भारतकोश
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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
  • अध्याय १२६ * | ४४१ ---|---

| धातार्यमा पुलस्त्यश्च पुलहश्च प्रजापतिः।<br>उरगौ वासुकिश्चैव संकीर्णश्चैव तावुभौ॥ ३<br>तुम्बुरुर्नारदश्चैव गन्धर्वौ गायतां वरौ।<br>क्रतुस्थलाप्सराश्चैव तथा वै पुञ्जिकस्थला॥ ४<br>ग्रामण्यौ रथकृत्तस्य रथौजाश्चैव तावुभौ।<br>रक्षो हेतिः प्रहेतिश्च यातुधानावुभौ स्मृतौ॥ ५<br>मधुमाधवयोर्ह्येष गणो वसति भास्करे।<br>वसन् ग्रीष्मे तु द्वौ मासौ मित्रश्च वरुणश्च वै॥ ६<br>ऋषिरत्रिर्वसिष्ठश्च नागौ तक्षकरम्भकौ।<br>मेनका सहजन्या च हाहा हूहूश्च गायकौ॥ ७<br>रथन्तरश्च ग्रामण्यौ रथकृच्चैव तावुभौ।<br>पुरुषादो वधश्चैव यातुधानौ तु तौ स्मृतौ॥ ८<br>एते वसन्ति वै सूर्ये मासयोः शुचिशुक्रयोः।<br>ततः सूर्ये पुनश्चान्या निवसन्ति स्म देवताः॥ ९<br>इन्द्रश्चैव विवस्वांश्च अङ्गिरा भृगुरेव च।<br>एलापत्रस्तथा सर्पः शङ्खपालश्च पन्नगः॥ १०<br>विश्वावसुसुषेणौ च प्रातश्चैव रथश्च हि।<br>प्रम्लोचेत्यप्सराश्चैव निम्लोचन्ती च ते उभे॥ ११<br>यातुधानस्तथा हेतिर्व्याघ्रश्चैव तु तावुभौ।<br>नभस्यनभसोरेतैर्वसन्तिश्च दिवाकरे॥ १२ | निवास करते हैं। धाता और अर्यमा दो देव, प्रजापति पुलस्त्य और प्रजापति पुलह दो ऋषि, वासुकि और संकीर्ण दो नाग, गायकोंमें श्रेष्ठ तुम्बुरु और नारद दो गन्धर्व, क्रतुस्थला और पुञ्जिकस्थला दो अप्सराएँ, रथकृत् और रथौजा दो ग्रामणी, हेति और प्रहेति दो राक्षस—इन सबका दल चैत्र और वैशाखमासमें सूर्यके रथपर निवास करता है। ग्रीष्म-ऋतुके ज्येष्ठ और आषाढ़मासमें मित्र और वरुण देवता, अत्रि और वसिष्ठ ऋषि, तक्षक और रम्भक नाग, मेनका और सहजन्या अप्सरा, हाहा और हूहू गन्धर्व, रथन्तर और रथकृत् ग्रामणी, पुरुषाद और वध राक्षस—ये सभी सूर्यके निकट रहते हैं। इसी प्रकार श्रावण और भाद्रपद-मासमें इन्द्र और विवस्वान् देवता, अङ्गिरा और भृगु ऋषि, एलापत्र और शंखपाल नामक नाग, विश्वावसु और सुषेण गन्धर्व, प्रात और रथ नामक ग्रामणी, प्रम्लोचा और निम्लोचन्ती अप्सरा तथा हेति और व्याघ्र राक्षस—ये सभी सूर्यके रथपर निवास करते हैं॥ १—१२॥ | | मासौ द्वौ देवताः सूर्ये वसन्ति च शरद्ऋतौ।<br>पर्जन्यश्चैव पूषा च भरद्वाजः सगौतमः॥ १३<br>चित्रसेनश्च गन्धर्वस्तथा वा सुरुचिश्च यः।<br>विश्वाची च घृताची च उभे ते पुण्यलक्षणे॥ १४<br>नागश्चैरावतश्चैव विश्रुतश्च धनञ्जयः।<br>सेनजिच्च सुषेणश्च सेनानीर्ग्रामणीस्तथा॥ १५<br>आपो वातश्च द्वावेतौ यातुधानावुभौ स्मृतौ।<br>वसन्ते ते च वै सूर्ये मासयोश्च त्विषोर्जयोः॥ १६<br>हैमन्तिकौ च द्वौ मासौ निवसन्ति दिवाकरे।<br>अंशो भगश्च द्वावेतौ कश्यपश्च क्रतुश्च तौ॥ १७<br>भुजङ्गश्च महापद्मः सर्पः कर्कोटकस्तथा।<br>चित्रसेनश्च गन्धर्वः पूर्णायुश्चैव गायनौ॥ १८<br>अप्सराः पूर्वचित्तिश्च तथैव ह्युर्वशी च या।<br>तक्षावारिष्टनेमिश्च सेनानीर्ग्रामणीश्च तौ॥ १९ | शरद्-ऋतुमें भी दो मासतक देवगण सूर्यके निकट वास करते हैं। पर्जन्य और पूषा देवता, भरद्वाज और गौतम ऋषि, चित्रसेन और सुरुचि गन्धर्व, शुभ लक्षणोंवाली विश्वाची और घृताची अप्सराएँ, ऐरावत और सुप्रसिद्ध धनञ्जय नाग, सेनजित् और सेनानायक सुषेण ग्रामणी, आप और वात नामक दो राक्षस—ये सभी आश्विन और कार्तिकमासमें सूर्यके रथपर अधिरोहण करते हैं। हेमन्त-ऋतुके दो महीने मार्गशीर्ष और पौषमें अंश और भग देवता, कश्यप और क्रतु ऋषि, महापद्म और कर्कोटक नाग, गानविद्यामें निपुण चित्रसेन और पूर्णायु गन्धर्व, पूर्वचित्ति और उर्वशी अप्सरा, तक्षाव और अरिष्टनेमि नामक सेनापति एवं ग्रामणी, |

४४२* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विद्युत्सूर्यश्च तावुग्रौ यातुधानौ तु तौ स्मृतौ।<br>सहे चैव सहस्ये च वसन्त्येते दिवाकरे॥ २०<br><br>ततस्तु शिशिरे चापि मासयोर्निवसन्ति ते।<br>त्वष्टा विष्णुर्जमदग्निर्विश्वामित्रस्तथैव च॥ २१<br><br>काद्रवेयौ तथा नागौ कम्बलाश्वतरावुभौ।<br>गन्धर्वो धृतराष्ट्रश्च सूर्यवर्चाश्च तावुभौ॥ २२<br><br>तिलोत्तमाप्सराश्चैव देवी रम्भा मनोरमा।<br>ग्रामणी ऋतजिच्चैव सत्यजिच्च महाबलः॥ २३<br><br>ब्रह्मोपेतश्च वै रक्षो यज्ञोपेतस्तथैव च।<br>इत्येते निवसन्ति स्म द्वौ द्वौ मासौ दिवाकरे॥ २४विद्युत् और सूर्य नामक दो उग्र राक्षस—ये सभी सूर्यके निकट वास करते हैं। तत्पश्चात् शिशिर-ऋतुके माघ और फाल्गुनमासोंमें त्वष्टा और विष्णु देवता, जमदग्नि और विश्वामित्र ऋषि, कद्रूके पुत्र कम्बल और अश्वतर नाग, धृतराष्ट्र और सूर्यवर्चा गन्धर्व, तिलोत्तमा और मनोहारिणी रम्भा देवी अप्सरा, महाबली ऋतजित् और सत्यजित् ग्रामणी, ब्रह्मोपेत और यज्ञोपेत राक्षस—ये सभी सूर्यके रथपर अधिरूढ़ होते हैं। इस प्रकार प्रत्येक दो मासके अन्तरसे ये सभी क्रमशः सूर्यके निकट निवास करते हैं॥ १३—२४॥
स्थानाभिमानिनो ह्येते गणां द्वादश सप्तकाः।<br>सूर्यमापादयन्त्येते तेजसा तेज उत्तमम्॥ २५<br><br>ग्रथितैस्तु वचोभिश्च स्तुवन्ति ऋषयो रविम्।<br>गन्धर्वाप्सरसश्चैव गीतनृत्यैरुपासते॥ २६<br><br>विद्याग्रामणिनो यक्षाः कुर्वन्त्याभीषुसंग्रहम्।<br>सर्पाः सर्पन्ति वै सूर्ये यातुधानानुयान्ति च॥ २७<br><br>वालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयाद् रविम्।<br>एतेषामेव देवानां यथावीर्यं यथातपः॥ २८<br><br>यथायोगं यथाधर्मं यथातत्त्वं यथाबलम्।<br>तपत्यसौ यथा सूर्यस्तेषां सिद्धिश्च तेजसा॥ २९<br><br>भूतानामशुभं सर्वं व्यपोहति स्वतेजसा।<br>मानवानां शुभैर्होतैर्हियते दुरितं तु वै॥ ३०<br><br>दुरितं हि प्रचाराणां व्यपोहन्ति क्वचित् क्वचित्।<br>एते सहैव सूर्येण भ्रमन्ति सानुगा दिवि॥ ३१<br><br>तपन्तश्च जपन्तश्च ह्लादयन्तश्च वै प्रजाः।<br>गोपायन्ति स्म भूतानि ईहन्ते ह्यनुकम्पया॥ ३२<br><br>स्थानाभिमानिनां ह्येतत्स्थानं मन्वन्तरेषु वै।<br>अतीतानां गतानां च वर्तन्ते साम्प्रतं च ये॥ ३३<br><br>एवं वसन्ति वै सूर्ये सप्तकास्ते चतुर्दश।<br>चतुर्दशेषु वर्तन्ते गणा मन्वन्तरेषु वै॥ ३४ये बारह सप्तक (देव, ऋषि, नाग, गन्धर्व, अप्सरा, ग्रामणी और राक्षस) गण अपने-अपने स्थानके अभिमानी देवता हैं। ये अपने तेजसे सूर्यके तेजको उत्कृष्ट कर देते हैं। वहाँ ऋषिगण स्वरचित वचनों—स्तोत्रोंद्वारा सूर्यका स्तवन करते हैं तथा गन्धर्व और अप्सराएँ नाच-गानके द्वारा सूर्यकी उपासना करती हैं। सूत-विद्यामें निपुण यक्षगण (सूर्यके रथके अश्वोंकी) बागडोर सँभालते हैं। सर्प सूर्यमण्डलमें इधर-उधर दौड़ते तथा राक्षसगण सूर्यका अनुगमन करते हैं। बालखिल्य नामक ऋषि उदयकालसे ही सूर्यको घेरकर अस्ताचलको ले जाते हैं। इन देवताओंका जैसा पराक्रम, तपोबल, योगबल, धर्म, तत्त्व और शारीरिक बल होता है, उसीके अनुसार उनके तेजसे समृद्ध हुए सूर्य तपते हैं। वे अपने तेजसे प्राणियोंके सभी अमङ्गलको दूर कर देते हैं तथा इन्हीं मङ्गलमय उपादानोंद्वारा मनुष्योंके पापका अपहरण करते हैं। ये सहायकगण अपनी ओर अभिमुख होनेवालोंके पापको नष्ट कर देते हैं और अपने अनुचरोंसहित आकाशमण्डलमें सूर्यके साथ ही भ्रमण करते हैं। ये जप-तप करके सभी प्रजाओंको प्रसन्न रखते हुए उनकी रक्षा करते हैं और दयावश सभी प्राणियोंकी शुभ-कामना करते हैं। भूत, भविष्य और वर्तमानकालके इन स्थानाभिमानियोंका वह स्थान प्रत्येक मन्वन्तरमें वर्तमान रहता है। इस प्रकार दो-दोके हिसाबसे उन सातों गणोंके चौदह देवता सूर्यके रथपर निवास करते हैं और चौदहों मन्वन्तरोंतक वर्तमान रहते हैं।
* अध्याय १२६ *४४३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ग्रीष्मे हिमे च वर्षासु मुञ्चमानो<br>घर्मं हिमं च वर्षं च दिनं निशां च।<br>गच्छत्यसावनुदिनं परिवृत्य रश्मीन्<br>देवान् पितॄंश्च मनुजांश्च सुतर्पयन् वै॥ ३५<br><br>शुक्ले तु पूर्णो तदहःक्रमेण<br>तं कृष्णपक्षे विबुधाः पिबन्ति।<br>पीतं तु सोमं द्विकलावशिष्टं<br>सुवृष्टये रश्मिषु रक्षितं तु॥ ३६<br><br>स्वधामृतं तत्पितरः पिबन्ति<br>देवाश्च सौम्याश्च तथैव कव्यम्।<br>सूर्येण गोभिर्हि विवर्धिताभि-<br>रद्भिः पुनश्चैव समुच्छ्रिताभिः॥ ३७<br><br>वृष्ट्याभिवृष्टाभिरथौषधीभि-<br>र्मर्त्या अथान्नेन क्षुधं जयन्ति।<br>तृप्तिश्चाप्यमृतेनार्धमासं सुराणां<br>मासं स्वाहाभिः स्वधया पितॄणाम्॥ ३८इस प्रकार सूर्य ग्रीष्म, हेमन्त और वर्षा-ऋतुओंमें क्रमशः अपनी किरणोंको परिवर्तित कर धूप, हिम और जलकी वर्षा करके देवताओं, पितरों और मानवोंको भलीभाँति तृप्त करते हुए प्रतिदिन रात-दिन चलते रहते हैं। जो शुद्ध अमृत उत्तम वृष्टिके लिये सूर्यकी किरणोंमें सुरक्षित रहता है, उसे देवगण प्रत्येक मासमें चन्द्रमामें प्रविष्ट होनेपर शुक्ल एवं कृष्णपक्षमें दिनके क्रमसे काल-क्षयके अनुसार पीते हैं। सभी देवगण तथा पितर कव्यस्वरूप उस अमृत चन्द्रमाका पान करते हैं। मानवगण सूर्यकी किरणोंद्वारा पोषित, जलद्वारा परिवर्धित और वृष्टिद्वारा सिंचित ओषधियों और अन्नसे अपनी क्षुधा शान्त करते हैं। उस स्वाहारूप अमृतसे देवताओंकी तृप्ति पंद्रह दिनतक तथा उस स्वधारूप अमृतसे पितरोंकी तृप्ति एक महीनेतक होती है। मनुष्य अन्नरूप अमृतसे सर्वदा जीवन धारण करते हैं। वह अमृत सूर्यकी किरणोंमें स्थित है, अतः सूर्य अपनी किरणोंद्वारा सबका पालन करते हैं॥ २५-३८॥
अन्नेन जीवन्त्यनिशं मनुष्याः<br>सूर्यः श्रितं तद्धि बिभर्ति गोभिः।<br>इत्येष एकचक्रेण सूर्यस्तूर्णं प्रसर्पति।<br>तत्र तैरक्रमैश्चैः सर्पतेऽसौ दिनक्षये॥ ३९<br><br>हरिर्हरिद्भिर्वह्यते तुरङ्गमैः<br>पिबत्यथाऽपो हरिभिः सहस्रधा।<br>ततः प्रमुञ्चत्यथ ताश्च यो हरिः<br>संमुह्यमानो हरिभिस्तुरङ्गमौः॥ ४०<br><br>अहोरात्रं रथेनासावेकचक्रेण वै भ्रमन्।<br>सप्तद्वीपसमुद्रांश्च सप्तभिः सप्तभिर्द्रुतम्॥ ४१<br><br>छन्दोरूपैश्च तैरश्वैर्यत्रचक्रं ततः स्थितिः।<br>कामरूपः सकृद्युक्तैः कामगैस्तैर्मनोजवैः॥ ४२<br><br>हरितैरव्यथैः पिङ्गैरैश्चैर्ब्रह्मवादिभिः।<br>बाह्यतोऽनन्तरं चैव मण्डलं दिवसः क्रमात्॥ ४३<br><br>कल्पादौ सम्प्रयुक्ताश्च वहन्त्याभूतसम्प्लवम्।<br>आवृतो वालखिल्यैश्च भ्रमते रात्र्यहानि तु॥ ४४इस प्रकार सूर्य अपने एक पहियेवाले रथसे शीघ्रतापूर्वक गमन करते हैं। दिनके व्यतीत हो जानेपर भी वे उन सात अश्वोंद्वारा चलते ही रहते हैं। हरे रंगवाले घोड़े सूर्यको वहन करते हैं। सूर्य अपनी किरणोंद्वारा हजारों प्रकारसे जल खींचते हैं। पुनः हरे रंगवाले घोड़ोंद्वारा वहन किये जाते हुए वे ही सूर्य उस जलको बरसाते हैं। इस तरह सूर्य अपने एक पहियेवाले रथसे दिनके क्रमानुसार मण्डलके बाहर और भीतर होते हुए सात-सातके क्रमसे सातों समुद्रोंमें दिन-रात वेगपूर्वक घूमते रहते हैं। जहाँ वह चक्र पहुँचता है, वहीं उनकी स्थिति मानी जाती है। उनके रथके (समुद्रसे उत्पन्न श्यामकर्ण) अश्व छन्दःस्वरूप, स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, एक ही बार जुते हुए इच्छानुरूप गमन करनेवाले और मनके समान शीघ्रगामी हैं। उनके शरीरका रंग हरा और पीला है। उन्हें थकावट नहीं होती। वे शक्तिशाली और ब्रह्मवादी हैं। वे कल्पके आरम्भमें रथमें जोते जाते हैं और प्रलय-पर्यन्त उस रथको वहन करते हैं। इस प्रकार वालखिल्य ऋषियोंद्वारा समावृत सूर्य रात-दिन भ्रमण करते रहते हैं।

