मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
मात्रकी निर्दुःखताके लिये ही सुषुप्तिमें प्रवृत्ति होती है । 'मै निर्दुःख होऊँ' इस अनुभवमें अहमंश तो अवर्जनीयतया उपस्थित होता है, जैसे 'दूसरेका ग्राम मेरा हो जाय' यहाँपर सम्बन्धांशको इच्छाविषयता होती है । यदि कहा जाय कि चिन्मात्र निर्दुःख हो ऐसी इच्छा होनी चाहिये, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि चिन्मात्ररूपसे विज्ञान न होनेसे ही ऐसा अनुभव नहीं होता । निर्दुःखका अनुभव है, ऐसी इच्छा होती ही है । कहा जाता है कि जो 'मैं' सोया था, वही मै जागता हूँ, जो 'मैं' पूर्व दिवसमें करता था, वही मैं आज कर रहा हूँ, इस तरहके प्रत्यभिज्ञान अहमर्थके भेदमे नहीं हो सकते । इसके सिवा कृतहानि (किये हुए कर्मोंका बिना फल दिये ही नाश) और अकृताभ्यागम (बिना कर्म किये ही फलका आगम) मानना पड़ेगा । जब प्रतिदिन सुषुप्तिमें अहमर्थका नाश और जागरमें फिर उसकी उत्पत्ति मानी जायगी, तब पूर्वोक्त दूषण अनिवार्य हो जायेंगे । कर्ता अहमर्थ और भोक्ता अहमर्थमें भेद होनेसे कर्म और फलभोगमे भी वैयधिकरण्यापत्ति होगी । [L1
ग्रन्थि ही अहंकार है। वही 'अनुभवामि' (मै अनुभव करता हूँ) इस तरह आत्मा- भिन्न आत्मस्वरूप अनुभवका आश्रय होनेसे चिदात्मक कहलाता है। 'अहं कर्ता' (मै करता हूँ) इस तरह जडरूप कर्तृत्वका आश्रय होनेसे अचिदात्मक है। ऐसी स्थितिमें अचित् अन्तःकरणके उपरम होनेपर चिदचित्सवलित (चिजडग्रन्थिरूप) अन्तःकरणका भी उपरम हो जाता है। अन्तःकरण, उसका अधिष्ठान और अन्तः- करणगत चिदाभास—यह तीनों मिलकर अहमर्थ कहलाते हैं। अन्तःकरणका आत्मामें स्वरूपसे ही अध्यास होता है। परन्तु अन्तःकरणमें आत्माका स्वरूप नहीं अध्यस्त होता; किंतु उसका संसर्ग ही अध्यस्त होता है। इसीलिये अन्योन्याध्यास होनेपर भी उभयके साक्षात्कारसे उभयकी निवृत्ति नहीं होती। अतएव शून्यवादपत्ति नहीं होती; क्योकि आत्मस्वरूप अधिष्ठानके साक्षात्कार होनेपर स्वरूपसे अध्यस्त अन्तःकरणकी निवृत्ति होती है। परन्तु आत्माका तो संसर्ग ही अन्तःकरणमें अध्यस्त है, अतः उसीकी निवृत्ति होती है। स्वरूप अध्यस्त नहीं है, अतः उसकी निवृत्ति नहीं होती। इस अन्योन्याध्यास—चिजडग्रन्थिको ही अहमर्थ कहा जाता है, फिर अन्तःकरणकी उपरतिसे उसकी उपरति होनी युक्त ही है। यह उपरति या निवृत्ति भी निरन्वय नाश नहीं है, किंतु कारणरूपसे अवस्थान ही है। अतएव पूर्वापरके अहमर्थमे भेद नहीं है। जैसे एक ही घृतमें कोई भेद नही होता, ठीक वैसे ही वही अन्तःकरण सुषुप्तिकालमें अविद्यात्मना परिणत होता है और जाग्रत्में फिर वही अन्तःकरणरूपमें व्यक्त होता है। इस तरह प्रत्यभिज्ञा और अनुभव-स्मरणका सामानाधिकरण्य, कर्मफलभोग वैयधिकरण्या- भाव, अकृताभ्यागम, कृतविप्रणाशादि दोष भी नही होंगे, 'अथातोऽहंकारादेशः, अथात आत्मादेशः' यह श्रुति भी अहंकारसे पृथक् आत्माके होनेमें प्रमाण है। पूर्वपक्षीकी ओरसे कहा जाता है कि वेदान्तोंके मतसे तो जैसे 'स एवाधस्तात् स एवोपरिष्टात्' इत्यादि वचनोंसे भूमा ब्रह्मके साथ आत्माका अभेद बतलाया गया है, वैसे ही आत्माका अहमर्थके साथ भी अभेद बतलाया जा सकता है। अतः जैसे आत्मस्वरूप होनेपर भी भूमाका पृथक् उपदेश है, वैसे ही 'अहमेवाध- स्तादहमेवोपरिष्टात्' इत्यादि वचनोंसे अहमर्थका पृथक् उपदेश होना सम्भव हो सकता है। तब फिर भेदबोधन कैसा ? यदि कहा जाय कि 'भूमा और आत्मा तो भिन्नत्वेन प्रत्यक्षसे प्रसिद्ध हे, अतः उनका पृथक् उपदेश एकता प्रतिपादनके लिये ही उपयुक्त है। जब कि दो सर्वात्मा नहीं हो सकते और भूमा तथा आत्मा- दोनोंको सर्वात्मता कही गयी है, तब दोनोंकी एकता अर्थात् अभिन्नता सिद्ध हो जाती है। अहंकारकी तो आत्माके साथ एकता प्रत्यक्ष सिद्ध है। अतः आत्मासे पृथक् अहंकारका उपदेश आत्मासे भेद ही सिद्ध करनेके लिये है।' पर यह असङ्गत है, क्योकि यदि अहमर्थसे अन्य आत्माकी भूमा ब्रह्मसे भिन्नता प्रत्यक्षद्वारा असिद्ध
७९८ मार्क्सवाद और रामराज्य है तो भेदार्थ ही दोनोंका उपदेश क्यो न माना जाय ? इसके सिवा, जब अहम्अर्थ तो ब्रह्मभिन्नत्वेन रूपेण सिद्ध है, तब उसका उपदेश अभेद-सिद्धिके लिये ही क्यों न मान लिया जाय ? इसी तरह 'अज्ञातज्ञापकत्वेन श्रुतिका प्रामाण्य सिद्ध होगा।' आदि पूर्वपक्ष भी असङ्गत है; क्योकि अहंकारसे भिन्न आत्माकी भूमारूप ब्रह्मसे भिन्नता प्रत्यक्षद्वारा असिद्ध होनेपर भी अभिन्नता भी उसी तरह असिद्ध ही है । परंतु फिर भी दोकी सर्वात्मता बन नहीं सकती, अतः सर्वात्म्योपदेशान्यथा- नुपपत्तिकी सहायतासे अभेदमे ही श्रुतिका तात्पर्य मानना युक्त है । परतु अहम्अर्थ और आत्माका अभेद असम्भव है; क्योंकि जड, चेतनकी एकता नहीं हो सकती, अतः अहम्अर्थका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिका आत्मासे अभेद-प्रतिपादनमे तात्पर्य नहीं हो सकता । सारांश यह है कि भूमा ब्रह्म ही ऊपर-नीचे, पूर्व- पश्चिम-सर्वत्र है, वही सब कुछ है, यह कथन अधिष्ठान बुद्धिसे ही सम्भव है। सर्वाधिष्ठान जो है, वही सब कुछ है । अतः यदि भूमा ब्रह्म ही सर्वदेश, काल, वस्तुका अधिष्ठान है, तब तो वही सब कुछ है, ऐसा कहना सम्भव है, अन्यथा असम्भव है; परंतु, जब कि उसी तरह आत्माके लिये भी कहा जा रहा है कि आत्मा ही नीचे-ऊपर, पूर्व-पश्चिम, वही सर्वत्र और वही सब कुछ है, तभी अधिष्ठान होनेसे ही आत्माकी भी सर्वात्मकता बन सकती है । परतु सर्वप्रपञ्च का दो अधिष्ठान होना असङ्गत है, अतः जबतक आत्मा और भूमा ब्रह्मका अत्यन्त अभेद न ज्ञात हो, तबतक दोनोंकी ही सर्वात्मकताका उपदेश नहीं सङ्गत हो सकता । इसलिये आत्मा और भूमा ब्रह्मकी एकता स्वीकार्य है । यद्यपि इसी तरह 'अहमेवाधस्तात्' मै ही सब कुछ हूँ । इस तरह अहंकारकी भी सर्वरूपता सुनकर पूर्वन्यायसे आत्मा और भूमाके समान ही अहंकार और आत्माका भी अत्यन्त अभेद मानना चाहिये, तथापि अहंकारकी जडता, दृश्यता, प्रत्यक्षता स्पष्ट ही सिद्ध है । अतः चेतन आत्माका उसके साथ अभेद नहीं हो सकता । इसीलिये अहंकारादेशके पश्चात् आत्मादेशका प्रसङ्ग आता है, जिसका आशय यह होता है कि चिदात्मसंवलित (व्यापक अधिष्ठान चैतन्य- मिश्रित) होनेसे ही अहंकारकी सर्वात्मता कही गयी है । वास्तवमे परिच्छिन्न अहंकार सर्वरूप नहीं है, किंतु आत्मा ही सर्वरूप है । कहा जाता है कि 'ऐसी ही स्थिति हे तो अहंकारकी सर्वात्मता न कहकर आत्माकी ही सर्वात्मता कहनी थी, इतनेसे भी आत्मा और ब्रह्मकी एकता सिद्ध हो ही सकती थी, परतु, यह कहना ठीक नहीं है; क्योकि लोकमें आत्मशब्द- का प्रयोग अहम्अर्थमे ही होता है, अतः 'आत्मा' पदसे शुद्ध आत्माकी सर्वात्मता नहीं बतलायी जा सकती थी।' परंतु, यदि अहंकारकी सर्वात्मताके अनन्तर आत्मा- की सर्वात्मता कही जायगी, तब तो इसपर अवश्य ही ध्यान जायगा कि अहंकार और आत्मा इन समानार्थक दो शब्दोका प्रयोग क्यो किया गया ? इस तरह
