भारतकोश
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माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

११२ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०

जीवकी उत्पत्तिके विषयमें दृष्टान्त

अजाति ब्रह्माकार्पण्यं वक्ष्या-<br>मीति प्रतिज्ञातम् । तत्सिद्धयर्थं<br>हेतुं दृष्टान्तं च वक्ष्यामीत्याह—मैं अजन्मा ब्रह्मका जो कृपण-<br>भावसे रहित है, वर्णन करता हूँ—<br>ऐसी प्रतिज्ञा की है। उसकी सिद्धिके<br>लिये हेतु और दृष्टान्त भी बतलाता<br>हूँ—इस अभिप्रायसे कहते हैं—

आत्मा ह्याकाशवज्जीवैर्घटाकाशैरिवोदितः । घटादिवच्च संघातैर्जातावेतन्रिदर्शनम् ॥ ३ ॥

आत्मा आकाशके समान है; वह घटाकाशोंके समान जीवरूपसे उत्पन्न हुआ है । तथा [ मृत्तिकासे ] घटादिके समान देहसंघातरूपसे भी उत्पन्न हुआ कहा जाता है । आत्माकी उत्पत्तिके विषयमें यही दृष्टान्त है ॥ ३ ॥

आत्मा परो हि यस्मादाकाश-<br>वत्सूक्ष्मो निरवयवः सर्वगतः<br>आकाशवदुक्तो जीवैः क्षेत्रज्ञैर्घटा-<br>काशैरिव घटाकाशतुल्य उदितः<br>उक्तः स एवाकाशसमः पर<br>आत्मा ।क्योंकि परमात्मा ही आकाशवत्<br>अर्थात् आकाशके समान सूक्ष्म<br>निरवयव और सर्वगत कहा गया है<br>और वही घटाकाशसदृश - क्षेत्रज्ञ<br>जीवोंके रूपमें उत्पन्न हुआ कहा<br>गया है, इसलिये वह परमात्मा ही,<br>आकाशके समान है ।
अथ वा घटाकाशैर्यथाकाश<br>उदित उत्पन्नस्तथा परो जीवात्म-<br>भिरुत्पन्नः । जीवात्मनां परस्मा-<br>दात्मन उत्पत्तिर्या श्रूयते वेदान्तेषुअथवा यों समझो कि जिस<br>प्रकार घटाकाशोंके रूपमें आकाश<br>उत्पन्न हुआ है उसी प्रकार परमात्मा<br>जीवात्माओंके रूपसे उत्पन्न हुआ<br>है । तात्पर्य यह है कि वेदान्तोंमें<br>जो परमात्मासे जीवात्माओंकी उत्पत्ति

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण ११३


सा महाकाशाद्धटाकाशोत्पत्तिसमा न परमार्थत इत्यभिप्रायः । <br><br> तस्मादेवाकाशाद्धटादयः संघाता यथोत्पद्यन्त एवमाकाशस्थानीयात्परमात्मनः पृथिव्यादिभूतसंघाता आध्यात्मिकाश्च कार्यकारणलक्षणा रज्जुसर्पवद्विकल्पिता जायन्ते । अत उच्यते घटादिवच्च संघातैरुदित इति । यदा मन्दबुद्धिप्रतिपिपादयिषया श्रुत्यात्मनो जातिरुच्यते जीवादीनां तदा जातावुपगम्यमानायामेतन्निदर्शनं दृष्टान्तो यथोदिताकाशवदित्यादिः ॥ ३ ॥सुनी जाती है वह महाकाशसे घटाकाशोंकी उत्पत्तिके समान है, परमार्थतः नहीं । <br><br> उसी आकाशसे जिस प्रकार घट आदि संघात उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार आकाशस्थानीय परमात्मासे रज्जुमें सर्पके समान विकल्पित हुए पृथिवी आदि भूतसंघात और शरीर तथा इन्द्रियरूप आध्यात्मिकभाव उत्पन्न होते हैं । इसीसे कहा जाता है—घटादिके समान देहादिसंघातरूपसे भी उदित हुआ है । जिस समय मन्दबुद्धि पुरुषोंके प्रति प्रतिपादन करनेकी इच्छासे श्रुतिने आत्मासे जीवादिकी उत्पत्तिका वर्णन किया है उस समय उनकी उत्पत्ति माननेमें यह उपर्युक्त आकाशादिके समान ही निदर्शन-दृष्टान्त है ॥३॥

जीवके विलीन होनेमें दृष्टान्त

घटादिषु प्रलीनेषु घटाकाशादयो यथा ।
आकाशे संप्रलीयन्ते तद्वज्जीवा इहात्मनि ॥ ४ ॥

घटादिके लीन होनेपर जिस प्रकार घटाकाशादि महाकाशमें लीन हो जाते हैं उसी प्रकार जीव इस आत्मामें विलीन हो जाते हैं ॥ ४ ॥

यथा घटाद्युत्पत्त्या घटाकाशाद्युत्पत्तिः; यथा वा घटादिप्रलयेजिस प्रकार घटादिकी उत्पत्तिसे घटाकाशादिकी उत्पत्ति होती है और जिस प्रकार घटादिके नाशसे घटा-

१५-१६

११४ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


घटाकाशादिप्रलयस्तद्वद्देहादि-काशादिका नाश होता है उसी प्रकार देहादि * संघातकी उत्पत्तिसे जीवकी उत्पत्ति होती है और उनका लय होनेपर जीवोंका इस आत्मामें लय हो जाता है । तात्पर्य यह है कि स्वतः उनका लय नहीं होता॥४॥
संघातोत्पत्त्या जीवोत्पत्तिस्त-
त्प्रलये च जीवानामिहात्मनि
प्रलयो न स्वत इत्यर्थः ॥ ४ ॥

आत्माकी असङ्गतामें दृष्टान्त

सर्वदेहेष्वात्मैकत्व एकस्मि-सम्पूर्ण देहोंमें एक ही आत्मा होनेपर तो एक आत्माके जन्म-मरण और सुख-दुःखादिमान् होनेपर सभीको उसका सम्बन्ध होगा तथा कर्म और फलकी संकरता हो जायगी [अर्थात् कर्म किसीका होगा और उसका फल कोई और ही भोगेगा] इस प्रकार जो द्वैतवादी कहते हैं उनके प्रति कहा जाता है—
ञ्जनन मरणसुखादिमत्यात्मनि
सर्वात्मनां तत्सम्बन्धः क्रियाफल-
साङ्कर्यं च स्यादिति य आहुद्वैति-
नस्तान्प्रतीदमुच्यते—