४४४ | * मत्स्यपुराण *


संस्कृतहिन्दी
ग्रथितैः स्ववचोभिश्च स्तूयमानो महर्षिभिः ।<br>सेव्यते गीतनृत्यैश्च गन्धर्वाप्सरसां गणैः ॥ ४५<br>पतंगः पतगैरश्वैर्भ्राम्यमाणो दिवस्पतिः ।<br>वीथ्याश्रयाणि चरति नक्षत्राणि तथा शशी ॥ ४६<br>ह्रासवृद्धी तथैवास्य रश्मयः सूर्यवत् स्मृताः ।<br>त्रिचक्रोभयतोऽश्वश्च विज्ञेयः शशिनो रथः ॥ ४७<br>अपां गर्भसमुत्पन्नो रथः साश्वः ससारथिः ।<br>सहारैस्तैस्त्रिभिश्चक्रैर्युक्तः शुक्लैर्हयोत्तमैः ॥ ४८<br>दशभिस्तुरगैर्दिव्यैरसङ्गेस्तन्मनोजवैः ।<br>सकृद्युक्ते रथे तस्मिन् वहन्तस्त्वायुगक्षयम् ॥ ४९<br>संगृहीता रथे तस्मिञ्श्वेताश्वक्षुःश्रवाश्च वै ।<br>अश्वास्तमेकवर्णास्ते वहन्ते शङ्खवर्चसः ॥ ५०<br>अजश्च त्रिपथश्चैव वृषो वाजी नरो हयः ।<br>अंशुमान् समधातुश्च हंसो व्योममृगस्तथा ॥ ५१<br>इत्येते नामभिश्चैव दश चन्द्रमसो हयाः ।<br>एवं चन्द्रमसं देवं वहन्ति स्मायुगक्षयम् ॥ ५२उस समय महर्षिगण स्वरचित वचनोंद्वारा सूर्यकी स्तुति करते हैं। गन्धर्वों और अप्सराओंका समुदाय नाच-गानद्वारा सूर्यकी सेवा करता है। दिनके स्वामी सूर्य पक्षियोंके समान वेगशाली अश्वोंद्वारा सदा भ्रमण कराये जाते हुए नक्षत्रसम्बन्धिनी वीथियोंका आश्रय लेकर भ्रमण करते हैं। इसी प्रकार चन्द्रमा भी चक्कर लगाते हैं। इनकी भी ह्रास-वृद्धि और किरणें सूर्यके समान ही बतलायी गयी हैं। चन्द्रमाका रथ तीन पहियेका है और उसमें दोनों ओर घोड़े जुते रहते हैं। घोड़े-सारथि और हारसे सुशोभित तथा तीन पहियोंसे युक्त रथके साथ चन्द्रदेव (समुद्र मन्थनके समय) जलके मध्यसे प्रकट हुए थे। उसमें श्वेत रंगवाले तथा दस उत्तम घोड़े जुते हुए थे। वे अश्व दिव्य, अनुपम और मनके समान वेगशाली हैं। वे एक बार उस रथमें जोत दिये जानेपर युगप्रलयपर्यन्त उस रथको वहन करते हैं। उस रथमें जुते हुए चक्षुःश्रवानामक घोड़े चन्द्रमाको वहन करते हैं, उनके नेत्र और कान भी श्वेत रंगके हैं। वे सभी शङ्खके समान उज्ज्वल एक ही रंगके हैं। चन्द्रमाके उन दस अश्वोंका नाम अज, त्रिपथ, वृष, वाजी, नर, हय, अंशुमान्, सप्तधातु, हंस और व्योममृग है। इस प्रकार वे अश्व युगप्रलयपर्यन्त चन्द्रदेवको वहन करते हैं। चन्द्रमा पितरोंसहित देवताओंद्वारा घिरे हुए गमन करते हैं॥ ३९—५२ १/२ ॥
देवैः परिवृतः सोमः पितृभिः सह गच्छति ।<br>सोमस्य शुक्लपक्षादौ भास्करे परतः स्थिते ॥ ५३<br>आपूर्यते परो भागः सोमस्य तु अहःक्रमात् ।<br>ततः पीतक्षयं सोमं युगपद्ध्यापयन् रविः ॥ ५४<br>पीतं पञ्चदशाहं च रश्मिनैकेन भास्करः ।<br>आपूरयन् प्रददौ तेन भागं भागमहःक्रमात् ॥ ५५<br>सुषुम्नाप्यायमानस्य शुक्ले वर्धन्ति वै कलाः ।<br>तस्माद्ध्वसन्ति वै कृष्णे शुक्ले ह्याप्याययन्ति च ॥ ५६<br>इत्येवं सूर्यवीर्येण चन्द्रस्याप्यायते तनुः ।<br>पौर्णमास्यां प्रदृश्येत शुक्लः सम्पूर्णमण्डलः ॥ ५७<br>एवमाप्यायते सोमः शुक्लपक्षेष्वहःक्रमात् ।<br>ततो द्वितीयाप्रभृति बहुलस्य चतुर्दशी ॥ ५८<br>अपां सारमयस्येन्दो रसमात्रामकस्य च ।<br>पिबन्त्यम्बुमयं देवा मधु सौम्यं तथामृतम् ॥ ५९<br>सम्भृतं त्वर्धमासेन ह्यमृतं सूर्यतेजसा ।<br>भक्षार्थमागताः सोमं पौर्णमास्यामुपासते ॥ ६०शुक्लपक्षके प्रारम्भमें सूर्यके परभागमें स्थित होनेपर चन्द्रमाका परभाग दिनके क्रमसे पूर्ण होता है। उस समय (देवताओंद्वारा अमृत) पी लेनेसे क्षीण हुए चन्द्रमाको सूर्य एक ही बारमें पूर्ण कर देते हैं। इस प्रकार पंद्रह दिनोंतक देवताओंद्वारा चूसे गये चन्द्रमाके एक-एक भागको सूर्य अपनी एक ही किरणद्वारा दिनके क्रमसे परिपूर्ण करते रहते हैं। सूर्यकी सुषुम्ना नामक किरणद्वारा परिवर्धित चन्द्रमाकी कलाएं शुक्लपक्षमें वृद्धिको प्राप्त होती हैं तथा कृष्णपक्षमें क्षीण हो जाती हैं। पुनः शुक्लपक्षमें वे बढ़ती जाती हैं। इस प्रकार सूर्यके पराक्रमसे चन्द्रमाका शरीर वृद्धिंगत होता है और धीरे-धीरे पूर्णिमा तिथिको पूर्ण होकर सम्पूर्ण मण्डल श्वेत वर्णका दिखायी पड़ता है। इस प्रकार शुक्लपक्षमें दिनके क्रमसे चन्द्रमा वृद्धिको प्राप्त होते हैं। तदनन्तर जलके सारभूत एवं रसमात्रात्मक चन्द्रमाके मधु-सदृश जलमय अमृतको देवगण कृष्णपक्षकी द्वितीयासे लेकर चतुर्दशी तिथितक पान करते हैं। पंद्रह दिनोंतक सूर्यके तेजसे सञ्चित किये हुए अमृतको खानेके लिये पूर्णिमा तिथिको चन्द्रमाके निकट आये हुए देवगण

* अध्याय १२६ * | ४४५

| एकरात्रं सुराः सार्धं पितृभिर्ऋषिभिश्च वै।<br>सोमस्य कृष्णपक्षादौ भास्कराभिमुखस्य वै॥ ६१<br>प्रक्षीयते परो ह्यात्मा पीयमानकलाक्रमात्।<br>त्रयश्च त्रिंशता सार्धं त्रीणि चैव शतानि तु॥ ६२<br>त्रयस्त्रिंशत् सहस्राणि देवाः सोमं पिबन्ति वै।<br>इत्येवं पीयमानस्य कृष्णा वर्धन्ति ताः कलाः॥ ६३<br>क्षीयन्ते च ततः शुक्लाः कृष्णा ह्याप्याययन्ति च।<br>एवं दिनक्रमात् पीते देवैश्चापि निशाकरे॥ ६४<br>पीत्वार्धमासं गच्छन्ति अमावास्यां सुराश्च ते।<br>पितरश्चोपतिष्ठन्ति ह्यमावास्यां निशाकरम्॥ ६५<br>ततः पञ्चदशे भागे किञ्चिच्छेषे निशाकरे।<br>ततोऽपराह्ने पितरो यदन्यदिवसे पुनः॥ ६६<br>पिबन्ति द्विकलां कालं शिष्टास्तस्य तु याः कलाः।<br>विनिःसृष्टं त्वमावास्यां गभस्तिभ्यः स्वधामृतम्॥ ६७<br>अर्धमाससमाप्तौ तु पीत्वा गच्छन्ति तेऽमृतम्।<br>सौम्या बर्हिषदश्चैव अग्निष्वात्ताश्च ये स्मृताः॥ ६८<br>काव्याश्चैव तु ये प्रोक्ताः पितरः सर्व एव ते।<br>संवत्सरास्तु वै काव्याः पञ्चाब्दा ये द्विजैः स्मृताः॥ ६९<br>सौम्यास्तुऋतवो ज्ञेयाः मासा बर्हिषदस्तथा।<br>अग्निष्वात्तास्तथा पक्षाः पितृसर्गस्थिता द्विजाः॥ ७०<br>पितृभिः पीयमानायां पञ्चदश्यां तु वै कलाम्।<br>यावच्च क्षीयते तस्माद् भागःपञ्चदशस्तु सः॥ ७१<br>अमावास्यां तथा तस्य अन्तरा पूर्यते परः।<br>वृद्धिक्षयौ वै पक्षादौ षोडश्यां शशिनः स्मृतौ।<br>एवं सूर्यनिमित्ते ते क्षयवृद्धी निशाकरे॥ ७२ | पितरों और ऋषियोंके साथ एक राततक चन्द्रमाकी उपासना करते हैं। कृष्णपक्षके प्रारम्भमें सूर्यके सम्मुख उपस्थित चन्द्रमाका मन पान की जाती हुई कलाओंके क्रमसे अत्यन्त क्षीण हो जाता है। उस समय तैंतीस हजार तीन सौ तैंतीस देवता चन्द्रमाकी अमृतकलाको पीते* हैं। इस प्रकार पान किये जाते हुए चन्द्रमाकी वे कृष्णपक्षीय कलाएँ (शुक्लपक्षमें) बढ़ती हैं और शुक्लपक्षीय कलाएँ (कृष्णपक्षमें) घटती हैं। पुनः कृष्णपक्षीय कलाएँ बढ़ती हैं। (यही शुक्लपक्ष और कृष्णपक्षमें बढ़ने-घटनेका क्रम है।)॥ ५३—६३ ½ ॥<br><br>इस प्रकार दिनके क्रमसे देवगण पंद्रह दिनतक चन्द्रमाके अमृतका पान करते हैं और अमावास्या तिथिको वे वहाँसे चले जाते हैं। तब पितृगण अमावास्या तिथिमें चन्द्रमाके पास आते हैं। तदनन्तर चन्द्रमाके पंद्रहवें भागके कुछ शेष रहनेपर वे पितर दूसरे दिन अपराह्नके समय उन सभी अवशिष्ट कलाओंको केवल दो कला समयतक ही पान करते हैं। अमावास्यातक पंद्रह दिन पर्यन्त चन्द्रमाकी किरणोंसे निकलते हुए स्वधारूपी अमृतका पानकर पितृगण अमर हो जाते हैं। वे सभी पितर सौम्य, बर्हिषद, अग्निष्वात्त और काव्य नामसे कहे गये हैं। पाँच वर्षके कार्यकालवाले जो पितर हैं, जिन्हें द्विजगण काव्य कहते हैं, वर्ष हैं। सौम्य नामक पितरोंको पक्ष ऋतु जानना चाहिये। दो बर्हिषद् और अग्निष्वात्तको मास—ये तीनों पितृलोकमें निवास करनेवाले द्विज हैं। पूर्णिमा तिथिको पितरोंद्वारा पान की जाती हुई कलाका जितना अंश क्षीण होता है, वह पंद्रहवाँ भाग है। अमावास्याके बाद चन्द्रमाका रिक्त भाग पूर्ण होता है। चन्द्रमाकी वृद्धि और क्षय दोनों पक्षोंके प्रारम्भमें ही माना गया है, उसे सोलहवीं कला कहते हैं। इस प्रकार चन्द्रमाकी क्षय-वृद्धि सूर्यके निमित्तसे ही होती है॥ ६४—७२॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे सूर्यादिगमनं नाम षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें सूर्यादिगमन नामक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२६॥


