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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

२२८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह मीराँ को प्रभु सांची दासी बनाओ। झूठो धंधो से मेरा फ़ंदा छुडाओ। लूटे ही लेत विवेक का डेरा। बुधि बल यदपि करु बहुतेरा। हाय राम, नहि कछु बस मेरा। मरत हू विवस प्रभु धाओ सबेरा। धर्म उपदेश नित प्रति सुनती हू। मन कुचाल से भी डरती हूं। सदा साधु सेवा करती हू। सुमिरण ध्यान मे चित धरती हू। भक्ति मार्ग दासी को दिखाओ। मीराँ को प्रभु साची दासी बनाओ ॥३८५॥† भाषा के आधार पर पद की प्रामाणिकता विशेष संदिग्ध है। विभिन्न बोलियों में प्राप्त पद १ बन्दे बन्दगी मत भूल। चार दिना की कर ले डूबी, ज्यूँ पाडिभरा फूल। आया था ए लोभ के कारण, भूल गमाया मूल। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, रहना वे 'हजूर। ॥३८६॥† उपर्युक्त पद में ब्रज और पंजाबी भाषा का अजीब सम्मिश्रण है। अन्तिम पंक्ति का द्वितीयांश 'रहना वे हजूर' भी अर्थ हीन ही प्रतीत होता है। पंजाबी भाषा के प्रभाव के कारण पद की प्रामा- णिकता विशेष संदिग्ध है।

वैष्णव प्रभाव द्योतक पद पौराणिक गाथाएँ राजस्थानी में प्राप्त पद १ क्यूँ कर म्हे दिन काटा (नाथ जी), थे तो म्हांसू अतर राखो (नाथ जी) राखो क़पटी आंटा। कुबज्या दासी कस राइं की, फिरती कपड़ा फाटा, वाकू तो पटरानी कीन्ही पहरे रेसम पाटा। बाजूबन्द मूंदडी अंगुली नखसिख गहणों साटा, पहर¹ कुबड़ी न्हावण चाली जमुन के घाटां। धान न भावै नीद न आवै, चिन्ता लगी निराटा, मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, देख देख हियो फाटां। ॥३८७॥† २ दूर रहो रे कवर नदना रे, परे² रह रे कवर नदना रे। कारी कामरी वारा तू रे कान जी ओ, थे तो रीझ्‍या³ सालूड़ा⁴ री कोर जी ओ । गज मोत्यां⁵ वारी राणी राधिका जी रे, श्री राधा गोरी ज्याको नाम छै रै । १ पहन कर, २ दूर, ३ मोहित हो गये, ४ओढ़नी, ५मोती का राजस्थानी बहुवचन।

