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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

२३ संत-मत प्रभाव द्योतक पद राजस्थानी में प्राप्त पद १ ग्यान कूं बाण बसी हो, म्हॉरा सतगुरु जी हो ५५६ ३०७ २ बडे घर ताली लागी रे ५५७ " ३ चालो अभम के देस, काल देखत डरै ५५८ ३०८ ४ राम नाम मेरे मन बसियो ५५९ " *(१) रसियो राम रिझाऊँ ए माइ . ३०६ ५ म्हाँरो जनम मरण रो साथी ५६० " ६ मिलता जाज्यो हो गुरु ज्ञानी ५६१ ३१० ७ आज्यो आज्यो गोविन्द म्हॉरे म्हैल ५६२ ३११ ८ आवो आवो जी रग भीना ५६३ " ९ राणो जी गिरधर रा गुण गास्याँ ५६४ " १० सतगुरु म्हॉरी प्रीत निभाज्यो जी ५६५ ३१२ ११ पिया की खुमार, मै तो बावरी भई माय ५६६ " १२ जागो म्हॉरा, जगपति राइकेँ, हँसि बोलो क्यूं नहि ५६७ ३१३ १३. साँवरियो म्हाने भाँग पिलाई .. .. ५६८ " १४ प्रभु जी मन माने तब तार . ५६९ " १५ करना फकीरी तो क्या दिलगीरी ५७० ३१४ मिश्रित भाषाओं में प्राप्त पद १ कित गयो पछी बोल तो ... .. ५७१ " २ वाल्हा, मै वैरागिन हूँगी हो ५७२ " ३ हेली, सुरत सोहागिन नार .. ५७३ ३१५ • (१) पिरथिवी माया जल मे पडी ३१६ ४ मनख जनम पदारथ पायो, ऐसी बहुर न आता . ५७४ " ५. मै तो हरि चरणन की दासी .. ५७५ ३१७ ब्रजभाषा में प्राप्त पद १ कोई कछु कहै मन लागा ५७६ ३१८ २ मोहिं लागी लगन गुरु चरनन की . ५७७ " ३ गली तो झाारो बन्द हुई, मैं हरि सो कैसे मिलूं जाय ५७८ " ४ हेरी में तो प्रेम दिवानी, मेरो दरद न जाने कोय . ५७९ ३१९ • (१) राम की दिवानी, मेरो दरद नहिं जाने कोई . " ५. मीराँ मनमानी सुरत सैल असमानी . ५८० "

२४ ६ सखी, तैनै नैन गमाय दिया रोय ५८१ ३२० ७ पिया मोहि आरति तेरी हो ५८२ ,,- (१) स्याम तेरी आरति लागी हो ३२१ (२) पिया मोहे आरति तेरी हो ३२२ (३) पिया मोहिं आरति तेरी हो ,, ८ री मेरे पार निकस गया, सतगुरु मारया तीर ~५८३ ३२३ ९ भर मारी रे वाना, मेरे सतगुरु बिरह लगाय के ५८४ ,, १० नैनन बनज बसाऊँ री, जो मैं साहिब पाऊँ- ५८५ ~ ,, गुजराती मे प्राप्त पद १ मार्या रे मोहना बाण, धूतारे, मने मार्या मोहना बाण ५८६ ३२४ २ तमे जानि लियो समुद्र सरीखा, मारा वीरा रे ५८७ ,, ३ मदर माँ दिवडा बिना नुँ अँधारूँ ५८८ ,, ४ जुनैं थयूं रे, देवल, जुनूं थयूं ५८९ ३२५ ५ आरति तोरी रे प्रिय, मोरी आरत तोरी रे ५९० ,,

जीवन खण्ड

मतभेद राजस्थानी में प्राप्त पद १ तू मत बरजै माई री, साधाँ दरसन जाती । राम नाम हिरदै बसै, माहिले मदमाती । माई कहै सुन धीहड़ी, काहे गुण फूली । लोक सोवै सुख नीदड़ली, थे कथूँ रैणज भूली । गेली दुनियाँ बावली, ज्याँकूँ राम न भावै । ज्याँ रे हिरदै हरि बसै, त्याँ कूँ नीद न आवै । चौबास्याँ की बावड़ी, ज्याँ कूँ नीर न पीजै । हरि नारे अमृत झरै, ज्याँ की आस करीजै । रूप सुरगा राम जी, मुख निरखत जीजै । मीराँ व्याकुल विरहणी, अपनी कर लीजै ॥१॥† उपर्युक्त पद मे "माहिले" के स्थान मे "म्हाँरे" होना युक्तियुक्त है, क्योकि "माहिले" जैसा कोई शब्द हिन्दी या राजस्थानी मे नही है । २ मीराँ . माई, म्हाँने सुपणे मे परण गया जगदीस । सोती को सुपणा आविया जी, सुपणा बिस्वाबीस¹ । माँ गेली² दीखे मीरा बावली, सुपणा आल जंजाल । मीराँ माई, म्हाँने सुपणे मे, परण गया गोपाल । १ शुभ, २ पागल,