* देवताओंद्वारा चन्द्रकला-पानका वर्णन—कालिदासादिके रघुवंश (५।१६) के—‘पर्यायपीतस्य सुरैर्हिमांशोः’ आदिमें बड़े सरस ढंगसे किया गया है। हेमाद्रि आदि व्याख्याताओंने इसकी—‘प्रथमां पिबते वह्निर्द्वितीयां पिबते रविः’ आदिसे व्याख्या भी सुन्दर की है। पर वस्तुतः कालिदास तथा भर्तृहरि के ‘कत्वशेषश्चन्द्रः’ आदिका मूलाधार मत्स्यपुराणका यह प्रकरण ही दीखता है।

१२९- त्रिपुर-निर्माणका वर्णन

४४६ * मत्स्यपुराण *


एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय

ग्रहोंके रथका वर्णन और ध्रुवकी प्रशंसा

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
ताराग्रहाणां वक्ष्यामि स्वर्भानोस्तु रथं पुनः।<br>अथ तेजोमयः शुभ्रः सोमपुत्रस्य वै रथः॥ १ऋषियो! अब मैं (ग्रहकक्षानुसार बुधादि) ग्रहों, नक्षत्रों और राहुके रथका वर्णन कर रहा हूँ। सोमपुत्र बुधका रथ उज्ज्वल एवं तेजोमय है। उसमें वायुके समान वेगशाली पीले रंगके दस घोड़े जोते जाते हैं। उनके नाम हैं—श्वेत, पिशङ्ग, सारङ्ग, नील, पीत, विलोहित, कृष्ण, हरित, पृषत और पृश्नि। इन्हीं महान् भाग्यशाली, अनुपम एवं वायुसे उत्पन्न दस घोड़ोंसे वह रथ युक्त है। इसके बाद मङ्गलका रथ सुवर्णनिर्मित बतलाया जाता है। वह रथके सम्पूर्ण आठों अङ्गोंसे संयुक्त है तथा लाल रंगवाले आठ घोड़ोंसे युक्त है। उसपर अग्निसे प्रकट हुआ ध्वज फहराता रहता है। उसपर सवार होकर किशोरावस्थाके मङ्गल कभी सीधी एवं कभी वक्र गतिसे विचरण करते हैं। अङ्गिराके पुत्र देवाचार्य विद्वान् बृहस्पति पीले रंगके तथा वायुके-से वेगशाली आठ दिव्य अश्वोंसे जुते हुए सुवर्णमय रथपर चलते हैं। वे एक राशिपर एक वर्षतक रहते हैं, इसलिये इस रथके द्वारा स्वाधिष्ठित राशिकी दिशाकी ओर (दोनों गतियों)-से अपने वर्गसहित जाते हैं। शुक्र भी अपने वेगशाली रथपर आरूढ़ होकर भ्रमण करते हैं। उनके रथमें अग्निके समान रंगवाले आठ घोड़े जुते रहते हैं और वह ध्वजाओंसे सुशोभित रहता है। शनैश्चर अपने लोहनिर्मित रथपर सवार होकर चलते हैं। उसमें वायुतुल्य वेगशाली एवं बलवान् घोड़े जुते रहते हैं। राहुका रथ तमोमय है। उसे कवच आदिसे सुसज्जित वायुके समान वेगवाले काले रंगके आठ घोड़े खींचते हैं। सूर्यके भवनमें निवास करनेवाला वह राहु पूर्णिमा आदि पर्वोंमें चन्द्रमाके पास चला जाता है और अमावास्या आदि पर्वोंमें चन्द्रमाके पाससे सूर्यके निकट लौट आता है। इसी प्रकार केतुके रथमें भी वायुके समान शीघ्रगामी आठ घोड़े जोते जाते हैं। उनके शरीरकी कान्ति पुआलके धुँएके सदृश है। वे दुबले-पतले शरीरवाले और बड़े भयंकर हैं। ये सभी वायुरूपी रस्सीसे ध्रुवके साथ सम्बद्ध हैं। इस प्रकार मैंने ग्रहोंके रथोंके साथ-साथ घोड़ोंका वर्णन कर दिया॥ १—१२॥
युक्तो हयैः पिशङ्गैस्तु दशभिर्वातरंहसैः।<br>श्वेतः पिशङ्गः सारङ्गो नीलः पीतो विलोहितः॥ २
कृष्णश्च हरितश्चैव पृषतः पृश्निरैव च।<br>दशभिस्तु महाभागैरुत्तमैर्वातसम्भवैः॥ ३
ततो भौमरथश्चापि ह्यष्टाङ्गः काञ्चनः स्मृतः।<br>अष्टभिर्लोहितैरश्वैः सध्वजैरग्निसम्भवैः।<br>सर्प तेऽसौ कुमारो वै ऋजुवक्रानुवक्रगः॥ ४
अतश्चाङ्गिरसो विद्वान् देवाचार्यो बृहस्पतिः।<br>शोणैरश्वैश्च रौक्मेण स्यन्दनेन विसर्पति॥ ५
युक्तेनावाजिभिर्दिव्यैरष्टाभिर्वातरंहसैः ।<br>अब्दं वसति यो राशौ सवर्णस्तेन गच्छति॥ ६
युक्तेनाष्टाभिरश्वैश्च सध्वजैरग्निसंनिभैः।<br>रथेन क्षिप्रवेगेन भार्गवस्तेन गच्छति॥ ७
ततः शनैश्चरोऽप्यश्वैः सबलैर्वातरंहसैः।<br>कार्ष्णायसं समारुह्य स्यन्दनं यात्यसौ शनिः॥ ८
स्वर्भानोस्तु यथान्वाश्वाः कृष्णा वै वातरंहसः।<br>रथं तमोमयं तस्य वहन्ति स्म सुदर्शिताः॥ ९
आदित्यनिलयो राहुः सोमं गच्छति पर्वसु।<br>आदित्यमेति सोमाच्च तमसोऽन्तेषु पर्वसु॥ १०
ततः केतुमतस्त्वश्वा अष्टौ ते वातरंहसः।<br>पलालधूमवर्णाभाः क्षामदेहाः सुदारुणाः॥ ११
एते वाहा ग्रहाणां वै मया प्रोक्ता रथैः सह।<br>सर्वे ध्रुवे निबद्धास्ते निबद्धा वातरश्मिभिः॥ १२
* अध्याय १२७ *४४७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एते वै भ्राम्यमाणास्ते यथायोगं वहन्ति वै।<br>वायव्याभिरदृश्याभिः प्रबद्धा वातरश्मिभिः॥ १३<br><br>परिभ्रमन्ति तद्बद्धाश्चन्द्रसूर्यग्रहा दिवि।<br>यावत्तमनुपर्यन्ति ध्रुवं वै ज्योतिषां गणः॥ १४<br><br>यथा नद्युदके नौस्तु उदकेन सहोह्यते।<br>तथा देवगृहाणि स्युरुह्यन्ते वातरंहसा।<br>तस्माद्यानि प्रगृह्यन्ते व्योम्नि देवगृहा इति॥ १५<br><br>यावन्त्यश्चैव ताराः स्युस्तावन्तोऽस्य मरीचयः।<br>सर्वा ध्रुवनिबद्धास्ता भ्रमन्त्यो भ्रामयन्ति च॥ १६<br><br>तैलपीडाकरं चक्रं भ्रमद् भ्रामयते यथा।<br>तथा भ्रमन्ति ज्योतींषि वातबद्धानि सर्वशः॥ १७<br><br>अलातचक्रवद् यान्ति वातचक्रेरितानि तु।<br>यस्मात् प्रवहते तानि प्रवहस्तेन स स्मृतः॥ १८<br><br>एवं ध्रुवे नियुक्तोऽसौ भ्रमते ज्योतिषां गणः।<br>एष तारामयः प्रोक्तः शिशुमारे ध्रुवो दिवि॥ १९वायुरूपी अदृश्य रस्सियोंद्वारा बँधे हुए ये सभी अश्व भ्रमण करते हुए नियमानुसार उन रथोंको खींचते हैं। जिस प्रकार ध्रुवसे बँधे हुए सूर्य, चन्द्र आदि ग्रह गगनमण्डलमें परिभ्रमण करते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण ज्योतिर्गण ध्रुवके पीछे-पीछे घूमता है। जिस प्रकार नदीके जलमें पड़ी हुई नौका जलके साथ बहती जाती है, उसी तरह देवताओंके गृह भी वायुके वेगसे वहन किये जाते हैं, इसीलिये वे आकाशमण्डलमें देव-गृह नामसे पुकारे जाते हैं। आकाशमण्डलमें जितनी तारकाएँ हैं, उतनी ही ध्रुवकी किरणें भी हैं। ये सभी तारकाएँ ध्रुवसे संलग्न हैं, इसलिये स्वयं घूमती हुई किरणें उन्हें भी घुमाती हैं। जैसे तेल पेरनेवाला चक्र (कोल्हू) स्वयं घूमता है और अपनेसे लगी हुई सभी वस्तुओंको घुमाता है, वैसे ही वायुरूपी रस्सीसे बँधी हुई ज्योतियाँ सब ओर भ्रमण करती हैं। वातचक्रसे प्रेरित होकर घूमती हुई वे ज्योतियाँ अलातचक्र (जलती हुई बनेठी)-की भाँति प्रतीत होती हैं। चूंकि वायु उन ज्योतियोंको वहन करता है, इसलिये वह 'प्रवह' नामसे प्रसिद्ध है। इस प्रकार ध्रुवसे बँधा हुआ यह ज्योतिश्चक्र भ्रमण करता है। इसी प्रकार गगनमण्डलमें स्थित शिशुमारचक्रमें ये ध्रुव तारामय अर्थात् ताराओंसे युक्त कहे जाते हैं। दिनमें जो पाप किया जाता है, वह रात्रिमें उस चक्रको देखनेसे नष्ट हो जाता है॥ १३-१९ १/२॥
यदह्ना कुरुते पापं तं दृष्ट्वा निशि मुञ्चति।<br>शिशुमारशरीरस्था यावत्यस्तारकास्तु ताः॥ २०<br><br>वर्षाणि दृष्ट्वा जीवेत तावदेवाधिकानि तु।<br>शिशुमाराकृतिं ज्ञात्वा प्रविभागेन सर्वशः॥ २१<br><br>उत्तानपादस्तस्याथ विज्ञेयः सोत्तरा हनुः।<br>यज्ञोऽधरस्तु विज्ञेयो धर्मो मूर्धानमाश्रितः॥ २२<br><br>हृदि नारायणः साध्या अश्विनौ पूर्वपादयोः।<br>वरुणश्चार्यमा चैव पश्चिमे तस्य सक्थिनी॥ २३<br><br>शिश्रे संवत्सरो ज्ञेयो मित्रश्चापानमाश्रितः।<br>पुच्छेऽग्निश्च महेन्द्रश्च मरीचिः कश्यपो ध्रुवः॥ २४शिशुमारचक्रके शरीरमें जितनी तारकाएँ स्थित हैं, उनका दर्शन कर तथा सर्वथा शिशुमारकी आकृतिको जानकर मनुष्य उतने ही अधिक वर्षोंतक जीवित रह सकता है। उत्तानपादको उस शिशुमारचक्रका ऊपरी जबड़ा तथा यज्ञको निचला जबड़ा समझना चाहिये। धर्म उसके मस्तकपर स्थित हैं। हृदयमें नारायण और साध्यगणोंको तथा अगले पैरोंमें अश्विनीकुमारोंको जानना चाहिये। वरुण और अर्यमा उसकी पिछली जाँघें हैं। शिश्न (जननेन्द्रिय)-के स्थानपर संवत्सरको समझिये और गुदास्थानपर मित्र स्थित हैं। उसकी पूँछमें अग्नि, महेन्द्र, मरीचि, कश्यप और ध्रुव स्थित हैं।
४४८* मत्स्यपुराण *
एष तारामयः स्तम्भो नास्तमेति न वोदयम्।<br>नक्षत्रचन्द्रसूर्याश्च ग्रहास्तारागणैः सह ॥ २५<br>तन्मुखाभिमुखाः सर्वे चक्रभूता दिवि स्थिताः।<br>ध्रुवेणाधिष्ठिताश्चैव ध्रुवमेव प्रदक्षिणम् ॥ २६<br>परियान्ति सुरश्रेष्ठं मेढीभूतं ध्रुवं दिवि।<br>आग्नीध्रकाश्यपानां तु तेषां स परमो ध्रुवः ॥ २७<br>एक एव भ्रमत्येष मेरोरन्तरमूर्धनि।<br>ज्योतिषां चक्रमादाय आकर्षंस्तमधोमुखः ॥ २८<br>मेरुमालोकयन्नेव प्रतियाति प्रदक्षिणम् ॥ २९ताराओं‌द्वारा निर्मित यह स्तम्भ नक्षत्र, चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह और तारागणोंके साथ न अस्त होता है न उदय, अपितु ये सभी आकाशमें चक्रकी तरह उसके मुखकी ओर देखते हुए स्थित हैं। ये ध्रुवसे अधिकृत होकर आकाशस्थित मेढ़ीभूत सुरश्रेष्ठ ध्रुवकी ही प्रदक्षिणा करते हैं। उन आग्नीध्र तथा कश्यपके वंशमें ध्रुव ही सर्वश्रेष्ठ हैं। ये ध्रुव अकेले ही मेरुके अन्तर्वर्ती शिखरपर ज्योतिष्चक्रको साथ लेकर उसे खींचते हुए भ्रमण करते हैं। उस समय उनका मुख नीचेकी ओर रहता है। इस प्रकार वे मेरुको प्रकाशित करते हुए उसकी प्रदक्षिणा करते हैं ॥ २०—२९ ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे ध्रुवप्रशंसा नाम सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें ध्रुव-प्रशंसा नामक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १२७ ॥


एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय

देव-गृहों तथा सूर्य-चन्द्रमाकी गतिका वर्णन

ऋषय ऊचुः <br><br> यदेतद् भवता प्रोक्तं श्रुतं सर्वमशेषतः।<br>कथं देवगृहाणि स्युः कथं ज्योतींषि वर्णय ॥ १<br><br>सूत उवाच<br><br>एतत् सर्वं प्रवक्ष्यामि सूर्याचन्द्रमसोर्गतिम्।<br>यथा देवगृहाणि स्युः सूर्याचन्द्रमसोस्तथा ॥ २<br>अग्रेर्वृष्टौ रजन्यां वै ब्रह्मणाव्यक्तयोनिना।<br>अव्याकृतमिदं त्वासीन्नैशेन तमसाऽऽवृतम् ॥ ३<br>चतुर्भूतावशिष्टेऽस्मिन् ब्रह्मणा समधिष्ठिते।<br>स्वयम्भूर्भगवान्वांस्तत्र लोकतत्त्वार्थसाधकः ॥ ४<br>खद्योतरूपी विचरन्नाविर्भावं व्यचिन्तयत्।<br>ज्ञात्वाग्निं कल्पकालादावपः पृथ्वीं च संश्रिताः ॥ ५<br>स सम्भृत्य प्रकाशार्थं त्रिधा तुल्योऽभवत् पुनः।<br>पाचको यस्तु लोकेऽस्मिन् पार्थिवः सोऽग्निरुच्यते ॥ ६ऋषियोंने पूछा— सूतजी! आपने जो यह सारा विषय पूर्णरूपसे वर्णन किया है, उसे तो हमलोगोंंने सुना, परंतु देव-गृह कैसे होते हैं? (यह जाननेकी विशेष उत्कण्ठा हो रही है।) अतः आप पुनः (पूर्वकथित) ज्योतिष्चक्रका कुछ और विस्तारसे वर्णन कीजिये ॥ १ ॥<br><br>सूतजी कहते हैं— ऋषियो! अब मैं जिस प्रकार देव-गृह एवं सूर्य, चन्द्रमा और अग्निके गृह होते हैं तथा जैसी सूर्य और चन्द्रमाकी गति होती है, वह सब बतला रहा हूँ। (ब्रह्माकी) रात्रि व्यतीत होनेपर प्रातःकाल अव्यक्तयोनि ब्रह्माने देखा कि जगत्‌की कोई वस्तु दीख नहीं रही है। सारा जगत् रात्रिके अन्धकारसे आच्छन्न है। (कहीं प्रकाशका चिह्नमात्र भी अवशेष नहीं है।) ब्रह्माद्वारा अधिष्ठित इस जगत्‌में केवल चार पदार्थ अवशिष्ट थे, तब लोकोंके तत्त्वार्थको सिद्ध करनेवाले स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा खद्योत (जुगनू)-के रूपमें विचरण करते हुए प्रकाशको आविर्भूत करनेके लिये विचार करने लगे। (उस समय उन्हें स्मरण हुआ कि) कल्पकालके आदिमें अग्नि-तत्त्व जल और पृथ्वीमें सम्मिलित हो गया था। यह जानकर उन्होंने तीनोंको एकत्र कर प्रकाश करनेके लिये तीन भागोंमें विभक्त कर दिया। इस प्रकार इस लोकमें जो पाचक नामक अग्नि है,
* अध्याय १२८ *४४९

| यश्चासौ तपते सूर्ये शुचिरग्निश्च स स्मृतः।<br>वैद्युतो जाठरः सौम्यो वैद्युतश्चाप्यनिन्धनः॥ ७<br>तेजोभिश्चाप्यते कश्चित् कश्चिदेवाप्यनिन्धनः।<br>काष्ठेन्धनस्तु निर्मथ्यः सोऽद्भिः शाम्यति पावकः॥ ८<br>अर्चिष्मान्पचनोऽग्निस्तु निष्प्रभः सौम्यलक्षणः।<br>यश्चासौ मण्डले शुक्ले निरूष्मा न प्रकाशते॥ ९<br>प्रभा सौरी तु पादेन अस्तं याति दिवाकरे।<br>अग्निमाविशते रात्रौ तस्मादग्निः प्रकाशते॥ १० | उसे पार्थिव अग्नि कहते हैं। जो अग्नि सूर्यमें स्थित होकर ताप पैदा करती है, वह शुचि अग्नि कहलाती है। उदरमें स्थित अग्नि विद्युत्से उत्पन्न हुई मानी जाती है। उसे सौम्य कहते हैं। इस वैद्युताग्निका इन्धन जल है। कोई अग्नि अपने तेजसे ही बढ़ती है और कोई बिना इन्धनके भी उद्दीप्त होती है। काष्ठरूपी इन्धनसे जलनेवाली अग्निका नाम निर्मन्थ्य है। यह अग्नि जलके संयोगसे शान्त हो जाती है। पचमान अग्नि ज्वालाओंसे संयुक्त रहता है और प्रभाहीन रहना सौम्य अग्निका लक्षण है। जो श्वेत मण्डलमें स्थित रहकर ऊष्मारहित हो प्रकाशित नहीं होती, सूर्यकी वह कान्ति सूर्यके अस्त हो जानेपर अपने चतुर्थांशसे अग्निमें प्रवेश कर जाती है, इसी कारण रातमें अग्निका प्रकाश अधिक होता है॥ २-१०॥ | | उदिते तु पुनः सूर्ये ऊष्माग्नेस्तु समाविशत्।<br>पादेन तेजसश्चाग्नेस्तस्मात् संतपते दिवा॥ ११<br>प्राकाश्यं च तथौष्ण्यं च सौर्याग्नेये तु तेजसी।<br>परस्परानुप्रवेशादाप्यायेते दिवानिशम्॥ १२<br>उत्तरे चैव भूम्यर्धे तथा ह्यस्मिंस्तु दक्षिणे।<br>उत्तिष्ठति पुनः सूर्ये रात्रिराविशते ह्यपः॥ १३<br>तस्मात् ताम्रा भवन्त्यापो दिवारात्रिप्रवेशनात्।<br>अस्तं गते पुनः सूर्ये अहो वै प्रविशत्यपः॥ १४<br>तस्मान्नक्तं पुनः शुक्ला ह्यापो दृश्यन्ति भासुराः।<br>एतेन क्रमयोगेन भूम्यर्धे दक्षिणोत्तरे॥ १५<br>उदयास्तमये चात्र ह्यहोरात्रं विशत्यपः।<br>यश्चासौ तपते सूर्यः सोऽपः पिबति रश्मिभिः॥ १६<br>सहस्त्रपादस्त्वेषोऽग्नी रक्तकुम्भनिभस्तु सः।<br>आदत्ते स तु नाडीनां सहस्त्रेण समन्ततः॥ १७<br>अपो नदीसमुद्रेभ्यो हृदकूपेभ्य एव च।<br>तस्य रश्मिसहस्त्रेण शीतवर्षोष्णनिःस्रवः॥ १८ | पुनः सूर्योदय होनेपर अग्निकी ऊष्मा अपने तेजके चतुर्थांशसे सूर्यमें प्रविष्ट हो जाती है, इस कारण दिनमें सूर्य पूर्णरूपसे तपते हैं। प्रकाशता, उष्णता, सूर्य और अग्निका तेज—इन सबके परस्पर अनुप्रवेश करनेके कारण दिन-रातकी पूर्ति होती है। पृथ्वीके उत्तरवर्ती तथा दक्षिणवर्ती अर्धभागमें सूर्यके उदय होनेपर रात्रि पुनः जलमें प्रवेश कर जाती है। इस प्रकार दिनके समय रात्रिके जलमें प्रवेश करनेके कारण दिनमें जल लाल रंगका दीख पड़ता है। पुनः सूर्यके अस्त हो जानेपर दिन जलमें प्रवेश करता है। इसी कारण जल रातमें उज्ज्वल और चमकीला दिखायी पड़ता है। इसी क्रमसे भूमिके दक्षिणोत्तर अर्धभागमें सूर्यके उदय एवं अस्तके समय दिन और रात क्रमशः जलमें प्रवेश करते हैं। जो ये सूर्य तप रहे हैं, वे अपनी किरणोंद्वारा जलको सोखते हैं। सूर्यमें स्थित अग्निका रंग लाल रंगके घड़ेके समान है। उसमें हजारों किरणें हैं। वह अपनी सहस्रों नाड़ियोंसे नदी, समुद्र, ह्रद और कुएँसे जलको ग्रहण करता है। सूर्यकी उन्हीं हजारों किरणोंसे शीत, वर्षा और गरमीका प्रादुर्भाव होता है॥ ११-१८॥ | | तासां चतुःशतं नाड्यो वर्षन्ते चित्रमूर्तयः। | उन सहस्रों किरणोंमें विचित्र आकृतिवाली चार सौ नाड़ियाँ जलकी वर्षा करनेवाली हैं। उनमें |


* प्रकारान्तरसे इन अग्नियोंका बहुत कुछ उल्लेख अ० ५१ में भी हो चुका है। यहाँ १२६-२८तकके तीन अध्यायोंमें ग्रहोंके स्वरूप तथा उनके रथ, आयुध आदिका परिचय बहुत सुन्दर रूपमें कराया गया है। पहले ९४वें अध्यायमें भी इन ग्रहोंका स्वरूपनिरूपण हुआ है।

१३०- दानवश्रेष्ठ मयद्वारा त्रिपुरकी रचना

४५० * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चन्दनाश्चैव मेध्याश्च केतनाश्चेतनास्तथा ॥ १९<br>अमृता जीवनाः सर्वा रश्मयो वृष्टिसर्जनाः ।<br>हिमोद्भवाश्च ताभ्योऽन्या रश्मयस्त्रिंशतः स्मृताः ।<br>चन्द्रताराग्रहैः सर्वैः पीता भानोर्गभस्तयः ॥ २०<br>एता मध्यास्तथान्याश्च ह्रादिन्यो हिमसर्जनाः ।<br>शुक्लाश्च ककुभश्चैव गावो विश्वभृतश्च याः ॥ २१<br>शुक्लास्ता नामतः सर्वास्त्रिंशत्या घर्मसर्जनाः ।<br>सम्बिभ्रति हि ताः सर्वा मनुष्यान् देवताः पितॄन् ॥ २२<br>मनुष्यानौषधीभिश्च स्वधया च पितॄनपि ।<br>अमृतेन सुरान् सर्वान् सततं परितर्पयन् ॥ २३<br>वसन्ते चैव ग्रीष्मे च शनैः संतपते त्रिभिः ।<br>वर्षासु च शरद्येवं चतुर्भिः सम्प्रवर्षति ॥ २४<br>हेमन्ते शिशिरे चैव हिमोत्सर्गस्त्रिभिः पुनः ।<br>औषधीषु बलं धत्ते सुधां च स्वधया पुनः ॥ २५<br>सूर्योऽमरत्वममृते त्रयस्त्रिषु नियच्छति ।<br>एवं रश्मिसहस्रं तु सौरं लोकर्थिसार्थकम् ॥ २६<br>भिद्यते ऋतुमासाद्य जलशीतोष्णनिःस्रवम् ।<br>इत्येवं मण्डलं शुक्लं भास्वरं लोकसंज्ञितम् ॥ २७<br>नक्षत्रग्रहसोमानां प्रतिष्ठा योनिरैव च ।<br>ऋक्षचन्द्रग्रहाः सर्वे विज्ञेयाः सूर्यसम्भवाः ॥ २८चन्दना, मेध्या, केतना, चेतना, अमृता और जीवना—ये सभी किरणें विशेषरूपसे वृष्टि करनेवाली हैं। सूर्यकी तीन सौ किरणें हिमसे उत्पन्न हुई कही जाती हैं। उन्हें चन्द्रमा, तारा और सभी ग्रह पीते रहते हैं। ये मध्य नाड़ियाँ कहलाती हैं। इनके अतिरिक्त अन्य ह्रादिनी आदि नाड़ियाँ हिमकी सृष्टि करनेवाली हैं। शुक्ला, ककुभ, गौ और विश्वभृत् नामकी जो नाड़ियाँ हैं, वे सभी शुक्ला नामसे कही जाती हैं। इनकी भी संख्या तीन सौ हैं। ये धूपको उत्पन्न करनेवाली हैं। वे सभी मनुष्यों, देवताओं और पितरोंका भरण-पोषण करती हैं। ये किरणें ओषधियों (एवं अन्नों) द्वारा सभी मनुष्योंको, स्वधाद्वारा पितरोंको और अमृतके माध्यमसे देवताओंको सदा तृप्त करती रहती हैं। सूर्य वसन्त और ग्रीष्म-ऋतुमें शनैः-शनैः अपनी तीन सौ किरणोंसे ताप उत्पन्न करते हैं। इसी प्रकार वर्षा और शरद्-ऋतुमें चार सौ किरणोंके माध्यमसे वर्षा करते हैं। पुनः हेमन्त और शिशिर-ऋतुमें तीन सौ किरणोंद्वारा बर्फ गिराते हैं। यही सूर्य ओषधियोंमें बल, स्वधामें सुधा और अमृतमें अमरत्वका आधान करते हैं अर्थात् तीनों पदार्थोंमें तीन तरहके गुण उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार सूर्यकी ये हजारों किरणें लोगोंका प्रयोजन सिद्ध करनेवाली हैं। ऋतुओंके क्रमानुसार जलकी शीतलता और उष्णतामें परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार उदीप्त एवं श्वेत वर्णवाला वह लोकसंज्ञक मण्डल नक्षत्र, ग्रह और सोमकी प्रतिष्ठा एवं योनि है। इन सभी चन्द्र, नक्षत्र और ग्रहोंको सूर्यसे उत्पन्न हुआ जानना चाहिये॥ १९—२८॥
सुषुम्ना सूर्यरश्मिर्या क्षीणं शशिनमेधते ।<br>हरिकेशः पुरस्तात्तु यो वै नक्षत्रयोनिकृत् ॥ २९<br>दक्षिणे विश्वकर्मा तु रश्मिराप्याययद् बुधम् ।<br>विश्वावसुश्च यः पश्चाच्छुक्रयोनिश्च स स्मृतः ॥ ३०<br>संवर्धनस्तु यो रश्मिः स योनिर्लोहितस्य च ।<br>षष्ठस्तु ह्याश्वभू रश्मिर्योनिः सा हि बृहस्पतेः ॥ ३१<br>शनैश्चरं पुनश्चापि रश्मिराप्यायते सुराट् ।<br>न क्षीयन्ते यतस्तानि तस्मान्नक्षत्रता स्मृता ॥ ३२<br>क्षेत्राण्येतानि वै सूर्यमापतन्ति गभस्तिभिः ।<br>क्षेत्राणि तेषामादत्ते सूर्यो नक्षत्रता ततः ॥ ३३सूर्यकी जो सुषुम्ना नामकी किरण है, वह क्षीण हुए चन्द्रमाको पुनः बढ़ाती है। पूर्वदिशामें जो हरिकेश नामकी किरण है, वह नक्षत्रोंकी जननी है। दक्षिण दिशामें स्थित विश्वकर्मा नामकी किरण बुधको तृप्त करती है। पश्चिम दिशामें जो विश्वावसु नामक किरण है, उसे शुक्रकी योनि (उत्पत्तिस्थान) कहा जाता है। जो संवर्धन किरण है, वह लोहित (मंगल)-की योनि है। छठी किरणको अश्वभू कहते हैं, वह बृहस्पतिकी योनि है। पुनः सुराट् नामक किरण शनैश्चरकी वृद्धि करती है। चूँकि ये (चन्द्र, नक्षत्र और ग्रह) कभी नष्ट नहीं होते, इसीलिये इनकी नक्षत्रता मानी गयी है। उपर्युक्त नक्षत्रोंके क्षेत्र सूर्यपर आकर गिरते हैं और सूर्य अपनी किरणोंद्वारा उन क्षेत्रोंको ग्रहण करते हैं, इसीसे उनकी नक्षत्रता सिद्ध होती
* अध्याय १२८ *४५१