ध्यानसे विवेचन करनेपर निश्चय होगा कि आत्मशब्दसे शुद्ध आत्मा विवक्षित है। अतः उसीकी मुख्य सर्वात्मता है। अहंकारकी तो आत्मयुक्त होनेसे ही सर्वात्मता है। इस तरह आत्मशब्दका अहंकारसे अतिरिक्त शुद्ध आत्मामें पार्थक्य निर्णय करानेके लिये ही अहंकारका पृथक् उपदेश आवश्यक है। अर्थात् अहंकार- का पृथक् उपदेश आत्मासे भेद ही सिद्ध करनेके लिये है। कुछ महानुभावोंका तो ऐसा कहना है कि यहाँ सञ्चारिभावका वर्णन है। प्रेमके उद्रेकमें भावुक सभी विश्वको भूमा ब्रह्मरूपसे देखता है, उसीमें स्व-पर- विस्मृतिसे वह अपने-आपको ही भगवान् समझने लगता है। 'असावहं त्वित्यबला- स्तदात्मिका न्यवेदिषुः कृष्णविहारविभ्रमाः।' (श्रीमद्भा० १०।३०।३) अर्थात् जैसे गोपाङ्गनाएँ कृष्ण प्रेमोन्मादमें विह्वल होकर अपने-आपको कृष्ण समझने लगी थीं, वैसे ही साधक अपने-आपको ही भूमा मानकर 'मैं ही सब कुछ हूँ' ऐसा कहता है। परन्तु यह वस्तुस्थिति नहीं, संचारिभाव है, स्थायी नहीं है। अतएव फिर इस भावके मिटनेपर भूमारूप आत्माकी ही सर्वात्मताका अनुभव होता है।' इस मतमें भी अहमर्थसे आत्मशब्दार्थ भिन्न ही माना जाता है। यह दूसरी बात है कि इस मतमें आत्मा और भूमा-इन दोनों शब्दोंका परमेश्वर ही अर्थ है और अहं का अर्थ जीवात्मा है। परंतु यहाँ वस्तुके याथात्म्यका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति सञ्चारि- भावका वर्णन कर रही है या तत्त्वके भेद-अभेद आदिका, यह चिन्त्य है। 'कुछ लोगोंका यह भी कहना है कि 'वेदान्तीके मतमें भूमा, अहंकार और आत्मा— यह तीनों बिम्ब, प्रतिबिम्ब और मुखके समान हैं, अतः औपाधिक ब्रह्म भूमा है, जीव अहमर्थ है और निरुपाधिक चिन्मात्र ब्रह्म आत्मा है। इस दृष्टिसे तो जब वेदान्तीके मतमें भी जीवात्मासे अहंकारकी भिन्नता नहीं सिद्ध होती, तब अहमर्थ- की अनात्मता कैसे सिद्ध हो सकती है?' परंतु यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि उसका तात्पर्य यह है कि पहले भूमाका स्वरूप इस तरह बतलाया गया कि 'यत्र नान्यत्पश्यति, नान्यच्छृणोति, नान्यद्विजानाति' (छा० ७०) जहाँ न दूसरेको देखता है, न सुनता है, न जानता है, वही भूमा है। 'स एवाधस्तात्' वही ऊपर-नीचे, वही सब कुछ है। इस उक्तिमें 'यत्र' शब्दसे आधार-आधेयभावकी प्रतीति और 'सः' इस शब्दसे उसकी परोक्षता, अप्रत्यक्षता प्रतीत होती थी और इसीसे भूमामें आत्मासे भिन्नता भी प्रसक्त थी। ऐसी स्थितिमें सर्वभेदशून्य, अपरोक्ष, स्वप्रकाश, ब्रह्मके ज्ञानमें बाधा उपस्थित हो जाती, इसीलिये 'अहमेवाधस्तात्' 'मैं ही ऊपर-नीचे सब कुछ हूँ' इस उक्ति की आवश्यकता हुई। इससे सिद्ध किया गया कि पूर्वोक्त भूमा, जिसकी सर्वात्मता बतलायी गयी, वह अहमर्थरूप है, जीवसे अभिन्न ही है। एतावता 'सः' शब्दसे प्रतीत भूमाकी परोक्षताका वारण हुआ और जीवात्मा परमात्माका भेद एव आधाराधेयभाव आदि भी वारित हुआ। जैसे भूमा सर्वात्मा है, वैसे ही अहमर्थ या जीवात्मा भी सर्वात्मा है। जब दो
७९० मार्क्सवाद और रामराज्य सर्वात्मा नहीं हो सकते, तब अर्थात् ही दोनोंकी एकता समझी जाती है, जिससे अपरोक्ष जीवात्मासे अभिन्न भूमाकी अपरोक्षता एवं आधाराधेय भावादिसे विवर्जितता सिद्ध हो जाती है। परंतु इतनेपर भी यह गड़बड़ी पड़ती थी कि अविवेकी लोग 'मै' या 'अहं' का प्रयोग व्यापक शुद्ध चिदात्मामें न करके चिज्जड- ग्रन्थि या कार्यकारण-संघातमें ही करते हैं । इससे कहीं यह न समझ लिया जाय कि परिच्छिन्न, जड़ कार्यकारणसंघात ही भूमा ब्रह्म है, अतः अहंकाररहित शुद्ध आत्माकी सर्वात्मता बतलाकर सर्वोपद्रव-प्रपंचभेदशून्य, स्वप्रकाश भूमा ब्रह्मकी सर्वात्मताका समर्थन किया गया और अहंशब्द-वाच्यार्थ जड़ अहमर्थसे भिन्न अह- शब्दके लक्ष्यभूत अहमर्थ-साक्षीको मुख्य आत्मा कहा गया है । इसी अर्थको सिद्ध करनेमें भूमादेश, अहंकारादेश, आत्मादेश करनेवाली श्रुतियोंका तात्पर्य है । अतः यहाँ बिम्ब-प्रतिबिम्ब आदि कल्पनाका अवकाश नहीं था । यदि अविद्यामें प्रति- बिम्बित जीवको अहंकारशब्दसे कहनेपर भी प्रसक्त-भेदका वारण और आत्मा- देशद्वारा शुद्ध-आत्मासे अहंकारका भेद कहना सङ्गत हो, तो भी अविद्योपाधिक जीवको अहंकार-शब्दसे 'स्थूलारुन्धतीन्याय' से कहा जाता । जैसे अरुन्धतीके निकट रहनेवाले स्थूलताराको ही पहले दिखलाकर बादमें तन्निकटस्थ अरुन्धतीको दिखलाकर पूर्ववाक्यका भी तात्पर्य अरुन्धतीके प्रदर्शनमें ही माना जाता है, साथ ही स्थूल, सूक्ष्म, दोनों ही ताराओमे भेद स्वतः सिद्ध हो जाता है, वैसे ही 'अहंकार' शब्दसे पहले अविद्याप्रतिबिम्ब अहंकाराश्रय चैतन्य कहा जा सकता है । लोकमें अपरोक्ष चैतन्य- का 'मै' या 'अहं' शब्दसे ही व्यवहार होता है, 'अविद्याप्रतिबिम्ब' आदि शब्द अलौकिक है, अतः उनसे व्यवहार नही होता । पश्चात् 'आत्मादेशवाक्य' से 'अहंकारादेशवाक्य' का भी शुद्ध आत्माके ही सर्वात्म्य-निश्चयमें तात्पर्य विदित होता है । फिर अह शब्दवाच्यका और शुद्ध-आत्माका भेद सुतरा सिद्ध हो जाता है । अहमर्थको आत्मा माननेवाले बहुत से महानुभाव आत्माको अणु मानते हैं फिर अणु आत्माकी 'सर्वात्मता' कैसे हो सकती है ? जब अणु आत्मा ही अनन्त है और जगत्, ईश्वर आदि सब सत्य ही है तब एक अणुरूप जीव ही सब कुछ है यह कथन सङ्गत ही कैसे हो सकता है ? कुछ लोगोंका कहना है कि 'स एवाधस्तादहमेवाधस्तादात्मैवाधस्तात्' इत्यादि उपक्रम वाक्यो और 'सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः' इत्यादि स्मृतियोसे 'स एवेदं सर्वम्, अहमेवेदं सर्वम्, आत्मैवेदं सर्वम्' इत्यादि उपसंहार वाक्योका तात्पर्य सर्वात्मता ( सर्वस्वरूपता ) के प्रतिपादनमें नहीं, किंतु सर्वगतत्व या व्यापकत्वके प्रतिपादनमें ही है । अतएव 'सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः' यह स्मृति स्पष्ट कहती है कि आप सर्वव्यापक हैं अतः सर्वस्वरूप हैं । इसी तरह भूमा, अहमर्थ और आत्मा सभी सर्वगत, सर्वव्यापक हैं, अतः उनकी
