मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
४२ मुद्राराक्षसम्
वृत्त्या। तेषां भाव इति भृतकृत्य + तल् + टाप्, भृतकृत्यता, ताम्। चन्द्रगुप्त-सहोत्थायिन —चन्द्रगुप्त के साथ उठने-बैठने वाले। ये लोग पहले नन्द के पार्श्व-चर थे, पर अब चन्द्रगुप्त के अन्तरङ्ग बन गए हैं। सह उत्थातुं शीलमेषाम् इति सहोत्थायिन सह—उद् √स्था + णिनि कर्तरि ताच्छील्ये। चन्द्रगुप्तस्य सहोत्थायिन षष्ठी तत्०। परीक्षितभक्तय —परीक्षित भक्ति वाले, जिनकी राजभक्ति की परीक्षा हो गई है। परीक्षिता भक्ति एषाम् इति परीक्षितभक्तयः बहुव्रीहि स०। अत्र 'परीक्षितम्' इति सामान्ये नपुंसकम् यथा 'विदितभक्ति' इत्यत्र। सहाध्यायि—साथ-साथ पढ़ने वाला। सह अधीते इति सह्—अधि √इङ्+ णिनि साधुकारिणि कर्तरि सहाध्यायी। यह 'मित्रम्' का विशेषण होने के कारण नपुंसकलिंग है। औशनस्याम्—शुक्राचार्यप्रणीत। उशनस इदम् इति उशनस् + अण् स्त्रियाम् औशनसी, तस्याम्। दण्डनीत्याम्—नीतिशास्त्र में। दण्ड = राज-दण्ड। दण्डस्य नीतिः दण्डनीतिः, तस्याम्। अधिकरणे सप्तमी। प्रावीण्यम्—प्रवीणता, दक्षता को। प्रकृष्टो वीणा अस्य इति प्रवीणः। जो वीणा बजाने में दक्ष है, अतः सामान्य रूप में दक्ष के भाव में इस शब्द का प्रयोग होने लगा। तस्य भाव इति प्रवीण + ष्यञ् = प्रावीण्यम्। क्षपणकलिङ्गधारी—बौद्ध या जैन संन्यासी का चिह्न धारण करने वाला। क्षपणकस्य लिङ्गम् षष्ठी तत्०। तत् धरतोति क्षपणकलिङ्ग √धृ + णिनि साधुकारिणि कर्तरि = क्षपणकलिङ्गधारी। सख्य ग्राहित —मित्र बनवाया हुआ। यहां ग्रह् धातु बुद्ध्यर्थक होने से द्विकर्मक है। अतएव वाक्यप्रयोग इस तरह होगा—'स सख्य गृहीतवान् = चाणक्य तं सख्यं ग्राहितवान् = चाणक्येन स सख्यं ग्राहितः'। महत् प्रयोजनम्—यह प्रयोजन पांचवें अंक में विस्तार से बताया गया है।
तदेवमस्मत्तो न किञ्चित् परिहास्यते। वृषल एव केवलं प्रधानप्रकृतिरस्मास्वारोपितराज्यतन्त्रभारः सततमुदास्ते। अथवा यत्स्वयमभियोगदुःखरमाधारणैरपास्तं तदेव राज्य मुच्यते। कुतः —
स्वयमाहृत्य भुञ्जाना बलिनोऽपि स्वभावतः ।
गजेन्द्राश्च नरेन्द्राश्च प्रायः सीदन्ति दुःखिताः ॥ १६ ॥
व्याख्या—तत्—तस्मात् कारणात्, एवम्—अनेन प्रकारेण, अस्मत्त —मत्तः, न किञ्चित् परिहास्यते—न्यूनं भविष्यति। केवलं, प्रधानप्रकृतिः—मुख्य-प्रकृतिः, वृषल एव—चन्द्रगुप्त एव, अस्मासु—मयि, आरोपितराज्यतन्त्रभार —
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शक्तिषु चानश्' इत्यनेन चानश् । यह 'नरेन्द्र' और 'गजेन्द्र' दोनों का विधेयात्मक विशेषण है । स्वभावात — स्वभावेन इति स्वभाव + तसि तृतीयायाम् । 'प्रकृत्या-दिभ्य उपसंख्यानम्' इति वार्तिकेन तृतीया । इस पद्य में दीपक अलङ्कार और अनुष्टुप् छन्द है ॥ १६ ॥
[ तत प्रविशति यमपटेन चर । ]
चर —
पणमह जमस्स चलणे किं कज्ज देवएहि अणेहिं ।
एसो खु अण्णभत्ताण हरइ जीअ चडपडन्तम् ॥ १७ ॥
( प्रणमत यमस्य चरणौ किं कार्यं देवतैरन्यै ।
एष खल्वन्यभक्ताना हरति जीव परिस्फुरन्तम् ॥ )
तत — तदनन्तर, यमपटेन — यममूर्त्या चित्रितेन पटेन सह, चर — चाणक्यस्य गुप्तचर श्चित्रिन्, प्रविशति — समायाति — रङ्गभूमिम् इति शेष ।
अन्वय — यमस्य चरणौ प्रणमत, अन्यै देवतै किं कार्यम् । एष खलु अन्यभक्ताना परिस्फुरन्त जीव हरति ॥ १७ ॥
