मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
खेतिहर किसान वर्गको शोषक भी नहीं कहा जा सकता । उसीकी कमाई सबको खानेको मिलती है । अतः 'बहुजनहिताय, बहुजनसुखाय' उसकी दशा सुधारना क्या उचित न था ? फिर जब कम्युनिष्ट शोषितका ही पक्ष लेता है, तब यह भी कहना होगा कि 'जो सर्वाधिक शोषित हो, उसीका पक्ष लेकर शोषकोंका मुकाबला करना चाहिये ।' इस दृष्टिसे भी सर्वाधिक बहुसंख्यक समाजके हितार्थ प्रयत्न आवश्यक है । फिर केवल सर्वहारा मजदूर समाजका ही पक्षपात क्यों ? पुनश्च, यदि परिणाम सम्बन्धी, क्रमिक-परिवर्तन और अकस्मात् एवं शीघ्रतासे होनेवाले गुण-सम्बन्धी परिवर्तन विकासके नियम हैं तो जैसे सर्वहारावर्गद्वारा की गयी क्रान्ति स्वाभाविक अनिवार्य घटना हो सकती है, वैसे ही खेतिहर वर्ग- द्वारा भी की गयी क्रान्ति महत्त्वपूर्ण क्यों न होगी ? फिर यदि द्वन्द्वमानके अनुसार निर्माण और निर्वाणका क्रम चलता ही रहेगा तो किसी दिन साम्यवाद- की कल्पना भी पुरानी होगी और फिर इसे भी मिटानेके लिये कम्युनिष्टको प्रयत्न- शील होना पड़ेगा । आजकल जो 'सुधारवाद' चलता है, जिसका उद्देश्य प्राचीन वस्तुओंका एकाएक विनाश नहीं, किंतु दोषोंको दूर कर उन्हें अच्छा बनाना होता है, स्टालिन आदिने उसे नगण्य बताया है । समाजवादकी मुख्य तीन प्रवृत्तियाँ हैं—सुधारवाद, अराजकतावाद और मार्क्सवाद । सुधारवाद— ( बर्न्सवीक आदिकी विचारधारा ) समाजवादको बहुत दूरकी बात समझता है । उससे आगे कुछ है ही नहीं । सुधारवाद समाजवादी क्रान्तिको नहीं मानता और शान्तिपूर्ण उपायोंसे समाजवाद कायम करना चाहता है । सुधारवाद वर्गसंघर्षको न मानकर वर्ग- सहयोगका प्रतिपादन करता है । स्टालिनकी दृष्टिमे 'यह सुधारवाद दिन-प्रति-दिन सड़ता ही जा रहा है । समाजवाद और सुधारवादकी सारी समानता दिन-प्रति- दिन खतम होती जा रही है, अतः सुधारवादपर विचार करना ही व्यर्थ है ।' सुधारवादके सम्बन्धमें मार्क्सवादियोंकी यह धारणा है । प्राचीनतावादी सुधार- वादियोंको सर्वथा हेय बताते हैं । भारतमें काग्रेस, हिंदूसभा, जनसंघ आदि सुधार- वादी संस्थाएँ हैं । ये एक तरफ भारतीयता, संस्कृतिकी बातें करतीं और सुधार भी चाहती हैं । उधर, कम्युनिष्ट, सोशलिष्ट आदि अराजकतावादी पार्टियाँ सर्वथा परिवर्तनकर महाक्रान्ति चाहती हैं । रामराज्यादि पार्टियाँ शास्त्रों और परम्पराके अनुसार सनातन संस्कृति, धर्म एव राजनीतिमें सिद्धान्ततः तिलभर परिवर्तन नहीं चाहतीं । इनमें सुधारवादी किभी सिद्धान्तपर स्थिर नहीं हैं । रामराज्यवादी ईश्वर एव धर्म आत्माको ही आधारभित्ति मानकर चलते हैं । अपौरुषेय वेद एवं तन्मूलक आर्षग्रन्थ तथा तदविरुद्ध तर्कके आधारपर तत्त्वका निर्णय करते हैं । भौतिकवादी आत्मधर्मशास्त्रादिनिरपेक्ष, तर्क, प्रत्यक्ष एवं विज्ञानके आधारपर
मार्क्सीय द्वन्द्ववाद २४७ तत्त्व-निर्णय करते हैं । पर सुधारवादी बीच-बीचमें रहना चाहते हैं । फलतः वे दोनों पक्षोंहीसे उपेक्षित रहते हैं । उनमेंसे कुछको अन्तमें भौतिकवादकी ओर जाना पड़ता है और कुछको अध्यात्मकी ओर । अराजकतावादीका कहना है कि 'जबतक व्यक्तिको स्वतन्त्रता नहीं मिलती तबतक जनताको स्वतन्त्रता नहीं मिल सकती । अतः सब कुछ व्यक्तिके लिये होना चाहिये ।' मार्क्सवादी कहता है कि 'जनताकी स्वतन्त्रतासे ही व्यक्तिको स्वतन्त्रता मिलती है । अतः सब कुछ जनताके लिये ही होना चाहिये ।' पर रामराज्यवादीकी दृष्टिमें व्यक्ति और समाज दोनोंका समन्वय ही ठीक है । समष्टिकी सुख-समृद्धि और स्वतन्त्रतासे व्यक्तिके अभ्युदयमें सुविधा होती है । अनुकूल साधन और वातावरणसे आदमी उन्नतिके मार्गमें अग्रसर हो सकता है । इसके साथ ही जैसे एक-एक वृक्ष कट जानेसे वन कट जाता है, एक-एक सैनिक कट जानेसे सेना कट जाती है, वैसे ही एक-एक व्यक्तिके धनवान्, बलवान् बन जानेसे समष्टि बलवान्, धनवान् बन जाता है । व्यक्तियोंके निर्धन, अयोग्य हो जानेसे समष्टि निर्धन एव अयोग्य हो जाता है । जहाँ व्यष्टि समष्टिके हितोंमें विरोध हो, वहाँ समष्टिके अविरुद्ध ही व्यष्टिको आत्महित-साधनमें प्रवृत्त होना अनिवार्य होगा । व्यक्तिको समाजहितका, समाजको राष्ट्रहितका, राष्ट्रको विश्वहितका ध्यान रखना अनिवार्य होगा । समष्टिको हानि पहुँचाकर आत्महित साधना निन्द्य समझा जायगा । मार्क्सवादियोंके मतानुसार 'सुधारवादी न होकर क्रान्तिवादी होना चाहिये । विकासका क्रम आन्तरिक असंगतियोंके खुलनेसे आगे बढ़ता है । इन असंगतियोंपर विजय पानेके लिये इन्हींके आधारपर विरोधी शक्तियोंमें संघर्ष होता है । अतः मजदूरोका वर्ग-संघर्ष स्वाभाविक तथा अनिवार्य घटना है । इसीलिये पूँजीवादी असंगतियोंपर पर्दा न डालकर उन्हें खुलासा करना चाहिये । वर्ग-संघर्ष रोकनेका प्रयत्न न कर उसे उसके अन्तिम परिणामतक ले जानेका प्रयत्न करना चाहिये । अतः बिना मुलाहिजेकी सर्वहारा श्रेणी वर्गनीतिका पालन आवश्यक है ।' सर्वहारा और पूँजीवादियोंके हित-सामञ्जस्य करते ही सुधारवादी नीति या पूँजीवाद- के समाजवादमें विकसित होनेकी समझौतावादी नीतिका अनुसरण उचित नहीं है । इसे ही समाजके जीवन एव इतिहासपर लागू की जानेवाली द्वन्द्वात्मक प्रणाली कहा जाता है । रामराज्यवादी सर्वत्र अनिन्दित व्यक्ति या वर्गोंमें सामञ्जस्यके साथ अभ्युदयोन्मुखी प्रगतिको श्रेयस्कर समझते हैं । वर्गसंघर्ष दुष्प्रचारमूलक ही होता है । मन्थराने राम और भरतमें फूट डालकर संघर्ष डालना चाहा, पर सफल न हुई । इसी तरह अच्छे लोगोंमें वर्गवाद सफल नहीं होता ।
पञ्चम परिच्छेद वर्ग-संघर्ष 'वर्गसंघर्ष' मार्क्सवादका एक मूल सिद्धान्त है। ऐतिहासिक विवेचनसे वह इसी निष्कर्षपर पहुँचता है कि समाजका विकास वर्गसंघर्षसे प्रभावित होता है। समाजमें दो वर्ग होते हैं—शोषित तथा शोषक। उत्पादनके साधनोंपर जिनका अधिकार होता है; वह शोषक वर्ग है; दूसरा शोषित। प्रत्येक नियम, रीति, रिवाज, दर्शन, कला, इतिहास—सभी वर्ग-संघर्षके विचारोंसे प्रभावित होते हैं। उत्पादनके साधनोंमें परिवर्तनके साथ सामाजिक मान्यताओंमें परिवर्तन होता रहता है। इस स्थितिमें कोई भी नियम ऐसा नहीं जो शाश्वत कहा जा सके। शाश्वत नियमोंका नारा पूँजीवादी दार्शनिकोंद्वारा व्यक्तिगत सम्पत्ति की सुरक्षा तथा शोषणको प्रोत्साहित करनेके लिये लगाया गया। सापेक्ष और शाश्वत नियम कहा जाता है कि संसारमें सबसे पहले फ्रांसने समानता, स्वतन्त्रता एवं भ्रातृताका नारा बुलंद किया। मार्क्स उसीसे प्रभावित होकर साम्यवादकी ओर आकृष्ट हुआ, परंतु उसने देखा कि फ्रांसमें समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृताके नारे ही नारे हैं, व्यवहारमें घोर वैषम्य विद्यमान है। कोई तो महाधनवान्, सर्वसाधन- सम्पन्न है और कोई महादरिद्र एवं दुखी है। मार्क्सको