भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

५८० मीमांसादर्शनम् [ सू० है, क्योंकि नाभि से उत्थित वक्षःस्थल में विस्तार प्राप्त नाद का कण्ठ आदि स्थलों से संस्पर्श कर विशेष आकार में अभिव्यक्त करने के लिए प्रयत्न आवश्यक है और जिस रूप में उच्चारण करना चाहता है, उससे भिन्न रूप में ही उच्चारण हो जाता है। इसलिए एक ही शब्द अनादिकाल से आ रहा है। किन्तु वक्ता विशेष के उच्चारण के दोष से उसमें विकार आ जाता है और उसका भिन्न रूप में उच्चारण होने लगता है। उस व्यक्ति विशेष के सम्पर्क से उस सम्प्रदाय के अन्य व्यक्ति भी उस विकृत उच्चारण के अनुसार ही प्रयोग करते हैं, और इस प्रकार की उपपत्ति दृष्ट उच्चारण के अनुरूप ही है। अतः दृष्ट विरुद्ध न होने से अर्थापत्ति प्रमाण के आधार पर जो सभी शब्दों को साधु मानने की युक्ति समीचीन नहीं है। अन्यथा उपपन्न होने पर अर्थापत्ति प्रमाण के आधार पर किसी की साधुता का स्वीकार नहीं किया जा सकता है। अतः गो, गावी आदि शब्दों में एक ही अनादि है, और वही साधु है, अतिरिक्त शब्द अनादि न होने से अपभ्रंश या असाधु हैं। अनादि वाचक शब्द ही अशक्ति के कारण अनेक आकारों में परिवर्तित हो गये हैं, और ये ही प्राकृत आदि में प्रयुक्त होते हैं। अतः प्राकृत भाषा के प्रयुक्त शब्द ही साधु एवं संस्कृत की अपेक्षा प्राचीन है—यह कथन युक्तियुक्त नहीं है। ‘शब्दे अपराधस्य भागित्वम्’ शब्द में अपराधभागिता अर्थात् दुष्टता होती है। ‘प्रयत्ननिष्पत्तेः’ क्योंकि प्रयत्न के सहयोग से उसका उच्चारण होता है। शब्द का उच्चारण प्रयत्न सापेक्ष है, अतः शब्द में अपराधभागिता अर्थात् दुष्टता सिद्धान्त सिद्ध है। आशय यह है कि आलस्य, प्रमाद आदि के द्वारा शब्द जिस प्रकार यत्नपूर्वक उच्चारण करना चाहिए, वैसा उच्चारण करने में असमर्थ होने पर गावी आदि उच्चारण होता है, और इस उच्चारण से अपभ्रंश की परम्परा के क्रम में एक शब्द के अनेक अपभ्रंश हो जाते हैं ॥ २५ ॥ अन्यायश्चानेकशब्दत्वम् ॥ २६ ॥ शा० भा०—न चैष न्यायो यत्सदृशाः शब्दा एकमर्थमभिनिविशमानाः सर्वे- विच्छिन्नपारम्पर्या एवेति प्रत्ययमात्रदर्शनादभ्युपगम्यते, सादृश्यात्साधु- शब्देऽप्यवगते, प्रत्ययोऽवकल्प्यते¹। तस्मादमीषामेकोऽनादिः। अन्येऽपभ्रंशाः। हस्तः करः पाणिरित्येवमादिषु त्वभियुक्तोपदेशादनादिरमीषामर्थेन सम्बन्ध इति ॥ २६ ॥ सिद्धान्ते युक्तिः ॥ भा० वि०—सूत्रं व्याचष्टे—न चैष न्याय इति। घटः कलशः कुम्भः इत्यादि व्यवच्छेत्तुं सदृशा इत्युक्तं शालामालेत्यादिव्यवच्छेदाय—एकमर्थमिति। कथ- १ ब. वकल्पते।

सूत्रम्—अन्याय्यश्चानेकशब्दत्वमिति । कथं पुनरिदमन्याय्यम् ?

२६ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ५८१ मिदमन्याय्यमत आह—प्रत्ययमात्रेति । अभ्युपगम्येतेति । सर्वेऽविच्छिन्नपारम्पर्या इति इत्यनुषङ्गः, ततः किमत आह-तत्सादृश्यादिति । यस्य गाव्यादेरविच्छिन्न- पारम्पर्यताभ्युपगम्यते, तत्सादृश्यात् गवादिशब्दे स्मृतेऽपि तत एवार्थप्रत्ययो घटते, तेन यतोऽर्थप्रत्ययस्यैको एवानादिरितरेऽपभ्रंशा इति न सर्वेऽविच्छिन्न- पारम्पर्या इत्यर्थः । नन्वेवं सति हस्तः करः पाणिरित्यादीनामेकमर्थमभिनिविशमानानां सर्वेषा- मनादिता कथमित्याशङ्क्य शिष्टप्रयोगादित्याह—हस्त इति । अभियुक्तोपदेशा- दित्युपलक्षणम्, सादृश्याभावेन गत्यन्तराभावाच्चेति द्रष्टव्यम् ॥ २६ ॥ त० वा०—संशयापादनात्परपक्षे जितेऽपि स्वपक्षसिद्धिर्दुर्लभैवेत्येवमर्थमुत्तर- सूत्रम्—अन्याय्यश्चानेकशब्दत्वमिति । कथं पुनरिदमन्याय्यम् ? तदुच्यते—वाच्यवाचकसामर्थ्यनियमो योऽभिधागतः । सम्बन्धस्तदनेकत्वे स्वरूपात्सोऽपि हीयते ॥ ८५१ एकात्मकयोरेव हि वाच्यवाचकयोरन्योन्याक्षेपात्परस्परनियमः संभवति अन्यतरस्यापि त्वनेकत्वे सति व्यभिचारान्नियमहानिः । किं च—सामर्थ्यं सर्वभावानामर्थापत्त्याऽवगम्यते । एकसामर्थ्यसिद्धेऽर्थे नानेकं तच्च लभ्यते ॥ ८५२ अत्यन्तादृष्टा हि वाच्यप्रत्ययान्यथानुपपत्तिमात्रप्रमाणिका वाचकशक्तिरेकत्रैव कल्पिता तदनुसार्यपभ्रंशेष्वपि चेदनुगम्यते, को नाम तन्निरपेक्षवाचकशक्त्यन्तर- कल्पनां लभेत१। नाम च व्यवहारार्थमर्थस्याभ्युपगम्यते । तेनैकेनैव सिद्धेऽर्थे द्वितीयादि च निष्फलम् ॥ ८५३ किं च—विकल्पस्याष्टदोषत्वं पुरस्तादेव वर्णितम् । स चेहानेकशब्दत्वे निश्चयेन प्रसज्यते ॥ ८५४ नामान्तरे श्रुते चार्थस्तद्भिन्नोऽन्यः प्रतीयते संज्ञा चोत्पत्तिसंयोगात् २-२-८ इत्यत्रैतद्वदिष्यते ॥ ८५५ दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोः वैषम्यप्रतिपादनम् या तु हस्तः करः पाणिरित्यत्राऽनेकशब्दता । अनन्यगतिकत्वेन सा दृढस्मरणेन च ॥ ८५६ १ क. व कल्प्यते । २ क. (टिप्पण्यां) भजेतेति पा० ।

५८२ मीमांसादर्शनम् [ सू० एकशक्त्यनुसारेण यावत्त्वस्ति गतिः क्वचित् । उपमानानुमानाभ्यां तावत्सैवानुगम्यते ॥ ८५७ तस्मात्स्वरूपसम्बन्धशब्दार्थत्वनिरूपणे । एकैकनियमादेव गतिः स्यान्नान्यगोचरा ॥ ८५८ यथा च प्रकृतिसारूप्यद्वारेणापभ्रंशाः प्राकृतीमेव शक्तिमाविर्भावयन्तोऽर्थ- प्रतिपत्तावुपयोगं गच्छन्ति । तथा तदशक्तिश्चानुरूपत्वात्' इत्यत्र वर्णयिष्यते । तेनानेकप्रयोगेऽपि कश्चिदेवार्थसंगतः । तदुपस्थापनेनान्ये बोधकास्तदशक्तिजाः ॥ २६ ॥ ८५९ न्या० सु०—अत्र भाष्यकृता न चैष इत्यादिनेकस्यार्थस्यानेकशब्दत्वमयुक्तमित्येवं सूत्रं व्याख्याय, हेत्वपेक्षायां प्रत्ययमात्रेत्याद्युक्तं तदन्यथाप्युपपत्तिमात्रप्रतिपादकत्वेन, पूर्ववत्सन्देहमात्रापादनादनिर्णायकं तत्प्रकारनिरूपणं च 'तदशक्तिश्चे' त्यत्र वक्ष्यमाणत्वात् पुनरुक्तमित्युपेक्ष्य, स्वयं प्रश्नपूर्वं पक्षहेतूनाह—कथं पुनरिति । कारकयोः साक्षाद- सम्बन्धात् क्रियासम्बन्धे सत्येकक्रियावशीकारात्परस्परनियमसम्बन्धोऽभिधीयते । यथोक्तम्— 'प्रतिपत्तावुपादानात्साहित्ये च विवक्षिते । नियम्येत यदेकस्यां सम्बन्धः सोऽर्थशब्दयोः ॥' इति । स च वाच्यवाचकानेकत्वे स्वरूपात्नियमलक्षणाद्धीयत इत्यर्थः । वाच्यवाच- कत्वयोः कर्मकरणरूपकात्मकत्वाच्छक्तेरेव कारकत्वमभिप्रेत्य सामर्थ्यशब्दः । क्रिया- व्यापृतत्वरूपस्य तु कारकत्वमभिप्रेत्य तद्व्यवस्थासिद्ध्यर्थादृष्टातिशयरूपशक्त्य- भ्युपगमे वा वाच्यावच्छिन्नवाचकाश्रितैकशक्तिमात्रेणोभयव्यवस्थोपपत्तेरनवच्छिन्नत्वे वा शक्तित्रयकल्पनेऽपि व्यवस्थानुपपत्तेर्वाच्यावच्छिन्नस्य वाचकाश्रितस्य सामर्थ्यस्याभिधायां नियमो यः सम्बन्धशब्दाभिधेय इति योज्यम् । श्लोकं व्याचष्टे—एकेति । योग्यार्थापत्त्य- नुदयादप्यनेकवाचकशक्तिकल्पनमन्याय्यमित्याह—किं चेति । श्लोकं व्याचष्टे—अत्यन्तेति । आनर्थक्यादप्यनेकशब्दत्वमन्याय्यमित्याह—नाम चेति । विकल्पापत्तेरप्यन्याय्यमित्याह— किं चेति । अर्थभेदापत्तेरप्यन्याय्यमित्याह—नामान्तर इति । ननु हस्तकरादिष्वनेकशब्दत्वदर्शनात्कथमन्याय्यतेत्याशङ्क्य, हस्त इत्यादिभाष्येणाभि- युक्तोपदेशाभावे सत्यन्याय्येतेति परिहृतम्, तद् गाव्यादिष्वपशब्देष्वप्यभियुक्तोपदेशस्य पूर्वपक्षिणेष्टत्वादयुक्तमाशङ्क्य, गत्यन्तराभावसूचनाथंत्वेन व्याचष्टे—यत्त्विति । दृढस्मरणे- नेत्यभियुक्तोपदेशोऽनन्यगतिकत्वोपपादनार्थत्वेन व्याख्यातः । तदुपलक्षितमसादृश्यं चकारेण सूचितं सम्प्रत्युपेक्षितं भाष्यं गाव्यादिशब्देषु गत्यन्तरसम्भवसूचनाथंत्वेन व्याचष्टे— १. जै० सू० (१-३-८) ।

