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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
* अध्याय २८२ *१०६७
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
अत्राप्युपोषितस्तद्वद् ब्राह्मणैः सह भोजनम्।<br>कुर्यात् पुष्परथाकारं काञ्चनं मणिमण्डितम्॥ ३<br>वलभीभिर्विचित्राभिश्चतुश्चक्रसमन्वितम् ।<br>कृष्णाजिने तिलद्रोणं कृत्वा संस्थापयेद् रथम्॥ ४<br>लोकपालाष्टकोपेतं ब्रह्मार्कशिवसंयुतम्।<br>मध्ये नारायणोपेतं लक्ष्मीपुष्टिसमन्वितम्॥ ५<br>तथाष्टादश धान्यानि भाजनासनचन्दनैः।<br>दीपिकोपानहच्छत्रदर्पणं पादुकान्वितम्॥ ६<br>ध्वजे तु गरुडं कुर्यात् कूबराग्रे विनायकम्।<br>नानाफलसमायुक्तमुपरिष्टाद् वितानकम्॥ ७<br>कौशेयं पञ्चवर्णं तु अम्लानकुसुमान्वितम्।<br>चतुर्भिः कलशैः सार्धं गोभिरष्टाभिरन्वितम्॥ ८<br>चतुर्भिर्हेममातङ्गैर्मुक्तादामविभूषितैः ।<br>स्वरूपतः गजाभ्यां च युक्तं कृत्वा निवेदयेत्॥ ९करे। इस महादानमें भी यजमानको उपवास रखकर ब्राह्मणोंके साथ भोजन करनेका विधान है। उसे मणियोंसे सुशोभित पुष्परथके आकारका सुवर्णमय रथ, जो विचित्र तोरणों और चार पहियोंसे युक्त हो, बनवाना चाहिये। उस रथको कृष्णमृगचर्मके ऊपर रखे गये एक द्रोण तिलपर स्थापित करना चाहिये। वह रथ आठों लोकपाल, ब्रह्मा, सूर्य और शिवकी प्रतिमाओंसे युक्त हो। उसके मध्य-भागमें लक्ष्मीसहित विष्णुभगवान्‌की भी मूर्ति होनी चाहिये। उसे अठारह प्रकारके अन्न, पात्र, आसन, चन्दन, दीपक, जूता, छत्र, दर्पण और पादुकासे भी युक्त होना चाहिये। उसके ध्वजपर गरुड तथा जुआके अग्रभागपर विनायकको स्थापित करना चाहिये। वह नाना प्रकारके फलोंसे युक्त हो और उसके ऊपर चंदोवा तना हो। वह पँचरंगे रेशमी वस्त्र, विकसित पुष्पों, चार माङ्गलिक कलशोंके साथ आठ गौओं तथा मोतियोंकी मालाओंसे विभूषित चार सुवर्णके हाथियोंसे सम्पन्न हो। पुनः दो जीवित हाथियोंको रथमें जोतकर दान करना चाहिये॥ १–९॥
कुर्यात् पञ्चपलादूर्ध्वमा भारादपि शक्तितः।<br>तथा मङ्गलशब्देन स्नापितो वेदपुङ्गवैः॥ १०<br>त्रिः प्रदक्षिणामावृत्य गृहीतकुसुमाञ्जलिः।<br>इममुच्चारयेन्मन्त्रं ब्राह्मणेभ्यो निवेदयेत्॥ ११अपनी शक्तिके अनुसार उस रथको पाँच पलसे ऊपर एक भार सोनेतकका बनवाना चाहिये। इस प्रकार वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा माङ्गलिक शब्दोंके उच्चारणके साथ स्नान कराया गया यजमान अञ्जलिमें फूल लेकर तीन बार प्रदक्षिणा करे तथा निम्नलिखित मन्त्रका उच्चारण कर ब्राह्मणोंको दान दे—
नमो नमः शङ्करपद्मजार्क-<br>लोकेशविद्याधरवासुदेवैः ।<br>त्वं सेव्यसे वेदपुराणयज्ञै-<br>स्तेजोमयस्यन्दन पाहि तस्मात्॥ १२'तेजोमय स्यन्दन! शङ्कर, ब्रह्मा, सूर्य, लोकपाल, विद्याधर, वासुदेव, वेद, पुराण और यज्ञ तुम्हारी सेवा करते हैं, अतः तुम मेरी रक्षा करो। तुम्हें बारम्बार नमस्कार है।
यत्तत्पदं परमगुह्यतमं मुरारे-<br>रानन्दहेतुगुणरूपविमुक्तमन्तः ।<br>योगैकमानसद्दशो मुनयः समाधौ<br>पश्यन्ति तत्त्वमसि नाथ रथाधिरूढ ॥ १३रथाधिरूढ स्वामिन्! विष्णुभगवान्‌का जो पद परमगुह्यतम, आनन्दका हेतु और गुण एवं रूपसे परे है तथा एकमात्र योगरूप मानसिक दृष्टिवाले मुनिगण जिसका समाधिकालमें दर्शन करते हैं वह आप ही हैं।
यस्मात् त्वमेव भवसागरसम्प्लुताण्ड-<br>मानन्दभारमृतमध्वरपानपात्रम् ।<br>तस्मादघौघशमनेन कुरु प्रसादं<br>चामीकरेभरथ माधव सम्प्रदानात्॥ १४माधव! चूँकि आप ही भवसागरमें डूबनेवालोंके लिये आनन्दके पात्र, सत्यस्वरूप तथा यज्ञोंमें पानपात्र हैं, इसलिये आप इस सुवर्णमय हस्तिरथके दानसे मेरे पापपुञ्जोंको नष्टकर मुझपर कृपा कीजिये।'
इत्थं प्रणम्य कनकेभरथप्रदानं<br>यः कारयेत् सकलपापविमुक्तदेहः।<br>विद्याधरामरमुनीन्द्रगणाभिजुष्टं<br>प्राप्नोत्यसौ पदमतीन्द्रियमिन्दुमौलेः॥ १५जो मनुष्य इस प्रकार प्रणाम करके स्वर्णमय हस्तिरथका दान करता है उसका शरीर समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है और वह शङ्करजीके विद्याधर, देवगण एवं मुनीन्द्रगणोंद्वारा सेवित इन्द्रियातीत लोकको प्राप्त करता है। वह पूर्व

१०६८ * मत्स्यपुराण *


| कृतदुरितवितानप्रज्वलद्वह्निजाल-<br>  व्यतिकरकृतदाहोद्वेगभाजोऽपि बन्धून्।<br>नयति स पितृपुत्रान् बान्धवानप्यशेषान्<br>  कृतगजरथदानाच्छाश्वतं सद्म विष्णोः॥ १६॥ | जन्मके किये गये दुष्कर्म-रूप वितानसे आच्छादित प्रज्वलित अग्निकी ज्वालाओंके संयोगसे उत्पन्न हुए दाहके उद्वेगसे युक्त बन्धुओं, पितरों, पुत्रों तथा सम्पूर्ण बान्धवोंको इस हस्तिरथके दानसे विष्णुभगवान्के शाश्वत लोकमें ले जाता है॥ १०—१६॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने हेमहस्तिरथप्रदानविधिर्नाम द्व्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-वर्णन-प्रसङ्गमें हेमहस्तिरथ-प्रदान-विधि नामक दो सौ बयासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८२॥


दो सौ तिरासीवाँ अध्याय

पञ्चलाङ्गल (हल) प्रदानकी विधि

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>पञ्चलाङ्गलकं नाम महापातकनाशनम्॥ १<br>पुण्यां तिथिंमथासाद्य युगादिग्रहणादिकाम्।<br>भूमिदानं नरो दद्यात् पञ्चलाङ्गलकान्वितम्॥ २<br>खर्वटं खेटकं वापि ग्रामं वा सस्यशालिनम्।<br>निवर्त्तनशतं वापि तदर्धं वापि शक्तितः॥ ३<br>सारदारुमयान् कृत्वा हलान् पञ्च विचक्षणः।<br>सर्वोपकरणैर्युक्तानन्यान् पञ्च च काञ्चनान्।<br>कुर्यात् पञ्चपलादूर्ध्वमासहस्रपलावधि॥ ४<br>वृषाँल्लक्षणसंयुक्तान् दश चैव धुरन्धरान्।<br>सुवर्णशृङ्गाभरणान् मुक्तालाङ्गलभूषणान्॥ ५<br>रूप्यपादाग्रतिलकान् रक्तकौशेयभूषणान्।<br>स्रग्दामचन्दनयुताञ्शालायामधिवासयेत्॥ ६<br>पर्जन्यादित्यरुद्रेभ्यः पायसं निर्वपेच्चरुम्।<br>एकस्मिन्नेव कुण्डे तु गुरुस्तेभ्यो निवेदयेत्॥ ७<br>पलाशसमिधस्तद्वदाज्यं कृष्णतिलास्तथा।<br>तुलापुरुषवत् कुर्याल्लोकेशावाहनं बुधः॥ ८<br>ततो मङ्गलशब्देन शुक्लमाल्याम्बरो बुधः।<br>आहूय द्विजदाम्पत्यं हेमसूत्राङ्गुलीयकैः॥ ९अब इसके बाद मैं महापातकनाशी अतिश्रेष्ठ पञ्चलाङ्गल नामक महादानका वर्णन कर रहा हूँ। युगादि तिथियों तथा सूर्यग्रहण आदिके अवसरपर मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार पाँच हलोंसे युक्त, फसलसे सुशोभित ग्राम, खेट, खर्वट, एक सौ निवर्तन या उससे आधा पचास निवर्तन भूमिको दान करना चाहिये। विचक्षण पुरुष साखूकी लकड़ीके पाँच तथा सुवर्णके बने हुए अन्य पाँच हलोंको सभी सामग्रियोंसे युक्त करे। वे हल पाँच पल सोनेसे ऊपर एक हजार पलतकके बनवाने चाहिये। साथ ही दस वृषभोंको, जो उत्तम लक्षणोंसे युक्त तथा भार ढोनेमें समर्थ हों, जिनकी सींगें सुवर्णसे, पूँछ मोतीसे और खुर चाँदीसे विभूषित हों, जिनके सिरपर तिलक लगा हो, जो लाल रेशमी वस्त्रसे सुशोभित तथा पुष्पमाला और चन्दनसे युक्त हों, शालामें अधिवासित कराये। फिर पर्जन्य, आदित्य और रुद्रके लिये खीरकी चरु तैयार करे और गुरु उसे एक ही कुण्डमें उनके लिये निवेदित करे। उसी प्रकार पलाशकी समिधा, घृत तथा काले तिलका हवन करे। बुद्धिमान् यजमान तुलापुरुष-दानकी भाँति लोकपालोंका आवाहन करे। तदनन्तर शुक्ल वस्त्र एवं पुष्पमाला धारण कर बुद्धिमान् पुरुष माङ्गलिक शब्दोंके साथ द्विजदम्पतिको बुलाकर सोनेकी
* अध्याय २८३ *१०६९