४ मीराँ-वृहद्-पद संग्रह अंग अंग हल्दी मै करी जी, सूधे भीज्यो गात । माई, म्हाँने सुपणे मे परण गया दीनानाथ । छप्पन कोटि जहाँ जाण¹ पधारे, दुलूहा श्री भगवान । सुपणे में तोरण² बाँधियो जी, सुपणे मे आयी जाण । मीराँ को गिरधर मिल्यां जी, पूर्व जनम के भाग । सुपणे मे म्हाँने परण गया जी, हो गया अचल सुहाग ॥२॥† पाठान्तर--१ माई म्हाँने सुपना मे परणी गोपाल । गैली ये मीराँ भई बावरी, सपनू छै आल जंजाल । जो तू ने सपना मे गिरधर मिलिया, तो कछुक सैनाण बताय । हल्दी तो पीठी म्हाँरे̂ अग लिपटाई, मँहदी सूँ राच्या म्हाँरा हाथ। छप्पन कोड जाटू जान-पधारिया, दूल्हो श्री भगवान । साँवरियो सिर पेच कलगी, सोरठणी तलवार । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, पूरबले भरतार ।† पाठान्तर--२ माई, री म्हाँने सुपणे में परणी गोपाल । राती पीरी चूनर पहरी, महदी पान रसाल । कॉई करों और संग भाँवर, म्हाँने जग जंजाल । मीराँ प्रभु गिरधरन लाल सूँ , करी सगाई हाल ।† पाठान्तर--३ माई, मै तो सपना मे परणी गोपाल । हाथी भी लायो घोडा भी लायो और लायो सुखपाल ।† १ बारात, ̂ २ लकडी का बनाया हुआ एक चित्रित त्रिकोण जो बारात के समय पर लडकी के पिता के दरवाजे पर बाँध दिया जाता है। नियमानुसार दुलहा नीम की छड़ी से इसको छू देता है, तंब अन्य रस्में की जाती हैं।

मतभेद पाठान्तर--४ माई हूँ सुपणे मे परणी गोपाल। मति करो म्हारी ब्याव सगाई, क्यूँ बाँधो जजाल। झूठा मात पिता बधु, बध्यो अबध्या ख्याल। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, साँचो पति नन्दलाल।† उपर्युक्त दोनो पदो की प्रामाणिकता संदिग्ध है। मीराँ की छोटी बयस मे ही मीराँ की माता का निधन हो गया था, यही अद्यावधि सर्वमान्य है। भाषा पर भी आधुनिक राजस्थानी का प्रभाव स्पष्ट है। ३ कूड़ो वर कुण परणीजे माय, परणूं तो मर मर जाय। लख चौरासी को चूडलो रे बाला, पहर्यो कितीयक बार। कै तो जीव जानत है सजनी, कै जाने सिरजणहार। सात बरस की मै राम आरध्यौ, जब पाया करतार। मीराँ ने परमातम मिलीया, भव भव का भरतार॥३॥† यह पद श्री भटनागर जी द्वारा प्राप्त हुआ है। पदाभिव्यक्ति मे अर्थ संगति नही है। अत पद को प्रक्षिप्त कहा जा सकता है। ४ म्हाँने गुरू गोविन्द री आण, गोरल ना पूजॉ। और जो पूजो गोरज्या जी, थे क्यूँ न पूजो गोर। मन बाँछत फल पावस्यो जी, थे क्यूँ पूजो और। नहि हम पूजॉ गोरज्याँ जी, नहि पूजॉ अनदेव। बाल सनेही गोविन्दो, साध सता को काम। थे बेटी राठोडाँ की, थॉने राज दियो भगवान। राज करे ज्यॉने करने दीज्यो, मै भगता री दास।