इसका कारण ढूँढ़नेसे ज्ञात हुआ कि समाजमें धार्मिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक, आर्थिक शाश्वत नियमोंपर दृढ़ विश्वास बना हुआ है और समाज उन शाश्वत नियमोंको अपरिहार्य मानता है। फलतः लखपति, कोटिपतिका पुत्र स्वभावतः धनवान् होता है; भूमिपति, मकानमालिक आदि सभीकी संतानें सम्पन्न होती हैं। इस तरह समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृताकी बातें करते हुए भी कुछ लोगोंकी व्यक्तिगत सम्पत्ति ज्यो-की- त्यों बनी रहेगी। गरीब गरीब ही बने रहेंगे और व्यावहारिक आर्थिक दृष्टिसे समानता नहीं हो सकेगी।' इसलिये आर्थिक असंतुलन या अर्थ-वैषम्य दूरकर व्यावहारिक समानता लानेके उद्देश्यसे मार्क्सने अर्थ-सम्बन्धी प्राचीन नियमोंका खण्डन किया। परंतु यह संगत नहीं है। व्यक्तिगत सम्पत्ति भारतीय धार्मिक, राजनीतिक शास्त्रोंने व्यक्तिगत सम्पत्तियोंको वैध माना है। मन्वादि धर्मशास्त्र, मिताक्षरा आदि निबन्धग्रन्थोंमें कहा गया है कि पितृपितामहादिकी सम्पत्तिमें पुत्र पौत्रादिका जन्मना स्वत्व है। गर्भस्थ शिशुका भी पितापितामहादिकी सम्पत्तिमें स्वत्व मान्य है। अतएव दायके रूपमें प्राप्त चल, अचल धन पुत्रादिका वैध धन है। इसी प्रकार निधि लाभ, मित्रोंसे मिली, विजयसे प्राप्त, गाढ़े पसीनेकी कमाईमे खरीदीहुई सम्पत्ति, पुरस्कार तथा दानमें प्राप्त एवं उद्योग, कृषि, व्यापारादितथा उचित सूद आदिद्वारा प्राप्त सम्पत्ति वैध-सम्पत्ति समझी जाती है—
सप्त वित्तागमा धर्म्या दायो लाभः क्रयो जयः । प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च ॥ (मनु० १० । ११५) प्रायः आज भी सभी देशोंमें सम्पत्ति-सम्बन्धी नियम ऐसे ही हैं। किसीकी व्यक्ति सम्पत्ति, भूमि, मकान आदिपर उनके उत्तराधिकारियोंका अधिकार रहता है, सरकार भी अगर किसीकी कोई वस्तु सार्वजनिक हितकी दृष्टिसे लेती है तो उसे मुआवजा देती है। भारतमें भी जमींदारी, जागीरदारीका मुआवजा दिया गया है; राजाओंसे राज्य लेकर उन्हें कुछ सालाना दिया जा रहा है। इससे सिद्धान्ततः भारत-सरकारने बाप-दादाकी सम्पत्तिको बेटे पोतेकी बपौती—मिलकियत होनेका सिद्धान्त मान लिया, तभी मुआवजा और सालाना देनेकी बातकी सङ्गति लगती है । अन्यथा मुआवजा आदि देनेकी कोई सङ्गति नहीं लग सकती । हाँ, यह बात अवश्य है कि जब राज्य या जागीरें राजाओं या जागीरदारोंकी वैधानिक मिलकियत है, वैध धन है तब उन्हें उचित मूल्य बिना दिये और उन्हें बिना सन्तुष्ट किये मनमानी कुछ देकर अपहरण करना एक प्रकारका स्तेय ही है। आजकल कुछ लोग भूस्वामी कहनेमें हिचकिचाते हैं । परन्तु वस्तुतः यदि कोई अपने सिरकी टोपीका स्वामी हो सकता है, अपनी झोपड़ी और पत्नीका पति हो सकता है, तो भूस्वामी होना भी कोई अनहोनी घटना नहीं। यदि दृढ़ता- से अपनी टोपीकी रक्षा न की जायगी, तो गुंडे टोपी भी छीन लेंगे, अपनी थालीकी रोटीको भी उठा ले जायेंगे, झोपड़ी और पत्नी भी छिन जायगी। इसलिये कुछ पुराने साम्यवादियोंका भी मत था कि मौजूदा राज्य शासनसे अलग रहकर ही स्वतन्त्ररूपसे साम्यवादी पंचायती शासन कायम किये जाने चाहिये। नैतिक, आर्थिक भावनाओंके कारण किसीकी व्यक्तिगत सम्पत्तिमें हाथ डालना ये लोग अनुचित समझते थे। परन्तु मार्क्सके मतानुसार 'राज्यशक्तिको ही सामाजिक क्रान्तिका एक प्रबल अङ्ग बनाया जा सकता है।' मार्क्सने सबसे पहले इन विश्वासोंका खण्डन करना उचित समझा । तदनुसार ही उसने द्वन्द्वात्मक भौतिकवादकी स्थापना की । जिसके अनुसार आध्यात्मिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक नियमों और सिद्धान्तोंकी शाश्वतिकता और नित्यताका खण्डन किया जाता है। प्रसङ्गानुरूप उसे आत्मा, परमात्मा एवं धार्मिक नियमोंकी अनावश्यकता सिद्ध करनेका भी प्रयत्न करना पड़ता है। इन लोगोंके मतानुसार भूत या परमाणु अथवा कुछ विद्युत्कणों अथवा प्रकृतिके हलचलसे ही प्रपञ्च निर्माण होता है। 'डार्विन'का विकासवाद तथा वैज्ञानिक आविष्कार आदि ही इनकी विचारधाराकी आधार-भित्ति है। विकासवादकी आलोचना पिछले अध्यायमें पूर्णरूपसे की जा चुकी है। यहाँ उसे दुहरानेकी आवश्यकता नहीं। मार्क्सके मतानुसार जब मानवसमाजमें खेती आदि आरम्भ हो गयी, कुछ
२५० मार्क्सवाद और रामराज्य नियम बनने लगे और विवाह आदि चल पड़े, तब पंचायतों और मुखियोंका निर्माण हुआ; धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि अनेक प्रकारके नियम बनाये गये । इसी बीच खेतों तथा फलवान् वृक्षोंपर अधिकार प्राप्त करनेके लिये दो दलोंमें संग्राम होने लगे । संग्राममें जो लोग जीत गये, वे मालिक बन बैठे और जो हार गये, वे गुलाम बने । उसी समयसे मालिक और गुलामका जन्म हुआ और उनमें भेद, संघर्ष तथा विद्वेष उत्पन्न होने लगा। निजी सम्पत्तिकी प्रथा जबसे चली है, तभीसे दो दल तथा वर्ग परस्पर विरुद्ध रहने लगे थे । तबसे ही मनुष्यजातिका इतिहास वर्ग-कलहका इतिहास है । यह दूसरी बात है कि यह वर्ग- कलह कभी प्रत्यक्ष रहता है कभी अप्रत्यक्ष । इसके फलसे या तो नवीन सामाजिक प्रणाली, नवीन स्वामित्व प्रथा, नवीन आर्थिक नियमोंका जन्म होता है या दोनों वर्गोंका लड़ते-लड़ते नाश हो जाता है । ये दोनों दल भिन्न भिन्न स्वार्थ स्वामित्व- की प्रथा, आदर्श तथा सभ्यताके समर्थक होते हैं । शाश्वत नियम पर सिद्धान्ततः राज्यशक्तिको किसी भी धार्मिक, आध्यात्मिक नियन्त्रणमे ही रहना उचित है । अन्यथा अनियन्त्रित उच्छृङ्खल राज्यशक्ति राष्ट्रके लिये भीषण सिद्ध हो सकती है । 'बृहदारण्यक उपनिषद्' में कहा गया है कि 'धर्म क्षत्रका भी क्षत्र है', अर्थात् धर्मपर राजाका शासन नहीं चलता, अपितु राजापर धर्मका शासन चलता है । जैसे बिना नकेलके ऊँट, बिना लगामके घोड़ा, बिना ब्रेकके साइकिल- मोटर आदि खतरनाक होते हैं, वैसे ही बिना नियन्त्रणके निरङ्कुश राज्यशक्ति देशके लिये अभिशाप सिद्ध हो सकती है । इसीलिये आज भी कुछ शासनके नियम और परम्पराएँ हैं ही तथा शासनोंको उनका नियन्त्रण मानना ही पड़ता है। ऐसी स्थितिमें राज्यशक्तिको धार्मिक, सामाजिक या राजनीतिक परम्परागत नियमोंके उल्लङ्घन करनेका अधिकार कथमपि नहीं है । भारतीय सभ्यतामें धर्म ब्रह्मके द्रष्टा सांसारिक भावोंसे अतीत होते हैं । प्रियान्न सम्भवेद् दुःखमप्रियादधिकं भवेत् । ताभ्यां हि ये वियुज्यन्ते नमस्तेषां महात्मनाम् ॥ (वाल्मी० रामा० सुन्दर० २६ । ४६) जो प्रिय-अप्रिय दोनोंसे अतीत हैं, उन्हें ही नमनीय महात्मा कहा गया है । वे लोग भी ऋतम्भरा प्रज्ञा एवं अपौरुषेय शास्त्रोंका आदर करते हैं । कुछ लोगोंका कहना है कि विभिन्न देश-काल और परिस्थितिके अनुसार विभिन्न महापुरुषोंद्वारा राष्ट्रके धारण पोषणानुकूल निर्धारित नियम-समूह ही शास्त्र है। परंतु यह सर्वथा अनिश्चित एवं अव्यवस्थित है। क्रियामें विकल्प हो सकता है, परंतु वस्तुमे विकल्प नहीं हो सकता । एक वस्तुके विषयमें एक ही ज्ञान यथार्थ
