भारतकोश
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मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Mundaka Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished134 पृष्ठ

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७


लक्ष्य एवावर्जितं कृत्वेत्यर्थः । न हि हस्तेनेव धनुप आयमनमिह सम्भवति । तद्भावगतेन तस्मिन् ब्रह्मण्यक्षरे लक्ष्ये भावना भावः तद्गतेन चेतसा लक्ष्यं तदेव यथोक्तलक्षणमक्षरं सोम्य विद्धि ॥३॥उनके विषयोंसे हटा अपने लक्ष्यमें ही जोड़कर—क्योंकि इस धनुषको हाथसे धनुष चढ़ानेके समान नहीं खींचा जा सकता—तद्भावगत अर्थात् अपने लक्ष्य उस अक्षर ब्रह्ममें जो भावना है उस भावमें गये हुए चित्तसे हे सोम्य ! ऊपर कहे हुए लक्षणोंवाले अपने उसी लक्ष्य अक्षर ब्रह्मका वेधन कर ॥ ३ ॥

वेधनके लिये ग्रहण किये जानेवाले धनुषादिका स्पष्टीकरण

यदुक्तं धनुरादि तदुच्यते—ऊपर जो धनुष आदि बतलाये गये हैं उनका उल्लेख किया जाता है—

प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ।

अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ ४ ॥

प्रणव धनुष है, [ सोपाधिक ] आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है । उसका सावधानतापूर्वक वेधन करना चाहिये और बाणके समान तन्मय हो जाना चाहिये ॥ ४ ॥

प्रणव ,ओङ्कारो धनुः । यथेष्व्रासनं लक्ष्ये शरस्य प्रवेशकारणं तथात्मशरस्याक्षरे लक्ष्ये प्रवेशकारणमोङ्कारः । प्रणवेन ह्यभ्यस्यमानेन संस्क्रियमाणस्तदालम्ब्यनोऽप्रतिबन्धेनाक्षरेऽवतिष्ठते;प्रणव यानी ओंकार धनुष है । जिस प्रकार शरासन ( धनुष ) लक्ष्यमें बाणके प्रवेश कर जानेका साधन है उसी प्रकार [ सोपाधिक ] आत्मारूप बाणके अपने लक्ष्य अक्षरमें प्रवेश करनेका कारण ओंकार है । अभ्यास किये हुए प्रणवके द्वारा ही संस्कृत होकर वह उसके आश्रयसे बिना किसी बाधाके अक्षर ब्रह्ममें इस प्रकार स्थित होता है, जैसे धनुषसे छोड़ा

६८ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २


यथा धनुषास्त इषुर्लक्ष्ये । अतः प्रणवो धनुरिव धनुः । शरो ह्यात्मोपाधिलक्षणः पर एव जले सूर्यादिवदिह प्रविष्टो देहे सर्वबौद्धप्रत्ययसाक्षितां । स शर इव स्वात्मन्येवार्पितोऽक्षरे ब्रह्मण्यतो ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । लक्ष्य इव मनःसमाधित्सुभिः आत्मभावेन लक्ष्यमाणत्वात् । <br><br> तत्रैवं सत्यप्रमत्तेन बाह्यविषयोपलब्धितृष्णाप्रमादवर्जितेन सर्वतो विरक्तेन जितेन्द्रियेणैकाग्रचित्तेन वेद्धव्यं ब्रह्म लक्ष्यम् । ततस्तद्वेधनादूर्ध्वं शरवत्तन्मयो भवेत् । यथा शरस्य लक्ष्यैकात्मत्वं फलं भवति तथा देहाद्यात्मप्रत्ययतिरस्करणेनाक्षरैकात्मत्वं फलमापादयेदित्यर्थः ॥ ४ ॥हुआ बाण अपने लक्ष्यमें । अतः धनुषके समान होनेसे प्रणव ही धनुष है। तथा आत्मा ही बाण है, जो कि जलमें प्रतिबिम्बित हुए सूर्य आदिके समान इस शरीरमें सम्पूर्ण बौद्ध प्रतीतियोंके साक्षिरूपसे प्रविष्ट हो रहा है। वह बाणके समान अपने ही आत्मा (स्वरूपभूत) अक्षर ब्रह्ममें अनुप्रविष्ट हो रहा है। इसलिये ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है, क्योंकि मनको समाहित करनेकी इच्छावाले पुरुषोंको वही आत्मभावसे लक्षित होता है। <br><br> अतः ऐसा होनेके अनन्तर अप्रमत्त—बाह्य विषयोंकी उपलब्धिकी तृष्णारूप प्रमादसे रहित होकर अर्थात् सब ओरसे विरक्त यानी जितेन्द्रिय होकर एकाग्रचित्तसे ब्रह्मरूप अपने लक्ष्यका वेधन करना चाहिये। और फिर उसका वेधन करनेके अनन्तर बाणके समान तन्मय हो जाना चाहिये। तात्पर्य यह कि जिस प्रकार बाणका अपने लक्ष्यसे एकरूप हो जाना ही फल है उसी प्रकार देहादिमें आत्मत्वकी प्रतीतिका तिरस्कार कर उस अक्षरब्रह्मसे एकात्मत्वरूप फल प्राप्त करे ॥ ४ ॥