व्याख्या — यमस्य — धर्मराजस्य, चरणौ — पादौ, (यूय) प्रणमत — भजत, अन्यै — इतरे, देवतै — देवै, किं कार्यम् — किं प्रयोजनम् न किमपीत्यर्थ, एष खलु — यम, अन्यभक्तानाम् — तद्दान्तरोपासकाना, परिस्फुरन्त — स्यन्दमान, जीव — जीवन, हरति — नाशयति ॥ १७ ॥
हिन्दी अनुवाद — [ उसके बाद यमपट के साथ गुप्तचर आता है । ]
गुप्तचर — यमराज के चरणों को प्रणाम करो, दूसरे देवताओ से क्या प्रयोजन ? य ( यमराज ) दूसर (देवताओ ) के भक्तो के छटपटाते हुए प्राणो को हर लेते हैं ॥ १७ ॥
टिप्पणी — यमपटेन — यमराज के चित्रो से अकित वस्त्र से । पहले इस प्रकार के वस्त्र रखने वाले भिक्षुक लोगो को शुभाशुभ फल बताया करते थे । चाणक्य का यह गुप्तचर भी ऐसे ही भिक्षुक के वेश में जासूसी करता था । प्रणमत — इस पद्य का गूढ अर्थ यह है कि यमराज की तरह चाणक्य अपने भक्तो को समृद्ध बनाता है और राक्षस के भक्तो को मारता है । इसलिए चाणक्य
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चाणक्य को लोग क्रूर समझते हैं, किन्तु वस्तुत वह क्रूर नही है। जो उनकी भक्ति करते हैं, उन्ह वह बहुत देना है। इसमे भी अप्रस्तुत प्रशसा अलकार तथा आर्या छन्द है । ॥ १८ ॥
शिष्य —[ विलोक्य ] भद्र ! न प्रवेष्टव्यम् ।
चर —[ विहस्य ] हहो वह्मण, कस्स एद गेहम् ? ( अहो ब्राह्मण, कस्येद गृहम् ? )
शिष्य —अस्माकमुपाध्यायस्य सुगृहीतनाम्न आर्यचाणक्यस्य ।
चर —[ विहस्य ] हहो वह्मण, अत्तकेरकस जेव्व मह धम्मभादुणो घर होदि । ता देहि मे पवेस जाव दे उवज्झाअस्स जमपड पसारिअ धम्म उवदिसामि । ( अहो ब्राह्मण, आत्मीयस्यैव मम धर्मभ्रातुर्गृह भवति । तस्माद्देहि मे प्रवेश यावत्तवोपाध्यायस्य यमपट प्रसार्य धर्ममुपदिशामि । )
शिष्य —[ सक्रोधम् ] धिक् मूर्ख, किं भवानस्मदुपाध्यायादपि धर्मवित्तर ?
चर —हहो वह्मण, मा कुप्प । णहि सव्वो सव्व जाणादि । ता किवि ते उवज्झाओ जाणादि, किवि अम्हारिसा जाणादि । (अहो ब्राह्मण, मा कुप्य । नहि सर्व सर्व जानाति । तत् किमपि ते उपाध्यायो जानाति, किमप्यस्मादृशा जानन्ति ।)
शिष्य —मूर्ख, सर्वज्ञतामुपाध्यायस्य चोरयितुमिच्छसि ?
चर —हहो वह्मण, जइ तव उवज्झाओ सव्व जाणादि ता जाणादु दाव कस्स चन्दो अणिब्भिप्पेदो त्ति । (अहो ब्राह्मण, यदि तवोपाध्याय सर्व जानाति तर्हिजानातु तावत्कस्य चन्द्रोऽनभिप्रेत इति ।
शिष्य—[ देखकर ] महाशय ! ( भीतर ) प्रवेश न करना ।
गुप्तचर—अहा ब्राह्मण ! यह किसका घर है ?
शिष्य—हमारे आचार्य प्रात स्मरणीय आर्य चाणक्य का ।
गुप्तचर—[ हंसकर ] ब्राह्मण देवता ! ( तब तो ) मेरे अपने ही धर्म-
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शिष्य—मूर्ख, किमनेन ज्ञातेनाज्ञातेन वा ?
चर—तव उवज्झाओ एव्व जाणिस्सदि जं इमिणा जाणिदेण होदि। तुमं दाव एत्तिअं जाणासि कमलाणं चन्दो अणभिप्पेदो त्ति । णं पेक्ख—
कमलाणं मणहराणं वि रूआहित्तो विमवदइ शीलम् ।
संपुण्णमण्डलम्मि वि जाइँ चन्दे विरूद्धाइँ ॥१६॥( तवोपाध्याय एव ज्ञास्यति यदेनेन ज्ञानेन भवति । त्वं तावदेतावद् जानासि कमलानां चन्द्रोऽनभिप्रेत इति । ननु पश्य—
कमलानां मनोहराणामपि रूपाद्विमवदति शीलम् ।
सम्पूर्णमण्डलेऽपि यानि चन्द्रे विरुद्धानि ॥ )
हिन्दी अनुवाद—शिष्य—मूर्ख ! इसके जानने या न जानने से क्या ( होता है ) ?