होता है, अन्य अयथार्थ होते हैं। जैसे किसीने आत्माका देहादि भिन्न होना स्वीकार किया, किसीने देह मात्रको ही आत्मा माना, किसीने आत्माको अणुरूप, किसीने मध्यम, किसीने व्यापक माना, किसीने चेतन, किसीने अचेतन, किसीने उभयात्मक माना। यदि महापुरुष सर्वज्ञ हैं तो मतभेद कैसे ? कोई सर्वज्ञ, कोई अल्पज्ञ कहा जाय तो भी कैसे ? तत्तन्मतानुयायी अपने-अपने तीर्थंकरोंको सर्वज्ञ ही मानते हैं। किसी पुरुषके मतसे प्रभावित जनता, पंचों, विधानसभाओं एवं लोकसभाओंने यदि कोई धर्म या धर्मशास्त्र बना भी लिया, तो भी जबतक कर्मफलदाता ईश्वर उसे स्वीकार न कर ले तबतक उसका कोई भी महत्त्व नहीं। लौकिक कर्मों और फलोंके नियम लौकिक पुरुषोंद्वारा बनाये जा सकते हैं, परंतु जिन कर्मोंका दृष्ट फल नहीं है, जिनका केवल परलोकमें फल होता है, उन कार्योंका फल प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे विदित नहीं हो सकता। कितने लौकिक नेता या शासक मृत्युके अनन्तर कहाँ गये, उन्हें पिछले किन कर्मोंका क्या फल मिला, यह जानना न तो जनताके लिये सम्भव है और न तो पत्रकारों तथा विधानसभाई, लोकसभाई सदस्योंके लिये ही। धार्मिकोंका विश्वास है कि सगोत्र, सपिण्ड विवाहसे पाप होता है, परंतु आज सरकार इस शास्त्रीय नियमको तोड़कर उसे धर्म बनाने जा रही है। आज पिता- पुत्री, भ्राता-भगिनी, माता-पुत्रका उद्वाह अधर्म माना जाता है। हो सकता है, कुछ और प्रगतिशील कुछ दिनोंमें इसे भी जायज धर्म माननेका आग्रह करें और इसे भी कानून बना दे। किंतु यदि वस्तुतः ईश्वर है और वह इसे अधर्म समझता है तो जबतक वह इसे धर्म स्वीकार न करे, तबतक ऐसे उद्वाहोंको कोई सरकार धर्म भले ही कह दे, परंतु वह वस्तुतः धर्म नहीं हो सकता। ईश्वरवादीकी दृष्टिसे ईश्वर सनातन है, अतः उसके निर्धारित नियम भी सनातन हैं। वह सर्वज्ञ है, सर्वदेशों, कालों तथा परिस्थितियोंको जानता है तथा तत्तद्देशों, कालों और परिस्थितियों- के अनुसार नियम बनाता है। अल्पज्ञ नेता या सरकार सर्वदेश काल-परिस्थितियों- से अनभिज्ञ होते हैं। अतः वे यथाज्ञान नियम बनाते हैं। यदि दूसरी परिस्थितिमें पुराने नियमोंमें अड़चन प्रतीत होती है, तब उन्हें रद्दोबदल करनेकी आवश्यकता प्रतीत होती है। किंतु सर्वज्ञके सम्बन्धमें यह बात नहीं कही जा सकती। वह तो अनन्त देशकाल तथा ब्रह्माण्डोंको जानता है; अनन्त जीवों, उनके अनन्त जन्मों तथा प्रत्येक जन्मके अनन्त कर्मों एवं उनके फलोंको जानता है और फल देनेकी क्षमता भी रखता है। उसी सर्वशास्ता सर्वेशका शासनवचन ही शास्त्र है। यदि ईश्वरका विनाश सम्भव हो या ईश्वरकी पराजय सम्भव हो अथवा ईश्वरमें अल्पज्ञता या भ्रान्ति सिद्ध हो सके, तभी ईश्वरमें रद्दोबदल सम्भव है। पर ईश्वरका विनाश, पराजय आदि सर्वथा असम्भव है, अतः उसके धर्ममें भी परिवर्तन करना असम्भव है।
२५२ मार्क्सवाद और रामराज्य हाँ, ईश्वरीय शास्त्रोंने पहलेसे ही देश, काल परिस्थितिके अनुसार जितना नियमोंमें परिवर्तन निश्चित कर रखा है, वह परिवर्तन मान्य है। जैसे सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुगके भेदसे; विपत्ति, सम्पत्तिके भेदसे कुछ परिवर्तन शास्त्र सम्मत है ही। व्यवहारमें भी जो जिस कार्यमें दक्ष होता है, वह उसी कार्यमें सफल होता है। मिले हुए दूध- पानीको अलग करना हंसके लिये सरल है, पर औरोंके लिये कठिन। मिली हुई बालू और शर्कराको पृथक् करना पिपीलिकाके लिये सरल है, पर दूसरोंके लिये कठिन। विविध पुष्पस्तबकोंसे मधुर रस निकालकर मधु बनाना मधुमक्षिकाके लिये सरल है, औरोंके लिये कठिन। वैद्य, इंजीनियर, वकील, गणक आदि अपने-अपने विषयमें सफल हो सकते हैं, दूसरोंके विषयमें नहीं। दूरवीक्षण, अणुवीक्षण आदि या योगादिजन्य विशेषताओंके उत्पन्न होनेपर भी विषयकी सीमा बनी ही रहती है। योगादिजन्य विशेषतासे श्रोत्ररूपके सम्बन्धमें अथवा नेत्रशब्दके सम्बन्धमें सफल नहीं हो सकता— यत्राप्यतिशयोदृष्टः स स्वार्थानतिलङ्घनात्। दूरसूक्ष्मादिदृष्टौ स्यान्न रूपे श्रोत्रवृत्तिता ॥ यहाँ बहुमतका भी कोई मूल्य नहीं। कहा जा चुका है कि नेत्रविहीन कोटि- कोटि अन्धे भी रूपज्ञानमें सफल नहीं हो सकते। इसी तरह रोगके सम्बन्धमें वैद्या- दिकी ही सम्मति मान्य होती है, इंजीनियर या वकीलोंकी नहीं। डाक्टरों या वकीलोंके बहुमतके आधारपर टूटी घड़ीका पुर्जा ठीक नहीं कराया जा सकता, उसके लिये तो इंजीनियर ही अपेक्षित होगा। इसी तरह शाश्वत नियमोंके सम्बन्धमें उन्हींका मत मान्य हो सकता है, जो उसके जानकार तथा अधिकारी हैं। शोषक-शोषित भूमि आदिके लिये युद्ध, संघर्ष होने; मालिक गुलाम, शोषक-शोषित, उत्पीड़क-उत्पीड़ित आदिकी कल्पना तो हालकालकी बात है। सृष्टिके प्रारम्भकालमें सम्पूर्ण प्रजा धर्म-नियन्त्रित थी। उस समय सत्त्वगुणका पूर्ण विस्तार था। सभी समझते थे कि सभी प्राणी अमृतके पुत्र हैं—‘अमृतस्य पुत्राः’। सभी प्राणियोंकी सहज समानता, स्वतन्त्रता एवं भ्रातृत्ताकी मूल आधार भित्तिको समझते थे। व्यवहारमें सब एक दूसरेके पोषक ही थे, शोषक नहीं, सब परस्पर एक दूसरेके रक्षक ही थे, भक्षक नहीं। उत्पीड़क-उत्पीड़ितका भेद सर्वथा ही न था। महाभारतमें उस अवस्थाका वर्णन मिलता है— न वै राज्यं न राजाऽऽसीन्न दण्डो न च दाण्डिकः । धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥ ( महा० शां० प० ५९ । १४ ) अर्थात् प्रथम राज्य-राजा, दण्ड-दाण्डिक कोई भी भेद नहीं था। सभी धर्म-
नियन्त्रित हो परस्पर एक-दूसरेका पालन करते थे। अपौरुषेय नित्य वेदोंके द्वारा भी आदर्श शासनका रूप दिखलाया गया है— न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः। नानाहिताग्निर्नाविद्वान् न स्वैरी स्वैरिणी कुतः॥ (छान्दो० उप० ५। ११। ५) मेरे राज्यमें कोई चोर नहीं, कोई कृपण नहीं, कोई मद्यप नहीं और कोई अधिकारी होकर अनाहिताग्नि नहीं; अर्थात् कोई अस्वधर्मनिष्ठ नहीं, किन्तु सभी स्वधर्म- निष्ठा हैं। मेरे राज्यमें कोई दुराचारी पुरुष नहीं, फिर दुराचारिणी स्त्री तो हो ही कैसे सकती है ? आजके सभ्य कहे जानेवाले किसी भी शासनमें क्या ऐसा धार्मिक स्तर दृष्टिगोचर होता है ? व्यवहारतः जहाँ शिवि, दिलीप, रन्तिदेव आदि पशु, पक्षी एवं साधारण मनुष्योंके लिये आत्मोत्सर्ग तक कर देते थे, वहाँ शोषक-शोषित, उत्पीड़क-उत्पीड़ितोंके वर्ग-भेदको स्वाभाविक कहना कितना भ्रामक है, यह स्पष्ट है। कहा जाता है कि 'प्राचीनकालमें यूरोपके नगरोंमें निवास करनेवाले व्यापारी, कारीगर तथा मध्यमश्रेणीके लोगोंका जमींदारों-सरदारोंसे इसलिये लड़ाई हुई थी कि उनको कारीगरी एवं व्यापारकी स्वाधीनता तथा निजी सम्पत्तिको इच्छानुसार खर्च करनेकी स्वतन्त्रता मिले एवं एक राष्ट्रिय सरकार कायम हो। वही व्यापारी आदि आगे चलकर विजयी होकर पूँजीपति हो गये। उनसे भिन्न श्रमजीवी सम्पत्ति- विहीन हो गये। अपने देशकी सम्पत्तिमें उनका कुछ भी हिस्सा नहीं है। दूसरी ओर पूँजीकी उत्पत्ति दिन-पर-दिन पारस्परिक सहयोगपर निर्भर होती जा रही है और पूँजी एक सम्मिलित वस्तु बनती चली जाती है। इस कारण श्रमजीवी दल अब सम्पत्तिको व्यक्तिगत बनानेके लिये न झगड़कर इसलिये झगड़ता है कि समाज जो भी माल पैदा करता है, उसको उपयोगमें लाने या बाँटनेका अधिकार भी समाजको ही हो। इस प्रकार मध्य श्रेणीद्वारा ही एक दल ऐसा पैदा हुआ, जिसका उद्देश्य है वर्ग-विशेषके उद्देश्यको नष्ट कर सार्वजनिक स्वामित्वकी प्रथा प्रचलित करना। अन्तर्राष्ट्रिय-संघकी बड़ी सभा सितम्बर १८६७ में स्विटजरलैंडके लोसान नामक नगरमें हुई। उसमें एक प्रस्ताव पास किया गया कि रेलोंको राष्ट्रिय सम्पत्ति बना लिया जाय। तीसरी महासभा सितम्बर १८६८ में ब्रूसेल्स (बेल्जियम) में हुई, इसमें युद्धोंका विरोध किया गया और यह भी प्रस्ताव स्वीकृत किया गया कि रेलों, खानों, जंगलों और खेतीके लायक तमाम जमीनोंको राष्ट्रिय सम्पत्ति बना ली जाय। चौथी सभा १८६९ में बासेल (स्विटजरलैंड) में हुई। उसमें घोर वाद-विवादके पश्चात् यह प्रस्ताव स्वीकृत हुआ कि उत्तराधिकारके प्रचलित सभी नियम सर्वथा निन्दनीय हैं, अतः निजी सम्पत्तिकी प्रथाको सर्वथा उठा देना चाहिये। विस्तृत मन्वन्तरों, युगों, कल्पों आदि महाकालको देखते हुए हजार, पाँच
सौ वर्षोंका कोई महत्त्व नहीं रहता । इसलिये 「इस बीचके व्यक्तियो या किंचित् व्यक्ति-समूहोंसे सम्बन्धित घटनाओका कुछ भी महत्त्व नहीं रहता । अतः कुछ व्यक्तियों या कुछ सभाओंके प्रस्तावोंके आधारपर शाश्वतिक सिद्धान्तोंमें रद्दो- बदल नहीं हो सकता । इतिहासके आधारपर सिद्धान्तका निर्णय नहीं हो सकता । आये दिन अनाचार, दुराचार, पापाचारोंकी घटनाएँ घटती ही रहती हैं, फिर भी वे उपादेय नहीं समझी जातीं । डाका, चोरी, व्यभिचार, अग्निकाण्ड, हत्या- काण्डकी घटनाएँ घटती ही रहती हैं, परंतु इसीसे वे सब कर्म सिद्धान्त-कोटिमें नहीं आते । जब पूर्वोक्त युक्तिसे दाय, जय, क्रयादिद्वारा प्राप्त भूमि, सम्पत्ति आदिपर व्यक्तिगत अधिकार मान्य है, तब कुछ लोगोंके प्रस्तावों या व्यवहारोंसे उनका रद्दोबदल कैसे हो सकता है ? संसारमें प्रमाद, पुरुषार्थके भेदसे फलमें भेद होना अनिवार्य ही है । अतः दाम, आराममें विशेषता प्राप्त करनेके लिये ही प्राणी गुण, कर्ममें विशेषता लानेका प्रयत्न करता है । यदि दाम, आराममें विशेषताकी सम्भावना न हो तो कोई भी गुण कर्ममें विशेषता लानेका प्रयत्न ही न करेगा। कुछ विद्यार्थी, खिलाड़ी होते हैं, कुछ खर्राटा लेते रातभर सोते हैं, कुछ सावधान होकर रात- रात जागकर पढ़ते हैं । एक ही पिताके चार पुत्र होते हैं, पिताकी सम्पत्तिके वे चारो हिस्सेदार होते हैं । उनमेंसे कोई परिश्रमसे अपनी सम्पत्ति बढ़ा लेता है, कोई प्रमाद एवं विलासितामें फँसकर थोड़े ही दिनोंमें फूँक ताप लेता है । पुनः-पुनः समाज या समष्टिके नामपर सब सम्पत्तिका राष्ट्रीयकरण एवं वितरणकी व्यवस्था उस गुणकर्मकी विशेषताका अपलाप करना है । जैसे निम्नस्थलकी ओर जलका बहना स्वभाव है, वैसे ही बहिर्मुख प्राणियोंकी पशुवत् प्रवृत्ति स्वाभाविक है। भोग विलास, छीना-झपटी, बिना परिश्रम किये उत्तमोत्तम भोग-विलास एव सामग्रीका पाना उन्हे अभीष्ट होता है। ईश्वर- बुद्धि, धर्म-बुद्धि ही इसमें रुकावट डालती है । इसीलिये ऐसे लोग ईश्वर एवं धर्मको पहले समाप्त करना चाहते हैं । अपनेसे प्रबल धनवान्, बुद्धिमान्को देखकर ईर्ष्या, उसे मिटा देनेकी इच्छा—यह पाशविक स्वाभाविक भावना होती है । तमोगुण, रजोगुणकी अधिकता और सत्त्वगुणकी कमी ससारमें होती ही है । अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदि गुण समष्टिके लिये अत्यावश्यकरूपसे प्रायः सर्वमान्य हैं, तथापि उनकी कमी होती है । इस दृष्टिसे सामन्त जागीरदार, जमीन्दार, बादशाहों, राजाओंकी समाप्ति चाहते, व्यापारी अपनी सुविधाकी दृष्टिसे सामन्तादिकोंकी समाप्ति चाहते तथा किसान-मजदूर उनका भी खात्मा चाहते हैं । यदि उनसे भी अधिक अपकृष्ट कोई वर्ग हो, तो वह किसानोंका भी विनाश चाहेगा । इन्हीं स्वाभाविक, पाशविक प्रवृत्तियोंको रोकनेके लिये ही सदाचार, धर्म आदिकी
भावना फैलानेका महापुरुष लोग प्रयत्न करते आ रहे हैं । अमीर-गरीब सभी दुष्ट एव शोषक हो सकते हैं । वे ही पोषक एवं सज्जन भी हो सकते हैं । अधिकांशरूपमें अभावसे पीड़ित होकर गरीब ही चोरी, डाका, व्यभिचार आदिमें पकड़े जाते हैं । अमीरोंके पास वस्तुओंकी कमी न होनेसे उन्हे डाका, चोरी आदि- की आवश्यकता बहुत कम पड़ती है । बहुत-से गरीब भी सदाचारी, सत होते हैं । वैसे ही धनवान् भी सदाचारी होते हैं । वस्तुतस्तु विद्वान्, बलवान्, धनवान्, शक्तिमान्की विद्या, बल, धन, शक्ति- स्वतः न अच्छे ही होते हैं और न बुरे । दुष्ट पुरुषोंकी विद्या विवादके लिये, धन घमंडके लिये, शक्ति दूसरोंको उत्पीड़ित करनेके लिये होती है, परंतु सत्पुरुषोंकी विद्या ज्ञान फैलाने, उनका धन दान देने तथा दूसरोंकी सहायता पहुँचानेके काममें आता है और उनकी शक्ति दीनों, दुखियों और आर्तोंके रक्षणके काममें आती है । इसलिये 'धनवान्, बलवान्, शक्तिमान् सब शोषक होते हैं,' यह सिद्धान्त ही गलत है । मजदूर भी अधिनायकतन्त्र स्थापित कर अपने विरोधियोंका शोषण ही नहीं खात्मातक कर देते हैं । साधारण लोग अपने खाने-कमानेके काममें लगे रहते हैं । न उनमें शोषक होनेकी ही भावना है और न शोषित ही होनेकी । अतः यह विभाजन ही गलत है । हाँ, धर्म- भावना कम होने, सत्त्वगुण घटने, आध्यात्मिकता मिटने और भौतिकता बढनेसे 'मात्स्यन्याय' अवश्य फैल जाता है; जिसका अभिप्राय होता है कि जैसे जलमें बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियोंको खा लेती हैं, अरण्यनिवासी प्रबल जानवर दूसरे छोटे जन्तुओंको भक्षण कर लेते हैं, उसी प्रकार समाजके बलवान् मनुष्य भी दुर्बलोंके भक्षक बन जाते हैं । मूषकका मार्जार, मार्जारका श्वान, श्वानका व्याघ्र भक्षक बनता है । व्याघ्रका सिंह और सिंहका भी शार्दूल भक्षक होता है । सर्पके मुखमें पड़ा हुआ मेढक भी आसपासके उड़ते हुए मच्छरोंको खानेके लिये मुख फैलाता है । यहाँ सर्प, मेढक, मच्छर सभी अपेक्षाकृत शोषक भी हैं और शोषित भी । मत्स्योंमें भी सहस्रों मनकी मछली ( तिमि आदि ) सैकड़ों मनकी मछलीका भक्षण कर लेती हैं । मनोंकी मछली सेरोंकी मछलीको, सेरोंकी मछली छटांककी मछलीको और वह भी तोलोंकी मछलीका भक्षण करती है । यहाँ सभीमें शोषक-शोषित भाव है । इसी तरह धनमें भी तारतम्य है । कोटिपतिकी अपेक्षा अर्बुदपति प्रबल है, तब अर्बुदपतिको शोषक और कोटिपतिको शोषित कहना पड़ेगा । इसी तरह कोटिपतिको शोषक एव लक्षपतिको शोषित कहना पड़ेगा । लक्षपतिकी अपेक्षा सहस्रपति, उसकी अपेक्षा शतपति आदिकोंको शोषित कहा जायगा । फिर तो
