मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * अध्याय १८८ * | ७८७ |
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| धूमेनाकुलिता सा तु प्रसुप्ता धरणीतले।<br>अन्या गृहीतहस्ता तु सखि दह्यति बालिका ॥ ४५<br>अनेकदिव्यरत्नाढ्या दृष्ट्वा दहनमोहिता।<br>शिरसि ह्यञ्जलिं कृत्वा विज्ञापयति पावकम् ॥ ४६<br>भगवन् यदि वैरं ते पुरुषेष्वपकारिषु।<br>स्त्रियः किमपराध्यन्ते गृहपञ्जरकोकिलाः ॥ ४७<br>पाप निर्दय निर्लज्ज कस्ते कोपः स्त्रियः प्रति।<br>न दाक्षिण्यं न ते लज्जा न सत्यं शौर्यवर्जितः ॥ ४८<br>अनेन ह्यापसर्गेण तूपालम्भं शिखिन्यदात्।<br>किं त्वया न श्रुतं लोके ह्यवध्याः शत्रुयोषितः ॥ ४९<br>किंतु तुभ्यं गुणा होते दहनोत्सादनं प्रति।<br>न कारुण्यं भयं वापि दाक्षिण्यं न स्त्रियः प्रति ॥ ५०<br>दयां कुर्वन्ति म्लेच्छापि दहन्तीं वीक्ष्य योषितम्।<br>म्लेच्छानामपि कष्टोऽसि दुर्निवारो ह्यचेतनः ॥ ५१<br>एते चैव गुणास्तुभ्यं दहनोत्सादनं प्रति।<br>आसामपि दुराचार स्त्रीणां किं ते निपातने ॥ ५२<br>दुष्ट निर्घृण निर्लज्ज हुताशिन् मन्दभाग्यक।<br>निराशत्वं दुरावास बलाद् दहसि निर्दय ॥ ५३<br>एवं विलपमानास्ता जल्पन्त्यश्च बहून्यपि।<br>अन्याः क्रोशन्ति संक्रुद्धा बालशोकेन मोहिताः ॥ ५४<br>दहते निर्दयो वह्निः संक्रुद्धः पूर्वशत्रुवत्।<br>पुष्करिण्यां जलं दग्धं कूपेष्वपि तथैव च ॥ ५५<br>अस्मान् संदह्य म्लेच्छ त्वं कां गतिं प्रापयिष्यसि।<br>एवं प्रलपितं तासां श्रुत्वा देवो विभावसुः।<br>मूर्तिमान् सहसोत्थाय वह्निर्वचनमब्रवीत् ॥ ५६ | धुएँसे व्याकुल होकर पृथ्वीपर सो गयी। अन्य स्त्री अपनी सखीका हाथ पकड़कर कह रही हैं—'सखि! बालिका जल रही है।' कोई अनेक दिव्य रत्नोंसे अलंकृत नारी अग्निको देखकर मोहित हो गयी, तब वह सिरपर हाथ जोड़कर अग्निसे प्रार्थना करने लगी—'भगवन्! यदि तुम्हारा अपकारी पुरुषोंसे वैर है तो घरके पिंजरेमें कोयलके समान आबद्ध स्त्रियोंने तुम्हारा क्या अपराध किया है? अरे पापी! तुम तो बड़े निर्दयी और निर्लज्ज हो। स्त्रियोंके प्रति यह तुम्हारा कैसा क्रोध है! अरे कायर! न तो तुममें कुशलता है, न लज्जा है और न सत्यता है।' वह ऐसे आक्षेपयुक्त वाक्योंसे अग्निको उलाहना देने लगी। (फिर दूसरी कहने लगी—) 'क्या तुमने यह नहीं सुना है कि शत्रुको स्त्रियाँ भी अवध्य होती हैं? क्या जलाना और नाश करना ये ही तुम्हारे गुण हैं? तुम्हारेमें स्त्रियोंके प्रति दया, भय अथवा उदारता नहीं है। म्लेच्छगण भी स्त्रियोंको जलती हुई देखकर उनपर दया करते हैं। तुम तो म्लेच्छोंसे भी बढ़कर हृदयशून्य दुर्निवार कष्ट हो। दुराचारिन्! इन स्त्रियोंको मारनेसे तुम्हें क्या मिलेगा? क्या जलाना और मारना ये ही तुम्हारे गुण हैं? दुष्ट हुताशिन्! तुम बड़े दयाहीन, निर्लज्ज, अभागा, कठोर और कपटी हो। अरे निर्दय! तुम क्यों बलपूर्वक स्त्रियोंको जला रहे हो?' इस प्रकार वे स्त्रियाँ अनेकों प्रकारसे विलाप करती हुई चीत्कार कर रही थीं? अन्य कुछ स्त्रियाँ बालशोकसे मोहित होकर विलाप कर रही थीं। यह निष्ठुर अग्नि क्रुद्ध होकर पुराने शत्रुके समान हमलोगोंको जला रहा है। पुष्करिणियों और कुओंके भी जल सूख गये। अरे म्लेच्छ! हमलोगोंको जलाकर तुम किस गतिको प्राप्त होगे? इस प्रकार उनका प्रलाप सुनकर अग्निदेव सहसा मूर्तिमान् होकर उठ खड़े हुए और इस प्रकार बोले॥ ४०–५६॥ | | अग्निरुवाच | अग्निदेवने कहा— | | स्ववशो नैव युष्माकं विनाशं तु करोम्यहम्।<br>अहमादेशकर्ता वै नाहं कर्तास्म्यनुग्रहम् ॥ ५७<br>रुद्रक्रोधसमाविष्टो विचरामि यथेच्छया।<br>ततो बाणो महातेजास्त्रिपुरं वीक्ष्य दीपितम् ॥ ५८<br>सिंहासनस्थः प्रोवाच ह्यहं देवैर्विनाशितः।<br>अल्पसत्त्वैर्दुराचारैरीश्वरस्य निवेदितम् ॥ ५९ | मैं अपनी इच्छाके अनुसार तुमलोगोंका विनाश नहीं कर रहा हूँ, अपितु मैं आदेशका पालक हूँ। मैं अनुग्रहका कर्ता नहीं हूँ। मैं रुद्रके क्रोधसे आविष्ट होकर इच्छानुसार विचरण कर रहा हूँ। तदनन्तर सिंहासनपर बैठा हुआ महातेजस्वी बाण त्रिपुरको जलता हुआ देखकर बोला—'मैं देवताओंन्द्वारा विनष्ट कर दिया गया। उस स्वल्पबलशाली दुराचारियोंने शंकरसे निवेदन |
७८८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अपरीक्ष्य त्वहं दग्धः शंकरेण महात्मना।<br>नान्यः शक्तिस्तु मां हन्तुं वर्जयित्वा त्रिलोचनम्॥ ६०<br>उत्थितः शिरसा कृत्वा लिङ्गं त्रिभुवनेश्वरम्।<br>निर्गतः स पुरद्वारात् परित्यज्य सुहृत्सुतान्॥ ६१<br>रत्नानि यान्यनर्घाणि स्त्रियो नानाविधास्तथा।<br>गृहीत्वा शिरसा लिङ्गं गच्छन् गगनमण्डलम्॥ ६२<br>स्तुवंश्च देवदेवेशं त्रिलोकाधिपतिं शिवम्।<br>त्यक्ता पुरी मया देव यदि वध्योऽस्मि शंकर॥ ६३<br>त्वत्प्रसादान्महादेव मा मे लिङ्गं विनश्यतु।<br>अर्चितं हि मया देव भक्त्या परमया सदा॥ ६४<br>त्वत्कोपाद् यदि वध्योऽहं तदिदं मा विनश्यतु।<br>श्लाघ्यमेतन्महादेव त्वत्कोपाद् दहनं मम॥ ६५<br>प्रतिजन्म महादेव त्वत्पादनिरतो ह्यहम्।<br>तोटकच्छन्दसा देव स्तौमि त्वां परमेश्वर॥ ६६ | किया और महात्मा शंकरने भी बिना विचारे ही मुझे जला दिया। उन त्रिलोचनको छोड़कर अन्य कोई भी मेरा विनाश नहीं कर सकता। तब वह सिंहासनसे उठ खड़ा हुआ और त्रिभुवनपति शंकरके लिङ्गको सिरपर धारणकर मित्र, पुत्र, बहुमूल्य रत्नों, स्त्रियों और अन्यान्य अनेक प्रकारके पदार्थोंको छोड़कर नगरद्वारसे बाहर निकला। वह लिङ्गको सिरपर धारण कर गगनमण्डलमें जा पहुँचा और देवदेवेश त्रिभुवनपति शिवकी स्तुति करते हुए कहने लगा—'देव! मैंने अपनी पुरीका परित्याग कर दिया है। शंकर! यदि मैं वस्तुतः वध करने योग्य हूँ तो महादेव! आपकी कृपासे मेरा यह लिङ्ग विनष्ट न हो। देव! मैंने परमभक्तिके साथ सदा इसकी पूजा की है, अतः यदि मैं आपके कोपके कारण वध्य हूँ तो यह लिङ्ग विनष्ट न हो। महादेव! आपके कोपसे मेरा यह जल जाना प्रशस्त ही है। महादेव! प्रत्येक जन्ममें मैं आपके चरणोंमें ही लीन हूँ, अतः देवाधिदेव परमेश्वर! मैं तोटक-छन्दद्वारा आपकी स्तुति कर रहा हूँ॥ ५७—६६॥ |
| शिव शंकर शर्व हराय नमो<br>भव भीम महेश्वर सर्व नमः।<br>कुसुमायुधदेहविनाशकर<br>त्रिपुरान्तक अन्धकशूलधर॥ ६७<br><br>प्रमदाप्रिय कान्त विरक्त नमः<br>ससुरासुरसिद्धगणैर्नमित।<br>हयवानरसिंहगजेन्द्रमुखै-<br>रतिह्रस्वसुदीर्घविशालमुखैः ॥ ६८<br><br>उपलब्धुमशक्यतरैरसुरैः<br>प्रथितोऽस्मि च बाहुशतैर्बहुभिः।<br>प्रणतोऽस्मि भवं भवभक्तिरत-<br>श्चलचन्द्रकलाङ्कुर देव नमः॥ ६९<br><br>न च पुत्रकलत्रहयादिधनं<br>मम तु त्वदनुस्मरणं शरणम्।<br>व्यथितोऽस्मि शरीरशतैर्बहुभि-<br>र्गमिता च महानरकस्य गतिः॥ ७०<br><br>न निवर्तति जन्म न पापमतिः<br>शुचिकर्म निबद्धमपि त्यजति।<br>अनुकम्पति विभ्रमति त्रसति<br>मम चैव कुकर्म निवारयति॥ ७१ | आप शिव, शंकर, शर्व और हरको नमस्कार है। भव, भीम, महेश्वर और सर्वभूतमयको प्रणाम है। आप कामदेवके शरीरके नाशक, त्रिपुरान्तक, अन्धक, त्रिशूलधर, आनन्दप्रिय, कान्त, विरक्त और सुर-असुर-सिद्धगणोंसे नमस्कृत हैं, आपको नमस्कार है। मैं अश्व, वानर, सिंह और गजेन्द्रके-से मुखोंवाले, अतिशय छोटे, विस्तृत विशालमुखोंसे युक्त और सैकड़ों भुजाओंसे सम्पन्न बहुत-से अजेय असुरोंद्वारा प्राप्त करनेके लिये अशक्यरूपसे विख्यात हूँ। शिवजीकी भक्तिमें लीन रहनेवाला वही मैं भवके चरणोंमें प्रणिपात कर रहा हूँ। चञ्चल चन्द्रकलासे सुशोभित देव! आपको नमस्कार है। ये पुत्र, स्त्री, अश्वादि वैभव मेरे नहीं हैं, मेरे लिये तो आपका चिन्तन ही एकमात्र शरण है। मैं सैकड़ों शरीर (जन्म) धारण कर पीड़ित हो चुका हूँ। आगे महानरकमें पड़नेकी सम्भावना है। न जन्मसे छुटकारा मिलेगा, न पापबुद्धि ही निवृत्त होगी, शुद्ध कर्ममें लगा हुआ भी मन उसे छोड़ देता है, काँपता है, भ्रमित होता है और भयभीत होता है। मेरे ही कुकर्म अच्छे कर्मोंसे मुझे हटाते हैं। |
| * अध्याय १८८ * | ७८९ |
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| यः पठेत् तोटकं दिव्यं प्रयत: शुचिमानसः।<br>बाणस्येव यथा रुद्रस्तस्यापि वरदो भवेत्॥ ७२<br>इमं स्तवं महादिव्यं श्रुत्वा देवो महेश्वरः।<br>प्रसन्नस्तु तदा तस्य स्वयं वचनमब्रवीत्॥ ७३<br><br>महेश्वर उवाच<br>न भेतव्यं त्वया वत्स सौवर्णे तिष्ठ दानव।<br>पुत्रपौत्रसुहृद्बन्धुभार्याभृत्यजनैः सह॥ ७४<br>अद्यप्रभृति बाण त्वमवध्यस्त्रिदशैरपि।<br>भूयस्तस्य वरो दत्तो देवदेवेन पाण्डव॥ ७५<br>अक्षयश्चाव्ययो लोके विचरस्वाकुतोभयः।<br>ततो निवारयामास रुद्रः सप्तशिखं तदा॥ ७६<br>तृतीयं रक्षितं तस्य शंकरेण महात्मना।<br>भ्रमत्तु गगने दिव्यं रुद्रतेजःप्रभावतः॥ ७७<br>एवं तु त्रिपुरं दग्धं शंकरेण महात्मना।<br>ज्वालामालाप्रदीप्तं तत् पतितं धरणीतले॥ ७८<br>एकं निपतितं तत्र श्रीशैले त्रिपुरान्तके।<br>द्वितीयं पतितं तस्मिन् पर्वतेऽमरकण्टके॥ ७९<br>दग्धेषु तेषु राजेन्द्र रुद्रकोटिः प्रतिष्ठिता।<br>ज्वलत्तदपतत् तत्र तेन ज्वालेश्वरः स्मृतः॥ ८०<br>ऊर्ध्वेन प्रस्थितास्तस्य दिव्यज्वाला दिवं गताः।<br>हाहाकारस्तदा जातो देवासुरकृतो महान्॥ ८१<br>शरमस्तम्भयद् रुद्रो माहेश्वरपुरोत्तमे।<br>एवं वृत्तं तदा तस्मिन् पर्वतेऽमरकण्टके॥ ८२<br>चतुर्दशाख्यं भुवनं स भुक्त्वा पाण्डुनन्दन।<br>वर्षकोटिसहस्रं तु त्रिंशत्कोट्यस्तथापराः॥ ८३<br>ततो महीतलं प्राप्य राजा भवति धार्मिकः।<br>पृथिवीमेकच्छत्रेण भुङ्क्ते स तु न संशयः॥ ८४<br><br>एवं पुण्यो महाराज पर्वतोऽमरकण्टकः।<br>चन्द्रसूर्योपरागे तु गच्छेद् योऽमरकण्टकम्॥ ८५<br>अश्वमेधाद् दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः।<br>स्वर्गलोकमवाप्नोति दृष्ट्वा तत्र महेश्वरम्॥ ८६<br><br>ब्रह्महत्या गमिष्यन्ति राहुग्रस्ते दिवाकरे।<br>तदेवं निखिलं पुण्यं पर्वतेऽमरकण्टके॥ ८७ | जो मनुष्य संयत होकर पवित्र मनसे इस दिव्य तोटकछन्दमें रचित स्तोत्रको पढ़ता है, उसके लिये भी रुद्र बाणके समान वरदायक होते हैं। उस समय स्वयं महेश्वरदेव इस महादिव्य स्तोत्रको सुनकर उसपर प्रसन्न हो गये और इस प्रकार बोले॥ ६७-७३॥