यथैकस्मिन्घटाकाशे रजोधूमादिभिर्युते ।
न सर्वे संप्रयुज्यन्ते तद्वज्जीवाः सुखादिभिः ॥ ५ ॥

जिस प्रकार एक घटाकाशके धूलि और धुएँ आदिसे युक्त होनेपर समस्त घटाकाश उनसे युक्त नहीं होते उसी प्रकार जीव भी सुखादि धर्मोंसे लिप्त नहीं होते । [अर्थात् एक जीवके सुखादिमान् होनेपर सब जीव सुखादिमान् नहीं हो जाते ] ॥ ५ ॥


* यहाँ 'देह' शब्दसे लिङ्ग-देह समझना चाहिये, क्योंकि जीवत्वका नाश लिङ्ग-देहके नाशसे ही हो सकता है, स्थूल देहके नाशसे नहीं ।

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण ११५


यथैकस्मिन्घटाकाशे रजोधूमा-<br>दिभिर्युते संयुक्ते न सर्वे घटा-<br>काशादयस्तद्रजोधूमादिभिः<br>संयुज्यन्ते तद्वज्जीवाः सुखादिभिः।<br><br>नन्वेक एवात्मा ?<br>बाढम्; ननु न श्रुतं त्वया-<br>काशवत्सर्वसंघातेष्वेक एवात्मेति ?<br><br>यद्येक एवात्मा तर्हि सर्वत्र सुखी दुःखी च स्यात् ।<br><br>न चेदं सांख्यचोद्यं सम्भवति ।<br><br>(आत्मैकत्वे सांख्याक्षेप-निवृत्तिः)<br>न हि सांख्य आत्मनः सुखदुःखादिमत्त्वमिच्छति बुद्धिसमवायाभ्युपगमात्सुखदुःखादीनाम् । न चोपलब्धिस्वरूपस्यात्मनो भेदकल्पनायां प्रमाणमस्ति ।<br><br>भेदाभावे प्रधानस्य परार्थ्यानुपपत्तिरिति चेत्, न; प्रधानकृतस्यार्थस्यात्मन्यसमवायात् । यदि हि प्रधानकृतो बन्धो मोक्षो वार्थः पुरुषेषु भेदेन समवैतिजिस प्रकार एक घटाकाशके धूलि और धुएँसे युक्त होनेपर समस्त घटाकाशादि उस धूलि और धुएँसे संयुक्त नहीं होते उसी प्रकार जीव भी सुखादिसे लिप्त नहीं होते ।<br><br>पूर्व०—आत्मा तो एक ही है न ?<br>सिद्धान्ती—हाँ, क्या तूने यह नहीं सुना कि सम्पूर्ण संघातोंमें आकाशके समान व्याप्त एक ही आत्मा है ?<br><br>पूर्व०—यदि आत्मा एक ही है तो वह सर्वत्र सुखी-दुःखी होगा ।<br><br>सिद्धान्ती—सांख्यवादीकी यह आपत्ति सम्भव नहीं है । सांख्य आत्माका सुख-दुःखादिमत्त्व स्वीकार नहीं करता, क्योंकि सुख-दुःखादि तो बुद्धिसमवेत माने गये हैं तथा इसके सिवा अनुभवस्वरूप आत्माकी भेद-कल्पनामें कोई प्रमाण भी नहीं है ।<br><br>यदि कहो कि भेद न होनेपर तो प्रधानकी परार्थता भी सम्भव नहीं है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि प्रधानद्वारा सम्पादित कार्यका आत्माके साथ सम्बन्ध नहीं है। यदि प्रधानकर्तृक बन्ध या मोक्ष पुरुषोंमें पृथक्-पृथक्रूपसे समवेत
११६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
ततः प्रधानस्य परार्थ्यमात्मैकत्वे नोपपद्यत इति युक्ता पुरुषभेदकल्पना । न च सांख्यैर्बन्धो मोक्षो वार्थः पुरुषसमवेतोऽभ्युपगम्यते । निर्विशेषाश्च चेतनमात्रा आत्मानोऽभ्युपगम्यन्ते । अतः पुरुषसत्तामात्रप्रयुक्तमेव प्रधानस्य परार्थ्यं सिद्धं न तु पुरुषभेदप्रयुक्तमिति । अतः पुरुषभेदकल्पनायां न प्रधानस्य परार्थ्यं हेतुः ।होते तो आत्माका एकत्व माननेमें प्रधानकी परार्थता सम्भव नहीं हो सकती थी और तब पुरुषोंके भेदकी कल्पना करनी ठीक थी । किन्तु सांख्यवादी तो बन्ध या मोक्षको पुरुषसे सम्बद्ध ही नहीं मानते; वे तो आत्माओंको निर्विशेष और चेतनमात्र ही मानते हैं । अतः प्रधानकी परार्थता तो केवल पुरुषकी सत्तामात्रसे ही सिद्ध है, पुरुषोंके भेदके कारण नहीं । इसलिये पुरुषोंकी भेदकल्पनामें प्रधानकी परार्थता कारण नहीं है ।
न चान्यत्पुरुषभेदकल्पनायां प्रमाणमस्ति सांख्यानाम् । परसत्तामात्रमेव चैतन्निमित्तीकृत्य स्वयं बध्यते मुच्यते च प्रधानम् । परश्चोपलब्धिमात्रसत्तास्वरूपेण प्रधानप्रवृत्तौ हेतुर्न केनचिद्विशेषेणेति केवलमूढतयैव पुरुषभेदकल्पना वेदार्थपरित्यागश्च ।इसके सिवा सांख्यवादियोंके पास पुरुषोंका भेद माननेमें और कोई प्रमाण नहीं है । पर-( आत्मा ) की सत्तामात्रको ही निमित्त बनाकर प्रधान स्वयं बन्ध और मोक्षको प्राप्त होता है और वह पर केवल उपलब्धिमात्र सत्तास्वरूपसे ही प्रधानकी प्रवृत्तिमें हेतु है, किसी विशेषताके कारण नहीं । अतः केवल मूढ़तासे ही पुरुषोंकी भेदकल्पना और वेदार्थका परित्याग किया जाता है ।

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण ११७


[वैशेषिकमत-समीक्षा]