२६ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ५८३ एकेति । गोशब्दोच्चिचारयिषायामशक्त्या केनचिद्गावीत्युच्चारिते, श्रुतगावीशब्दसादृश्यं गोशब्दस्योपमानेनावगम्य, गावीशब्दोच्चारणस्य गोशब्दोच्चिचारयिषामूलत्वानुमानाद् गोशब्दशक्त्यनुसारेण गावीशब्दादप्यर्थप्रत्ययोपपत्तेर्न गावीशब्दस्य शक्त्यन्तरकल्पन- मित्यर्थः । अनेकशब्दत्वस्यान्याय्यत्वं पञ्चधोपपादितमुपसंहरति - तस्मादिति । स्वरूपं नियमरूपतासम्बन्धः सामर्थ्यलक्षणः शब्दो नामार्थो नामान्तरेऽप्यभिन्न इत्येषां चतुष्टयोपसंहारः । निरूपणशब्दव्यवस्थार्थत्वेनावश्यं विकल्पप्रसङ्गलक्षणोपपत्त्युपसंहारः । सर्वशब्दमध्ये एकैकस्यैव गवाश्वादिशब्दस्य वाचकत्वनियमादिति वीप्सार्थः । यद्वैकस्यैव शब्दस्य वाचकत्वनियमादेकस्यैव चार्थस्य वाच्यत्वनियमादिति यववराहाधिकरणोक्तो वाच्यैकत्वनियमो दृष्टान्तत्वेन वीप्सयोक्तः । कथं पुनरुपमानानुमानाभ्यामेकशक्त्यनुसारेण गतिसम्भव इत्याशङ्क्याह - यथा चेति । सिद्धान्तमुपसंहरति - तेनेति ॥ २६ ॥ भा० प्र०—इस प्रसङ्ग में यह शङ्का हो सकती है कि एक शब्द को साधु और अन्य शब्द को असाधु मानने का क्या कारण है ? सभी अपरपर्याय शब्दों में एक ही अर्थ के सभी शब्द वाचक होते हैं । अनेक शब्द को एक अर्थ का वाचक मानना उचित नहीं है । एक ही अर्थ की अनेक शब्दों से प्रतीति माननी होगी, किन्तु ऐसा मानने पर शब्द का अप्रामाण्य मानना होगा । अव्युत्पन्न व्यक्ति जब शब्द और अर्थ के सम्बन्ध का ज्ञान करता है, तब यह निर्णय करता है कि यह गो शब्द का वाच्य है; यह अश्व शब्द का वाच्य नहीं है इत्यादि नियम पूर्वक ही व्युत्पत्ति होती है । किन्तु इसके बाद जो यह समझता है कि गोणी गोता आदि सभी शब्दों का वाच्य गौ ही है । तब पूर्व नियम का वाध होता है । पूर्वोक्त नियम का बाध होने पर अव्युत्पन्न व्यक्ति को शब्द से अर्थ का बोध नहीं होगा । 'गामानय' गौ को लाओ इस प्रकार गो शब्द के सुनने के बाद कोई व्यक्ति जब गलकम्बल आदि से विशिष्ट प्राणिविशेष विशेषरूप को लेकर व्यवहार करता है । ऐसी स्थिति में अन्य अव्युत्पन्न व्यक्ति अर्थापत्ति प्रमाण के द्वारा यह अवगत करता है कि गो शब्द में गलकम्बलादि विशिष्ट प्राणिविशेषरूप अर्थ को बोध कराने की शक्ति है । इस प्रकार एक शब्द के सामर्थ्य से एक अर्थ सिद्ध होता है, उसी प्रकार अनेक शक्ति की कल्पना नहीं की जाती है, क्योंकि इसमें अर्थापत्ति बाधित होता है । अनेक शब्दों को एक अर्थ का वाचक मानने पर विकल्प की प्रसक्ति होगी । विकल्प मानने पर सभी के प्रामाण्य को पक्ष में बाधित मानना होगा । अतः सम्भव पक्ष में अन्यथा उपपत्ति होने पर विकल्प मानना उचित नहीं है । कर, हस्त आदि प्रयोगों में एक अर्थ में अनेक शब्द की वाच्यता माननी ही होगी ; क्योंकि दूसरा उपाय नहीं है । इसलिए गो, गावी आदि शब्दों में एक शब्द साधु है और अन्य शब्द असाधु हैं, अपभ्रंश है, वक्ता के उच्चारण के असामर्थ्य के कारण ही ये शब्द प्रयुक्त हुए हैं । हस्त, कर, पाणि आदि शब्दों का एक अर्थ में प्रयोग शिष्टाचार के कारण अनादि सम्बन्ध है । वस्तुतः एकार्थक मानने पर भी व्युत्पत्ति के आधार पर इन शब्दों के द्वारा

५८४ मीमांसादर्शनम् [ सू० प्रतीत अर्थ में भेद ही दृष्टिगोचर होता है। क्योंकि हस्त शब्द का अनेक उपयोग होता है। निरुक्त के अनुसार 'हस्तो हन्तेः' (नि० १।६) इस व्युत्पत्ति से प्राप्ति या हिंसा के उपयोग में ही हस्त शब्द का प्रयोग साधु है, कर शब्द कृधातु से करोति इति कर व्युत्पत्ति के अनुसार सामान्य क्रिया अर्थ में साधु है । इसी प्रकार पूजा आदि शुभ कर्म सम्पादन में ही पाणि शब्द का प्रयोग साधु है, क्योंकि पूजार्थक पण् धातु से यह प्रयोग निष्पन्न होता है । 'पाणिः पणायतेः पूजा कर्मणः, प्रगृह्य पाणी देवान् पूजयन्ति' (नि० २।२६) के अनुसार इसी अर्थ की प्रतीति इस शब्द से होती है। अतः कोई भी शब्द अपर पर्याय नहीं है। क्रिया भेद से भिन्न-भिन्न अर्थ के अनुसार शब्द का प्रयोग होता है। 'अन्यायः' = अन्याय या अनुचित है। 'च' = क्योंकि, 'अनेक शब्दत्वम्' = अनेक शब्द वाच्यता । एक ही अर्थ की अनेक शब्द वाच्यता अनुचित अर्थात् एक अर्थ का अनेक शब्द को वाचक मानना उचित नहीं है ॥ २६ ॥ तत्र तत्त्वमभियोगविशेषात्स्यात् ॥ २७ ॥ शा० भा०-कथं पुनस्तत्र१ तत्त्वं शक्यं विज्ञातुम् ? शक्यमित्याह२ । अर्थिनो ह्यभियुक्ता भवन्ति । दृश्यते चाभियुक्तानां गुण्यतामविस्मरणमुपपन्नम् । प्रत्यक्षं चैतद् गुण्यमानं न भ्रश्यत इति । तस्माद् यमभियुक्ता उपदिशन्त्येष एव साधुरिति, साधुरित्यवगन्तव्यः३ ॥२७॥ आशङ्कानिरासः ॥ भा० वि०-सूत्रव्यावर्त्यां शङ्कामाह-किं पुनरिति । माभूवन् सर्वेऽनादयः तथाप्ययमेवैकस्साधुरितरेऽसाधव इति, तेषु तत्त्वं न शक्यते ज्ञातुम्, नियामका- भावादित्यर्थः, उत्तरत्वेन सूत्रमवतारयति-शक्यमित्याहेति । तद्व्याचष्टे- अर्थिन इति । अर्थिनो=दृष्टार्थिनः । तदनेनादृष्टार्थसाधुप्रयोगनियमप्रतिपादकवेद- दर्शित्वमुक्तम्, अभियोगो=लक्षणात्मकव्याकरणशास्त्राभ्यासः, तद्वन्तोऽभियुक्ताः, तेन च व्याकरणाभ्यासानुगृहीतमयमेव साधुरितरेऽपभ्रंशा इति यत् प्रत्यक्षं तद्वत्त्वमुक्तम् । ननु यद्यर्थिनोऽभियुक्ता भवन्ति, तथाप्यभियोगस्य प्रमुषितत्वसंभवात् न तत्सहकृतं प्रत्यक्षं साधुत्त्वादिग्रहणाय पर्याप्तम् । अत्राह-दृश्यते चेति । गुणो गुणनमावर्तनं तद्वतामविच्छिन्नाभ्यासानामियुक्तं भवति, अनेन सौत्रं विशेषपदं व्याख्यातम्, अविच्छिन्नाभ्यासप्रमोषाभावरूपं अविस्मरणमेवोपपन्नं पश्याम इत्यर्थः, प्रत्यक्षं चातिशयेनावर्त्यमानस्य स्वाध्यायादेरविस्मरणमित्याह-प्रत्यक्षं १ ब. पुनरत्र । २ ब. इतःपरं 'तस्माद् य' इत्यन्तं नास्ति । ३ ब. साधुरवगन्तव्यः ।