६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह सेवा साधू जनन की, म्हाँरे राम मिलण की आस। लाजै पीहर सासरो, माइतणौ मौसाल। सब ही लाजै मेडतिया जी, थाँसू बुरा कहै ससार। चोरी करूँ न मारगी¹, नहि मै करूँ अकाज। पुन्न के मारग चालताँ, झक मारो ससार। नहि मै पीहर सासरे, नहि मै पिया जी की साथ। मीराँ ने गोविन्द मिलिया जी, गुरू मिलया रैदास ॥४॥ पाठान्तर—१ साधो रो सग निवारो राईं², भाभी जी गोरल पूजो जी राज। साइयाँ³ पूजे गोर ने थे पूजो गणगोर, मन बाँछत फल पावस्यौ। भाभी जी रुठे गणगोर। नै पूजूं गणगौर नै नहि पूजूँ अनदेव, बाल सामरो जाको थे नहि जानो भेव। सेवा सालगराम की साध संता रो काम, थे, बेटी राठौड की, थाँने राज दियो भगवान। राज करे ज्याँने करन द्यो, मै सन्तां की दास। भगति करौ भगवान की, म्हाँरे राम मिलण की आस। लाजै पीहर सासरो, लाजै या मोसार, नितराँ⁴ आवै ओलमा, थाने बुरा कहै संसार। चोरी न करूँ कुमारगी, नहि कुमाऊं पाप, पुन रे मारग चालता, म्हांसू कांई हठ लाग्या छो आप। कदि⁵ ठाकुर परचो⁶ दियो, कदि मानी परतीति। कुल को नातो तोडियो, भाभी जी नहि छै राजां की रीति। नहि जाऊं पीहर सासरे, नहि पिया के पास। मीराँ सरणै राम के, म्हांने गुरू मिलिया रैदास। १ कुमार्गी होना, २ राजा, ३ सखियाँ, ४ नित्यप्रति, ५ कब, ६ प्रत्यक्ष प्रभाव दिखाना,

५ मीराँ तो जन्मी मेरता सजनी म्हांरी हे । आन लियो ओतार¹ पिय म्हांरो गिरधारी । और सहेली पूजे गोरजा सजनी म्हारी हे । थे बी पूजो गोर पिय म्हांरो गिरधारी । और तो पूजे गोरजा हे सजनी म्हांरी हे । म्हे म्हाको सालिगराम पिय म्हारो गिरधारी । परोहित उरे² बुलाय के हे सजनी म्हारी हे । मीराँ की लगन लिखाय पिय म्हांरो गिरधारी । पिरोहित बैसो बिच जाय के हे सजनी म्हारी हे । पौच्यो छै गढ चित्तौर हे पिय म्हांरो गिरधारी । गेली भई मीरा बावली सजनी म्हांरी हे । अकल कुमारी³ बारी बसै पिय म्हारो गिरधारी । कागद मीरां मोकल्या हे सजनी म्हांरी हे । थारी खुसी परै तो राणा आव पिय म्हारो गिरधारी । हाथी सिधारे राणा सात सै सजनी म्हारी हे । घुरला वार न पार पिय म्हांरो गिरधारी । नेजे तो आवे चमकता म्हांरी सजनी हे । उडती आवे छै खेह पिया म्हांरो गिरधारी । काकड⁴ आयो राणा राजई सजनी म्हांरी हे । काकड करहा⁵ झुकाय पिय म्हांरो गिरधारी । आय पहुच्यो राणा मेडते सजनी म्हारी हे । बाजे बहोत बजाय पिय म्हारो गिरधारी । बागा तो आया राणा राई सजनी म्हारी हे । तबुवा दिये है तनाय पिय म्हांरो गिरधारी ।


१ अवतार, २ यहाँ, ३ अखड कुमारी, ४ सरहद्द, ५ सरहद ने अपने शिखर झुका दिये, अर्थात सरहद के लोगो ने बारात सजाकर आते हुए राणा का विशेष स्वागत किया । *

८ मीराँ बृहद्-पद-संग्रह

तोरण आया राणा राजई सजनी म्हारी हे । कामिण¹ कलस सँवारि पिय म्हांरो गिरधारी । फेराँ² तो आया राणा राजई सजनी म्हांरी हे । एक मीराँ की मीराँ दोय पिय म्हारी गिरधारी । परण पधारियो राणा रांजई सजनी म्हारी हे । पहुंच्यो गढ चितौर पिय म्हारो गिरधारी । महला पधार्यो राणा राजई सजनी म्हारी हे । एक मीराँ की चार मीराँ पिया म्हारो गिरधारी । सछा उरे बुलाय कै सजनी म्हारी हे । मीराँ कू समझाय, पिय म्हारो गिरधारी । समझाये समझे नहि सजनी म्हारी हे । बजर सिला विष बाट पिय म्हारो गिरधारी । बजर सिला बिख बांटियो सजनी म्हारी हे । पर फेटा बीच छानि पिय म्हारो गिरधारी । •पर फेटा बीच छानियो सजनी म्हांरी हे । देवो मीराँ जी को जाय पिय म्हांरो गिरधारी । चरनोदक आरोग्यो³ सजनी म्हारी हे । दूनो बढयौ छै सनेस⁴ पिय म्हांरो गिरधारी । पगा जू बाधे घूघरा, सजनी म्हांरी हे । गावै छै गुंन गोविन्द पिय म्हांरो गिरधारी । पटका⁵ खोल पगां पर्यौ सजनी म्हांरी हे । अपनो गुरुजी बताय पिय म्हांरो गिरधारी । म्हांरो गुरु रैदास है सजनी म्हारी हे । पढे सुने फल होय पिय म्हारो गिरधारी ॥५॥ लगभग एक ही भावना को व्यक्त करने वाले उपर्युक्त दोनो ही पद विशेष ध्यान देने योग्य है। पहले पद से यह स्पष्ट नही होता कि