२५६ मार्क्सवाद और रामराज्य रूप्यकपति और वराटिका ( कौड़ी ) पतिमें भी शोषक-शोषितकी कल्पना करनी पड़ेगी। यदि वर्ग-विध्वंसके सिद्धान्तानुसार शोषककी समाप्ति अभीष्ट है, तब तो आरण्यक व्याघ्र, सिंह, शार्दूल आदिको समाप्त करके केवल मच्छरोंका ही साम्राज्य स्थापित करना पड़ेगा। इसी प्रकार बड़ी मछलियोको समाप्त करके केवल रत्ती-रत्तीकी मछलियोको ही रखना पड़ेगा। इसी तरह समाजके बलवान्, धनवान्, विद्वानोको समाप्त करके केवल अति निर्बल, निर्बुद्धि, निर्धनोंका ही राज्य बनाना होगा। परन्तु यह क्या है ? राष्ट्रका उत्थान है या पतन ? आदर्श शासनोंका कभी भी ऐसा लक्ष्य न था। राष्ट्रके सिंह, शार्दूल समाप्त हो जायें, केवल शृगाल, मच्छर आदि रह जायें—यह आदर्श नहीं। सिंह-व्याघ्र भी रहे, श्वान-शृगाल भी रहे, अपने-अपने कर्मोंके अनुसार प्रबल-निर्बल, बुद्धिमान् निर्बुद्धि-सभी रहें; पर एक-दूसरेके पोषक हो, शोषक नहीं। इसीलिये रामराज्यमें बाघ-बकरे एक घाटपर पानी पीते थे; गज-पंचानन साथ-साथ रहते थे। सर्प-नकुल, चूहा-बिल्ली सब एक दूसरेके रक्षक थे, भक्षक नहीं, यही आदर्श शासन है। वस्तुतः मात्स्य-न्याय मिटानेके लिये ही राजा एवं राज्यकी व्यवस्था हुई थी। धर्मस्थापनके द्वारा सत्त्व विस्तार करके अहिंसाकी भावना दृढ करके ही राजा मात्स्यन्याय मिटाता था। वह सबको एक दूसरेका पूरक बनाता था, बैर मिटाकर, सौहार्द उत्पन्न कर शासन, शोषण एवं उत्पीड़नका अन्त करता था— सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥ बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई ॥ फूलहिं फलहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक सँग गज पंचानन ॥ चूहे-बिल्ली भी एक एक दूसरेके हित-चिन्तक, उपकारक तथा पोषक बने हुए थे। अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्संनिधौ वैरत्यागः।' (योगदर्श० २।३५) मनसा, वाचा, कर्मणा अहिंसाकी प्रतिष्ठा होनेपर अहिंसकके समीपमें परस्पर विरोधी हिंस्र प्राणियोके भी वैर छूट जाते हैं। रामायणके निशाकर या चन्द्रमा मुनिके आश्रममें यह आदर्श प्रत्यक्ष उपलब्ध होता था। रामराज्यमें तो यह आदर्श था ही। हाँ, जिनमें रज, तमकी मात्रा अधिक होती थी, धार्मिकताका सस्कार आनेमें विलम्ब होता था, उन्हे उग्र दण्ड देकर शोषणसे विरत किया जाता था। इसीलिये नीति शास्त्रोंमें दण्ड-विधान भी है। सरकस आदिमें देखा ही जाता है कि एक बकरी शेरके सिरपर चढकर हरी पत्ती खाती है, विद्युत्- सृणि (बिजलीके हंटर) के डरसे शेर चुप रहता है, बकरीको नहीं मारता।
वर्ग-संघर्ष २५७ इसलिये वर्गसङ्घर्ष वर्ग-विद्वेष फैलाकर वर्ग-विध्वंसका प्रयत्न कभी भी आदर्श वस्तु नहीं है । आधुनिक यन्त्रीकरण युगमें भी उत्पादनमें पूँजी और श्रम दोनों कारण हैं । पूँजी बिना श्रमजीवी कुछ नहीं कर सकते । श्रमजीवी विना पूँजी भी कुछ नहीं कर सकती । फिर भी श्रमजीवीको जीवनके लिये धन चाहिये । पूँजीपतिको उत्पादनके लिये श्रम चाहिये, अतः पूँजीपति धनसे श्रम खरीदता है । इसीलिये वह मजदूरको निश्चित मजदूरी देकर आयका भागी होता है । कम्यूनिज्ममें भी पूँजीवाद चलता है । भेद इतना ही है कि पूँजीवादमें अनेक पूँजीपति होते हैं, साम्यवादमें सरकारी पदाधि- रूढ लोगोंका एक गिरोह ही पूँजीपति होता है और इसके लिये तोड़-फोड़की परम्परा चलती रहती है । यदि वस्तुतः शासन-परिषद् और मजदूर-अधिनायकोंमें साधारण मजदूरोसे कोई विशेषता न हो तो फिर सङ्घर्ष क्यों ? फिर ट्राटस्की, वेरिया आदिका सफाया क्यो ? विरोधी व्यक्ति या समूहको समाप्त कर कुछ लोगोके ही धाक जमानेका क्या अर्थ है ? भारतीय शास्त्रोंके अनुसार यद्यपि सब वस्तु सबकी नहीं होती, इसीलिये भूपति, भूपाल सब नहीं होते । भूमि, सोना, लोहा, ताँबा, पेट्रोल आदि- की खाने भी सबकी नहीं होतीं, अबतक भी सबकी नहीं मानी जातीं । प्राकृतिक वस्तु सबकी होती है, यह पक्ष मान्य होनेपर पुत्री-पत्नी आदिमें सबका हिस्सा मानना उपस्थित हो जाता है । अतएव प्रसिद्ध पितृ-पितामहादिकी सम्पत्ति- में ही प्राणियोका अधिकार होता है। उसमे भी अधिकारके साथ कर्तव्य लगे हैं, ‘पिण्डं दत्त्वा धनं हरेत्’ पिण्ड दानादिक श्राद्ध करनेका जो अधिकारी है, वही पितृ-पितामहादिके दायका अधिकारी होता है । उनमें भी राजा आदिके प्रथम पुत्र ही मुख्य अधिकारी होते हैं । अन्य पुत्रोंको पोषण-गुजारा मिलता है । पिता पुत्रको ‘त्वं यज्ञस्त्व लोकस्त्व ब्रह्म’ इत्यादि वाक्योंद्वारा अपने अकृत या अर्धकृत वेदाध्ययन, धर्मानुष्ठान, लोक साधनादि- के सम्पादनका उत्तरदायित्व देता है और पुत्र ‘अह यज्ञः, अह लोकः, अहं ब्रह्म’ इत्यादि शब्दोंद्वारा उस उत्तरदायित्वको अङ्गीकार करता है । तभी वह सम्पत्तिका भी उत्तराधिकारी होता है । जो सम्पत्ति तो ले लेता है, परंतु कर्तव्यपालन नहीं करता; स्वाध्यायाध्ययन, धर्मानुष्ठान, लोकार्जनादि कर्तव्योंसे पराङ्मुख होता है, उस असाधुसे धन छीनकर कर्तव्यपालनमें तत्पर किंतु अर्थपीडित साधुपुरुषको प्रदान करनेका राजाको अधिकार है— योऽसाधुभ्योऽर्थमादाय साधुभ्यः सम्प्रयच्छति । स कृत्वा प्लवमात्मानं सन्तारयति तावुभौ ॥ (मनु० ११ । १८) मा० रा० १७
अतएव पुत्रके रहते हुए पुत्री (कन्या) को श्राद्धादिका अधिकार नहीं है। इसीलिये पुत्रके रहने हुए भारतीय धर्मशास्त्रानुसार पुत्रीको दायाधिकार भी नहीं है। परंतु पुत्र न होनेपर पुत्रीको पिण्डदानका अधिकार है और पुत्राभावमें पुत्री दायाधिकारिणी भी मानी जाती है। इस तरह 'सबमें सबका अधिकार है', यह सिद्धान्त गलत है। फिर भी विश्वप्रपञ्चकी सृष्टिमें जैसे ईश्वर कारण है, वैसे ही शुभाशुभ कर्मोंद्वारा जीव भी विश्वसृष्टिमें कारण है। जीवोंके कर्म-वैचित्र्यसे ही सृष्टिमें वैचित्र्य है। इस दृष्टिसे विश्वप्रपञ्चमें जीवोंका भी अधिकार है, अतः विश्वके आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवीके उपयोग करनेका अधिकार सबको ही है। इसीलिये योग्यता एव आवश्यकताके अनुसार चींटीको कणभर, हाथीको मनभरके अनुसार काम, दाम, आराम सबको ही मिलना चाहिये। इस रूपसे विशिष्ट भूमिसम्पत्ति आदिके अधिकारी विशिष्ट लोगोंको मान, आवास, स्थान एवं रोजी, रोजगार, उन्नतिका खुला रास्ता सबको ही मिलना चाहिये। द्वादशलक्षणी पूर्वमीमांसामें एक विचार चला है 'सर्वस्वदक्षिण याग' का, जिसमें सर्वस्व दक्षिणाकी चर्चा है। 