२३० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह 'बाला हाथ जोडी ने करा बीनती रे, म्हारो अबला को कह्‌योड़ो १ जादू मानजो रे। मीराँ मेडतणी रा म्हैला उभयिया रे, मै तो रीझ्या रीझ्या साधूङा री साथ मे रे ॥३८८॥† यह पद राजस्थानी लोक गीतों की लय पर ही है। श्री सूर्यकरण जी चतुर्वेदी जी के अनुसार भी इसकी प्रामाणिकता संदिग्ध है। ३ रुक्मणी री लाज राखो, राखोला म्हांराजी। आजि रुक्मण की लाज राखो। माता के मै र्घणि पियारी, नाही दोष पिता को। रुकभइयौ सिसुपाल बुलायो, नही मुख देखूँ वाको। थाका बिडद कूँ लोग हसैगो, जीव जावेगी म्हाको। मेरा स्याम कूँ कृष्न बतावै, नारद मूनीयो भाषो। मीराँ कहे यूँ रुक्मणी कहत है, ऊँच नीच मति राखो। ॥३८९॥† ४ माधो जी, आया ही सरैगो, राणी रुक्मण का भरतार। लिखी पतिया द्विज हाथ पठावो, द्वारका ने गमन करैगी। बडे बडे भूल महाबल जोधा, कुण से कोण घटैगी। यो सिसपाल चंदेरी को राजा, कूडी साँख भरैगी। मीराँ कहै यूँ रुक्मणी कहत है, योको ही बिड़द लजैगी। ॥३९०॥† १ कहा हुआ।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २३१ प्रसिद्ध है कि मीराँ ने रुक्मणी मगल नामक एक ग्रथ की रचना भी की थी, परन्तु अभी तक इस ग्रथ की उपलब्धि नही हुई है। श्री सूर्य- करण जी चतुर्वेदी का मत है कि उपर्युक्त दोनो पद सम्भवत उसी ग्रथ - के अश हो। सम्पूर्ण ग्रंथ के अप्राप्य होने के कारण मात्र दो चार पदो के आधार पर इस सबध मे कोई निर्णय देना सभव नही। ५ मत आवै रे नन्द का म्हांकी गली। म्हाकी गली की बाकी गुवालिन, मत ना लोग हँसावै रे। सासु बुरी मेरी नणद हठीली, पाडोसण¹ लख जावै२। कोऊ गलियो मे लुकतो छिपतो म्हांके कामी आवै रे। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, झूठो ही ललचावै रे ।।३९१।।† ६ म्हासूं मुखड़ै क्यूँ नहि बोली। म्हासूं काईं गुना लियो छै अबोले। पहली प्रीति करी हरि हम सूं, प्रेम प्रीति को झोलो। प्रेम प्रीति की गांठना धुलि गई, याने कुण विधि खोलो। कुब्जा दासी कसराय की, अक भरि भरि तोलो। मीराँ के प्रभु कबर मिलोगे, हिवडा री गांठवा खोलो ।।३९२।।† ७ मोहन मुसक्याने सखी लागे सोही जाणे। मै जल जमुना जात वृन्दावन वो पीछे से आयो। १ पडोसी स्त्रियाँ, २ लख जावे, भाँप लेना।

२३२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह . काकरी दे मोरी गगरी गिराई, जोरी से बैया मरोरी । सखी कोई रीत न जाणे । मै दधि बेचन जात वृन्दावन वो सामे से आयो । दधि की मटकी सिर से गिराई लूट लूट दधि खाणे, सखी कोई मरम न जाणे । घायल की गति घायल जाणे, जे कोई निकसे जाणे । मीराँ को कह्यो बुरा न मानो, आखिर जात अहीर । सखी ये प्रीत न जाणे ॥३९३॥† पद के तीसरे अंश का शेष पद से समन्वय नही होता। श्री सूर्य- करण चतुर्वेदी जी के मतानुसार भी यह पद मीराँ का प्रतीत नही होता। ८ नन्द जी रे आज बधावणो छै । गहमह हुई रंग रावल मै, निरखि नैना सुख पावनो छै । भाभी जी, म्यो था सूं पूछां, आजिरो द्योस सुहावणो छै । मीराँ के प्रभु गिरिधर जनमिया, हुवो मनोरथ भावनो छै। ॥३९४॥† ९ हे री माँ नन्द को१ गुमानी, म्हारे मनडे बस्यो । गहे दुम डार कदम की ठाढ़ो, मृदु मुस्काय म्हारी ओर हंस्यो । पीताम्बर फटि काछनी काछे, रतन जटित माथे मुकुट कस्यो । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, निरख बदन म्हारो मनडो फस्यो । ॥३९५॥ १ नन्दा का पुत्र, 'नन्द को', 'नन्द का' आदि प्रयोग राजस्थानी भाषा की शैली मे प्राय प्राप्त होते हैं,