१ घर मे काम करने वाले नौकर, २ भाँवरें, ३ खा लिया, ४ स्नेह, ५ दरवाजा।

मतभेद • ६ वार्तालाप किस विशेष व्यक्ति से हो रहा है। पहले पद (न० ४) के दूसरे पाठ से वार्तालाप का किसी ननद के साथ होना और दूसरे पद (न० ५) से वार्तालाप का किसी सखी के साथ होना ही स्पष्ट होता है। साथ ही इस पद (न० ५) की कुछ अपनी विशेषताएँ भी हैं। पदाभिव्यक्ति से स्पष्ट है कि मीराँ का विरोध न केवल गोर-पूजा से है अपितु राणा के साथ निश्चित किए गए विवाह से भी है। परन्तु इस विरोध के बावजूद भी मीराँ का विवाह हो जाता है। चित्तौड़ पहुँच कर भी मीराँ राणा की कुल परम्पराओ को स्वीकार नही करती। अत विष देने की योजना की जाती है। इस योजना मे निष्फल हो राणा प्रायश्चित करते है तथा मीराँ के गुरु को जानने की इच्छा प्रकट करते है। यह “रैदास” कौन हो सकते हैं ? मीराँ द्वारा बार बार “रैदास” को अपना गुरु बताना भी एक अत्यन्त विचारणीय प्रश्न है। ६ दे माई म्हाको गिरधर लाल। थारे चरणा की आनि करत हो, और न मणि लाल । नात सगो परिवारो सारो, मने लागे मानो काल । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, छबि लखि भई निहाल ॥६॥† उपर्युक्त पद प्रियादास कृत “भक्तमाल” की टीका मे आए उद्धरण का ही गेय-रूपान्तर मात्र सिद्ध होता है। ७ मीराँ ए ज्ञान धरम की गाठडी, हीरा रतन जडाओ जी । लोग थांरी निन्दरा करे, साधा मे मत जाओ जी । कुण गुरु समझायो, घर को धन्धो छोडद्यो जी । लोग थारी निन्दरा करे, साधा मे मत जाओ जी । कने कहोगी बाई माइडी, कणे कहोगी बाई बीरो जी ? कूण थारा पगलिया चापसी, कूण बूझे मन री बात ? बुढी टेढी म्हांरी मायडी, बीरा भर्यो ससार ।

१० मीरां-बृहद्-पद-संग्रह पावडी¹ पंगलियां चापसी² माला बुझै मन की बात । हरिदास दर्जी की बीनती जी, धोला³ वस्त्र सिमाओ जी । देर नगारो⁴ मीराँ चढ गयी, माता हियो मत हारो जी । बागा मे बोली कोयली, बन मे दादुर मोर । मीराँ ने गिरिधर मिलिया जी, र्नागर नन्द किशोर ॥७॥† उपर्युक्त पद से यह अज्ञात ही रह जाता है कि ऐसी दृढ अभि- व्यक्ति किसके प्रति हुई ? बहुत सम्भव है कि यह हरिदास दर्जी नामक कोई "रैदासी" सत ही मीराँ के गुरु "रैदास" हों । ८ कोई कछु कहो रे रग॰लाग्यो, रगलाग्यो भ्रम भाग्यो । लोग कहैं मीराँ भई बावरी, भ्रम दूनी ने खा गयो । कोई कहै रग लाग्यो ।- मीराँ साधा मे यूँ रम बैठी, ज्यूँ गूदड़ी मे तागो । सोने मैं सुहागो । मीराँ सूती अपने भवन में, सतगुरु आय जगा गयो । ज्ञानी गुरु आय जगा गयो ॥८॥† ९ थांने बरज बरज मैं हारी, भाभी मानो बात हमारी । राणे रोस कियो था ऊपर, साधो मे मत जारी । कुल को दाग लगै छे भाभी, निन्दा हो रही भारी । साधो रे सग बन बन भटको, लाज गमाई सारी । बड़ा घरां मे जन्म लियो छे, नाचो दै दै तारी । बर पायो हिंदुवाणै सूरज, अब बिदल मे काई धारी । मीराँ गिरधर साध सग तज, चलो हमारे लारी । १ खडाऊ या चप्पल, २ दबावेगी, ३ डंके की चोट,