मार्क्स और आत्मा ७९१ सर्वस्वरूपताका उपचार कहा जाता है । यदि अधिष्ठान या उपादान होनेमें वास्तविक सर्वस्वरूपता होती, तब तो कथंचित् अहंकाररहित केवल चैतन्यमें अहंशब्द- का भी तात्पर्य समझा जाता । वाच्यत्व, ज्ञेयत्व आदिके समान सर्वगतत्व भी अनेकोंमें हो सकता है । यदि जीव और ब्रह्मकी एकता ही श्रुतियोंका तात्पर्य हो, तब तो भूमा और आत्माके उपदेशसे ही अभीष्ट सिद्ध हो जाता, फिर अह- कारादेशकी व्यर्थता स्पष्ट ही है । परंतु, यह सब कथन अयुक्त है, क्योंकि उपर्युक्त युक्तियोंके अनुसार 'स एवाधस्तात्' इत्यादि वाक्योंका तात्पर्य ब्रह्मात्मैक्यमें ही है, सर्वगतत्व प्रतिपादनमें नहीं । वस्तुतः जो उपादान या अधिष्ठान होता है, उसी- की सर्वगतता भी सम्पन्न होती है । पृथिव्यादि सर्वप्रपञ्चका कारण होनेसे ही आकाश आदिकी भी व्यापकता है । अतएव 'सर्वकारणरूपसे आप सर्वत्र व्यापक हैं, इसीलिये आप सर्वरूप हैं,' इस तरह 'सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वं.' इस स्मृतिका भी तात्पर्य सर्वात्मतामें ही है । परिभूः, स्वयम्भूः—इन दो पदोंसे व्यापकता और सर्वरूपता सिद्ध की जाती है ।' 'परि-उपरि-सर्वतो वा भवतीति परिभूः' ऊपर या चारों ओर होनेवालेको 'परिभूः' कहा जाता है । 'यस्योपरि भवति यश्चोपरि भवति स सर्वः स्वयमेव भवतीति स्वयम्भूः' जिसके ऊपर और जो ऊपर होता है, उस सब कुछ अपने-आप होनेवालेको 'स्वयम्भूः' कहा जाता है । ठीक उसी तरह 'स एवाधस्तात्' इत्यादि वचनोंसे सर्वव्यापकता कहकर 'स एवेदं सर्वं' इत्यादि वचनोंसे उसीकी सर्वरूपता प्रतिपादित की गयी है । अतः उपक्रम- उपसंहारमें ऐक्यरूप्य ही है । इसके सिवा यह भी विचार करना चाहिये कि 'स भगव. कस्मिन् प्रति- ष्ठितः'—भगवन् ! वह भूमा किसमें प्रतिष्ठित है ? इस प्रश्नमें क्या भूमाका कहीं अवस्थानमात्र पूछा गया है अथवा भूमा परमार्थतः किसमें प्रतिष्ठित है, यह पूछा गया है ? यदि पहला पक्ष है तब तो उसका यह उत्तर है कि 'स्वे महिम्नि' अर्थात् अपने प्रपञ्चरूप महिमामें ही स्थित है । यद्यपि कहा जा सकता है कि 'यदि भूमा अपनी महिमामें स्थित है, तब तो जैसे राजा अपनी महिमासे गज, अश्व आदिमें स्थित होता है, यहाँ 'भोग-साधन' मे 'महिम' शब्दका प्रयोग हुआ है और वह भी राजाकी समान सत्तावाला है, अर्थात् जैसे राजा सत्य है, वैसे ही उसके भोग-साधन गजादि भी सत्य हैं, वैसे ही प्रपञ्चको भी ब्रह्मके समान ही सत्य होना चाहिये । ऐसी स्थितिमें वस्तुपरिच्छेद होनेसे भूमामें परिच्छिन्नता अनिवार्य होगी, तथापि यहाँ महिमा शब्दका अर्थ अपनी समान सत्तावाला भोगसाधन नहीं विवक्षित है, किंतु 'स्व' शब्द अपनेमें अध्यस्तरूप 'स्वीय' या 'आत्मीय' का बोधक है । कोई संकोचक प्रमाण न होनेसे सभी अध्यस्त दृश्य-प्रपञ्च 'स्वे महिम्नि' के 'स्व' शब्दका अर्थ है और महिमा शब्द उत्कर्षका बोधक है । राजसम्बन्धी होनेसे राजकीय गो, गजादिमें जैसे उत्कर्ष है,
वैसे ही प्रकाशक ब्रह्म-सम्बन्धसे अध्यस्त दृश्यमात्रमें उत्कर्ष है । अतः उसके परमार्थ सत्य होनेकी कोई अपेक्षा नहीं है । अतएव ब्रह्ममें परिच्छिन्नता आदि न आ सकेगी । यदि दूसरे अभिप्रायसे प्रश्न हो कि भूमा परमार्थतः किसमें प्रतिष्ठित है, तब तो 'यदि वा नो महिम्नि'—वह महिमामें प्रतिष्ठित नही है, यही उत्तर है; क्योंकि 'अन्यो ह्यन्यस्मिन् प्रतिष्ठितः'—दूसरा ही दूसरेमें प्रतिष्ठित होता है । जब भूमासे भिन्न परमार्थ सत्य कोई पदार्थ ही नहीं है, तब भूमाकी किसमें प्रतिष्ठा कही जाय ? 'यत्र नान्यत्पश्यति' इत्यादि वाक्यसे अद्वैत ब्रह्म ही भूमा कहा गया है । इस तरह जब पूर्व वाक्यसे ही अद्वितीय ब्रह्मका निश्चय हो गया, तब तो फिर उसके अनुसार ही 'स एवाधस्तात्' इत्यादि वाक्योंका भी सर्वात्मता-प्रतिपादनमे ही तात्पर्य होगा । दो वाक्योंका पृथक् अर्थकल्पना करना निरर्थक है । अतः 'स एवाधस्तात्' इत्यादि वाक्योंका यही तात्पर्य है कि अधर्-ऊर्ध्व, देशकाल आदि सब कुछ भूमा ही है । 'जाति सर्वगता होती है' इस सिद्धान्तके अनुसार व्यापक जातिके समान भूमा अन्यमें अधिष्ठित भी हो सकता है । जैसे घटत्वादि जाति घटादिमें तादात्म्यसम्बन्धसे एव अन्यत्र स्वरूप-सम्बन्धसे रहती है, वैसे ही भूमा अपने कार्योंमें तादात्म्यसम्बन्धसे और अनादि पदार्थोंमें स्वज्ञान-विष- यत्वादिसम्बन्धसे प्रतिष्ठित होता है । 'अहमेवाधस्तात्' इत्यादिके मध्यमें अहंका- रोपदेश भी व्यर्थ नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ब्रह्ममें अपरोक्षता, प्रत्यक्चैतन्या- भिन्नता आदिके प्रतिपादनके लिये उसकी सार्थकता पहले ही कह चुके हैं । कहा जाता है कि 'वेदान्त-मतानुसार प्रत्यक्चैतन्य आत्मा ही मुख्यरूपसे अपरोक्ष है । उसके साथ ब्रह्मकी एकता कहनेसे भूमा ब्रह्मकी अपरोक्षता ( प्रत्यक्षता) सिद्ध हो ही जानी, फिर अहंकारकी, जो वस्तुतः सर्वरूप नही है सर्वात्मता क्यो कही गयी ?' परतु इसका उत्तर यही है कि यद्यपि आत्माके सम्बन्धसे ही अहंकारकी भी अपरोक्षता है, अतः आत्माकी एकतासे ही भूमाकी अपरोक्षता सिद्ध हो सकती थी तथापि अहकार (मै) मे अपरोक्षता लोकमें बहुत प्रसिद्ध है, इसलिये उसकी उक्ति सार्थक है । इसके सिवा यदि 'अहं' का अर्थ अणुपरिणाम आत्मा ही मान लिया जाय, तब तो उसमे व्यापकता, सर्वरूपता आदि कुछ भी नहीं बन सकती । कुछ लोग कहते हैं कि 'भूमा नारायणख्यः स्यात् स एवाहंकृतिः स्मृतः। जीवस्थस्त्वनिरुद्धो यः सोऽहंकार इतीरितः ॥ अणुरूपोऽपि भगवान् वासुदेवः परो विभुः । आत्मेत्युक्तः स च व्यापी' इस स्मृतिमें भूमारूप नारायणहीको अहंकृति कहा गया है । एवं जीवमें रहनेवाले अनिरुद्धको ही अहंकार कहा गया है और 'अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मा परात्परः । योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम् ॥ सोऽहंकार इति प्रोक्तः सर्वतेजोमयो हि सः' इत्यादि स्मृतियोसे व्यक्त-भावको प्राप्त होकर पितामहको रचनेवाला ही अहंकार कहा गया है ।