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २३३ १० कुछ दोष नहि कुबज्या ने, बीर२ अपना श्याम खोटा । आप न आवे पतियाँ न भेजे, कागज का कोई टोटा । नौ लख धेनु नन्द घर दूंधे, माखन का नही टोटा । आप ही जाय द्वारिका छाये, ले समदर३ की ओटा । कुबज्या दासी नन्दराय की, वे नन्द जी के ढोटा । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, कुबज्या बडी हरी छोटा । ॥३९६॥† एक निम्नांकित ऐसा ही पद 'चन्द्रसखी' के नाम पर भी प्रचलित है। कुछ दोष नही कुबज्या ने, वीर आफ्नो स्याम खोटो । आप न आवे पतियाँ न भेजे, कागद रो काईं टोटो । बिख बेल रे बिख् फल लागे, काई छोटी काईं मोटो । जमना के नीरे तीरे धेन चरावे, हाथ चन्दन रो सोटो । कुबज्या चेरी कस राय री, वो छै नन्दजी रो ढोटो । इस पद मे 'चन्द्रसखी' की छाप नही है तथापि यह 'चन्द्रसखी'के सग्रह में ही प्राप्त है। पदाभिव्यक्ति देखने से प्रतीत होता है कि गेय परम्परा के कारण विभिन्न पदाश सग्रहीत होकर एक स्वतन्त्र पद के रूप मे चल पड़े हैं। ११ हमने सुणी छै हरि अधम उधारन । अधम उधारन सब जग तारण । गज की अरजि गरजि उठि ध्यायो, संकट पर्यो तब निवारण । द्रोपति सुता को चीर बढायो, दुसासन को मान पद मारण । प्रल्हाद की प्रतग्यां राखी, हरणाकुस नख इन्द्र विदारण । २ भाई, ३ समुद्र ।

२३४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह रिख पतनी पर कृपा कीन्ही, विप्र सुदामा की विपति विदारण। मीराँ के प्रभु मो बदि पर, एती अंबेरी भई किण कारण। ॥३९७॥ १२ म्हा नैणा आगे रहीजो जी स्याम गोविन्द। दास कबीर घर बालद जो लाया, बासदेव का छान छबन्द। दास धना को खेत निपजायो, गज की टेर सुनन्द। भीलणी का बेर सुदामा का तदुल, भर मूठडी, बुकन्द। करमी बाई को खीच आरोग्यो१, होइ परसण पाबन्द। सहस गोप बीच स्याम बिराजै, ज्यो तारा बिच चन्द। सब संतो का काज सवाँरे, मीराँ सूँ दूर रहन्द। ॥३९८॥ उपर्युक्त दोनो पद इस श्रेणी के अन्य पदो से अलग पड़ते है, क्योकि इनमे निर्वेद की भी भावना झलकती है। इस पद मे प्रयुक्त 'मीराँ 'सूँ दूर रहन्द' जैसी टेक भी अन्य पदो मे प्राप्त नही। मिश्रित भाषा में प्राप्त पद १ राम गरीब निवाज, मेरे सिर राम गरीब निवाज। ऋचन कलस सुदामा कूं दीनो, हींडत है गजराज। रावण के दस मसतग छेदे, दीयो भभीखण् राज। द्रोपती सती को चीर बंधायो, अपणे जन के काज। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, कुल की राखी लाज ॥३९९॥ १ खाया।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २३५ २ किरपा भई सतगुर अपने की बेर बेर, हरि नाँव१ लियो री। हिरणाकुस प्रल्हाद सतायो, जार अगन बिच डाल दियो री। राज छाँड दियो नाँव न छाँड़ियो, खम्भ फाड़ प्रभु दरस दियो री। माता को उपदेस भयो जब, राज छाँड धुजी बन मे गयो री। मारग मे मिल गए नारद मुनि, तब से धुजी अटल भयो री। सागर ऊपर सिला तिराई, दुष्ट रावण कूँ मार लियो री। सीता सहित अवधपुर आयै, भगत बिभीषण राज दियो री। सब भगतन की सहाय करी प्रभु, मेरी बेर कहाँ सोय गयो री। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, बसी बजा के मोहि लियो री। ॥४००॥† पद के प्रथम पंक्ति से सतमत का प्रभाव स्पष्ट हो उठता है, परन्तु शेष पद से वैष्णव प्रभाव ही स्पष्ट लक्षित होता है। ३ प्रीत मत तोडो गिरधर लाल। तुम ही साहुकार तुम ही बोहोर, ब्याज भूल मत जोडो। साँवरियाँ के कारणे मै तो बाग लगायो, काचा कलियाँ मत तोडो। साँवरियाँ के कारण मे तो सेज बिछाई, सूनी सेज मत छोड़ो। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, इमरत मे विष मत घोरो। ॥४०१॥† पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबध का निर्वाह नही हुआ है। श्री सूर्यकरण जी चतुर्वेदी के मतानुसार भी यह पद मीराँ विरचित नही प्रतीत होता। १ नाम।