मतभेद ११ मीराँ : मीराँ बात नही जग छानी, ऊदाँ समझो सुघर संयानी । साधू मात पिता मेरे, सजन सनेही ग्यानी । सत चरण की सरण रैण दिन, सत्त कहत हू बानी । राणा ने समझाओ जाओ, मै तो बात न मानी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सता हाथ बिकानी । ऊदाँ . भाभी ' बोलो बात बिचारी* । साधो की संगति दुख भारी, मानो बात हमारी । छापा तिलक गलहार उतारो, पहिरो हार हजारी । रतन जडित पहिरो आभूषण, भोगो भोग अपारी । मीराँ जी थे चालो महल मे, थाँनें सोगन म्हांरी । मीराँ. 'भाव भगत भूषण सजे, सील सतो सिंगार । ओढी चूनर प्रेम की, म्हारो गिरधर जी भरतार । ऊदाँ बाई मन समझ, जाओ अपने धाम । राज पाट भोगो तुम ही, हमसे न तासू काम ॥९॥ १० म्हांरी बात जगत सूँ छानी, साधा सूँ नही छानी री । साधू मात पिता कुल मेरे, साधू निरमल ग्यानी री । राणा ने समझाओ बाई, (ऊदाँ) मै तो एक न मानी री । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सतन हाथ बिकानी री ॥१०॥† इस पद को स्वतन्त्र पद न मानकर पद स. ७ की ही कुछ पंक्तियो “मीराँ गिरिधर ˙ ˙ हाथ बिकानी” का ही गेय रूपान्तर मानना अधिक युक्ति-सगत प्रतीत होता है। प्रथम पंक्ति के सिवा अन्य पंक्तियों पर ब्रजभाषा की छाप स्पष्ट है।

१२ मीराँ-बृहत्-पद-संग्रह ११ भाभी मीराँ ! कुल ने लगायी गाल, ईंडर गढ़ ते आया ओलमा¹ । बाई ऊदाँ ! थॉरे म्हॉरे नातो नाहि, बासो बस्या का आया जी ओलमा । भाभी मीराँ ! साधॉ को सग निवारि, सारो सहर थॉरी निन्दा करै । बाई ऊदाँ करे तो पड़या झख मारो, मन लाग्यो रमता राम सूँ । भाभी मीराँ पहरो नी मोत्या को हार, गहणो पहर्यो रतन जडाव को । बाई ऊदाँ छोड़यो मोत्यां को हार, गहणो तो पहर्यो सील सन्तोष को । भाँभी मीराँ ! औरॉ के आवे छै आच्छी² रूढी जान, थॉरे आवे हरिजन पावनॉ । बाई ऊदाँ चौबसियां³ झाँक, साधॉ को मडल लागे सुहावणो । भाभी मीराँ ! लाजे गढ चितौड, राणो जी लाजै गढ़ रा राजबी । बाई ऊदाँ ! तार्यो तार्यो चित्तौड, राणा जी तार्या गढ रा राजवी । भाभी मीराँ ! लाजै लाजै थाँरू मायड बाप, पीहर लाजै जी मेडतो । बाई ऊदाँ ! तार्या म्हें तो मायड बाप, पीहर तार्यो जी मेडतो । भाभी मीराँ ! राणा जी कियो छै थां पर कोप, रतन कचोले विष घोलियो। बाई ऊदाँ ! घोल्यो तो घोलवा द्यो कर, चरणामृत वो ही म्हू पीवस्यां । भाभी मीराँ ! देखतड़ा ही मर जाय, विष तो कहिए बासक नाग को । बाई ऊदाँ ! नही म्हारे माय र बाप, अमर डाली धरती झेलिया । भाभी मीराँ ! राणा उभा छै थारे द्वार, पोथी मागें छै थारे ज्ञान की । बाई ऊदाँ ! म्हारी खाँड़ा री धार, ज्ञान निभावन राणा छै नही । भाभी मीराँ ! राणा जी रो बचन न लोप, उन रूठ्यां भीड़ी कोऊ नहीं । बाई ऊदाँ ! रमापति आवे म्हारी भीड़, अरज करूं छूँ तांसू बीनती ॥११॥ १२ भाभी मीराँ हो साधा को संग निवारि, थारी लोक निन्दा करै । १ शिकायत, २ भली सुन्दर, ३ बरॉमदा ।