अतः इन स्मृतियोंके अनुसार ही श्रुतिका अर्थ होना चाहिये।' परन्तु यह ठीक नहीं; क्योंकि सर्वात्मता-प्रतिपादक श्रुति-वचनोंके अनुसार ही स्मृतियोंका अर्थ करना युक्त है। इस दृष्टिसे इन स्मृतियोंका यही अर्थ होता है कि 'नारायण ही भूमा है और वही अहंकृति है' अर्थात् अहंकारोपलक्षित चित्तसे अभिन्न होनेके कारण वही अहंकृति भी कहलाता है। अविद्याप्रतिबिम्बरूप जीवके आश्रित अविद्या, काम, कर्मके अनुसार इहलोक-परलोकमें-कहींपर न रुकनेवाला अहंकार ही 'अनिरुद्ध' है। इसमें और शुद्ध आत्मामें अवश्य ही भेद है। मोक्षधर्मके विवेचनसे यह स्पष्ट हो जाता है 'परमात्मेति यं प्राहुः सांख्ययोगविशारदा । तस्मात्प्रसृतमव्यक्तं प्रधानं तद्विदुर्जनाः ॥' अर्थात् सांख्ययोगविशारद जिसे परमात्मा कहते हैं उसीमे प्रधान या अव्यक्त उत्पन्न होता है। 'अव्यक्ताद् व्यक्तमुत्पन्नं लोकसृष्ट्यर्थमीश्वरात् । अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मा परात्परः ॥ योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम् । सोऽहंकार इति प्रोक्तः सर्वतेजोमयो हि सः ॥ पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । अहंकारप्रसूतानि महाभूतानि पञ्च च ॥' (सर्वदर्शनसं०) लोकसृष्ट्यर्थ अव्यक्त (अव्यक्तभावापन्न ईश्वर) से अनिरुद्ध या महान् आत्मा (महत्तत्त्व, समष्टिबुद्धि, सूत्रात्मा या हिरण्यगर्भ) का प्रादुर्भाव हुआ। जिस महान्ने व्यक्तभावापन्न होकर पितामह (विराट्) को रचा है, वही महान् आत्मा (हिरण्यगर्भ) आगे चलकर अहंकार कहलाता है। वह बुद्धिरूप या तेज-(सत्त्व) प्रधान सूक्ष्म शरीरका अभिमानी होनेसे ही तेजोमय है। उसी अहंकारसे फिर पञ्चभूतोंकी रचना हुई। मोक्षधर्मके इन वाक्योंमें सांख्यमतानुसार महत्तत्त्व और अहंकारमें ही 'महान्' और 'अहंकार' शब्दका प्रयोग हुआ है। वेदान्त-मतानुसार वीक्षण और विविकीर्षा (प्रपञ्चरूपसे आविर्भावकी इच्छा) ही उनके अर्थ हैं। 'तदैक्षत' इस श्रुतिसे जो ईक्षण कहा गया है, उसे ही महान् कहा जा सकता है। 'एकोऽहं बहु स्याम्' इत्यादि श्रुतिके अनुसार अनेक होनेकी इच्छा ही अहंकार है, अतएव ईक्षणके पश्चात् ही 'अहं' पदका उल्लेख हुआ है। 'अहंकारश्चाहंकर्त्तव्यञ्च' 'महाभूतान्यहंकार' इत्यादि श्रुति-स्मृतिमें अहंकारकी उत्पत्ति और लय बतलाया गया है। अत उसमें व्यापकता कभी नहीं बन सकती। जहाँ भी कहीं अहमर्थकी व्यापकता कही गयी है सर्वत्र ही अहंकारसे रहित, अहंकारके अधिष्ठानभूत व्यापक चैतन्यमें ही लक्षणासे अहंपदका प्रयोग हुआ है। जैसे 'अहं मनुरभवं सूर्य्यश्च' इस वामदेवकी उक्तिमें यद्यपि आपाततः प्रतीत होता है कि परिच्छिन्न जीवकी ही सर्वरूपता कही जा रही है तथापि सिद्धान्ततः वहाँ लक्षणासे अहंकाररहित व्यापक
शुद्ध चैतन्यमें 'अहं' का प्रयोग निर्णय किया गया है। वैसे ही जहाँ भी अहमर्थकी व्यापकता सुनायी दे, वहाँ व्यापक चैतन्य ही 'अह' का अर्थ समझना चाहिये । कुछ लोग कहते हैं कि 'अहंकारश्चाहं कर्तव्यश्च' इत्यादि स्थलोंमें महत्तत्त्वका कार्य और मन आदिका कारण अहन्तत्त्व लिया गया है । 'महत्तत्त्वाद्धिकुर्वाणाद्भ- गवद्वीर्यसंभवात् । क्रियाशक्तिरहंकारस्त्रिविधः समपद्यत' ( श्रीमद्भा० ३ । २६ । २३ ) इत्यादि वचनोंके अनुसार यह सात्त्विक, राजस, तामस—त्रिविध अहकार आत्मस्वरूप अहमर्थसे सर्वथा भिन्न है । यदि अहमर्थ और अहंकारमें भेद न माना जायगा, तब तो इसी तरह 'बुद्धिरव्यक्तमेव च' ( गीता १३ । ५ ) इस वचनमें भी विवाद खड़ा हो सकेगा । यहाँ 'बुद्धि' पद क्षेत्रान्तर्गत दृश्यविशेषके लिये आया है । परंतु यदि 'बुद्धि' शब्दसे संवित् ( स्वप्रकाश ज्ञानरूप आत्मा ) का बोध हो, तब तो संवित्का भी क्षेत्रकोटिमें ही परिगणन होगा । अतः कहना होगा कि भले ही कहीं 'बुद्धि' और 'ज्ञान' पदसे संवित् या आत्मा कहा जाय, पर 'बुद्धिरव्यक्तमेव च' इस क्षेत्रस्वरूपके निरूपण-प्रसङ्गका 'बुद्धि' शब्द संवित्का बोधक नहीं है । ठीक इसी तरह क्षेत्रमें प्रयुक्त अहंकार शब्दका अर्थ आत्मा नहीं है; किंतु 'अहमात्मा गुडाकेश' ( गीता १० । २० ) इत्यादि स्थलोंका ही 'अह'पद आत्मा- का बोधक है । 'दम्भाहंकारसंयुक्ताः' ( गीता १७ । ५ ) इत्यादि स्थलोंमें 'अह' पदका प्रयोग देहमें, अहंबुद्धि और गर्वमें होता है । 'गर्वोऽभिमानोऽहंकारः' ( अमर० १ । ७ । २१ ) इस कोषसे भी मालूम होता है कि अहंकार शब्द केवल अहम
कुछ लोग अहमर्थमें आत्मा-अनात्मा—दोनोंका मिश्रण नहीं मानते और कर्तृत्व आदिको मुख्य आत्माका ही धर्म मानते हैं। परन्तु यह असंगत है; क्योंकि असङ्ग, अनन्त आत्मामे कर्तृत्व माननेसे मुक्तिका होना अत्यन्त असम्भव हो जायगा। कहा जाता है कि 'यदि अहङ्कार या अहंशब्द चिज्जड- ग्रन्थिका वाचक हो तब तो दूसरोकी ग्रन्थिमें भी 'अहं' का प्रयोग होना चाहिये।' परन्तु उन्हें यह भी देखना चाहिये कि उनके ही मतमें अहंकार और मान्त अहम्का प्रयोग दूसरोंके अन्तःकरण या क्षेत्रमे क्यों नहीं होता ? यदि उन्हे ऐसा इष्ट हो तो हमें भी इष्ट ही है। भेद यही है कि हमारे यहाँ इन पदो- की अपने उच्चारयितामें शक्ति है। शुद्ध आत्मा उच्चारयिता है नहीं, अतः जैसे वहाँ लक्षणासे प्रयोग होता है, वैसे ही दूसरी ग्रन्थिमें भी होगा। कहा जाता है कि कर्तृत्व आदिके अनात्म-धर्म होनेपर भी उसे अपने आश्रय प्रतीतिके बिना भी आत्मामें वैसे ही प्रतीति होनी चाहिये, जैसे 'गौरोऽहम्' यहाँ गौरवके आश्रय देहकी प्रतीति न होनेपर भी गौरवकी आत्मामें प्रतीति होती है। परन्तु ध्यान देनेपर स्पष्ट प्रतीत होता है कि दृष्टान्तमें भी देहत्वरूपसे देहका भान न होनेपर भी गौरव मनुष्यत्वरूपसे देहका भान अवश्य रहता है। फिर दार्शन्तिक कर्तृत्व आदि आश्रयभूत अहमर्थकी प्रतीतिके बिना कैसे प्रतीत होगे ? सार यह है कि जहाँ आरोप अनुभूयमान होता है, वहाँ या तो प्रतिबिम्बरूपता होती है अथवा धर्मीका अध्यास अवश्य होता है। जब कर्तृत्वादि प्रतिबिम्बरूप नहीं हैं, तब अवश्य ही धर्मीका अध्यास मानना चाहिये। अहं प्रत्ययका विषय होनेसे शरीरके समान अहमर्थ अनात्मा है इत्यादि अनुमानसे भी अहमर्थकी अनात्मता सिद्ध होती है। कहा जाता है कि इस तरह तो अहमर्थके भीतर अधिष्ठानभूत चैतन्य भी अह प्रत्ययका विषय है, फिर उसे भी अनात्मा कहना पड़ेगा। परन्तु इसका उत्तर स्पष्ट है। जिस रूपसे उसे अहंप्रत्यय- विषयता है, उस रूपसे उसकी अनात्मता इष्ट ही है और स्वरूपसे वह सर्वथा अविषय है अतः उसमें अनात्मताकी प्रसक्ति नहीं है। अहमर्थ आत्मासे अन्य है। 