२३६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ४ नन्द को बिहारी म्हारे हियडे बस्यो छै। कटि पर लाल काछनी काछे, हीरा मोती वालो मुकुट धर्यो छे। गहिर ल्यो डाल कदम की, ठाडी गोहज मो तन हेरि हस्यो छे। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, निरखि दृगन मे नीर भर्यो छे। ॥४०२॥† पद की तृतीय पंक्ति सर्वथा अर्थहीन है। ५ मिथुला, कर पूजन की त्यारी। धूप दीप नैवेद्य आरती, सबही सौज लेआ री। बहु विध सूं पंकवान बनाकर, करो भोग की त्यारी। जीमेली१ म्हारो पिया गिरधारी, साधां ने बेग बुला री। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर चरणा पर बलिहारी। ॥४०३॥ पाठान्तर १, मिथुला, सुन यह बात हमारी। राज भोग की समै३ हुई है, बेग२ थाल सजला री। छप्पन भोग छतीसो विजन, सीतर जल की झारी। धूप दीप नई वेद४ आरती, कीजे वेग त्यारी। धरिये भोग विलम्ब नही कीजिये, मेरी मान पियारी। जीमे म्हाँरो प्यारो गिरधर, साधा ने बेग बुलारी। उपर्युक्त पद विशेष विचारणीय है। किसी अन्य को आज्ञा देकर पूजन की त्यारी करने की अभिव्यक्ति इस पद की विशेषता है। यहाँ “मिथुला” सम्बोधन भी किस के प्रति हुआ है यह एक विचारणीय प्रश्न है। १ भोजन करेगा, २ शीघ्र, ३ समय, ४ नैवेद्य।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २३७ ६ मन मोह्यो रे बसीवाला। काँधे कमरिया हाथ लकुटिया, मारियो नैना के भाल। यक बन ढूँढी सकल बन ढूँढे, कहूँ नही पायो नन्दलाल। मोर मुकुट पीताम्बर राजे, कानन कुडल छबी बिसाल। मीराँ प्रभु गिरधर जू की प्यारो, आनि मिल्यो प्यारी गोपाल। ॥४०४॥† पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सम्बन्ध का निर्वाह नही हुआ है। ७ वाह वाह रे मोहन प्यारे, कहाँ चले जादू करि के। रुप सरूप सलोनी सी डारी, मेरो मन लीनू हर के। मोर मुकुट सिर छत्र बिराजै, नख पर गिरवर धर के। दमन कियो नाग काली को, आप घुसे मघ सर के। फण फण निरत करत यदुनन्दन, अमै कियौ बग बद के। सब ब्रजलोग छाँडि निज घरकूँ, जाई बसे तर गिर के। सात दिवस लग सूँड धार, जल इन्द्र पखो पग डर के। कातिग¹ मास बाल सब मिल कै, नाचै जल मे तिर के। चोर चोर पुनि बगल डार कै, जाय चढ़े छल करि के। वृन्दावत की कुज गलिन मे, रास रच्यो छल बल के। मीरां के प्रभु हरि अविनासी, पानै पडी गिरिवर के ॥४०५॥ पदाभिव्यक्ति असंगत है। ८ पाछो रथ फेरो द्वारका रारा। सूरज तलफे चदा तलफे, तलफे. नोलख तारा। १ कार्तिक।