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९


आत्मसाक्षात्कारके लिये पुनः विधि

अक्षरस्यैव दुर्लक्ष्यत्वात्पुनः पुनर्वचनं सुलक्षणार्थम्—कठिनतासे लक्षित होनेवाला होनेके कारण उस अक्षरका ही, भली प्रकार लक्ष्य करानेके लिये बार-बार वर्णन किया जाता है—

यस्मिन्द्यौः पृथिवी चान्तरिक्ष- मोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥ ५ ॥

जिसमें द्युलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष और सम्पूर्ण प्राणोंके सहित मन ओतप्रोत है उस एक आत्माको ही जानो, और सब बातोंको छोड़ दो; यही अमृत (मोक्षप्राप्ति) का सेतु (साधन) है ॥ ५ ॥

यस्मिन्नक्षरे पुरुषे द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षं चोतं समर्पितं मनश्च सह प्राणैः करणैरन्यैः सर्वैस्तमेव सर्वाश्रयमेकमद्वितीयं जानथ जानीत हे शिष्याः । आत्मानं प्रत्यक्स्वरूपं युष्माकं सर्वप्राणिनां च ज्ञात्वा चान्या वाचोऽपरविद्यारूपा विमुञ्चथ विमुञ्चत परित्यजत तत्प्रकाश्यं च सर्वं कर्म ससाधनम् ; यतोऽमृतस्यैषहे शिष्यगण ! जिस अक्षर पुरुषमें द्युलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष और प्राणों यानी अन्य समस्त इन्द्रियोंके सहित मन ओत—समर्पित है उस एक—अद्वितीय आत्माको ही जानो; तथा इस प्रकार आत्माको अपने और समस्त प्राणियोंके प्रत्यक्स्वरूपको जानकर अपरविद्यारूप अन्य वाणीको तथा उससे प्रकाशित होनेवाले समस्त कर्मको उसके साधनसहित छोड़ दो—उसका सब प्रकार त्याग कर दो, क्योंकि यह अमृतका सेतु है—

७० | मुण्डकोपनिषद् | [ मुण्डक २


सेतुरेेतदात्मज्ञानममृतस्यामृतत्वस्य मोक्षस्य प्राप्तये सेतुरिव सेतुः संसारमहोदधेः उत्तरणहेतुत्वात्तथा च श्रुत्यन्तरं "तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय" ( श्वे० उ० ३ । ८, ६ । १५ ) इति ॥ ५ ॥यह आत्मज्ञान संसार-महासागरको पार करनेका साधन होनेके कारण अमृत—अमरत्व यानी मोक्षकी प्राप्तिके लिये [ नदीके पार जानेके साधनभूत ] सेतुके समान सेतु है। जैसा कि—"उसीको जानकर पुरुष मृत्युको पार कर जाता है, उसकी प्राप्तिका [ इसके सिवा ] और कोई मार्ग नहीं है" इत्यादि एक अन्य श्रुति भी कहती है॥ ५ ॥