'अहं' शब्दका अभिधेय (वाच्य) होनेसे अहंकारशब्द-वाच्यके समान पर्यायता दिखलायी जा चुकी, अतः असिद्धिकी कल्पना नही की जा सकती। कहा जाता है कि वेदान्ती भी तो 'गौरोऽहम्' इस तरह आत्माको गौरवकी कल्पनाका अधिष्ठान मानता है और 'मा न भूवम्, भूयासम्' इत्यादि रूपसे आत्माको ही परप्रेमास्पद मानता है। साथ ही अहमर्थ अपनी सत्तामें प्रकाश (बोध) से रहित नहीं होता, अतः आत्मा- की स्वप्रकाशता भी कही जाती है। यदि अहमर्थ अनात्मा ही हो, तब तो यह सब उपर्युक्त कथन कथमपि सङ्गत न हो सकेगा, क्योकि 'गौरोऽहम्', 'मा न भूवम्' अहमर्थकी प्रकाशाव्यभिचारिता यह सभी अहमर्थसे ही सम्बन्धित है। अतः यदि वह अनात्मा है, तब तो यह अहमर्थसे सम्बन्धित स्वप्रकाशत्वादि अनात्मामें ही
७९६ मार्क्सवाद और रामराज्य पर्यवसित होगे । परंतु यह कथन ठीक नहीं है । गौरत्वादि अनात्माके आरोपका अधिष्ठान अहमर्थ नहीं है, अपितु आत्मा ही है । किंतु जैसे 'इदम्' (पुरोवर्ती शुक्तिकादि) अधिष्ठानका अवच्छेदक होनेसे अधिष्ठान कहलाता है, वैसे ही अहमर्थ भी अधिष्ठानका अवच्छेदक होनेसे अधिष्ठान कहलाता है । वास्तवमें अहमर्थ अनात्माके आरोपका अधिष्ठान नहीं है । आत्मामें अहंकारका ऐक्यारोप (भ्रम) होनेसे ही अहमर्थमें प्रेमास्पदत्वकी प्रतीति होती है । जो कहा जाता है कि 'ऐसा माननेसे अन्योन्याश्रय-दोष होगा', वह भी ठीक नहीं । सुषुप्तिकालमें आत्माका प्रकाश होता है, अहमर्थका प्रकाश नहीं होता । इसीसे उन दोनोका भेद सिद्ध हो जाता है । कहा जाता है कि 'अहमर्थके प्रेमसे भिन्न अन्य प्रेमका अनुभव ही नहीं होता, अतः अहमर्थको ही प्रेमास्पद मानना चाहिये, परंतु यह ठीक नहीं । परामशसे सिद्ध सुषुप्तिमे अहमर्थशून्य आत्माके प्रेमका अनुभव स्पष्ट है, अतः अहमर्थ-प्रेमसे भिन्न भी आत्मप्रेम है ही। यहाँ संदेह होता है कि यद्यपि अहितमें हितबुद्धिसे प्रेम उत्पन्न होता है तथापि जो प्रेमका आस्पद नहीं है, उसमें प्रेमास्पदताका आरोप कहीं भी नहीं देखा गया । अतः यदि अहमर्थ-प्रेमास्पद आत्मा नहीं है, तब इसमें प्रेमास्पदताका आरोप कैसे हो सकता है ?' परंतु इसका समाधान यह है कि अहमर्थमे प्रेमास्पदत्वका आरोप होता है, ऐसा नहीं; किंतु यह कहा जा रहा है कि अहमर्थमें आत्माके ऐक्यका आरोप होनेसे प्रेमास्पदता है, स्वाभाविक नहीं । स्वाभाविक प्रेमका आस्पद आत्मा ही है । इच्छा और प्रेममें भेद है, अतएव सिद्ध वस्तुमे भी स्नेहात्मक-वृत्तिरूप प्रेम होता है । रहा यह कि 'अहमर्थका प्रकाशके साथ व्यभिचार न होनेसे उसे ही आत्मा माना जाय', यह भी ठीक नहीं, क्योकि वह तो अहमर्थ और आत्माके भेदमें भी बन सकता है । परंतु स्वप्रकाश आत्मसम्बन्धके बिना जड अहमर्थका प्रकाशाव्यभिचार नहीं हो सकता । अतएव वह भी अहमर्थ भिन्न आत्मामे प्रमाण है, अर्थात् अहमर्थके प्रकाशाव्यभिचारसे उसकी स्वप्रकाशता नहीं मानी जा सकती, अपितु इससे स्वप्रकाश आत्माका सम्बन्ध ही निश्चित होता है । कहा जाता है कि 'समारोप्यस्य रूपेण विषयो रूपवान् भवेत् । विषयस्य तु रूपेण समारोप्यं न रूपवत् ॥' अर्थात् आरोपितके रूपसे विषय रूपवान् होता है, विषय (अधिष्ठान) के रूपसे समारोपित पदार्थ रूपवान् नहीं होता । इस युक्तिसे आरोपित अहमर्थके अप्रेमास्पदत्वसे ही आत्मामें अप्रेमास्पदत्वकी प्रतीति होनी चाहिये । परंतु यहाँ विचार करना चाहिये कि क्या अधिष्ठानका धर्म आरोपितमें प्रतीत होना चाहिये अथवा आरोप्यगत धर्मका अधिष्ठानमें भान होना चाहिये ? पहला पक्ष तो इसलिये ठीक नहीं है कि अधिष्ठानके जिस धर्मसे विशिष्ट स्वरूपज्ञानसे आरोपितकी निवृत्ति हो जाती है, वह धर्म आरोप्यमें कदापि नहीं प्रतीत होता—ऐसा नियम है । जैसे शुक्तिरजतमें शुक्तिगत इदन्ताकी प्रतीति होनेपर भी शुक्तिगत नीलपृष्ठत्व, त्रिकोणत्व,
मार्क्स और आत्मा ७१७ शुक्तित्वादि धर्मका भान नहीं होता, क्योंकि शुक्तित्वादिविशिष्ट शुक्तिकाके ज्ञान होनेसे आरोपित रजतकी निवृत्ति हो ही जाती है। अतः अधिष्ठानके उसी रूपसे समारोप्य रूपवान् नहीं होता, जिसके ज्ञानसे आरोपित मिट जाय। प्रेमास्पदत्व वैसा धर्म नहीं है। अतः जैसे शुक्तिरजतमें शुक्तिकी इदन्ता भासित होती है, वैसे ही आत्मगत प्रेमास्पदताके अहमर्थमें अभानका नियम नहीं कहा जा सकता। दूसरा पक्ष भी सङ्गत नहीं है, क्योंकि आरोप्यगत वे ही धर्म अधिष्ठानमे प्रतीत हो सकते हैं जो अधिष्ठानगत धर्म-प्रतीतिका विरोधी न हो। अतएव सर्पगत भीषणता, अधिष्ठानगत इदन्ता-प्रतीतिका अविरुद्ध होनेके कारण अधिष्ठानमें भासित होती है। परन्तु अधिष्ठानगत धर्म इदन्ताकी प्रतीतिके विरुद्ध देशान्तरस्थत्वादि अन्य धर्मकी प्रतीति नहीं होती। ठीक उसी तरह आत्मामें भी आरोप्य अहमर्थके वे ही धर्म प्रतीत हो सकेंगे, जो आत्मधर्म-प्रतीतिका बाधक न हो। परन्तु यहाँ तो अप्रेमास्पदत्वरूप आरोप्यधर्म