२८ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः। ५८५ चेति । तेन पूर्वपूर्वस्मृत्यनुगृहीतप्रत्यक्षमूलत्वाद्वेद मूलत्वाच्चोत्तरोत्तराभियुक्तस्मृतेः प्रामाण्यात् तद्बलादेव नियमद्वयसिद्धिरित्याशयः । भवतु प्रयोगनियमविषयायाः श्रुतेः श्रुतिमूलत्वेन प्रामाण्यम्, साधुस्वरूपनियमविषयायास्त्वसन्मूलाया विप्र- लम्भादिमूलत्वसंभवात् कथं प्रामाण्यमत आह—दृश्यते चेति । अभियुक्तत्वम्, यथार्थदर्शित्वम्, गुणवत्त्वं यथादृष्टार्थवादित्वमुपपन्नं प्रमाणमिति यावत् । ननु प्रमुषितव्याकरणस्य स्मरणमप्रमाणमपि भविष्यति तत्राह—प्रत्यक्षं चैतदिति । गुण्यमानमावर्तमानमित्यर्थः, समूलत्वेनोपसंहरति-तस्मादिति ॥२७॥ तदशक्तिश्चानुरूपत्वात् ॥ २८ ॥ शा० भा०—अथ यदुक्तम्-अर्थोऽवगम्यते गाव्यादिभ्यः, अत एषामप्यनादि- रर्थेन सम्बन्ध इति । तदशक्तिरेषां गम्यते । गोशब्दमुच्चारयितुकामेन केनचिद- शक्त्या गावीत्युच्चारितम् । अपरेण ज्ञातं सास्नादिमानस्य विवक्षितः तदर्थं गौरित्युच्चारयितुकामो गावीत्युच्चारयति । ततः शिक्षित्वाऽपरेऽपि सास्नादि- मति विवक्षिते गावीत्युच्चारयन्ति । तेन गावादिभ्यः सास्नादिमानवगम्यते । अनुरूपो हि गाव्यादिर्गोशब्दस्य ॥ २८ ॥ उत्तरम् । भा० वि०—शङ्कोत्तरत्वेन सूत्रं व्याख्यातुं शङ्कामनुवदति—अथेति । गाव्या- दिभ्य एवेत्यर्थः । भवतु गृहीतगोशब्दवाचकत्वस्य श्रुतगावीशब्दसादृश्यावगत- गोशब्दादेवार्थप्रत्ययः, यस्तु गाव्यादिभ्य एवार्थं प्रत्येति, तं प्रति तेषामेव वाचकत्वमाश्रयणीयमिति भावः । तत्प्रतिपत्तिप्रकारं दर्शयितुं सूत्रावयवं व्याचष्टे- तदशक्तिरिति । प्रयोज्यवृद्धस्तावत् उत्तमवृद्धप्रयुक्तगावीशब्दसादृश्यात् गोशब्द- मवगम्य तद्विवक्षां चास्यानुमाय देवदत्तपदविवक्षायां तत्तत्पदप्रयोगाद् देवदत्तपद- प्रयोगशक्तित्वात् गावीपदप्रयोगात् गोपदप्रयोगशक्तिमुत्तमवृद्धस्यावगच्छतीत्यर्थः । एतद्विवृणोति—गोशब्दमिति । केनचिदुत्तमवृद्धेनोच्चारयतीत्यस्यानन्तरमितिशब्द- मध्याहृत्यापरेण मध्यमवृद्धेन ज्ञातमिति सम्बन्धनीयम् । तेन तस्य तावद्विवक्षा- विषयत्वेनानुमितात् गोशब्दादेवार्थप्रत्ययः, इति पूर्वोक्तानुवादः, अस्तु गृहीत- गोशब्दवाचकत्वस्य मध्यमवृद्धस्यैवम्, इतरेषां तु कथम् ? अत आह—तत इति । मध्यमवृद्धाच्छिक्षित्वा व्युत्पद्यते अपरोऽपि बालोऽपीत्यर्थः, यद्यपि मूलशब्दानु- सारेणैव सास्नादिमति प्रयोज्यवृद्धप्रत्ययः, तथापि तत्प्रत्ययस्य व्यवहारानुमितस्य गाव्यादिविकारशब्दान्वयव्यतिरेकित्वाद्विकारशब्दाशकिजत्वाज्ञानाच्च, तज्जन्य- त्वमाकलयन्तो बालास्तत्रैव गाव्यादिशब्दसामर्थ्यं कल्पयन्ति, तत॒ स्वयमपि प्रयोगसमये सास्नादिमति विवक्षिते गावीत्येवोच्चारयन्ति, एवमन्येऽपी- त्यपभ्रष्टैरेव गाव्यादिभिस्सास्नादिमानर्थोऽवगम्यते, न तु वाचकैरेवेत्यर्थः ।

५८६ मीमांसादर्शनम् [ सू० नन्वेवमश्वमानयेत्युत्तमवृद्धप्रयुक्तादश्वशब्दादपि गोशब्दमवगम्य सास्नादिमति प्रवृत्तावश्वशब्दस्यापि तत्र व्युत्पत्तिप्रसङ्ग इत्याशङ्क्यानुरूपत्वादिति सूत्रावयवं व्याचष्टे—अनुरूपो हीति । न शब्दमात्राद् गोशब्दावगतिः किन्तु सदृशादेव गाव्यादेरित्यर्थः इति भावः ॥ २८ ॥ एकदेशत्वाच्च विभक्तिव्यत्यये स्यात् ॥ २९ ॥ शा० भा०—अत एव हि विभक्तिव्यत्ययेऽपि प्रत्ययो भवति । अश्मकैरा- गच्छामीत्यश्मकशब्दैकदेश उपलब्धे, अश्मकेभ्य इत्येष शब्दः स्मर्यते । ततोऽस्म- केभ्य इत्येषोऽर्थ॑. उपलभ्यत इति । एवं गाव्यादिदर्शनाद् गोशब्दस्मरणम्², ततः सास्नादिमानवगम्यते ॥ २९ ॥ उत्तरे युक्तिः । ॥ इत्यष्टमं व्याकरणाधिकरणम् ॥ भा० वि०—गाव्यादिशब्दस्य साधुशब्दस्मारेणनार्थप्रत्यायकत्वं दृष्टान्तेन दर्शयितुं विभक्तिव्यत्यये प्रत्ययः स्यादिति सूत्रावयवं व्याचष्टे—अत एवेति । यतस्सदृशशब्ददर्शनात्सदृशान्तरे बुद्धिरुपपन्ना । अत एवेत्यर्थः, क्वैवं भवतीत्य- त्राह—अश्मकैरिति । कथमश्मकैरित्यस्मादश्मकेभ्य इत्यस्य विरूपस्य स्मरण- मित्याशङ्क्यैकदेशादिति सूत्रावयवो व्याख्यातः । अश्मकशब्दैकदेश उपलब्ध इति, इदानीं स्मृताच्छब्दात् तदर्थावगतिमाह–तत इति । दृष्टान्तनिविष्टमर्थं दार्ष्टान्तिके योजयति—एवमिति । तेन गाव्यादिशब्दस्मृतानां गवादिशब्दानामेव वाचकत्वा- तेषामेव सास्नादिमति साधुत्वम्, न गाव्यादीनामिति युक्ता शब्देषु व्यवस्थे- त्याशयः ॥ २९ ॥ त० वा०—तुल्यप्रयोगप्रतिपत्तीनामन्यतरावधारणमशक्यमिति चेत् ? अत आह—तत्र तत्त्वमभियोगविशेषात्स्यादिति । कः पुनरभियोगः ? को वा तद्विशेषः ? कथं वा तेन वाचकत्वनिरूपणमिति ? तदुच्यते—लक्षणश्रवणाभ्यासादभियोगः प्रवर्तते । तेन लक्ष्यान्तरज्ञानं तद्विशेषोऽभिधीयते ॥ ८६० प्रतिपदपाठो ह्यानन्त्यादत्यन्ताशक्यः तदभावे च लक्षणानुसरणमेवैकमशेष- लक्ष्यनिरूपणक्षमत्वेनावधार्यते । तस्मान्न लोकवेदाभ्यां कश्चिद् व्याकरणादृते । वाचकाननपभ्रष्टान्न्यथावज्ज्ञातुमर्हति ॥ ८६१ १ ब. इत्यर्थोऽवम्यते । २ ब. गाव्यादि शब्ददर्शनाद्रो ।