<br><br>भगवान् महेश्वरने कहा—वत्स! तुम्हें डरना नहीं चाहिये। दानव! तुम पुत्र, मित्र, बन्धु, पत्नी और भृत्यजनोंके साथ सुवर्णनिर्मित नगरमें निवास करो। बाण! आजसे तुम देवताओंद्वारा अवध्य हो गये। अब तुम लोकमें सर्वथा निर्भय, अव्यय और अक्षय होकर विचरण करो। पाण्डुनन्दन! इस प्रकार देवाधिदेवने बाणको पुनः वर प्रदान किया। तदनन्तर रुद्रने अग्निको जलानेसे मना कर दिया। इस प्रकार महात्मा शंकरने बाणासुरके तृतीय पुरकी रक्षा की। वह पुर रुद्रके तेजके प्रभावसे गगनमण्डलमें घूमने लगा। इस प्रकार महात्मा शंकरने त्रिपुरको जलाया। वह ज्वालामालासे प्रदीप्त होकर पृथ्वीतलपर गिर पड़ा। उनमेंसे एक पुर त्रिपुरान्तकके श्रीशैलपर गिरा और द्वितीय उस अमरकण्टक पर्वतपर गिरा। राजेन्द्र! उनके जल जानेपर उसपर करोड़ों रुद्र प्रतिष्ठित हुए। वह जलता हुआ गिरा था, इस कारण ज्वालेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसकी दिव्य ज्वालाएँ ऊपरको उठती हुई स्वर्गलोकतक जा पहुँचीं। उस समय देवों और असुरोंके द्वारा किया गया भयंकर हाहाकार व्याप्त हो गया। तब रुद्रने अमरकण्टक पर्वतपर उत्तम माहेश्वरपुरमें शरको स्तम्भित कर दिया। पाण्डुनन्दन! (इस प्रकार अमरकण्टकपर्वतपर जो व्यक्ति रुद्रकोटिकी अर्चना करता है) वह तीस करोड़ एक हजार वर्षपर्यन्त चौदहों भुवनोंका उपभोग कर अन्तमें पृथ्वीपर जन्म लेकर धार्मिक राजा होता है। वह एकच्छत्र सम्राट् होकर पृथ्वीका उपभोग करता है—इसमें संदेह नहीं है॥ ७४-८४॥<br><br>महाराज! यह अमरकण्टक पर्वत ऐसा पुण्यजनक है। जो व्यक्ति चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय अमरकण्टक पर्वतपर जाता है, वह अश्वमेध-यज्ञसे दसगुना फल प्राप्त करता है और वहाँ महेश्वरका दर्शन करके स्वर्गलोकको प्राप्त करता है—ऐसा मनीषियोंने कहा है। सूर्यग्रहणके अवसरपर अमरकण्टकपर जानेसे ब्रह्महत्याएँ निवृत्त हो जाती हैं। इस प्रकार अमरकण्टक पर्वतपर अशेष पुण्य |
७९० * मत्स्यपुराण *
| मनसापि स्मरेद् यस्तं गिरिं त्वमरकण्टकम्।<br>चान्द्रायणशतं साग्रं लभते नात्र संशयः॥८८ | प्राप्त होता है। जो मनसे भी उस अमरकण्टकपर्वतका स्मरण करता है, उसे निःसंदेह सौ चान्द्रायणव्रतसे भी अधिक फल मिलता है। | | त्रयाणामपि लोकानां विख्यातोऽमरकण्टकः।<br>एष पुण्यो गिरिश्रेष्ठः सिद्धगन्धर्वसेवितः॥८९ | अमरकण्टक पर्वत तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। यह पुण्यमय श्रेष्ठ पर्वत सिद्धों और गन्धर्वोंसे सेवित, | | नानाद्रुमलताकीर्णो नानापुष्पोपशोभितः।<br>मृगव्याघ्रसहस्रैस्तु सेव्यमानो महागिरिः॥९० | विविध वृक्षों और लताओंसे व्याप्त तथा अनेक प्रकारके पुष्पोंसे सुशोभित है। यह महान् पर्वत हजारों मृगों और व्याघ्रोंसे सेवित है। | | यत्र संनिहितो देवो देव्या सह महेश्वरः।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा चेन्द्रो विद्याधरगणैः सह॥९१ | जहाँ देवी पार्वतीके साथ महादेव, ब्रह्मा, विष्णु तथा विद्याधरोंके साथ इन्द्र सदा उपस्थित रहते हैं, | | ऋषिभिः किन्नरैर्यक्षैर्नित्यमेव निषेवितः।<br>वासुकिः सहितस्तत्र क्रीडते पन्नगोत्तमैः॥९२ | वह अमरकण्टक पर्वत ऋषियों, किन्नरों और यक्षोंके द्वारा सदा सेवित रहता है। श्रेष्ठ सर्पोंके साथ वासुकि वहाँ क्रीड़ा करते रहते हैं। | | प्रदक्षिणं तु यः कुर्यात् पर्वतेऽमरकण्टके।<br>पौण्डरीकस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥९३ | जो मनुष्य अमरकण्टक पर्वतकी प्रदक्षिणा करता है, वह पौण्डरीक यज्ञका फल प्राप्त करता है। | | तत्र ज्वालेश्वरं नाम तीर्थं सिद्धनिषेवितम्।<br>तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः॥९४ | वहाँ सिद्धोंद्वारा सेवित ज्वालेश्वर नामक तीर्थ है, उसमें स्नानकर मानव स्वर्गलोकको प्राप्त करते हैं और जो वहाँ शरीरका त्याग करते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। | | ज्वालेश्वरे महाराज यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>चन्द्रसूर्योपरागेषु तस्यापि शृणु यत्फलम्॥९५ | महाराज! चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर जो व्यक्ति ज्वालेश्वरमें प्राणोंका परित्याग करता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनिये। | | सर्वकर्मविनिर्मुक्तो ज्ञानविज्ञानसंयुतः।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति यावदाभूतसम्प्लवम्॥९६ | वह व्यक्ति सभी कर्मोंसे विनिर्मुक्त तथा ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न हो प्रलयकालपर्यन्त रुद्रलोकको प्राप्त करता है। | | अमरेश्वरदेवस्य पर्वतस्य उभे तटे।<br>तत्र ता ऋषिकोट्यस्तु तपस्तप्यन्ति सुव्रत॥९७ | सुव्रत! अमरकण्टकपर्वतके दोनों तटोंपर करोड़ों ऋषिगण तपस्यामें रत रहते हैं। | | समंताद् योजनक्षेत्रो गिरिश्चामरकण्टकः॥९८ | यह अमरकण्टकपर्वत चारों ओरसे एक योजनमें विस्तृत है। | | अकामो वा सकामो वा नर्मदायां शुभे जले।<br>स्नात्वा मुच्येत पापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति॥९९ | अकाम हो या सकाम, जो मनुष्य नर्मदाके शुभदायक जलमें स्नान करता है, वह सभी पापोंसे छुटकारा पा लेता है और रुद्रलोकको प्राप्त करता है॥८५-९९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥१८४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्यवर्णनमें एक सौ अठासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥१८४॥
- अध्याय १८९ * | ७९१
एक सौ नवासीवाँ अध्याय
नर्मदा-कावेरी-संगमका माहात्म्य
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>पृच्छन्ति ते महात्मानो मार्कण्डेयं महामुनिम्।<br>युधिष्ठिरपुरोगास्ते ऋषयश्च तपोधनाः॥ १<br>आख्याहि भगवंस्तथ्यं कावेरीसंगमो महान्।<br>लोकानां च हितार्थाय अस्माकं च विवृद्धये॥ २<br>सदा पापरता ये च नरा दुष्कृतकारिणः।<br>मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यो गच्छन्ति परं पदम्।<br>एतदिच्छाम विज्ञातुं भगवन् वक्तुमर्हसि॥ ३ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! युधिष्ठिरको आगे कर वे तपोधन महात्मा-ऋषिगण महामुनि मार्कण्डेयसे पूछने लगे—'भगवन्! आप हमलोगोंके अभ्युदय और लोकके कल्याणके लिये उस नर्मदा और कावेरीके संगमका माहात्म्य भलीभाँति वर्णन कीजिये। भगवन्! जिसके प्रभावसे सदा पापमें रत एवं दुराचारमें प्रवृत्त रहनेवाले मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाते हैं और परमपदको प्राप्त करते हैं, उसे हमलोग जानना चाहते हैं, आप बतानेकी कृपा करें॥ १—३॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>शृण्वन्त्ववहिताः सर्वे युधिष्ठिरपुरोगमाः।<br>अस्ति वीरो महायक्षः कुबेरः सत्यविक्रमः॥ ४<br>इदं तीर्थमनुप्राप्य राजा यक्षाधिपोऽभवत्।<br>सिद्धिं प्राप्तो महाराज तन्मे निगदतः शृणु॥ ५<br>कावेरी नर्मदा यत्र सङ्गमो लोकविश्रुतः।<br>तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा कुबेरः सत्यविक्रमः॥ ६<br>तपोऽतप्यत यक्षेन्द्रो दिव्यं वर्षशतं महत्।<br>तस्य तुष्टो महादेवः प्रादाद् वरमनुत्तमम्॥ ७<br>भो भो यक्ष महासत्त्व वरं ब्रूहि यथेप्सितम्।<br>ब्रूहि कार्यं यथेष्टं तु यत्ते मनसि वर्तते॥ ८ | मार्कण्डेयजीने कहा—युधिष्ठिरसहित ऋषिगण! आपलोग सावधान होकर सुनिये। सत्य पराक्रमी एवं शूरवीर महायक्ष कुबेरने इस तीर्थमें आकर सिद्धि प्राप्त की और वे यक्षोंके अधीश्वर बने। महाराज! मैं उनका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। किसी समय सत्यपराक्रमी यक्षपति कुबेरने जहाँ कावेरी और नर्मदाका लोकप्रसिद्ध संगम है, वहाँ स्नानकर पवित्र हो सौ दिव्य वर्षोंतक घोर तपस्या की। तब संतुष्ट होकर महादेवजीने उन्हें उत्तम वर प्रदान करते हुए कहा—'महाबलशाली यक्ष! तुम अपना अभीष्ट वर माँग लो। तुम्हारे मनमें जो यथेष्ट कार्य वर्तमान है, उसे बतलाओ'॥ ४—८॥ |
| कुबेर उवाच<br>यदि तुष्टोऽसि मे देव यदि देयो वरो मम।<br>अद्यप्रभृति सर्वेषां यक्षाणामधिपो भवे॥ ९<br>कुबेरस्य वचः श्रुत्वा परितुष्टो महेश्वरः।<br>एवमस्तु ततो देवस्तत्रैवान्तरधीयत॥ १०<br>सोऽपि लब्धवरो यक्षः शीघ्रं लब्धफलोदयः।<br>पूजितः स तु यक्षैश्च ह्यभिषिक्तस्तु पार्थिव॥ ११<br>कावेरीसङ्गमं तत्र सर्वपापप्रणाशनम्।<br>ये नरा नाभिजानन्ति वञ्चितास्ते न संशयः॥ १२ | कुबेर बोले—देव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना चाहते हैं तो मैं आजसे सभी यक्षोंका अधीश्वर हो जाऊँ। कुबेरका वचन सुनकर महेश्वर परम प्रसन्न हुए और 'ऐसा ही हो'—यों कहकर वे देवाधिदेव वहीं अन्तर्धान हो गये। राजन्! इस प्रकार उस यक्षने वर प्राप्त कर शीघ्र ही फलको भी प्राप्त किया। वह यक्षोंद्वारा पूजित होकर राजाके पदपर अभिषिक्त किया गया। वहीं सभी पापोंको नाश करनेवाला कावेरी-संगम है जो मनुष्य उसे नहीं जानते, वे निःसंदेह ठगे |
| ७९२ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तत्र स्नायीत मानवः।<br>कावेरी च महापुण्या नर्मदा च महानदी॥ १३<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र ह्यर्चयेद् वृषभध्वजम्।<br>अश्वमेधफलं प्राप्य रुद्रलोके महीयते॥ १४<br>अग्निप्रवेशं यः कुर्याद् यश्च कुर्यादनाशकम्।<br>अनिवर्त्या गतिस्तस्य यथा मे शंकोरोऽब्रवीत्॥ १५<br>सेव्यमानो वरस्त्रीभिः क्रीडते दिवि रुद्रवत्।<br>षष्टिवर्षसहस्त्राणि षष्टिकोट्यस्तथापराः॥ १६<br>मोदते रुद्रलोकस्थो यत्र तत्रैव गच्छति।<br>पुण्यक्षयात् परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः॥ १७<br>भोगवान् दानशीलश्च महाकुलसमुद्भवः।<br>तत्र पीत्वा जलं सम्यक् चान्द्रायणफलं लभेत्॥ १८<br>स्वर्गं गच्छन्ति ते मर्त्या ये पिबन्ति शुभं जलम्।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये यत्फलं प्राप्नुयान्नरः।<br>कावेरीसंगमे स्नात्वा तत्फलं तस्य जायते॥ १९<br>एवमादि तु राजेन्द्र कावेरीसंगमे महत्।<br>पुण्यं महत्फलं तत्र सर्वपापप्रणाशनम्॥ २० | गये। इसलिये मनुष्यको सब तरहसे प्रयत्न करके वहाँ स्नान करना चाहिये। राजेन्द्र! कावेरी और नर्मदा—ये दोनों अतिशय पुण्यशालिनी महानदी हैं। उसमें स्नानकर जो मनुष्य वृषभध्वज शिवकी पूजा करता है, वह अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करके रुद्रलोकमें पूजित होता है। जो मनुष्य वहाँ अग्निमें प्रवेश करता है या जो उपवासपूर्वक निवास करता है, उसे पुनरावृत्तिरहित गति प्राप्त होती है—ऐसा शंकरजीने मुझे बतलाया था। वह पुरुष स्वर्गलोकमें सुन्दरी स्त्रियोंद्वारा सेवित होकर रुद्रके समान साठ करोड़ साठ हजार वर्षोंतक क्रीड़ा करता है एवं रुद्रलोकमें स्थित होकर आनन्दका भोग करता है तथा जहाँ चाहता है वहाँ चला जाता है। पुनः पुण्य क्षीण होनेपर वह भ्रष्ट होकर उत्तम कुलमें उत्पन्न, भोगवान्, दानशील और धार्मिक राजा होता है। इस संगममें जलका सम्यक् पानकर मनुष्य चान्द्रायण-व्रतका फल प्राप्त करता है। जो मानव इसके पवित्र जलको पीते हैं, वे स्वर्गको चले जाते हैं। गङ्गा और यमुनाके संगममें स्नान करनेसे मनुष्यको जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही फल उसे कावेरीके संगममें स्नान करनेसे मिलता है। राजेन्द्र! इस तरह कावेरी और नर्मदाके संगममें स्नान करनेसे सभी पापोंका नाश करनेवाला अतिशय पुण्य और महान् फल प्राप्त होता है॥ ९–२०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नर्मदाका माहात्म्यवर्णन नामक एक सौ नवासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८९॥