'सर्वस्व, क्या है, माता-पिता भी सर्वस्वमें आते हैं या नहीं, उनका भी दान हो सकता है या नहीं, इत्यादि, इसपर उत्तर दिया गया कि सर्वस्वमें माता पिता अवश्य हैं, पर उनका दान नहीं हो सकता, क्योंकि स्वत्वनिवृत्तिपूर्वक परस्वत्वोत्पादन ही दान है। माता-पिताका स्वत्व इस प्रकारका नहीं है जिसकी निवृत्ति हो सके। पुनः विचार चला कि समग्र भूमिका दान हो सकता है या नहीं। यह विचार खण्ड भूमिके लिये नहीं है, क्योंकि खण्ड भूमिका तो दान होता ही है। इसीलिये शबर स्वामीने विचार करते हुए कहा कि 'अखण्डभूमि किसके पास हो सकती है ? हो सकती है सार्वभौम सम्राट्के पास, सर्वस्वदक्षिणमें अखण्डभूमिका दान प्रसक्त है, इसपर जैमिनिका सूत्र है— 'न भूमिर्देया स्यात् सर्वान् प्रत्यविशिष्टत्वात् ।' (मीमांसादर्श० ६।७।२।३) अर्थात् राजमार्ग, चत्वर, देवादि स्थानसहित अखण्डभूमिका दान नहीं हो सकता; क्योंकि वह सबकी है। यद्यपि यहाँ कुछ लोगोंने इसी आधारपर यह भी सिद्ध किया है कि भूमि किसी व्यक्तिकी नहीं होती, किंतु वह समाजकी होती है, इसीसे उसका दान नहीं हो सकता, किंतु पूर्वापर देखनेसे यह गलत सिद्ध होता है। उसका अभिप्राय इतना ही है कि चत्वर, राजमार्गादिसहित भूमिका दान नहीं हो सकता, क्योंकि हो सकता है कि प्रतिग्रहीता राजमार्गमें ही खेत, उद्यान बनाये और दूसरोंको चलनेसे रोके। अतः अखण्ड भूमण्डलका दान नहीं हो सकता। हाँ, देवस्थान, चत्वर, राजमार्गादि छोड़कर खण्ड
भूमिका दान शतपथ, ऐतरेय आदिमें स्पष्ट वर्णित है ! 'श्रीमद्भागवत' में ही आता है कि होता आदि ऋत्विजोंके लिये प्राची आदि सभी दिशाओंका दान श्रीरामचन्द्रने किया था, जिससे समस्त राज्यका दान सुस्पष्ट प्रतीत होता है । सार यही है कि विशिष्ट वस्तुओंमें विशिष्ट लोगोंका अधिकार होनेपर भी सर्व- साधारणको भी उचित विकासका अवकाश मिलना चाहिये । इसीलिये खेती, व्यापार उद्योग या सेवा-सर्विस आदि द्वारा सबके ही निर्वाहका उपाय होना चाहिये । भले ही उसे किसी व्यक्तिकी सेवा न कहकर राष्ट्रकी सेवा कहा जाय । पारिश्रमिकको मजदूरी, या वेतन न कहकर हिस्सा कहा जाय । आजकल नौकरी, मजदूरी, गुलामी आदि शब्दोंसे बड़ी घृणा है, पर चल रहा है नामान्तरसे वही । वैसे सिद्धान्त है 'समानमें अङ्गाङ्गीभाव, शेष-शेषी भाव नहीं होता ।' इसीको सेव्य-सेवकभाव, उपकार्योपकारक तथा भृत्य एवं स्वामीका भाव भी कहा जाता है । चेतन-चेतन समान है । उनमें शेष शेपीभाव न होना जो उचित मानते हैं, उनके यहाँ भी शेष-शेषीभाव अवश्य चलता है । राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, फील्डमार्शलकी रुचिके अनुसार चलनेवाले, उनकी आज्ञा माननेवाले, सभी उनके शेष या अङ्ग ही हैं, चाहे उनका नाम जो रखा जाय । वस्तुतः प्राणिमात्र अपनी सीमित सत्ताको अपरिमित, अनन्त सत्ता बनाना चाहता है । सीमित ज्ञान आनन्द एवं परिमित स्वतन्त्रता एव सीमित शासन 'हुकूमत' को निःसीम बनाना चाहता है । शब्दोंका भेद अवश्य रहता है-छोटोंसे हुकूमत स्वीकार कराना चाहता है । माता, पिता, गुरुओंसे अपना अनुरोध या प्रार्थना स्वीकार कराना चाहता है । फल दोनोंका एक ही है । उसकी रुचिके अनुसार छोटे-बड़े सभी काम करें । शब्दोंका ही हेरफेर है । पहले बिना पारिश्रमिक दिये काम करानेको बेगार कहा जाता था, आजकल बिना पारिश्रमिक दिये बड़े-बड़े लोगोंसे भी काम कराया जाता है, उसे बेगार न कहकर 'श्रमदान' कहा जाता है । प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबावोंसे यह श्रमदान सबको करना पड़ रहा है । रामराज्यके अनुसार यद्यपि पूँजी, भूमि, खान आदि सबका नहीं है, जिन्हें पितृ-पितामहादि परम्परासे प्राप्त है, अथवा जिन्होंने जय, क्रय, पुरस्कार आदिके रूपमें पाया है, उनका है । उनसे होनेवाली आय मालिकको ही मिलनी चाहिये, साथ ही श्रमकी उचित कीमत उन्हें देनी पड़ती है । श्रमके मूल्य-निर्णयमें आवश्यकतानुसार आर्थिक असंतुलन दूर करनेकी नीतिसे एवं उचित रूपसे सबका ही जीवनस्तर उन्नत बनानेकी दृष्टिसे राज्योंका भी हस्तक्षेप हो सकता है । उधर मालिकोंके घरमें भी— धर्माय यशसेऽर्थाय कामाय स्वजनाय च । पञ्चधा विभजन् वित्तं इहामुत्र च मोदते ॥ ( आपस्त० ८ । ०
के अनुसार अतिरिक्त आयका पञ्चधा विभाजन कहकर समन्वयकी व्यवस्था की गयी है । रामराज्यका यह आदर्श था कि कोई किसीका शोषक, भक्षक या अनिष्ट- चिन्तक न बने । एक-दूसरेके पोषक, रक्षक, शुभचिन्तक बने । कारण सब वेदादिशास्त्रोंके अनुसार अपने धर्मपर ही चलते थे, कोई किसीसे वैर नहीं करता था । परस्परकी विषमता दूर हो चुकी थी । जाति, सम्प्रदाय, पार्टी आदि बिना सबके साथ सुन्दर व्यवहार होता था । दैहिक, दैविक, भौतिक किसी प्रकारका ताप किसीको नहीं होने पाता था । निरपराध श्वानको भी मारनेवाला दण्डका भागी होता था, चाहे वह विद्वान्, बलवान् धनवान्, ब्राह्मण हो या और कोई । यों तो योग्यता एव आवश्यकताके अनुसार काम, दाम और आराममें तारतम्य हो सकता था; किंतु काम, दाम और आरामकी कमी किसीको न होती थी । दरिद्र, हीन, दुखी या मूर्ख कोई न था— नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना । नहि कोउ अबुध न लच्छन हीना ॥ रामराज्यके आदर्श चाहनेवालोंके द्वारा आज भी विविध वैषम्य और आर्थिक असंतुलन दूर करनेका प्रयत्न होना ही चाहिये । सदाका नियम है— जब किसी अङ्गमें रक्त, मांस, अस्थिकी कमी होती है तो आवश्यकतानुसार दूसरे अङ्गसे उसकी पूर्ति कर ली जाती है । इसीलिये सब अङ्ग परस्पर पोषक माने जाते हैं, शोषक नहीं । एकको कष्ट होनेसे सभी कष्ट मानते हैं । सब सहायताके लिये तत्पर रहते हैं । चरणमें काँटा लगता है तो नेत्र देखनेमे, हाथ काँटा निकालनेमें, मुख फूत्कारद्वारा दर्द दूर करनेमें लग जाते हैं । इसीलिये किसी अङ्गमें दर्द या दोष आनेपर दर्द और दोष मिटानेका प्रयत्न किया जाता है, अङ्गच्छेदके लिये नहीं, किंतु लाखों खर्च करके भी एक अगुलीके दर्द दूर करनेका यत्न किया जाता है । अङ्ग-भङ्ग करनेसे सर्व शरीरको बचाया जाता है । इसीलिये कहा जाता है, नासिकापर हुई फोड़ाफुसियोको दूर करना उचित है, नाक काटना उचित नहीं । सिर-दर्द दूर करनेके लिये सिर काटना उचित नहीं । सिर बना रहे दर्द दूर हो, यही चिकित्सा है । रोगी मिटाकर रोग मिटाना बुद्धिमानी नहीं । रोगीका रोग मिटाना उचित है । रोगीको मिटाना चिकित्साका उद्देश्य नहीं है । जहाँ अनिवार्य होता है, एक अङ्ग छेद बिना अङ्गीके विकृत होनेका भय रहता है, वही अङ्ग-छेद या आपरेशनकी अनुमति होती है । इसीलिये यहाँ यज्ञ, दान आदिकी पद्धति थी । इसके द्वारा आर्थिक असंतुलन दूर होता रहता था । एक सम्राट् भी सर्वस्वदक्षिण याग करनेके पश्चात् सामान्य मृन्मय पात्रसे ही अपना काम चलाता था ।