गुप्तचर—तुम्हारे आचार्य ही समझेंगे, जो इसके जानने से होता है । तुम तो इतना ही जानते हो कि कमलों को चन्द्रमा पसन्द नहीं है । अच्छा देखो—
अन्वय—मनोहराणामपि कमलानां शीलं रूपात् विमवदति । यानि सम्पूर्णमण्डलेऽपि चन्द्रे विरुद्धानि ॥१६॥
व्याख्या—मनोहराणामपि—सुन्दराणामपि, कमलानां—पद्मानां, शीलं—स्वभावं आचरितं वा, रूपात्—आकृतेः, विसंवदति—रूपमनुहरति । यानि—कमलानि, सम्पूर्णमण्डलेऽपि—षोडशकलासमन्वितेऽपि, चन्द्रे—चन्द्रमसि, विरुद्धानि—विपरीतानि नानुरक्तानीत्यर्थः ॥१६॥
हिन्दी अनुवाद—मनोहर ( होते हुए ) भी कमलों का स्वभाव ( उनकी ) आकृति से उलटा हुआ करता है । ( यथानि ) जो ( अर्थात् वे कमल ) पूर्ण बिम्ब से युक्त होने पर भी चन्द्रमा के विरुद्ध ( आचरण करते ) हैं ॥१६॥
टिप्पणी—रूपात्—अत्र 'ल्यब्लोपे कर्मण्यधिकरणे च' इति वार्त्तिकेन पञ्चमी । रूपमपेक्ष्येत्यर्थः । विमवदति—विपरीत आचरण करता है । सम्पूर्णमण्डलेऽपि—पूर्णमण्डल अर्थात् सोलह कलाओं से युक्त होने पर भी ।
प्रथमोऽङ्कः ४६
अपूर्ण मंडल में तो कहना ही क्या—यह 'अपि' शब्द का अर्थ है। चन्द्रे—यहाँ चन्द्रमा और चन्द्रगुप्त दोनो अर्थ विवक्षित है। श्लोक का गूढार्थ यह है कि राक्षस के भक्त बहुत-मे सुन्दराकृति जन नगर मे विचरण करते है, वे असम्पूर्ण मण्डल वाले चन्द्रगुप्त के विरुद्ध तो है ही पूर्ण मण्डल होने पर भी विरुद्ध जाएँगे। यहाँ चन्द्रपक्ष मे मंडल का अर्थ है विम्ब और राजपक्ष मे उसका अर्थ होता है—निकट और दूर के पडोसी शत्रु, मित्र आदि राज्यो का समूह। इस पद्य मे अप्रस्तुत-प्रशंसा अलंकार है और आर्या छन्द है ॥१६॥
चाणक्यः— [ आकर्ण्यात्मगतम् ] अये, चन्द्रगुप्तादपरक्तान् पुरुषान् जानामीत्युपक्षिप्तमनेन ।
शिष्यः— मूर्ख, किमिदमसम्बद्धमभिधीयते ?
चरः— हंहो बह्मण, सुसंबद्धं जेव्व एवं भवे । ( अहो ब्राह्मण, सुसम्बद्धमेवैतद्भवेत् । )
शिष्यः— यदि किं स्यात् ।
चरः— यदि सुणिदुं जाणन्तं लहे । (यदि श्रोतुं जानन्तं लभे । )
चाणक्यः— भद्र, विश्रब्धं प्रविश । लप्स्यसे श्रोतारं ज्ञातारं च ।
चरः— एसो पविशामि । ( एष प्रविशामि । ) [ प्रविश्योपसृत्य च ] जेदु अज्जो । ( जयत्वार्यः । )
चाणक्यः— [विलोक्यात्मगतम्] कथमयं प्रकृतिचित्तपरिज्ञाने नियुक्तो निपुणकः । [ प्रकाशम् ] भद्र ! स्वागतम् । उपविश ।
चरः— ज अज्जो आणवेदि । [ भूमावुपविष्टः । ] (यदार्य आज्ञापयति । )
हिन्दी अनुवाद—चाणक्य— [ सुनकर मन में ] अरे ! चन्द्रगुप्त के विरोधी जनो को जानता हूँ, ऐसा इसने संकेत किया है ।
शिष्य— मूर्ख ! यह क्या अटपटी बात बक रहे हो ?
गुप्तचर— बाह्मण महाराज ! यह सुसंगत ही होती ।
शिष्य— यदि क्या होता ?
मु० रा०—४
५० मुद्राराक्षसम्
गुप्तचर—यदि सुनने के लिये जानकार (व्यक्ति) मिलता।
चाणक्य—भद्र ! विश्वास के साथ भीतर आओ। सुनने और समझने वाले को पा जाओगे।
गुप्तचर—यह आया। [प्रवेश करके और समीप जाकर] आर्य की जय हो।
चाणक्य—[देखकर मन में] क्यो, यह तो प्रजा की मनोवृत्ति जानने के लिए नियुक्त किया गया निपुणक है। [प्रकट] भद्र ! (तुम्हारा) स्वागत है। बैठो।
गुप्तचर—आर्य की जैसी आज्ञा। [भूमि पर बैठ जाता है।]
टिप्पणी—चन्द्रगुप्तात्—अत्र अपादाने पञ्चमी। उपक्षिप्तम्—इङ्गित क्रिया। उप√क्षिप्+क्त कर्मणि। इसका अनुक्त कर्त्ता 'अनेन' है। असम्बद्धम्—असंगत, ऊटपटांग। सम्√बन्ध्+क्त कर्मणि = सम्बद्धम्। न सम्बद्धम् असम्बद्धम् नञ्तत्०। यह 'अभिधीयते' का उक्तकर्म है। उक्ते कर्मणि प्रथमा। अभिधीयते = कथ्यते। अभि√धा+लट्—ते कर्मणि। भवेत्, स्यात्—अत्र 'हेतुहेतुमतोर्लिङ्' इत्यनेन लिङ्। कथम्—यह आश्चर्यसूचक अव्यय है। यहाँ किसी पुस्तक में यह अधिक पाठ है—'क्व प्रभूतत्वात् कार्याणा कस्य परिज्ञाने नियुक्तो निपुणक इति न ज्ञायते। आ ज्ञातम्, अये।' इसका अर्थ है—'कार्य की अधिकता के कारण यह ध्यान में नहीं आ रहा है कि निपुणक को किस बात की जानकारी के लिए नियुक्त किया था। हाँ, समझ गया। अरे!'
चाणक्य—भद्र, वर्णयेदानीं स्वनियोगवृत्तान्तम्। अपि वृषलमनुरक्ताः प्रकृतयः ?