२९ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ५८७ तत्सामस्त्यापरिज्ञाने पारिशेष्यानिरूपणात् । अर्थापत्त्याऽपशब्दानां निश्चयो नोपपद्यते ॥ ८६२ लक्षणानुगमाद्यांस्तु बहिरेव प्रयुञ्जते । नियतप्रतिपक्षत्वात्तेष्वर्थापत्तिसंभवः ॥ ८६३ तेनोभयज्ञानस्यापि व्याकरणमेवोपाय इति, तद्गताभियोगविशेषाश्रयणम् । यत्तु प्रयोगोत्पत्तिशास्त्रत्वादिति लक्षणे तन्मूलासंभवादितरेतराश्रयत्वमुक्तम्, तत् लोकव्यवहारप्रसिद्धप्रतिपादकत्वमात्रेणाऽनिर्णीतपारमार्थिकवाचकत्वैरपि व्याकरणावयवभूतैः पदैः केषांचित्साधुत्वमन्वाख्याय, पुनस्तैरप्यन्वाख्यापकशब्द- साधुत्वनिर्णयात्परिहरिष्यते । यदि वाचकतेवाऽऽदौ न स्याद्व्याकरणादृते । न विज्ञायेत वा तत्र भवेदन्योन्यसंश्रयम् ॥ ८६४ विज्ञाते वाचकत्वेऽपि तदपभ्रंशसंकरात् । विवेकप्रतिपत्त्यर्थमिष्टा च व्याक्रिया स्मृतिः ॥ ८६५ तेन संकीर्णासंकीर्णवाचकज्ञानोपायत्वाल्लोकव्याकरणयोर्भिन्नविषयत्वेनाऽ- पुनरुक्तता, वेदे साधुशब्दमात्रदर्शनादनर्थकं व्याकरणमित चेत् ? न । अकृत्स्न- विषयत्वात् । केचिद्व्यवस्थिता एव साधवो लोकवेदयोः । सर्वशाखागतान्विद्यात्को वा साधारणानपि ॥ ८६६ यथैव लौकिकप्रतिपदपाठस्याशक्यत्वम् एवं वेदेऽपि सर्वशाखागतानसकृदपि श्रोतुमशक्तिः, किमुताध्येतुम् । प्रकृतिप्रत्ययानन्त्याद्यावन्तः पदराशयः । लक्षणेनानुगम्यन्ते कस्तानध्येतुमर्हति ॥ ८६७ एतेन पुरुषार्थक्रत्वर्थादृष्टसाधुशब्दप्रयोगज्ञानसाध्यसाधनभावविधिवाक्यगत- पदव्याक्रिया, तस्याश्च पूर्वप्रसिद्धतन्मूलत्वकल्पनागतेतरेतराश्रयत्वप्रसङ्ग प्रत्युक्तः । यदि ह्येकान्तेन 'तस्मान्न ब्राह्मणेन म्लेच्छितवै' 'एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः सुप्रयुक्तः शास्त्रान्वितः स्वर्गे लोके कामधुग्भवति' 'तस्मादेषा व्याकृता वागुद्यते' इति चैवमादिक्रतुपुरुषगतनियमविधिदर्शनोत्तरकालमेव व्याकरणेन प्रवर्तितव्यमिति पौर्वापर्यव्यवस्था भवेत्, तत एवं पर्यनुयोगः प्रसज्येतापि व्याकृतत्वाश्रयो वेदविधिः, वेदविध्याश्रयं च व्याकरणं कथमवकल्पिष्यत इति ? यदा तु किंचिद- ग्रन्थोपनिबद्धप्रकृतिप्रत्ययादिविभागद्वारप्रक्रियात्मकव्याकरणस्मृतिवर्जितकाला - भावादन्वाख्यानानन्वाख्येयान्वाख्यातविधिप्रयोगानन्वाख्यातप्रतिषेधवर्जनषट्कस्या-

५८८ मीमांसादर्शनम् [ सू० ॰प्यवगम्यमानवेदविधिमूलत्वादनादित्वे सति, सर्वेषां वेदवेदि १यूपा हवनीयाध्वर्युगो- दोहनादिस्वरूप-तत्कार्य-तत्साधनविधीनामिव सर्वदाऽनवगतपूर्वापरविभागसम्बन्धेऽ- त्यन्तादृष्टार्थत्वमेव केवलं शास्त्रप्रत्ययाधीनम्, तदा सर्वकालव्याक्रियमाणविद्यमान- शब्दनियमविधेर्न किंचिदनुपपन्नम् । यत्तु वाचकत्वावाचकत्वव्यतिरिक्तसाध्वसाधुताभावाद्वाचकावाचकत्वयोश्च लौकिकप्रयोगप्रतिपत्तितद्विपर्ययमात्रशरणत्वाद् गाव्यादिशब्दानामवाचकत्वप्रतिज्ञाने लोकविरोधान्न भेर्यादिशब्दमातृकाक्षरपाठप्रसिद्धन्यूनातिरिक्तविपर्यस्तवर्णपदव्यति- रिक्तप्रसिद्धमध्ये कश्चिदपशब्दो नामास्तीति । तत्राभिधीयते— संमुग्धवाचके लोके लक्षणाद्वाचकः स्फुटः । गम्यते स्मरणं चोक्तमाचाराद्बलवत्तरम् ॥ ८६८ लोकव्याकरणाभ्यां हि मिश्राभ्यामविप्लुतवाचकसिद्धिरिति, तावदेव लोक- व्यवहाराद्वाचकत्वज्ञानं जायते, यावद्व्याकरणानुगतत्वं नाभ्युपगम्यते । यदा तु तयोर्मार्गभेदेन प्रतिपत्तिः तदा 'तेष्वदर्शनाद्विरोधस्य समा विप्रतिपत्तिः स्यात् १-३-८' इत्युपन्यस्य 'शास्त्रस्था वा तन्निमित्तत्वात् १-३-९' इत्यने- नैवोत्तरेण व्याकरणाख्यशास्त्रगतप्रतिपत्तिबलीयस्त्वम्, तदभियुक्तपुरुषबलीयस्त्वं वापूर्वमेव स्थापितम् । तर्केणावाचकत्वं च वदल्लोकेन बाध्यते । स्मर्यमाणविरोधस्तु ब्राह्मणाब्राह्मणादिवत् ॥ ८६९ यथैव तुल्यशिरः पाण्याद्याकारेष्वपि संकीर्णलोकदृष्टिग्राह्येषु ब्राह्मणादिषु मातापितृसम्बन्धस्मरणादेव वर्णविवेकावधारणं भवति, तथा साधुशब्दावधारण- मपीतिलोकविरोधाभावः । यथा च तुल्यपाण्यादिरूपत्वाद्वर्णसंकरम् । वदतः स्मृतिबाधः स्यात्तथा वाचकसंकरम् ॥ ८७० आदितश्च स्मृतेः सिद्धः प्रत्यक्षेणापि गम्यते । साध्वसाधुविभागोऽयं कुशलैर्वर्णभेदवत् ॥ ८७१ यो नाम स्मृतिप्रतिपादितोऽर्थः कर्मफलसम्बन्धवदनियतकालत्वान्न ज्ञायते, कदा भविष्यतीति, सोऽत्यन्तं प्रत्यक्षाद्यविषयत्वात्केवलशास्त्रमूलत्वेन स्थाप्यते। यस्य त्वादौ स्मरणजनितविवेके कृते तदनन्तरमेव प्रत्यक्षमपि विचाराभ्यास- १ क. वेदी ।

२९ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ५८९ जनितसंस्कारस्य रागा१भ्यासजनितषड्जादिविभागविषयमिव साध्वसाधुशब्द- रूपगोचरमुपजायते । तस्मै तर्केण यो नाम साधयेच्छब्दसंकरम् । तस्य प्रत्यक्षबाधोऽपि वर्णसंकरबाधवत् ॥ ८७२ तेनापशब्दगतवाचकत्वापादनस्यैव समस्तप्रमाणविरोधः शक्यो वक्तुम्, न स्मर्यमाणशब्दसाधुत्वपक्षस्येति निरवद्यता । तेनादृष्टार्थप्रत्यायननियमप्रतिषेधद्वारं धर्माधर्मसाधनत्वकृतमपि साध्वसाधुत्वज्ञानमुपपत्स्यते । यस्त्वाह साधुत्वं नेन्द्रियग्राह्यमित्यादिश्लोकम् । भर्तृहरिणा वाक्यपदीयेऽभिहितस्य अर्थस्योपन्यासनिरसौ तं प्रत्येवं वक्तव्यम् । साधुत्वमिन्द्रियग्राह्यं लिङ्गमस्य च विद्यते । शास्त्रस्य विषयोऽप्येष प्रयोगोऽप्यस्त्यसंकरः ॥ इति । ८७३ ग्रस्तनिरस्ताम्बूकतादिदोषवर्जितनियमह्रस्वादिकालाभिव्यङ्ग्ययथालक्षित- क्रमग्राह्यवर्णानां स्मर्यमाण।विनष्टावाचकरूपविषयश्रोत्रज्ञानेनोदात्तादिवदिन्द्रिय- ग्राह्यत्वम् । तदुत्तरकालप्रवृत्तव्यवहारगतार्थप्रतिपत्तिसहितलक्षणगतप्रकृतिप्रत्यय- लोपागमविकारादेशादिलिङ्गमप्यव्यभिचारि विद्यते । साधुनियमप्रयोगनियमयोरभ्युपगमे पूर्वोक्तदोषपरिहारः शास्त्रस्य च द्विविधस्यापि श्रुतिस्मृतिरूपस्य स्वर्गलोकयज्ञोपकारसिद्धिसाधन- भावप्रतिपादनाथं स्यार्थानर्थकार्यस्वरूपज्ञानार्थस्य चायमेवंविविध एवान्योऽपि विषयः । अविनष्टैः शब्दैर्भाषमाणस्य स्वर्गयज्ञोपकारौ भवतः । यज्ञे च कर्मण्यप- शब्दैर्भाषमाणस्यानृतमिव वदतः प्रतिषिद्धाचरणनिमित्तक्रतुवैगुण्यप्रसङ्गः । यथोक्तं “वाग्योगविद् दुष्यति चापशब्दैः” इति । एतौ द्वावप्यर्थौ न शास्त्रादृतेऽन्येन प्रतिपादयितुं शक्येते इति अतीवशास्त्रविषयः । द्वाभ्यामेव च विधिप्रतिषेधाभ्या- मविनष्टैः शब्दैः स्वर्गयज्ञोपकारकामो भाषेत न विनष्टैरिति, न प्रतिशब्दाप- शब्दमनन्तविधिप्रतिषेधकल्पनप्रसङ्गः । विधि-निषेधशेषतया स्वरूपप्रतिपादनपरस्यादिशास्त्रत्वम् न च विधिप्रतिषेधविषयेणैव शास्त्रेण भवितव्यम्, न प्रमेयस्वरूपज्ञानापनार्थें- नेत्येतदीश्वराज्ञासिद्धम् । न हि 'अविनाशी वा अरे अयमात्माऽनुच्छित्तिधर्मा' इत्यादि 'चतुस्त्रिंशदाश्वीनानि, सरस्वत्या विनशनप्लाक्षप्रस्रवणे' इत्येवमादि- १. रागाभ्याय ।