| कौशेयवस्त्रकटकैर्मणिभिश्चाभिपूजयेत् ।<br>शय्यां सोपस्करां दद्याद् धेनुमेकां पयस्विनीम्॥ १०<br><br>तथाष्टादश धान्यानि समंतादधिवासयेत्।<br>ततः प्रदक्षिणीकृत्य गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥ ११<br><br>इममुच्चारयेन्मन्त्रमथ सर्वं निवेदयेत्।<br>यस्माद् देवगणाः सर्वे स्थावराणि चराणि च॥ १२<br><br>धुरंधराङ्गे तिष्ठन्ति तस्माद् भक्तिः शिवेऽस्तु मे।<br>यस्माच्च भूमिदानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १३<br><br>दानान्यन्यानि मे भक्तिर्धर्म एवं दृढा भवेत्।<br>दण्डेन सप्तहस्तेन त्रिंशद्दण्डं निवर्तनम्॥ १४<br><br>त्रिभागहीनं गोचर्ममानमाह प्रजापतिः।<br>मानेनानेन यो दद्यान्निवर्तनशतं बुधः।<br>विधिनानेन तस्याशु क्षीयते पापसंहतिः॥ १५<br><br>तदर्थमथवा दद्यादपि गोचर्ममात्रकम्।<br>भवनस्थानमात्रं वा सोऽपि पापैः प्रमुच्यते॥ १६<br><br>यावन्ति लाङ्गलकमार्गमुखानि भूमे-<br>र्भासां पतेर्दुहितुरङ्गजरोमकाणि।<br>तावन्ति शङ्करपुरे ससमा हि तिष्ठेद्<br>भूमिप्रदानमिह यः कुरुते मनुष्यः॥ १७<br><br>गन्धर्वकिन्नरसुरसुरसिद्धसङ्घै-<br>राधूतचामरमुपेत्य महद्विमानम्।<br>सम्पूज्यते पितृपितामहबन्धुयुक्तः<br>शम्भोः पदं व्रजति चामरनायकः सन्॥ १८<br><br>इन्द्रत्वमप्यधिगतं क्षयमभ्युपैति<br>गोभूमिलाङ्गलधुरन्धरसम्प्रदानात् ।<br>तस्मादघौघपटलक्षयकारि भूमे-<br>र्दानं विधेयमिति भूतिभवोद्भवाय॥ १९ | जंजीर, अंगूठी, रेशमी वस्त्र, सुवर्णके कङ्कण एवं मणियोंद्वारा उनकी पूजा करे तथा सामग्रियोंसहित शय्या और एक दूध देनेवाली गायका भी दान करे॥ १-१०॥<br><br>हलोंके चारों ओर अठारह प्रकारके अन्नोंको रखना चाहिये। फिर अञ्जलिमें फूल लेकर प्रदक्षिणा करनेके पश्चात् सबका दान कर देना चाहिये। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करे—'चूँकि सभी देवगण तथा चराचर जीव भारवाही वृषभोके अङ्गोंमें निवास करते हैं, अतः मेरी शिवमें भक्ति हो। चूँकि अन्य सभी दान भूमिदानकी सोलहवीं कलाकी भी समता नहीं कर सकते, अतः धर्ममें मेरी सुदृढ़ भक्ति हो।' सात (मतान्तरसे दस) हाथोंके दण्डके मापसे तीस दण्ड मापका एक निवर्तन होता है और उसके तिहाई अंशसे न्यूनको गोचर्म* कहते हैं—ऐसा मान प्रजापतिने बतलाया है। जो बुद्धिमान् पुरुष इस मानके अनुसार एक सौ निवर्तन भूमिको इस विधिसे दान करता है, उसका पापपुञ्ज शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जो उसका आधा भाग या गोचर्ममात्र अथवा एक भवन बनने योग्य भूमिका दान करता है, वह भी पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य इस मर्त्यलोकमें भूमि-दान करता है, वह उस भूमिमें हलके मुखके जितने मार्ग बनते हैं तथा सूर्यपुत्रीके अङ्गमें जितने रोएँ हैं, उतने वर्षोंतक शंकरपुरीमें निवास करता है तथा गन्धर्व, किन्नर, सुर, असुर और सिद्धोंके समूहोंद्वारा चँवर डुलाये जाते हुए महान् विमानपर सवार हो पिता, पितामह और बन्धुगणोंके साथ देवनायक होकर शम्भुलोकमें जाता है और वहाँ पूजित होता है। मनुष्य इस गौ, भूमि, हल और वृषभोका दान करनेसे नष्ट हुए इन्द्रत्वको भी प्राप्त कर लेता है, अतः ऐश्वर्य एवं समृद्धिके लिये पापपुञ्जके परदेको नष्ट करनेवाले भूमिदानको अवश्य करना चाहिये॥ ११-१९॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने पञ्चलाङ्गलप्रदानविधिर्नाम त्र्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादानानुकीर्तन-प्रसंगमें पञ्चलाङ्गलप्रदान-विधि नामक दो सौ तिरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८३॥


* दशहस्तेन दण्डेन त्रिंशद्दण्डानिवर्तनम्। दश तान्येव गोचर्म दत्त्वा स्वर्गे महीयते ॥

१०७० * मत्स्यपुराण *


दो सौ चौरासीवाँ अध्याय

हेमधरा (सुवर्णमयी पृथ्वी)-दानकी विधि

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि धरादानमनुत्तमम्।<br>पापक्षयकरं नृणाममङ्गल्यविनाशनम्॥ १<br>कारयेत् पृथिवीं हैमीं जम्बूद्वीपानुकारिणीम्।<br>मर्यादापर्वतवतीं मध्ये मेरुसमन्विताम्॥ २<br>लोकपालाष्टकोपेतां नववर्षसमन्विताम्।<br>नदीनदसमोपेतां सप्तसागरवेष्टिताम्॥ ३<br>महारत्नसमाकीर्णां वसुरुद्रार्कसंयुताम्।<br>हेम्नः पलसहस्रेण तदर्धेनाथ भक्तितः॥ ४<br>शतत्रयेण वा कुर्याद् द्विशतेन शतेन वा।<br>कुर्यात् पञ्चपलादूर्ध्वमशक्तोऽपि विचक्षणः॥ ५<br>तुलापुरुषवत् कुर्याल्लोकेशावाहनं बुधः।<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ॥ ६<br>वेद्यां कृष्णाजिनं कृत्वा तिलानामुपरि न्यसेत्।<br>तथाष्टादशधान्यानि रसांश्च लवणादिकान्॥ ७<br>तथाष्टौ पूर्णकलशान् समन्तात् परिकल्पयेत्।<br>वितानकं च कौशेयं फलानि विविधानि च॥ ८<br>तथांशुकानि रम्याणि श्रीखण्डशकलानि च।<br>इत्येवं कारयित्वा तामधिवासनपूर्वकम्॥ ९<br>शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लाभरणभूषितः।<br>प्रदक्षिणं ततः कृत्वा गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥ १०<br>पुण्यं कालमथासाद्य मन्त्रानेतानुदीरयेत्।अब इसके बाद मैं मनुष्योंके अमङ्गल और पापको नष्ट करनेवाले सर्वश्रेष्ठ हेमधरादानका वर्णन कर रहा हूँ। दानी इस दानमें जम्बूद्वीपके आकारकी भाँति सुवर्णमयी पृथ्वीकी रचना करवाये, वह मध्यमें सुमेरुपर्वतसे युक्त, मर्यादापर्वतोंसे सम्पन्न तथा आठ लोकपालों, नौ वर्षों, नदियों और नदोंसे युक्त हो, सातों सागरोंसे घिरी हुई हो। उसे बहुमूल्य रत्नोंसे जटिल तथा वसु, रुद्र और आदित्योंसे युक्त कर दे। इस पृथ्वीको अपनी शक्तिके अनुसार एक हजार, पाँच सौ, तीन सौ, दो सौ या एक सौ पल सोनेका बनवाना चाहिये। विचक्षण पुरुष अपनी असमर्थतामें इसे पाँच पलसे अधिक स्वर्णसे भी बनवा सकता है। बुद्धिमान् पुरुष तुलापुरुष-दानकी भाँति लोकपालोंका आवाहन तथा ऋत्विज्, मण्डप, पूजनसामग्री, आभूषण और आच्छादन आदिका संकलन करे। फिर वेदीपर कृष्णमृगचर्म फैलाकर उसके ऊपर रखी हुई तिलराशिपर पृथ्वीकी प्रतिमा स्थापित कर दे। तत्पश्चात् उसके चारों ओर अठारह प्रकारके अन्नों, लवणादि रसों और जलसे भरे आठ माङ्गलिक कलशोंको स्थापित करना चाहिये। उसे रेशमी चाँदौवा, विविध प्रकारके फल, मनोहर रेशमी वस्त्र और चन्दनोंके टुकड़ोंसे अलंकृत करना चाहिये। इस प्रकार अधिवासनपूर्वक पृथ्वीका सारा कार्य सम्पन्नकर स्वयं श्वेत वस्त्र और पुष्पमाला धारणकर, श्वेत वर्णके आभूषणोंसे विभूषित हो अञ्जलिमें पुष्प लेकर प्रदक्षिणा करे तथा पुण्यकाल आनेपर इन मन्त्रोंका उच्चारण करे॥ १—१० १/२ ॥
नमस्ते सर्वदेवानां त्वमेव भवनं यतः॥ ११<br>धात्री च सर्वभूतानामतः पाहि वसुंधरे।<br>वसु धारयसे यस्माद् वसु चातीव निर्मलम्॥ १२<br>वसुंधरा ततो जाता तस्मात् पाहि भयादलम्।<br>चतुर्मुखोऽपि नो गच्छेद यस्मादन्तं तवाचले॥ १३'वसुंधरे! चूँकि तुम्हीं सभी देवताओं तथा सम्पूर्ण जीवनिकायकी भवनभूता तथा धात्री हो, अतः मेरी रक्षा करो। तुम्हें नमस्कार है। चूँकि तुम सभी प्रकारके भवनों, उनमें वास करनेवाले प्राणियों तथा अत्यन्त निर्मल रत्नोंको भी धारण करती हो, इसीसे तुम्हारा वसुंधरा नाम है, तुम संसार-भयसे मेरी रक्षा करो। अचले! चूँकि ब्रह्मा भी तुम्हारे अन्तको नहीं प्राप्त कर सकते,
* अध्याय २८५ *१०७१
अनन्तायै नमस्तस्मात् पाहि संसारकर्दमात्।<br>त्वमेव लक्ष्मी गोविन्दे शिवे गौरीति चास्थिता॥ १४इसलिये तुम अनन्ता हो, तुम्हें प्रणाम है। तुम इस संसाररूप कीचड़से मेरी रक्षा करो। तुम्हीं विष्णुमें लक्ष्मी, शिवमें गौरी, ब्रह्माके समीप गायत्री, चन्द्रमामें ज्योत्स्ना, रविमें प्रभा, बृहस्पतिमें बुद्धि और मुनियोंमें मेधा नामसे ख्यात हो। चूँकि तुम समस्त विश्वमें व्याप्त हो, इसलिये विश्वम्भरा कही जाती हो। धृति, स्थिति, क्षमा, क्षोणी, पृथ्वी, वसुमती तथा रसा—ये तुम्हारी मूर्तियाँ हैं। देवि! तुम अपनी इन मूर्तियोंद्वारा इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करो।' इस प्रकार उच्चारणकर पृथ्वीकी मूर्तिको ब्राह्मणोंको निवेदित कर दे। उस पृथ्वीका आधा अथवा चौथाई भाग गुरुको समर्पित करे। शेष भाग ऋत्विजोंको देकर उन्हें नमस्कार कर विसर्जन करे। जो मनुष्य पुण्यकाल आनेपर सुवर्णनिर्मित कल्याणमयी पृथ्वीका इस विधिके साथ दान करता है, वह वैष्णव पदको प्राप्त होता है तथा क्षुद्रघंटिकाओं (घुँघरू)-से सुशोभित एवं सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा वैकुण्ठमें जाकर तीन कल्पपर्यन्त निवास करता है और इक्कीस पीढ़ियोंके पितरों, पुत्रों तथा पौत्रोंका उद्धार कर देता है। इस प्रकार जो मनुष्य इस विधिको प्रसङ्गवश भी पढ़ता अथवा श्रवण करता है, उसका शरीर सर्वथा पापसमूहोंसे मुक्त हो जाता है और वह स्वर्गलोकमें देवाङ्गनाओंद्वारा प्रार्थित होता हुआ सहस्रों देवताओंद्वारा सेवित शंकरजीके लोकको प्राप्त होता है॥ ११—२१॥
गायत्री ब्रह्मणः पार्श्वे ज्योत्स्ना चन्द्रे रवौ प्रभा।<br>बुद्धिर्बृहस्पतौ ख्याता मेधा मुनिषु संस्थिता॥ १५
विश्वं व्याप्य स्थिता यस्मात्ततो विश्वम्भरा स्मृता।<br>धृतिः स्थितिः क्षमा क्षोणी पृथ्वी वसुमती रसा॥ १६
एताभिर्मूर्तिभिः पाहि देवि संसारसागरात्।<br>एवमुच्चार्य तां देवीं ब्राह्मणेभ्यो निवेदयेत्॥ १७
धरार्धं वा चतुर्थांशं गुरवे प्रतिपादयेत्।<br>शेषं चैवाथ ऋत्विग्भ्यः प्रणिपत्य विसर्जयेत्॥ १८
अनेन विधिना यस्तु दद्याद्धेमधरां शुभाम्।<br>पुण्यकाले तु सम्प्राप्ते स पदं याति वैष्णवम्॥ १९
विमानेनार्कवर्णेन किङ्किणीजालमालिना।<br>नारायणपुरं गत्वा कल्पत्रयमथावसेत्।<br>पितॄन् पुत्रांश्च पौत्रांश्च तारयेदेकविंशतिम्॥ २०
इति पठति य इत्थं यः शृणोति प्रसङ्गा-<br>दपि कलुषवितानैर्मुक्तदेहः समन्तात्।<br>दिवममरवधूभिर्याति सम्प्रार्थ्यमानो<br>पदममरसहस्रैः सेवितं चन्द्रमौलेः॥ २१

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने हेमपृथिवीदानमाहात्म्यं नाम चतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-प्रसङ्गमें हेम-पृथ्विदान-माहात्म्य नामक दो सौ चौरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८४॥