साम्राज्ञीके भी अङ्गमें माङ्गल्य सूत्र-मात्र भूषण रह जाता था । यज्ञोंमें सदा सेवा निरत शूद्रसे मेवा लेकर, व्यापारनिरत वैश्यसे वस्तुएँ खरीदकर, क्षत्रियपर रक्षाका भार देकर, ब्राह्मणको याजनका कार्यभार देकर सभीको द्रव्य समर्पण किया जाता था ! याचक अयाचक हो जाते थे । प्रायः सब देनेकी बात सोचते थे, लेनेकी नहीं । देनेवाले हर ढंगसे देनेका रास्ता खोजते थे ! दूसरे लोग न लेनेका मार्ग खोजते रहते थे । गाढ़ी कमाईके स्वल्प धनसे भी गुजारा करना ठीक समझा जाता था । प्रतिग्रहको निन्द्य समझा जाता था । मुफ्तखोरी, हरामखोरीसे सभी भरसक बचनेका प्रयत्न करते थे । लूट, खसोट, चोरीकी तो बात कोई सोचता ही न था । दूसरेकी सम्पत्ति, हीरा, रत्न, मणि, अन्नादि रास्तेमें पड़े हो या अपने घरमें ही कोई क्यों न डाल गया हो, आवश्यकता होनेपर भी विधिपूर्वक विना पाये लेना अनुचित समझा जाता था— परान्नं परद्रव्यं वा पथि वा यदि वा गृहे । अदत्तं नैव गृह्णीयादेतद् ब्राह्मणलक्षणम् ॥ इधर भौतिकवादमें लेनेवाले हर प्रकारसे मरकर, मारकर भी लेना चाहते हैं । देनेवाले मर जाना मंजूर करते हैं, पर देना नहीं चाहते । जिसके घरमें तीन वर्षके लिये कुटुम्ब-पोषणकी सामग्री होती थी, वह शेष धन सोमयज्ञमें अवश्य खर्च कर देता था । साधारण दीन प्राणी भी अतिथि-सत्कारके लिये सदा लालायित रहता था । रन्तिदेव आदि तो ४८ दिनके निर्जल व्रतके बाद भी स्वल्प प्राप्त सामग्रीद्वारा सर्वप्रथम अतिथि-पूजा आवश्यक मानकर प्रवृत्त हुए, ब्राह्मण, अन्त्यज, पुल्कसको सब कुछ देकर सत्कार किया । मरते-दमतक ईश्वरसे यही चाहा कि 'मुझे स्वर्ग, अपवर्ग, राज्य आदि कुछ भी न चाहिये । केवल दुःखी प्राणियोंका दुःख ही मुझे मिले । मेरे शुभकर्मोंसे प्राणियोंको संतोप हो।' धर्मभावनाकी प्रधानताके कारण ही राजा शिविने कपोतकी रक्षाके लिये अपने शरीरका मास और अन्तमें अपने आपको देकर कपोतकी रक्षा करनी चाही थी । राजा दिलीप ने नन्दिनीकी रक्षाके लिये अपनेको सिंहका ग्रास बनानेका निश्चय कर लिया । इस भावनामें शोषण, उत्पीड़न, विताड़नाकी कल्पना भी नहीं हो सकती ।
आर्थिक असंतुलन
आर्थिक असंतुलन मिटानेके लिये ही शास्त्रोंमें दानका महत्त्व कहा गया है । अपनी श्रद्धासे, दूसरोंके उपदेशसे, लज्जासे, भयसे किसी तरह भी देना परम कल्याणकारी है । शास्त्रोंमें यह भी कहा गया है कि जो धनी होकर दानी नहीं और निर्धन होकर तपस्वी नहीं, ऐसे लोग गलेमें पत्थर बाँधकर समुद्रमें डुबा देने योग्य होते हैं—
२६२ मार्क्सवाद और रामराज्य द्वावम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम् । धनवन्तमदातारं दरिद्रं चातपस्विनम् ॥ ( महाभा० उद्योग० ३३ । ६० ) रामराज्यकी अर्थनीतिमें उपार्जन और उपयोग दोनों ही धर्मनियन्त्रित होते हैं। पर्वत खनन जैसे अति क्लेशसे होनेवाले स्वल्प लाभको तथा धर्मातिक्रमण- जन्य लाभको एव शत्रुचरणचुम्बनसे होनेवाले लाभको हेय समझना ही उचित है— अतिक्लेशेन येऽर्थाः स्युर्धर्मस्यातिक्रमेण वा । अरेर्वा प्रणिपातेन मा स्म , तेषु मनः कृथाः ॥ ( महा० उद्योग० ३९ । ७७ ) दूसरोको बिना संताप पहुँचाये, सद्धर्मका अतिक्रमण बिना किये, खलोंके द्वारोपर बिना घुटना टेके मिलनेवाले स्वल्प लाभको भी बहुत समझना चाहिये । अकृत्वा परसंतापमगत्वा खलमन्दिरम् । अनुल्लङ्घ्य सतां वर्त्म यत्स्वल्पमपि तद्बहु ॥ ( शार्ङ्ग० पद्ध० स० १ ) ईमानदारीकी कमाईसे सुख-शान्ति एवं समृद्धि होती है । प्रसिद्ध है कि ईमानदारीका धन पानीमें नहीं डूबता, आगमें नहीं जलता और चोरके पेटमें नहीं हजम होता । उसीसे बरकत भी होती है । वंश-वृद्धि भी उसीसे होती है । बेईमानीसे भले ही तत्काल बडा लाभ हो, पर वह टिकाऊ नहीं होता । उलटे सुख समृद्धि लेकर चला जाता है । वशवृद्धिके अनुकूल भी नहीं होता । न्यायार्जित धनमें भी टैक्स आदिका खर्च निकालकर अतिरिक्त आयमें पञ्चधा विभाग करके ही यथोचित उपयोग करना ठीक होता है । प्रथम विभाग धर्मार्थ राष्ट्रके हितमें व्यय किया जाय, द्वितीय भाग यशके लिये राष्ट्रमे व्यय किया जाय, तृतीय भाग अर्थार्जन या मूल सम्पत्ति-रक्षणके काममें लाया जाय और चतुर्थ भाग अपने काममें लगाया जाय । पाँचवाँ भाग कुटुम्बी, नौकर, मजदूर आदि स्वजनोंके काममे लगाया जाय । पाँच हिस्सामें एक हिस्सा अपने काममें लगानेकी अनुमति है, परंतु उसमे भी नियन्त्रण है कि जितनेमें पेट भरे, तन ढके, उतने- हीमें ममत्व उचित है। अधिकमें ममत्व करना चौर्य है, उसे दण्ड मिलना चाहिये । इस तरह पाँच हिस्सेमें चार हिस्सा राष्ट्रहितके काममे आता ही है। एक हिस्सेमे भी यथावश्यक अपने उपयोगमें लगाना उचित है । तथाकथित राष्ट्रीकरणमें राष्ट्रकी भूमि, सम्पत्ति, कल-कारखानो, उद्योग- धंधोका सरकारीकरण हो जाता है । व्यक्ति शासनयन्त्रका नगण्य कलपुर्जे बन जाता है । शासनयन्त्र किसी दल या दलके तानाशाहोके हाथका कठपुतला बन जाता है । ऐसी तथाकथित सरकारें बिना नकेलके ऊँट, बिना लगामके घोडे, बिना ब्रेकके मोटर, अथवा बिना ड्राइवरके स्टार्ट की हुई मोटरके समान खतरनाक हो
वर्ग संघर्ष २६३ जाती हैं। सब वस्तुओंका राष्ट्रीयकरण शास्त्र और धर्मसे विरुद्ध तो है ही, लौकिक दृष्टिसे भी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता नष्ट हो जानेसे व्यक्तिगत विकास रुक जाता है। व्यक्तियोंका समुदाय ही कुटुम्ब, नगर, राष्ट्र तथा विश्व होता है। जैसे एक-एक वृक्षों- के कट जानेपर वन कट जाता है, एक-एक सैनिकोंके नष्ट हो जानेपर सेना नष्ट हो जाती है, वैसे ही एक एक व्यक्तियोंके परतन्त्र, अशिक्षित, निर्धन, निर्बल हो जानेपर राष्ट्र एवं विश्व भी वैसा ही हो जाता है। एक-एक व्यक्तियोंके हृष्ट पुष्ट, बलवान् तथा बुद्धिमान् होनेपर राष्ट्र तथा विश्व भी हृष्ट-पुष्ट बलवान् तथा बुद्धिमान् हो जाता है। व्यक्तिगत सम्पत्ति-शक्ति नष्ट हो जानेपर शासन निरङ्कुश हो जाता है, उसे हरा सकनेकी शक्ति जनताके पास नहीं रहती। नोटिस, पोस्टर, अखबार, सभा, आन्दोलन आदि सभी कामोंमें द्रव्यकी अपेक्षा होती है। सब चीज सरकारके हाथमें रहनेसे व्यक्ति एव तत्समुदाय जनता कुछ न कर सकेगी। अतः जनतामें शक्ति भी रहना आवश्यक है। वस्तुतः अतिसमता और अतिविषमता दोनों ही दोष प्रतीत होते हैं। हाथकी अङ्गुलियाँ भी यदि अति विषम हों तो भी, अति सम हों तो भी, बेढङ्गी लगेंगी। पेट, पैर, हाथ सम हों तो भी ठीक नहीं और यदि पेट बहुत मोटा, पैर, हाथ बहुत पतले हों तो भी रोग ही समझा जायगा। इस तरह आवश्यक है कि योग्यता-आवश्यकताके अनुसार सभीके काम, दाम, आरामकी व्यवस्था हो। भले ही चींटीको कनभर, हाथीको मनभरके अनुसार योग्यता और आवश्यकता- का ध्यान रखा जाय, परंतु आरामकी कमी नहीं होनी चाहिये। केन्द्रीकरण या राष्ट्रीयकरणकी अपेक्षा विकेन्द्रीकरण सदा ही सर्वश्रेष्ठ है। इसमें एक तो सम्पत्तिसम्बन्धी परम्परागत ईश्वरीय नियमका रक्षण होता है, 'सप्तवित्तागमा धर्म्याः' के अनुसार