पादने शास्त्रशब्दवाच्यत्वबाधः१ ।

५९० मीमांसादर्शनम् [ सू० वाक्यशेषाणाञ्च शास्त्रगतानामर्थतत्त्वप्रतिपादनपरत्वं न लभ्यते । नापि तत्प्रति- पादने शास्त्रशब्दवाच्यत्वबाधः१ । अथापि विधिप्रतिषेधात्मकेनैव शास्त्रेण भवितव्यमिति काचित्परिभाषा । तथाऽप्येवंविधाः साधुशब्दाः प्रत्येतव्या इतीदृशो विधिः संभवत्येव । यो२ वाक्यान्तरावगतादृष्टफलार्थी यद्यविनष्टैः शब्दैर्भाषितुमिच्छेत्, स चैतानेवंरूपाने- तत्क्रममात्रांश्च वर्णानुपाददीत, नाधिकान्न न्यूनांश्चेति यावद्रूपं विधिप्रतिषेधौ शक्यौ दर्शयितुमिति, शास्त्रविषयत्वसिद्धिः । निःसन्दिग्धवृद्धबालप्रयुक्तदेवदत्त- तत्तादिशब्दोपमयाऽपि च सर्वशब्दानां विनष्टाविनष्टरूपैरवश्यं भवितव्यमिति शक्यं विज्ञातुम् । एवं व्याकरणानुगतवैदिकशब्दाविनाशसादृश्यादपि तद्विध- लौकिकाविनष्टत्वोपमानं दर्शयितव्यम् । अर्थपत्त्याऽपि साधुत्वसमर्थम् तथा लौकिकार्थप्रत्ययोत्थापितवाचकत्वार्थापत्तिलभ्यस्तावदेकः साधुत्व- निश्चयः । ततः संभवत्प्रमादालस्यकरणवैगुण्यनिमित्तापभ्रष्टरूपवर्जितकेवलसाध्व- न्वाख्यानस्यान्थानुपपद्यमानत्वादपरयाऽप्यर्थापत्त्या सिद्धमेव साधुत्वज्ञानम् । अपभ्रंशेषु साधुत्वं तुल्यार्थत्वादुच्यते । लक्षणाभावमार्गेण तस्याभावोऽपि निश्चितः ॥ इति ॥ ८७४ षण्णामपि प्रमाणानां साध्वसाधुत्वनिर्णये । व्यापारोऽस्तीति को जल्पेत्साधुत्वं निष्प्रमाणकम् ॥ ८७५ यद्यप्यनभियुक्तानां प्रयोगोऽस्ति ससंकरः । अभियुक्ता विवेक्ष्यन्ते तथाऽपि ब्राह्मणादिवत् ॥ ८७६ यथा च पद्मरागादीन्काचस्फटिकमिश्रितान् । परीक्षका विजानन्ति साधुत्वमपरे तथा ॥ ८७७ यथा रत्नपरीक्षायां साध्वसाधुत्वलक्षम् । तथा व्याकरणात्सिद्धं साधुशब्दनिरूपणम् ॥ ८७८ पौरुषेयव्याकरणागमपरम्परायामपि च तदनुगतसाधुत्वानन्तरदर्शनात् पूर्वदृष्टविवेकज्ञानमात्रपरत्वाद्वा नान्धपरम्परावचन्त्यायप्रसङ्गः । यावानिह दृष्टांशः स वैदिकविधिप्रतिषेधद्वयादेवोपपन्नः । तत्सिद्ध्यर्थाविनिष्टरूपाज्ञानं वेदशिष्टप्रयोगसंवादिव्याकरणान्वाख्यानपारम्पर्येण सद्यः फलत्वात्सुलभमिति न पुरुषकृतत्वनिमित्तदोषप्रसङ्गः । १. क. वाच्यत्वं बाघः । २. क. यद्वाक्यान्तरा ।

२९ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ५९१ यत्तु दृष्टार्थत्वात्स्वसामर्थ्यप्राप्तत्वादेव 'अप्राप्ते शास्त्रमर्थवत्' ६-२-४ इति वाचकभाषणविधानमनुपपन्नमिति तत्राधिकरणेनेवोत्तरं 'नियमाार्था¹ वा श्रुतिरुच्यते' ४-२-२३ इति । यत्त्ववाचकत्वेनापशब्दानामप्रसङ्गाद्व्यावर्त्याभावे नियमानुपपत्तिरिति । तत्रोच्यते—नियमः परिसंख्या वा न व्यावर्त्यादृतेनेष्यते । नित्यतामात्रकारी तु नियमः किं न लभ्यते ॥ ८७९ सति भाषितव्ये कदाचिदविनष्टेन भाषेत, कदाचित्प्रमादाशक्तिजापभ्रंशेना- प्यक्षिनिकोचनादिना वा शब्दरहितेनैव प्रत्यापयेत् । अत्र श्रेयोऽर्थिनोऽवश्यं साधुभाषा नियम्यते । नियोगेन हि तां कुर्वन्नपूर्वं साधयिष्यति ॥ ८८० यद्यपि च नियमेऽन्यनिवृत्तिरवश्यं कल्पनीया, तथाऽपि साधुशब्दस्मृतिव्य- वहितानां कालरूढरूपभ्रान्तिवाचकत्वगृहीतानां चापशब्दानां संभवति² प्रयोगप्र सङ्गे साधुनियमेन व्यावृत्तिः । अथ वा नैवापशब्दानमंपृथक्त्वे केचिदेकक्रियाविषयानेकद्रव्यगुणादिवद- भिधायां प्राप्नुवन्ति ये साधुनियमेन व्यावर्त्येरन् । किं तु--साधूनेव प्रयुञ्जाना नाशयेयुरयत्नतः । मा³ विनीनशदित्येवं नियमस्तान्नियच्छति ॥ ८८१ तद्यथा 'यो विदग्धः, स नैर्ऋतः' इत्येवमादिदोषनिन्दापूर्वकम् 'अविदहता श्रपयितव्यः' इति नियम्यते, तथा 'दुष्ट शब्दः स्वरतो वर्णतो वा' इत्यादिना निन्दितत्वात्, 'तस्माद् ब्राह्मणेन न म्लेच्छितवै नापभाषितवै म्लेच्छो ह वा एष यदपशब्दः' इति प्रमादादिनिमित्तविनाशेन शब्दकार्यादर्थसाधनादपेतोऽयं म्लेच्छः, 'म्लेच्छ अव्यक्तायां वाचि, इति स्मरणात्स न प्रयोक्तव्य इति प्रतिषेधः । 'तस्मादेषा व्याकृता वागुद्यते' इति च विधिरविनष्टप्रयोगनियमार्थः । ननु चाशक्तिजा दोषाः प्रमादजनिताश्च ये । परिहर्तुमशक्यत्वान्निषेधस्याप्यगोचराः ॥ ८८२ उच्यते—प्रमादमेव मा कार्षीः सामर्थ्याय यतस्व च । एवमर्थो निषेधोऽयं नाऽऽद्रियेताऽन्यथा ह्यसौ ॥ ८८३ अन्ये सुखमुखारूढा न क्लेशेन विवक्षवः । शक्ताश्चैवाप्रमत्ताश्च वदेयुरनिवारिताः ॥ ८८४ १. क. नियमाार्था श्रुति । २. क. सम्भविनि । ३. क. माविनोनश ।

तृतीयोक्तिक्रियागम्यगुणभावेऽपि वक्तरि ।

५९२ मीमांसादर्शनम् [ सू० अशक्तैर्नाशिताश्चान्ये दाक्षिण्याद्यनुवर्तनात् । जानन्तोऽपि प्रयुञ्जीरन् यदि शास्त्रं न वारयेत् ॥ ८८५ अन्येऽपि प्राकृतालापैरशक्तैर्व्यवहर्तृभिः । सह व्यवहरन्तस्तानुपेत्यापि प्रयुञ्जते ॥ ८८६ तत्कथं नाम यत्किञ्चित्स्यादपभ्रंशकारणम् । दूरात्परिहरेयुस्तदिति यत्नो नियम्यते ॥ ८८७ यत्तु दृष्टार्थप्रत्ययाननिराकाङ्क्षत्वाददृष्टार्थप्रयोगोत्पत्त्याशास्त्रत्वमिति । तत्रोच्यते—दृष्टे सत्यपि सर्वत्र नियमाददृष्टमिष्यते । क्रत्वर्थं १पुरुषार्थं च तत्संयोगपृथक्त्वतः ॥ ८८८ 'एकस्य तूभयत्वे संयोगपृथक्त्वं' ४-३-५ तच्चेह प्रकरणानारभ्यवादाभ्याम- वगतम् । तत्र— क्रत्वर्थांशे परार्थत्वादर्थवादः फलश्रुतिः । पुरुषार्थे तु निर्देशात्फलमात्रेयदर्शनात् ॥ ८८९ क्रत्वर्थं ह्यनिर्ज्ञातोपायत्वात्सर्वादृष्टोपसंग्रहक्षममिति नियमापूर्वमात्मसात्कुर्व- त्पुरुषार्थांशे फलश्रुतिमर्थवादीकरोति । पुरुषार्थस्य नियमस्य त्ववश्यकल्पनीय- प्रयोजनत्वादर्थप्रतिपत्तेश्चापभ्रंशेऽप्यक्षिनिकोचादिभ्यो वा सुतरां सिद्धत्वादनाका- ङ्क्षितनियमापूर्वोेपजीवनसामर्थ्यं नास्तीत्यवश्यमर्थवादोपात्तमेव स्वर्गलोके काम- धुग्धाग्धेव फलत्वेनाऽऽश्रयणीयम् । यत्तु न ज्ञायते क्वेदं नियमापूर्वमाश्रितमिति, तत्राभिधीयते— नियमापूर्वस्याश्रयनिरूपणम् क्रत्वर्थं तावदङ्गेषु तदर्थेष्वेव संश्रितम् । अनङ्गत्वाभिधानार्थं स्यात्क्रत्वर्थं नराश्रितम् ॥ ८९० 'प्रकरणविशेषाद्वा तद्युक्तस्य तत्संस्कारो (४-३-१८) द्रव्यवत्' इति हि ज्योति- ष्टोमप्रकरणगतब्राह्मणशब्दलक्षिततदपूर्वसाधनयजमानसंस्कारत्वात्साधुभाषणनिय- मापूर्वस्य । 'याजमानास्तु तत्प्रधानत्वात्कर्मवत्' (३-८-२) इत्यनेन न्यायेन फल- प्रतिग्रहणयोग्यत्वाधानार्थं तदाश्रितमेव विज्ञायते । पुरुषार्थवाक्येऽपि सम्यग्ज्ञात- सुप्रयुक्तत्वाक्षिप्तज्ञातृप्रयोक्तृपर्युपस्थापनात्क्रियाफलयोश्च तद्गामित्वात्प्रधानया- गाद्यपूर्ववदेव ज्ञातृप्रयोक्त्राश्रितं निष्पद्यते । तत्रैव दृष्टान्तप्रदर्शनम् तृतीयोक्तिक्रियागम्यगुणभावेऽपि वक्तरि । संस्कार्यत्वात्प्रधानत्वं स्यात्प्रयाजाज्यशेषवत् ॥ ८९१ १. क. पृथक्त्वंकारणं ।