दो सौ पचासीवाँ अध्याय

विश्वचक्रदानकी विधि

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्‌ने कहा—
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>विश्वचक्रमिति ख्यातं महापातकनाशनम्॥ १<br>तपनीयस्य शुद्धस्य विश्वचक्रं तु कारयेत्।<br>श्रेष्ठं पलसहस्रेण तदर्धेन तु मध्यमम्॥ २अब इसके बाद मैं महापातकनाशी एवं अत्यन्त श्रेष्ठ विश्वचक्र नामक महादानकी विधि बतला रहा हूँ। यह विश्वचक्र तपाये हुए शुद्ध स्वर्णका बनवाना चाहिये। यह विश्वचक्र एक सहस्र पल सुवर्णका उत्तम, पाँच सौ पलका मध्यम और
१०७२* मत्स्यपुराण *

| तस्यार्धेन कनिष्ठं स्याद् विश्वचक्रमुदाहृतम्।<br>अन्यद् विंशात् पलादूर्ध्वमशक्तोऽपि निवेदयेत्॥ ३<br>षोडशारं ततश्चक्रं भ्रमन्नेम्यष्टकावृतम्।<br>नाभिपद्मे स्थितं विष्णुं योगारूढं चतुर्भुजम्॥ ४<br>शङ्खचक्रेऽस्य पार्श्वे तु देव्यष्टकसमावृतम्।<br>द्वितीयावरणे तद्वत् पूर्वतो जलशायिनम्॥ ५<br>अत्रिर्भृगुर्वसिष्ठश्च ब्रह्मा कश्यप एव च।<br>मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नरसिंहोऽथ वामनः॥ ६<br>रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्कीति वै क्रमात्।<br>तृतीयावरणे गौरी मातृभिर्वसुभिर्युता॥ ७<br>चतुर्थे द्वादशादित्या वेदाश्चत्वार एव च।<br>पञ्चमे पञ्च भूतानि रुद्राश्चैकादशैव तु॥ ८<br>लोकपालाष्टकं षष्ठे दिङ्मातङ्गास्तथैव च।<br>सप्तमेऽस्त्राणि सर्वाणि मङ्गलानि च कारयेत्॥ ९<br>अन्तरान्तरतो देवान् विन्यसेदष्टमे पुनः।<br>तुलापुरुषवच्छेषं समन्तात् परिकल्पयेत्॥ १०<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ।<br>विश्वचक्रं ततः कुर्यात् कृष्णाजिनतिलोपरि॥ ११ | ढाई सौ पलका कनिष्ठ कहा गया है। अल्प वित्तवाला मनुष्य अन्य प्रकारसे बीस पलसे ऊपरका बना हुआ विश्वचक्र दान कर सकता है। यह चक्र सोलह अरों तथा आठ नेमियोंसे युक्त घूमता हुआ होना चाहिये। उसके नाभि-कमलपर योगारूढ चतुर्भुज विष्णुको स्थापित करना चाहिये। उनके बगलमें शङ्ख और चक्र हों तथा आठ देवियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरे हुए हों। उसके दूसरे आवरणमें उसी प्रकार जलशायी, अत्रि, भृगु, वसिष्ठ, ब्रह्मा, कश्यप, मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, रामचन्द्र, परशुराम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि को, तीसरे आवरणमें मातृकाओं तथा वसुओंसहित गौरीको, चतुर्थ आवरणमें बारहों आदित्यों तथा चारों वेदोंको, पाँचवें आवरणमें पाँचों महाभूतों तथा ग्यारहों रुद्रको, छठे आवरणमें आठों लोकपालों तथा दिग्गजोंको, सप्तम आवरणमें सभी प्रकारके माङ्गलिक अस्त्रोंको तथा अष्टम आवरणमें थोड़े-थोड़े अन्तरपर देवताओंको स्थापित करे। शेष कार्य तुला-पुरुष-दानकी तरह करना चाहिये। उसी तरह ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, भूषण और आच्छादन आदिको भी रखना चाहिये। फिर उक्त विश्वचक्रको कृष्णमृगचर्मपर रखे गये तिलके ऊपर स्थापित करना चाहिये॥ १—११॥ | | तथाष्टादश धान्यानि रसांश्च लवणादिकान्।<br>पूर्णकुम्भाष्टकं चैव वस्त्राणि विविधानि च॥ १२<br>माल्येक्षुफलरत्नानि वितानं चापि कारयेत्।<br>ततो मङ्गलशब्देन स्नातः शुक्लाम्बरो गृही।<br>होमाधिवासनान्ते वै गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥ १३<br>इममुच्चारयेन्मन्त्रं त्रिः कृत्वा तु प्रदक्षिणम्।<br>नमो विश्वमयायेति विश्वचक्रात्मने नमः॥ १४<br>परमानन्दरूपी त्वं पाहि नः पापकर्दमात्।<br>तेजोमयमिदं यस्मात् सदा पश्यन्ति योगिनः॥ १५<br>हृदि तत्त्वं गुणातीतं विश्वचक्रं नमाम्यहम्।<br>वासुदेवे स्थितं चक्रं चक्रमध्ये तु माधवः॥ १६<br>अन्योन्याधाररूपेण प्रणमामि स्थिताविह।<br>विश्वचक्रमिदं यस्मात् सर्वपापहरं परम्॥ १७ | फिर अठारह प्रकारके अन्न, लवण आदि सभी रस, जलसे भरे हुए आठ माङ्गलिक कलश, विविध प्रकारके वस्त्र, पुष्पमाला, ईख, फल, रत्न, वितान—इन सबको भी यथास्थान रखना चाहिये। तदनन्तर माङ्गलिक शब्दोंके साथ गृहस्थ यजमान स्नान करके श्वेत वस्त्र धारणकर हवन एवं अधिवासनके उपरान्त अञ्जलिमें पुष्प ग्रहणकर तीन बार प्रदक्षिणा करे और इस मन्त्रका उच्चारण करे—'विश्वमयको नमस्कार है। विश्वचक्रात्माको प्रणाम है। तुम परमानन्दस्वरूप हो, अतः पापरूप कीचड़से हमारी रक्षा करो। चूँकि इस तत्त्वस्वरूप, गुणातीत, तेजोमय विश्वचक्रको योगीलोग सदा अपने हृदयमें देखते हैं, अतः मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। यह विश्वचक्र वासुदेवमें स्थित है और माधव इस चक्रके मध्य भागमें स्थित हैं, इस प्रकार तुम दोनों अन्योन्याधाररूपसे स्थित हो, तुम्हें मैं प्रणाम करता हूँ। चूँकि यह विश्वचक्र सम्पूर्ण पातकोंका विनाश करनेवाला, |

* अध्याय २८६ *१०७३

| आयुधं चापि वासश्च भवाद्युद्धर मामतः।<br>इत्यामन्त्र्य च यो दद्याद् विश्वचक्रं विमत्सरः ॥ १८<br>विमुक्तः सर्वपापेभ्यो विष्णुलोके महीयते।<br>वैकुण्ठलोकमासाद्य चतुर्बाहुः सनातनः ॥ १९<br>सेव्यतेऽप्सरसां सङ्घैस्तिष्ठेत् कल्पशतत्रयम्।<br>प्रणमेद् वाथ यः कृत्वा विश्वचक्रं दिने दिने।<br>तस्यायुर्वर्धते नित्यं लक्ष्मीश्च विपुला भवेत् ॥ २०<br>इति सकलजगत्सुराधिवासं<br>वितरति यस्तपनीयषोडशारम्।<br>हरिभवनमुपागतः स सिद्ध-<br>श्चिरमभिगम्य नमस्यते शिरोभिः ॥ २१<br>असुदर्शनतां प्रयाति शत्रो-<br>र्मदनसुदर्शनतां च कामिनीभ्यः।<br>स सुदर्शनकेशवानुरूपः<br>कनकसुदर्शनदानदग्धपापः ॥ २२<br>कृतगुरुदुरितानि षोडशार-<br>प्रवितरणे प्रवराकृतिर्मुरारेः।<br>अभिभवति भवोद्भवन्ति भित्त्वा<br>भवमभितो भवने भयानि भूयः ॥ २३ | भगवान्‌का आयुध तथा उनका निवासस्वरूप भी है, अतः इस भवसे मेरा उद्धार करें।' इस प्रकार आमन्त्रित करके जो मनुष्य मत्सररहित हो इस विश्वचक्रका दान करता है, वह सभी पापोंसे छूटकर विष्णुलोकमें पूजित होता है तथा वैकुण्ठलोकको प्राप्तकर चार भुजाओंसे युक्त और अविनाशी हो जाता है तथा अप्सरासमूहोंद्वारा सेवित होकर तीन सौ कल्पोंतक वहाँ निवास करता है। अथवा जो व्यक्ति इस विश्वचक्रका निर्माण कर इसे प्रतिदिन प्रणाम करता है, उसकी आयु बढ़ती है और नित्य लक्ष्मीकी वृद्धि होती है। इस प्रकार जो व्यक्ति सुवर्णनिर्मित सोलह अरोंसे युक्त तथा समस्त जगत् एवं देवताओंके अधिष्ठानरूप इस चक्रको वितरित करता है, वह विष्णु-भवनको प्राप्त होता है तथा उसे सिद्धगण सिर झुकाकर नमस्कार करते हैं। वह पुरुष स्वर्णनिर्मित सुदर्शनके दानसे निष्पाप होकर शत्रुओंको विकराल रूपमें तथा कामिनियोंको मदनकी भाँति सुन्दर कमनीयरूपमें दिखायी पड़ता है और शुभदर्शन केशवकी भाँति मनोरम स्वरूप धारण करता है। इस सोलह अरोंवाले सुवर्णनिर्मित चक्रके दान करनेसे किये गये महापाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं और कर्ता मुरारिकी श्रेष्ठ आकृति प्राप्त करता है तथा भव-भयका भेदन कर बार-बार जन्म-मरणके भयसे भी छूट जाता है ॥ १२—२३ ॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने विश्वचक्रप्रदानविधिर्नाम पञ्चाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-वर्णन-प्रसंगमें विश्वचक्रप्रदान-विधि नामक दो सौ पचासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २८५ ॥


दो सौ छियासीवाँ अध्याय

कनककल्पलतादानकी विधि

मत्स्य उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>महाकल्पलता नाम महापातकनाशनम् ॥ १<br><br>पुण्यां तिथिंमथासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ॥ २<br><br>तुलापुरुषवत् कुर्याल्लोकेशावाहनं बुधः।<br>चामीकरमयीः कुर्याद् दश कल्पलताः समाः ॥ ३मत्स्यभगवान्‌ने कहा— इसके बाद मैं महापापोंको नष्ट करनेवाले परमोत्तम महाकल्पलता नामक महादानकी विधि बतला रहा हूँ। बुद्धिमान् यजमान किसी पुण्यतिथिके दिन पुण्याहवाचन करके पूर्वकथित तुलापुरुष-दानके समान ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, आभूषण और आच्छादन आदिका प्रबन्ध करे तथा उसी प्रकार लोकपालोंका आवाहन करे। कल्पलता-दानके लिये सुवर्णनिर्मित समान परिमाणकी दस कल्पलताएँ बनवाये,