ओंकाररूपसे ब्रह्मचिन्तनकी विधि

किं च—तथा—

अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः

स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः ।

ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं

स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् ॥ ६ ॥

रथचक्रकी नाभिमें जिस प्रकार अरे लगे होते हैं उसी प्रकार जिसमें सम्पूर्ण नाडियाँ एकत्रित होती हैं उस ( हृदय ) के भीतर यह अनेक प्रकारसे उत्पन्न हुआ सञ्चार करता है। उस आत्माका 'ॐ' इस प्रकार ध्यान करो। अज्ञानके उस पार गमन करनेमें तुम्हारा कल्याण हो [ अर्थात् तुम्हें किसी प्रकारका विघ्न प्राप्त न हो ] ॥ ६ ॥

अरा इव, यथा रथनाभौ समर्पिता अरा एवं संहताः सम्प्रविष्टा यत्र यस्मिन्हृदये सर्वतो देहव्यापिन्यो नाड्यस्तस्मिन्हृदयेअरोंके समान अर्थात् जिस प्रकार रथकी नाभिमें अरे समर्पित रहते हैं उसी प्रकार शरीरमें सर्वत्र व्याप्त नाडियाँ जिस हृदयमें संहत अर्थात् प्रविष्ट हैं उसके भीतर यह बौद्ध प्रतीतियों-

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१


बुद्धिप्रत्ययसाक्षीभूतः स एष प्रकृत आत्मान्तर्मध्ये चरते चरति वर्तते; पश्यञ्शृण्वन्मन्वानो विजानन्बहुधानेकधा क्रोधहर्षादिप्रत्ययैर्जायमान इव जायमानोऽन्तःकरणोपाध्यनुविधायित्वाद्वदन्ति लौकिका हृष्टो जातः क्रुद्धो जात इति । तमात्मानम् ओमित्येवमोङ्कारालम्बनाः सन्तो यथोक्तकल्पनया ध्यायथ चिन्तयत ।का साक्षीभूत और जिसका प्रकरण चल रहा है वह आत्मा देखता, सुनता, मनन करता और जानता हुआ अन्तःकरणरूप उपाधिका अनुकरण करनेवाला होनेसे उसके हर्ष-क्रोधादि प्रत्ययोंसे मानो [नवीन-नवीनरूपसे] उत्पन्न होता हुआ मध्यमें सञ्चार करता—वर्तमान रहता है। इसीसे लौकिक पुरुष 'वह हर्षित हुआ, वह क्रोधित हुआ' ऐसा कहा करते हैं। उस आत्माको 'ॐ' इस प्रकार अर्थात् उपर्युक्त कल्पनासे ओंकारको आलम्बन बनाकर ध्यान यानी चिन्तन करो।
उक्तं वक्तव्यं च शिष्येभ्य आचार्येण जानता । शिष्याश्च ब्रह्मविद्याविविदिषुत्वान्निवृत्तकर्माणो मोक्षपथे प्रवृत्ताः। तेषां निर्विघ्नतया ब्रह्मप्राप्तिमाशास्त्याचार्यः। स्वस्ति निर्विघ्नमस्तु वो युष्माकं पाराय परकूलाय। परस्तात्कस्मादविद्यातमसः । अविद्यारहितब्रह्मात्मस्वरूपगमनायेत्यर्थः ॥ ६ ॥विद्वान् आचार्यको शिष्योंसे जो कुछ कहना था वह कह दिया। इससे ब्रह्मविद्याके जिज्ञासु होनेके कारण शिष्यगण भी सब कर्मोंसे उपरत होकर मोक्षमार्गमें जुट गये। अतः आचार्य उन्हें निर्विघ्नतापूर्वक ब्रह्मप्राप्तिका आशीर्वाद देते हैं—'पार अर्थात् पर तीरपर जानेके लिये तुम्हें स्वस्ति—निर्विघ्नता प्राप्त हो। किसके पार जानेके लिये ? अविद्यारूप अन्धकारके पार जानेके लिये अर्थात् अविद्यारहित ब्रह्मात्मस्वरूपकी प्राप्तिके लिये ॥ ६ ॥