९ ] प्रथमाध्याये तृतीयपाद। ५९३ तथैव 'प्रयाजशेषेण हवींष्यभिधारयति' इत्ति सत्यपि शेषस्य तृतीयानिर्देशे, कार्योपयोगित्वात्संस्कार्यत्वावधारणम् । एवं ब्राह्मस्यापीत्यदोषः । यदि वा ब्राह्मणेनेति तृतीया यागकारिणी । कामधुक्शब्दयोगाच्च बहिःप्राधान्यकल्पना ॥ ८९२ नैव म्लेच्छनकारित्वात्तृतीयेयं प्रतीयते । कुर्वता यागमित्येवं ब्राह्मणेनेति योज्यते ॥ ८९३ यागे यो गुणभावश्च संस्कारे सा प्रधानता । न ह्यारादुपकारित्वं संयुक्तस्योपयोगिता ॥ ८९४ तच्चोपयोगित्वं प्रकरण-तृतीयाविभक्तिश्रवणाभ्यामवगतं शेषस्वीकरणसमर्थं भवति । बाह्यपुरुषार्थत्वेऽपि कामधुक्शब्दस्य पुरुषोपभोग्यकाम्यमानार्थसाधन- वचनत्वात्पुरुषप्राधान्यप्रतिपत्तिः१ । यद्यपि च साधुशब्दोच्चारणमुच्चारयित्रर्थम्, क्रत्वर्थं च न भवति, तथाऽपि तद्गतनियमप्रतिषेधयोरेव क्रत्वर्थपुरुषार्थत्वे भविष्यतः । न हि यदर्थे कर्मणि यो नियमप्रतिषेधो, तावेव केवलौ तदर्थौ भवतः । तथा हि—स्त्रद्युपायमांसभक्षादिपुरुषार्थमपि श्रितः । प्रतिषेधः क्रतोरङ्गमिष्टः प्रकरणाश्रयात् ॥ ८९५ क्रत्वर्थात्खादिराच्चेष्टा वीर्यसिद्धिविधानतः । भोजनाच्चाप्यतिथ्यर्थात्पूर्वं दातृसंश्रितम् ॥ ८९६ अतश्च परार्थोच्चारणाश्रितावपि नियमप्रतिषेधौ स्वप्रयोजनाकाङ्क्षावेलायां संनिहितपुरुषप्रधानौ विज्ञायेते । अतश्च वेदमूलत्वे सत्येवं प्रतिपादिते । प्रयोगोत्पत्त्यशास्त्रत्वं यदुक्तं तदसत्कृतम् ॥ ८९७ यच्चास्य कृतिमत्त्वेन स्वतः शास्त्रत्वबाधनम् । तत्प्रसिद्धिविरुद्धं स्यादचन्द्रशशिवाक्यवत् ॥ ८९८ शास्त्रशब्दस्य रूढ्या योगेन च व्याकरणस्य ग्रहणम् शास्त्रशब्दो यदि तावद्रूढः ततश्चतुर्दशसु तावद्विद्यास्थानेषु शास्त्रस्थानामेव प्रसिद्धः तदन्तर्गतत्वाच्च व्याकरणस्य शास्त्रत्वनिराकरणानुपपत्तिः । अथापि शिष्यतेऽनेनेति शास्त्रत्वमन्वर्थमिष्यते, तथाऽपि व्याकरणेन साधुशब्दाः शिष्यन्ते, तदनुगमोपाया वा प्रकृतिप्रत्ययादयः तदभियुक्तशिष्यजनो वेति सर्वथा शास्त्र- शब्दप्रवृत्तिरविहता । १. क. पुरुषोपयोग्य । ३८

५९४ मीमांसादर्शनम् [ सू० प्रसिद्धमपि शास्त्रत्वं यस्तु तर्केण वारयेत् । वेदस्यापि स नित्यत्वाद् व्योमवद्वारयिष्यति ॥ ८९९ सदृष्टान्तं व्याकरणस्य शास्त्रत्वनिषेधे परिहारकथनम् यथैव हि व्याकरणादीनां कृत्रिमकाव्योपनिबन्धसाधर्म्याच्छास्त्रत्वं प्रतिषेद्धुम- ध्यवसीयते, तथाऽऽकाशादिकालात्मनां१ परमाणुदृष्टान्तबलेन नित्यत्वाद्वेदशास्त्र- त्वमप्ययत्नेनैव क्रियेत । यो हि नागरिकभाषाभिज्ञतया ग्रामीणैर्मातापितरावपि शुक्लवचनैरभिदधीत, स केनान्येन वार्येत । परत्राविनयं कुर्वन्पितृभ्यां वार्यते सुतः । तयोरेवाविनीतस्य को भवेद्विनिवारकः ॥ ९०० तथा बहिरसंबद्धं वदन्वेदेन वार्यते । साङ्गेन तं पुनर्निघ्नन्केनान्येन निवार्यते ॥ ९०१ क्रुद्धो यो नाम यं हन्ति स तस्याङ्गानि कृन्तति । कृत्ताङ्गस्य२ ततस्तस्य विनाशः कियता भवेत् ॥ ९०२ तेन त्रयी द्विषन्पूर्व वेदाङ्गान्येव लुम्पति । ततस्तेनैव मार्गेण मूलान्यस्य कृन्तति ॥ ९०३ श्रुतिस्मृतिप्रमाणत्वे हेतुपूर्वं निरूपिते । अङ्गानामप्रमाणत्वमशास्त्रत्वं च को वदेत् ॥ ९०४ व्याकरणस्य स्मृतिभिर्वैषम्येऽपि वेदमूलत्वेन व्याकरणान्तरेण साम्यम् यत्त्वितरस्मृतीनां प्रायेण सारूप्याद्व्याकरणस्य तद्विलक्षणत्वात्तन्मध्यपा- तित्वमसंभाव्यमिति । तत्रोच्यते—सर्वधर्मसूत्राणां वर्णाश्रमधर्मोपदेशित्वाद्धर्माणां चैकरूपप्रायत्वात्परसंवादित्वं युक्तम् । व्याकरणस्य त्वन्य एव साधुशब्दतत्त्वनिर्ण- यरूपो विषयः । तत्रास्य व्याकणान्तरेणैव संगतिः स्यात् न धर्मसूत्रैः । स्मृतित्वं त्वङ्गानाम्, धर्मसूत्राणां चाविशिष्टम् । अथापि स्मृतिशब्देन नाङ्गानामभिधेयता । तथाऽप्येषां न शास्त्रत्वप्रमाणत्वनिराक्रिया ॥ ९०५ पुराणं मानवो धर्मः साङ्गो वेदश्चिकित्सितम् ॥ ९०६ इति हि तुल्यवत्प्रामाण्यस्मरणम्— अपि वा कर्तृसामान्यादुक्तो न्यायश्च यः स्मृतेः । प्रमाणत्वे समानोऽसौ वेदाङ्गेष्वपि गम्यते ॥ ९०७ १. क. कालात्मनः । २. क. कृन्ताङ्गस्य ।

