यदि ठीक समयपर कन्याओंका दान हो गया तो पिता धर्मफलका भागी होता है ॥
यस्तु पुष्पवतीं कन्यां बान्धवो न प्रयच्छति ।
मासि मासि गते बन्धुस्तस्या भ्रौणघ्न्यमाप्नुते ॥
जो भाई-बन्धु रजस्वलावस्थामें पहुँच जानेपर भी कन्याका किसी योग्य वरके साथ विवाह नहीं कर देता, वह उसके एक-एक मास बीतनेपर भ्रूणहत्याके फलका भागी होता है ॥
यस्तु कन्यां गृहे रुन्ध्याद् ग्राम्यैर्भोगैर्विवर्जिताम् ।
अवध्यातः स कन्याया बन्धुः प्राप्नोति भ्रूणहाम् ॥
जो भाई-बन्धु कन्याको विषय-भोगोंसे वंचित करके घरमें रोके रखता है, वह उस कन्याके द्वारा अनिष्ट चिन्तन किये जानेके कारण भ्रूणहत्याके पापका भागी होता है ॥