७२ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २

अपर ब्रह्मका वर्णन तथा उसके चिन्तनका प्रकार

योऽसौतमसः परस्तात्संसार-महोदधिं तीर्त्वा गन्तव्यः परविद्याविषय इति स कस्मिन्वर्तत इत्याह—यह जो अज्ञानान्धकारके परे संसारमहासागरको पार करके जानेयोग्य परविद्याका प्रदेश है वह किसमें वर्तमान है ? इसपर कहते हैं—

यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्यैष महिमा भुवि दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्न्यात्मा प्रतिष्ठितः ॥ मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय । तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति ॥७॥

जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है और जिसकी यह महिमा भूलोकमें स्थित है वह यह आत्मा दिव्य ब्रह्मपुर आकाश (हृदयाकाश) में स्थित है । वह मनोमय तथा प्राण और [सूक्ष्म] शरीरको [एक देहसे दूसरे देहमें] ले जानेवाला पुरुष हृदयको आश्रितकर अन्न (अन्नमय देह) में स्थित है । उसका विज्ञान (अनुभव) होनेपर ही विवेकी पुरुष, जो आनन्दरूप अमृत ब्रह्म प्रकाशित हो रहा है, उसका सम्यक् साक्षात्कार करते हैं ॥ ७ ॥

यः सर्वज्ञः सर्वविद्व्याख्यातः'जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है' इसकी व्याख्या पहले (मुण्ड० १ । १ । ९ में) की जा चुकी है ।
तं पुनर्विनिशिनष्टि; यस्यैष प्रसिद्धो महिमा विभूतिः। कोऽसौ महिमा ?उसीके फिर और विशेषण बतलाते हैं—जिसकी यह प्रसिद्ध महिमा यानी विभूति है; वह महिमा क्या है ?
यस्येमे द्यावापृथिव्यौ शासने विधृते तिष्ठतः। सूर्याचन्द्रमसौये द्युलोक और पृथिवी जिसके शासनमें धारण किये हुए (यानी स्थिरतापूर्वक) स्थित हैं, जिसके
खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ७३
यस्य शासनेऽलातचक्रवदजस्रं भ्रमतः । यस्य शासने सरितः सागराश्च स्वगोचरं नातिक्रामन्ति। तथा स्थावरं जङ्गमं च यस्य शासने नियतम् । तथा चर्तवोऽयने अब्दाश्च यस्य शासनं नातिक्रामन्ति । तथा कर्तारः कर्माणि फलं च यच्छासनात्स्वं स्वं कालं नातिवर्तन्ते स एष महिमा भुवि लोके यस्य स एष सर्वज्ञ एवं महिमा देवो दिव्ये द्योतनवति सर्वबौद्धप्रत्ययकृतद्योतने ब्रह्मपुरे, ब्रह्मणोऽत्र चैतन्यस्वरूपेण नित्याभिव्यक्तत्वाद्ब्रह्मणः पुरं हृदयपुण्डरीकं तस्मिन्यद्व्योम तस्मिन्व्योम्न्याकाशे हृत्पुण्डरीकमध्यस्थे, प्रतिष्ठित इवोपलभ्यते । न ह्याकाशवत्सर्वगतस्य गतिरागतिः प्रतिष्ठावान्यथा सम्भवति ।शासनमें, सूर्य और चन्द्रमा अलातचक्रके समान निरन्तर घूमते रहते हैं, जिसके शासनमें नदियाँ और समुद्र अपने स्थानका अतिक्रमण नहीं करते, इसी प्रकार स्थावरजङ्गम जगत् जिसके शासनमें नियमित रहता है; तथा ऋतु, अयन और वर्ष--ये भी जिसके शासनका उल्लंघन नहीं करते एवं कर्ता, कर्म और फल जिसके शासनसे अपने-अपने कालका अतिक्रमण नहीं करते—ऐसी यह महिमा संसारमें जिसकी है वह ऐसी महिमावाला सर्वज्ञ देव दिव्य—द्युतिमान् यानी समस्त बौद्ध प्रत्ययोंसे होनेवाले प्रकाशयुक्त ब्रह्मपुरमें—क्योंकि चैतन्यस्वरूपसे इस (हृदयकमलस्थित आकाश) में ब्रह्मकी सर्वदा अभिव्यक्ति होती है इसलिये हृदयकमल ब्रह्मपुर है, उसमें जो आकाश है उस हृदयपुण्डरीकान्तर्गत आकाशमें प्रतिष्ठित (स्थित) हुआ-सा उपलब्ध होता है। इसके सिवा आकाशवत् सर्वव्यापक ब्रह्मका जाना-आना अथवा स्थित होना और किसी प्रकार सम्भव नहीं है।