चर—अह इं ? अज्जेण क्खु तेसु तेसु विराअकारणेसु परिहरिज्जंतेसु सुगहीदणामहेए देवे चन्दउत्ते दिढं अनुरत्ताओ पकिदिओ। किंदु उण संति एत्थ णअरे अमच्चरक्खसेण सह पढमं समुप्पण्णसिणेहबहुमाणा तिण्णि पुरिसा, जे देवस्स चन्दसिरिणो सिरिं ण सहन्दि। (अथ किम् ? आर्येण खलु तेषु तेषु विरागकारणेषु परिह्रियमाणेषु सुगृहीतनामधेये देवे चन्द्रगुप्ते दृढमनुरक्ताः प्रकृतयः। किन्तु पुनः सन्त्यत्र नगरे अमात्यराक्षसेन सह प्रथमं समुत्पन्नस्नेहबहुमानास्त्रयः पुरुषाः, ये देवस्य चन्द्रश्रियः श्रियं न सहन्ते।)
प्रथमोऽङ्कः (५१)
चाणक्यः— [ सक्रोधम् ] ननु वक्तव्यं स्वजीवितं न सहन्ते इति । भद्र, अपि ज्ञायन्ते नामधेयतः ?
चरः— कहं अजाणिअणामहेआ अज्जस्स णिवेदिअन्ति ? ( कथमज्ञातनामधेया आर्यस्य निवेद्यन्ते ? )
चाणक्यः— तेन हि श्रोतुमिच्छामि ।
हिन्दी अनुवाद—चाणक्य— भद्र ? अब बताओ अपने कार्य का समाचार । क्या प्रजाएँ चन्द्रगुप्त में अनुरक्त हैं ?
गुप्तचर— और क्या ? आपके द्वारा विरक्ति के उन-उन कारणों के दूर कर दिये जाने पर प्रातःस्मरणीय महाराज चन्द्रगुप्त मे प्रजाएँ अत्यन्त अनुरक्त हैं। किन्तु फिर भी इस नगर में पहले से ही अमात्य राक्षस के साथ स्नेह तथा सम्मान का व्यवहार करने वाले ऐसे तीन व्यक्ति हैं, जो चन्द्र तुल्य शोभा वाले महाराज की राज्य-श्री का सहन नहीं करते हैं ।
चाणक्य— [ क्रोध के साथ ] तब तो यह कहो कि वे अपने जीवन का सहन नहीं करते हैं । भद्र ! क्या उन्हें नामतः जानते हो ?
गुप्तचर— बिना नाम जाने कैसे आप से निवेदन करता ?
चाणक्य— तो सुनना चाहता हूँ ।
टिप्पणी—स्वनियोगवृत्तान्तम्— अपने कार्य का समाचार । स्वस्य नियोगः । तस्य वृत्तान्तः षष्ठीतत्०, तम् । यह 'वर्णय' का कर्म है । वृषलम्— अत्र कर्मप्रवचनीययोगे द्वितीया । अथ किम्— यह स्वीकारार्थक अव्यय है । तेषु विरागकारणेषु परिह्रियमाणेषु— अत्र 'यस्य च भावेन भावलक्षणम्' इति सूत्रेण सप्तमी । चन्द्रश्रियः— चन्द्रमा की-सी कान्ति वाले । चन्द्रस्य श्रीः इव श्रीः अस्य बहुव्रीहि स०, तस्य । इसका सम्बन्ध 'श्रियम्' से है । अपि— यहाँ प्रश्नवाचक अव्यय है । 'गर्हासमुच्चयप्रश्नशङ्कासम्भावनास्वपि' इत्यमरः । नामधेयतः— नाम से । अत्र 'प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम्' इति वर्तिकेन तृतीया । ततः तृतीयान्तात् नामधेयशब्दात् तसिः स्वार्थे । आर्यस्य— यहाँ सम्बन्ध सामान्य में षष्ठी हुई; अन्यथा 'निवेद्यन्ते' के योग मे चतुर्थी होनी चाहिए थी । निवेद्यन्ते— नि√विद् + णिच् + लट् — अन्ते कर्मणि ।
५२ मुद्राराक्षसम्
चर—सुणादु अज्जो। पढम दाव अज्जस्स रिपुपक्खे वद्धपक्सवादो खवणओ जीवसिद्धी। (शृणोत्वार्य। प्रथम तावदार्यस्य रिपुपक्षे वृद्धपक्षपात क्षपणको जीवसिद्धिः।)
चाणक्य—[सहर्षमात्मगतम्] अस्मद्रिपुपक्षे वृद्धपक्षपात क्षपणक !
चर—जीवसिद्धी णाम सो जेण सा अमच्चरक्खसप्पउत्ता विसकण्णा देवे पव्वदीसरे समावेसिदा। (जीवसिद्धिर्नाम स येन सा अमात्यराक्षसप्रयुक्ता विषकन्या देवे पर्वतेश्वरे समावेशिता।)
चाणक्य—[स्वगतम्] जीवसिद्धिरेष तावदस्मत्प्रणिधिः। [प्रकाशम्] भद्र, अथापरः कः?
चर—अज्ज, अवरो वि अमच्चरक्खसस्स पिअवअस्सो काअत्थो सअडदामो णाम। (आर्य, अपरोऽपि अमात्यराक्षसस्य प्रियवयस्य कायस्थ शकटदामो नाम।)
चाणक्य—[विहस्यात्मगतम्] कायस्थ इति लघ्वी मात्रा तथापि न युक्तं प्राकृतमपि रिपुमवज्ञातुम्। तस्मिन्मया सुहृच्छद्मना सिद्धार्थको विनिक्षिप्तः। [प्रकाशम्] भद्र, तृतीयं श्रोतुमिच्छामि।
चर—तिदीओ वि अमच्चरक्खसस्स दुदीअ विअ हिअअं पुप्फउरणिवासी मणिआरसेट्ठी चन्दनदासो णाम। जस्स गेहे कलत्तं ण्णासीकदुअ अमच्चरक्खसो णअरादो अवक्कन्तो। (तृतीयोऽपि अमात्यराक्षसस्य द्वितीयमिव हृदय पुष्पपुरनिवासी मणिकारश्रेष्ठी चन्दनदामो नाम। यस्य गेहे कलत्रं न्यासीकृत्य अमात्यराक्षसो नगरादपक्रान्तः।)
हिन्दी अनुवाद—गुप्तचर—आर्य सुनें। पहला तो आपके शत्रु-पक्ष का बहुत बड़ा पक्षपाती क्षपणक जीवसिद्धि है।
चाणक्य—[हर्ष के साथ मन में] हमारे शत्रु पक्ष का पक्षपाती क्षपणक !