सूत्र-वार्त्तिक-भाष्यकाराणां विगानस्य परिहारः

२९ ] प्रथमाध्याये तृतीयपाद। ५९५ प्रमाणषट्कमूलत्वं पूर्वं चैषां प्रदर्शितम् । दृष्टादृष्टफलत्वेन तस्मान्नास्त्यप्रमाणता ॥ ९०८ एकस्य च यदा युक्त्या समूलत्वं निरूपितम् । पौरुषेयान्तरग्रन्थमूलताऽपि तदेष्यते ॥ ९०९ असंभावितमूलं हि पौरुषेयं यदुच्यते । मूले तस्याप्रतिष्ठत्वं रूपे जात्यन्धवाक्यवत् ॥ ९१० इह तु समूलत्वादेकान्तरितप्रामाण्यसिद्धिः । सूत्र-वार्त्तिक-भाष्यकाराणां विगानस्य परिहारः यत्तु सूत्रवार्तिकभाष्यकाराणामन्योन्यविगीतवचनत्वादप्रमाणत्वमिति । तत्राभिधीयते— स्मृतीनामप्रमाणत्वे विगानं नैव कारणम् । श्रुतीनामपि भूयिष्ठं विगीतत्वं हि दृश्यते ॥ ९११ विगीतवाक्यमूलानां यदि स्यादविगीतता । तासां ततोऽप्रमाणत्वं भवेन्मूलविपर्ययात् ॥ ९१२ मूलानुरूप्येण हि स्मृतीनां प्रमाणत्वं तदविगानेन— परस्परविगीतत्वमतस्तासां न दूषणम् । विगानाद्धि विकल्पः स्यान्नैकत्राप्यप्रमाणता ॥ ९१३ धर्मसाधनतांशे च विगानं नैव विद्यते । अन्वाख्यानविगानं तु लक्ष्यभेदान्न दुष्यति ॥ ९१४ सूत्रप्रत्याख्यानस्य समाधानम् पुनरुक्तत्वादिना हि यत्सूत्रप्रत्याख्यानम्, तस्य च पुनः समाधानम् । यस्यावैदिकमूलत्वान्न किंचिदपि दुष्यति । ये चापीष्ट्युपसंख्याने ते च स्मृत्यन्तराश्रिते ॥ ९१५ न चाधिकोपसंख्यानान्न्यूनस्यास्त्यप्रमाणता ॥ ९१६ तद्यथा—वाजसनेयिशाखायामाध्वर्यवं चरकशाखासु च बह्वित्येतावता नाल्पविषयप्रमाणीकुर्वन्ति । तस्मादयमपि न दोषः । यस्तु सूत्रकारस्य प्रयोजनानभिधानोपालम्भः । स श्रुतिस्मृतिसिद्धत्वान्नोपालम्भत्वमर्हति । ग्रन्थान्ते च स्वसंवेद्यं सुज्ञानं तत्प्रयोजनम् ॥ ९१७

५९६ मीमांसादर्शनम् [ सू० सत्यं ब्रूयादित्यास्मृतिविहितस्य सत्यद्वयस्य निर्वचनम् सत्यवचनं च सर्वश्रुतिस्मृतिषु स्वर्गसाधनत्वेन, यागसाधनत्वेन च नियतम् । सत्यं च द्विविधं शब्दसत्यम्, अर्थसत्यं च । तत्र यथैव यथावस्थिताविप्लुतार्थ- वचनं श्रेयःसाधनम्, एवं यथावस्थितशब्दसत्यवचनमपि, यथा चार्थसत्यविपर्ययः प्रत्यवायाय एवं विनियोगकालप्रयुक्तशब्दानृतवचनमपि । शब्दसाधुत्वज्ञानं च व्याकरणाभियोगविशेषादित्युक्तम् । तस्माद्विज्ञायमानत्वान्नोक्तं मूलकृता स्वयम् । शास्त्रेण सर्वशब्दाना मन्वाख्यानप्रयोजनम् ॥ ९१८ न च व्याकरणप्रयोजनाभिप्रायं प्रति केचिद्विवदन्ते । स त्वभिप्रायः किं न्याय्यः नेत्यर्थान्तरमेतत् । धर्माय नियमं चाऽऽह वाक्यकारः प्रयोजनम् । वेदमूलस्तु तत्रैक एको व्याकरणाश्रयः ॥ ९१९ साधुनियमप्रयोगनियमार्थाय व्याकरणम् नियमद्वयप्रयुक्तं व्याकरणम् । साधुशब्दज्ञानात्तत्पूर्वप्रयोगाद्वा । स्वर्गयज्ञोप- कारसिद्धिरित्येतत्तावद्वेदमूलम्, अनन्यप्रमाणकत्वात् । अतश्चायं तावद्वेदाख्येन शास्त्रेण धर्मनियमः । तथा व्याकरणाख्येन साधुरूपं नियम्यते । अविशेषेण सिद्धि स्याद्विना व्याकरणस्मृतेः ॥ ९२० तेन वेदावगतसम्यग्ज्ञात्साधुशब्दप्रयोगात्मकधर्माङ्गत्वेन व्याकरणप्रक्रिये- तिकर्तव्यतया नित्यवाचकशब्दरूपज्ञाननियमः क्रियते । वार्त्तिकभाष्यकारयोः परिहारं कृत्वाचिन्तान्यायेन यच्च कात्यायनेन ज्ञाने धर्म इति चेत्तथाऽधर्म इति तन्त्रेण, प्रसङ्गेन वाऽप- शब्दज्ञानादधर्मत्वापत्तिदोषमभिधाय¹, शास्त्रपूर्वप्रयोगेऽभ्युदय इति निःश्रेयस- सिद्धयुपायेऽवधारिते, यत्पुनः परावृत्य भाष्यकारेणोक्तम्, 'अथ वा पुनरस्तु ज्ञाने धर्म इत्याभ्युपेत्यवादमात्रम्, तत्-पूर्वोक्तदोषपरिहारसामर्थ्यप्रदर्शनाथं कृत्वाचिन्तान्यायेनोक्तम् । परमार्थतस्त्वन्यानर्थक्यप्रसङ्गविज्ञातपाराथ्र्यपादितार्थ- वादत्वात्फलश्रुतिर्न फलप्रतिपत्तिक्षमा विज्ञायते । यथा 'योऽश्वमेधेन यजते य उ चैनमेवं वेद' इति ज्ञानमात्रादेव ब्रह्महत्यातारणं यदि सिद्ध्येत्, को जातुचिद्बहु- द्रव्यव्ययायाससाध्यमश्वमेधं² कुर्यात् । तद्विधानं चानर्थकमेव स्यात् । एवं शब्द- १ क. वापशब्दज्ञानादपधर्मत्वापत्ति । २ क. क्षयव्यया ।

२९ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ५९७ ज्ञानाच्चेद्धर्मः सिध्येत्, को नामानेकतालवादि व्यापारायासखेदमन्ुभवेत् । तस्मात्क्रतुवदेव ज्ञानपूर्वप्रयोगस्यैव फलं कारणे कार्यवदुपचारात्तण्डुले देववर्षण- वज्ज्ञाने धर्मवचनमापादिताधर्मपरिहाराभिधानशक्तिमात्रप्रदर्शंनार्थमेवोप न्यस्तम्, न फलवत्त्वप्रतिपादनाय। 'द्रव्यसंस्कारकर्मसु परार्थत्वात्' (४-३-१) इत्यनेन न्यायेन ज्ञानस्य पुरुषशब्दसंस्कारत्वेन निराकाङ्क्षस्य फलसम्बन्धासम्भवात् । आत्मज्ञानस्याभ्युदय-निःश्रेयसफलकत्वेन अप्रकरणस्थत्वेनार्थवादत्वमितिवर्णनम् सर्वत्रैव हि विज्ञानं संस्कारत्वेन गम्यते । पराङ्गं चाऽऽत्मविज्ञानादन्यत्रेत्यवधारणात् ॥ ९२१ आत्मज्ञानं हि संयोगपृथक्त्वात्क्रत्वर्थपुरुषार्थत्वेन ज्ञायते तेन विना परलोक- फलेषु कर्मसु प्रवृत्तिनिवृत्यसम्भवात् । तथा 'य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः' तथा 'मन्तव्यो बोद्धव्यः' 'तथाऽऽत्मानमुपासीत' इति कामवाद-लोकवाद-वचनविशेषैर्जिज्ञासामनन सहितात्म- ज्ञानकेवला वबोधपर्यन्त स्पष्टात्मतत्त्वज्ञान विधानापेक्षितवाक्यान्तरोपात्तद्विविधाभ्यु- दयनिःश्रेयसरूपफलसम्बन्धः, 'स सर्वांश्च लोकानाप्नोति, सर्वांश्च कामानाप्नोति तरति शोकमात्मवित्, तथा स यदि पितृलोककामो भवति, संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति, तेन पितृलोकेन संपन्नो महीयते' इत्यादिना योगजन्याणि- माद्यष्टगुणैश्वर्यफलानि वर्णितानि । तथा 'स खल्वेवं वर्तयंन्यावदायूषं ब्रह्मलोकमभिसंपद्यते, न स पुनरावर्तंते' इत्यपुनरावृत्यात्मकपरमात्मप्राप्त्यवस्थाफलवचनम् । अप्रकरणगतत्वेनानैक‍ान्तिक- क्रतुसम्बन्धासम्बन्धाच्च नाञ्जन-खादिर-स्रुव-वाक्यादिफलश्रुतिवदर्थवादत्वम् । न च ज्ञानविधानेन कर्मसम्बन्धवारणम् । प्रत्याश्रमवर्णनियतानि नित्यनैमित्तिककर्माण्यपि पूर्वकृतदुरितक्षयार्थमकरण- निमित्तानागतप्रत्यवायपरिहारार्थं च कर्तव्यानि । न च तेषां भिन्नप्रयोजनत्वाद् भिन्नमार्गत्वाच्च बाध-विकल्प-परस्पराङ्गाङ्गिभावाः संभवन्ति । शब्दज्ञानस्य त्वेकान्तेन प्रयोगाङ्गत्वात्पूर्वतरभावित्वाच्च न पृथक् फलसम्बन्धसम्भव इति ज्ञान- पूर्वप्रयोगफलवत्त्वमेव निश्चीयते । अदिमद्वयाकरणस्यानादिविधिमूलकत्वं व्यवहारनित्यतामादायोपपत्तिः यत्त्वादिमद्वयाकरणज्ञानतत्पूर्वकप्रयोगफलसम्बन्धोऽनादिविधिमूलो नावकल्पत इति । तत्र यूपाधिकरणवद्व्याकरणपरम्परानादित्वादन्ुपालम्भः । 'तस्मादेषा व्याकृता' इति च व्याकरणव्यवहारनित्यत्वमुक्तम् ।