२३८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह

गऊ भी तलफे बाच्छा भी तलफे, तलफे गुवाल बिचारा। जोगी भी तलफे जगम भी तलफे, तलफे समदर खारा। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, तुम जीते हम हारा ॥४०६॥† ऐसी पदाभिव्यक्ति अन्य पदो से सर्वथा भिन्न पडती है। अन्तिम पंक्ति और शेष पद मे पूर्वापर सबन्ध का निर्वाह भी नही हुआ है। ९ मैया ले थारी लकरी, ले थारी कांवरी, बछिया हू न जाऊ री। सग के ग्वाल बाल सब बलिभद्र कूं मोकलो। ⁃ एकलो बन मे डराऊ री। सघन बन मे कछु खबर नहि परे। सग के ग्वाल सब मोहे डरावे रे। दादुर मोर पछी यूं रटे, कृष्ण कृष्ण कहि मोहि खिजावे। माखन तो बलिभद्र को खिलायो, हमको पिलाई खाटी छाछडी। वृन्दावन के मारग जातां, पाऊ¹ मे चेभत झीनी काकरी। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कवल तोरी आँख री॥४०७॥† उपर्युक्त पद का भाषा और भाव के आधार पर गुजराती पदो से गहरा समन्वय है। गुजराती भाषा का प्रभाव भी स्पष्ट है। प्रथम अर्द्धांश की भावाभिव्यक्ति का सूरदास के पदो से गहरा साम्य है। पद की छठी पंक्ति का शेष पद से पूर्वापर सबन्ध का निर्वाह नही होता। अन्तिम पंक्ति द्वितीयार्द्ध सर्वथा अर्थविहीन है। ऐसे पदो को गेय परम्परा का फल मानना ही अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होता है। १० आज अनारी ले गयो सारी, बैठी कदम के डारी हो माय। म्हारी गैल² फर्‍यो गिरधारी, हे भाय आज अनारी ले गयो सारी।

१ पैर, २ पीछे।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २३९ मै जल जमुना भरन गई थी, आगयौ कृष्ण मुरारी हे माय । ले गयो सारी अनारी हॉररी, जल मे उभी उघारी हे माय । सखी साइनी मोरी हँसत है, हँसि हँसि दे मोहि तारी हे माय । सास बुरी अरु नणद हठीली, लरि लरि दे मोहि तारी हे माय । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल की बारी हे माय ॥४०८॥† ११ वाटड़ली निहारा जी हरि ठाढौ । आप नही आवत पतियाँ नाही मेलत, छाती करी हरि ठाढी¹ । इत गोकुल उत मथुरा नगरी, जमुना बहै छै नाडी । आप जाय मथुरा मे बैठे, प्रीत रली उहाँ बाढी । हम को लिखि लिखि जोग पठावत, आप दूलह कुबज्या भई लाढी² । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, कहा करै जमुना आडी । ॥४०९॥ लगभग ऐसे ही पद गुजराती भाषा के पदो मे भी मिलते हैं। अन्तिम पंक्ति का द्वितीयांश अर्थविहीन है। १२ मोरी गलियन मे आवो जी घनश्याम । पिछवाडे आए हेला³ दीजी, ललित सखी हे म्हारो नाम । पैया परत हूँ बिनती करत हूँ, मत कर मान गुमान । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तेरे चरण मे ध्यान । ॥४१०॥ १ कठिन, मजबूत, २ दूसरी पत्नी, ३ पुकार।

२४० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह विभिन्न भाषाओं में प्राप्त पद १ कुबज्या ने जादू डारा री, जिन मोहैं श्याम हमारा । झरमर झरमर मेहा बरसे, झुक आये बादल कारा । निरमल जल जमुना को छाँडो, जाय पिया जल खारा । शीतल छाँय कदम की छोडी, धूप सहा अति भारा । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, बाही प्राण पियारा ॥४११॥† कही कही प्रथम पक्ति के द्वितीयांश का निम्नांकित पाठान्तर भी प्राप्त है -- “बिना भाल सुर मारा”। २ मेरे प्यारे गिरिवरधारी जी, दासी क्यो बिसार डारी । द्रोपदी की लाज राखी, सब दुख सो निवारी । प्रल्हाद पैज पारी, नृसिंह देह धारी । भीलनी के झूठे बैर खाये, कछु जात न बिचारी । कुब्जा सो नेह लायो, और गोतम की नारी तारी । प्यासी फिरो दरस बिन तलफो, मोहे काहे बिसारी । न्यासी फिरो दरस बिन तलफो, मोहे काहे बिसारी । मीरा के प्रभु दरसन दीजो, गिरिधर अपनी ओर निहारी । ॥४१२॥ ३ छैल, गैल मत रोकै तू हमारी रे । चाल कुचाल चलो जिन चंचल, ऐसी अनीती तैने करमी विचारी रे । सखी सग की देखत ठाढी, चरचा करेंगी सब पुरनर नारी रे ।