गुप्तचर—जीवसिद्धि नाम का वह (व्यक्ति) है, जिसने अमात्य
प्रथमोऽङ्कः ५३
राक्षस द्वारा भेजी गई उस विषकन्या को महाराज पर्वतेश्वर के लिए नियुक्त किया था।
चाणक्य— [ मन में ] यह जीवसिद्धि तो हमारा गुप्तचर है। [ प्रकट ] भद्र ! और दूसरा कौन है ?
गुप्तचर—आर्य ! दूसरा भी अमात्य राक्षस का प्रिय मित्र कायस्थ शकटदास ( नामक व्यक्ति ) है।
चाणक्य— [ हँसकर मन में ] 'कायस्थ' यह छोटी मात्रा है ( अर्थात् कायस्थ की क्या हस्ती है ) । तो भी छोटे शत्रु की भी उपेक्षा करना ठीक नही है । उसके लिए तो मैने मित्र के बहाने सिद्धार्थक को नियुक्त कर रखा है। [ प्रकट ] भद्र ! तीसरे ( व्यक्ति ) को सुनना चाहता हूँ।
**गुप्तचर—**तीसरा भी अमात्य राक्षस का अभिन्नहृदय पाटलिपुत्र का रहने वाला सेठ जौहरी चन्दनदास नाम का ( व्यक्ति ) है, जिसके घर मे ( अपनी ) पत्नी को थाती रखकर अमात्य राक्षस नगर से बाहर निकला हुआ है।
**टिप्पणी—बद्धपक्षपातः—**बद्धस्नेहः । पक्षपात ( तरफदारी ) करने वाला । पक्षे पातः सुप्स्सुपा स० । बद्धः पक्षपातः अनेन इति बद्धपक्षपातः बहुव्रीहि स० । **जीवसिद्धिः—**चाणक्य का मित्र इन्दुशर्मा । यह चाणक्य का प्रयोजन सिद्ध करने के लिये नाम और वेश बदल कर राक्षस का प्रबल पक्षपाती बन गया है । यह बात निपुणक को नही मालूम है । इसीलिए यह चाणक्य से उसकी निन्दा करता है । **समावेशिता—**नियुक्त किया । सम् आ√विश् +णिच् +क्त कर्मणि । **प्रणिधिः—**गुप्तचर । प्रणिधीयन्ते अस्मिन् इति प्र-नि√धा +कि + 'कर्मण्यधिकरणे च' इत्यनेन, 'नेर्गदनद'—इत्यादिना णत्वम् । **लघ्वी मात्रा—**क्षुद्रः अंशः । छोटी मात्रा, तुच्छ बात । कायस्थ की उत्पत्ति क्षत्रिय पिता और शूद्रा माता से मानी गई है । उसका कार्य लिखना है, न कि युद्ध करना । इसी से उसकी अल्पप्राणता की ओर संकेत करते हुए चाणक्य ने उसके लिए 'लघ्वी मात्रा' शब्द का प्रयोग किया है । **सुहृच्छद्मना—**मित्रच्छलेन । **विनिक्षिप्तः—**विनियोजितः । **मणिकारश्रेष्ठी—**जौहरो, सेठ । मणीन् करोति इति मणिकारः मरिण√कृ +अण् 'कर्मण्यण्' इत्यनेन । श्रेष्ठानि श्रेष्ठवस्तूनि सन्ति अस्य इति श्रेष्ठी श्रेष्ठ +इनि । मणिकारश्चासौ श्रेष्ठी च इति मणिकारश्रेष्ठी
| ५४ | मुद्राराक्षसम् |
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कर्मधारय स०। न्यासीकृत्य—निक्षिप्य। धरोहर रखकर। नि√अस्+घञ् कर्मणि=न्यास । अन्यासं न्यासं कृत्वा इति न्यास+च्वि√कृ, ईत्व+त्वा—ल्यप् । अपक्रान्त —भाग निकला। अप√क्रम्+क्त कर्तरि।
चाणक्य —[ आत्मगतम् ] नून सुहृत्तम । न अनात्मसदृशेषु राक्षस कलत्र न्यासीकरिष्यति। [ प्रकाशम् ] भद्र, चन्दनदासस्य गृहे राक्षसेन कलत्र न्यासीकृतमिति कथमवगम्यते ?
चर —अज्ज, इअ अङ्गु०लिमुद्दा अज्ज अवगदत्थ करिस्मदि (आर्य, इयमङ्गु०लिमुद्रा आर्यमवगतार्थं करिष्यति ।) [ इत्यर्पयति ।]
चाणक्य —[ मुद्रामवलोक्य गृहीत्वा राक्षसस्य नाम०वाचयति । सहर्षं स्वगतम् । ] ननु वक्तव्य राक्षस एवास्मदङ्गु०लिप्रणयी संवृत्त इति । [ प्रकाशम् ] भद्र, अङ्गु०लिमुद्राधिगम विस्तरेण श्रोतुमिच्छामि ।
चर —सुणादु अज्जो । अत्थि दाव अह अज्जेण पौरजणचरिदअण्णे-सणे णिउत्तो परघरप्पवेसे परस्स अणासक्कणिज्जेण इमिणा जमपडेण हिण्डन्तो मणियारसेट्ठिचन्दनदासस्स गेह पविट्ठोम्हि । तर्हि जमपड पसारिअ पडत्तोम्हि गीदाइ गाइदुं । ( शृणोत्वार्य । अस्ति तावदह-मार्येण पौरजनचरितान्वेषणे नियुक्त परगृहप्रवेशे परस्यानाशङ्कनीयेन अनेन यमपटेन आहिण्डमानो मणिकारश्रेष्ठिचन्दनदासस्य गृह प्रविष्टो-ऽस्मि । तत्र यमपट प्रसार्य प्रवृत्तोऽस्मि गीतानि गातुम् । )
चाणक्य —तत किम् ?