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नहीं दिखायी देती, अतः मुक्तिकी अनिष्टापत्ति कही जा सकती है, तथापि विचार करनेसे विदित होगा कि इच्छाके समय अन्तःकरणका अध्यास होता है। अतएव यद्यपि आत्ममात्रकी मुक्तिकी इच्छा नहीं अनुभूत होती, तथापि विशिष्टगत मुक्तिकी इच्छाका ही शुद्धात्मगतत्वेन पर्यवसान होता है। आशय यह है कि इच्छाके भासक साक्षीसे ही अहमर्थका भान होता है, अतः इच्छाके उल्लेखकालमें अहमर्थ- का उल्लेख होनेपर भी विवेकियोंको अहमर्थके विविक्त आत्मगतरूपसे ही मुक्तिकी इच्छा होती है। अविवेकीको भी, जो दुःखमूलवाला हो उसमें दुःखमूलका उच्छेद हो, ऐसी इच्छा होती है। इस तरह शुद्धात्मामें दुःखमूलोच्छेदरूप मुक्तिकी इच्छा पर्यवसित होती है; क्योकि दुःखमूल अज्ञानवाला नहीं है। कहा जाता है कि यदि अहमर्थ अन्तःकरण ग्रन्थिरूप ही है तब तो 'मम मनः'—मेरा मन, मेरा अन्तःकरण—ऐसी बुद्धि नहीं होनी चाहिये; क्योकि अन्तःकरण और मन दोनो एक ही वस्तु हैं। परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योकि अन्तः- करण जडमात्र है। परंतु चेतन आत्मा और अन्तःकरण—इन दोनोंकी ग्रन्थि अहमर्थ है। इस भेदसे मेरा मन इस तरह षष्ठी (सम्बन्ध) बन सकती है। फिर भी कहा जाता है कि 'मनः स्फुरति, मनोऽस्ति' इस ज्ञानमें भी मनकी सत्ता और स्फूर्तिरूप आत्मासे सम्बन्ध है अतः इसे भी चिदचिद् ग्रन्थि कहा जा सकता है। फिर अह इस ज्ञान और 'मनःस्फुरति' इस ज्ञानमे समता क्यो नहीं प्रतीत होती ? यह ठीक नहीं है; क्योंकि सम्बन्धमात्र ही ग्रन्थि या संवलन नहीं कहा जाता, किंतु तादात्म्येन प्रतिभास (अभेदरूपसे प्रतीति) ही सवलन या ग्रन्थि है। 'मनः स्फुरति, मनोऽस्ति' इत्यादि स्थलोंमें आख्यातसे मनमें स्फुरण एवं सत्ताकी आश्रयता ही प्रतीत होती है, मनमें स्फुरणादिका तादात्म्य नहीं प्रतीत होता। अह इस स्थानमें तो अन्तःकरणका चेतनमें तादात्म्याध्यास है। कहा जाता है कि सभी भ्रान्तियोंमें अधिष्ठानांश और आरोप्य—इन दो अङ्गोकी अवश्य प्रतीति होती है। यदि 'इदं रजतम्' इत्यादि भ्रान्तियोंमें अधिष्ठानांश इदन्ताकी प्रतीति न अपेक्षित हो, तब तो बिना अधिष्ठानका भ्रम मानना पड़ेगा, जिससे शून्यवादकी प्रसक्ति अवश्य होगी। परतु 'अह इस भ्रान्तिमे तो दो अशकी प्रतीति ही नही होती। यदि कहा जाय कि वहाँ भी दो अंशकी कल्पना कर लेनी चाहिये, तब तो फिर 'आत्मा' इस बुद्धिमें भी दो अंशकी कल्पनासे भ्रान्तिता-सिद्धि माननी होगी। यदि दो अशकी प्रतीति न होनेसे 'आत्मा' इस प्रतीतिकी भ्रान्ति न माने, तब तो 'अह' इस प्रतीतिको भी भ्रान्ति मानना व्यर्थ है। इन संदेहोका समाधान यह है कि यदि भ्रान्तिमें अधिष्ठान और आरोप्य—इन दो अंशकी प्रतीतिका आपादन करना है तो वह तो मान्य ही है। अहमर्थका मिथ्यात्व ही उसके द्वितीय अंशके होनेमें प्रमाण है। परतु 'आत्मा' इस बुद्धिके विषयमें भी दो अंश है; इसमे तो कुछ भी प्रमाण नहीं है। अतः 'आत्मा' इस बुद्धिमें भी दो
! Look at where the dot is: The dot is right between र्थाandशor directly overश! Wait, let's look at line 6: अ ह म र्थाthen dot? The dot is over the space betweenर्थाandश! Wait, look at the character after र्था: Wait! Is it श? Look at it: it looks like वा? No, look at अहं: Wait, could it be: अहमर्था-no. Wait, let's compare the character withशin line 7: Line 7:अज्ञ—इनLine 1:अंशकी->अंthenशthenकी. Look at शinअंशकी: it has a round loop, then a vertical bar. In line 6: अहमर्थांशमें- it has the exact sameश! So it is अहमर्थांशमें! Wait, what is that smudge below? It's just slight ink bleed or typeface artifact. So it is definitely अहमर्थांशमें भी`!
Wait, let's check line 7:
स्फुराम्यहम्' इस तरह स्फुरण और अज्ञ—इन दो अंगोंकी प्रतीति होती ही है।
Yes, `स्फ
८०० मार्क्सवाद और रामराज्य प्रयोग मानना चाहिये, यह बात पहले ही कही जा चुकी है । जैसे 'युष्मद्' शब्द सम्बोध्य चेतनका बोधक होता हुआ भी लक्षणया अचेतनमात्रका बोधक होता है, वैसे ही 'अस्मद्' शब्द अहंकारविशिष्ट चेतनका बोधक होता हुआ भी लक्षणासे केवल शुद्ध चेतनमें ही प्रयुक्त होता है । आन्तर-बाह्य सभी प्रपञ्चका अधिष्ठान (आधार) सत् ही है, इसलिये घट, पट, मठ, पृथिवी, जल, तेज, आकाश सबके साथ 'सत्' (है) लगता है; जैसे आकाश सत् (है), वायु सत् (है), घट सत् (है) आदि । जैसे मिट्टीके घट-उदंचन आदि हर एक कार्यमें मिट्टी है, जलके तरंग बुलबुले आदि हर एक कार्यमें जल है, वैसे ही एक कार्यमें सत्, सत्ता या हस्ती है, अतः वही सत् कारण है । आकाशका कारण 'अहं तत्त्व' हे और उसका कारण 'महत्तत्त्व' और उसका भी 'अव्यक्त तत्त्व' है । जैसे सुषुप्तिमे अज्ञान या निद्रासे आवृत स्वप्रकाश सत्द्वारा ही मेघसे ढंके हुए सूर्यमें बादलकी तरह अज्ञान या निद्राका प्रकाश होता है, वैसे ही समष्टि अज्ञान या निद्रासे आवृत व्यापक स्वप्रकाश सत् ही उसका प्रकाशक होता है । आवृत सत्से भासित समष्टि अज्ञानको ही 'अव्यक्त' कहा जाता है । उस अव्यक्तसे उत्पन्न होनेवाली समष्टि बुद्धि या ज्ञानको ही 'महत्तत्त्व' कहा जाता है । जैसे घोर नींदसे अकस्मात् जगाये जानेपर पहले अहंकार-ममकारसे शून्य केवल कुछ ज्ञान होता है, वैसे ही समष्टि सुषुप्तिके पश्चात् अज्ञानावृत सत्को अहंकार-ममकारशून्य समष्टि ज्ञान उत्पन्न होता है । यह ज्ञान अज्ञानरूप अव्यक्त- का परिणाम है । जैसे अप्रकाशरूप पर्वतकी खानसे प्रकाशमय मणिका प्रादुर्भाव होता है, किंवा जैसे सूर्यके प्रकाशको न व्यक्त करनेवाली मिट्टीसे ही उत्पन्न होकर काच सूर्यप्रतिबिम्बका ग्राहक होता है, वैसे ही निखिल शक्तियोंके आश्रय केन्द्र अज्ञान (अचित्त्तत्वसे) चैतन्य-प्रतिबिम्बग्राहकज्ञान उत्पन्न होता है (यहाँ चित्स्वरूप परमात्मासे विलक्षण अचित् या जड़-शक्ति ही अज्ञान पदसे विवक्षित है, इसीका परिणाम वृत्तिरूप ज्ञान है) । यह स्वप्रकाश परमात्म- रूप नित्यबोध या ज्ञानसे भिन्न है, अतः उसीके प्रतिबिम्ब या आभाससे युक्त होनेके कारण अचित्परिणाममे औपचारिक 'ज्ञान' पदका प्रयोग होता है । जाग्रत् एव स्वप्नके ज्ञानोका सुषुप्तिमें लय हो जाता है और सुषुप्तिके पश्चात् ही इनका पुनः प्रादुर्भाव होता है । अतः जैसे मिट्टीसे उत्पन्न और उसमें लीन होनेवाले विकारोंका मिट्टी कारण समझी जाती है, वैसे ही जाग्रदादि ज्ञानोंका सौषुप्त अज्ञान कारण समझा जाता है । सोकर जागनेवालेके अहंकार-ममकारसे शून्य प्राथमिक ईक्षण (ज्ञान)के समान ही अज्ञानोपहित सत्का अहंकार-शून्य केवल ईक्षण (ज्ञान) ही महत्तत्त्व है । पुनश्च जैसे सामान्य ईक्षणके अनन्तर 'मै अमुक हूँ' इत्यादि रूपसे अहंकारका उल्लेख होता है । वैसे ही सत्के ईक्षणके बाद उसमें 'एकोऽहं बहु