१ रास्ता ।

२४२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह जो कोई ल्यावै श्याम वैद कूँ, तो उठि बैठूँ हसिके री । भृकुटि कमान वान बाँके लोचन, मारत हिय कसिके री । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, कैसो रहो घर बसि के री ॥४१५॥† पाठान्तर १, हे माँ बड़ी बड़ी आँखियन वारो साँवरो, मो तन हेरत हँसि के । भौंहैं कमान वान वाके लोचन मारत हियरे कसि के । जतन करो, जतन लिख बाँधो, ओषध लाऊ घसि के । ज्यो तोको कछु और बिथा हो, नाहिन मेरो बसि के । कौन जतन करो मेरी आली, चदन लाऊ घसि के । जन्तर मन्तर॒ जादू टोना, माधुरी मूरत बसि के । साँवरि सूरत आनि मिलावो, ठाडी रहूँ मै हँसि के । रेजा रेजा भयो करेजा, अदर देखो धसि के । मीराँ तो गिरधर बिन देखे, कैसे रहे घर किस के ।† उपर्युक्त पाठ की अभिव्यक्ति मे असंगति है । 'चन्द्रसखी' के नाम पर भी एक ऐसा ही पद प्रचलित है — हँस के री, माँ री, मेरा मन ले गये आँखनवारो क्वारो, हँसि के । भौंहे कवान वान जाके, लोचण मेरे हिवड़े मार्या कस के । रेजा रेजा भयो करेजा मेरो, भीतर देखो धस के । जतन करो, जन्तर लिखि ल्यावो, ओखद लावो घस के । रोम रोम विष छाय रह्यो है, कारो खायो डस के । जो कोई मोहन आनि मिलावै, गले मिलूँगी, हँस के । चन्द्रसखी भज बालंकृष्ण छबि, क्या रे करु घर बस के । ६ अंब नही जाने दूँ गिरधारी, थारे म्हारे प्रीत लगी अति भारी । बाँको मुकुट काछनी सुन्दर, ऊपर जरद किनारी ।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २४३ गल मुतियन की माल बिराजे, कुन्डल की छवि न्यारी । बाँकी मो कजरारे नैना, अलकै छुट रहि कारी । मद मद मुरली धुन बाजत, मोही बृज की नारी । क्षुद्र घटिका कटि सोहै, भुज पर बाजू धारी । कडा भरहरी सुधर नेवरी, नूपुर की गुणकारी । दुरजन लोग हँसो क्यो ने मोसो, दे दे कर कर तारी । मीराँ प्रभु की भई दिवानी, प्रेम मगन मतवारी ॥४१६॥† पद की सातवी पंक्ति अर्थहीन प्रतीत होती हैं। आठवी पंक्ति की अभिव्यक्ति और शेष पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबन्ध का निर्वाह नही होता। यह पद श्री जगतश्रवण जी के पुजारी जी की जबानी लिखा गया है। सूर्यकरण जी चतुर्वेदी के मतानुसार इस पद को इस रूप मे प्रामाणिक नही माना जा सकता है। ७ मेरी चूनर भिजावे, मेरे भिजे अगी पाक। नन्द महर जी को कुअर कन्हैया, जान न देऊगी मै आज । पट पकर के फगवाँ ल्यूँगी, मुख भी डोगी उगराज । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सदा रहो सिरताज ॥४१७॥† पद की तीसरी पंक्ति सर्वथा अर्थ-विहीन है। ८ जागो मोहन प्यारे ललना, जागो बसीवार। रजनी बीती भोर भई है, घर घर खुले किवारे । गोपी दधि मथुन करियत है, कंगन के झनकारे । उठो लाल जी भोर भयो है, सुर नर ठाढै द्वारे । ग्वाल बाल सब करत कोलाहल, जय जय शब्द उचारे । माखन रोटी हाथ मे लीन्ही, गऊअन के रखवारे। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, शरण आये कूँ तारे ॥४१८॥†