| अस्माल्लोकादमुं लोकं तीर्णानां सुकृतात्मनाम्।<br>तारणात्तारका ह्येताः शुक्लत्वाच्चैव शुक्लिकाः॥ ३४<br><br>दिव्यानां पार्थिवानां च वंशानां चैव सर्वशः।<br>तपनस्तेजसो योगादादित्य इति गद्यते॥ ३५<br><br>सुवतिः स्पन्दनार्थे च धातुरेष निगद्यते।<br>सवनात्तेजसोऽपां च तेनासौ सविता स्मृतः॥ ३६<br><br>बह्वर्थश्चन्द्र इत्येष ह्लादने धातुरुच्यते।<br>शुक्लत्वे ह्यमृतत्वे च शीतत्वेऽपि विमान्यते॥ ३७ | है। इस लोकसे परलोकमें जानेवाले पुण्यात्माओंका उद्धार करनेके कारण ये किरणें तारका नामसे प्रसिद्ध हैं तथा शुक्ल-वर्णकी होनेके कारण शुक्ला भी कही जाती हैं। दिव्य (स्वर्गीय) एवं पार्थिव (भौमिक) सभी प्रकारके वंशोंके तेजके संयोगसे सम्पन्न होनेके कारण सूर्यको 'तपन' कहा जाता है। 'सवति (सूते) अर्थात् 'सु' धातु 'उत्पत्ति अथवा चेतनाभाव' के अर्थमें प्रयुक्त होती है। * इसलिये (भूमि-) जल-तेजके उत्पादक होनेके कारण सूर्य सविता कहलाते हैं। इसी प्रकार 'चदि आह्लादने' यह बह्वर्थक धातु आह्लादित करनेके अर्थमें भी प्रयुक्त होती है। इसका शुक्लत्व, अमृतत्व और शीतत्व आदि अन्य अनेकों अर्थोंमें प्रयोग किया जाता है। (इसी धातुसे चन्द्र या चन्द्रमा शब्द निष्पन्न हुआ है।)॥ २९-३७॥ | | सूर्याचन्द्रमसोर्दिव्ये मण्डले भास्वरे खगे।<br>जलतेजोमये शुक्ले वृत्तकुम्भनिभे शुभे॥ ३८<br>वसन्ति कर्मदेवास्तु स्थानान्येतानि सर्वशः।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु ऋषिसूर्यग्रहादयः॥ ३९<br>तानि देवगृहाणि स्युः स्थानाख्यानि भवन्ति हि।<br>सौरं सूर्योऽविशत्स्थानं सौम्यं सोमस्तथैव च॥ ४०<br>शौक्रं शुक्लोऽविशत्स्थानं षोडशारं प्रभास्वरम्।<br>बृहस्पतिर्बृहत्त्वं च लोहितं चापि लोहितः॥ ४१<br>शनैश्चरोऽविशत् स्थानमेवं शानैश्वरं तथा।<br>बुधोऽपि वै बुधस्थानं भानुं स्वर्भानुरेव च॥ ४२<br>नक्षत्राणि च सर्वाणि नाक्षत्राण्याविशन्ति च।<br>ज्योतींषि सुकृतामेते ज्ञेया देवगृहास्तु वै॥ ४३<br>स्थानान्येतानि तिष्ठन्ति यावदाभूतसम्प्लवम्।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु देवस्थानानि तानि वै॥ ४४<br>अभिमाने न तिष्ठन्ति तानि देवाः पुनः पुनः।<br>अतीतास्तु सहातीतैर्भाव्या भव्यैः सुरैः सह॥ ४५<br>वर्तन्ते वर्तमानैश्च सुरैः सार्धं तु स्थानिनः। | सूर्य और चन्द्रमाके दिव्य मण्डल गगनतलमें उद्भासित होते हैं। वे सुन्दर श्वेत रंगवाले, जल और तेजसे सम्पन्न एवं कुम्भ-सदृश गोलाकार हैं। उनमें सभी मन्वन्तरोंके ऋषि एवं सूर्यादि ग्रह कर्मदेवताके रूपसे निवास करते हैं। ये ही उनके स्थान हैं, इसीसे उन्हें देव-गृह कहा जाता है। वे देव-गृह उन्हीं देवोंके नामसे प्रसिद्ध होते हैं। सूर्य सौर नामक स्थानमें तथा चन्द्रमा सौम्य स्थानमें प्रवेश करते हैं। शुक्र शौक्र स्थानमें प्रवेश करते हैं, जो सोलह अरोंसे युक्त और अत्यन्त कान्तिमान् है। इसी प्रकार बृहस्पति बृहत्त्व स्थानमें, मंगल लोहित स्थानमें, शनैश्चर शानैश्वर स्थानमें, बुध बुधस्थानमें और राहु भानुस्थानमें प्रवेश करते हैं। सभी नक्षत्र नाक्षत्र स्थानमें प्रवेश करते हैं। इस प्रकार इन सभी ज्योतियोंको उन पुण्यात्माओंके देव-गृह जानने चाहिये। ये सभी स्थान प्रलयपर्यन्त स्थित रहते हैं। सभी मन्वन्तरोंमें वे ही देवस्थान होते हैं। सभी देवता पुनः-पुनः उन्हीं अपने-अपने स्थानोंमें निवास करते हैं। अतीतकालीन स्थानीय देवता अतीतोंके साथ, भविष्यत्कालीन स्थानीय देवता भावी देवताओंके साथ और वर्तमानकालीन स्थानीय देवता वर्तमान देवताओंके साथ वर्तमान रहते हैं॥ ३८-४५ ½॥ | | सूर्यो देवो विवस्वांश्च अष्टमस्त्वदितेः सुतः॥ ४६<br><br>द्युतिमान् धर्मयुक्तश्च सोमो देवो वसुः स्मृतः।<br>शुक्रो दैत्यस्तु विज्ञेयो भार्गवोऽसुरयाजकः॥ ४७ | अदितिके आठवें पुत्र विवस्वान् सूर्य देवता माने गये हैं। प्रभाशाली एवं धर्मात्मा चन्द्रदेव वसु कहे गये हैं। भृगुनन्दन शुक्रको, जो असुरोंके पुरोहित हैं, कर्मानुसार दैत्य समझना चाहिये। |


* निरुक्त, अमरटीका, धातुवृत्ति, उणादिकोश आदिके अनुसार भी 'षूङ् प्राणि-प्रसवे' धातुसे 'सविता' शब्द बनता है, जिसका अर्थ है-जगत्को उत्पन्न करनेवाला।

१३१- त्रिपुरमें दैत्योंका सुखपूर्वक निवास, मयका स्वप्न-दर्शन और दैत्योंका अत्याचार

४५२ * मत्स्यपुराण *

| बृहस्पतिर्बृहत्तेजा देवाचार्योऽङ्गिरःसुतः।<br>बुधो मनोहरश्चैव शशिपुत्रस्तु स स्मृतः॥ ४८<br>शनैश्चरो विरूपश्च संज्ञापुत्रो विवस्वतः।<br>अग्निर्विकेश्यां जज्ञे तु युवासौ लोहिताधिपः॥ ४९<br>नक्षत्रनाम्यः क्षेत्रेषु दाक्षायण्याः सुताः स्मृताः।<br>स्वर्भानुः सिंहिकापुत्रो भूतसंतापनोऽसुरः॥ ५०<br>चन्द्रार्कग्रहनक्षत्रेष्वभिमानी प्रकीर्तितः।<br>स्थानान्येतानि चोक्तानि स्थानिन्यश्चैव देवताः॥ ५१<br>शुक्लमग्निसमं दिव्यं सहस्रांशोर्विवस्वतः।<br>सहस्रांशुत्विषः स्थानमम्मयं तैजसं तथा॥ ५२<br>आप्यस्थानं मनोज्ञस्य रविरश्मिगृहे स्थितम्।<br>शुक्रः षोडशरश्मिस्तु यस्तु देवो ह्यपोमयः॥ ५३<br>लोहितो नवरश्मिस्तु स्थानमाप्यं तु तस्य वै।<br>बृहद्द्वादशरश्मीकं हरिद्राभं तु वेधसः॥ ५४<br>अष्टरश्मिः शनेस्तत्तु कृष्णं वृद्धमयस्मयम्।<br>स्वर्भानोस्तत्त्वायसं स्थानं भूतसंतापनालयम्॥ ५५<br>सुकृतामाश्रयास्तारा रश्मयस्तु हिरण्मयाः।<br>तारणात्तारकाः प्रोक्ताः शुक्लत्वाच्चैव तारकाः॥ ५६<br>नवयोजनसाहस्रो विष्कम्भः सवितुः स्मृतः।<br>मण्डलं त्रिगुणं चास्य विस्तारो भास्करस्य तु॥ ५७<br>द्विगुणः सूर्यविस्ताराद् विस्तारः शशिनः स्मृतः।<br>त्रिगुणं मण्डलं चास्य वैपुल्याच्छशिनः स्मृतम्॥ ५८<br>सर्वोपरि निसृष्टानि मण्डलानि तु तारकाः।<br>योजनार्धप्रमाणानि ताभ्योऽन्यानि गणानि तु॥ ५९<br>तुल्यो भूत्वा तु स्वर्भानुस्तदधस्तात् प्रसर्पति।<br>उद्धृत्य पार्थिवीं छायां निर्मितां मण्डलाकृतिम्॥ ६०<br>ब्रह्मणा निर्मितं स्थानं तृतीयं तु तमोमयम्।<br>आदित्यात् स तु निष्क्रम्य सोमं गच्छति पर्वसु॥ ६१<br>आदित्यमेति सोमाच्च पुनः सौरेषु पर्वसु।<br>स्वभासा तुदते यस्मात्स्वर्भानुरिति स स्मृतः॥ ६२ | महर्षि अङ्गिराके पुत्र परम तेजस्वी बृहस्पति देवोंके आचार्य हैं। मनोहर रूपवाले बुध चन्द्रमाके पुत्र हैं। शनैश्चर कुरूप कहे गये हैं। ये सूर्यके संयोगसे उत्पन्न हुए संज्ञाके पुत्र हैं। लाल रंगके अधिपति मंगल नवयुवक (माने गये) हैं। स्वयं अग्निदेव ही रूपमें विकेशी (भूमि) के* गर्भसे उत्पन्न हुए थे। नक्षत्र नामवाली सत्ताईस नक्षत्राभिमानी देवियाँ दाक्षायणीकी कन्या मानी गयी हैं। राहु सिंहिकाका पुत्र है। यह सभी प्राणियोंको कष्ट देनेवाला राक्षस है। इस प्रकार सूर्य, चन्द्र, ग्रह और नक्षत्रोंके अभिमानी देवताओंका वर्णन किया गया। साथ ही उनके स्थान तथा स्थानी देवता भी बतलाये गये। सहस्र किरणधारी सूर्यका स्थान दिव्य, श्वेत वर्णवाला तथा अग्निके समान तेजस्वी है। चन्द्रमाका स्थान तैजस एवं जलमय है। बुधका स्थान जलमय है और वह सूर्यकी किरणरूपी गृहमें स्थित है। शुक्रदेवका स्थान सोलह किरणोंसे युक्त एवं जलमय है। मंगल नौ किरणोंसे युक्त हैं, उनका स्थान जलमय है। बृहस्पतिका स्थान बारह किरणोंसे युक्त है और उसकी कान्ति हल्दीके समान पीली है। शनैश्चरका स्थान आठ किरणोंसे युक्त, प्राचीन, लौहमय एवं काले रंगका है। राहुका स्थान लोहेका बना है, वह प्राणियोंको कष्ट देनेवाला है। ताराएँ सुकृतीजनोंका आश्रय स्थान हैं। इनकी किरणें स्वर्णमयी हैं। जीवोंका निस्तार करनेके कारण ये तारका कहलाती हैं और शुक्लवर्ण होनेके कारण इनका शुक्ला भी नाम है॥ ४६–५६॥<br><br>सूर्यके व्यासका विस्तार नौ हजार योजन है और इनका सम्पूर्ण मण्डल इस (व्यास) से तिगुना अर्थात् सत्ताईस हजार योजन है। चन्द्रमाका विस्तार सूर्यके विस्तारसे दुगुना बतलाया जाता है। चन्द्रमाका सम्पूर्ण मण्डल विपुलतामें सूर्य-मण्डलसे तिगुना है। सबके ऊपर तारकाओंके मण्डल हैं। उनका विस्तार आधे योजनका बतलाया जाता है। उनसे नीचे अन्य गणोंके स्थान हैं। राहु उनकी तुलनामें समान होते हुए भी उनके नीचेसे भ्रमण करता है। ब्रह्माद्वारा निर्मित वह तीसरा स्थान तमोमय है। उसे पृथिवीकी छायाको ऊपर उठाकर मण्डलाकार बनाया गया है। राहु पूर्णिमा आदि पर्वोंमें सूर्यमण्डलसे निकलकर चन्द्रमण्डलमें चला जाता है और सूर्य-सम्बन्धी अमावास्या आदि पर्वोंमें पुनः चन्द्रमण्डलसे निकलकर सूर्यमण्डलमें चला आता है। वह अपनी कान्तिसे प्राणियोंको कष्ट पहुँचाता है, इसीलिये उसे स्वर्भानु कहते हैं। |