स्याम्'—मैं एक हूँ, अनेक होऊँ, इस रूपसे अहङ्कारका उल्लेख होता है वही 'अह- न्तत्त्व' है। सुषुप्तिकी ओर जाते हुए भी 'मैं कहाँ और कौन हूँ' इत्यादि अहङ्कार- का पहले लय होता है। केवल कुछ चेत (ज्ञानसामान्य) रह जाता है। अन्तमें वह भी अज्ञान या सुषुप्तिमें लीन हो जाता है। परन्तु आत्मा या परमात्मस्वरूप नित्यबोध या ज्ञान तो इन तीनोंका भासक है, स्वप्रकाश सद्रूप है। जैसे बादलकी टुकड़ी देखकर आकाशव्यापी मेघमण्डल बुद्धिमें आरूढ हो सकता है, वैसे ही व्यष्टि (जीवगत) अहङ्कार, बुद्धि (ज्ञान), अज्ञान (सुषुप्ति) से ईश्वरगत समष्टि अहंतत्त्व, महत्तत्त्व और अव्यक्ततत्त्वका बोध हो जाता है। जैसे अहङ्कारपूर्वक ही जीवका कार्य होता है, वैसे ही अहङ्कारपूर्वक ही परमात्मासे आकाशादि समस्त प्रपञ्च उत्पन्न होते हैं। तभी अहन्तत्त्वसे शब्दतन्मात्रा या अपञ्चीकृत सूक्ष्म आकाशकी उत्पत्ति मानी गयी है। सर्वप्रथम अज्ञान या अचित् भी स्वप्रकाश सत्की ही शक्ति है। अतः वह भी सत्से स्वतन्त्र होकर स्वतः सत् नहीं है। जैसे सिता (शर्करा)के सम्बन्धसे अमधुर वस्तु भी मधुर प्रतीत होती वैसे ही स्वप्रकाश सत्के सम्बन्धसे ही अव्यक्तादि सभी प्रपञ्चमें सत्ता और स्फूर्ति प्रतीत होती है। अतएव जैसे लहरोंमें भीतर-बाहर जल ही रहता है, वैसे ही अव्यक्तसे लेकर सभी प्रपञ्चके भीतर-बाहर सत् ही है, स्फूर्ति ही है। जैसे जलके बिना लहर कोई वस्तु ही नहीं, वैसे ही सत्के बिना—स्फूर्तिके बिना अव्यक्त, अचित्, महत्तत्त्व, अहन्तत्त्व आकाशादि सब असत् हो जाते हैं। जबतक उनमें सत्का योग है तबतक उनका होना, उनकी सत्ता या स्फूर्ति है। सत्के बिना सब-के सब असत् हो जाते हैं। इसीलिये कहा है—'जासु सत्यता ते जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥ अतः अचित् आदि सभी मिथ्या हैं।, अधिष्ठानका साक्षात् बोध होते ही सब मिट जाते हैं। आकाशसे वायु, तेज, जल, पृथ्वी, घटादि सब उत्पन्न होते हैं और क्रमेण सब उसीमें लीन हो जाते हैं, तथापि घटाकाश, शरावाकाश, महाकाश आदि अनेक कल्पनाएँ हो जाती हैं। आकाशसे ही सूर्य, उससे ही घट और जल उसका ही आकाश और सूर्यरूपसे बिम्ब-प्रतिबिम्ब होना सङ्गत है और पार्थिव प्रपञ्च पृथ्वीमें, पृथ्वी जलमें, जल तेजमें, तेज वायुमे और वायुके आकाशमे मिलते ही सब कुछ केवल आकाश ही रह जाता है। उसी तरह स्वप्रकाश सत्से ही उत्पन्न अनेक उपाधियोंसे बिम्ब-प्रतिबिम्ब जीव, जगत् आदि अनेक भेद बनते हैं। परन्तु उत्पत्तिके विपरीत क्रमसे जब सब कुछ परमात्मामें लीन हो जाता है तब एक ही परमात्मा रह जाता है। जैसे आकाशसे ही क्रमेण घट उसीसे जल, उसीसे प्रतिबिम्ब और वही बिम्ब होता है, अन्तमें आकाश कार्य होनेसे सबका उसीमें लय हो जाता है, वैसे ही सर्व प्रपञ्च अनन्त, अखण्ड स्वप्रकाश चित्में ही उत्पन्न होता है, उसीमे लीन हो जाता है। 'अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्।
भा० २।९ ५६—
८०२ मार्क्सवाद और रामराज्य पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥' (श्रीमद्भा० २।१०।३२) भगवान्की उक्ति है कि सृष्टिके पहले एक मै ही था, मुझसे भिन्न कार्यकारण कुछ भी नही था, सृष्टि होनेपर भी जो प्रपञ्च उपलब्ध होता है, वह भी मै ही हूँ और अन्तमें जो अवशिष्ट रहता है वह भी मै हूँ । 'आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा । वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥' (माण्डूक्यकारिका ४। ३१) अर्थात् जो आदिमें नहीं, अन्तमें नही, वह मध्यमें भी नही ही है। यद्यपि मध्यमें सत्-सा प्रतीत होता है, तथापि है असत् ही । घटादि कार्य अपनी उत्पत्तिके पहले नहीं थे, अन्तमें नष्ट होनेके बाद भी नही रहते हैं । अतः मध्यमें सत्से प्रतीत होनेवालोंको भी असत् ही समझना चाहिये । जलकी लहरे, पानीके बुलबुले और स्वप्न- के पदार्थ, उत्पत्ति या प्रतीतिके पहले भी नहीं रहते, अन्तमें भी नहीं रहते, केवल मध्य- में प्रतीत होते हैं, तो भी उन्हें असत् ही समझना उचित है। 'अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥' (गीता २।२८) सभी प्रपञ्च उत्पत्तिके पहले अव्यक्त ही था, अन्तमें भी सब अव्यक्त हो जाता है, केवल मध्यमें व्यक्त है, फिर उसके लिये क्या रोना ? कोई अत्यन्त प्रिय वस्तु या व्यक्ति अदर्शन—अज्ञानसे ही आया, अन्तमें पुनः अदर्शनमें ही चला गया । फिर जो न अपना है, न जिसके हम हैं, उसके लिये क्या रोना ? 'अदर्शनादापतिताः पुनश्चादर्शनं गताः। नैते तव न तेषां त्वं तत्र का परिदेवना ॥' (महा० स्त्रीपर्व २।१३) जैसे मिट्टी या जलके भीतर ही तरह-तरहके पात्र और तरङ्ग आ जाते हैं, वैसे ही मनके भीतर ही सब दृश्य आ जाते हैं। मनकी हलचलमें ही दृश्य दिखलायी पड़ता है और उसके मिटनेमें मिट जाता है, अतः सब कुछ मन ही है । वह मन स्वप्रकाश सत् या भानके भीतर आ जाता है, अतः स्वप्रकाश सत् या अबाध्य अनन्त भान ही सब कुछ है । जैसे दर्पणके भीतर भूधर-सागर, गगन- मेघमाला, सूर्य-चन्द्र-नक्षत्र, वन-उपवन, नगर आदि प्रतिबिम्बरूपमें दिखायी देते हैं, वैसे ही अव्यक्तादि स्थावरान्त सदसत् सकल प्रपञ्च कूटस्थ स्वप्रकाश सत् या भानमें दिखायी देता है । जाग्रत्-स्वप्नके द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, सुषुप्तिकी निद्रा या अज्ञान जिससे प्रकाशित होते है, वही शुद्ध भानरूप आत्मा है। ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति, प्रकाश-प्रवृत्ति मोह (रज तम-सत्त्व) इन सबका प्रकाशक सबका अधिष्ठान, सबका कारण, सबसे अतीत सत् ही आत्मा है । वह प्रतिबिम्बके समान है, प्रतिबिम्ब नहीं। अतः उससे पृथक् बिम्बकी सत्ता नहीं अपेक्षित है। जैसे शुद्ध दर्पण देखनेसे प्रतिबिम्ब दृष्टि मिट जाती है, वैसे शुद्ध सत् देखनेसे प्रपञ्च-बुद्धि मिटती है। बोध होनेके उपरान्त यद्यपि प्रपञ्चका मूल अज्ञान मिट जाता है, तथापि प्रारब्धदोषसे प्रारब्ध-स्थितितक प्रपञ्चकी प्रतीति होती है । भोगसे प्रारब्ध मिटनेपर अवश्य ही प्रपञ्चप्रतीति भी मिट जाती है--'तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्ये अथ सम्पत्स्ये।' (छां० उ० ६।१४।२) 'भोगेन त्वितरे क्षपयित्वाथ सम्पद्यते ।'