ये त्वाहुर्वैशेषिकादय इच्छादय आत्मसमवायिन इति; तदप्यसत् । स्मृतिहेतूनां संस्काराणामप्रदेशवत्यात्मन्यसमवायात् । आत्ममनःसंयोगाच्च स्मृत्युत्पत्तेः स्मृतिनियमानुपपत्तिः । युगपद्वा सर्वस्मृत्युत्पत्तिप्रसङ्गः ।इसके सिवा वैशेषिकादि मतावलम्बी जो कहते हैं कि इच्छा आदि आत्माके धर्म हैं, सो उनका यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि स्मृतिके हेतुभूत संस्कारोंका प्रदेशहीन (निरवयव) आत्मासे समवाय सम्बन्ध नहीं हो सकता । यदि आत्मा और मनके संयोगसे स्मृतिकी उत्पत्ति मानी जाय तो स्मृतिका कोई नियम ही सम्भव नहीं है अथवा एक साथ ही सम्पूर्ण स्मृतियोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा । *
[मन आदिभिः आत्मसंयोगानुपपत्तिः]<br><br>न च भिन्नजातीयानां स्पर्शादिहीनानामात्मनां मन आदिभिः संबन्धो युक्तः । न च द्रव्याद्रूपादयो गुणाः कर्मसामान्यविशेषसमवाया वा भिन्नाः सन्ति परेषाम् । यदिइसके सिवा स्पर्शादिसे रहित भिन्नजातीय आत्माओंका मन आदिके साथ सम्बन्ध मानना ठीक भी नहीं है । तथा दूसरोंके मतमें द्रव्यसे रूप आदि उसके गुण एवं कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय भिन्न भी नहीं हैं । † यदि दूसरोंके मतमें

* उस समय ऐसा नियम नहीं हो सकेगा कि वस्तुके प्रत्यक्ष अनुभवके समय उसकी स्मृति न हो, क्योंकि स्मृतिका असमवायी कारण आत्मा और मनका संयोग तो अनुभवकालमें भी है ही । इसके सिवा असमवायी कारणकी तुल्यताके कारण एक साथ समस्त स्मृतियोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग भी उपस्थित हो जायगा । यदि कहो कि स्मृतिके संस्कारोंका उद्बोध न होनेके कारण एक साथ स्मृति नहीं हो सकती तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि संस्कार और उनका उद्बोध ये दोनों आत्मामें ही रहते हैं—इस विषयमें उनका एक मत नहीं है । इसलिये इनकी गणना स्मृतिकी सामग्रीके अन्तर्गत नहीं हो सकती ।
† वैशेषिक मतमें साधारणतया द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय ये छः प्रकारके भाव पदार्थ हैं । उनमें द्रव्य उसे कहते हैं जिसके साथ

११८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
ह्यत्यन्तभिन्ना एव द्रव्यात्स्यु-वे इच्छा आदि द्रव्यसे तथा आत्मासे अत्यन्त भिन्न ही हों तो ऐसा होनेपर तो द्रव्यके साथ उनका सम्बन्ध ही सिद्ध नहीं हो सकता।
रिच्छादयश्चात्मनस्तथा च सति
द्रव्येण तेषां सम्बन्धानुपपत्तिः ।
अयुतसिद्धानां समवायलक्षणःयदि कहो कि अयुतसिद्ध¹ पदार्थों- का समवाय-सम्बन्ध माननेमें विरोध नहीं है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं;* क्योंकि इच्छा आदि अनित्य धर्मोंसे नित्य आत्मा पूर्वसिद्ध होनेके कारण उनका परस्पर अयुतसिद्धत्व सम्भव नहीं है। यदि इच्छा आदि आत्माके साथ अयुतसिद्ध हों तो आत्मगत महत्त्वके समान उनकी भी नित्यता- का प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा । और यह बात इष्ट नहीं है, क्योंकि इससे आत्माके अनिर्मोक्षका प्रसङ्ग आ जाता है ।
संबन्धो न विरुध्यत इति चेत्,
न । इच्छादिभ्योऽनित्येभ्य
आत्मनो नित्यस्य पूर्वसिद्धत्वा-
न्नायुतसिद्धत्वोपपत्तिः। आत्मना-
युतसिद्धत्वे चेच्छादीनामात्म-
गतमहत्त्ववन्नित्यत्वप्रसङ्गः । स
चानिष्टः । आत्मनोऽनिर्मोक्ष-
प्रसङ्गात् ।
समवायस्य च द्रव्यादन्यत्वे सति द्रव्येण सम्बन्धान्तरं वाच्यंयदि समवाय द्रव्यसे भिन्न है तो द्रव्यके साथ उसका कोई अन्य

गुण एवं क्रिया आदि समवाय-सम्बन्धसे रहें। गुण—रूप, रस एवं गन्ध आदिको कहते हैं। कर्म—गमनादि क्रिया। सामान्य—जाति, मनुष्यत्व, पशुत्वादि। विशेष—परमाणुओंका परस्पर भेद करनेवाला धर्म, जिसके कारण विभिन्न प्रकारके परमाणुओंसे विभिन्न प्रकारका कार्य उत्पन्न होता है। समवाय—एक प्रकारका सम्बन्ध जैसा कि गुण एवं क्रिया आदिका द्रव्यके साथ है।

१. जो पदार्थ परस्पर मिलकर सिद्ध हुए हों।

* अयुतसिद्धत्वमें चार पक्ष हैं—१ अभिन्नकालमें होना; २ अभिन्न देशमें होना; ३ अभिन्न स्वभाववाले होना; ४ संयोग और वियोगकी अयोग्यतावाले होना। उनमेंसे प्रथम पक्षका खण्डन करते हैं—