दाय, जय, क्रय, पुरस्कारादिमें प्राप्त सम्पत्ति वैध मानी जायगी, पितृ, पितामहकी सम्पत्तिमे पुत्र, पौत्र, प्रपौत्रका जन्मना स्वत्व स्वीकृत होगा तथा जय, क्रयादिद्वारा भी व्यक्तिगत विकासका अवकाश रहेगा। अतिरिक्त आयका पञ्चधा विभागद्वारा धार्मिक दृष्टिसे कर्तव्य-बुद्धिसे राष्ट्रके हितार्थ अधिकांश आयका व्यय होगा। मूल सम्पत्तिका भी अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महामारी, सङ्ग्राम आदि असाधारण परिस्थितिमें, जैसे सरकारी खजानेकी सम्पत्तिका राष्ट्रहितार्थ विनियोग होता है, वैसे ही व्यक्तिगत मूल सुरक्षित धन भी काममें आ सकेगा। इस तरह धर्मनियन्त्रित नीतिमें आर्थिक असंतुलन भी नहीं होता। व्यक्तिगत विकासका अवकाश बना रहता है। पितृ-पितामहादि-परम्पराप्राप्त दायाधिकार भी बना रहता है। दाम, आरामकी विशेषताके लिये ही काममें विशेषता सम्पादनकी प्रवृत्ति होती है। तभी विविध प्रतियोगिताएँ भी सार्थक होती हैं। लौकिक कहावत है कि 'हानिका डर एव लाभका लोभ ही प्राणीको प्रगतिशील
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बनाता है। भय और लोभके बिना आमतौरपर प्राणी निरुत्साह रहता है। सब वस्तुओके राष्ट्रियकरणसे मनुष्य भी यन्त्रवत् काम करता है, ममत्व न होनेसे तत्परता और सावधानीसे काम नहीं होता। जिस नौकरशाहीकी पहले निन्दा की जाता थी, वही नौकरशाही सिरपर आ जाती है। यही कारण है कि नौकरोकी देख-रेख रहते हुए भी गोदामोंमें लाखो टन अन्न सड़ जाते हैं। उपार्जन करने- वालोको जितनी ममता अपनी छोटी अन्नराशिमे होती है और जितनी तत्परतासे वह उसकी रक्षा करता है, सरकारी नौकरोंमें न उतनी ममता ही होती है और न तो रक्षणका ही ध्यान रहता है। यही स्थिति बड़े-बड़े कामोंकी है। कागजी घोड़े दौड़ानेमें करोड़ो खर्च हो जाते हैं, काम कुछ नहीं हो पाता। दामोदर- घाटी, हीराकुण्ड आदिके कामोंमे कितना व्यय और कितनी असफलता हुई, यह स्पष्ट ही है पजाबके बाँध और विद्युत्केन्द्र निर्माणमें भी यही हालत है। अस्तु ! अभिप्राय यह है कि जब विकेन्द्रीकरणके पक्षमें अनेक अच्छाइयाँ है तो आस्तिकोको उसे व्यवहारमें लानेका प्रयत्न करना चाहिये। सबसे पहले तो प्रत्येक नागरिक यह नियम बनाये कि उसके ग्राम, नगर, पड़ोसमें कोई व्यक्ति भूखा, नगा नहीं रहने पायेगा। बिना भूखेको खिलाये न खायेंगे। रोगीका इलाज-प्रबन्ध बिना किये विश्राम न करेंगे। विशेषतः शासक तो कुटुम्बपतिके तुल्य होता है। जैसे कुटुम्बके भोजन, वस्त्रका प्रबन्ध कर लेनेके बाद ही कुटुम्बपति भोजन, वस्त्र ग्रहण करता है, उसी तरह राष्ट्रके भोजन, वस्त्रादिका प्रबन्ध करा लेनेके बाद ही शासकोंको भोजन, वस्त्रादि ग्रहण करना चाहिये। इतना ही क्यों, भगवान् शिवके समान कुटुम्ब- पति अमृत कुटुम्बके अन्य सदस्योको बाँट देता है और स्वयं विषको ही ग्रहण कर लेता है। कौस्तुभ, लक्ष्मी, ऐरावत, उच्चैःश्रवा, अमृत आदि अन्य सभी रत्न देवताओके हिस्सेमे पडे, विष शङ्करके हिस्सेमें। विषको भी शिवजीने पेटमें रखकर न तो पेटको ही विषैला बनाया और न मुखमे रखकर मुखको ही जहरीला बनाया, बल्कि उसे कण्ठमें ही रख लिया। ठीक ऐसे ही कुटुम्ब या राष्ट्रके मालिक पुरुखाको कठिनाइयोको विषके घूँटके तुल्य स्वयं सहना पडता है। वह उसकी कटुतासे न पेटको, न मुखको ही कड़वा बनने देता है। पेटका विषैलापन या मुखका विषैलापन दोनों ही सघटनको छिन्न-भिन्न कर देते है। परन्तु जब कोई अच्छी वस्तु, अच्छे वस्त्र, भूषण, भोजनादि मिलें तो घरका कोई मालिक अपने बच्चोंकी और अपनी परवा न कर कुटुम्बके अन्य सदस्योको ही बाँट देता है। तभी उसके नियन्त्रणमें कुटुम्बका संचालन ठीक चलता है। उत्पादन और नियम उत्पत्तिके पुराने साधनो एवं पद्धतियोंमें रद्दोबदल होनेसे उत्पादनमें
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वर्ग-संघर्ष २६५ विस्तार अवश्य हो जाता है, उत्पन्न वस्तुओंमें सस्तापन भी आता है तथा आमदनीमें भी वृद्धि हो जाती है । पर माल खपतके लिये बाजारोंकी आवश्यकता, माल भेजने तथा कारखानोंके लिये कोयले, पेट्रोलके खानोंकी आवश्यकता, बाजारों एवं कोयले- पेट्रोल आदिके लिये सङ्घर्ष एवं बेकारीकी समस्या अवश्य खड़ी होती है । इसीलिये रामराज्यमें उद्योगोंका विकेन्द्रीकरण अभीष्ट है । छोटे व्यवसायों- द्वारा स्वावलम्बी ढङ्गसे बेकारी दूर कर व्यापकरूपसे रोजगारोंकी व्यवस्था की जाती है । कम्यूनिष्ट यद्यपि बड़ी-बड़ी पुस्तकोंमें कलकारखानोंके द्वारा गरीबोंके रोजगार छिन जानेकी चीख-पुकार मचाते हैं, परंतु उन्हीं कलकारखानोंका ही वे समर्थन भी करते हैं । इतना ही क्यों, वे कलकारखानोंके विस्तारसे ही मजदूरोंका लाखोंकी संख्यामें एकत्रित एवं सङ्गठित हो सकना तथा मजदूर-आन्दोलनोंके द्वारा कम्यूनिष्ट राज्य-स्थापनाका भी स्वप्न देखते हैं । अस्तु, ईश्वर एवं धर्मकी भावना दृढ होनेसे वैभव एवं सम्पत्तिवाले सम्पत्तिका सदुपयोग राष्ट्रके पोषणमें तथा जीवन-स्तर उन्नत करनेमें करेंगे । बेकारी दूर करनेके काममें सम्पत्ति उपयुक्त होगी । इसीलिये प्राचीनकालमें आजकी अपेक्षा कहीं अधिक सम्पत्ति, शक्तिबल, विद्या, दक्षताके रहनेपर भी असंतुलित विषमता, बेकारी, कलह आदि नहीं था । ईश्वर-धर्मकी भावना घटनेसे ही मात्स्यन्याय परस्पर भक्ष्य-भक्षकभाव, शोषक-शोषित भाव बढ़ता है । पर उसे ही मार्क्सवादी गुण मानते हैं । वर्ग- कलह, वर्ग-विद्वेष, वर्ग-विध्वंस ही जिसके सिद्धान्त एवं सत्ताका आधार हो, वही जिसके जीवन एवं उन्नतिका एकमात्र साधन हो, उससे विश्वशान्ति एवं विश्वमें समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृत्वकी आशा करना व्यर्थ है । अस्तु । उत्पादन-विस्तारसे कुछ भौतिक परिवर्तन होनेपर भी धर्मदर्शन एवं राजनीतिक नियमोंमें स्वत्वोंके रद्दोबदलका कोई प्रसङ्ग नहीं होता । अमेरिका आदिकोंमें बिना मौलिक रद्दोबदलके भी काम चलता ही है। आर्थिक दशा, सामाजिक, धार्मिक नियमोंकी नींव ही नहीं, जिससे आर्थिक-दशामें परिवर्तन होने- से धार्मिक नियमरूप भवन ढह पड़ें और उनमें रद्दोबदल आवश्यक हो । जो कहते हैं कि 'जिन लोगोंने उत्पादन साधनोंमें रद्दोबदल कर लिया उन्हें उत्पन्न हुई वस्तुओंके वितरणसम्बन्धी नियमोंमें भी रद्दोबदल कर लेनेका अधिकार मानना न्यायसङ्गत है । अतः पुत्र-पौत्रादिका पिता-पितामहादिकी सम्पत्तिमें दायपसे बपोती सम्पत्तिके रूपमें अधिकार माननेके नियम भी रद्दोबदल करके तथा सभी स्वत्व-सम्बन्धी पुराने नियमोंमें भी रद्दोबदल करके समाजीकरण या राष्ट्रीयकरणका सिद्धान्त मानना ठीक ही है। पर यह पक्ष विचारणीय है कि उत्पादन साधनोंमें रद्दोबदल करनेका मुख्य श्रेय किसे है । क्या साधारण मजदूर- समुदायको ? कहना पड़ेगा कि बड़े-बड़े वैज्ञानिको, अन्वेषकोंको ही इसका श्रेय होना