१४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह साचाँ साहिब जी यो दुख सह्यो न जाई, हीवडो तो सुमर भर्चो सांचा साहिब जी बिदद री लाज, कर जोडे मीराँ बिनती करै ॥१२॥ † उपर्युक्त पद मे कुम्भा जी तथा दूदा जी का नाम आया है, यह विचारणीय है। ऐसे पदो से यही स्पष्ट हो जाता है कि मीराँ का विवाह “कुँवर” से नही अपितु “राणा” से ही हुआ था, परन्तु यही एक पद ऐसा है जिसके आधार पर यह राणा कौन थे, इस पर प्रकाश पडता है। पद की पक्ति “राणा जी रा बाघेला ...... मेडती” विशेष महत्वपूर्ण है। इस अभिव्यक्ति के आधार पर कहा जा सकता है कि मीराँ तक जहर का प्याला पहुँचाने वाले राणा के बाघेला सरदार ही थे। पद विशेष विचारणीय है। १३ ऊदाँ : माया थे क्यूँ रे तजी भाभी मीराँ, क्यूँ रे लियो बैराग, काईं थारे मन बसी । मीराँ : याही म्हारे मन बसी ऊदाँ, यूँ लियो बैराग, माया यूँ रे तजी । ऊदाँ . ऊचा नीचा बेसणा ये भाभी उत्तम तिहारी जात, राणा सो वर पाइयो हे भाभी, नो कूँटाँ१ में थांरो राज । मीराँ : ऐसा तो मोती ओस का ये बाई, जैसी यो संसार, लगै झकोलो पोन को ये बाई, छिन मे सब ढल जाय । ऊदाँ: खीर खांड को भोजन जीमो भाभी, ओढ़ो दिखनी चीर२ । राणा सो वर पाइयो थे भाभी, सब मह लाय थांरो सीर । १ कोना, दिशा, २ दिखनी चीर . दक्षिण से आया हुआ वस्त्र। राजस्थान में इसको अति उत्तम और सुन्दर माना जाता है। अपनी बहुमूल्यता के कारण यह राजघराने के ही उपयुक्त पड़ता है। अतः यह शब्द सुन्दर और कीमती वस्त्र के लिए रूढ़ि रूप हो गया।

मतभेद १५ मीराँ खीर खाड को भोजन त्याग्यो ये बाई, त्याग्यो दिखणी चीर राणा सो वर त्याग्यो ये बाई, सब संतन मे म्हारो सीर । ऊदाँ ॰ बास्या-कूस्या¹ टुकडा ये भाभी, और मिलेगी खाटी छार्य रो रो भूखा मरो ये भाभी, नही मिलेगो हरि आय । मीराँ बास्या तो कूस्या टूकड़ा ये बाई, पीस्यां खाटी छाय² । म्हे रोवा भूखा मरा ये बाई, जब रे मिलेगो हरि आय ॥१३॥† माया म्हे तो यूँ र तजी । १४ सुणजो जी थे भाभी मीराँ, थापे राणा जी कोप कियो छै जी । भाभी थारे मारणा कारणे, प्यालो हाथ लियो छै जी । उठ उठ भाजे रोस रो, या तो हाँथ खग लियो छै जी । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, इमरत पान कियो छै जी ॥१४॥† यह पद भी कोई स्वतन्त्र पद न होकर पद न० ११ की कुछ पंक्तियो का ही गेय रूपान्तर प्रतीत होता है। १५ अकोलो लाग्यो जी रग गिरधर को आन । गिरधर गिरधर काई करो, कोई गिरधर श्याम सुजाण । मीराँ तो चन्दा भई, कोई गिरधर उँग्यो भान । ऊदाँ थे तो बावली, कोई निहचै करल्यो ध्यान । आपा दोन्यू मिल भजा, कोई ज्यो गोप्योँ बिच कान³ । मीराँ ने गिरधर मिलिया जी, ममता रो राख्यो मान ॥१५॥† पदाभिव्यक्ति असंगत है। कीर्तन मडली मे प्राय ऐसे गीत मिलते हैं। प्राप्त इतिहास के आधार पर मीराँ की किसी ननद का नाम ऊदाँ बाई नही मिलता। भोजराज की चार बहने थी। १. कुवरबाई १ रूखा सूखा, २ छाँछ, मट्ठा, ३ कान्ह, कृष्ण।