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण ११९


[आत्मनो व्यावहारिकबन्धमोक्षाद्युपपादनम्]
यथा द्रव्यगुणयोः । समवायो नित्यसम्बन्ध एवेति न वाच्यमिति चेत्तथा च समवायसम्बन्धवतां नित्यसम्बन्धप्रसङ्गात्पृथक्त्वानुपपत्तिः । अत्यन्तपृथक्त्वे च द्रव्यादीनां स्पर्शवदस्पर्शद्रव्ययोरिव षष्ठ्यर्थानुपपत्तिः ।सम्बन्ध बतलाना चाहिये, जैसा कि द्रव्य और गुणका है। और यदि कोई कहे कि समवाय तो नित्य सम्बन्ध ही है, इसलिये उसके साथ कोई सम्बन्ध बतलानेकी आवश्यकता नहीं है तो ऐसी अवस्थामें समवायसम्बन्धवालोंका नित्यसम्बन्ध होनेके कारण उनकी पृथक्ता सम्भव नहीं है। और यदि द्रव्यादिको परस्पर अत्यन्त भिन्न माना जाय तो जिस प्रकार स्पर्शवान् और स्पर्शहीन द्रव्योंमें परस्पर सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है उसी प्रकार उसका सम्बन्ध ही नहीं हो सकता।
इच्छाद्युपजनापायवद्गुणवत्त्वे चात्मनोऽनित्यत्वप्रसङ्गः । देहफलादिवत्सावयवत्वं विक्रियावत्त्वं च देहादिवदेवेति दोषावपरिहार्यौ ।यदि आत्माको इच्छादि उत्पत्ति-विनाशशील गुणोंवाला माना जाय तो उसकी अनित्यताका प्रसंग उपस्थित हो जायगा। तथा उसके देह और फलादिके समान सावयवत्व एवं देहादिके समान ही विक्रियावत्त्व—ये दो दोष भी अपरिहार्य ही होंगे।
यथा त्वाकाशस्याविद्याध्यारोपितरजोधूममलवत्तादिदोषवत्त्वं तथात्मनोऽविद्याध्यारोपितबुद्ध्याद्युपाधिकृतसुखदुःखादिदोषवत्त्वे बन्धमोक्षादयो व्यावहारिका न विरुध्यन्ते । सर्ववादिभिरविद्या-जिस प्रकार कि आकाशका अविद्याध्यारोपित घटादिउपाधियोंके कारण ही धूलि, धूम और मलसे युक्त होना है उसी प्रकार आत्माका भी, अविद्यासे आरोपित बुद्धि आदि उपाधिके कारण सुख-दुःखादि दोषसे युक्त होनेपर, व्यावहारिक बन्ध, मोक्ष आदि होनेमें कोई विरोध नहीं है; क्योंकि सभी वादियोंने
१२०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

| कृतव्यवहाराभ्युपगमात्परमार्था- | व्यवहारको अविद्याकृत माना है, | | नभ्युपगमाच्च । तस्मादात्मभेद- | परमार्थरूप नहीं माना । अतः | | परिकल्पना वृथैव तार्किकैः | तार्किकलोग जीवोंके भेदकी कल्पना | | क्रियत इति ॥ ५ ॥ | वृथा ही करते हैं ॥ ५ ॥ |

व्यावहारिक जीवभेद

| कथं पुनरात्मभेदनिमित्त इव | किन्तु एक ही आत्मामें, आत्माओं- | | व्यवहार एकस्मिन्नात्मन्यविद्या- | के भेदके कारण होनेवालेके समान, | | कृत उपपद्यत इति, उच्यते— | अविद्याकृत व्यवहार किस प्रकार | | | सम्भव है ? इसपर कहते हैं— |

रूपकार्यसमाख्याश्च भिद्यन्ते तत्र तत्र वै ।
आकाशस्य न भेदोऽस्ति तद्वज्जीवेषु निर्णयः ॥ ६ ॥

[घटादि उपाधियोंके कारण प्रतीत होनेवाले] भिन्न-भिन्न आकाशोंके रूप, कार्य और नामोंमें तो भेद है, परन्तु आकाशमें तो कोई भेद नहीं है । उसी प्रकार जीवोंके विषयमें भी निश्चय समझना चाहिये ॥ ६ ॥

| यथेहाकाश एकस्मिन्घटकर- | जिस प्रकार इस एक ही | | कापवरकाद्याकाशानामल्पत्वम- | आकाशमें घट, कमण्डलु और मठादि | | हत्त्वादिरूपाणि भिद्यन्ते तथा | आकाशोंके अल्पत्व-महत्त्वादि रूपोंमें | | कार्यमुदकाहरणधारणशयनादि- | भेद है, तथा जहाँ-तहाँ व्यवहारमें | | समाख्याश्च घटाकाशकरकाकाश | उनके किये हुए जल लाना, जल | | इत्याद्यास्तत्कृताश्च भिन्ना दृश्यन्ते । | धारण करना और शयन करना | | तत्र तत्र वै व्यवहारविषय | आदिकार्य एवं घटाकाश करकाकाश | | इत्यर्थः। सर्वोऽयमाकाशे रूपादि- | आदि नाम भिन्न-भिन्न देखे जाते हैं। | | भेदकृतो व्यवहारो न परमार्थ | किन्तु आकाशमें रूपादिके कारण | | | होनेवाला यह सब व्यवहार पार- |

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १२१


एव । परमार्थतस्त्वाकाशस्य न भेदोऽस्ति । न चाकाशभेदनिमित्तो व्यवहारोऽस्त्यन्तरेण परोपाधिकृतं द्वारम् । यथैतत्त्वद्देहोपाधिभेदकृतेषु जीवेषु घटाकाशस्थानीयेष्वात्मसु निरूपणात्कृतो बुद्धिमद्भिर्निर्णयो निश्चय इत्यर्थः ॥ ६ ॥मार्थिक ही नहीं हैं। परमार्थतः तो आकाशका कोई भेद नहीं है। अन्य उपाधिकृत निमित्तके सिवा वस्तुतः आकाशके भेदके कारण होनेवाला कोई व्यवहार है ही नहीं। जैसा कि यह [ आकाशका भेद ] है उसी प्रकार देहादि उपाधिके भेदसे किये हुए घटाकाशस्थानीय जीवोंमें भेदका निरूपण किया जानेके कारण बुद्धिमानोंने [ उस भेदका अपारमार्थिकत्व ] निश्चय किया है—यह इसका तात्पर्य है ॥ ६ ॥

जीव आत्माका विकार या अवयव नहीं है

ननु तत्र परमार्थकृत एव घटाकाशादिषु रूपकार्यादिभेदव्यवहार इति ? नैतदस्ति, यस्मात्किन्तु घटाकाशादिमें जो रूप और कार्य आदिका भेद-व्यवहार है वह तो वास्तविक ही है ? [ ऐसी शंका होनेपर कहते हैं—] यह बात नहीं है, क्योंकि—

नाकाशस्य घटाकाशो विकारावयवौ यथा ।

नैवात्मनः सदा जीवो विकारावयवौ तथा ॥ ७ ॥

जिस प्रकार घटाकाश आकाशका विकार या अवयव नहीं है उसी प्रकार जीव भी आत्माका विकार या अवयव कभी नहीं है ॥ ७ ॥

परमार्थाकाशस्य घटाकाशो न विकारः; यथा सुवर्णस्यपरमार्थाकाशका घटाकाश न तो विकार है, जैसे कि सुवर्णके रुचकादि
१२२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