७४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २


स ह्यात्मा तत्रस्थो मनोवृत्ति-भिरेव विभाव्यत इति मनोमयो मनउपाधित्वात्प्राणशरीरनेता प्राणश्च शरीरं च प्राणशरीरं तस्यायं नेता स्थूलाच्छरीराच्छरीरान्तरं प्रति । प्रतिष्ठितोऽन्ने-स्थितोऽन्ने भुज्यमानान्नविपरिणामे प्रतिदिनमुपचीयमानेऽपचीयमाने च पिण्डरूपान्ने हृदयं बुद्धिं पुण्डरीकच्छिद्रे संनिधाय समवस्थाप्य । हृदयावस्थानमेव ह्यात्मनः स्थितिर्न ह्यात्मनः स्थितिरन्ने ।<br><br>तदात्मतत्त्वं विज्ञानेन विशिष्टेन शास्त्राचार्योपदेशजनितेन ज्ञानेन शमदमध्यानसर्वत्यागवैराग्योद्भूतेन परिपश्यन्ति सर्वतः पूर्णं पश्यन्त्युपलभन्ते धीरा विवेकिनः आनन्दरूपं सर्वानर्थदुःखायासप्रहीणममृतं यद्विभाति विशेषेण स्वात्मन्येव भाति सर्वदा ॥ ७ ॥वहाँ (हृदयाकाशमें) स्थित वही आत्मा मनोवृत्तिसे ही अनुभव किया जाता है; इसलिये मनरूप उपाधिवाला होनेसे वह मनोमय है । तथा प्राणशरीरनेता—प्राण और शरीरका नाम प्राणशरीर है, उसे यह एक स्थूल शरीरसे दूसरे शरीरमें ले जानेवाला है । यह हृदय अर्थात् बुद्धिको उसके पुण्डरीकाकाशमें आश्रित कर अन्न यानी खाये हुए अन्नके परिणामरूप और निरन्तर बढ़ने-घटनेवाले पिण्डरूप अन्न (अन्नमय देह) में स्थित है, क्योंकि हृदयमें स्थित होना ही आत्माकी स्थिति है, अन्यथा अन्नमें आत्माकी स्थिति नहीं है ।<br><br>धीर—विवेकी पुरुष शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे प्राप्त तथा शम, दम, ध्यान, सर्वत्याग एवं वैराग्यसे उत्पन्न हुए विशेष ज्ञानद्वारा उस आत्मतत्त्वको सर्वत्र परिपूर्ण देखते यानी अनुभव करते हैं, जो आनन्दस्वरूप—सम्पूर्ण अनर्थ, दुःख और आयाससे रहित, सुखस्वरूप एवं अमृतमय सर्वदा अपने अन्तःकरणमें ही विशेषरूपसे भास रहा है ॥ ७ ॥

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५


ब्रह्मसाक्षात्कारका फल

अस्य परमात्मज्ञानस्य फलमिदमभिधीयते—इस परमात्मज्ञानका यह फल बतलाया जाता है—

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्च्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥ ८ ॥