एक सौ नब्बेवाँ अध्याय
नर्मदाके तटवर्ती तीर्थ
| मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजीने कहा— |
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| नार्मदे चोत्तरे कूले तीर्थं योजनविस्तृतम्।<br>यन्त्रेश्वरेति विख्यातं सर्वपापहरं परम्॥ १<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् दैवतैः सह मोदते।<br>पञ्च वर्षसहस्राणि क्रीडते कामरूपधृक्॥ २<br>गर्जनं च ततो गच्छेद् यत्र मेघचयोत्थितः।<br>इन्द्रजिन्नाम सम्प्राप्तस्तस्य तीर्थप्रभावतः॥ ३<br>मेघनादं ततो गच्छेद् यत्र मेघानुगर्जितम्।<br>मेघनादो गणस्तत्र परमां गणतां गतः॥ ४ | राजन्! नर्मदाके उत्तर तटपर एक योजन विस्तृत यन्त्रेश्वर नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ तीर्थ है, जो सभी पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नानकर मानव देवताओंके साथ आनन्द मनाता है और इच्छानुसार रूप धारणकर पाँच हजार वर्षोंतक वहाँ क्रीड़ा करता है। वहाँ गर्जन नामक तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये, जहाँ मेघसमूह ऊपर उठते रहते हैं। इस तीर्थके प्रभावसे मेघनादको इन्द्रजित् नाम प्राप्त हुआ था। वहाँसे मेघनाद जाना चाहिये, जहाँ मेघके गर्जनकी-सी ध्वनि होती रहती है। इसी स्थानपर मेघनाद-गण गणके श्रेष्ठ पदको प्राप्त किया था। |
| * अध्याय १९० * | ७९३ |
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| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तीर्थमाम्रातकेश्वरम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत्॥ ५<br>नर्मदोत्तरतीरे तु धारा तीर्थं तु विश्रुतम्।<br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा तर्पयेत् पितृदेवताः॥ ६<br>सर्वान् कामानवाप्नोति मनसा ये विचिन्तिताः।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ब्रह्मावर्तमिति स्मृतम्॥ ७<br>तत्र संनिहितो ब्रह्मा नित्यमेव युधिष्ठिर।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र ब्रह्मलोके महीयते॥ ८ | राजेन्द्र! इसके बाद आम्रातकेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नानकर मानव एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। नर्मदाके उत्तर तटपर प्रसिद्ध धारातीर्थ है, उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य यदि पितरों और देवताओंका तर्पण करता है तो उसे मनोऽभिलषित कामनाएँ प्राप्त हो जाती हैं। राजेन्द्र! इसके बाद ब्रह्मावर्त नामसे प्रसिद्ध तीर्थमें जाना चाहिये। युधिष्ठिर! वहाँ ब्रह्मा सदा विराजमान रहते हैं। राजेन्द्र! उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य ब्रह्मलोकमें पूजित होता है॥ १—८॥ |
| ततोऽङ्गारेश्वरं गच्छेन्नियतो नियताशनः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो रुद्रलोकं स गच्छति॥ ९<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र कपिलातीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् कपिलादानमाप्नुयात्॥ १०<br>गच्छेत् करञ्जतीर्थं तु देवर्षिगणसेवितम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोलोकं समवाप्नुयात्॥ ११<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र कुण्डलेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र संनिहितो रुद्रस्तिष्ठते ह्युमया सह॥ १२<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र स वन्द्यस्त्रिदशैरपि।<br>पिप्पलेशं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्॥ १३<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र रुद्रलोके महीयते।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र विमलेश्वरमुत्तमम्॥ १४<br>तत्र देवशिला रम्या चेश्वरेण विनिर्मिता।<br>तत्र प्राणपरित्यागाद् रुद्रलोकमवाप्नुयात्॥ १५<br>ततः पुष्करिणीं गच्छेत् तत्र स्नानं समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र हीन्द्रस्यार्थासनं लभेत्॥ १६ | वहाँ नियमपूर्वक संयत भोजन करता हुआ अङ्गारेश्वर जाना चाहिये। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकको जाता है। राजेन्द्र! वहाँसे कपिला नामसे प्रसिद्ध श्रेष्ठ तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य कपिला गौके दानका फल प्राप्त करता है। इसके बाद देवों और ऋषियोंसे सेवित करंज नामक तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजन्! इस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको गोलोककी प्राप्ति होती है। राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ कुण्डलेश्वर नामक तीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ उमाके साथ रुद्र सदा निवास करते हैं। राजेन्द्र! उस तीर्थमें स्नानकर वह देवताओंद्वारा भी वन्दनीय हो जाता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् सभी पापोंके नाशक पिप्पलेश-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! वहाँसे श्रेष्ठ विमलेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ महेश्वरद्वारा निर्मित एक देवशिला है। उस स्थानपर प्राणोंका त्याग करनेसे रुद्रलोककी प्राप्ति होती है। तदुपरान्त पुष्करिणीतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करे, वहाँ स्नान करनेमात्रसे ही मानव इन्द्रका आधा आसन प्राप्त कर लेता है॥ ९—१६॥ |
| नर्मदा सरितां श्रेष्ठा रुद्रदेहाद् विनिःसृता।<br>तारयेत् सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ १७ | नदियोंमें श्रेष्ठ नर्मदा रुद्रके शरीरसे निकली है, यह स्थावर और जंगम सभी जीवोंका उद्धार करती है। |
| सर्वदेवाधिदेवेन त्वीश्वरेण महात्मना।<br>कथिता ऋषिसंघेभ्यो ह्यस्माकं च विशेषतः॥ १८ | ऐसा सभी देवताओंके अधीश्वर महात्मा शंकरने स्वयं ऋषिगणको और विशेषकर मुझे बताया है। |
| मुनिभिः संस्तुता ह्येषा नर्मदा प्रवरा नदी।<br>रुद्रदेहाद् विनिष्क्रान्ता लोकानां हितकाम्यया॥ १९ | मुनियोंने इस श्रेष्ठ नर्मदा नदीकी स्तुति की है। यह नर्मदा संसारके हितकी कामनासे रुद्रके शरीरसे निकली है। |
| ७९४ | * मत्स्यपुराण * |
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| सर्वपापहरा नित्यं सर्वदेवनमस्कृता।<br>संस्तुता देवगन्धर्वैरप्सरोभिस्तथैव च॥ २०<br>नमः पुण्यजले ह्लाद्ये नमः सागरगामिनि।<br>नमस्ते पावनिर्दाहे नमो देवि वरानने॥ २१<br>नमोऽस्तु ते ऋषिगणसिद्धसेविते<br>नमोऽस्तु ते शंकरदेहनिःसृते।<br>नमोऽस्तु ते धर्मभृतां वरप्रदे<br>नमोऽस्तु ते सर्वपवित्रपावने॥ २२<br>यस्त्विदं पठते स्तोत्रं नित्यं श्रद्धासमन्वितः।<br>ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियो विजयी भवेत्॥ २३<br>वैश्यस्तु लभते लाभं शूद्रश्चैव शुभां गतिम्।<br>अर्थार्थी लभते ह्यर्थं स्मरणादेव नित्यशः॥ २४<br>नर्मदां सेवते नित्यं स्वयं देवो महेश्वरः।<br>तेन पुण्या नदी ज्ञेया ब्रह्महत्यापहारिणी॥ २५ | यह सभी पापोंका क्षय करनेवाली और सभी देवोंद्वारा नमस्कृत है। देव, गन्धर्व और अप्सराओंने इसकी भलीभाँति स्तुति की है। आदि गङ्गे! तुम्हें नमस्कार है। पुण्यसलिले! तुम्हें प्रणाम है। सागरकी ओर गमनशीले! तुम्हें अभिवादन है। पापोंको नष्ट करनेवाली एवं सुन्दर मुखवाली देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम ऋषिसमूह एवं सिद्धोंसे सेवित हो, तुम्हें प्रणाम है। शंकरके शरीरसे निकली हुई तुम्हें अभिवादन है। तुम धर्मात्मा प्राणियोंको वर देनेवाली हो, तुम्हें नमस्कार है। सभीको पवित्र एवं निष्पाप करनेवाली तुम्हें प्रणाम है। जो श्रद्धासे समन्वित होकर इस स्तोत्रका नित्य पाठ करता है, वह ब्राह्मण हो तो वेदज्ञ और क्षत्रिय हो तो विजयी होता है। वैश्य धनका लाभ करता है और शूद्रको शुभ गतिकी प्राप्ति होती है। अर्थको चाहनेवाला सदा स्मरणमात्रसे ही अर्थ-लाभ करता है। साक्षात् महेश्वरदेव नर्मदा नदीका नित्य सेवन करते हैं, इसीलिये इस पवित्र नदीको ब्रह्महत्यारूपी पापका निवारण करनेवाली जानना चाहिये॥ १७-२५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये नवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्यवर्णन-प्रसङ्गमें एक सौ नब्बेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९०॥
एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय
नर्मदाके तटवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य
| मार्कण्डेय उवाच<br>तदाप्रभृति ब्रह्माद्या ऋषयश्च तपोधनाः।<br>सेवन्ते नर्मदां राजन् रागक्रोधविवर्जिताः॥ १<br><br>युधिष्ठिर उवाच<br>कस्मिन् निपतितं शूलं देवस्य तु महीतले।<br>तत्र पुण्यं समाख्याहि यथावन्मुनिसत्तम॥ २<br><br>मार्कण्डेय उवाच<br>शूलभेदमिति ख्यातं तीर्थं पुण्यतमं महत्।<br>तत्र स्नात्वार्चयेद् देवं गोसहस्रफलं लभेत्॥ ३<br><br>त्रिरात्रं कारयेद् यस्तु तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>अर्चयित्वा महादेवं पुनर्जन्म न विद्यते॥ ४ | मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! तभीसे ब्रह्मा आदि देवता और तपस्वी ऋषिगण क्रोध-रागसे रहित होकर नर्मदाका सेवन करते हैं॥ १॥<br><br>युधिष्ठिरने पूछा— मुनिश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर महादेवजीका त्रिशूल किस स्थानपर गिरा था? उस स्थानका पुण्य यथार्थरूपसे बतलाइये॥ २॥<br><br>मार्कण्डेयजी बोले— वह महान् पुण्यमय तीर्थ शूलभेद नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ स्नानकर महादेवजीकी पूजा करे, उससे एक हजार गो-दानका फल प्राप्त होता है। नराधिप! जो मनुष्य उस तीर्थस्थानमें तीन राततक महादेवजीकी पूजा करके निवास करता है, उसका पुनर्जन्म |