१०७४ * मत्स्यपुराण *


नानापुष्पफलोपेता नानांशुकविभूषिताः ।<br>विद्याधरसुपर्णानां मिथुनैरुपशोभिताः ॥ ४<br><br>पुष्पाण्यादित्सुभिः सिद्धैः फलानि च विहङ्गमैः ।<br>लोकपालानुकारिण्यः कर्तव्यास्तासु देवताः ॥ ५<br><br>ब्राह्मीमनन्तशक्तिं च लवणस्योपरि न्यसेत् ।<br>अधस्ताल्लतयोर्मध्ये पद्मशङ्खकरे शुभे ॥ ६<br><br>इमासनस्था तु गुडे पूर्वतः कुलिशायुधा ।<br>रजन्यजस्थिताग्नायी स्रुवपाणिरथानले ॥ ७<br><br>याम्ये च महिषारूढा गदिनी तण्डुलोपरि ।<br>नैर्ऋते नैर्ऋती स्थाप्या सखड्गा दक्षिणापरे ॥ ८<br><br>वारुणे वारुणी क्षीरे झषस्था नागपाशिनी ।<br>पताकिनी च वायव्ये मृगस्था शर्करोपरि ॥ ९<br><br>सौम्या तिलेषु संस्थाप्या शङ्खिनी निधिसंस्थिता ।<br>माहेश्वरी वृषारूढा नवनीते त्रिशूलिनी ॥ १०<br><br>मौलिन्यो वरदास्तद्वत् कर्तव्या बालकान्विताः ।<br>शक्त्या पञ्चपलादूर्ध्वमासहस्रात् प्रकल्पयेत् ॥ ११<br><br>सर्वासामुपरि स्थाप्यं पञ्चवर्णं वितानकम् ।<br>धेनवो दश कुम्भाश्च वस्त्रयुग्मानि चैव हि ॥ १२<br><br>मध्यमे द्वे तु गुरवे ऋत्विग्भ्योऽन्यास्तथैव च ।<br><br>ततो मङ्गलशब्देन स्नातः शुक्लाम्बरो बुधः ।<br>त्रिः प्रदक्षिणमावृत्य मन्त्रमेतमुदीरयेत् ॥ १३<br><br>नमो नमः पापविनाशिनीभ्यो<br>ब्रह्माण्डलोकेश्वरपालिनीभ्यः ।<br>आशंसिताधिक्यफलप्रदाभ्यो<br>दिग्भ्यस्तथा कल्पलतावधूभ्यः ॥ १४<br><br>इति सकलदिगङ्गनाप्रदानं<br>भवभयसूदनकारि यः करोति ।<br>अभिमतफलदे स नागलोके<br>वसति पितामहवत्सराणि त्रिंशत् ॥ १५<br><br>पितृशतमथ तारयेद् भवाब्धे-<br>र्भवदुरितौघविघातशुद्धदेहः ।जो विविध प्रकारके पुष्पों और फलोंसे युक्त तथा विविध रेशमी वस्त्रोंसे विभूषित तथा विद्याधरों एवं पक्षियोंके जोड़ोंसे सुशोभित हों। उन्हें पुष्प चुननेका प्रयत्न करते हुए सिद्धों, फल खानेके लिये उत्सुक पक्षियों तथा लोकपालोंके समान आकृतिवाली देवियोंसे युक्त बनाना चाहिये। फिर लवणराशिके ऊपर अनन्त एवं ब्राह्मी शक्तिको स्थापित करना चाहिये। दो लताओंके निम्नभागमें पद्म और शङ्खसे सुशोभित हाथोंवाली उन दोनों मङ्गलमयी देवियोंको चित्रित करे॥ १—६॥<br><br>पूर्व दिशामें गुड़के ऊपर कुलिशका अस्त्र धारण किये हुए हाथीपर विराजमान इन्द्राणीको, अग्निकोणमें हल्दी-चूर्णपर स्रुवा हाथमें लिये हुए बकरेपर सवार अग्नायीको, दक्षिण दिशामें तण्डुलपर महिषारूढ़ गदा धारण किये हुए यमीको, नैर्ऋत्यकोणमें घृतके ऊपर खड्गसहित नैर्ऋतीको, पश्चिम दिशामें दुग्धपर नागपाश धारण किये हुए मत्स्यपर आरूढ़ वारुणीको, वायव्यकोणमें शर्कराके ऊपर मृगारूढ़ पताका लिये हुए पताकिनी (वायवी)-को, उत्तर दिशामें तिलोंपर निधिसहित शङ्ख लिये हुए (कौबेरी)-को तथा ईशानकोणमें मक्खनकी राशिपर नन्दीपर आरूढ़ त्रिशूलधारण किये हुए माहेश्वरी शक्ति ऐशानीको स्थापित करना चाहिये। उसी प्रकार वहाँ केश-मुकुट धारण करनेवाली वरदायिनी देवियोंको भी बालकोंके साथ स्थापित करना चाहिये। उन्हें अपनी शक्तिके अनुसार पाँच पल सोनेसे ऊपर एक हजार पलतकका बनवाना चाहिये। इन सभीके ऊपर पाँचरंगा वितान तानना चाहिये। फिर दस गौ, दस कलश तथा दो वस्त्रोंका दान देना चाहिये। इनमेंसे दो मध्यम लताओंको गुरुको तथा अन्य ऋत्विजोंको देना चाहिये। तत्पश्चात् बुद्धिमान् यजमानको माङ्गलिक शब्दोंके साथ स्नान करनेके बाद श्वेत वस्त्र धारणकर इन कल्पलताओंकी तीन प्रदक्षिणा कर इस भावके मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—‘जो पापविनाशिनी, ब्रह्माण्ड एवं लोकेश्वरोंका पालन करनेवाली तथा याचकोंको अभिलाषासे भी अधिक फल प्रदान करनेवाली हैं, उन कल्पलता-वधुओं तथा दिग्वधुओंको बारम्बार नमस्कार है।' इस प्रकार जो पुरुष भवभयको हरण करनेवाले सम्पूर्ण दिगङ्गनाओंके दानको करता है, वह अभीष्ट फलदायी नागलोकमें ब्रह्माके तीस वर्षोतक निवास करता है तथा सैकड़ों पितरोंको भवसागरसे तार देता है। वह सांसारिक पापसमूहके नष्ट हो जानेसे
* अध्याय २८७ *१०७५

| सुरपतिवनितासहस्रसंख्यैः<br>परिवृतमम्बुजसंसदाभिवन्द्यः ॥ १६<br>इति विधानमिदं दिगङ्गनानां<br>कनककल्पलताविनिवेदकम् ।<br>पठति यः स्मरतीह तथैक्षते<br>स पदमेति पुरंदरसेवितम्॥ १७ | विशुद्धशरीर होकर हजारों देवाङ्गनाओंसे सुशोभित ब्रह्माके लोकमें अभिवन्दनीय होता है। इस प्रकार दिगङ्गनाओंके तथा कनककल्पलताके दानकी विधिको जो पढ़ता, स्मरण करता या देखता है, वह इन्द्रद्वारा सेवित पदको प्राप्त करता है॥ ७—१७॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने कनककल्पलताप्रदानविधिर्नाम षडशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादानवर्णन-प्रसंगमें कनककल्पलताप्रदानविधि नामक दो सौ छियासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २८६ ॥


दो सौ सतासीवाँ अध्याय

सप्तसागर-दानकी विधि

मत्स्य उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>सप्तसागरकं नाम सर्वपापप्रणाशनम्॥ १<br>पुण्यं दिनमथासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>तुलापुरुषवत् कुर्याल्लोकेशावाहनं बुधः॥ २<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ।<br>कारयेत् सप्त कुण्डानि काञ्चनानि विचक्षणः॥ ३<br>प्रादेशमात्राणि तथारत्निमात्राणि वै पुनः।<br>कुर्यात् सप्तपलादूर्ध्वमासहस्राच्च शक्तितः॥ ४<br>संस्थाप्यानि च सर्वाणि कृष्णाजिनतिलोपरि।<br>प्रथमं पूरयेत् कुण्डं लवणेन विचक्षणः॥ ५<br>द्वितीयं पयसा तद्वत् तृतीयं सर्पिषा पुनः।<br>चतुर्थं तु गुडेनैव दध्ना पञ्चममेव च॥ ६<br>षष्ठं शर्करया तद्वत् सप्तमं तीर्थवारिणा।<br>स्थापयेल्लवणस्थं तु ब्रह्माणं काञ्चनं शुभम्॥ ७<br>केशवं क्षीरमध्ये तु घृतमध्ये महेश्वरम्।<br>भास्करं गुडमध्ये तु दधिमध्ये निशाधिपम्॥ ८<br>शर्करायां न्यसेल्लक्ष्मीं जलमध्ये तु पार्वतीम्।<br>सर्वेषु सर्वरत्नानि धान्यानि च समन्ततः॥ ९**मत्स्यभगवान्ने कहा—**अब मैं सम्पूर्ण पापोंके विनाशक परमोत्तम सप्तसागर नामक महादानकी विधि बतला रहा हूँ। बुद्धिमान् पुरुष तुलापुरुष-दानकी तरह किसी पवित्र दिनके आनेपर पुण्याहवाचन करके लोकपालोंका आवाहन करे। तथा ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, भूषण, आच्छादन आदिका प्रबन्ध भी उसी तरह करे। विचक्षण पुरुष स्वर्णनिर्मित सात स्वतन्त्र कुण्डोंका निर्माण करे। ये कुण्ड एक बित्ता चौड़े तथा एक अरत्नि अर्थात् बँधी हुई मुट्ठीवाले हाथ-जितने लम्बे होने चाहिये। इन्हें अपनी आर्थिक शक्तिके अनुसार सात पल सोनेसे ऊपर एक हजार पलतकका बनवाना चाहिये। इन सभी कुण्डोंको कृष्णमृगके चर्मपर रखे गये तिलोंके ऊपर स्थापित करना चाहिये। विद्वान् पुरुषको प्रथम कुण्डको लवणसे, द्वितीय कुण्डको दुग्धसे, तृतीयको घृतसे, चतुर्थको गुड़से, पञ्चमको दहीसे, छठेको चीनीसे तथा सातवेंको तीर्थोंके पवित्र जलसे पूर्ण करना चाहिये। फिर लवण कुण्डमें सुवर्ण-निर्मित ब्रह्माकी, दुग्धकुण्डके मध्यमें भगवान् विष्णुकी, घृतकुण्डमें भगवान् शिवकी, गुड़कुण्डमें भगवान् भास्करकी, दधिकुण्डमें चन्द्रमाकी, शर्कराकुण्डमें लक्ष्मीकी और जलकुण्डमें पार्वतीकी स्थापना करनी चाहिये। सभी कुण्डोंको सभी ओरसे रत्नों तथा अन्नोंद्वारा अलंकृत करना

१०७६ * मत्स्यपुराण *


| तुलापुरुषवच्छेषमत्रापि परिकल्पयेत्।<br>ततो वारुणहोमान्ते स्नापितो वेदपुङ्गवैः॥१०<br>त्रिः प्रदक्षिणमावृत्य मन्त्रानेतानुदीरयेत्।<br>नमो वः सर्वसिन्धूनामाधारेभ्यः सनातनाः।<br>जन्तूनां प्राणदेभ्यश्च समुद्रेभ्यो नमो नमः॥११<br>क्षीरोदकाज्यदधिमाधुरलावणेषु-<br>सारामृतेन भुवनत्रयजीवसंघान्।<br>आनन्दयन्ति वसुभिश्च यतो भवन्त-<br>स्तस्मान्ममाप्यघविघातमलं विशन्तु॥१२<br>यस्मात् समस्तभुवनेषु भवन्त एव<br>तीर्थामरासुरसुबद्धमणिप्रदानम् ।<br>पापक्षयामृतविलेपनभूषणाय<br>लोकस्य बिभ्रति तदस्तु ममापि लक्ष्मीः॥१३<br>इति ददाति रसामृतसंयुता-<br>ञ्छुचिरविस्मयवानिह सागरान्।<br>अमलकाञ्चनवर्णमयानसौ<br>पदमुपैति हरेरमराचितः ॥१४<br>सकलपापविधौतविराजितः<br>पितृपितामहपुत्रकलत्रकम् ।<br>नरकलोकसमाकुलमप्ययं<br>झटिति सोऽपि नयेच्छिवमन्दिरम्॥१५ | चाहिये। शेष कार्य तुलापुरुषदानकी भाँति सम्पन्न करना चाहिये। तत्पश्चात् महावारुणी आहुतियाँ प्रदानकर वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा अभिषिक्त यजमान इन कुण्डोंकी तीन बार प्रदक्षिणा कर इन मन्त्रोंका उच्चारण करे॥१—१० १/२॥<br>'सनातन सागरगण! आपलोग समस्त जीवोंके प्राणदाता तथा सम्पूर्ण नदियोंके आधार हो, आपको बारंबार नमस्कार है। चूँकि आपलोग दुग्ध, जल, घृत, दही, मधु, लवण, शक्कररूप अमृत तथा रत्नादि सम्पत्तियोंद्वारा त्रिभुवनके जीवसमूहोंको आनन्दित करते हैं, अतः मेरे भी पापपुञ्जोंका विनाश करें। चूँकि आपलोग ही समस्त भुवनोंमें लोकके पापक्षय, अमृतविलेपन और भूषणके निमित्त तीर्थों, देवताओं, असुरों और सुन्दर मणिके प्रदान-कार्यको धारणवाले हैं, अतः वह लक्ष्मी मुझे भी प्राप्त हो।' इस प्रकार जो मनुष्य पवित्र एवं विस्मयरहित होकर इस लोकमें रस एवं अमृतसे युक्त निर्मल सोनेके बने हुए सागरोंका दान करता है, वह देवताओंद्वारा पूजित होकर भगवान् विष्णुके पदको प्राप्त करता है। सम्पूर्ण पापोंके धुल जानेसे विशुद्ध हुआ यह पुरुष नरकलोकमें व्याकुल हुए पिता, पितामह, पुत्र और पत्नी आदिको भी शीघ्र ही शिवलोकमें ले जाता है॥११—१५॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने सप्तसागरप्रदानविधिर्नाम सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥२८७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादानवर्णन-प्रसङ्गमें सप्तसागरदान-विधि नामक दो सौ सत्तासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥२८७॥