१६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह २ पद्माबाई, ३ गंगाबाई और ४ राज बाई। प्रसिद्ध ऐतिहासिक गह लोत जी के अनुसार मीराँ की एक ननद का डूगरगढ ब्याहा जाना सिद्ध होता है। अद्यावधि प्राप्त इतिहास के आधार पर उपर्युक्त पदो को प्रामाणिक मानना सम्भव नही। १६ अब मीराँ मान लीजो म्हारी , हो जी थाने सखिया बरजे सारी। राणा बरजे, राणी 'बरजे, बरजे सब परिवारी। कुवर पाटवी सो भी-बरजे, और सहेल्या सारी। सीस फूल सिर ऊपर सोहै, बिदली शोभा भारी। साधन के ढिग बैठ बैठ के, लाज गमाई सारी। नित प्रति उठि नीच घर जाओ, कुल को लगाओ गारी। बडा घरा की छोरू कहावो, नाचो दे दे तारी। वर पायो हिंदुवाणे सूरज, इब दिल मे काई धारी। तार्यो पीहर, सासरो तार्यो, माय मोसाली तारी। मीराँ ने सद्गुरु मिलिया जी, चरण कमल बलिहारी ॥१४॥। पदाभिव्यक्ति के आधार पर यह स्पष्ट नही होता कि यह संवाद किस के साथ हो रहा है। प्रथम दो पंक्तियो की अभिव्यक्ति अवश्य ही कुछ नई सी प्रतीत होती है। परन्तु अन्य पंक्तियों को देखने से ऐसा ही प्रतीत होता है कि ऊदाँ-मीराँ सवाद की भावनाओ की ही पुन- रुक्ति हुई है। इतने अधिकारपूर्ण ढंग से विरोध किसी प्रभावशाली निकट संबधी द्वारा ही संभव है। बहुत सम्भव है कि यह सवाद भी ऊदाँ-मीराँ के बीच हुआ हो। पद की प्रथम दो पंक्तियाँ विशेष महत्वपूर्ण है। "राणा" और "राणी" तो विरोध करते ही हैं, इतना ही नही, "कुवर पाटवी सो भी बरजे"। यह "कुंवर पांटवी" कौन है ? क्या यही भोजराज हे ? प्राप्त इतिहास बताता है कि मीराँ का संघर्ष वैधव्य के बाद ही प्रारम्भ ॰ १ युवराज ।

मतभेद १७ हुआ, जब कि भोजराज के सौतेले छोटे भाई राज्याधिकारी बने। उपर्युक्त पद के आधार पर मीराँ का संघर्ष भोजराज की जीवित- अवस्था मे ही प्रारम्भ हो जाता है और वह भी कृष्ण की आराधना हेतु नही अपितु इसलिये कि “नितप्रति उठि नीच घर जाओ” और “नाचो दे दे तारी”। अन्तिम पंक्ति मे वर्णित यह “सदगुरू” भी अब तक एक रहस्य ही बने हुए है। सम्भव है कि “सदगुरू” कौन थे, यह जान लेने पर मीराँ के जीवन वृतान्त पर गहरा प्रकाश पड सकेगा। १७ नहि भावै थारो देसडलो रग रूडो¹। थारे देसा मे राणा साध नही छै, लोग बसै सब कूड़ो। गहना गाठी राणा हम सब त्याग्या, त्याग्या कर रो चूड़ो। काजल टीकी हम सब त्याग्या, त्याग्या बाधन जूड़ो। मेवा मिसरी मै सब त्याग्या, त्याग्या छै सक्कर बुरो। तन की आस कबहु नहि कीनी, ज्यूँ रण माही सूरो। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, वर पायो मै पूरो ॥१७॥ पाठान्तर १, नहि भावै थारो देसड़लो जी रूडो रूडो। हरि की भगति करै नही कोई, लोग बसै सब कूडो। पाटी माग उतारि धरूंगी, न पहिरू कर चूड़ो। मीराँ हठीली कह सतन सो, वर पायो छै पूरो। पाठान्तर २, राणा जी थारो देसडलो रग रूडो। थारे मुलक मे भक्ति नहि छै, लोग बसे सब कूड़े। १ रंगो से भरा सजा हुआ सुन्दर। २