१९२- शुक्लतीर्थका माहात्म्य
| * अध्याय १९१ * | ७९५ |
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| भीमेश्वरं ततो गच्छेन्नारदेश्वरमुत्तमम्।<br>आदित्येशं महापुण्यं स्मृतं किल्बिषनाशनम्॥ ५<br>नन्दिकेशं परिष्वज्य पर्याप्तं जन्मनः फलम्।<br>वरुणेशं ततः पश्येत् स्वतन्त्रेश्वरमेव च।<br>सर्वतीर्थफलं तस्य पञ्चायतनदर्शनात्॥ ६<br>ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र युद्धं यत्र सुसाधितम्।<br>कोटितीर्थं तु विख्यातमसुरा यत्र मोहिताः॥ ७<br>यत्रैव निहता राजन् दानवा बलदर्पिताः।<br>तेषां शिरांस्यगृह्णन्त सर्वे देवाः समागताः॥ ८<br>तस्तु संस्थापितो देवः शूलपाणिर्वृषध्वजः।<br>कोटिर्विनिहता तत्र तेन कोटीश्वरः स्मृतः॥ ९<br>दर्शनात् तस्य तीर्थस्य सदेहः स्वर्गमारुहेत्।<br>यदा त्विन्द्रेण क्षुद्रत्वाद् वज्रं कीलेन यन्त्रितम्॥ १०<br>तदाप्रभृति लोकानां स्वर्गमार्गो निवारितः।<br>यः स्तुतं श्रीफलं दद्यात् कृत्वा चान्ते प्रदक्षिणाम्॥ ११<br>पार्वतं सहदीपं तु शिरसा चैव धारयेत्।<br>सर्वकामसुसम्पन्नो राजा भवति पाण्डव॥ १२<br>मृतो रुद्रत्वमाप्नोति ततोऽसौ जायते पुनः।<br>स्वर्गादेत्य भवेद् राजा राज्यं कृत्वा दिवं व्रजेत्॥ १३<br>बहुनेत्रं ततः पश्येत् त्रयोदश्यां तु मानवः।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वयज्ञफलं लभेत्॥ १४<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तीर्थं परमशोभनम्।<br>नराणां पापनाशाय ह्यगस्त्येश्वरमुत्तमम्॥ १५<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मलोके महीयते।<br>कार्तिकस्य तु मासस्य कृष्णपक्षे चतुर्दशी॥ १६<br>घृतेन स्नापयेद् देवं समाधिस्थो जितेन्द्रियः।<br>एकविंशकुलोपेतो न च्यवेद्वैश्रवात् पदात्॥ १७<br>धेनुमुपानहौ छत्रं दद्याच्च घृतकम्बलम्।<br>भोजनं चैव विप्राणां सर्वं कोटिगुणं भवेत्॥ १८<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र बलाकेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् सिंहासनपतिर्भवेत्॥ १९ | नहीं होता। इसके बाद श्रेष्ठ भीमेश्वर और नारदेश्वर तीर्थकी यात्रा करे। आदित्येश तीर्थ महान् पुण्यशाली और पापका नाशक कहा गया है। नन्दिकेशका दर्शन करनेसे जन्म धारण करनेका पर्याप्त फल सुलभ हो जाता है। इसके बाद वरुणेश एवं स्वतन्त्रेश्वरका दर्शन करे। इस पञ्चायतनका दर्शन करनेसे सभी तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है। राजेन्द्र! इसके बाद कोटितीर्थ नामसे प्रसिद्ध स्थानमें जाना चाहिये। जहाँ युद्ध हुआ था और जहाँ असुरगण मोहित हुए थे, राजन्! जहाँ बलके घमंडमें चूर दानवगण मारे गये थे और आये हुए देवगणोंने उनके सिरोंको ग्रहण कर लिया था, जहाँ देवताओंद्वारा हाथमें त्रिशूल धारण किये हुए भगवान् वृषध्वज महादेवकी प्रतिष्ठा की गयी थी, वहाँ करोड़ों दानवोंका संहार हुआ था, अतः वह कोटीश्वर तीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस तीर्थका दर्शन करनेसे सशरीर स्वर्गारोहण प्राप्त होता है। जबसे इन्द्रने कृपणताके कारण वज्रको कीलसे कीलित कर दिया तबसे साधारण लोगोंके लिये स्वर्गका मार्ग बंद हो गया॥३-१० १/२॥<br><br>पाण्डुनन्दन! जो स्तुति करनेके पश्चात् अन्तमें इस तीर्थकी प्रदक्षिणा कर बिल्वफल प्रदान करता है तथा दीपकसहित पर्वतप्रतिमा सिरपर धारण करता है, वह सभी कामनाओंसे सम्पन्न होकर राजा होता है और मृत्यु होनेपर रुद्रत्वको प्राप्त करता है। पुनः जब वह स्वर्गसे लौटकर जन्म लेता है, तब राजा होता है और राज्यका उपभोग करनेके बाद स्वर्गमें चला जाता है। इसके बाद त्रयोदशी तिथिको मानव बहुनेत्र तीर्थका दर्शन करे। वहाँ मनुष्य स्नानमात्र करनेसे सभी यज्ञोंके फलको प्राप्त कर लेता है। राजेन्द्र! तदनन्तर मनुष्योंके पापोंका नाश करनेके लिये विख्यात अगस्त्येश्वर नामक श्रेष्ठ एवं परम रमणीय तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! उस तीर्थमें स्नान करनेसे मानव ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। जो जितेन्द्रिय मानव समाहितचित्तसे कार्तिकमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिमें महादेवजीको घृतसे स्नान कराता है, उसका इक्कीस पीढ़ीत्तक महेश्वरके पदसे पतन नहीं होता। वहाँ यदि विप्रोंको धेनु, जूता, छाता, घी, कम्बल और भोजनका दान दिया जाय तो वह सभी करोड़गुना हो जाता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त उत्तम बलाकेश्वरतीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! उस तीर्थमें स्नान करनेसे मानव सिंहासनका |
| ७९६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नर्मदादक्षिणे कूले तीर्थं शक्रस्य विश्रुतम्।<br>उपोष्य रजनीमेकां स्नानं तत्र समाचरेत्॥ २०<br>स्नानं कृत्वा यथान्यायमर्चयेच्च जनार्दनम्।<br>गोसहस्रफलं तस्य विष्णुलोकं स गच्छति॥ २१ | अधिपति होता है। नर्मदाके दक्षिण तटपर इन्द्रका प्रसिद्ध तीर्थ है, वहाँ एक रातका उपवास कर विधिविधानसे स्नान करे, स्नान करनेके बाद विधिपूर्वक जनार्दनकी अर्चना करे तो उसे एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त होता है और वह विष्णुलोकमें जाता है॥ १९—२१॥ |
| ऋषितीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापहरं नृणाम्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र शिवलोकं च गच्छति॥ २२<br>नारदस्य तु तत्रैव तीर्थं परमशोभनम्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत्॥ २३<br>देवतीर्थं ततो गच्छेद् ब्रह्मणा निर्मितं पुरा।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मलोके महीयते॥ २४<br>अमरकण्टकं गच्छेदमरैः स्थापितं पुरा।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते॥ २५<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र रावणेश्वरमुत्तमम्।<br>नित्यं चायतनं दृष्ट्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया॥ २६<br>ऋणतीर्थं ततो गच्छेद् ऋणोभ्यो मुच्यते ध्रुवम्।<br>वटेश्वरं ततो दृष्ट्वा पर्याप्तं जन्मनः फलम्॥ २७<br>भीमेश्वरं ततो गच्छेत् सर्वव्याधिविनाशनम्।<br>स्नातमात्रो नरो राजन् सर्वदुःखैः प्रमुच्यते॥ २८<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तुरासङ्गममुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा महादेवमर्चयन् सिद्धिमवाप्नुयात्॥ २९<br>सोमतीर्थं ततो गच्छेत् पश्येच्चन्द्रमनुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् भक्त्या परमया युतः॥ ३०<br>तत्क्षणाद् दिव्यदेहस्थः शिववन्मोदते चिरम्।<br>षष्टिवर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते॥ ३१ | तत्पश्चात् मनुष्योंके सभी पापोंके नाशक ऋषितीर्थकी यात्रा करे, वहाँ स्नानमात्र करनेसे मानव शिवलोकको चला जाता है। वहीं नारदजीका परम रमणीय तीर्थ है, वहाँ स्नानमात्रसे मानव एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। राजन्! इसके बाद प्राचीनकालमें ब्रह्माद्वारा निर्मित देवतीर्थमें जाय, वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। तदनन्तर प्राचीनकालमें देवोंद्वारा स्थापित अमरकण्टककी यात्रा करे। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ रावणेश्वर-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ मनुष्य प्रतिदिन देवमन्दिरका दर्शनकर ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। तदुपरान्त ऋणतीर्थमें जाय, वहाँ जानेसे मानव निश्चय ही ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। इसके बाद वटेश्वरका दर्शन करके मनुष्यजन्मका पूर्ण फल प्राप्त कर लेता है। राजन्! तदनन्तर सभी व्याधियोंको नाश करनेवाले भीमेश्वरतीर्थकी यात्रा करे। उस तीर्थमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य सभी दुःखोंसे छुटकारा पा जाता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठतम तुरासङ्ग तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ स्नानकर महादेवजीकी पूजा करनेसे सिद्धि प्राप्त होती है। इसके बाद सोमतीर्थमें जाय और वहाँ परम श्रेष्ठ चन्द्रमाका दर्शन करे। राजन्! उस तीर्थमें परम भक्तिसे युक्त हो स्नान करनेसे मानव उसी क्षण दिव्य शरीर धारणकर शिवके समान चिरकालपर्यन्त आनन्दका अनुभव करता है और साठ हजार वर्षोंतक रुद्रलोकमें पूजित होता है॥ २२—३१॥ |
| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र पिङ्गलेश्वरमुत्तमम्।<br>अहोरात्रोपवासेन त्रिरात्रफलमाप्नुयात्॥ ३२<br>तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र कपिलां यः प्रयच्छति।<br>यावन्ति तस्या रोमाणि तत्प्रसूतिकुलेषु च॥ ३३<br>तावद् वर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते।<br>यस्तु प्राणपरित्यागं कुर्यात् तत्र नराधिप॥ ३४ | राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ पिङ्गलेश्वरतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ एक दिन-रात उपवास करनेसे त्रिरात्रका फल प्राप्त होता है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जो कपिला गौका दान देता है, उस दाताके वंशके कुलवाले उस गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक रुद्रलोकमें पूजित होते हैं। नराधिप! उस तीर्थमें जो मानव प्राणका |