रुचकादिर्यथा वाप्रां फेनबुद्- | आभूषण तथा जलके फेन, बुद्बुद बुदाहिमादिः; नाप्यवयवो यथा | और हिम आदि हैं, और न जैसे वृक्षस्य शाखादिः । न तथा | शाखादि वृक्षके अवयव हैं उस आकाशस्य घटाकाशो विकारा- | प्रकार उसका अवयव ही है। इसी वयवौ यथा तथा नैवात्मनः | तरह, जैसे कि महाकाशका घटाकाश परस्य परमार्थसतो महाकाशस्था- | विकार या अवयव नहीं है उसी नीयस्य घटाकाशस्थानीयो जीवः | प्रकार, अर्थात् उपर्युक्त दृष्टान्तानुसार सदा सर्वदा यथोक्तदृष्टान्तवन्न | ही, महाकाशस्थानीय परमार्थ सत् विकारो नाप्यवयवः । अत | परमात्माका घटाकाशस्थानीय जीव, आत्मभेदकृतो व्यवहारो मृषै- | किसी अवस्थामें विकार या अवयव वेत्यर्थः ॥ ७ ॥ | नहीं है । अतः तात्पर्य यह है कि आत्मभेदजनित व्यवहार मिथ्या ही है ॥ ७ ॥

आत्माकी मलिनता अज्ञानियोंकी दृष्टिमें है

यस्माद्यथा घटाकाशादिभेद- | क्योंकि जिस प्रकार घटाकाशादि बुद्धिनिबन्धनो रूपकार्यादिभेद- | भेदबुद्धिके कारण उसका रूप एवं व्यवहारस्तथा देहोपाधिजीवभेद- | कार्य आदि भेदव्यवहार है उसी कृतो जन्ममरणादिव्यवहारः । | प्रकार देहोपाधिक जीवभेदके कारण तस्मात्तत्कृतमेवं क्लेशकर्मफलमल- | ही जन्म-मरण आदि व्यवहार है; वत्त्वमात्मनो न परमार्थत | इसलिये उसका किया हुआ ही इत्येतमर्थं दृष्टान्तेन प्रतिपिपा- | आत्माका क्लेश, कर्मफल और मलसे दयिषन्नाह— | युक्त होना है, परमार्थतः नहीं—इसी बातको दृष्टान्तसे प्रतिपादन करनेकी इच्छासे कहते हैं—

यथा भवति बालानां गगनं मलिनं मलैः । तथा भवत्यबुद्धानामात्मापि मलिनो मलैः ॥ ८ ॥

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १२३


जिस प्रकार मूर्ख लोगोंको [ धूलि आदि ] मलके कारण आकाश मलिन जान पड़ता है उसी प्रकार अविवेकी पुरुषोंकी दृष्टिमें आत्मा भी [ राग-द्वेषादि ] मलसे मलिन हो जाता है ॥ ८ ॥


यथा भवति लोके बालानाम-<br><br>विवेकिनां गगनमाकाशं घन-<br><br>रजोधूमादिमलैर्मलिनं मलवन्न<br><br>गगनं मलवद्याथात्म्यविवेकिनाम्,<br><br>तथा भवत्यात्मा परोऽपि यो<br><br>विज्ञाता प्रत्यक्क्लेशकर्मफलमलै-<br><br>र्मलिनोऽबुद्धानां प्रत्यगात्मविवेक-<br><br>रहितानां नात्मविवेकवताम् ।<br><br>नह्यूषरदेशस्तृड्वत्प्राण्यध्यारो-<br><br>पितोदकफेनतरङ्गादिमांस्तथा<br><br>नात्माबुद्धारोपितक्लेशादिमलै-<br><br>र्मलिनो भवतीत्यर्थः ॥ ८ ॥लोकमें जिस प्रकार बाल अर्थात् अविवेकी पुरुषोंकी दृष्टिमें आकाश मेघ, धूलि और धुआँ आदि मलोंके कारण मलिन-मलयुक्त हो जाता है, किन्तु आकाशके यथार्थ स्वरूपको जाननेवालोंकी दृष्टिमें ऐसा नहीं होता; उसी प्रकार अबुद्ध-प्रत्यगात्माके विवेकसे रहित पुरुषोंकी दृष्टिमें, जो प्रत्यक् और सबका साक्षी है वह परात्मा भी क्लेश, कर्म और फलरूप मलोंसे मलिन हो जाता है; किन्तु आत्मज्ञानियोंकी दृष्टिमें ऐसा नहीं होता ।<br><br>तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार ऊसरदेश तृषित प्राणीके आरोपित किये हुए जलके फेन और तरङ्गादि-से युक्त नहीं होता उसी प्रकार आत्मा भी अज्ञानियोंद्वारा आरोपित क्लेशादि मलोंसे मलिन नहीं होता ॥ ८ ॥

पुनरप्युक्तमेवार्थं प्रपञ्चयति—फिर भी पूर्वोक्त अर्थका ही विस्तार कहते हैं—
१२४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

मरणे सम्भवे चैव गत्यागमनयोरपि ।
स्थितौ सर्वशरीरेषु आकाशेनाविलक्षणः ॥ ९ ॥

यह आत्मा सम्पूर्ण शरीरोंमें मृत्यु, जन्म, लोकान्तरमें गमनागमन और स्थित रहनेमें भी आकाशसे अविलक्षण है। [अर्थात् इन सब व्यवहारोंमें रहते हुए भी यह आकाशके समान निर्विकार और विभु है] ॥९॥

घटाकाशजन्मनाशगमना-घटाकाशके जन्म, नाश, गमन,
गमनस्थितिवत्सर्वशरीरेष्वात्मनोआगमन और स्थितिके समान सम्पूर्ण शरीरोंमें आत्माके जन्म-मरणादिको
जन्ममरणादिराकाशेनाविलक्षणःआकाशसे अविलक्षण (भेदरहित) ही अनुभव करना चाहिये—यह
प्रत्येतव्य इत्यर्थः ॥ ९ ॥इसका अभिप्राय है ॥ ९ ॥

संघाताः स्वप्नवत्सर्वे आत्ममायाविसर्जिताः ।
आधिक्ये सर्वसाम्ये वा नोपपत्तिर्हि विद्यते ॥ १० ॥