२४४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह पद की प्रथम और अन्तिम पंक्ति के निम्नांकित पाठान्तर भी मिलते हैं। “प्रथम पंक्ति . “जागो बसीवारे ललना, जागो मेरे प्यारे।” अन्तिम पंक्ति . “मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तरण आया कूं तारे।” अभिव्यक्ति के विचार से इस अन्तिम पंक्ति का प्रथम पाठ ही उपयुक्त सिद्ध होता है। ९ तुम सो तो मन लाग रह्यो, तुम जागो मोहन प्यार। भोर भई चिडिया चह्चाई, कागा बोले कारे। कामनिया ने चीर सभाले, घर घर खुले किवारे। सारी गऊएँ निकसाई, यमुना लेकर संग ग्वाल रे। ग्वाल बाल सब द्वारे ठाडे, ठांई हार तिहारे। घर घर ग्वालन दही बिलोवे, कर कगन झनकारे। वस्त्र आभूषण तन पर धारो, पागियाँ पेच सवारे। या ब्रज के प्रभु भूषण तुम हो, तुम ही प्राण हमारे। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, आयी शरण तिहारे ॥४१९॥† अन्तिम पंक्ति के द्वितीयाश का निम्नांकित पाठान्तर भी मिलता है। “तुम हो प्राण हमारे।” ऐसी स्थिति मे आठवी और नवी पंक्ति के द्वितीयाश एक ही हो जाते है । पाचवी पंक्ति का द्वितीयाश अर्थहीन् है। १० सखी मेरो कानूडो, कलेजे की कोर। मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, कुडल की झकझोर । विन्द्रावन की कुज गलिन मे, नाचत नद किसोर। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कंवल चितचोर ॥४२०॥†

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २४५ ११ रे री कौन जाति पनिहारी। इत गोकुल उत मथुरा नगरी, बीच मिले गिरधारी। सुन्दर वदन नयन मृग मानौँ, विधाता आप सर्वारी। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, तुम जीते हम हारी ॥४२१॥† पदाभिव्यक्ति मे सगति का अभाव है। १२ गागर ना भरन देत तेरो कान्ह माई। हँसि हँसि मुख मोड़ि मोड, गागर छिटकाई। घूघट पट खोल देत, साँवरो कन्हाई। जसुमति तै भली बात, लाल कों सिखाई। नगर डगर झगरो करत, रारि तो मचाई। हौ तो बीर जमुना तीर, नीर भरन धाई। गिरधर प्रभु चरण कमल, मीराँ बलि जाई ॥४२२॥† पद की छठी पक्ति मे प्रयुक्त "बीर" शब्द का अर्थ जुडता नही है। "गिरधर प्रभु चरण कमल, मीराँ बलि जाई।" जैसी टेक भी इस पद की विशेषता है। १३ कमल दल लोचना, तैने कैसे नाथ्यो भुजग। पेसि पियाला काली नाग नाथ्यो, फण फण निर्त अकरत। कूद परियो न डर्यो जल माँही, और कारी नहि सक। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, श्री वृन्दावन चन्द ॥४२३॥† १४ मन अटकी मेरे दिल अटकी हो, मुकट लटक मेरे मन अटकी। माथे खोर चन्दन की, सेला है पीरे पटकी।

२४६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह शंख गदा पद्म विराजै, गुंज माल मेरे हिये अटकी। अन्तरधान भये गोपिन मे, सुध न रही जमुना तटकी। पात पात वृन्दावन ढूँढै, कुज कुज राधा लटकी। जमुना के तीरे धेनु चरावै, सुरत रही वशी वट की। फूलन के जामा कदम की छैया, गोपिन की मटुकी पटकी। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, जानत हो सब के घटकी ॥४२४॥† पदाभिव्यक्ति मे सगति नही है। चतुर्थ और सातवी पक्तियाँ अर्थ-विहीन ही प्रतीत होती है, अत पद की प्रामाणिकता सहज सदिग्ध है। १५ यदुबर लागत है मोहि प्यारो। मथुरा मे हरि जन्म लियो है, गोकुल मे पग धारो। जन्मत ही पूतना गति दीनी, अधम उधारन हारो। यमुना के तीर धेनु चरावै, ओढे कामलो कारो। सुन्दर बदन दल लोचन, पीताम्बर पर वारो। मोर मुकुट मकराकृत कुडल, कर मे मुरली धारो। शंख चक्र गदा पद्म विराजै, संतन को रखवारो। जल डूबत ब्रज राखि लियो है, कर पर गिरिवर धारो। मीराँ प्रभु गिरिधर नागर, जीवन प्राण हमारो। ॥४२५॥ १६ भज केशव गोविन्द गोपाल हरि हरि, राधेश्याम पहिरे बनमाला। मथुरा मे हरि जन्म लियो है, गोकुल फुलै नन्दलाला। गोपी के कन्हैया बलभद्र जी के भैया, भक्त वच्छल प्रभु प्रतिपाला। पूतना को जननी गति दीन्ही, अधम उधारन नन्दलाला। मोर मुकुट पीताम्बर सोहैं, गल बैजन्ती माला।