दो सौ अठासीवाँ अध्याय

रत्नधेनुदानकी विधि

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>रत्नधेन्विति विख्यातं गोलोकफलदं नृणाम्॥ १अब मैं मनुष्योंको गोलोक प्रदान करनेवाले अत्युत्तम 'रत्नधेनु' नामक महादानकी विधिको वर्णन कर रहा हूँ।
पुण्यं दिनमथासाद्य तुलापुरुषदानवत्।<br>लोकेशावाहनं कृत्वा ततो धेनुं प्रकल्पयेत्॥ २किसी पुण्य दिनके आनेपर यजमान तुलापुरुषदानकी तरह लोकपालोंका आवाहन करनेके पश्चात् धेनुकी कल्पना करे।
* अध्याय २८८ *१०७७
संस्कृतहिन्दी
भूमौ कृष्णाजिनं कृत्वा लवणद्रोणसंयुतम्।<br>धेनुं रत्नमयीं कुर्यात् सङ्कल्प्य विधिपूर्वकम्॥ ३<br>स्थापयेत् पद्मरागाणामेकाशीतिं मुखे बुधः।<br>पुष्परागशतं तद्वद् घोणायां परिकल्पयेत्॥ ४<br>ललाटे हेमतिलकं मुक्ताफलशतं दृशोः।<br>भ्रूयुगे विद्रुमशतं शुक्ती कर्णद्वये स्मृते॥ ५<br>काञ्चनानि च शृङ्गाणि शिरो वज्रशतात्मकम्।<br>ग्रीवायां नेत्रपटलं गोमेदकशतान्वितम्॥ ६<br>इन्द्रनीलशतं पृष्ठे वैदूर्यशतपार्श्वके।<br>स्फाटिकैरुदरं तद्वत् सौगन्धिकशतैः कटिम्॥ ७<br>खुरा हेममयाः कार्याः पुच्छं मुक्तावलीमयम्।<br>सूर्यकान्तेन्दुकान्तौ च घ्राणे कर्पूरचन्दने॥ ८<br>कुङ्कुमानि च रोमाणि रौप्यनाभिं च कारयेत्।<br>गारुत्मतशतं तद्वदपाने परिकल्पयेत्॥ ९<br>तथान्यानि च रत्नानि स्थापयेत् सर्वसन्धिषु।<br>कुर्याच्छर्करया जिह्वां गोमयं च गुडात्मकम्॥ १०<br>गोमूत्रमाज्येन तथा दधिदुग्धे स्वरूपतः।<br>पुच्छाग्रे चामरं दद्यात् समीपे ताम्रदोहनम्॥ ११पृथ्वीपर कृष्णमृगचर्म बिछाकर उसपर एक द्रोण लवण रखकर उसके उपर विधिपूर्वक संकल्पसहित रत्नमयी धेनुको स्थापित करे। बुद्धिमान् पुरुष उसके मुखमें इक्यासी पद्मराग मणि तथा थूथुनमें इक्यासी पुष्पराग (पुखराज) स्थापित करे। उस गौके ललाटपर सोनेका तिलक लगावे। उसकी दोनों आँखोंमें सौ मुक्ता (मोती), दोनों भौंहोंपर सौ प्रवाल (मूँगा) और दोनों कानोंकी जगह दो शुक्तियाँ (सीपें) लगानी चाहिये। उसके सींग सोनेके होने चाहिये। सिरकी जगह सौ हीरोंको स्थापित करना चाहिये। कण्ठ और नेत्र-पलकोंमें सौ गोमेदक, पृष्ठभागमें सौ इन्द्रनील (नीलम), दोनों पार्श्वस्थानोंमें सौ वैदू (डू)-र्य (बिलौर), उदरपर स्फटिक तथा कटिदेशपर सौ सौगन्धिक (माणिक-लाल) मणि रखना चाहिये। खुरोंको स्वर्णमय, पूँछको मुक्ता (मोतियों)-की लड़ियोंसे युक्त और दोनों नाकोंको सूर्यकान्त तथा चन्द्रकान्त मणियोंसे बनाकर कर्पूर और चन्दनसे अर्चित करना चाहिये। रोमोंको केसर और नाभिको चाँदीसे बनवाये। गुदामें सौ लाल मणियोंको लगाना चाहिये। अन्य रत्नोंको संधिभागोंपर लगाना चाहिये। जीभको शक्करसे, गोबरको गुड़से और गोमूत्रको घीसे बनवाना चाहिये। दही-दूध प्रत्यक्ष ही रखे। पूँछके अग्रभागपर चमर तथा समीपमें ताँबेकी दोहनी रखनी चाहिये॥ १—११॥
कुण्डलानि च हैमानि भूषणानि च शक्तितः।<br>कारयेदेवमेवं तु चतुर्थांशेन वत्सकम्॥ १२<br>तथा धान्यानि सर्वाणि पादांश्चेक्षुमयाः स्मृताः।<br>नानाफलानि सर्वाणि पञ्चवर्णं वितानकम्॥ १३<br>एवं विरचनं कृत्वा तद्वद्धौमाधिवासनम्।<br>ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दद्याद् धेनुमामन्त्रयेत् ततः।<br>गुडधेनुवदावाह्य इह चोदाहरेत् ततः॥ १४<br>त्वां सर्वदेवगणाधाम यतः पठन्ति<br>रुद्रेन्द्रसूर्यकमलासनवासुदेवाः।<br>तस्मात् समस्तभुवनत्रयदेहयुक्ता<br>मां पाहि देवि भवसागरपीड्यमानम्॥ १५अपनी आर्थिक शक्तिके अनुसार उसे सोनेसे निर्मित आभूषण और कुण्डल पहनाने चाहिये, उसके ईखके पैर होने चाहिये। इसी प्रकार गौके चतुर्थांशसे बछड़ा बनवाना चाहिये। उस गौके समीप सभी प्रकारके अन्न, विविध फल, पँचरंगा वितान भी यथास्थान रखना चाहिये। इस प्रकार गौकी रचना, हवन और अधिवासन करनेके बाद ऋत्विजोंको दक्षिणा देनी चाहिये। इसके बाद धेनुको आमन्त्रित करे। उस समय गुड़धेनुकी तरह आवाहन कर यह कहना चाहिये—'देवि! चूँकि रुद्र, इन्द्र, सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु—ये सभी तुम्हें सम्पूर्ण देवताओंका निवासस्थान मानते हैं तथा समस्त त्रिभुवन तुम्हारे ही शरीरमें व्याप्त हैं, अतः तुम भवसागरसे पीड़ित मेरा उद्धार करो।'

१०७८ * मत्स्यपुराण *


आमन्त्र्य चेत्थमभितः परिवृत्य भक्त्या<br>दद्याद् द्विजाय गुरवे जलपूर्विकां ताम्।<br>यः पुण्यमाप्य दिनमत्र कृतोपवासः<br>पापैर्विमुक्ततनुरेति पदं मुरारेः॥ १६<br><br>इति सकलविधिज्ञो रत्नधेनुप्रदानं<br>वितरति स विमानं प्राप्य देदीप्यमानम्।<br>सकलकलुषमुक्तो बन्धुभिः पुत्रपौत्रैः<br>स हि मदनस्वरूपः स्थानमभ्येति शम्भोः॥ १७इस प्रकार आमन्त्रित करनेके बाद गौकी परिक्रमा कर भक्तिपूर्वक हाथमें जल लेकर उस गौको ब्राह्मण गुरुको दान करना चाहिये। जो व्यक्ति इस प्रकार पुण्य दिन आनेपर उपवासकर यह दान करता है, उसका शरीर पापोंसे मुक्त हो जाता है और वह भगवान् मुरारिके परमपदको प्राप्त करता है। इस प्रकार सम्पूर्ण विधियोंको जाननेवाला जो पुरुष इस रत्नधेनुका दान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर कामदेव-सदृश सौन्दर्यशाली हो जाता है तथा अपने बन्धुओं, पुत्रों और पौत्रोंके साथ देदीप्यमान विमानपर सवार हो, शिवके लोक (कैलास या सुमेरुस्थित दिव्य शिवधाम)-को प्राप्त करता है॥ १२ - १७॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने रत्नधेनुप्रदानविधिर्नामाष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके महादानवर्णन-प्रसङ्गमें रत्नधेनुदान नामक दो सौ अठासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८८॥


दो सौ नवासीवाँ अध्याय

महाभूतघट-दानकी विधि

मत्स्य उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>महाभूतघटं नाम महापातकनाशनम्॥ १<br>पुण्यां तिथिंमथासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ॥ २<br>तुलापुरुषवत् कुर्याल्लोकेशावाहनादिकम्।<br>कारयेत् काञ्चनं कुम्भं महारत्नाचितं बुधः॥ ३<br>प्रादेशादङ्गलशतं यावत् कुर्यात् प्रमाणतः।<br>क्षीराज्यपूरितं तद्वत् कल्पवृक्षसमन्वितम्॥ ४<br>पद्मासनगतांस्तत्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान्।<br>लोकपालान् महेन्द्रांश्च स्वस्ववाहनमास्थितान्।<br>वराहेणोद्धृतां तद्वत् कुर्यात् पृथ्वीं सपङ्कजाम्॥ ५<br>वरुणं चासनगतं काञ्चनं मकरोपरि।<br>हुताशनं मेषगतं वायुं कृष्णमृगासनम्॥ ६<br>तथा कोषाधिपं कुर्यान्मूषकस्थं विनायकम्।<br>विन्यस्य घटमध्ये तान् वेदपञ्चकसंयुतान्॥ ७<br>ऋग्वेदस्याक्षसूत्रं स्याद् यजुर्वेदस्य पङ्कजम्।<br>सामवेदस्य वीणा स्याद् वेणुं दक्षिणतो न्यसेत्॥ ८मत्स्यभगवान्ने कहा—अब इसके बाद मैं महापातकोंको नष्ट करनेवाले अत्युत्तम 'महाभूतघट-दान' नामक महादानकी विधि बतला रहा हूँ। किसी पवित्र तिथिके आनेपर तुलापुरुष-दानकी तरह पुण्याहवाचन कर ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, आभूषण और आच्छादन आदिके प्रबन्धके साथ लोकपालोंका आवाहन आदि कार्य सम्पन्न करे। फिर बुद्धिमान् पुरुष रत्नोंसे जटित सोनेका एक कलश बनवाये, जो एक वित्तेसे लेकर सौ अंगुलतकके विस्तारवाला हो। उसे दुग्ध और घृतसे पूर्ण करके उसके पास कल्पवृक्ष रख दे। वहीं पद्मासनपर स्थित ब्रह्मा तथा अपने-अपने वाहनोंपर आरूढ़ विष्णु, शिव, लोकपालगण, देवराज इन्द्रादि देवगणोंको भी बनाये। उसी प्रकार वराहद्वारा ऊपर उठायी गयी कमलसमेत पृथ्वीकी रचना करनी चाहिये। फिर मकरके वाहनपर आसन लगाये हुए स्वर्णनिर्मित वरुण, मेषवाहनपर आरूढ़ अग्नि, कृष्णमृगपर सवार वायु, पालकीपर बैठे हुए कुबेर तथा मूषकपर स्थित गणपति—इन सब देवताओंको पाँचों वेदोंके साथ उक्त घटमें स्थापित करना चाहिये। उनमें ऋग्वेदको रुद्राक्षमाला लिये, यजुर्वेदको कमल लिये, सामवेद-को बायें हाथमें वीणा और दाहिने हाथमें वेणु लिये
* अध्याय २९० *१०७९
अथर्ववेदस्य पुनः स्रुक्स्रुवौ कमलं करे।<br>पुराणवेदो वरदः साक्षसूत्रकमण्डलुः॥ ९<br>परितः सर्वधान्यानि चामरासनदर्पणम्।<br>पादुकोपानहच्छत्रं दीपिकाभूषणानि च॥ १०<br>शय्यां च जलकुम्भांश्च पञ्चवर्णं वितानकम्।<br>स्नात्वाधिवासनान्ते तु मन्त्रमेतमुदीरयेत्॥ ११<br>नमो वः सर्वदेवानामाधारेभ्यश्चराचरे।<br>महाभूताधिदेवेभ्यः शान्तिरस्तु शिवं मम॥ १२<br>यस्मान्न किंचिदप्यस्ति महाभूतैर्विना कृतम्।<br>ब्रह्माण्डे सर्वभूतेषु तस्माच्छ्रीरक्षयास्तु मे॥ १३<br>इत्युच्चार्य महाभूतघटं यो विनिवेदयेत्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम्॥ १४<br>विमानेनार्कवर्णेन पितृबन्धुसमन्वितः।<br>स्तूयमानो वरस्त्रीभिः पदमभ्येति वैष्णवम्॥ १५<br>षोडशैतानि यः कुर्यान्महादानानि मानवः।<br>न तस्य पुनरावृत्तिरिह लोकेऽभिजायते॥ १६<br>इह पठति य इत्थं वासुदेवस्य पार्श्वे<br>ससुतपितृकलत्रः संशृणोतीह सम्यक्।<br>मुररिपुभवने वै मन्दिरे वार्कलक्ष्म्या<br>त्वमरपुरवधूभिर्मोदते सोऽपि कल्पम्॥ १७तथा अथर्ववेदको हाथोंमें स्रुक्, स्रुवा और कमल लिये हुए बनाना चाहिये। पञ्चमवेद पुराणके आयुध अक्षसूत्र, कमण्डलु और अभय तथा वरद मुद्राएँ हैं॥ १–९॥<br>उस कलशके चारों ओर सभी (अठारह) प्रकारके अन्न, चामर, आसन, दर्पण, पादुका, जूता, छत्र, दीपक, आभूषण, शय्या, जलपूर्ण कलश और पँचरंगा वितान रखना चाहिये। फिर यजमान अधिवासनके अन्तमें स्नान करके इस मन्त्रका उच्चारण करे—'इस चराचर जगत्‌में आपलोग सम्पूर्ण देवताओंके आधार तथा पञ्चमहाभूतोंके अधिदेवता हैं, आपलोगोंको प्रणाम है। आप मुझे शान्ति एवं कल्याण प्रदान कीजिये। चूँकि इस ब्रह्माण्डके सभी जीवोंमें इन पञ्च महाभूतोंके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है, अतः इनकी कृपासे मुझे अक्षय लक्ष्मी प्राप्त हो।' इस प्रकार उच्चारण करनेके बाद जो व्यक्ति महाभूतघटका दान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर परम गतिको प्राप्त होता है तथा पितरों एवं बन्धुगणोंके साथ सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर आरूढ़ हो अप्सराओंद्वारा प्रशंसित होता हुआ विष्णुके लोकको जाता है। जो मानव इन उपर्युक्त सोलहों महादानोंका अनुष्ठान करता है, उसे इस लोकमें पुनः नहीं आना पड़ता। इस पृथ्वीपर जो मनुष्य वासुदेवके समीप इसे इस विधिसे पढ़ता है तथा पुत्र, पिता एवं स्त्रीके साथ भलीभाँति श्रवण करता है, वह सूर्यके समान तेजस्वी होकर देवाङ्गनाओंके साथ विष्णुलोकमें कल्पपर्यन्त आनन्दका अनुभव करता है॥ १०–१७॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तनं नामैकोननवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-वर्णन नामक दो सौ नवासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८९॥