देहादि समस्त संघात स्वप्नके समान आत्माकी मायासे ही रचे हुए हैं। उनके अपेक्षाकृत उत्कर्ष अथवा सबकी समानतामें भी कोई हेतु नहीं है ॥ १० ॥

घटादिस्थानीयास्तु देहादि-घटादिस्थानीय देहादिसंघात
संघाताः स्वप्नदृश्यदेहादिवन्मा-स्वप्नमें दीखनेवाले देहादिके समान
याविकृतदेहादिवच्चात्ममायावि-तथा मायावीके रचे हुए देहादिके
सर्जिताः, आत्मनो मायाविद्यासदृश आत्माकी मायासे ही रचे हुए हैं। तात्पर्य यह है कि आत्माकी
तया प्रत्युपस्थापिता न परमार्थतःमाया जो अविद्या है उसके प्रस्तुत
सन्तीत्यर्थः । यद्याधिक्यमधिक-किये हुए हैं, परमार्थतः नहीं हैं।
भावस्तिर्यग्देहाद्यपेक्षया देवादि-यदि तिर्यगादि देहोंकी अपेक्षा देवता

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १२५


कार्यकरणसंघातानां यदि वा सर्वेषां समतैव नैषामुपपत्तिः सम्भवः सद्भावप्रतिपादको हेतुर्विद्यते नास्ति, हि यस्मात्तस्मादविद्याकृता एव न परमार्थतः सन्तीत्यर्थः ॥ १० ॥आदिके शरीर और इन्द्रियोंकी अधिकता-उत्कृष्टता है अथवा यदि [ तत्त्वदृष्टिसे ] सबकी समानता ही है, तो भी, क्योंकि उनके सद्भावका प्रतिपादक कोई हेतु नहीं है, इसलिये वे अविद्याकृत ही हैं, परमार्थतः नहीं हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ १० ॥

उत्पत्त्यादिवर्जितस्याद्वयस्यात्मतत्त्वस्य श्रुतिप्रमाणकत्वप्रदर्शनार्थवाक्यान्युपन्यस्यन्ते—उत्पत्ति आदिसे रहित अद्वितीय आत्मतत्त्वका श्रुतिप्रमाणकत्व प्रदर्शित करनेके लिये [ उपनिषद्के ] वाक्योंका उल्लेख किया जाता है—

रसादयो हि ये कोशा व्याख्यातास्तैत्तिरीयके ।
तेषामात्मा परो जीवः खं यथा संप्रकाशितः ॥ ११ ॥

तैत्तिरीय श्रुतिमें जिन रसादि [ अन्नमयादि ] कोशोंकी व्याख्या की गयी है, आकाशवत् परमात्मा ही उनके आत्मा जीवरूपसे प्रकाशित किया गया है ॥ ११ ॥

रसादयोऽन्नरसमयः प्राणमय इत्येवमादयः कोशा इव कोशा अस्यादेरिवोत्तरोत्तरस्यापेक्षया बहिर्भावात्पूर्वपूर्वस्य व्याख्याता विस्पष्टमाख्यातास्तैत्तिरीयके तैत्तिरीयकशाखोपनिषद्वल्ल्यां तेषां कोशानामात्मा येनात्मना पञ्चापितैत्तिरीयकमें अर्थात् तैत्तिरीयकशाखोपनिषद्वल्लीमें जिन रसादि—अन्नरसमय एवं प्राणमय इत्यादि कोशोंकी व्याख्या—स्पष्ट विवेचना की गयी है और जो उत्तरोत्तरकी अपेक्षा पूर्व-पूर्व बहिःस्थित होनेके कारण खड्गके कोशके समान कोश कहे गये हैं उन कोशोंका आत्मा,
१२६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
कोशा आत्मवन्तोऽन्तरतमेन, स हि सर्वेषां जीवननिमित्तत्वाज्जीवः ।जिस अन्तरतम आत्माके कारण पाँचों कोश आत्मवान् हैं, वही सबके जीवनका निमित्त होनेके कारण 'जीव' कहलाता है ।
कोऽसावित्याह—पर एवात्मा यः पूर्वं "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तै० उ० २ । १) इति प्रकृतः। यस्मादात्मनः खममायादिवदाकाशादिक्रमेण रसादयः कोशलक्षणाः संघाता आत्ममायाविसर्जिता इत्युक्तम् । स आत्मास्माभिर्यथा खं तथेति संप्रकाशित "आत्मा ह्याकाशवत्" (अद्वैत० ३) इत्यादिश्लोकैः । न तार्किकपरिकल्पितात्मवत्पुरुषबुद्धिप्रमाणगम्य इत्यभिप्रायः ॥११॥वह कौन है ? इसपर कहते हैं—वह परमात्मा ही है, जिसका पहले "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म " इत्यादि वाक्योंमें प्रसङ्ग है और जिस आत्मासे खप्न और माया आदिके समान आकाशादि क्रमसे कोशरूप संघात आत्माकी मायासे ही रचे गये हैं-ऐसा कहा गया है । उस आत्माको हमने "आत्मा ह्याकाशवत्" इत्यादि श्लोकोंमें, जैसा आकाश है उसीके समान प्रकाशित किया है । तात्पर्य यह है कि वह तार्किकोंके कल्पना किये हुए आत्माके समान मनुष्यकी बुद्धिसे प्रमाणित होनेवाला नहीं है ॥ ११ ॥

द्वयोर्द्वयोर्मधुज्ञाने परं ब्रह्म प्रकाशितम् ।
पृथिव्यामुदरे चैव यथाकाशः प्रकाशितः ॥ १२ ॥

लोकमें, जिस प्रकार पृथिवी और उदरमें एक ही आकाश प्रकाशित हो रहा है उसी प्रकार [ बृहदारण्योक्त ] मधु ब्राह्मणमें [ अध्यात्म और अधिदैवत-इन ] दोनों स्थानोंमें एक ही ब्रह्म निरूपित किया गया है ॥१२॥