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २४७ यमुना के नीरे तीरे धेनु चरावे, मुरली बजावे नन्दलाला । वृन्दावन हरि रास रच्यो है, मीराँ की करौ प्रतिपाला ॥४२६॥ १७ या मोहन के मै रूप लुभानी । हाट बाट मोहि रोकत टोकत, या रसिया की मै सारी न जानी । सुन्दर बदन कमल दल लोचन, बाँकी चितवन मद मुसकानी । यमुना के नीरे तीरे धेनु चरावे, बसी मे गावे मीठी बानी । तन मन धन गिरधर पर वारू, चरण कमल मीराँ लपटानी । ॥४२७॥† पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबन्ध का निर्वाह नही हुआ है । १८ अब मै शरण तिहारी जी मोहि राखो कृपा निधान । अजामिल अपराधी तारे, तारे नीच सदान । जल डूबत गजराज उबारे, गणिका चढी विमान । और अधम तारे बहुतेरे, माखन सन्त सुजान । कुब्जा नीच भीलनी तारी, जाने सकल जहान । कहं लगि कहूँ गिणत नही आवै, थकि रहै वेद पुरान । मीराँ कहै मै शरण रावरी, सुनियो दोनों कान ॥४२८॥ १९ सुण लीजो बिनती मोरी , मै सरन गही प्रभु तोरी । तुम तो पंतित अनेक उधारे , भव सागर ते तार्यो । में सब का तो नाम नही जानूं, कोई कोई भक्त बखानो । अम्बरीष सुदामा नामी पहुचाये, निज धाम्र । ध्रुव जो पाँच बरस को बालक, दरस दियो घनस्यामा । धना भक्त का खेद जमाया, कबिरा बैल चराया ।

२४८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह सबरी के झूठे बेर खाये, काज किए मन भाये । सदना ओ सैना नाई को तुम लीन्हा अपनाई । कर्मा की खीचडी तुम खाई, गनिका पार लगाई । मीराँ प्रभु तुम्हारे रंगराती, जानत सब दुनियाई । ॥४२९॥ उपर्युक्त दोनो पदो की प्रथम पक्ति का भाव-भाषा साम्य विचारणीय है । २० तुम बिन मोरी कौन खबर ले गोबरधन गिरधारी । मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, कुडल की छबि न्यारी रे । भरी सभा मे द्रोपदी ठारी, राखो लाज हमारी रे । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कमल बलिहारी रे ॥४३०॥ २१ देखत राम हँसे, सुदामा, कूँ देखत राम हँसे । फाटी तो फुलडियाँ, पॉव उभाडे चलते चरण धसे । बालपने का मीत सुदामा , अब क्यो दूर बसे । कहा भावज ने भेट पठाई, तदुल तीन पसे । कित गई प्रभु मोरी टूटी टपरिया, हीरा मोती लाल कसे । कित गई प्रभु मोरी गऊवन बछिया, द्वार बिच हस्ती फँसे । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, सरणा तोरे बसे । ॥४३१॥ २२ गोकुल के बासी, भले ही आये गोकुल के बासी । गोकुल की नारी , देखत आनन्द सुख रासी । एक गावत एक नाचत, एक करत हॉसी । पींताम्बर के फेटा बॉधे, अरगजा सुबासी । गिरिधर से सुनवल ठाकुर, मीराँ सी दासी ॥४३२॥ †