हिन्दी अनुवाद—चाणक्य —[ मन मे ] सचमुच परम मित्र है। (क्योकि) अपने से भिन्न जनो के पास राक्षस ( अपनी ) भार्या को नही रखेगा । [ प्रकट ] भद्र ! चन्दनदास के घर में राक्षस ने ( अपनी ) स्त्री को रखा है—यह कैसे ( तुम ) जानते हो ?
गुप्तचर—आर्य ! यह अँगूठी आपको सब कुछ बता देगी । [ अँगूठी देता है । ]
चाणक्य—[अँगूठी को देखकर, लेकर राक्षस का नाम बांचता है । हर्ष के साथ मन में ] कहना तो यह चाहिए कि राक्षस ही हमारी उँगलिया का प्रेमी
प्रथमोऽङ्कः ५५
हो गया (अर्थात् हमारी मुट्ठी में आ गया)। [ प्रकट ] भद्र ! अँगूठी की प्राप्ति के बारे में विस्तार से सुनना चाहता हूँ।
गुप्तचर—आर्य सुनें। नागरिकों के चरित्र का पता लगाने के लिए आपके द्वारा नियुक्त किया हुआ मैं दूसरे के घर में प्रवेश करने पर किसी के संदेह न करने योग्य इस यमपट के साथ घूमता हुआ सेठ जौहरी चन्दनदास के घर मे प्रविष्ट हुआ। वहाँ यमपट को फैलाकर गीत गाने लगा।
चाणक्य—उसके बाद क्या हुआ ?
टिप्पणी—सुहृत्तमः—परम बन्धु। अतिशयेन सुहृत् इति सुहृत्तमः सुहृद् + तमप्। अनात्मसदृशेषु—आत्मसदृशाः निजानुरूपाः ये न तादृशेषु। जो अपने अनुरूप या अभिन्नहृदय न हो, ऐसे लोगों के पास। न्यासीकरिष्यति—निधास्यति। रखेगा। अवगतार्थम्—ज्ञात विषय वाला। अवगतः विदितः अर्थः विषयः प्रश्नवस्तु इति यावत् येन, तम्। वारयति—उच्चारयति। बाँचता है। √वच् + णिच् + लट् — तिप्। अस्मदङ्गुलिप्रणयी--अस्माकम् अङ्गुलयः अस्मदङ्गुलयः षष्ठीतत्०। तासु प्रणयी सुप्सुपा स०। हमारी उँगलियों का स्नेही अर्थात् हमारे हस्तगत। विस्तरेण—विस्तार से। वि√स्तृ + अप् भावे = विस्तरः, तेन। विस्तार शब्दे तु 'प्रथने वावशब्दे' इति सूत्रेण घञ् प्रत्ययः। अतएव 'वाक्यस्य विस्तरः' 'पटस्य विस्तारः' इत्यादि। अस्ति—यह एक अव्यय है। इसका अर्थ होता है—यह है कि। आर्येण—भवता। पौरजनस्य—नागरिकस्य। चरितान्वेषणे—व्यापारज्ञाने। अनाशङ्कनीयेन—सन्देहायोग्येन। आहिण्डमानः—भ्रमन्।
चरः—तदो एक्कादो अववरकादो पञ्चवरिसदेसीओ पिअदंसणी-असरीराकिदी कुमारओ 'बालत्तणसुलहकोदूहलोप्फुल्लणअणोणिक्कमिदुं पउत्तो। तदो हा णिग्गदो हा णिग्गदो त्ति संकापरिग्गहणिवेदइत्तिओ तस्स एव्व अववरकस्स अब्भन्तरे इत्थिआजणस्स उट्ठिदो महन्तो कलअलो। तदो ईसि दारदेशदाविदमुहीए एक्काए इत्थिआए सो कुमारओ णिक्कमन्तो एव्व णिब्भच्छिअ अवलम्बिदो कोमलाए बाहुलदाए। तस्साए कुमारसंरोधसंभमप्पचलिदङ्ग लिदो करादो पुरिसअङ्गुलिपरि-णाहप्पमाणघडिआ विअलिआ इअं अङ्गुलिमुद्दिआ देहलीबन्धम्मि पडिआ उट्ठिदा ताए अणवबुद्धा एव्व मम चलणपासं समागच्छिअ प्रणामणि-
५६ मुद्राराक्षसम्
हुआ कुलवहु विअ णिच्चला सवुत्ता । मए वि अमच्चरक्खसस्स णामंकिदेत्ति अज्जस्स पादमूल पाविदा । ता एसो इमाए आओमो । ( ततश्च एकस्मादपवरकात्पञ्चवर्षदेशीय प्रियदर्शनीयशरीराकृति कुमारको बालत्वसुलभकौतूहलोत्फुल्लनयनो निष्क्रमितु प्रवृत्त । ततो हा निर्गतो हा निर्गत इति शङ्कापरिग्रहनिवेदयिता तस्यैवापवरकस्याभ्यन्तरे स्त्रीजनस्योत्थितो महान्कलकल । तत ईषद्द्वारदेशदापितमुख्या एकया स्त्रिया स कुमारको निष्क्रामन्नेव निर्भर्त्स्यविलम्बित कोमलया बाहुलतया । तस्या कुमारसरोधसम्भ्रमप्रचलिताङ्गुले करात्पुरुषाङ्गुलिपरिणाहप्रमाणघटिता विगलितेयमङ्गुलिमुद्रिका देहलीबन्धे पतिता उत्थिता तया अनवबुद्धैव मम चरणपार्श्व समागत्य प्रणामनिभृता कुलवधूरिव निश्चला सवृत्ता । मयापि अमात्यराक्षसस्य नामाङ्कितेति आर्यस्य पादमूल प्रापिता । तस्मादेषोऽस्या आगम ।