दो सौ नब्बेवाँ अध्याय

कल्पनुकीर्तन

मनुरुवाच<br><br>कल्पमानं त्वया प्रोक्तं मन्वन्तरयुगेषु च।<br>इदानीं कल्पनामानि समासात् कथयाच्युत॥ १मनुने पूछा—अच्युत! मन्वन्तर एवं युगोंका वर्णन करते समय आपने कल्पका प्रमाण तो बता दिया है, अब मुझे (सभी तीस) कल्पोंके नाम संक्षेपसे बतलाइये॥ १॥

१०८० * मत्स्यपुराण *


मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
कल्पानां कीर्तनं वक्ष्ये महापातकनाशनम्।<br>यस्यानुकीर्तनादेव वेदपुण्येन युज्यते॥ २<br>प्रथमः श्वेतकल्पस्तु द्वितीयो नीललोहितः।<br>वामदेवस्तृतीयस्तु ततो राथन्तरोऽपरः॥ ३<br>रौरवः पञ्चमः प्रोक्तः षष्ठो देव इति स्मृतः।<br>सप्तमोऽथ बृहत्कल्पः कन्दर्पोऽष्टम उच्यते॥ ४<br>सद्योऽथ नवमः प्रोक्त ईशानो दशमः स्मृतः।<br>तम एकादशः प्रोक्तस्तथा सारस्वतः परः॥ ५<br>त्रयोदश उदानस्तु गारुडोऽथ चतुर्दशः।<br>कौर्मः पञ्चदशः प्रोक्तः पौर्णमास्यामजायत॥ ६<br>षोडशो नारसिंहस्तु समानस्तु ततोऽपरः।<br>आग्नेयोऽष्टादशः प्रोक्तः सोमकल्पस्तथा परः॥ ७<br>मानवो विंशतिः प्रोक्तस्तत्पुमानिति चापरः।<br>वैकुण्ठश्चापरस्तद्वल्लक्ष्मीकल्पस्तथा परः॥ ८<br>चतुर्विंशतिमः प्रोक्तः सावित्रीकल्पसंज्ञकः।<br>पञ्चविंशस्ततो घोरो वाराहस्तु ततोऽपरः॥ ९<br>सप्तविंशोऽथ वैराजो गौरीकल्पस्तथापरः।<br>माहेश्वरस्तु स प्रोक्तस्त्रिपुरं यत्र घातितम्॥ १०<br>पितृकल्पस्तथान्ते तु या कुहूर्ब्रह्मणः पुरा।<br>इत्येवं ब्रह्मणो मासः सर्वपातकनाशनः॥ ११अब मैं कल्पोंका वर्णन कर रहा हूँ, जो महान् पातकोंको नष्ट करनेवाला है और जिसका अनुकीर्तन करनेसे वेदाध्ययनका पुण्य प्राप्त होता है। उनमें प्रथम श्वेतकल्प, दूसरा नीललोहित, तीसरा वामदेव, चौथा रथन्तरकल्प, पाँचवाँ रौरवकल्प, छठा देवकल्प, सातवाँ बृहत्कल्प, आठवाँ कंदर्पकल्प, नवाँ सद्यःकल्प, दसवाँ ईशानकल्प, ग्यारहवाँ तमःकल्प, बारहवाँ सारस्वतकल्प, तेरहवाँ उदानकल्प, चौदहवाँ गारुडकल्प तथा पंद्रहवाँ कौर्मकल्प कहा गया है। इस दिन ब्रह्माजीकी पूर्णिमातिथि थी। सोलहवाँ नारसिंहकल्प, सत्रहवाँ समानकल्प, अठारहवाँ आग्नेयकल्प, उन्नीसवाँ सोमकल्प, बीसवाँ मानवकल्प, इक्कीसवाँ तत्पुमान्कल्प, बाईसवाँ वैकुण्ठकल्प, तेईसवाँ लक्ष्मीकल्प, चौबीसवाँ सावित्रीकल्प, पचीसवाँ घोरकल्प, छब्बीसवाँ वाराहकल्प, सत्ताईसवाँ वैराजकल्प, अट्ठाईसवाँ गौरीकल्प, उन्तीसवाँ माहेश्वरकल्प कहा गया है, जिसमें त्रिपुरका विनाश हुआ था। तीसवाँ पितृकल्प है, जो प्राचीन कालमें ब्रह्माकी अमावस्या थी। इस प्रकार ये सभी तीसों कल्प ब्रह्माके एक मास हैं, जो सभी पातकोंका नाश करनेवाले हैं॥ २—११॥
आदावेव हि माहात्म्यं यस्मिन् यस्य विधीयते।<br>तस्य कल्पस्य तन्नाम विहितं ब्रह्मणा पुरा॥ १२<br>संकीर्णास्तामसाश्चैव राजसाः सात्त्विकास्तथा।<br>रजस्तमोमयास्तद्वदेते त्रिंशदुदाहृताः॥ १३<br>संकीर्णेषु सरस्वत्याः पितॄणां व्युष्टिरुच्यते।<br>अग्नेः शिवस्य माहात्म्यं तामसेषु दिवाकरे।<br>राजसेषु च माहात्म्यमधिकं ब्रह्मणः स्मृतम्॥ १४<br>यस्मिन् कल्पे तु यत्प्रोक्तं पुराणं ब्रह्मणा पुरा।<br>तस्य तस्य तु माहात्म्यं तत्स्वरूपेण वर्ण्यते॥ १५<br>सात्त्विकेष्वधिकं तद्वद् विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम्।<br>तथैव योगसंसिद्धा गमिष्यन्ति परां गतिम्॥ १६प्रारम्भमें ही जिस कल्पमें जिसका माहात्म्य वर्णन किया गया है, उसी आधारपर ब्रह्माने उस कल्पका वह नाम रखा है। ये तीसों कल्प संकीर्ण, तामस, राजस, सात्त्विक तथा रजस्तमोमय—इन भेदोंसे युक्त कहे गये हैं। संकीर्ण कल्पोंमें सरस्वती तथा पितरोंका, तामसमें अग्नि, सूर्य तथा शिवका और राजसमें ब्रह्माका अधिक माहात्म्य कहा गया है। प्राचीन कालमें ब्रह्माने जिस कल्पमें जिस पुराणको कहा है, उसी कल्पका माहात्म्य उस पुराणमें वर्णन किया गया है। सात्त्विक कल्पोंमें उत्तम रूपसे विष्णु भगवान्का माहात्म्य वर्णित है। योगसे सिद्धि प्राप्त करनेवाले लोग उनके पाठसे
  • अध्याय २९० * १०८१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्राह्मं पाद्ममिमं यस्तु पठेत् पर्वणि पर्वणि।<br>तस्य धर्मे मतिर्ब्रह्मा करोति विपुलां श्रियम्॥ १७<br><br>यस्तु दद्यादिमान् कृत्वा हैमान् पर्वणि पर्वणि।<br>ब्रह्मविष्णुपुरे वासं मुनिभिः पूज्यते दिवि॥ १८<br><br>सर्वपापक्षयकरं कल्पदानं यतो भवेत्।<br>मुनिरूपांस्ततः कृत्वा दद्यात् कल्पान् विचक्षणः॥ १९<br><br>पुराणसंहिता चेयं तव भूप मयोदिता।<br>सर्वपापहरा नित्यमारोग्यश्रीफलप्रदा॥ २०<br><br>ब्रह्मसंवत्सरशतादेकाहं शैवमुच्यते।<br>शिववर्षशतादेकं निमेषं वैष्णवं विदुः॥ २१<br><br>यदा स विष्णुर्जागर्ति तदेदं चेष्टते जगत्।<br>यदा स्वपिति शान्तात्मा तदा सर्वं निमीलति॥ २२परमगतिको प्राप्त होते हैं। जो व्यक्ति प्रत्येक पर्वमें इन ब्रह्म तथा पद्म नामक पुराणोंका पाठ करता है, उसकी बुद्धिको ब्रह्मा धर्ममें लगाते हैं तथा उसे प्रचुर सम्पत्ति प्रदान करते हैं। जो व्यक्ति पर्व आनेपर इन्हें सोनेका बनवाकर दान करता है, वह ब्रह्मा तथा विष्णुके पुरमें निवास करते हुए स्वर्गमें मुनियोंद्वारा पूजित होता है; क्योंकि कल्पदान सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला होता है। विचक्षण पुरुषको इन कल्पोंको मुनिके समान स्वरूपवाला बनाकर दान करना चाहिये। राजन्! यह पुराण-संहिता, जो मैंने तुम्हें बताया है, सभी पापोंको नष्ट करनेवाली तथा नित्य आरोग्य एवं श्रीरूप फल प्रदान करनेवाली है। ब्रह्माका सौ वर्ष शिवका एक दिन तथा शिवका सौ वर्ष विष्णुका एक निमेष कहा जाता है। जब वे विष्णु जागते रहते हैं, तब यह जगत् भी चेष्टावान् रहता है और जब वे शान्त होकर शयन करते हैं, तब सारा जगत् शान्त हो जाता है॥ १२—२२॥
सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा देवदेवेशो मत्स्यरूपी जनार्दनः।<br>पश्यतां सर्वभूतानां तत्रैवान्तरधीयत॥ २३<br><br>वैवस्वतो हि भगवान् विसृज्य विविधाः प्रजाः।<br>स्वान्तरं पालयामास मार्तण्डकुलवर्धनः॥ २४<br><br>यस्य मन्वन्तरं चैतदधुना चानुवर्तते।<br>पुण्यं पवित्रमेतद् वः कथितं मत्स्यभाषितम्।<br>पुराणं सर्वशास्त्राणां यदेतन्मूर्ध्नि संस्थितम्॥ २५**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! ऐसा कहकर मत्स्यरूपी देवदेवेश्वर जनार्दन सभी प्राणियोंके सामने वहीं अन्तर्हित हो गये। विवस्वान्‌के पुत्र मार्तण्ड-कुलवर्धन भगवान् मनु विविध प्रजाओंकी सृष्टि कर अपनी अवधितक उनका पालन करते रहे। उन्हींका यह मन्वन्तर अभीतक चला आ रहा है। इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे मत्स्यभगवान्‌द्वारा कहे गये पुण्यप्रद पवित्र पुराणका वर्णन कर दिया। यह मत्स्यपुराण सभी शास्त्रोंमें शिरोभूषण-रूपसे अवस्थित है॥ २३—२५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कल्पानुकीर्त्तनं नाम नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २९०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कल्पानुकीर्तन नामक दो सौ नब्बेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २९०॥