* अध्याय १९१ * । ७९७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अक्षयं मोदते कालं यावच्चन्द्रदिवाकरौ।<br>नर्मदातटमाश्रित्य तिष्ठेयुर्ये नरोत्तमाः ॥ ३५<br>ते मृताः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा।<br>सुरेश्वरं ततो गच्छेन्नाम्ना कर्कोटकेश्वरम् ॥ ३६<br>गङ्गावतरते तत्र दिने पुण्ये न संशयः।<br>नन्दितीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् ॥ ३७<br>तुष्यते तस्य नन्दीशः सोमलोके महीयते।<br>ततो दीपेश्वरं गच्छेद्व्यासतीर्थं तपोवनम् ॥ ३८<br>निवर्तिता पुरा तत्र व्यासभीता महानदी।<br>हुंकारिता तु व्यासेन दक्षिणेन ततो गता ॥ ३९<br>प्रदक्षिणां तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>अक्षयं मोदते कालं यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥ ४०<br>व्यासस्तस्य भवेत् प्रीतः प्राप्नुयादीप्सितं फलम्।<br>सूत्रेण वेष्टयित्वा तु दीपो देयः सवेदिकः ॥ ४१<br>क्रीडते ह्यक्षयं कालं यथा रुद्रस्तथैव च।<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र ऐरण्डीतीर्थमुत्तमम् ॥ ४२<br>संगमे तु नरः स्नात्वा मुच्यते सर्वपातकैः।<br>ऐरण्डी त्रिषु लोकेषु विख्याता पापनाशिनी ॥ ४३<br>अथवाश्वयुजे मासि शुक्लपक्षे तु चाष्टमी।<br>शुचिर्भूत्वा नरः स्नात्वा सोपवासपरायणः ॥ ४४<br>ब्राह्मणं भोजयेदेकं कोटिर्भवति भोजिता।<br>ऐरण्डीसंगमे स्नात्वा भक्तिभावानुरञ्जितः।<br>मृत्तिकां शिरसि स्थाप्य ह्यवगाह्य च वै जलम् ॥ ४५<br>नर्मदोदकसम्मिश्रं मुच्यते सर्वकिल्बिषैः।<br>प्रदक्षिणं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप ॥ ४६<br>प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा।<br>ततः सुवर्णसलिले स्नात्वा दत्त्वा तु काञ्चनम् ॥ ४७<br>काञ्चनेन विमानेन रुद्रलोके महीयते।<br>ततः स्वर्गाच्च्युतः कालाद् राजा भवति वीर्यवान् ॥ ४८<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र हीक्षुनद्यास्तु संगमम्।<br>त्रैलोक्यविश्रुतं दिव्यं तत्र संनिहितः शिवः ॥ ४९ | परित्याग करता है, वह चन्द्र और सूर्यकी स्थितिपर्यन्त अक्षय कालतक आनन्दका अनुभव करता है। जो श्रेष्ठ मानव नर्मदाके तटपर निवास करते हैं, वे मरकर सन्त और पुण्यवान् व्यक्तियोंके समान स्वर्गमें जाते हैं। तदनन्तर कर्कोटकेश्वर नामसे प्रसिद्ध सुरेश्वरकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ पुण्यतिथिको गङ्गाका अवतरण होता है, इसमें संदेह नहीं है। तत्पश्चात् नन्दितीर्थमें जाय और वहाँ विधिपूर्वक स्नान करे। इससे उसपर नन्दीश्वर शिव प्रसन्न होते हैं और वह चन्द्रलोकमें पूजित होता है। तत्पश्चात् व्यासके तपोवन दीपेश्वर-तीर्थकी यात्रा करे। वहाँ प्राचीनकालमें व्याससे डरकर महानदी पीछेकी ओर लौटने लगी थी, तब व्यासके हुंकारसे वह दक्षिणकी ओर प्रवाहित हुई, नराधिप! उस तीर्थकी जो प्रदक्षिणा करता है, वह चन्द्र और सूर्यकी स्थितिपर्यन्त अक्षय कालतक आनन्दका उपभोग करता है। उसपर व्यासदेव प्रसन्न होते हैं और उसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। वहाँ वेदीपर सूतसे परिवेष्टित दीपका दान करना चाहिये। ऐसा करनेसे मानव रुद्रकी तरह अक्षय कालतक आनन्दपूर्वक जीवनयापन करता है॥ ३२—४१ ½॥<br><br>राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ ऐरण्डी-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। ऐरण्डी नदी पापनाशकके रूपमें तीनों लोकोंमें विख्यात है। उसके सङ्गममें स्नान करनेसे मनुष्य सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है। अथवा यदि मनुष्य आश्विन-मासके शुक्लपक्षमें अष्टमी तिथिको स्नान करके पवित्र हो उपवासपूर्वक एक ब्राह्मणको भोजन करा दे तो उसे एक करोड़ ब्राह्मणोंको भोजन करानेका फल प्राप्त होता है। जो ऐरण्डी-संगममें भक्तिभावपूर्वक उसकी मिट्टीको सिरपर धारणकर नर्मदाके जलसे मिश्रित जलमें अवगाहनकर स्नान करता है, वह सभी पापोंसे छूट जाता है। नराधिप! जो उस तीर्थमें जाकर प्रदक्षिणा करता है, उसने मानो सात द्वीपोंवाली वसुन्धराकी परिक्रमा कर ली। तदनन्तर सुवर्णसलिल नामक तीर्थमें स्नानकर सुवर्णका दान करनेसे मनुष्य सुवर्णमय विमानसे जाकर रुद्रलोकमें पूजित होता है। फिर वह समयानुसार स्वर्गसे च्युत होनेपर पराक्रमी राजा होता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् इक्षु नदीके सङ्गमपर जाना चाहिये। यह दिव्य तीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। वहाँ शिवजी सदा उपस्थित |
१९३- नर्मदा-माहात्म्य-प्रसङ्गमें कपिलादि विविध तीर्थोंका माहात्म्य, भृगुतीर्थका माहात्म्य, भृगुमुनिकी तपस्या, शिव-पार्वतीका उनके समक्ष प्रकट होना, भृगुद्वारा उनकी स्तुति और शिवजीद्वारा भृगुको वर प्रदान
७९८ * मत्स्यपुराण *
| तत्र स्नात्वा नरो राजन् गाणपत्यमवाप्नुयात्।<br>स्कन्दतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्॥ ५०<br>आजन्म जनितं पापं स्नानमात्राद् व्यपोहति।<br>लिङ्गसारं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ५१<br>गोसहस्रफलं तस्य रुद्रलोके महीयते।<br>भङ्कतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्॥ ५२<br>तत्र गत्वा तु राजेन्द्र स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>सप्तजन्मकृतैः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः॥ ५३ | रहते हैं। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मानव गणाधिपतिका स्थान प्राप्त कर लेता है। तदुपरान्त स्कन्द-तीर्थकी यात्रा करे। यह तीर्थ सभी पापोंका विनाशक है। यहाँ स्नान करनेमात्रसे मानव जन्मभरके किये हुए पापोंसे छूट जाता है। इसके बाद लिङ्गसार-तीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। इससे उसे एक हजार गौओंके दानका फल मिलता है और वह रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तदनन्तर सभी पापोंके विनाशक भङ्कतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजेन्द्र! वहाँ जाकर स्नान करनेसे मानव सात जन्मोंमें किये गये पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है॥ ४२-५३॥ |
| वटेश्वरं ततो गच्छेत् सर्वतीर्थमनुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत्॥ ५४<br>संगमेशं ततो गच्छेत् सर्वदेवनमस्कृतम्।<br>स्नानमात्रान्नरस्तत्र चेन्द्रत्वं लभते ध्रुवम्॥ ५५<br>कोटितीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापहरं परम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राज्यं लभते नात्र संशयः॥ ५६<br>तत्र तीर्थं समासाद्य दत्त्वा दानं तु यो नरः।<br>तस्य तीर्थप्रभावेण सर्वं कोटिगुणं भवेत्॥ ५७<br>अथ नारी भवेत् काचित्तत्र स्नानं समाचरेत्।<br>गौरीतुल्या भवेत् सापि त्विन्द्रपत्नी न संशयः॥ ५८<br>अङ्गारेशं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते॥ ५९<br>अङ्गारकचतुर्थ्यां तु स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>अक्षयं मोदते कालं शुचिः प्रयतमानसः॥ ६०<br>अयोनिसम्भवे स्नात्वा न पश्येद् योनिसंकटम्।<br>पाण्डवेशं तु तत्रैव स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ६१<br>अक्षयं मोदते कालमवध्यस्त्रिदशैरपि।<br>विष्णुलोकं ततो गत्वा क्रीडते भोगसंयुतः॥ ६२<br>तत्र भुक्त्वा महाभोगान् मर्त्यराजोऽभिजायते।<br>कठेश्वरं ततो गच्छेत् तत्र स्नानं समाचरेत्॥ ६३<br>उत्तरायणसम्प्राप्तौ यदिच्छेत् तस्य तद्भवेत्। | तदनन्तर सभी तीर्थोंमें श्रेष्ठ वटेश्वरतीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मानव एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। तत्पश्चात् सभी देवोंद्वारा नमस्कृत सङ्गमेश-तीर्थमें जाय। वहाँ स्नान-मात्रसे मनुष्य निश्चित ही इन्द्र-पदको प्राप्त करता है। इसके बाद सभी पापोंको नष्ट करनेवाले श्रेष्ठ कोटितीर्थकी यात्रा करे। वहाँ स्नानकर मनुष्य राज्यकी प्राप्ति करता है—इसमें संदेह नहीं है। उस तीर्थमें आकर जो मनुष्य दान देता है, उसका सब कुछ उस तीर्थके प्रभावसे करोड़गुना हो जाता है। यदि वहाँ कोई स्त्री स्नान करती है तो वह निःसंदेह गौरी अथवा इन्द्र-पत्नी शचीके समान हो जाती है। इसके बाद अङ्गारेश-तीर्थकी यात्रा करके वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। जो मनुष्य पवित्र एवं संयत-मन होकर अङ्गारक-चतुर्थीके दिन वहाँ स्नान करता है, वह अक्षय कालतक आनन्दका उपभोग करता है। अयोनिसम्भव नामक तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको योनिसंकटका दर्शन नहीं होता। वहीं पाण्डवेश-तीर्थ है, उसमें स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेसे वह देवताओंसे भी अवध्य होकर अक्षय कालतक आनन्दका अनुभव करता है और मरणोपरान्त विष्णुलोकमें जाकर भोगसे परिपूर्ण हो क्रीड़ा करता है तथा वहाँ उत्तम भोगोंका भोग कर मृत्युलोकमें राजा होता है। इसके बाद उत्तरायण आनेपर कठेश्वर-तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेसे मानव जो इच्छा करता है, वह उसे प्राप्त हो जाता है॥ ५४-६३ ½॥ |
| चन्द्रभागां ततो गच्छेत् तत्र स्नानं समाचरेत्॥ ६४ | राजन्! इसके बाद चन्द्रभागा नदीपर जाकर वहाँ |
| * अध्याय १९१ * | ७९९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्नातमात्रो नरो राजन् सोमलोके महीयते।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तीर्थं शक्रस्य विश्रुतम्॥ ६५<br>पूजितं देवराजेन देवैरपि नमस्कृतम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् दानं दत्त्वा तु काञ्चनम्॥ ६६<br>अथवा नीलवर्णाभं वृषभं यः समुत्सृजेत्।<br>वृषभस्य तु रोमाणि तत्प्रसूतिकुलेषु च॥ ६७<br>तावद्वर्षसहस्राणि नरो हरपुरे वसेत्।<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो राजा भवति वीर्यवान्॥ ६८<br>अश्वानां श्वेतवर्णानां सहस्त्राणां नराधिप।<br>स्वामी भवति मर्त्येषु तस्य तीर्थप्रभावतः॥ ६९<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ब्रह्मावर्तमनुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजंस्तर्पयेत् पितृदेवताः॥ ७०<br>उपोष्य रजनीमेकां पिण्डं दत्त्वा यथाविधि।<br>कन्यागते तथाऽऽदित्ये अक्षयं स्यान्नराधिप॥ ७१<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र कपिलातीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् कपिलां यः प्रयच्छति॥ ७२<br>सम्पूर्णपृथिवीं दत्त्वा यत्फलं तदवाप्नुयात्।<br>नर्मदेशं परं तीर्थं न भूतं न भविष्यति॥ ७३<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्नश्वमेधफलं लभेत्।<br>नर्मदादक्षिणे कूले संगमेश्वरमुत्तमम्॥ ७४<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् सर्वयज्ञफलं लभेत्।<br>तत्र सर्वोद्यतो राजा पृथिव्यामेव जायते॥ ७५<br>सर्वलक्षणसम्पूर्णः सर्वव्याधिविवर्जितः।<br>नार्मदे चोत्तरे कूले तीर्थं परमशोभनम्॥ ७६<br>आदित्यायतनं दिव्यमीश्वरेण तु भाषितम्।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र दानं दत्त्वा तु शक्तितः।<br>तस्य तीर्थप्रभावेण दत्तं भवति चाक्षयम्॥ ७७<br>दरिद्रा व्याधिनो ये तु ये तु दुष्कृतकर्मिणः।<br>मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं तु यान्ति ते॥ ७८<br>माघमासे तु सम्प्राप्ते शुक्लपक्षस्य सप्तमी।<br>वसेदायतने तत्र निराहारो जितेन्द्रियः॥ ७९ | स्नान करे। वहाँ स्नानमात्रसे मनुष्य चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। राजेन्द्र! इसके बाद इन्द्रके प्रसिद्ध तीर्थमें जाय। वह तीर्थ साक्षात् देवराजद्वारा पूजित तथा सम्पूर्ण देवताओंद्वारा वन्दित है। राजन्! वहाँ स्नानकर जो मनुष्य सुवर्णका दान देता है अथवा नीलवर्णवाले वृषभका उत्सर्ग करता है तो वह वृषभके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक अपने कुलमें उत्पन्न संततिके साथ शिवपुरमें निवास करता है। इसके बाद स्वर्गसे गिरनेपर वह पराक्रमी राजा होता है। नराधिप! उस तीर्थके प्रभावसे मृत्युलोकमें आकर वह श्वेतवर्णवाले हजारों अश्वोंका स्वामी होता है। राजन्! तदनन्तर ब्रह्मावर्त नामक श्रेष्ठ तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! उस तीर्थमें स्नानकर देवताओं और पितरोंका विधिवत् तर्पण करना चाहिये। नरेश्वर! सूर्यके कन्याराशिमें स्थित होनेपर जो वहाँ एक रात उपवास करके विधिपूर्वक पिण्डदान करता है, उसका वह कर्म अक्षय हो जाता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ कपिलातीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजन्! उस तीर्थमें स्नानकर जो मनुष्य कपिला गौका दान करता है, उसे सम्पूर्ण पृथ्वीका दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह मिल जाता है। नर्मदेश उत्तम तीर्थस्थान है। इसके समान तीर्थ न हुआ है, न होगा। राजन्! उस तीर्थमें स्नानकर मानव अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करता है। नर्मदाके दक्षिण तटपर श्रेष्ठ सङ्गमेश्वर-तीर्थ है। राजन्! वहाँ स्नान करनेपर मनुष्य सभी यज्ञोंके फलको प्राप्त करता है और वह पृथ्वीपर सभी प्रकारके उद्यमोंसे सम्पन्न, सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त तथा सभी प्रकारकी व्याधियोंसे रहित राजा होता है॥ ६४—७५ १/२॥<br><br>नर्मदाके उत्तर तटपर अत्यन्त मनोहर आदित्यायतन नामक दिव्य तीर्थ है, ऐसा महादेवजीने कहा है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें स्नान करके जो यथाशक्ति दान देता है, उसका वह दान उस तीर्थके प्रभावसे अक्षय हो जाता है। जो दरिद्र, रोगग्रस्त और दुष्कर्मी हैं, वे भी (यहाँ स्नान करनेसे) सभी पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकको चले जाते हैं। जो मनुष्य माघमासके शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथि आनेपर इन्द्रियोंका संयम कर और निराहार रहकर इस आदित्यायतन तीर्थमें निवास करता है, वह |
| ८०० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न जराव्यथितो मूको न चान्धो बधिरोऽथवा।<br>सुभगो रूपसम्पन्नः स्त्रीणां भवति वल्लभः॥ ८०<br>एवं तीर्थं महापुण्यं मार्कण्डेयेन भाषितम्।<br>ये न जानन्ति राजेन्द्र वञ्चितास्ते न संशयः॥ ८१<br>गर्गेश्वरं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र स्वर्गलोकमवाप्नुयात्॥ ८२<br>मोदते स्वर्गलोकस्थो यावदिन्द्राश्चतुर्दश।<br>समीपतः स्थितं तस्य नागेश्वरतपोवनम्॥ ८३<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र नागलोकमवाप्नुयात्।<br>बह्वीभिर्नागकन्याभिः क्रीडते कालमक्षयम्॥ ८४<br>कुबेरभवनं गच्छेत् कुबेरो यत्र संस्थितः।<br>कालेश्वरं परं तीर्थं कुबेरो यत्र तोषितः॥ ८५<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र सर्वसम्पदमाप्नुयात्। | न तो वृद्धावस्था और रोगसे ही ग्रस्त होता है, न गूँगा, अंधा अथवा बहरा ही होता है, अपितु भाग्यशाली, रूपवान् और स्त्रियोंका प्रिय होता है। राजेन्द्र! इस प्रकार मार्कण्डेयजीने इस महान् पुण्यदायक तीर्थका वर्णन किया था। जो उस तीर्थको नहीं जानते, वे निःसंदेह वञ्चित ही हैं। इसके बाद गर्गेश्वर-तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नान करनेसे ही मानव स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेता है और चौदह इन्द्रोंके कार्यकालतक वह स्वर्गमें आनन्दपूर्वक निवास करता है। राजेन्द्र! उसीके समीपमें नागेश्वर नामक तपोवन है। वहाँ स्नानकर मनुष्य नागलोकको प्राप्त करता है और अनेकों नागकन्याओंके साथ अक्षय कालतक क्रीडा करता है। तदनन्तर कुबेरभवनमें जाय, जहाँ कुबेर विराजमान रहते हैं। जहाँ कुबेर सन्तुष्ट हुए थे। वह कालेश्वर नामक उत्तम तीर्थ है। राजेन्द्र! इस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको सभी सम्पत्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं॥ ७६-८५ १/२॥ |
| ततः पश्चिमतो गच्छेन्मारुतालयमुत्तमम्॥ ८६<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र शुचिर्भूत्वा समाहितः।<br>काञ्चनं तु ततो दद्याद् यथाशक्ति सुबुद्धिमान्॥ ८७<br>पुष्पकेण विमानेन वायुलोकं स गच्छति। | तत्पश्चात् उससे पश्चिममें स्थित श्रेष्ठ मारुतालय-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजेन्द्र! जो बुद्धिमान् वहाँ स्नान करके पवित्र हो सावधानीपूर्वक यथाशक्ति सुवर्णका दान करता है, वह पुष्पकविमानद्वारा वायुलोकको चला जाता है। |
| यवतीर्थं ततो गच्छेन्माघमासे युधिष्ठिर॥ ८८<br>कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>नक्तं भोज्यं ततः कुर्यान्न पश्येद् योनिसंकटम्॥ ८९ | युधिष्ठिर! तदुपरान्त माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको यवतीर्थमें जाकर स्नान करे और रातमें ही भोजन करे। ऐसा करनेवाले पुरुषको पुनः योनिसंकटका दर्शन नहीं करना पड़ता। |
| अहल्यातीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र ह्यप्सरोभिः प्रमोबते/प्रमोदते॥ ९०<br>अहल्या च तपस्तप्त्वा तत्र मुक्तिमुपागता। | इसके बाद अहल्यातीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मानव अप्सराओंके साथ आनन्दका उपभोग करता है। उस तीर्थमें अहल्याने तपस्या कर मुक्ति पायी थी। |
| चैत्रमासे तु सम्प्राप्ते शुक्लपक्षे चतुर्दशी॥ ९१<br>कामदेवदिने तस्मिन्नहल्यां यस्तु पूजयेत्।<br>यत्र यत्र नरोत्पन्नो नरस्तत्र प्रियो भवेत्॥ ९२<br>स्त्रीवल्लभो भवेच्छ्रीमान् कामदेव इवापरः। | चैत्रमासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशी तिथि एवं सोमवारको जो मनुष्य वहाँ अहल्याकी पूजा करता है, वह जहाँ-जहाँ जन्म लेता है, वहाँ-वहाँ सभीका प्रिय होता है। वह दूसरे कामदेवके समान स्त्रियोंका प्रियपात्र एवं श्रीसम्पन्न होता है। |
| अयोध्यां तु समासाद्य तीर्थं रामस्य विश्रुतम्॥ ९३<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वपापैः प्रमुच्यते। | श्रीरामके प्रसिद्ध तीर्थ अयोध्यामें आकर स्नानमात्र करनेसे मानव सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। |
| सोमतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ९४<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वपापैः प्रमुच्यते।<br>सोमग्रहे तु राजेन्द्र पापक्षयकरं नृणाम्॥ ९५ | इसके बाद सोमतीर्थकी यात्रा करे और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मानव सभी पापोंसे छुटकारा पा जाता है। राजेन्द्र! चन्द्रग्रहणके अवसरपर स्नान करनेसे यही तीर्थ मनुष्यके सभी पापोंको नष्ट कर देता है। राजन्! |
| * अध्याय १९१ * | ८०१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्रैलोक्यविश्रुतं राजन् सोमतीर्थं महाफलम्।<br>यस्तु चान्द्रायणं कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप॥ ९६<br>सर्वपापविशुद्धात्मा सोमलोकं स गच्छति।<br>अग्निप्रवेशेऽथ जले अथवापि ह्यनाशके॥ ९७<br>सोमतीर्थे मृतो यस्तु नासौ मर्त्येऽभिजायते। | महान् फल देनेवाला यह सोमतीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। नराधिप! उस तीर्थमें जो चान्द्रायण-व्रत करता है, वह सभी पापोंसे विशुद्ध होकर सोमलोकको चला जाता है। जो अग्निमें प्रवेश कर, जलमें डूबकर या भोजनका परित्याग कर इस सोमतीर्थमें प्राणका त्याग करता है, वह पुनः मृत्युलोकमें जन्म नहीं ग्रहण करता॥ ९६–९७ १/२॥ |
| शुभतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ९८<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र गोलोके तु महीयते।<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र विष्णुतीर्थमनुत्तमम्॥ ९९<br>योधनीपुरमाख्यातं विष्णुस्थानमनुत्तमम्।<br>असुरा योधितास्तत्र वासुदेवेन कोटिशः॥ १००<br>तत्र तीर्थं समुत्पन्नं विष्णुः प्रीतो भवेदिह।<br>अहोरात्रोपवासेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ १०१<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तापसेश्वरमुत्तमम्।<br>हरिणी व्याधसंत्रस्ता पतिता यत्र सा मृगी॥ १०२<br>जले प्रक्षिप्तगात्रा तु अन्तरिक्षं गता च सा।<br>व्याधो विस्मितचित्तस्तु परं विस्मयमागतः॥ १०३<br>तेन तापेश्वरं तीर्थं न भूतं न भविष्यति।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ब्रह्मतीर्थमनुत्तमम्॥ १०४<br>अमोहकमिति ख्यातं पितॄंश्चैवात्र तर्पयेत्।<br>पौर्णमास्याममायां तु श्राद्धं कुर्याद् यथाविधि॥ १०५<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् पितृपिण्डं तु दापयेत्।<br>गजरूपा शिला तत्र तोयमध्ये प्रतिष्ठिता॥ १०६<br>तस्यां तु दापयेत् पिण्डं वैशाख्यां तु विशेषतः।<br>तृप्यन्ति पितरस्तत्र यावत् तिष्ठति मेदिनी॥ १०७<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र सिद्धेश्वरमनुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गणपत्यन्तिकं व्रजेत्॥ १०८ | तदनन्तर शुभतीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य गोलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् सर्वोत्तम विष्णूतीर्थकी यात्रा करे। विष्णुका यह सर्वश्रेष्ठ स्थान योधनीपुरके नामसे प्रसिद्ध है। यहाँ भगवान् वासुदेवने करोड़ों असुरोंसे युद्ध किया था, इसी कारण यह तीर्थस्थान बन गया। यहाँ जानेसे विष्णु प्रसन्न होते हैं। यहाँ एक दिन-रात उपवास करनेसे यह ब्रह्महत्याके पापको नष्ट कर देता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ तापसेश्वर तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये, जहाँ व्याधके भयसे डरी हुई मृगी गिर पड़ी थी और जलमें शरीरका परित्याग कर अन्तरिक्षमें चली गयी थी। यह देखकर आश्चर्यचकित हुए व्याधको महान् विस्मय हुआ। इसी कारण इसका नाम तापेश्वरतीर्थ हुआ। इसके समान दूसरा तीर्थ न हुआ है, न होगा। राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ ब्रह्मतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। यह तीर्थ अमोहक नामसे भी प्रसिद्ध है। यहाँ पितरोंका तर्पण तथा पूर्णिमा और अमावास्याको यथाविधि श्राद्ध करना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान कर मनुष्यको पितरोंको पिण्ड देना चाहिये। वहाँ जलमें गजके आकारकी एक शिला प्रतिष्ठित है। उसी शिलापर विशेषतया वैशाखकी पूर्णिमाको पिण्ड देना चाहिये। ऐसा करनेसे जबतक पृथ्वी स्थित रहती है, तबतक पितृगण तृप्त बने रहते हैं। राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ सिद्धेश्वर तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य गणपति के समीप पहुँच जाता है॥ ९८–१०८॥ |
| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र लिङ्गो यत्र जनार्दनः।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र विष्णुलोके महीयते॥ १०९ | राजेन्द्र! तत्पश्चात् जनार्दन-लिङ्गकी यात्रा करे। राजेन्द्र! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य विष्णुलोकमें पूजित होता है। |
| नर्मदादक्षिणे कूले तीर्थं परमशोभनम्।<br>कामदेवः स्वयं तत्र तपोऽतप्यत वै महत्॥ ११० | नर्मदाके दक्षिण तटपर परम रमणीय कुसुमेश्वर तीर्थ है। वहाँ स्वयं कामदेवने कठोर तपस्या की थी। उसने एक |
८०२ * मत्स्यपुराण *
| दिव्यं वर्षसहस्रं तु शंकरं पर्युपासत।<br>समाधिभङ्गदग्धस्तु शंकरेण महात्मना॥ १११<br>श्वेतपर्वा यमश्चैव हुताशः शुक्रपर्वणि।<br>एते दग्धास्तु ते सर्वे कुसुमेश्वरसंस्थिताः॥ ११२<br>दिव्यवर्षसहस्रेण तुष्टस्तेषां महेश्वरः।<br>उमया सहितो रुद्रस्तुष्टस्तेषां वरप्रदः॥ ११३<br>मोक्षयित्वा तु तान् सर्वान् नर्मदातटमास्थितः।<br>ततस्तीर्थप्रभावेण पुनर्दैवत्वमागताः॥ ११४<br>ऊचुश्च परया भक्त्या देवदेवं वृषध्वजम्।<br>त्वत्प्रसादान्महादेव तीर्थं भवतु चोत्तमम्।<br>अर्धयोजनविस्तीर्णं क्षेत्रं दिक्षु समंततः॥ ११५<br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा चोपवासपरायणः।<br>कुसुमायुधरूपेण रुद्रलोके महीयते॥ ११६<br>वैश्वानरो यमश्चैव कामदेवस्तथा मरुत्।<br>तपस्तप्त्वा तु राजेन्द्र परां सिद्धिमवाप्नुयुः॥ ११७<br>अङ्कोलस्य समीपे तु नातिदूरे तु तस्य वै।<br>स्नानं दानं च तत्रैव भोजनं पिण्डपातनम्॥ ११८<br>अग्निप्रवेशेऽथ जले अथवा तु ह्यनाशके।<br>अनिवर्तिका गतिस्तस्य मृतस्यामुत्र जायते॥ ११९<br>त्र्यम्बकेण तु तोयेन यश्चरुं श्रपयेन्नरः।<br>अङ्कोलमूले दत्त्वा तु पिण्डं चैव यथाविधि॥ १२०<br>तृप्यन्ति पितरस्तस्य यावच्चन्द्रदिवाकरौ।<br>उत्तरे त्वयने प्राप्ते घृतस्नानं करोति यः॥ १२१<br>पुरुषो वाथ स्त्री वापि वसेदायतने शुचिः।<br>सिद्धेश्वरस्य देवस्य प्रातः पूजां प्रकल्पयेत्॥ १२२<br>स यां गतिमवाप्नोति न तां सर्वैर्महामखैः।<br>यदावतीर्णः कालेन रूपवान् सुभगो भवेत्॥ १२३<br>मर्त्ये भवति राजा च त्वासमुद्रान्तगोचरे।<br>क्षेत्रपालं न पश्येत् तु दण्डपाणिं महाबलम्॥ १२४<br>वृथा तस्य भवेद् यात्रा ह्यदृष्ट्वा कर्णकुण्डलम्।<br>एवं तीर्थफलं ज्ञात्वा सर्वे देवाः समागताः।<br>मुञ्चन्ति कुसुमौघैंस्तु तेन तत् कुसुमेश्वरम्॥ १२५ | हजार दिव्य वर्षोंतक शंकरकी सर्वभावसे उपासना की थी, किंतु महात्मा शंकरकी समाधिके भङ्ग होनेसे वह भस्म हो गया। इसी प्रकार कुसुमेश्वरमें स्थित श्वेतपर्वा, यम, हुताश और शुक्रपर्वा—ये सभी भी किसी समय जल गये थे। एक हजार दिव्य वर्षोंतक तपस्या करनेपर महेश्वर इनपर प्रसन्न हुए। इस प्रकार प्रसन्न हुए उमासहित रुद्रने इन्हें वर प्रदान किया। तब इन लोगोंको मोक्ष प्रदानकर वे नर्मदाके तटपर प्रतिष्ठित हो गये। तदनन्तर उस तीर्थके प्रभावसे उन लोगोंको पुनः देवत्व प्राप्त हो गया, तब उन्होंने अतिशय भक्तिके साथ देवाधिदेव वृषभध्वजसे कहा—'महादेव! आपकी कृपासे दिशाओंमें चारों ओर आधा योजन विस्तृत यह क्षेत्र उत्तम तीर्थ हो जाय।' उस तीर्थमें उपवासपूर्वक स्नानकर मनुष्य कामदेवके रूपमें रुद्रलोकमें पूजित होता है॥ १०९—११६॥<br><br>राजेन्द्र! यहाँ वैश्वानर, यम, कामदेव और मरुत्ने तपस्या कर परम सिद्धि प्राप्त की थी। उस तीर्थसे थोड़ी दूरपर अंकोलके समीप स्नान, दान, भोजन तथा पिण्डदान करना चाहिये। यहाँ अग्निमें जलकर, जलमें डूबकर या अनशन करके प्राण-त्याग करनेवालेको परलोकमें अपुनर्भवकी गति प्राप्त होती है। जो व्यक्ति त्र्यम्बकतीर्थके जलसे चरु पकाकर अङ्कोलके मूलमें विधिपूर्वक पिण्डदान करता है, उसके पितृगण चन्द्र और सूर्यकी स्थितिपर्यन्त तृप्त रहते हैं। उत्तरायण आनेपर चाहे पुरुष हो या स्त्री—जो कोई भी घृतसे स्नान करता है और पवित्र होकर उस आयतनमें निवास करता है तथा प्रातःकाल सिद्धेश्वरदेवकी पूजा करता है, वह जिस गतिको प्राप्त करता है, वह सभी यज्ञोंके करनेसे भी नहीं प्राप्त हो सकती। कालगतिसे पुनः जब वह मृत्युलोकमें जन्म ग्रहण करता है, तब सौभाग्यशाली एवं रूपसे सम्पन्न होकर समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राजा होता है। जो यहाँ आकर महाबली दण्डपाणि क्षेत्रपालका दर्शन नहीं करता और कर्णकुण्डलको नहीं देखता, उसकी यात्रा व्यर्थ हो जाती है। इस प्रकार तीर्थके फलको जानकर सभी देवगण वहाँ उपस्थित होकर कुसुमोंकी वृष्टि करने लगे, इसीसे यह कुसुमेश्वर नामसे विख्यात हुआ॥ ११७—१२५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्य-वर्णनमें एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९१॥
| * अध्याय १९२ * | ८०३ |
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एक सौ बानबेवाँ अध्याय
शुक्लतीर्थका माहात्म्य
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मार्कण्डेय उवाच<br><br>भार्गवेशं ततो गच्छेद् भग्नो यत्र जनार्दनः।<br>असुरैस्तु महायुद्धे महाबलपराक्रमैः॥ १<br>हुंकारितास्तु देवेन दानवाः प्रलयं गताः।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २<br>शुक्लतीर्थस्य चोत्पत्तिं शृणु त्वं पाण्डुनन्दन।<br>हिमवच्छिखरे रम्ये नानाधातुविचित्रिते॥ ३<br>तरुणादित्यसंकाशे तप्तकाञ्चनप्रभे।<br>वज्रस्फटिकसोपाने चित्रपट्टशिलातले॥ ४<br>जाम्बूनदमये दिव्ये नानापुष्पोपशोभिते।<br>तत्रासीनं महादेवं सर्वज्ञं प्रभुमव्ययम्॥ ५<br>लोकानुग्रहकर्तारं गणवृन्दैः समावृतम्।<br>स्कन्दनन्दिमहाकालैर्वीरभद्रगणादिभिः ।<br>उमया सहितं देवं मार्कण्डिः पर्यपृच्छत॥ ६<br>देवदेव महादेव ब्रह्मविष्ण्विन्द्रसंस्तुत।<br>संसारभयभीतोऽहं सुखोपायं ब्रवीहि मे॥ ७<br>भगवन् भूतभव्येश सर्वपापप्रणाशनम्।<br>तीर्थानां परमं तीर्थं तद् वदस्व महेश्वर॥ ८ | मार्कण्डेयजीने पूछा— राजेन्द्र! तदनन्तर भार्गवेशतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ एक बार भगवान् जनार्दन महायुद्धमें महाबली असुरोंके साथ युद्ध करते-करते थक गये, फिर उन प्रभुके हुंकारसे ही दानवगण नष्ट हो गये थे। वहाँ स्नान करनेसे मानव सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। पाण्डुनन्दन! अब आप शुक्लतीर्थकी उत्पत्ति सुनिये। किसी समय विविध धातुओंसे रंग-बिरंगे हिमवान् पर्वतके मनोरम शिखरपर, जो मध्याह्नकालिक सूर्यके समान देदीप्यमान, तपाये हुए सोनेकी प्रभासे युक्त, हीरक और स्फटिककी सीढ़ियोंसे सुशोभित था, एक दिव्य सुवर्णमय तथा अनेक पुष्पोंसे विभूषित शिलातलपर सर्वज्ञ, सामर्थ्यशाली, अविनाशी, लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले महादेव स्कन्द, नन्दी, महाकाल, वीरभद्र आदि गणों तथा अन्यान्य गणसमूहोंसे घिरे हुए उमाके साथ बैठे हुए थे। उसी समय मार्कण्डेयजीने उनसे पूछा—'ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्रसे वन्दित, देवाधिदेव महादेव! मैं संसार-भयसे भीत हूँ, मुझे सुखका साधन बतलाइये। ऐश्वर्यशाली महेश्वर! आप भूत और भविष्यके स्वामी हैं, अतः जो सभी पापोंका विनाशक एवं तीर्थोंमें श्रेष्ठ हो, वह तीर्थ मुझे बतलाइये॥ १—८॥ |
| ईश्वर उवाच<br><br>शृणु विप्र महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद।<br>स्नानाय गच्छ सुभगं ऋषिसङ्घैः समावृतः॥ ९<br>मन्वत्रिकश्यपाश्चैव याज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः।<br>यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती॥ १०<br>नारदो गौतमश्चैव सेवन्ते धर्मकाङ्क्षिणः।<br>गङ्गा कनखले पुण्या प्रयागं पुष्करं गयाम्॥ ११<br>कुरुक्षेत्रं महापुण्यं राहुग्रस्ते दिवाकरे।<br>दिवा वा यदि वा रात्रौ शुक्लतीर्थं महाफलम्॥ १२ | भगवान् शंकरने कहा— महाबुद्धिमान् विप्र! तुम तो सकलशास्त्रविशारद और सौभाग्यशाली हो, तुम मेरी बात सुनो और ऋषियोंके साथ स्नान करनेके लिये शुक्लतीर्थमें जाओ। मनु, अत्रि, कश्यप, याज्ञवल्क्य, उशना, अङ्गिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, नारद और गौतम—ये ऋषिगण धर्मकी अभिलाषासे युक्त हो उसी तीर्थका सेवन करते हैं। गङ्गा कनखलमें पुण्यको देनेवाली है, सूर्यग्रहणके समय प्रयाग, पुष्कर, गया और कुरुक्षेत्र विशिष्ट पुण्यदायक हो जाते हैं, किंतु शुक्लतीर्थ दिन या रात—सभी समय महान् पुण्यफल देनेवाला है। |
१९४- नर्मदातटवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य
८०४ * मत्स्यपुराण *