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १२७


किं चाधिदैवमध्यात्मं च तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः पृथिव्याद्यन्तर्गतो यो विज्ञाता पर एवात्मा ब्रह्म सर्वमिति द्वयोर्द्वयोराद्वैतक्षयात्परं ब्रह्म प्रकाशितम् । क्वेत्याह—ब्रह्मविद्याख्यं मध्वमृतममृतत्वं मोदनहेतुत्वाद्विज्ञायते यस्मिन्निति मधुज्ञानं मधुब्राह्मणं तस्मिन्नित्यर्थः। किमिवेत्याह—पृथिव्यामुदरे चैव यथैक आकाशोऽनुमानेन प्रकाशितो लोके तद्वदित्यर्थः ॥ १२ ॥तथा अधिदैवत और अध्यात्म-भेदसे जो तेजोमय और अमृतमय पुरुष पृथिवीके भीतर है और जो विज्ञाता परमात्मा ब्रह्म ही सब कुछ है—इस प्रकार द्वैतका क्षय होनेपर्यन्त दोनों स्थानोंमें परब्रह्मका ही प्रतिपादन किया गया है । कहाँ किया गया है ? सो बतलाते हैं—जिसमें ब्रह्मविद्यासंज्ञक मधु यानी अमृतका ज्ञान है—आनन्दका हेतु होनेके कारण उसका अमृतत्व है—उस मधुज्ञान यानी मधुब्राह्मणमें [ उसका प्रतिपादन किया गया है ] । किसके समान प्रतिपादन किया है ? इसपर कहते हैं कि जिस प्रकार लोकमें अनुमानसे पृथिवी और उदरमें एक ही आकाश प्रकाशित होता है, उसी तरह [ इनकी एकता समझो ] यह इसका अभिप्राय है ॥ १२ ॥

आत्मैकत्व ही समीचीन है

जीवात्मनोरनन्यत्वमभेदेन प्रशस्यते ।
नानात्वं निन्यते यच्च तदेवं हि समञ्जसम् ॥ १३ ॥

क्योंकि जीव और आत्माके अभेदरूपसे एकत्वकी प्रशंसा की गयी है और उनके नानात्वकी निन्दा की गयी है इसलिये वही [ यानी उनकी एकता ही ] ठीक है ॥ १३ ॥

१२८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
यद्युक्तितःश्रुतितश्चनिर्धारितं जीवस्य परस्य चात्मनो जीवात्मनोरनन्यत्वमभेदेन प्रशस्यते स्तूयते शास्त्रेण व्यासादिभिश्च । यच्च सर्वप्राणिसाधारणं स्वाभाविकं शास्त्रबहिष्कृतैः कुतार्किकैर्विरचितं नानात्वदर्शनं निन्द्यते “न तु तद्द्वितीयमस्ति” (बृ० उ० । ४ । ३ । २३) “द्वितीयाद्वै भयं भवति” (बृ० उ० १ । ४ । २) “उदरमन्तरं कुरुते, अथ तस्य भयं भवति” (तै० उ० २ । ७ । १) “इदं सर्वं यदयमात्मा” (बृ० उ० २ । ४ । ६, ४ । ५ । ७) “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति” (क० उ० २ । १ । १०) इत्यादिवाक्यैश्चान्यैश्च ब्रह्मविद्भिः । यच्चैतत्तदेवं हि संमञ्जसमृज्ववबोधं न्याय्यमित्यर्थः । यास्तु तार्किकपरिकल्पिताः कुदृष्टयस्ता अनृज्व्यो निरूप्यमाणा न घटनां प्राञ्चन्तीत्यभिप्रायः ॥ १३ ॥क्योंकि युक्ति और श्रुतिसे निश्चय किये हुए जीव और परमात्माके एकत्वकी शास्त्र और व्यासादि मुनियोंने समानरूपसे प्रशंसा यानी स्तुति की है और शास्त्रबाह्य कुतार्किकोंद्वारा कल्पित सर्वप्राणि-साधारण स्वाभाविक नानात्वदर्शनकी “उससे अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है” “दूसरेसे निश्चय भय होता है” “जो थोड़ा-सा भी भेद करता है, उसे भय प्राप्त होता है” “यह जो कुछ है सब आत्मा है” “जो यहाँ नानात्वत् देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है” इत्यादि वाक्यों तथा अन्य ब्रह्मवेत्ताओं-द्वारा निन्दा की गयी है । यह जो [ बतलाया गया ] है वह इसी प्रकार समजस-सरल बोधगम्य अर्थात् न्याययुक्त है । तथा तार्किकोंकी कल्पना की हुई जो कुदृष्टियाँ हैं वे सरल नहीं हैं; अभिप्राय यह है कि वे निरूपण की जानेपर प्रसंगके अनुरूप नहीं ठहरतीं ॥ १३ ॥

श्रुत्युक्त जीव-ब्रह्मभेद गौण है

जीवात्मनोः पृथक्त्वं यत्प्रागुत्पत्तेः प्रकीर्तितम् ।
भविष्यद्वृत्त्या गौणं तन्मुख्यत्वं हि न युज्यते ॥ १४ ॥

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १२९


पहले (उपनिषदोंके कर्मकाण्डमें) उत्पत्तिबोधक वाक्योंद्वारा जो जीव और परमात्माका पृथक्त्व बतलाया है वह भविष्यद्-वृत्तिसे गौण है, उसे मुख्य अर्थ मानना ठीक नहीं है ॥ १४ ॥

ननु श्रुत्यापि जीवपरमात्मनोः पृथक्त्वं यत्प्रागुत्पत्तेरुत्पत्त्यर्थोपनिषद्वाक्येभ्यः पूर्वं प्रकीर्तितं कर्मकाण्डे अनेकशः कामभेदत इदंकामोऽदःकाम इति; परश्च “स दाधार पृथिवीं द्याम्” (ऋ०सं० १०।१२१।१) इत्यादिमन्त्रवर्णैः; तत्र कथं कर्मज्ञानकाण्डवाक्यविरोधे ज्ञानकाण्डवाक्यार्थस्यैवैकत्वस्य सामञ्जस्यमवधार्यत इति ?**शंका—**जब श्रुतिने भी पहले—कर्मकाण्डमें उत्पत्ति-प्रतिपादक उपनिषद्-वाक्योंद्वारा 'इदंकामः' 'अदःकामः' आदि प्रकारसे [कर्मकाण्डमें भिन्न-भिन्न कामनाओंवाले कर्माधिकारी पुरुषके समान] अनेकों कामनाओंके भेदसे जीव और परमात्माका भेद प्रतिपादन किया है तथा परमात्माका “उसने पृथिवी और द्युलोकको धारण किया” इत्यादि मन्त्रवर्णोंसे पृथक् ही निर्देश किया है, तब इस प्रकार कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्डके वाक्योंमें विरोध उपस्थित होनेपर केवल ज्ञानकाण्डोक्त एकत्वका ही सामञ्जस्य (यथार्थत्व) किस प्रकार निश्चय किया जा सकता है ?
अत्रोच्यते—“यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते” (तै० उ० ३ । १) “यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गाः” (बृ० उ० २ । १ । २०) “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः” (तै० उ० २ । १ । २) “तदैक्षत” (छा० उ० ६ । २ । ३) “तत्तेजोऽसृजत” (छा० उ०**समाधान—**इस विषयमें हमारा कथन है कि “जहाँसे ये सब भूत उत्पन्न होते हैं” “जिस प्रकार अग्निसे नन्हीं-नन्हीं चिनगारियाँ [निकलती हैं]” “उसी इस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ” “उसने ईक्षण किया” “उसने तेजको रचा”