५९८ मीमांसादर्शनम् [ सू० न चैषा सम्प्रदायेन व्याकृतेत्यभिधीयते । तत्र ह्युच्यत इत्येव व्याकृतेति तु निष्फलम् ॥ ९२२ यद्यपि च मनुना पङ्क्तिपावनमध्ये वेदादेवोपलभ्योक्तं ‘यश्च व्याकुरुते वाचं यश्च मीमांसतेऽध्वरम्’ इति । तेनापि पूर्वपश्चादुक्ताधीतवेदत्व-यज्ञमीमांसन- व्यतिरिक्तविषयेण सताऽवश्यमेतदेव व्याकरणज्ञानमाश्रयितव्यमिति तन्नित्यत्व- सिद्धिः ॥ २७-२८-२९ ॥ (इति व्याकरणाधिकरणम् ॥ ८ ॥) न्या० सु०—भाष्यकृता पदोत्तरत्वेन सूत्रं व्याख्यातुं कथं पुनरित्याशङ्कितम् । तद्व्याचष्टे—तुल्येति । ततश्च पुनरपि अगृह्यमाणविशेषत्वात् सर्वेषां वाचकत्वमापद्येते- त्याशयः । शक्यमित्याहेति भाष्येणैतदाशङ्कानिरासार्थत्वेनैतत्सूत्रमवतारितं तद्व्याचष्टे— अत आहेति । अत्रार्थिनोऽभियुक्ता भवन्तीत्यादिभाष्येददृष्टार्थिनामार्याणां शब्दार्थविषयादर- विशेषात्तदुपदेशे वाचकत्वावधारणकारणमित्याभाति । तच्च गव्यादिशब्देष्वप्यार्योप- देशतुल्यत्वादयुक्तमितिमत्वाऽर्थविशेषप्रतिपिपादयिषया पृच्छति—कः पुनरिति । अभियोग- तद्विशेषशब्दयोः प्रकृतोपयोगिनमर्थमाह—तदुच्यत इति । शब्दपरोऽभियोग इति निर्देशः । लक्षणस्य व्याकरणस्य यच्छ्रवणम्, तदभ्यासनिमित्तः तं वा विषयीकृत्याभियोगशब्दः प्रवर्त्तते लक्षणश्रवणाभ्यासोऽत्राभियोगशब्देनोक्त इत्यर्थः । यल्लक्ष्यमुदाहरणीकृत्य लक्षण- श्रवणमभ्यस्तं तद्व्यतिरिक्तानान्तुल्यन्यायानां लक्ष्याणां तेन लक्षणश्रवणाभ्यासेन ज्ञान- मभियोगविशेषः फलेन तद्धेतोरभ्यासातिशयस्य लक्षणाल्लक्षणश्रवणाभ्यासातिशयोऽभियोग- विशेष इत्युक्तं भवति । ननु प्रतिपदपाठेनैव वाचकत्वनिरूपणसिद्धेनं लक्षणश्रवणाभ्यासा- तिशयापेक्षेत्याशङ्कां निरस्य तृतीयस्य प्रश्नस्योत्तरमाह—प्रतिपदेति । ननु प्रतिपदपाठस्याभ्यासत्वेऽपि— वेदाङ्गो वैदिकाः सिद्धाः लोकाच्चैव हि लौकिकाः । अनर्थकं व्याकरणमिति न्यायेन लौकिकवैदिकप्रयोगसिद्धत्वाद्वाचकत्वनिरूपणस्य न व्याकरणापेक्षेत्याशङ्कयाह—तस्मादिति । वाचकसामस्त्याज्ञानत्वावाचकत्वनिश्चयोऽपि न सम्भवतीत्याह—तत्साकल्येति । ननु वाचकसामस्त्यज्ञानेऽपि कथमवाचकनिश्चयः स्यादित्या- शङ्कयाह—लक्षणेति । सूत्रार्थमुपसंहरति—तेनेति । सूत्रं व्याख्याय, पूर्वपक्षोक्तानि दूषणानि परिहरिष्यन्पदपूर्वकत्वाच्च वाक्यात्मक- शास्त्रव्यापारसिद्धेरित्यादिनोक्तमितरेतराश्रयमनुभाषणपूर्वकं परिहरति—यत्त्विति । प्रयोगोत्पत्त्यशास्त्रत्वादित्यनेन लक्षणशास्त्रस्य तन्मूलशास्त्रस्य वा लोकप्रसिद्धपदप्रयोगा- दुत्पत्तेः प्रयोगनियामकत्वासम्भवादितरेतराश्रयत्वं यदुक्तम्, तद्यदि तावन्निर्णीतवाचकत्वैः पदैरन्वाख्यानम्, अन्वाख्यानाच्च वाचकत्वनिर्णय इत्येवं रूपमभिप्रेतम् ततो वाचकत्वा- निर्णयेऽपि प्रतिपादकत्वमात्रेणान्वाख्यायकत्वोपपत्तेः सुपरिहरमित्यर्थः ।

२९ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ५९९ ननु च कुत्वं कस्मान्न भवतीत्यादिलक्षणानुगमदर्शनाद्व्याकरणावयवभूतेष्वपि पदेषु साधुत्वनिर्णयेन भाव्यमित्याशङ्क्य—पुनस्तैरेपोत्युक्तम् । अथ लक्ष्याणां शब्दानां साधुत्वे सत्यन्वाख्यानमन्वाख्यानाच्च साधुतेतीतरेतराश्रयमभिप्रेतं तत्राह--यदीति । न त्वेतदस्तीति शेषः। ननु व्याकरणात्प्रागेव साधुत्वज्ञाने व्याकरणानर्थक्यं स्यादित्याशङ्कयाह— निशानेति । श्लोकं व्याचष्टे—तेनेति । ननु लौकिकशब्दानां सङ्कीर्णत्वाद्व्रतवन्वाख्यान- मर्थवद्वैदिकानां त्वसङ्कीर्णत्वादनर्थकमित्याशङ्कते — वेद इति । अनेन च नचाश्रितप्रतिपद- पाठानां लक्षणं न कार्यमित्यादिनोक्तमानर्थक्यं प्रसङ्गात्परिहारायाऽनुभाषितं सर्वसाधु- शब्दानां वेदे प्रयोगे सति व्याकरणानर्थक्यं स्यात्कृत्स्नसाधुशब्दविषयत्वाभावात्तु वेदस्य तदनुगतशब्दान्वाख्यानार्थं व्याकरणं भविष्यतीति परिहरति ॥ २७ ॥ न्या० सु०—भाषायामित्यधिकृत्यानुगतानां लोकविषयत्वाच्छन्दसीत्यधिकृत्यानुगतानां च वेदविषयत्वान्न वेदस्य कृत्स्नविषयतेत्युपपादयति—केष्विदिति । तेन लोकव्यवस्थितानां तावल्लक्षणमर्थवदित्यशयः । कृत्स्नसाधारणसाधुशब्दविषयत्वस्याप्येकस्यां शाखायाम- भावात्सर्वशाखागतानां चाध्ययनाशक्तेः शाखान्तर्गतसाधारणशब्दानामप्यपभ्रंशेभ्यो विवेकाय लक्षणमर्थवदित्याह—सर्वेति । एतदेव विवृणोति — तथैवेति । अशक्तानन्त्यं कारणमाह—प्रकृतीति । इत्थं निर्णीतवाचकत्वैः पदैरन्वाख्यानमन्वाख्यानाच्च वाचकत्व- निर्णय इत्येवं रूपे लक्ष्याणां शब्दानां साधुत्वे सत्यन्वाख्यानमन्वाख्यानाच्च साधुतेत्येवं रूपं वा लक्षणगतेऽन्योन्याश्रये परिहृते यदि कश्चिद्व्याकरणमूलभूतो वैदिको विधिर्व्याकरणा- श्रयो वेदविद्विद्याश्रयं च व्याकरणमित्येवं रूपम् । तस्मान्न ब्राह्मणेन म्लेच्छितवा इत्यादि- लक्षणमूलगतमितरेतराश्रयं ब्रूयात् तत्राह—एतेनेति । पुरुषार्थं यत्स्वर्गे लोके कामधुग्भवतीति प्रतिपादितम् अदृष्टं साध्यं क्रत्वर्थं च ब्राह्मणेन न म्लेच्छितवा इतिज्योतिष्टोमप्रकरणाधीतवाक्यकल्पन्याकृता वागुद्यत इत्यनारभ्या- धीतवाक्यकल्पं वा, यत्साध्यम्, यच्च साधुशब्दप्रयोगाख्यम्, साधुशब्दज्ञानाख्यं वा साधनं तयोर्यत्साध्यसाधनभावविधायकं वाक्यं तद्गतानां शास्त्रान्वितादिपदानां वा या व्याक्रिया, तस्याश्च या पूर्वंप्रसिद्धविधिव्याक्यमूलत्वकल्पना त्वयेष्टा, तस्याश्च तद्वाक्यमूलत्वे वेदविहितः प्राक्सिद्धत्वकल्पनापत्तेस्तदाश्रयो वेदविधिः, तस्याश्च तन्मूलत्वकल्पना तदाश्रया सेतीतरेत- राश्रयत्वस्य यः प्रसङ्गः शक्यते एतेन प्रासाङ्गिकानर्थक्यपरिहारसमाधानस्याबुद्धिस्थेन लक्षण- गतेनेतरेतराश्रयत्वपरिहारन्यायेन प्रत्युक्त इत्यर्थः । एतदेव व्यतिरेकदर्शनपूर्वकं विवृणोति- यदि हीति । अन्वाख्यानं प्रकृत्यादिविभागेनाख्यानम् । अन्वाख्येयाः साधुशब्दाः अन्वाख्या- तानां विधिः—व्याकृता वागुद्यत इत्यादिप्रयोगो व्यवहारकाल इति चतुष्टयं साधुशब्दविषयं ब्राह्मणेन न म्लेच्छितवा इत्यन्वाख्यातानां प्रतिषेधः व्यवहारकाले वर्जनम्, चेत्यसाधुविषयं द्वयमिति षट्कस्याप्यनादित्वे सति सर्वेषामन्वाख्यानादीनां सर्वदाऽनवगतपूर्वापरविभागसम्बन्धे सति यदात्यन्तादृष्टार्थत्वमात्रमेषां शास्त्रीयप्रत्ययाधीनं न स्वरूपम्, तदा सर्वकालव्याक्रिय- माणत्वेन विद्यमानस्य शब्दस्य यो नियमविधिस्तस्येत्यर्थः, निषेधोऽपि विधिशब्देनोपलक्षितः