* सभी पुराणों तथा मूर्त्यष्टक शिवव्याख्यानोंमें विकेशीको भूमि कहा गया है। उनके पुत्र होनेसे ही मङ्गलको भौम कहा जाता है।

* अध्याय १२८ *४५३
चन्द्रतः षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते।<br>विष्कम्भान्मण्डलाच्चैव योजनानां तु स स्मृतः॥ ६३<br>भार्गवात्पादहीनश्च विज्ञेयो वै बृहस्पतिः।<br>बृहस्पतेः पादहीनौ कुजसौरौवुभौ स्मृतौ॥ ६४<br>विस्तारमण्डलाभ्यां तु पादहीनस्तयोर्बुधः।<br>तारानक्षत्ररूपाणि वपुष्मन्तीह यानि वै॥ ६५<br>बुधेन समरूपाणि विस्तारान्मण्डलात्तु वै।<br>तारानक्षत्ररूपाणि हीनानि तु परस्परम्॥ ६६व्यास और बाह्यवृत्त—दोनोंके योजन-परिमाणमें शुक्रका परिमाण चन्द्रमाके सोलहवें भागके बराबर बतलाया जाता है। बृहस्पतिका परिमाण शुक्रके परिमाणसे एक चतुर्थांश कम जानना चाहिये। शनि और मंगल—ये दोनों प्रमाणमें बृहस्पतिसे चतुर्थांश कम बतलाये गये हैं। बुध इन दोनों ग्रहोंसे विस्तार और मण्डलमें चौथाई कम हैं। आकाशमण्डलमें तारा, नक्षत्र आदि जितने शरीरधारी हैं, वे सभी विस्तार और मण्डलके हिसाबसे बुधके समकक्ष हैं। तारा और नक्षत्र परस्पर एक-दूसरेसे कम हैं॥५७—६६॥
शतानि पञ्च चत्वारि त्रीणि द्वे चैकमेव च।<br>सर्वोपरि विसृष्टानि मण्डलानि तु तारकाः॥ ६७<br>योजनार्धप्रमाणानि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते।<br>उपरिष्टात्तु ये तेषां ग्रहा ये क्रूरसात्त्विकाः॥ ६८<br>सौरश्चाङ्गिरसो वक्रो विज्ञेया मन्दचारिणः।<br>तेभ्योऽधस्तात्तु चत्वारः पुनश्चान्ये महाग्रहाः॥ ६९<br>सोमः सूर्यो बुधश्चैव भार्गवश्चेति शीघ्रगाः।<br>यावन्ति चैव ऋक्षाणि कोट्यस्तावन्ति तारकाः॥ ७०<br>सर्वेषां तु ग्रहाणां वै सूर्योऽधस्तात् प्रसर्पति।<br>विस्तीर्णं मण्डलं कृत्वा तस्योर्ध्वं चरते शशी॥ ७१<br>नक्षत्रमण्डलं चापि सोमादूर्ध्वं प्रसर्पति।<br>नक्षत्रेभ्यो बुधश्चोर्ध्वं बुधाच्चोर्ध्वं तु भार्गवः॥ ७२<br>वक्रस्तु भार्गवादूर्ध्वं वक्रादूर्ध्वं बृहस्पतिः।<br>तस्माच्छनैश्चरश्चोर्ध्वं देवाचार्योपरि स्थितः॥ ७३<br>शनैश्चरात्तथा चोर्ध्वं ज्ञेयं सप्तर्षिमण्डलम्।<br>सप्तर्षिभ्यो ध्रुवश्चोर्ध्वं समस्तं त्रिदिवं ध्रुवे॥ ७४<br>द्विगुणेषु सहस्रेषु योजनानां शतेषु च।<br>ग्रहान्तरमथैकैकमूर्ध्वं नक्षत्रमण्डलात्॥ ७५<br>ताराग्रहान्तराणि स्युरुपर्युपर्यधिष्ठितम्।<br>ग्रहाश्च चन्द्रसूर्यौ च दिवि दिव्येन तेजसा॥ ७६<br>नक्षत्रेषु च युज्यन्ते गच्छन्तो नियतक्रमात्।इस प्रकार उन सभी ज्योतिर्गणोंका मण्डल पाँच, चार, तीन, दो अथवा एक योजनमें विस्तृत है। तारकाओंके मण्डल सबसे ऊपर हैं। उनका प्रमाण आधा योजन है। इनसे कम विस्तारवाला अन्य कोई नहीं है। इनके ऊपर जो क्रूर और सात्त्विक ग्रह स्थित हैं, उन्हें शनैश्चर, बृहस्पति और मंगल समझना चाहिये। ये सभी मन्द गतिवाले हैं। इनके नीचे चन्द्र, सूर्य, बुध और शुक्र—ये चार अन्य महान् ग्रह विचरण करते हैं। ये सभी शीघ्रगामी हैं। जितने नक्षत्र हैं, उतने ही करोड़ तारकाएँ हैं। सूर्य सभी ग्रहोंके निचले भागमें गमन करते हैं। सूर्यके उपरी भागमें चन्द्रमा अपने मण्डलको विस्तृत करके चलते हैं। नक्षत्रमण्डल चन्द्रमासे ऊपर भ्रमण करता है। इसी प्रकार नक्षत्रोंसे ऊपर बुध, बुधसे ऊपर शुक्र, शुक्रसे ऊपर मंगल, मंगलसे ऊपर बृहस्पति और देवाचार्य बृहस्पतिके ऊपर शनैश्चर स्थित हैं। शनैश्चरसे ऊपर सप्तर्षि-मण्डलको जानना चाहिये। सप्तर्षियोंसे ऊपर ध्रुव हैं और ध्रुवसे ऊपर सारा आकाशमण्डल है। नक्षत्रमण्डलसे ऊपर प्रत्येक ग्रह दो लाख योजनोंके अन्तरपर स्थित है। ताराओं और ग्रहोंके अन्तर परस्पर एक-दूसरेके ऊपर स्थित हैं। आकाशमण्डलमें सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहगण दिव्य तेजसे युक्त हो निश्चित क्रमानुसार चलते हुए नक्षत्रोंसे मिलते हैं॥ ६७—७६ १/२ ॥
चन्द्रार्कग्रहनक्षत्रा नीचोच्चगृहमाश्रिताः॥ ७७<br>समागमे च भेदे च पश्यन्ति युगपत्प्रजाः।<br>परस्परं स्थिता ह्येवं युज्यन्ते च परस्परम्॥ ७८चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह और नक्षत्र अपने-अपने नीचे-ऊँचे गृहोंमें स्थित होते हैं। इसी क्रमसे इनका समागम और वियोग भी होता है। उस अवसरपर सभी प्राणी इन्हें एक साथ देखते हैं। इस प्रकार स्थित रहकर ये

४५४ * मत्स्यपुराण *

| असंकरेण विज्ञेयस्तेषां योगस्तु वै बुधैः।<br>इत्येवं संनिवेशो वै पृथिव्या ज्योतिषां च यः॥ ७९<br>द्वीपानामुदधीनां च पर्वतानां तथैव च।<br>वर्षाणां च नदीनां च ये च तेषु वसन्ति वै॥ ८०<br>इत्येषोऽर्कवशेनैव संनिवेशस्तु ज्योतिषाम्।<br>आवर्तः सान्तरो मध्ये संक्षिप्तश्च ध्रुवात्तु सः॥ ८१<br>सर्वतस्तेषु विस्तीर्णो वृत्ताकार इवोच्छ्रितः।<br>लोकसंव्यवहारार्थमीश्वरेण विनिर्मितः॥ ८२<br>कल्पादौ बुद्धिपूर्वं तु स्थापितोऽसौ स्वयम्भुवा।<br>इत्येष संनिवेशो वै सर्वस्य ज्योतिरात्मकः॥ ८३<br>विश्वरूपं प्रधानस्य परिणामोऽस्य यः स्मृतः।<br>तेषां शक्यं न संख्यातुं याथातथ्येन केनचित्।<br>गतागतं मनुष्येण ज्योतिषां मांसचक्षुषा॥ ८४ | परस्पर संयुक्त होते हैं। विद्वान्लोग इनके इस सम्बन्धको अमिश्रित ही मानते हैं। इसी प्रकार पृथ्वी, ज्योतिर्गणों, द्वीप, समुद्र, पर्वत, वर्ष, नदी तथा उनमें निवास करनेवाले प्राणियोंकी स्थिति है। ज्योतिर्गणोंका यह स्थितिक्रम सूर्यके कारण ही है। (मण्डलाकार घूमते समय) उन गणोंके मध्यमें आवर्त-सा दीख पड़ता है। वह बीचमें ध्रुवके आ जानेसे संक्षिप्त हो जाता है। वह चारों ओर ऊँचाईपर गोलाकार फैला रहता है। परमेश्वरने लोकोंकी प्रयोजन-सिद्धिके लिये उसे बनाया है। ब्रह्माने कल्पके आदिमें बहुत सोच-विचारकर इसे स्थापित किया है। इस प्रकार यह सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डलकी स्थिति है। प्रधान (प्रकृति)-का यह विश्वरूप परिणाम अत्यन्त अद्भुत है। कोई भी इसकी यथार्थ गणना नहीं कर सकता। मनुष्य अपने चर्मचक्षुओंसे इन ज्योतिर्गणोंके गमनागमनको नहीं देख सकता॥ ७७—८४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे देवगृहवर्णनं नामाष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें देवगृहवर्णन नामक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२८॥


एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय

त्रिपुर-निर्माणका वर्णन

ऋषय ऊचुः
कथं जगाम भगवान् पुरारित्वं महेश्वरः।<br>ददाह च कथं देवस्तन्नो विस्तरतो वद॥ १<br>पृच्छामस्त्वां वयं सर्वे बहुमानात् पुनः पुनः।<br>त्रिपुरं तद् यथा दुर्गं मयमायाविनिर्मितम्।<br>देवेनैकेषुणा दग्धं तथा नो वद मानद॥ २ऋषियोंने पूछा— सबको मान देनेवाले सूतजी! भगवान् महेश्वर पुरारि (त्रिपुरके शत्रु) किस कारण हो गये तथा उन देवाधिदेवने उसे कैसे दग्ध किया? यह आप हमलोगोंको विस्तारपूर्वक बतलाइये। हम सब लोग परम सम्मानपूर्वक आपसे बारंबार पूछ रहे हैं कि मयदानवकी मायाद्वारा विनिर्मित उस त्रिपुर दुर्गको भगवान् शंकरने एक ही बाणसे जिस प्रकार जला दिया था, हमलोगोंसे उस प्रसङ्गका विस्तारसे वर्णन कीजिये॥ १-२॥
* अध्याय १२९ *४५५

| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! भगवान् शंकरने जिस प्रकार त्रिपुरको विदीर्ण किया था (उसका वर्णन कर रहा हूँ), सुनिये। मय नामक एक महान् मायावी असुर था। वह विभिन्न प्रकारकी मायाओंका उत्पादक था। वह संग्राममें देवताओंद्वारा पराजित हो गया था, इसलिये घोर तपस्यामें संलग्न हो गया। द्विजवरो! उसे तपस्या करते देख दो अन्य दैत्य भी अनुग्रहवश उसीके कार्यके उद्देश्यसे उग्र तपस्यामें जुट गये। उनमें एक महाबली विद्युन्माली और दूसरा महापराक्रमी तारक था। ये दोनों मयके तेजसे आकृष्ट होकर उसीके पार्श्वभागमें बैठकर तपस्या कर रहे थे। उस समय तपस्यासे उद्भासित होते हुए वे तीनों ऐसा प्रतीत हो रहे थे, मानो लौकिक रूपमें मूर्तिमान् तीनों अग्नियाँ हों। वे तीनों दानव त्रिलोकीको संतप्त करते हुए तपस्यामें संलग्न थे। वे हेमन्त-ऋतुमें जलमें शयन करते, ग्रीष्म-ऋतुमें पञ्चाग्नि तापते और वर्षा-ऋतुमें आकाशके नीचे खुले मैदानमें खड़े रहते थे। इस प्रकार वे सबको परम प्रिय लगनेवाले अपने शरीरको सुखा रहे थे और मात्र फल, मूल, फूल और जलके आहारपर जीवन व्यतीत कर रहे थे अथवा वे कभी-कभी निराहार भी रह जाते थे। उनके वल्कलोंपर कीचड़ जम गया था और वे स्वयं विमल देहधारी होकर भी गंदे सेवारके कीचड़ोंमें निमग्न रहते थे। इस कारण उनके शरीरका मांस गल गया था। वे इतने दुर्बल हो गये थे कि उनके शरीरकी नसें बाहर उभड़ आयी थीं। उनकी तपस्याके प्रभावसे सारा जगत् निष्प्रभ हो गया—काँप उठा। सर्वत्र उदासी छा गयी। सभीके स्वर मन्द पड़ गये। इस प्रकार उन तीनों दानवरूपी अग्नियोंसे त्रिलोकीको जलते देखकर जगद्बन्धु पितामह ब्रह्मा उनके समक्ष प्रकट हुए॥ ३—११ १/२॥<br><br>तब वे दैत्य अपने पितामहको सहसा सम्मुख उपस्थित देखकर अत्यन्त साहस करके बोले और उनकी स्तुति करने लगे। उस समय ब्रह्माके नेत्र और मुख हर्षसे खिल उठे थे। तब उन्होंने तपस्याके प्रभावसे सूर्यके समान प्रभावशाली उन दानवोंसे | | शृणुध्वं त्रिपुरं* देवो यथा दारितवान् भवः।<br>मयो नाम महामायो मायानां जनकोऽसुरः॥ ३<br>निर्जितः स तु संग्रामे तताप परमं तपः।<br>तपस्यन्तं तु तं विप्रा दैत्यावन्यावनुग्रहात्॥ ४<br>तस्यैव कृत्यमुद्दिश्य तेपतुः परमं तपः।<br>विद्युन्माली च बलवांस्तारकाख्यश्च वीर्यवान्॥ ५<br>मयतेजःसमाक्रान्तौ तेपतुर्मयपार्श्वगौ।<br>लोका इव यथा मूर्तास्त्रयस्त्रय इवाग्नयः॥ ६<br>लोकत्रयं तापयन्तस्ते तेपुर्दानवास्तपः।<br>हेमन्ते जलशय्यासु ग्रीष्मे पञ्चतपे तथा॥ ७<br>वर्षासु च तथाऽऽकाशे क्षपयन्तस्तनूः प्रियाः।<br>सेवानाः फलमूलानि पुष्पाणि च जलानि च॥ ८<br>अन्यथाचरिताहाराः पङ्केनाचितवल्कलाः।<br>मग्नाः शैवालपङ्केषु विमलाविमलेषु च॥ ९<br>निर्मांसाश्च ततो जाताः कृशा धमनिसंतताः।<br>तेषां तपःप्रभावेण प्रभावविधुतं यथा॥ १०<br>निष्प्रभं तु जगत् सर्वं मन्दमेवाभिभाषितम्।<br>दह्यमानेषु लोकेषु तैस्त्रिभिर्दानवाग्निभिः॥ ११<br>तेषामग्रे जगद्बन्धुः प्रादुर्भूतः पितामहः।<br>ततः साहसकर्तारः प्राहुस्ते सहसागतम्॥ १२<br>स्वकं पितामहं दैत्यास्तं वै तुष्टुवुरेव च।<br>अथ तान् दानवान् ब्रह्मा तपसा तपनप्रभान्॥ १३ | |


* यह महत्त्वपूर्ण प्रसङ्ग बहुत कुछ स्कन्द ५। ४३, शिव, सौरपु० २९-३० लिङ्गपु० ७३-४, आदि पुराणोंसे मिलता है। वैसे यह अपेक्षाकृत सर्वाधिक विस्तृत है तथा आगेके नर्मदा-माहात्म्यमें इसी ग्रन्थमें पुनः आया है। इसका बीज तै० सं० ६। ३। २। १, शतप० ६। ३। ३। २५ आदिमें प्राप्त होता है और पुष्पदन्तने भी 'शिवमहिम्नःस्तव' १८-१९ आदिके 'रथः क्षोणी यन्ता'.....'त्रिपुरतृण', 'त्रिपुरहर' आदिमें इसकी खूब उत्प्रेक्षा की है।

४५६* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उवाच हर्षपूर्णाक्षो हर्षपूर्णमुखस्तदा।<br>वरदोऽहं हि वो वत्सास्तपस्तोषित आगतः॥ १४<br>व्रियतामीप्सितं यच्च साभिलाषं तदुच्यताम्।<br>इत्येवमुच्यमानं तु प्रतिपन्नं पितामहम्॥ १५<br>विश्वकर्मा मयः प्राह प्रहर्षोत्फुल्ललोचनः।<br>देव दैत्याः पुरा देवैः संग्रामे तारकामये॥ १६<br>निर्जितास्ताडिताश्चैव हताश्चाप्यायुधैरपि।<br>देववैरानुबन्धाच्च धावन्तो भयवेपिताः॥ १७<br>शरणं नैव जानीमः शर्म वा शरणार्थिनः।<br>सोऽहं तपःप्रभावेण तव भक्त्या तथैव च॥ १८<br>इच्छामि कर्तुं तद् दुर्गं यद् देवैरपि दुस्तरम्।<br>तस्मिंश्च त्रिपुरे दुर्गे मत्कृते कृतिनां वर॥ १९<br>भूम्यग्निजलदुर्गाणां शापानां मुनितेजसाम्।<br>देवप्रहरणानां च देवानां च प्रजापते॥ २०<br>अलङ्घनीयं भवतु त्रिपुरं यदि ते प्रियम्।कहा—'बच्चो! मैं तुमलोगोंकी तपस्यासे संतुष्ट होकर तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। तुमलोगोंकी जो अभिलाषा हो, उसे कहो और अपना अभीष्ट वर माँग लो।' वर देनेके लिये उत्सुक पितामहको इस प्रकार कहते हुए देखकर असुरोंके शिल्पी मयके नेत्र अत्यन्त हर्षसे उत्फुल्ल हो उठे। तब उसने कहा—'देव! प्राचीनकालमें घटित हुए तारकामय संग्राममें देवताओंने दैत्योंको पराजित कर दिया था। उन्होंने अस्त्रोंके प्रहारसे कुछको तो मौतके घाट उतार दिया था और कुछको बुरी तरहसे घायल कर दिया था। उस समय देवताओंके साथ वैर बँध जानेके कारण हमलोग भयसे कम्पित होकर चारों दिशाओंमें भागते फिरे, परंतु हम शरणार्थियोंको यह ज्ञात न हुआ कि हमारे लिये शरणदाता कौन है तथा हमारा कल्याण कैसे होगा। इसलिये मैं अपनी तपस्याके प्रभावसे तथा आपकी भक्तिके बलपर एक ऐसे दुर्गका निर्माण करना चाहता हूँ, जिसका पार करना देवताओंके लिये भी कठिन हो। सुकृती पुरुषोंमें श्रेष्ठ पितामह! मेरे द्वारा निर्मित उस त्रिपुरमें पृथ्वी, जल एवं अग्निसे निर्मित तथा सुरक्षित दुर्गोंका और मुनियोंके प्रभावसे दिये गये शापों, देवताओंके अस्त्रों और देवोंका प्रवेश न हो सके। प्रजापते! यदि आपको अच्छा लगे तो वह त्रिपुर सभीके लिये अलङ्घनीय हो जाय॥ १२—२० $\frac{१}{२}$ ॥
विश्वकर्मा इतीवोक्तः स तदा विश्वकर्मणा॥ २१<br>उवाच प्रहसन् वाक्यं मयं दैत्यगणाधिपम्।<br>सर्वामरत्वं नैवास्ति असद्वृत्तस्य दानव॥ २२<br>तस्माद् दुर्गविधानं हि तृणादपि विधीयताम्।तब असुरोंके विश्वकर्मा (महाशिल्पी) मयद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर विश्व-स्रष्टा ब्रह्मा दैत्यगणोंके अधीश्वर मयसे हँसते हुए बोले—'दानव! (तुझ-जैसे) असदाचारीके लिये सर्वामरत्वका विधान नहीं है, अतः तुम तृणसे ही अपने दुर्गका निर्माण करो।'
पितामहवचः श्रुत्वा तदैव दानवो मयः॥ २३<br>प्राञ्जलिः पुनरप्याह ब्रह्माणं पद्मसंभवम्।<br>यस्तदेकेषुणा दुर्गं सकृन्मुक्तेन निर्दहेत्॥ २४<br>समं स संयुगे हन्यादवध्यं शेषतो भवेत्।उस समय पितामहकी ऐसी बात सुनकर मयदानवने हाथ जोड़कर पुनः पद्मयोनि ब्रह्मासे कहा—'जो एक ही बारके छोड़े गये एक ही बाणसे उस दुर्गको जला दे, वही युद्धस्थलमें हम सबको मार सके, शेष प्राणियोंसे हमलोग अवध्य हो जायँ।'
एवमस्त्विति चाप्युक्त्वा मयं देवः पितामहः॥ २५<br>स्वप्ने लब्धो यथार्थो वै तत्रैवादर्शनं ययौ।<br>गते पितामहे दैत्या गता मयरविप्रभाः॥ २६<br>वरदानाद् विरेजुस्ते तपसा च महाबलाः।<br>स मयस्तु महाबुद्धिर्दानवो वृषसत्तमः॥ २७तदनन्तर मयसे 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' कहकर भगवान् ब्रह्मा स्वप्नमें प्राप्त हुए धनकी तरह वहीं अन्तर्हित हो गये। पितामहके चले जानेपर सूर्यके समान प्रभावशाली मय आदि दानव भी अपने स्थानको चले गये। वे महाबली दानव तपस्या तथा वरदानके प्रभावसे अत्यन्त शोभित हो रहे थे। कुछ समयके बाद दानवश्रेष्ठ महाबुद्धिमान् मय-

१३२- त्रिपुरवासी दैत्योंका अत्याचार, देवताओंका ब्रह्माकी शरणमें जाना और ब्रह्मसहित शिवजीके पास जाकर उनकी स्तुति करना

* अध्याय १२९ *४५७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दुर्गं व्यवसितः कर्तुमिति चाचिन्तयत् तदा।<br>कथं नाम भवेद् दुर्गं तन्मया त्रिपुरं कृतम्॥ २८<br>वत्स्यते तत्पुरं दिव्यं मत्तो नान्यैर्न संशयः।<br>यथा चैकेषुणा तेन तत्पुरं न हि हन्यते॥ २९<br>देवैस्तथा विधातव्यं मया मतिविचारणम्।<br>विस्तारो योजनशतमेकैकस्य पुरस्य तु॥ ३०<br>कार्यस्तेषां च विष्कम्भश्चैकैकशतयोजनम्।<br>पुष्ययोगेण निर्माणं पुराणां च भविष्यति॥ ३१<br>पुष्ययोगेण च दिवि समेष्यन्ति परस्परम्।<br>पुष्ययोगेण युक्तानि यस्तान्यासादयिष्यति॥ ३२<br>पुराण्येकप्रहारेण स तानि निहनिष्यति।<br>आयसं तु क्षितितले रजतं तु नभस्तले॥ ३३<br>राजतस्योपरिष्टात् तु सौवर्णं भविता पुरम्।<br>एवं त्रिभिः पुरैर्युक्तं त्रिपुरं तद् भविष्यति।<br>शतयोजनविष्कम्भैरन्तरैस्तद् दुरासदम्॥ ३४<br>अट्टालकैर्यन्त्रशतघ्निभिश्च<br>सचक्रशूलोपलकम्पन्नैश्च ।<br>द्वारैर्महामन्दरमेरुकल्पैः प्राकार-<br>शृङ्गैः सुविराजमानम्॥ ३५<br>सतारकाख्येन मयेन गुप्तं<br>स्वस्थं च गुप्तं तडिमालिनापि।<br>को नाम हन्तुं त्रिपुरं समर्थो<br>मुक्त्वा त्रिनेत्रं भगवन्तमेकम्॥ ३६दानव दुर्गकी रचना करनेके लिये उद्यत हो विचार करने लगा। मेरे द्वारा निर्मित होनेवाला यह त्रिपुर दुर्ग कैसा बनाया जाय, जिससे उस दिव्य पुरमें निस्संदेह मेरे अतिरिक्त अन्य कोई निवास न कर सके तथा उसके द्वारा छोड़े गये एक बाणसे यह पुर बींधा न जा सके। देवगण उसे नष्ट करनेकी चेष्टा करेंगे ही, किंतु मुझे तो अपनी बुद्धिसे विचार कर लेना चाहिये। उनमें एक-एक पुरका विस्तार सौ योजनका करना है तथा उनके विष्कम्भ (स्तम्भ या शहतीर) भी एक-एक सौ योजनके बनाने हैं॥ २९–३१½॥<br><br>इन पुरोंका निर्माण पुष्य नक्षत्रके योगमें होगा। इसी पुष्य नक्षत्रके योगमें ये तीनों पुर आकाशमण्डलमें परस्पर मिल जायँगे। जो मनुष्य पुष्य नक्षत्रके योगमें इन तीनों पुरोंको परस्पर मिला हुआ पा लेगा, वही एक बाणके प्रहारसे इन्हें नष्ट कर सकेगा। उनमेंसे एक पुर भूतलपर लौहमय, दूसरा गगनतलमें रजतमय और तीसरा रजतमय पुरसे ऊपर सुवर्णमय होगा। इस प्रकार तीनों पुरोंसे युक्त होनेके कारण वह त्रिपुर नामसे विख्यात होगा। इनके अन्तर्भागमें सौ योजन विस्तारवाले विष्कम्भ (बाधक स्तम्भ) रहेंगे, जिससे यह दूसरोंद्वारा दुष्प्राप्य होगा। वह त्रिपुर अट्टालिकाओं, एक ही बारमें सौ मनुष्योंका वध करनेवाले यन्त्रों, चक्र, त्रिशूल, उपल और ध्वजाओं, मन्दराचल और सुमेरु गिरि-सरीखे द्वारों और शिखर-सदृश परकोटोंसे सुशोभित होगा। उनमें तारक लौहमय पुरकी और मय सुवर्णमय पुरकी रक्षा करेंगे तथा आकाशस्थित रजतमय पुरकी रक्षामें विद्युन्माली नियुक्त रहेगा। ऐसी दशामें एकमात्र भगवान् शंकरको छोड़कर दूसरा कौन इस त्रिपुरका विनाश करनेमें समर्थ हो सकेगा॥ ३१–३६॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १२९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२९॥