| दर्शनात् स्पर्शनाच्चैव स्नानाद् दानात् तपो जपात् ।<br>होमाच्चैवोपवासाच्च शुक्लतीर्थं महाफलम् ॥ १३<br>शुक्लतीर्थं महापुण्यं नर्मदायां व्यवस्थितम् ।<br>चाणक्यो नाम राजर्षिः सिद्धिं तत्र समागतः ॥ १४<br>एतत् क्षेत्रं सुविपुलं योजनं वृत्तसंस्थितम् ।<br>शुक्लतीर्थं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १५<br>पादपाग्रेण दृष्टेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति ।<br>जगतीदर्शनाच्चैव भ्रूणहत्यां व्यपोहति ॥ १६<br>अहं तत्र ऋषिश्रेष्ठ तिष्ठामि ह्युमया सह ।<br>वैशाखे चैत्रमासे तु कृष्णपक्षे चतुर्दशी ॥ १७<br>कैलासाच्चापि निष्क्रम्य तत्र संनिहितो ह्यहम् । | यह शुक्लतीर्थ दर्शन, स्पर्श, स्नान, दान, तप, जप, हवन और उपवास करनेसे महान् फलदायक होता है। यह महान् पुण्यदायक शुक्लतीर्थ नर्मदामें अवस्थित है। चाणक्य नामक राजर्षिने यहीं सिद्धि प्राप्त की थी। यह विशाल क्षेत्र एक योजन परिमाणका गोलाकार है। यह शुक्लतीर्थ महापुण्यको प्रदान करनेवाला और सम्पूर्ण पापोंका नाशक है। यह यहाँ स्थित वृक्षके अग्रभागको देखनेसे ब्रह्महत्या और यहाँकी भूमिके दर्शन करनेसे भ्रूणहत्याके पापको नष्ट कर देता है। ऋषिश्रेष्ठ! मैं वहाँ उमाके साथ निवास करता हूँ। चैत्र तथा वैशाख-मासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको मैं कैलाससे भी आकर यहाँ उपस्थित रहता हूँ॥ ९—१७ ½ ॥ | | दैत्यदानवगन्धर्वाः सिद्धविद्याधरास्तथा ॥ १८<br>गणाश्चाप्सरसो नागाः सर्वे देवाः समागताः ।<br>गगनस्थास्तु तिष्ठन्ति विमानैः सार्वकामिकैः ॥ १९<br>शुक्लतीर्थं तु राजेन्द्र ह्यागता धर्मकाङ्क्षिणः ।<br>रजकेन यथा वस्त्रं शुक्लं भवति वारिणा ॥ २०<br>आजन्मजनितं पापं शुक्लं तीर्थं व्यपोहति ।<br>स्नानं दानं महापुण्यं मार्कण्ड ऋषिसत्तम ॥ २१<br>शुक्लतीर्थात् परं तीर्थं न भूतं न भविष्यति ।<br>पूर्वे वयसि कर्माणि कृत्वा पापानि मानवः ॥ २२<br>अहोरात्रोपवासेन शुक्लतीर्थे व्यपोहति ।<br>तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञैर्दानेन वा पुनः ॥ २३<br>देवार्चनेन या पुष्टिर्न सा क्रतुशतैरपि ।<br>कार्तिकस्य तु मासस्य कृष्णपक्षे चतुर्दशी ॥ २४<br>घृतेन स्नापयेद् देवमुपोष्य परमेश्वरम् ।<br>एकविंशत्कुलोपेतो न च्यवेदेश्वरात् पदात् ॥ २५<br>शुक्लतीर्थं महापुण्यमृषिसिद्धनिषेवितम् ।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्न पुनर्जन्मभाग् भवेत् ॥ २६<br>स्नात्वा वै शुक्लतीर्थे तु ह्यर्चयेद् वृषभध्वजम् ।<br>कपालपूरणं कृत्वा तुष्यत्यत्र महेश्वरः ॥ २७ | राजेन्द्र! दैत्य, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, गण, अप्सराएँ और नाग—ये सभी देवगण आकर सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंपर आरूढ़ हो गगनमें स्थित रहते हैं। धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले ये सभी शुक्लतीर्थमें आते हैं; क्योंकि जैसे धोबी मलिन वस्त्रको जलसे धोकर उज्ज्वल कर देता है, उसी तरह शुक्लतीर्थ जन्मसे लेकर तबतकके किये गये पापोंको नष्ट कर देता है। ऋषिश्रेष्ठ मार्कण्डेय! यहाँका स्नान और दान महान् पुण्यफलको देनेवाले होते हैं। शुक्लतीर्थसे श्रेष्ठ तीर्थ न हुआ है और न होगा। मानव बचपनमें किये गये पाप-कर्मोंको शुक्लतीर्थमें एक दिन-रात उपवास करके नष्ट कर देता है। यहाँ तपस्या, ब्रह्मचर्य, यज्ञ, दान और देवार्चनसे जो पुष्टि प्राप्त होती है, वह (अन्यत्र किये गये) सैकड़ों यज्ञोंसे भी नहीं मिलती। यहाँ कार्तिकमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको उपवास कर परमेश्वर महादेवको घृतसे स्नान कराना चाहिये। ऐसा करनेसे वह अपने इक्कीस पीढ़ियोंतकके पूर्वजोंके साथ महादेवके स्थानसे च्युत नहीं होता। राजन्! ऋषियों और सिद्धोंद्वारा सेवित यह शुक्लतीर्थ महान् पुण्यदायक है। वहाँ स्नान करनेसे मानव पुनर्जन्मका भागी नहीं होता। शुक्लतीर्थमें स्नानकर वृषभध्वजकी पूजा करे और कपालको भर दे, ऐसा करनेसे महेश्वर प्रसन्न होते हैं॥ १८—२७॥ |
| * अध्याय १९२ * | ८०५ |
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| अर्धनारीश्वरं देवं पटे भक्त्या लिखापयेत्।<br>शङ्खतूर्यनिनादैश्च ब्रह्मघोषैश्च सद्द्विजैः॥ २८<br>जागरं कारयेत् तत्र नृत्यगीतादिमङ्गलैः।<br>प्रभाते शुक्लतीर्थे तु स्नानं वै देवतार्चनम्॥ २९<br>आचार्यान् भोजयेत् पश्चाच्छिवव्रतपरांञ्शुचीन्।<br>दक्षिणां च यथाशक्ति वित्तशाठ्यं विवर्जयेत्॥ ३०<br>प्रदक्षिणं ततः कृत्वा शनैर्देवान्तिकं व्रजेत्।<br>एवं वै कुरुते यस्तु तस्य पुण्यफलं शृणु॥ ३१<br>दिव्ययानं समारूढो गीयमानोऽप्सरोगणैः।<br>शिवतुल्यबलोपेतस्तिष्ठत्याभूतसम्प्लवम्॥ ३२<br>शुक्लतीर्थे तु या नारी ददाति कनकं शुभम्।<br>घृतेन स्नापयेद् देवं कुमारं चापि पूजयेत्॥ ३३<br>एवं या कुरुते भक्त्या तस्याः पुण्यफलं शृणु।<br>मोदते शर्वलोकस्था यावदिन्द्राश्चतुर्दश॥ ३४<br>पौर्णमास्यां चतुर्दश्यां संक्रान्तौ विषुवे तथा।<br>स्नात्वा तु सोपवासः सन् विजितात्मा समाहितः॥ ३५<br>दानं दद्याद् यथाशक्त्या प्रीयेतां हरिशंकरौ।<br>एवं तीर्थप्रभावेण सर्वं भवति चाक्षयम्॥ ३६<br>अनाथं दुर्गतं विप्रं नाथवन्तमथापि वा।<br>उद्वाहयति यस्तीर्थे तस्य पुण्यफलं शृणु॥ ३७<br>यावत्तद्रोमसंख्या च तत्प्रसूतिकुलेषु च।<br>तावद्वर्षसहस्त्राणि शिवलोके महीयते॥ ३८ | वस्त्रके ऊपर भक्तिके साथ अर्धनारीश्वर महादेवका चित्र लिखवाये और शङ्ख-तुरहीके शब्दों एवं उत्तम ब्राह्मणोंके द्वारा वैदिक मन्त्रोंके उच्चारणके साथ-साथ नृत्य, गीत आदि मङ्गल-कार्य करते हुए वहाँ रातमें जागरण कराये। प्रातःकाल शुक्लतीर्थमें स्नान करके देवताकी पूजा करे। तत्पश्चात् शिवव्रत-परायण पवित्र आचार्योंको भोजन कराये और कृपणता छोड़कर उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा दे। इसके बाद उनकी प्रदक्षिणा कर धीरेसे देवताके समीप जाय। जो ऐसा करता है, उसे प्राप्त होनेवाला पुण्यफल सुनिये। वह शिवके समान बलशाली हो अप्सराओंद्वारा गाया जाता हुआ दिव्य विमानपर बैठकर प्रलयपर्यन्त स्थित रहता है। जो स्त्री शुक्लतीर्थमें शुभकारक सुवर्णका दान करती है और महादेवको घृतसे स्नान कराकर कुमार (स्कन्द)-की भी पूजा करती है, भक्तिपूर्वक ऐसा करनेवाली स्त्रीको जो पुण्यफल प्राप्त होता है, उसे सुनिये। वह रुद्रलोकमें स्थित रहकर चौदह इन्द्रोंके कार्यकालतक आनन्दका उपभोग करती है। जो पूर्णिमा एवं चतुर्दशी तिथि, संक्रान्तिके दिन और विषुवयोगमें वहाँ स्नान करके मनको वशमें कर समाहित चित्तसे उपवासके साथ 'विष्णु और शंकर—दोनों प्रसन्न हों' इस भावनासे यथाशक्ति दान देता है, उसका वह सब तीर्थके प्रभावसे अक्षय हो जाता है। जो मानव उस तीर्थमें अनाथ, दुर्गतिग्रस्त अथवा सनाथ विप्रका भी विवाह कराता है उसे प्राप्त होनेवाला पुण्यफल सुनिये। वह उस ब्राह्मणके तथा उसकी वंशपरम्परामें उत्पन्न हुए लोगोंके शरीरमें जितने रोओंकी संख्या है, उतने हजार वर्षोंतक शिवलोकमें पूजित होता है॥ २८—३८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्यमें एक सौ वानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९२॥
| ८०६ | * मत्स्यपुराण * |
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एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय
नर्मदा-माहात्म्य-प्रसङ्गमें कपिलादि विविध तीर्थोंका माहात्म्य, भृगुतीर्थका माहात्म्य, भृगुमुनिकी तपस्या, शिव-पार्वतीका उनके समक्ष प्रकट होना, भृगुद्वारा उनकी स्तुति और शिवजीद्वारा भृगुको वर-प्रदान
| मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजीने कहा— |
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| ततस्त्वनरकं गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र नरकं च न पश्यति॥ १<br>तस्य तीर्थस्य माहात्म्यं शृणु त्वं पाण्डुनन्दन।<br>तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र यस्यास्थीनि विनिक्षिपेत्॥ २<br>विलयं यान्ति पापानि रूपवाञ्जायते नरः।<br>गोतीर्थं तु ततो गत्वा सर्वपापात् प्रमुच्यते॥ ३<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र कपिलातीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र गत्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत्॥ ४<br>ज्येष्ठमासे तु सम्प्राप्ते चतुर्दश्यां विशेषतः।<br>तत्रोपोष्या नरो भक्त्या कपिलां यः प्रयच्छति॥ ५<br>घृतेन दीपं प्रज्वाल्य घृतेन स्नापयेच्छिवम्।<br>सघृतं श्रीफलं जग्ध्वा दत्त्वा चान्ते प्रदक्षिणम्॥ ६<br>घण्टाभरणसंयुक्तां कपिलां यः प्रयच्छति।<br>शिवतुल्यबलो भूत्वा नैवासौ जायते पुनः॥ ७<br>अङ्गारकदिने प्राप्ते चतुर्थ्यां तु विशेषतः।<br>पूजयेत् तु शिवं भक्त्या ब्राह्मणेभ्यश्च भोजनम्॥ ८<br>अङ्गारकनवम्यां तु अमायां च विशेषतः।<br>स्नापयेत् तत्र यत्नेन रूपवान् सुभगो भवेत्॥ ९<br>घृतेन स्नापयेल्लिङ्गं पूजयेद् भक्तितो द्विजान्।<br>पुष्पकेण विमानेन सहस्रैः परिवारितः॥ १०<br>शैवं पदमवाप्नोति यत्र चाभिमतं भवेत्।<br>अक्षयं मोदते कालं यथा रुद्रस्तथैव सः॥ ११<br>यदा तु कर्मसंयोगान्मर्त्यलोकमुपागतः।<br>राजा भवति धर्मिष्ठो रूपवाञ्जायते कुले॥ १२<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र ऋषितीर्थमनुत्तमम्।<br>तृणबिन्दुर्नार्म ऋषिः शापदग्धो व्यवस्थितः॥ १३<br>तत्तीर्थस्य प्रभावेण शापमुक्तोऽभवद् द्विजः। | राजन्! तदनन्तर अनरक नामक तीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मानवको नरकका दर्शन नहीं होता। पाण्डुनन्दन! अब आप उस तीर्थका माहात्म्य सुनिये। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जिसकी हड्डियाँ डाल दी जाती हैं, उसके पापसमूह नष्ट हो जाते हैं और वह पुनः रूपवान् होकर जन्म ग्रहण करता है। तत्पश्चात् गोतीर्थमें जाकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ कपिलातीर्थकी यात्रा करे। राजन्! जो मनुष्य ज्येष्ठ-मासमें विशेषकर चतुर्दशी तिथिको वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान और उपवासकर कपिला गौका दान करता है, उसे एक हजार गोदानका फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य वहाँ घीसे दीपक जलाकर घीसे शिवको स्नान कराता है और घृतके साथ बेलको स्वयं खाता है एवं दान देता है तथा अन्तमें प्रदक्षिणा करके घण्टा और अलंकारसे विभूषित कपिला गौका दान करता है, वह शिवके तुल्य बलवान् होता है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता। मंगलवारको विशेषकर चतुर्थी तिथिको शिवकी भक्तिपूर्वक पूजा करके ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। मंगलवारकी नवमी एवं विशेषतया अमावस्या तिथिको यत्नपूर्वक शिवको स्नान करानेसे मनुष्य रूपवान् और भाग्यवान् होता है। जो घृतसे शिवलिङ्गको स्नान कराकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंकी पूजा करता है, वह हजारों विमानोंसे घिरे हुए पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो शिवलोकको जाता है और यहाँ अभिलषित वस्तुओंको प्राप्त करता है तथा रुद्रके समान ही अक्षय कालतक वहाँ आनन्दका उपभोग करता है। जब कभी कर्मवश वह मृत्युलोकमें आता है तो कुलीन वंशमें जन्म ग्रहण करता है और रूपवान् धर्मात्मा राजा होता है। राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ ऋषितीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। यहाँ तृणबिन्दु नामक ऋषि शापसे दग्ध होकर स्थित थे, किंतु इस तीर्थके प्रभावसे वे द्विज शापसे मुक्त हो गये॥ १—१३॥ |