१८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह पाट पटम्बर सब ही मै त्यागा, तज दियो कर रो चूडो । मेवा मिसरी मै सब ही त्यागा, त्यागा छै सक्कर बुरो । तन की मै आस कबहू नहि कीनी, ज्यूँ रण माहि सूरो । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, वर पायो छै पूरो । पाठान्तर ३, राणा जी थारो देस्ड़लो छै रग रूड़ो । राम नाम की भक्ति न भावै, लोग बसै सब कूड़ो । मेवा मिठाई मीरा सब ही त्यागे, त्याग्यो छै सान और बुरो । गहणो तो गाठो मीरा सब ही त्याग्यो, त्याग्यो छै बैया रो चूड़ो । साल दुसाला मीरा सब सोई त्याग्या, सिर पर बांध्यो छै जूडो । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, बर पायो छै मीरा रूडो । पाठान्तर ४, देसडलो रूड़ो रूडो, राणा जी थांरो देसडलो । भगत न भावै म्हारा राम की, लोग बसै सब छै कूड़ो । मेवा मिसरी सब ही त्याग्या, त्याग दियो छै बुरो । तन की आस कबहू नहि कीनी, ज्यूँ रण माहि सूरो । भाई मात कुटुम्बी त्याग्यो, त्याग दियो छै चूडो । घूँघट को पटि दूर कियो, सरि बाध्यौ छै जूड़ो । यो ससार भव दुख को सागर, मै हाकीयौ दूरो । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, वर पायो छै पूरो । यह पाठ भटनागर जी द्वारा किसी दादू पथी सत के सग्रह से प्राप्त हुआ । १८ राणौ जी मेवाडो म्हांरे दाय न आवै । गिरधर मो मर्न भाया भोलि माय ।

मतभेद १९ राणा जी म्हारू रूस रह्यो है, कडा वचन सुनाय भोली माय। गुरू कृपा सूं सत पधार्या, सता स्याम मिलाय भोली माय। बाधि घूघरा नृत्य करू म्हे, हरि गुण गाय रिझावा भोली माय। मीराँ के प्रभु आस पराई, गिरिधर सेजाँ आया भोली माय ॥१८॥† पद की प्रथम पंक्ति की अभिव्यक्ति पद स० १७ की अभिव्यक्ति से मिलती है। परन्तु शेष पदाभिव्यक्ति संर्वथा विभिन्न पडती है। पदाभिव्यक्ति मे सगति का भी अभाव है। “भोली माय” जैसा सम्बोधन पद की हर पंक्ति मे प्रयुक्त हुआ है जो विशेप विचारणीय है। १९ अब नहि मानूँ राणा थारी, मै बर पायो गिरधारी। मनि कपूर की एक गति है, कोऊ कहो हजारी। ककर कचन एक गति है, गुंज मिरच इकसारि। अनड घणी को सरणो लीनो, हाथ सुमिरंनी धारी। जोग लियो जब क्या दलगीरी, गुरू पाया निज भारा। साधू संगत मह दिल राजी, भइ कुटुम्ब सूं न्यारी। क्रोड बार समझाओ मोकूँ, चालूँगी बुद्धि हमारी। रतन जडित की टोपी सिर पै, हार कठ को भारा। चरन घूघरू घमस पडत है, म्हे करा स्याम सूं यारी। लाज सरम सब ही मै हारी, यौ तन चरण अधारी। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, झक मारो संसारी ॥१९॥†

२० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह पाठान्तर १, अब नहि मानाला म्हे थारी,म्हाने बर मिलि गिरधारी । मन कपूर की एक ही गति है, कहा कहू बार हजारी । ककर कचन एक गिणत है, गुज मिरच एक सारी । अनन्त धणी के सरणे आई, हाथ सुमिरणी धारी । जोग लियो जब बाद तजी री, गुर पाया निज भारी । साध सगत मेरो मंन राजी, भई कुटूब सू न्यारी । क्रोड बार समझावों मोकू, चालूगी बुद्धि हमारी । म्हे राणा के परत¹ न रहस्या, कई बार कह कह हारी । सौ बातन की एक बात है, अब तो समझ गवारी । रतन जडित की टोपी सिर पर, हार कठ को भारी । चरण घूंघरा घमस पडत है, “म्हे” कराँ स्याम सू न्यारी । लाज सरम तो सभी गुमाई, यो तन चरणा धारी । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल बलिहारी ।† उपर्युक्त पद निम्नांकित अन्तर के साथ भी पाया जाता है । १ अतिभारी । २. जब बाद तजी री । ३ में भई स्याम की प्यारी । पाठान्तर २, अब तो नही म्हैं थांरी म्हांने, वर मिलिया गिरधारी । मन कपूर की एक ही गति है, कहा कहूं बार हजारी । ककर कंचन एक गिणत है, गुज मिरच इकंसारी । अनन्त धणी के सरणे आई, हाथ सुमिरणी धारी । जोग लियो जब सब ही त्याग्यो, गुरु पाया निज भारी । साध संगत मेरो दिल राजी, भई कुटुंब सू न्यारी । कोटि बेर समझावो मोकूं, चालूगी बुद्धि हमारी । म्हैं राणा के परत न जावा, केईं बेर कह हारी । १ लौट कर ।