४५८ | * मत्स्यपुराण *


एक सौ तीसवाँ अध्याय

दानवश्रेष्ठ मयद्वारा त्रिपुरकी रचना

सूत उवाच**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इस प्रकार सोच-विचारकर (महाशिल्पी) मयदानव दिव्य उपायोंके प्रभावसे बननेवाले तथा मनके संकल्पानुसार चलनेवाले त्रिपुर नामक दुर्गकी रचना करनेको उद्यत हुआ। उसने सोचा कि इस मार्गमें परकोटा बनेगा, यहाँ अथवा वहाँ गोपुर (नगरका फाटक) रहेगा, यहाँ अट्टालिकाका दरवाजा तथा यहाँ महलका मुख्य द्वार रखना उचित है। इधर विशाल राजमार्ग होना चाहिये, यहाँ दोनों ओर पगडंडियोंसे युक्त सड़कें और गलियाँ होनी चाहिये, यहाँ चबूतरा रखना ठीक है, यह स्थान अन्तःपुरके योग्य है, यहाँ शिव-मन्दिर रखना अच्छा होगा, यहाँ वट-वृक्षसहित तड़ागों, बावलियों और सरोवरोंका निर्माण उचित होगा। यहाँ बगीचे, सभाभवन और वाटिकाएँ रहेंगी तथा यहाँ दानवोंके निकलनेके लिये मनोहर मार्ग रहेगा। इस प्रकार नगर-रचनामें निपुण मयने केवल मनःसंकल्पमात्रसे उस दिव्य त्रिपुर नगरकी रचना कर डाली थी, ऐसा हमने सुना है। मयने जो काले लोहेका पुर निर्मित किया था, उसका अधिपति तारकासुर हुआ। वह उसपर अपना आधिपत्य जमाकर वहाँ निवास करने लगा। दूसरा जो पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान कान्तिमान् रजतमय पुर निर्मित हुआ, उसका स्वामी विद्युन्माली हुआ। यह विद्युत्समूहोंसे युक्त बादलकी तरह जान पड़ता था। मयद्वारा जिस तीसरे स्वर्णमय पुरकी रचना हुई, उसमें सामर्थ्यशाली मय स्वयं गया और उसका अधिपति हुआ। जिस प्रकार तारकासुरके पुरसे विद्युन्मालीका पुर सौ योजनकी दूरीपर था, उसी प्रकार विद्युन्माली और मयके पुरोंमें भी सौ योजनका अन्तर था। मयदानवका विशाल पुर मेरुपर्वतके समान दीख पड़ता था॥ १—१०½॥
इति चिन्तायुतो दैत्यो दिव्योपायप्रभावजम्।<br>चकार त्रिपुरं दुर्गं मनःसंचारचारितम्॥ १
प्राकारोऽनेन मार्गेण इह वामुत्र गोपुरम्।<br>इह चाट्टालकद्वारमिह चाट्टालगोपुरम्॥ २
राजमार्ग इतश्चापि विपुलो भवतामिति।<br>रथ्योपरथ्याः सदृशा इह चत्वर एव च॥ ३
इदमन्तःपुरस्थानं रुद्रायतनमत्र च।<br>सवटानि तडागानि ह्यत्र वाप्यः सरांसि च॥ ४
आरामाश्च सभाश्चात्र उद्यानान्यत्र वा तथा।<br>उपनिर्गमो दानवानां भवत्यत्र मनोहरः॥ ५
इत्येवं मानसं तत्राकल्पयत् पुरकल्पवित्।<br>मयेन तत्पुरं सृष्टं त्रिपुरं त्विति नः श्रुतम्॥ ६
कार्ष्णायसमयं यत्तु मयेन विहितं पुरम्।<br>तारकाख्योऽधिपस्तत्र कृतस्थानाधिपोऽवसत्॥ ७
यत्तु पूर्णेन्दुसंकाशं राजतं निर्मितं पुरम्।<br>विद्युन्माली प्रभुस्तत्र विद्युन्माली त्विवाम्बुदः॥ ८
सुवर्णाधिकृतं यच्च मयेन विहितं पुरम्।<br>स्वयमेव मयस्तत्र गतस्तदधिपः प्रभुः॥ ९
तारकस्य पुरं तत्र शतयोजनमन्तरम्।<br>विद्युन्मालिपुरं चापि शतयोजनकेऽन्तरे॥ १०
* अध्याय १३० *४५९

| मेरुपर्वतसंकाशं मयस्यापि पुरं महत्।<br>पुष्यसंयोगमात्रेण कालेन स मयः पुरा॥ ११<br><br>कृतवांस्त्रिपुरं दैत्यस्त्रिनेत्रः पुष्यकं यथा।<br>येन येन मयो याति प्रकुर्वाणः पुरं पुरात्॥ १२<br><br>प्रशस्तास्तत्र तत्रैव वारुण्या मालया स्वयम्।<br>रुक्मरूप्यायसानां च शतशोऽथ सहस्रशः॥ १३<br><br>रत्नाचितानि शोभन्ते पुराण्यमरविद्विषाम्।<br>प्रासादशतजुष्टानि कूटागारोत्कटानि च॥ १४<br><br>सर्वेषां कामगानि स्युः सर्वलोकातिगानि च।<br>सोद्यानवापीकूपानि सपद्मसरवन्ति च॥ १५<br><br>अशोकवनभूतानि कोकिलारुतवन्ति च।<br>चित्रशालविशालानि चतुःशालोत्तमानि च॥ १६<br><br>सप्ताष्टदशभौमानि सत्कृतानि मयेन च।<br>बहुध्वजपताकानि स्रग्दामालङ्कृतानि च॥ १७<br><br>किङ्किणीजालशब्दानि गन्धवन्ति महान्ति च।<br>सुसंयुक्तोपलिप्तानि पुष्यनैवेद्यवन्ति च॥ १८<br><br>यज्ञधूमान्धकाराणि सम्पूर्णकलशानि च।<br>गगनावरणाभानि हंसपङ्क्तिनिभानि च॥ १९<br><br>पङ्क्तीकृतानि राजन्ते गृहाणि त्रिपुरे पुरे।<br>मुक्ताकलापैर्लम्बद्भिर्हसन्तीव शशिश्रियम्॥ २० | जिस प्रकार पूर्वकालमें त्रिलोचन भगवान् शंकरने पुष्यककी रचना की थी, उसी प्रकार मयदानवने केवल पुष्यनक्षत्रके संयोगसे कालकी व्यवस्था करके त्रिपुरका निर्माण किया। पुरकी रचना करता हुआ मय जिस-जिस मार्गसे एक पुरसे दूसरे पुरमें जाता था, वहाँ-वहाँ वरुणकी दी हुई मालाद्वारा उत्पन्न चमत्कारसे सोने, चाँदी और लोहेके सैकड़ों-हजारों भवन स्वयं ही बनते जाते थे। उन देव-शत्रुओंके पुर रत्नखचित होनेके कारण विशेष शोभा पा रहे थे। वे सैकड़ों महलोंसे युक्त थे। उनमें ऊँचे-ऊँचे कूटागार (छतके ऊपरकी कोठरियाँ) बने थे। उनमें सभी लोग स्वच्छन्द विचरण करते थे। वे (सुन्दरतामें) सभी लोकोंका अतिक्रमण करनेवाले थे। उनमें उद्यान, बावली, कुआँ और कमलोंसे युक्त सरोवर शोभा पा रहे थे। उनमें अशोक वृक्षके बहुतेरे वन थे, जिनमें कोयलें कूकती रहती थीं। उनमें बड़ी-बड़ी चित्रशालाएँ और उत्तम अटारियाँ बनी थीं। मयने क्रमशः सात, आठ और दस तल्लेवाले भवनोंका बड़ी सुन्दरताके साथ निर्माण किया था। उनपर बहुसंख्यक ध्वज और पताकाएँ फहरा रही थीं। वे मालाकी लड़ियोंसे अलंकृत थे। उनमें लगी हुई क्षुद्र घण्टिकाओंके शब्द हो रहे थे। वे उत्कृष्ट गन्धयुक्त पदार्थोंसे सुवासित थे। उन्हें समुचितरूपसे उपलिप्त किया गया था। उनमें पुष्प, नैवेद्य आदि पूजन-सामग्री सँजोयी गयी थी और जलपूर्ण कलश स्थापित थे। वे यज्ञजन्य धुएँसे अन्धकारित हो रहे थे। उस त्रिपुर नामक पुरमें आकाशसरीखे नीले तथा हंसोंकी पङ्क्तिके समान उज्ज्वल भवन कतारोंमें सुशोभित हो रहे थे। उनमें लटकती हुई मोतियोंकी झालरें ऐसी प्रतीत होती थीं, मानो चन्द्रमाकी शोभाका उपहास कर रही हैं॥ ११-२०॥ | | मल्लिकाजातिपुष्पाद्यैर्गन्धधूपाधिवासितैः ।<br>पञ्चेन्द्रियसुखैर्नित्यं समैः सत्पुरुषैरिव॥ २१ | वे नित्य मल्लिका, चमेली आदि सुगन्धित पुष्पों तथा गन्ध, धूप आदिसे अधिवासित होनेसे पाँचों इन्द्रियोंके सुखोंसे समन्वित सत्पुरुषोंकी तरह सुशोभित हो रहे थे। | | हैमराजतलौहाद्यमणिरत्नाञ्जनाङ्किताः ।<br>प्राकारास्त्रिपुरे तस्मिन् गिरिप्राकारसंनिभाः॥ २२ | उस त्रिपुरमें सोने, चाँदी और लोहेके प्राचीर बने हुए थे, जिनमें मणि, रत्न और अंजन (काले पत्थर) जड़े हुए |

१३३- त्रिपुर-विध्वंसार्थ शिवजीके विचित्र रथका निर्माण और देवताओंके साथ उनका युद्धके लिये प्रस्थान

४६० * मत्स्यपुराण *


एकैकस्मिन् पुरे तस्मिन् गोपुराणां शतं शतम्।<br>सपताकाध्वजवतां दृश्यन्ते गिरिशृङ्गवत्॥ २३<br>नूपुरारावरम्याणि त्रिपुरे तत्पुराण्यपि।<br>स्वर्गातिरिक्तश्रीकाणि तत्र कन्यापुराणि च॥ २४<br>आरामैश्च विहारैश्च तडागवटचत्वरैः।<br>सरोभिश्च सरिद्भिश्च वनैश्चोपवनैरपि॥ २५<br>दिव्यभोगोपभोगानि नानारत्नयुतानि च।<br>पुष्पोत्करैश्च सुभगास्त्रिपुरस्योपनिर्गमाः।<br>परिखाशतगम्भीराः कृता मायानिवारणैः॥ २६<br>निशम्य तद्दुर्गविधानमुत्तमं<br>कृतं मयेनाद्भुतवीर्यकर्मणा।<br>दितेः सुता दैववराजवैरिणः<br>सहस्रशः प्रापुरनन्तविक्रमाः॥ २७<br>तदा सुरैर्दर्पितवैरीमर्दनै-<br>र्जनार्दनैः शैलकरीन्द्रसंनिभैः।<br>बभूव पूर्णं त्रिपुरं तथा पुरा<br>यथाम्बरं भूरिजलैर्जलप्रदैः॥ २८थे। वे ऐसे प्रतीत होते थे मानो पर्वतोंकी चहारदीवारी हो। उस एक-एक पुरमें सैकड़ों गोपुर बने थे, जिनपर ध्वजा और पताकाएँ फहरा रही थीं। वे पर्वत-शिखरके समान दीख रहे थे। उस त्रिपुरमें नूपुरोंकी झनकार होती थी, जिससे वे अत्यन्त रमणीय लग रहे थे। उन पुरोंका सौन्दर्य स्वर्गसे भी बढ़कर था। उनमें कन्यापुर भी बने हुए थे। वे बगीचों, विहारस्थलों, तड़ागों, वटवृक्षके नीचे बने चबूतरों, सरोवरों, नदियों, वनों और उपवनोंसे सम्पन्न थे। वे दिव्य भोगकी सामग्रियों और नाना प्रकारके रत्नोंसे परिपूर्ण थे। उस त्रिपुरके बाहर निकलनेवाले मार्गोंपर पुष्प बिखेरे गये थे, जिससे वे बड़े सुन्दर लग रहे थे। उनमें मायाको निवारण करनेवाले उपकरणोंद्वारा सैकड़ों गहरी खाइयाँ बनायी गयी थीं। अद्भुत पराक्रमयुक्त कर्म करनेवाले मयके द्वारा निर्मित उस उत्तम दुर्गकी रचनाका वृत्तान्त सुनकर देवराज इन्द्रके शत्रु अनन्त पराक्रमी हजारों दैत्य वहाँ आ पहुँचे। उस समय वह त्रिपुर गर्वीले शत्रुओंका मान मर्दन करनेवाले, जनताके लिये कष्टदायक तथा पर्वतीय गजेन्द्रोंके समान विशालकाय असुरोंसे उसी प्रकार खचाखच भर गया, जैसे अधिक जलवाले बादलोंसे आकाश आच्छादित हो जाता है॥ २१—२८॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें एक सौ तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३०॥


एक सौ इकतीसवाँ अध्याय

त्रिपुरमें दैत्योंका सुखपूर्वक निवास, मयका स्वप्न-दर्शन और दैत्योंका अत्याचार

सूत उवाच<br>निर्मिते त्रिपुरे दुर्गे मयेनासुरशिल्पिना।<br>तद् दुर्गं दुर्गतां प्राप बद्धवैरैः सुरासुरैः॥ १<br>सकलत्राः सपुत्राश्च शस्त्रवन्तोऽन्तकोपमाः।<br>मयादिष्टानि विविशुर्गृहाणि हृषिताश्च ते॥ २**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इस प्रकार असुरशिल्पी मयने त्रिपुर नामक दुर्गका निर्माण किया, परंतु अन्ततोगत्वा परस्पर बँधे हुए वैरवाले देवताओं और असुरोंके लिये वह दुर्ग दुर्गम हो गया। उस समय वे सभी शस्त्रधारी दैत्य जो यमराजके समान भयंकर थे, मयके आदेशसे अपनी स्त्रियों और पुत्रोंके साथ हर्षपूर्वक उन गृहोंमें