१०८२ * मत्स्यपुराण *


दो सौ इक्यानबेवाँ अध्याय

मत्स्यपुराणकी अनुक्रमणिका

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! विश्वस्वरूप मत्स्यभगवान्‌ने धर्म, अर्थ और कामके साधनभूत जिस सम्पूर्ण मत्स्यपुराणका वर्णन किया था, वह सब मैंने आपलोगोंको बतला दिया। उसमें आदिमें मनुका संवाद, ब्रह्माण्डका वर्णन तथा चतुर्मुख ब्रह्माके मुखसे उद्भूत शारीरिक सांख्यका वर्णन है। तत्पश्चात् देवताओं और असुरोंकी उत्पत्ति, मरुद्गणोंकी उत्पत्ति, मदनद्वादशी, लोकपालोंका पूजन, मन्वन्तरोंका उद्देश्य, राजा पृथुका वर्णन, सूर्य और वैवस्वत मनुकी उत्पत्ति, बुधका इलासे संयोग, पितृवंशका वर्णन, श्राद्धके कालका निर्णय, पितृतीर्थोंमें प्रवास, सोमकी उत्पत्ति, सोमवंशका वर्णन, ययातिका चरित्र, कार्तवीर्य अर्जुनका माहात्म्य, वृष्णिवंशका वर्णन, भृगुशाप, विष्णुका दैत्योंको शाप, पुरुषेशका कीर्तन, अग्नि-वंशका वर्णन, पुराणोंका वर्णन, क्रियायोगका विवेचन, नक्षत्रसंज्ञकव्रत, मार्तण्डशयन, कृष्णाष्टमीव्रत, रोहिणीचन्द्रव्रत, तडागविधिका माहात्म्य, पादोत्सर्ग-विधि, सौभाग्यशयनव्रत, अगस्त्यव्रत, अनन्ततृतीयाव्रत, रसकल्याणीव्रत, आर्द्रानन्दकरीव्रत, सारस्वतव्रत, उपरागाभिषेकव्रत, सप्तमीस्नपनव्रत, भीमद्वादशीव्रत, अनङ्गशयनव्रत, अशून्यशयनव्रत, अङ्गारकव्रत, सप्तमीसप्तकव्रत, विशोकद्वादशीव्रत, दस प्रकारके मेरुओंके दानकी विधि, ग्रहशान्ति, ग्रहोंके स्वरूपका कथन, शिवचतुर्दशीव्रत, सर्वफलत्यागव्रत तथा सूर्यवार-व्रतका निरूपण हुआ है॥ १—१४॥
एतद्वः कथितं सर्वं यदुक्तं विश्वरूपिणा।<br>मात्स्यं पुराणमखिलं धर्मकामार्थसाधनम्॥ १<br>यत्रादौ मनुसंवादो ब्रह्माण्डकथनं तथा।<br>सांख्यं शारीरकं प्रोक्तं चतुर्मुखमुखोद्भवम्॥ २<br>देवासुराणामुत्पत्तिर्मारुतोत्पत्तिरेव च।<br>मदनद्वादशी तद्वल्लोकपालाभिपूजनम्॥ ३<br>मन्वन्तराणामुद्देशो वैन्यराजाभिवर्णनम्।<br>सूर्यवैवस्वतोत्पत्तिर्बुधसङ्गमनं तथा॥ ४<br>पितृवंशानुकथनं श्राद्धकालस्तथैव च।<br>पितृतीर्थप्रवासश्च सोमोत्पत्तिस्तथैव च॥ ५<br>कीर्तनं सोमवंशस्य ययातिचरितं तथा।<br>कार्तवीर्यस्य माहात्म्यं वृष्णिवंशानुकीर्तनम्॥ ६<br>भृगुशापस्तथा विष्णोर्दैत्यशापस्तथैव च।<br>कीर्तनं पुरुषेशस्य वंशो हौताशनस्तथा॥ ७<br>पुराणकीर्तनं तद्वत् क्रियायोगस्तथैव च।<br>व्रतं नक्षत्रसंख्याकं मार्तण्डशयनं तथा॥ ८<br>कृष्णाष्टमीव्रतं तद्वद् रोहिणीचन्द्रसंज्ञितम्।<br>तडागविधिमाहात्म्यं पादपोत्सर्ग एव च॥ ९<br>सौभाग्यशयनं तद्वदगस्त्यव्रतमेव च।<br>तथानन्ततृतीया तु रसकल्याणिनी तथा॥ १०<br>आर्द्रानन्दकरी तद्वद् व्रतं सारस्वतं पुनः।<br>उपरागाभिषेकश्च सप्तमीस्नपनं पुनः॥ ११<br>भीमाख्या द्वादशी तद्वदनङ्गशयनं तथा।<br>अशून्यशयनं तद्वत् तथैवाङ्गारकव्रतम्॥ १२<br>सप्तमीसप्तकं तद्वद् विशोकद्वादशी तथा।<br>मेरुप्रदानं दशधा ग्रहशान्तिस्तथैव च॥ १३<br>ग्रहस्वरूपकथनं तथा शिवचतुर्दशी।<br>तथा सर्वफलत्यागः सूर्यवारव्रतं तथा॥ १४

* अध्याय २९१ *

१०८३


| संक्रान्तिस्नपनं तद्वद् विभूतिद्वादशीव्रतम्।<br>षष्टिव्रतानां माहात्म्यं तथा स्नानविधिक्रमः॥ १५<br>प्रयागस्य तु माहात्म्यं सर्वतीर्थानुकीर्तनम्।<br>ऐलाश्रमव्रतं तद्वद् द्वीपलोकानुकीर्तनम्॥ १६<br>सूर्यचन्द्रगतिस्तद्वदादित्यरथवर्णनम् ।<br>तथान्तरिक्षचारश्च ध्रुवमाहात्म्यमेव च॥ १७<br>भुवनानि सुरेन्द्राणां त्रिपुराघोषणं तथा।<br>पितृपिण्डदमाहात्म्यं मन्वन्तरविनिर्णयः॥ १८<br>वज्राङ्गस्य तु सम्भूतिस्तारकोत्पत्तिरेव च।<br>तारकासुरमाहात्म्यं ब्रह्मदेवानुमन्त्रणम्॥ १९<br>पार्वतीसम्भवस्तद्वत् तथा शिवतपोवनम्।<br>अनङ्गदेहदाहस्तु रतिशोकस्तथैव च॥ २०<br>गौरीतपोवनं तद्वद् विश्वनाथप्रसादनम्।<br>पार्वतीऋषिसंवादस्तथैवोद्वाहमङ्गलम् ॥ २१<br>कुमारसम्भवस्तद्वत् कुमारविजयस्तथा।<br>तारकस्य वधो घोरो नरसिंहोपवर्णनम्॥ २२<br>पद्मोद्भवविसर्गस्तु तथैवान्धकघातनम्।<br>वाराणस्यास्तु माहात्म्यं नर्मदायास्तथैव च॥ २३<br>प्रवरानुक्रमस्तद्वत् पितृगाथानुकीर्तनम्।<br>तथोभयमुखीदानं दानं कृष्णाजिनस्य च॥ २४<br>तथा सावित्र्युपाख्यानं राजधर्मास्तथैव च।<br>यात्रानिमित्तकथनं स्वप्नमाङ्गल्यकीर्तनम्॥ २५<br>वामनस्य तु माहात्म्यं तथैवाथ वराहजम्।<br>क्षीरोदमथनं तद्वत् कालकूटाभिशासनम्॥ २६<br>देवासुरविमर्दश्च वास्तुविद्यास्तथैव च।<br>प्रतिमालक्षणं तद्वद् देवताराधनं ततः॥ २७<br>प्रासादलक्षणं तद्वन्मण्डपानां तु लक्षणम्।<br>भविष्यद्राजनिर्देशो महादानानुकीर्तनम्।<br>कल्पानुकीर्तनं तद्वद् ग्रन्थानुक्रमणी तथा॥ २८ | उसी प्रकार संक्रान्तिस्नपनव्रत, विभूतिद्वादशीव्रत, साठ व्रतोंका माहात्म्य, स्नानविधिका क्रम, प्रयागका माहात्म्य, समस्त तीर्थोंका वर्णन, ऐलाश्रमव्रत, द्वीप और लोकोंका कथन, सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन, आदित्यके रथका वर्णन, उसका अन्तरिक्षमें गमन, ध्रुवका माहात्म्य, सुरेन्द्रोंके भुवन, त्रिपुरके प्रति घोषणा, पितरोंके पिण्डदानका माहात्म्य, मन्वन्तरोंका निर्णय, वज्राङ्गकी उत्पत्ति, तारककी उत्पत्ति, तारकासुरकी प्रशंसा, ब्रह्मा और देवताओंकी मन्त्रणा, पार्वतीकी उत्पत्ति, शिवका तपोवन-गमन, कामदेवके शरीरका दाह, रतिका शोक, पार्वतीका तपोवन-गमन, विश्वनाथकी प्रसन्नता, पार्वती और सप्तर्षियोंका संवाद, पार्वतीका विवाहोत्सव, कुमार स्कन्दकी उत्पत्ति, कुमारकी विजय, तारकासुरका भयंकर वध, नरसिंहावतारका वर्णन, पद्मोद्भवका विसर्ग, अन्धकासुरका वध, वाराणसीका माहात्म्य, नर्मदाका माहात्म्य, प्रवरोंका अनुक्रम, पितृगाथाका वर्णन, उभयमुखी दान तथा कृष्णमृगचर्मके दानका वर्णन, सावित्रीका उपाख्यान, राजधर्मका वर्णन, यात्राके निमित्तका कथन, शुभ-अशुभ स्वप्नों और शकुनोंका निरूपण, वामनका माहात्म्य, वराहका माहात्म्य, क्षीरसागरका मन्थन, कालकूटका दमन, देवों और असुरोंका संग्राम, वास्तुविद्याका कथन, प्रतिमाओंके लक्षण, देवताओंकी आराधना, प्रासादोंका लक्षण, मण्डपोंका लक्षण, भविष्यत्कालीन राजाओंका वर्णन, महादानोंका कथन, कल्पोंका वर्णन तथा ग्रन्थोंकी अनुक्रमणिकाका कथन हुआ है॥ १५–२८॥ | | एतत् पवित्रमायुष्यमेतत् कीर्तिविवर्धनम्।<br>एतत् पवित्रं कल्याणं महापापहरं शुभम्॥ २९ | यह पुराण परम पवित्र, आयु प्रदान करनेवाला, कीर्तिवर्धक, परम पावन, कल्याणकारक, बड़े-बड़े पापोंको नष्ट करनेवाला और मङ्गलमय है। इस पुराणसे मनुष्योंको | | अस्मात् पुराणात् सुकृतं नराणां तीर्थावलीनामवगाहनानाम् ।<br>समस्तधर्माचरणोद्भवानां सदैव लाभश्च महाफलानाम्॥ ३० | सदैव पुण्य तथा समस्त तीर्थोंमें स्नान करने और सम्पूर्ण धर्माचरणसे उत्पन्न हुए महान् फलोंका लाभ प्राप्त होता है। |

१०८४ * मत्स्यपुराण *


एतत् पुराणं परमं सर्वदोषविघातकम्।<br>मत्स्यरूपेण हरिणा कथितं मनवेऽर्णवे॥ ३१<br>अस्मात् पुराणादपि पादमेकं<br>पठेत् तु यः सोऽपि विमुक्तपापः।<br>नारायणस्यास्पदमैति नून-<br>मनङ्गवद् दिव्यवपुः सुखी स्यात्॥ ३२<br>पुराणमेतत् सकलं रहस्यं<br>श्रद्धान्वितः पुण्यमिदं शृणोति।<br>स चाश्वमेधावभृथप्रभावं<br>फलं समाप्नोति हरप्रसादात्॥ ३३<br>शिवं विष्णुं समभ्यर्च्य ब्रह्माणं सदिवाकरम्।<br>श्लोकं श्लोकार्धपादं वा श्रद्धया यः शृणोति वा।<br>श्रावयेद् वापि धर्मज्ञस्तत्फलं शृणुत द्विजाः॥ ३४<br>ब्राह्मणो लभते विद्यां क्षत्रियो लभते महीम्।<br>वैश्यो धनमवाप्नोति सुखं शूद्रस्तु विन्दति॥ ३५<br>आयुष्मान् पुत्रवांश्चैव लक्ष्मीवान् पापवर्जितः।<br>श्रुत्वा पुराणमखिलं शत्रुभिश्चापराजितः॥ ३६यह परमोत्तम पुराण सम्पूर्ण दोषोंका नाशक है। इसे मत्स्यरूपधारी श्रीहरिने प्रलयकालमें एकार्णवके जलमें मनुके प्रति कहा था। जो मनुष्य इस पुराणके एक श्लोकके एक चरणका भी पाठ करता है, वह भी पापोंसे मुक्त होकर सुखी हो जाता है तथा कामदेवकी भाँति दिव्य शरीर धारणकर निश्चय ही नारायणके निवासस्थान वैकुण्ठमें चला जाता है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस पुण्यप्रद एवं रहस्यमय सम्पूर्ण पुराणको सुनता है, वह शंकरजीकी कृपासे अश्वमेध-यज्ञके अन्तमें होनेवाले अवभृथ-स्नानके सदृश प्रभावशाली फलको प्राप्त करता है। द्विजवरो! जो धर्मज्ञ मनुष्य शिव, विष्णु, ब्रह्मा और सूर्यकी अर्चना करके श्रद्धापूर्वक इस पुराणके एक श्लोक, आधे श्लोक अथवा एक चरणको सुनता है अथवा दूसरेको सुनाता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनिये। वह ब्राह्मण हो तो विद्या, क्षत्रिय हो तो पृथ्वी, वैश्य हो तो धन और शूद्र हो तो सुख प्राप्त करता है। सम्पूर्ण पुराण सुननेवाला पापरहित होकर आयुष्मान्, पुत्रवान् और लक्ष्मीवान् हो जाता है तथा उसे शत्रु पराजित नहीं कर सकते॥ २९—३६॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽनुक्रमणिका नामैकनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २९१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अनुक्रमणिका नामक दो सौ इक्यानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २९१॥