व्याख्या—ततश्च—गीतगानानन्तर च, एकस्मात्, अपवरकात्—प्रकोष्ठात्, पञ्चवर्षदेशीय —ईषदसमाप्तपञ्चवर्ष , प्रियदर्शनीयशरीराकृति —प्रिया मनोहरा दर्शनीया भव्या शरीरस्य देहस्य आकृति आकारो यस्य स तथाविध , कुमारक —बालक , बालत्वसुलभकौतूहलोत्फुल्लनयन —बालत्वस्य शिशुत्वस्य सुलभ स्वभावज यत् कौतूहल कौतुक तेन उत्फुल्ले विकसिते नयने नेत्रे यस्य स तथोक्त , निष्क्रमितु—निर्गन्तुम्, प्रवृत्त —उद्युक्त । तत —तदनन्तर, हा निर्गत हा निर्गत —हा कष्टमपयात कुमार इति, शङ्कापरिग्रहनिवेदयिता—शङ्काया सन्देहस्य परिग्रह प्राप्ति तस्य निवेदयिता सूचक , तस्यैव अपवरकस्य, अभ्यन्तरे—मध्ये, स्त्रीजनस्य—नारीणा, महान्—विशेष , कलकल —अव्यक्तध्वनि , उत्थित —समुत्पन्न । तत —पश्चात्, ईषद्द्वारदेशदापितमुख्या—ईषत् अल्प द्वारमेव देश प्रदेश तत्र दापित निहित मुखम् आनन यया सा तादृश्या, एकया—केवलया, स्त्रिया—नार्या, स —पूर्वोक्त , कुमारक —बाल , निष्क्रामन्नेव—वहिर्निर्गच्छन्नेव, निर्भर्त्स्य—तिरस्कृत्य, कोमलया—मृद्व्या, बाहुलतया—भुजशाखया, अवलम्बित —धृत । तस्या —स्त्रिया , कुमारसरोधसम्भ्रमप्रचलिताङ्गुले —कुमारस्य बालस्य सरोध बहिर्गमनप्रतिषेध तत्र सम्भ्रम व्याकुलता तेन प्रचलिता प्रकम्पिता अङ्गुलय यस्य स तथाविध तस्मात्, करात्—पाणे , पुरुषाङ्गुलिपरिणाहप्रमाणघटिता—पुरुषस्य पुस अङ्गुलि.
प्रथमोऽङ्कः ५७
तस्याः परिणाहः विशालता तस्य प्रमाणेन घटिता निर्मिता, इयं—दृश्यमाना, अङ्गुलिमुद्रिका—नामाङ्कितमङ्गुलीयकं, विगलिता—अङ्गुलितश्च्युता, ( सती ) देहलीबन्धे—देहल्या द्वाराधःप्रदेशस्य बन्धः बन्धनस्थानं तत्र, पतिता—भ्रष्टा, उत्थिता—अभिघातात् उत्प्लुता, तया—नार्या, अनवबुद्धैव—अविदिता एव, मम—मे, चरणपार्श्व—पादसमीपं, समागत्य—समेत्य, प्रणामनिभृता—प्रणतिविनीता, कुलवधूः इव—कुलाङ्गना इव, निश्चला—सुस्थिरा, संवृत्ता संजाता । मयापि, अमात्यराक्षसस्य—राक्षसनाम्नो मन्त्रिणः, नामाङ्किता—नाम्ना चिह्निता, इति—एवम् अवलोक्येति शेषः, आर्यस्य—भवतः, पादमूलं—चरणनिकटं, प्रापिता—समानीता । तस्मात्—अतएव, एषः—अयम्, अस्याः—अङ्गुलिमुद्रायाः, आगमः—प्राप्तिः लाभवृत्तान्त इत्यर्थः ।
हिन्दी अनुवाद—उसके बाद एक प्रिय और दर्शनीय शरीर की आकृति वाला लगभग पाँच साल का बालक, जिसकी आंखे बाल-सुलभ कौतूहल से खिल गईं थी, एक कमरे से निकलने लगा । तदनन्तर उसी कमरे के भीतर स्त्रियो का 'हाय निकल गया, हाय निकल गया' इस प्रकार का सन्देह-सूचक भारी शोर मच गया । उसके बाद एक महिला ने दरवाजे से थोड़ा मुँह निकालकर झाँका और निकलते हुए उस बालक को डाँटकर ( अपनी ) कोमल बाँहों से पकड़ लिया । लड़के को रोकने की व्याकुलता के कारण काँपती हुई अँगुलियों वाले उस ( महिला ) के हाथ से निकली हुई यह अँगूठी, जिसकी गठन पुरुष की अँगुली की मोटाई के अनुसार है, चौखठ पर गिर पडी और उछलकर उस ( स्त्री ) के बिना जाने ही मेरे ही पैर के पास आकर प्रणाम करने में संलग्न कुलवधू के समान निश्चल हो गई । मैने भी अमात्य राक्षस के नाम से चिह्नित देखकर इसे आपके चरणों के निकट ला उपस्थित किया । अतएव यह इसकी प्राप्ति ( का समाचार ) है ।
टिप्पणी—अपवरकात्—कमरे से । अपव्रियते अनेन अस्मिन् वा इति अप √ वृ + अप् करणे अधिकरणे वा = अपवरः । स एव इति अपवर + कन् स्वार्थे = अपवरकः, तस्मात् । अपादाने पञ्चमी । कोई 'अपवरक' का अर्थ खिड़की करते है । पञ्चवर्षदेशीयः—पाँच साल से कुछ कम अवस्था का । पञ्च वर्षाणि अस्य इति पञ्चवर्षः बहुव्रीहि स० । ईषदूनः पञ्चवर्षः इति पञ्चवर्ष + देशीयर 'ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः' इत्यनेन । कुमारकः—बालक ।