फिर भी मनको निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्ममें प्रतिष्ठित करनेके लिये प्रथम वाक्, चक्षु आदि कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियोंको रोक लेना चाहिये, अर्थात् भाषण, दर्शन आदि इन्द्रियोंके व्यापारोंको रोककर केवल मनसे जप या ध्यान करते रहना चाहिये । जब कुछ कालके अभ्याससे दर्शनादि व्यापाररहित होकर मानस ध्यान, जपादि स्थिर हो जाय; तब मनको बुद्धिमें लय कर देना चाहिये । अर्थात् सङ्कल्प-विकल्पात्मक मनके व्यापारको निश्चयात्मिका बुद्धिमें लीन कर देना चाहिये । केवल ध्येय लक्ष्यके दृढ निश्चयमें संकल्प समाप्त कर देना चाहिये । पश्चात् व्यष्टि-बुद्धिको समष्टि-बुद्धि अर्थात् महत्तत्त्वमें लीन करना चाहिये और उसे फिर समष्टिबुद्धिके भी भासक शान्त आत्मामें लय करना चाहिये । अथवा वागादिव्यापारोंका मनमें लय करके मनको निश्चयात्मिका बुद्धिमें, फिर उसे समष्टि- बुद्धिमें और उसे शान्त आत्मामें नियन्त्रित या लीन करना चाहिये । बुद्धिके भासक शुद्ध भानका ही चिन्तन करना तद्भिन्न वस्तुका चिन्तन न करना ही उसका लय है । ‘यच्छे
द्वादश परिच्छेद मार्क्स और ईश्वर मार्क्सवादी विद्वान् धर्मके समान ही ईश्वरको भी अनावश्यक समझते हैं। उनकी दृष्टिमें 'भीरुता या भ्रान्तिके कारण कल्पनाप्रसूत भूत प्रेत ही सभ्यताके साबुनसे धुलते-धुलते देवता बन गया, और फिर वह कल्पित देवता ही विज्ञानकी चमत्कृतिसे चमत्कृत होकर ईश्वर या निर्गुण ब्रह्म बन गया। ईश्वर या ब्रह्म न तो कोई वास्तविक वस्तु है, न उसकी आवश्यकता ही है। ईश्वरकी कल्पनासे लाभके बदले हानि अधिक हो सकती है। कारण, ईश्वरीय शास्त्र या ईश्वरीय नियमका नाम लेकर अन्धविश्वासी लोग प्रगतिके मार्गमे बार-बार रोड़ा अटकाते रहते हैं।' एक कम्युनिस्टका कहना है कि 'जो ईश्वर या धर्मको मानते हुए भी मार्क्सकी अर्थनीति कार्यान्वित करनेकी बात करता है, या तो वह धूर्त मक्कार है अथवा महामूर्ख। ईश्वर दिखावटी हुंडी नहीं है। ईश्वर माना जायगा तो उसके नियम भी मानने पड़ेंगे। फिर व्यक्तिगत भूमि-सम्पत्ति आदिका राष्ट्रीयकरण भी ईश्वरीय नियमके विरुद्ध ठहरेगा।' परंतु ईश्वर यदि सत्य वस्तु है तो किसीके चाहने या न चाहनेसे उसका कुछ भी बिगड़ नहीं सकता। भले ही चमगादड़ोंको सूर्यका प्रखर प्रकाश असत्, अनावश्यक एवं हानिकारक प्रतीत होता हो, परंतु एतावता सूर्य असत्, अनावश्यक एवं हानिकारक नहीं सिद्ध होते। वैसे किसीको ईश्वर भी भले ही असत्, अनावश्यक एवं हानिकारक प्रतीत हो, फिर भी उसकी प्रचण्ड सत्ताका अपलाप होना असम्भव है। वस्तुतः सूर्यनारायणसे भी अधिक सूर्यचन्द्रका भी भासक ईश्वर एक स्वतःसिद्ध सर्वमान्य वस्तु है। यह बात आधुनिक अन्वेषण, न्याय-सांख्य-वेदान्त-दर्शन, आस्तिक सिद्धान्तो तथा आस्तिक वादोसे स्पष्ट सिद्ध है। धर्म एवं ईश्वर परम सत्य वस्तु है, इसीलिये सर्वकाल एवं सर्वदेशमें इसकी मान्यता रही है। कहा जाता है कि द्वितीय युद्धके प्रसङ्गमें अमेरिका एव अफ्रीकाके कई ऐसे प्रदेशोमें वैज्ञानिकोने अनुसंधान किया तो वहाँ यही पता चला कि वहाँके जंगली लोगोंमें धर्म एव ईश्वरके सम्बन्धमें किसी प्रकारकी धारणा नही है। परंतु ठीक इसके विपरीत यह भी कहा जाता है कि जब उन प्रदेशोंमें जाकर कई आस्तिकोने वहाँके लोगोंसे बात की तो पता चला कि वे लोग आसमानी पिता एवं स्वर्गीय लोकपर विश्वास रखते हैं, परंतु विदेशी सभ्य कहे जानेवाले लोगोंकी पहले तो वे बात ही नहीं समझते और समझनेपर भी डरकर अपना भाव नहीं व्यक्त कर सकते। प्रोफेसर मैक्सम्यूलरके अनुसार पादरी
मार्क्स और ईश्वर [८०५]
डाक्टर कौल, जुलूजातिके मध्यमें बहुत दिनोंतक रहे। जब वे उनकी भाषा भली प्रकार बोलने और समझने लगे तो उन्हें मालूम पडा कि जुलूजातिमें भी धर्म है। उनके विश्वासानुसार प्रत्येक घरानेका एक पूर्वज था और फिर समस्त मानवजातिका भी एक पूर्वज था, जिसका नाम उन्होंने 'उनकुलंकुलू' (प्रपितामह) रखा है। जब उनसे पूछा गया कि उनकुलकुलूका पिता कौन है ? तो उन्होंने उत्तर दिया कि वह बाँससे निकला था। जुलू-भाषामें बाँसको उथलङ्ग कहते हैं। बाप संतानका उथलङ्ग कहलाता है। जैसे बाँससे कल्ले फूटते हैं, उसी प्रकार बापसे संतानकी उत्पत्ति होती है। डाक्टर कौलसे एक जुलूने कहा कि 'यह ठीक नहीं कि स्वर्गीय राजाको हमने गोरे आदमियोंसे सुना है। गर्मियोंमें जब बादल गरजते हैं, तो हम कहते हैं - राजा (ईश्वर) खेल रहा है।' एक बुड्ढेने कहा कि 'हम बचपनमें यही सुना करते थे कि राजा ऊपर है, हम उसका नाम नहीं जानते। संसारको पैदा करनेवाला उम्दबूको (राजा) है, जो कि ऊपर है।' एक बुड्ढीने कहा कि जिसने सब संसार बनाया, उसीने अन्न भी बनाया। 'ईश्वर कहाँ है ?' यह पूछनेपर वृद्ध लोग कहते हैं कि वह स्वर्गमें है, राजाओंका भी राजा है। मैडम ब्लेवैट्स्कीका कहना है कि जिस प्रकार मछली पानीके बाहर नहीं रह सकती, उसी प्रकार साधारण मनुष्य भी किसी प्रकारके धर्मके बाहर नहीं रह सकता।' संसारमें चेतन-अचेतन दो प्रकारके पदार्थ मिलते हैं, उनमें अचेतनसे चेतन प्रबल होता है। एक चींटी बड़े-बड़े मिट्टीके चट्टानोंको काट देती है। छोटे-छोटे कीड़े पहाड़ोंको तोड़ देते हैं। छोटा पक्षी बड़े-से-बड़े वृक्षोंको हिला देता है। वस्तुतः जहाँ चेतनता है, वहीं बल होता है। जड वस्तुएँ निर्बल होती हैं। घोड़ा गाड़ी खींचता है, गाड़ीकी अपेक्षा घोड़ा बलवान् है। जडशरीर भी चेतनके सहारे चलता है। मरे हुए हाथीसे जीवित चींटी भी बलवान् है। चेतनोंमें भी मनुष्यकी शक्ति बहुत ही प्रबल है। एक शिशु भी हाथीका नियन्त्रण करता है। सिंह-जैसा क्रूर जन्तु भी मनुष्यकी इच्छाका अनुसरण करता है। जल, वायु, बिजली आदि भूतोंपर मनुष्यका अधिकार है। रेल, तार, वायुयान आदि मनुष्य- शक्तिके ही परिचायक हैं। मनुष्य सृष्टिमें भी रद्दोबदल करता रहता है। वह समुद्रको पार कर, पहाड़-जंगलको काटकर शहर बसा देता है, नदियोंपर बड़े-बड़े पुल बाँध देता है, उनके प्रवाहको बदल देता है, स्थलोंमें जल एवं जलमें स्थल बना देता है। फिर भी विचित्र सृष्टिमें कितने ही प्राणी मनुष्यसे भी कहीं अधिक बलवान् होते हैं। गृध्रकी दृष्टि और हिरणोंके दौड़के सामने मनुष्यकी शक्ति कमजोर है। बड़े बड़े वैज्ञानिक, बलवान्, बुद्धिमान् भी महाशक्तिमान् सर्वज्ञके सामने कुछ नहीं हैं। बड़े-बड़े बलवान् अन्तमें अपने-आपको प्राकृतिक शक्तियोंके सामने नगण्य पाते हैं। वस्तुतः निश्चयके आधारपर आशा होती है और आशाके आधारपर ही प्राणीकी प्रवृत्ति होती है।