पुराण-श्रवण-कालमें पालनीय धर्म

श्रद्धाभक्तिसमायुक्ता नान्यकार्येषु लालसाः।<br>वाग्यताः शुचयोऽव्यग्राः श्रोतारः पुण्यभागिनः॥ १<br><br>अभक्त्या ये कथां पुण्यां शृण्वन्ति मनुजाधमाः।<br>तेषां पुण्यफलं नास्ति दुःखं स्याज्जन्मजन्मनि॥ २<br><br>पुराणं ये च सम्पूज्य ताम्बूलाद्यैरुपायनैः।<br>शृण्वन्ति च कथां भक्त्याऽदरिद्राः स्युर्न संशयः॥ ३<br><br>कथायां कीर्त्यमानायां ये गच्छन्त्यन्यतो नराः।<br>भोगान्तरे प्रणश्यन्ति तेषां दाराश्च सम्पदः॥ ४जो लोग श्रद्धा और भक्तिसे सम्पन्न, अन्य कार्योंकी लालसासे रहित, मौन, पवित्र और शान्तचित्तसे (पुराणकी कथाको) श्रवण करते हैं, वे ही पुण्यके भागी होते हैं। जो अधम मनुष्य भक्तिरहित होकर पुण्यकथाको सुनते हैं, उन्हें पुण्यफल तो मिलता नहीं, उलटे प्रत्येक जन्ममें दुःख भोगना पड़ता है। जो लोग ताम्बूल, पुष्प, चन्दन आदि पूजन-सामग्रियोंद्वारा पुराणकी भलीभाँति पूजा करके भक्तिपूर्वक कथा सुनते हैं, वे निःसंदेह दरिद्रतारहित अर्थात् धनवान् होते हैं। जो मनुष्य कथा होते समय अन्य कार्यके लिये वहाँसे उठकर अन्यत्र चले जाते हैं, उनकी पत्नी और
* पुराण-श्रवण-कालमें पालनीय धर्म *१०८५

| सोष्णीषमस्तका ये च कथां शृण्वन्ति पावनीम्।<br>ते बलाकाः प्रजायन्ते पापिनो मनुजाधमाः॥ ५<br><br>ताम्बूलं भक्षयन्तो ये कथां शृण्वन्ति पावनीम्।<br>श्वविष्ठां खादयन्त्येताननयन्ति यमकिङ्कराः॥ ६<br><br>ये च तुङ्गासनारूढाः कथां शृण्वन्ति दाम्भिकाः।<br>अक्षय्यनरकान् भुक्त्वा ते भवन्त्येव वायसाः॥ ७<br><br>ये वै वरासनारूढा ये च मध्यासनस्थिताः।<br>शृण्वन्ति सत्कथां ते वै भवन्त्यर्जुनपादपाः॥ ८<br><br>असम्प्रणम्य शृण्वन्ति विषभक्षा भवन्ति ते।<br>तथा शयानाः शृण्वन्ति भवन्त्यजगरा नराः॥ ९ | सम्पत्ति नष्ट हो जाती है। जो पापी अधम मनुष्य मस्तकपर पगड़ी बाँधकर (या टोपी लगाकर) पवित्र कथाको सुनते हैं, वे (दूसरे जन्ममें) बगुला होकर उत्पन्न होते हैं। जो लोग पान चबाते हुए पवित्र कथाको सुनते हैं, उन्हें कुत्तेका मल खाना पड़ता है और यमदूत उन्हें यमपुरीमें ले जाते हैं। जो ढोंगी मनुष्य (व्यासासनसे) ऊँचे आसनपर बैठकर कथा सुनते हैं, वे ही अक्षय नरकोंका भोग करके कौआ होते हैं। जो लोग (व्यासासनसे) श्रेष्ठ आसनपर अथवा मध्यम आसनपर बैठकर उत्तम कथाको श्रवण करते हैं, वे अर्जुन नामक वृक्ष होते हैं। जो मनुष्य (पुराणकी पुस्तक और व्यासको) बिना प्रणाम किये ही कथा सुनते हैं, वे विषभक्षी होते हैं तथा जो लोग सोते हुए कथा सुनते हैं, वे अजगर साँप होते हैं॥ १—९॥ | | यः शृणोति कथां वक्तुः समानासनसंस्थितः।<br>गुरुतल्पसमं पापं सम्प्राप्य नरकं व्रजेत्॥ १०<br><br>ये निन्दन्ति पुराणज्ञान् कथां वै पापहारिणीम्।<br>ते वै जन्मशतं मर्त्याः सूकराः सम्भवन्ति हि॥ ११<br><br>कथायां कीर्त्यमानायां ये वदन्ति दुरुत्तरम्।<br>ते गर्दभाः प्रजायन्ते कृकलासास्तथैव च॥ १२<br><br>कदाचिदपि ये पुण्यां न शृण्वन्ति कथां नराः।<br>ते भुक्त्वा नरकान् घोरान् भवन्ति वनसूकराः॥ १३<br><br>ये कथामनुमोदन्ते कीर्त्यमानां नरोत्तमाः।<br>अशृण्वन्तोऽपि ते यान्ति शाश्वतं परमं पदम्॥ १४<br><br>कथायां कीर्त्यमानायां विघ्नं कुर्वन्ति ये शठाः।<br>कोट्यब्दं नरकान् भुक्त्वा भवन्ति ग्रामसूकराः॥ १५<br><br>ये श्रावयन्ति मनुजान् पुण्यां पौराणिकीं कथाम्।<br>कल्पकोटिशतं सांग्रं तिष्ठन्ति ब्रह्मणः पदे॥ १६<br><br>आसनार्थं प्रयच्छन्ति पुराणज्ञस्य ये नराः।<br>कम्बलाजिनवासांसि मञ्चं फलकमेव च॥ १७<br><br>स्वर्गलोकं समासाद्य भुक्त्वा भोगान् यथेप्सितान्।<br>स्थित्वा ब्रह्मादिलोकेषु पदं यान्ति निरामयम्॥ १८ | इसी प्रकार जो वक्ताके समान आसनपर बैठकर कथा सुनता है, वह गुरु-शय्या-गमनके समान पापका भागी होकर नरकगामी होता है। जो मनुष्य पुराणोंके ज्ञाता (व्यास) और पापोंको हरण करनेवाली कथाकी निन्दा करते हैं, वे सौ जन्मोंतक सूकर-योनिमें उत्पन्न होते हैं। कथा होते समय जो लोग वक्ताको बुरा उत्तर देते हैं, वे गदहा तथा गिरगिटकी योनिमें पैदा होते हैं। जो मनुष्य इस पुण्य कथाको कभी भी नहीं सुनते, वे घोर नरकोंका भोग करके बनैले सूअर होते हैं। जो नरश्रेष्ठ कही जाती हुई कथाका अनुमोदन करते हैं, वे कथा न सुननेपर भी अविनाशी परम पदको प्राप्त होते हैं। जो दुष्ट कही जाती हुई कथामें विघ्न पैदा करते हैं, वे करोड़ों वर्षोतक नरकोंका भोग करके अन्तमें ग्रामीण सूअर होते हैं। जो लोग साधारण मनुष्योंको पुराणसम्बन्धिनी पुण्य कथा सुनाते हैं, वे सौ करोड़ कल्पोंसे भी अधिक समयतक ब्रह्मलोकमें निवास करते हैं। जो मनुष्य पुराणके ज्ञाता वक्ताको आसनके लिये कम्बल, मृगचर्म, वस्त्र, सिंहासन और चौकी प्रदान करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाकर अभीष्ट भोगोंका उपभोग करनेके बाद ब्रह्मा आदिके लोकोंमें निवास कर अन्तमें निरामय पदको प्राप्त होते हैं॥ १०—१८॥ | | पुराणस्य प्रयच्छन्ति ये वरासनमुत्तमम्।<br>भोगिनो ज्ञानसम्पन्ना भवन्ति च भवे भवे॥ १९ | इसी तरह जो लोग पुराणकी पुस्तकके लिये उत्तम श्रेष्ठ आसन प्रदान करते हैं, वे प्रत्येक जन्ममें भोगोंका उपभोग करनेवाले एवं ज्ञानी होते हैं। |

१०८६ * मत्स्यपुराण *


ये महापातकैर्युक्ता उपपातकिनश्च ये।<br>पुराणश्रवणादेव ते प्रयान्ति परं पदम्॥ २०<br>एवंविधविधानेन पुराणं शृणुयान्नरः।<br>भुक्त्वा भोगान् यथाकामं विष्णुलोकं प्रयाति सः॥ २१<br>पुस्तकं पूजयेत् पश्चाद् वस्त्रालङ्करणादिभिः।<br>वाचकं विप्रसंयुक्तं पूजयीत प्रयत्नवान्॥ २२<br>गोभूमिहेमवस्त्राणि वाचकाय निवेदयेत्।<br>ब्राह्मणान् भोजयेत् पश्चान्मण्डलड्डुकपायसैः॥ २३<br>त्वं व्यासरूपी भगवन् बुद्ध्या चाङ्गिरसोपमः।<br>पुण्यवाञ्शीलसम्पन्नः सत्यवादी जितेन्द्रियः॥ २४<br>प्रसन्नमानसं कुर्याद् दानमानोपचारतः।<br>त्वत्प्रसादादिमान् धर्मान् सम्पूर्णाञ्श्रुतवानहम्॥ २५<br>एवं प्रार्थनकं कृत्वा व्यासस्य परमात्मनः।<br>यशस्वी च भवेन्नित्यं यः कुर्याद्देवमादरात्॥ २६<br>नारदोक्तानिमान् धर्मान् यः कुर्यान्नियतेन्द्रियः।<br>कृत्स्नं फलमवाप्नोति पुराणश्रवणस्य वै॥ २७जो महापातकोंसे युक्त होते हैं अथवा जो उपपातकी होते हैं, वे सभी पुराणकी कथा सुननेसे ही परम पदको प्राप्त हो जाते हैं। जो मनुष्य इस प्रकारके नियम-विधानसे पुराणकी कथा सुनता है, वह स्वेच्छानुसार भोगोंको भोगकर विष्णुलोकको चला जाता है। कथा समाप्त होनेपर श्रोता पुरुष प्रयत्नपूर्वक वस्त्र और अलंकार आदिद्वारा पुस्तककी पूजा करे। तत्पश्चात् सहायक ब्राह्मणसहित वाचककी पूजा करे। उस समय वाचकको गौ, पृथ्वी, सोना और वस्त्र देना चाहिये। तदुपरान्त ब्राह्मणोंको मलाई, लड्डू और खीरका भोजन कराना चाहिये। तदनन्तर परमात्मा व्याससे प्रार्थना करे—'आप व्यासरूपी भगवान्! बुद्धिमें बृहस्पतिके समान, पुण्यवान्, शीलसम्पन्न, सत्यवादी और जितेन्द्रिय हैं, आपकी कृपासे मैंने इन सम्पूर्ण धर्मोंको सुना है।' इस प्रकार प्रार्थना कर दान, मान और सेवासे उनके मनको प्रसन्न करना चाहिये। जो मनुष्य इस प्रकार आदरपूर्वक करता है, वह सदा यशस्वी होता है। जो जितेन्द्रिय मनुष्य देवर्षि नारदद्वारा कहे गये इन धर्मोंका पालन करता है, वह पुराण-श्रवणका सम्पूर्ण फल पाता है॥ १९—२७॥
सूत उवाच<br>मत्स्यरूपी स भगवान् मनवे बुद्धिशालिने।<br>अवापोद्घातसहितमुक्त्वा ह्यन्तर्दधौ तदा॥ २८॥**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! उस समय मत्स्यरूपी भगवान् बुद्धिशाली मनुसे आदि-अन्त-सहित इस पुराणको कहकर अन्तर्हित हो गये॥ २८॥

इति पुराणश्रवणकालीनधर्माः।

इति श्रीमद्द्वैपायनमुनिप्रणीतं मत्स्यपुराणं समाप्तम्।
इस प्रकार श्रीमद्द्वैपायनमुनिप्रणीत मत्स्यपुराण समाप्त हुआ॥