५८
मुद्राराक्षसम्
अज्ञात कुमार इति कुमार + कन् अज्ञाते । उत्फुल्ल—विकसित । उद् √फल् + क्त कर्तरि 'ति च' इति सूत्रेण उत्वम् 'उत्फुल्लसंफुल्लयोरुपसंख्यानम्' इति वार्तिकेन लत्व च । परिग्रह—उत्पत्ति, प्राप्ति । परि√ग्रह् + अप् भावे । नामाङ्किता—यहाँ के सन्दर्भ से यह पता चलता है कि अमात्य राक्षस उस बालक का पिता है और वह स्त्री उसकी माता है । नगर से पलायन करने के समय राक्षस ने अपने परिवार को चन्दनदास के घर में छोड़कर स्मारक के रूप में यह नामांकित मुद्रिका अपनी पत्नी को दे रखी है ।
चाणक्य—भद्र ! श्रुतम्, अपसर । ( नचिरादस्य परिश्रमस्यानुरूप फलमधिगमिष्यसि ),
चर—ज अज्जो आणवेदि । ( यदार्य आज्ञापयति । ) [ इति निष्क्रान्त । ]
चाणक्य—शार्ङ्गरव ! शार्ङ्गरव !
[ प्रविश्य ]
शिष्य—उपाध्याय ! आज्ञापय ।
चाणक्य—वत्स ! मसीभाजन पत्रञ्चोपानय ।
शिष्य—यदाज्ञापयत्युपाध्याय । [ इति निष्क्रम्य पुन प्रविश्य ] उपाध्याय ! इद मसीभाजन पत्रञ्च ।
चाणक्य—[ पत्र गृहीत्वा स्वगतम् ] किमत्र लिखामि ? अनेन खलु लेखेन राक्षसो जेतव्य ।
[ प्रविश्य ]
प्रतीहारी—जेदु अज्जो ( जयत्वार्य ) ।
चाणक्य—[ सहर्षमात्मगतम् ] गृहीतो जयशब्द । [ प्रकाशम् ] शोणोत्तरे ! किमागमनप्रयोजनम् ?
हिन्दी अनुवाद—चाणक्य—भद्र ! सुन लिया । जाओ । शीघ्र ही इस परिश्रम के अनुरूप फल प्राप्त करोगे ।
गुप्तचर—श्रीमान् की जैसी आज्ञा । [ बाहर चला जाता है । ]
प्रथमोऽङ्कः ५६
चाणक्य—शार्ङ्गरव ! शार्ङ्गरव !
[ प्रवेश करके ]
शिष्य—आचार्य ! आज्ञा दीजिए ।
चाणक्य—वत्स ! दवात और कागज ले आओ ।
शिष्य—आचार्य की जो आज्ञा । [ बाहर जाकर और फिर प्रवेश करके ] आचार्य ! यह दवात और कागज है ।
चाणक्य—[ पत्र लेकर मन में ] इस पर क्या लिखूँ ? इसी लेख से तो राक्षस को जीतना है ।
[ प्रवेश करके ]
प्रतीहारी—आर्य की जय हो ।
चाणक्य—[ हर्षपूर्वक मन में ] 'जय' शब्द का ग्रहण कर लिया ( अर्थात् विजय मिल गई ) । [ प्रकट ] शोणोत्तरे ! कैसे आना हुआ ?
टिप्पणी—नचिरात्—शीघ्र । यहाँ 'न' नञ् से भिन्न निषेधार्थक अव्यय है । 'चिरात्' भी चिरार्थक अव्यय है । न चिरात् सुप्सुपा स० । अपवर्गे तृतीया । अव्ययत्वात् सुब्लोपः । किमत्र लिखामि—यहाँ चाणक्य अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये पुनः उद्यम करता है । अतएव गुप्तचर के वृत्तान्त से अन्तरित बीज की पुनः प्रवर्त्तना होने के कारण यह बिन्दु है । कहा भी है—'अवान्तरार्थविच्छेदे विन्दुरच्छेदकारणम्' साहित्यदर्पण । प्रतीहारी—राजा के निकटवर्ती द्वार पर रहने वाली स्त्री प्रतिहारी कहलाती है । यह सन्धिविग्रह आदि कार्यों का निवेदन करती है—
'द्वारि द्वाःस्थे प्रतीहारः प्रतीहार्यप्यनन्तरे । सन्धिविग्रहसम्बद्धं नानाकार्यसमुत्थितम् ॥
निवेदयन्ति याः कार्यं प्रतीहार्यस्तु ताः स्मृताः ।'
राक्षसो जेतव्यः—चाणक्य जैसे ही इन शब्दो का उच्चारण करता है वैसे ही एक अप्रत्याशित व्यक्ति आकर कहता है—'आपकी जय हो' । चाणक्य इसे शुभ शकुन समझकर अपनी भावी विजय के सम्बन्ध मे आशान्वित होते हुए कह उठता है—'जय मिल गई' । नाटक की परिभाषा में इसको 'गण्ड' कहते हैं—'गण्डः प्रस्तुतसम्बन्धिभिन्नार्थं सहसोदितम्' । गृहीतोऽयं जय शब्दः—यह इस नाटक का पहला पताकास्थान है, जिसका लक्षण यह है—'यत्रार्थे