१७-१८

१३०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का० ]
६ । २ । ३) इत्याद्युत्पत्त्यर्थोपनि-इत्यादि उत्पादक उपनिषद्वाक्योंसे
षद्वाक्येभ्यः प्राक्पृथक्त्वं कर्मकाण्डेपहले कर्मकाण्डमें जो पृथक्त्वका
प्रकीर्तितं यत्तन्न परमार्थम् । किंप्रतिपादन किया गया है वह
तर्हि ? गौणं महाकाशघटा-परमार्थतः नहीं है। तो कैसा है ?
काशादिभेदवत् । यथौदनंवह महाकाश और घटाकाशादिके
पचतीति भविष्यद्वृत्त्या तद्वत् ।भेदके समान गौण है और जिस
न हि भेदवाक्यानां कदाचिदपिप्रकार भविष्यद्वृत्तिसे 'भात पकाता
मुख्यभेदार्थत्वमुपपद्यते । स्वाभा-है'* ऐसा कहा जाता है उसीके
विकाविद्यावत्प्राणिभेददृष्ट्यनुवा-समान है। आत्म-भेदवाक्योंका मुख्य
दित्वाद्रास्तभेदवाक्यानाम् ।भेदप्रतिपादकत्व कभी सम्भव नहीं
है; क्योंकि भेदवाक्य तो अज्ञानी
जीवोंकी स्वाभाविक भेददृष्टिका ही
अनुवाद करनेवाले हैं।
इह चोपनिषत्सूत्पत्तिप्रलयादि-यहाँ उपनिषदोंमें तो "तू वह
वाक्यैर्जीवपरमात्मनोरेकत्वमेवहै" "यह अन्य है और मैं अन्य
प्रतिपिपादयिषितम् "तत्त्वमसि"हूँ—ऐसा जो जानता है वह
(छा० उ० ६ । ८–१६) "अन्योऽ-नहीं जानता" इत्यादि श्रुतियोंके
सावन्योऽहमस्मीति न स वेद"अनुसार उत्पत्ति-प्रलयादि-बोधक
(बृ० उ० १ । ४ । १०)वाक्योंसे भी जीव और परमा-
इत्यादिभिः । अत उपनिषत्सुत्माका एकत्व ही प्रतिपादन करना
एकत्वं श्रुत्या प्रतिपिपादयिषितंइष्ट है। अतः उपनिषदोंमें श्रुतिको
भविष्यतीति भाविनीमेकत्ववृत्ति-एकत्व ही प्रतिपादन करना इष्ट
माश्रित्य लोके भेददृष्ट्यनुवादोहोगा—इस भविष्यद्वृत्तिको आश्रय
गौण एवेत्यभिप्रायः ।करके लोकमें भेददृष्टिका अनुवाद
गौण ही है—यह इसका अभिप्राय है।

* 'भात' उबले हुए चावलोंको कहते हैं; जो चावल पकाये जाते हैं उनकी संज्ञा 'भात' नहीं है। अतः इस वाक्यमें जो उनके लिये 'भात' शब्दका प्रयोग हुआ है वह भविष्यदृष्टिसे है।

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १३१


अथ वा "तदैक्षत" (छा० उ० ६।२।३) "तत्तेजोऽसृजत" (छा० उ० ६।२।३) इत्याद्युत्पत्तेः प्राक् "एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।२) इत्येकत्वं प्रकीर्तितम् । तदेव च "तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि" (छा० उ० ६।८-१६) इत्येकत्वं भविष्यतीति तां भविष्यद्वृत्तिमपेक्ष्य यज्जीवात्मनोः पृथक्त्वं यत्र क्वचिद्वाक्ये गम्यमानं तद्गौणम्, यथौदनं पचतीति तद्वत् ॥१४॥

अथवा "उसने ईक्षण किया" "उसने तेजको रचा" इत्यादि श्रुतियोंद्वारा जो उत्पत्तिसे पूर्व "एकमेवाद्वितीयम्" इत्यादि प्रकारसे एकत्वका निरूपण किया है वह "वह सत्य है, वह आत्मा है और वही तू है" इस प्रकार आगे एकत्व हो जायगा इस भविष्यद्वृत्तिसे जहाँ-कहीं किसी वाक्यमें जीव और आत्माका पृथक्त्व जाना गया है उसी प्रकार-गौण है, जैसे कि 'भात पकाता है' इस वाक्यमें [ 'भात' शब्दका प्रयोग ] ॥ १४ ॥


दृष्टान्तयुक्त उत्पत्ति-श्रुतिकी व्यवस्था

ननु यद्युत्पत्तेः प्रागजं सर्वमेकमेवाद्वितीयं तथाप्युत्पत्तेरूर्ध्वं जातमिदं सर्वं जीवाश्च भिन्ना इति, नैवम्; अन्यार्थत्वादुत्पत्तिश्रुतीनाम् । पूर्वमपि परिहृत एवायं दोषः स्वप्नवदात्ममायाविसर्जिताः संघाता घटाकाशोत्पत्तिभेदादिवज्जीवानामुत्पत्तिभेदादिरिति । इत श्चोत्पत्ति-

यदि कहो कि उत्पत्तिसे पूर्व तो सब अजन्मा तथा एक ही अद्वितीय है तथापि उसके पीछे तो सब उत्पन्न हुआ ही है और तब जीव भी भिन्न ही हैं-तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उत्पत्तिसूचक श्रुतियाँ दूसरे ही अभिप्रायसे हैं । 'देहादिसंघात स्वप्नके समान आत्माकी मायासे ही प्रस्तुत किये हुए हैं' तथा 'घटाकाशकी उत्पत्तिसे होनेवाले भेदके समान जीवोंकी उत्पत्तिके भेद हैं' इन वाक्योंद्वारा पहले भी इस दोषका परिहार किया ही जा चुका है । इसीलिये पूर्वोक्त उत्पत्ति-भेदादिसूचक श्रुतियोंसे उन-