उस परावर (कारणकार्यरूप) ब्रह्मका साक्षात्कार कर लेनेपर इस जीवकी हृदयग्रन्थि टूट जाती है, सारे संशय नष्ट हो जाते हैं और इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं ॥ ८ ॥

भिद्यते हृदयग्रन्थिरविद्यावासनाप्रचयो बुद्ध्याश्रयः कामः “कामा येऽस्य हृदि श्रिताः” (क० उ० २ । ३ । १४, वृ० उ० ४ । ४ । ७) इति श्रुत्यन्तरात्। हृदयाश्रयोऽसौ नात्माश्रयः भिद्यते भेदं विनाशमायाति । छिद्यन्ते सर्वज्ञेयविषयाः संशया लौकिकानामामरणान्तु गङ्गास्रोतोवत्प्रवृत्ता विच्छेदमायान्ति । अस्य विच्छिन्नसंशयस्य निवृत्ताविद्यस्य यानि विज्ञानोत्पत्तेः प्राक्तनानि जन्मान्तरे चाप्रवृत्त-“इसके हृदयमें जो कामनाएँ आश्रित हैं” इत्यादि अन्य श्रुतिके अनुसार ‘हृदयग्रन्थि’ बुद्धिमें स्थित अविद्यावासनामय कामको कहते हैं। यह हृदयके ही आश्रित रहनेवाली है आत्माके आश्रित नहीं । [उस आत्मतत्त्वका साक्षात्कार होनेपर यह] भेद अर्थात् नाशको प्राप्त हो जाती है। तथा लौकिक पुरुषोंके ज्ञेय पदार्थविषयक सम्पूर्ण सन्देह, जो उनके मरणपर्यन्त गङ्गाप्रवाहवत् प्रवृत्त होते रहते हैं, विच्छिन्न हो जाते हैं। जिसके संशय नष्ट हो गये हैं और जिसकी अविद्या निवृत्त हो चुकी है ऐसे इस पुरुषके जो विज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व जन्मान्तरमें किये हुए कर्म फलोन्मुख नहीं हुए

७६ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २


फलानि ज्ञानोत्पत्तिसहभावीनि<br>च क्षीयन्ते कर्माणि । न त्वेत-<br>ज्जन्मारम्भकाणि प्रवृत्तफलत्वात् ।<br>तस्मिन्सर्वज्ञेऽसंसारिणि परावरे<br>परं च कारणात्मनावरं च<br>कार्यात्मना तस्मिन्परावरे साक्षा-<br>दहमस्मीति दृष्टे संसारकारणो-<br>च्छेदान्मुच्यत इत्यर्थः ॥ ८ ॥हैं और जो ज्ञानोत्पत्ति के साथ-<br>साथ किये जाते हैं वे सभी नष्ट हो<br>जाते हैं; किन्तु इस ( वर्तमान )<br>जन्मको आरम्भ करनेवाले कर्म<br>क्षीण नहीं होते, क्योंकि उनका<br>फल देना आरम्भ हो जाता है ।<br>तात्पर्य यह है कि उस सर्वज्ञ<br>असंसारी परावर—कारणरूपसे<br>पर और कार्यरूपसे अपर ऐसे उस<br>परावरके 'यह साक्षात् मैं ही हूँ' इस<br>प्रकार देख लिये जानेपर संसारके<br>कारणका उच्छेद हो जानेसे यह<br>पुरुष मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥

उक्तस्यैवार्थस्य सङ्क्षेपाभि-<br>धायका उत्तरे मन्त्रास्त्रयोऽपि—आगेके तीन मन्त्र भी पूर्वोक्त<br>अर्थको ही संक्षेपसे बतलाने-<br>वाले हैं—

ज्योतिर्मय ब्रह्म

हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् ।
यच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥ ९ ॥

वह निर्मल और कलाहीन ब्रह्म हिरण्मय ( ज्योतिर्मय ) परम कोशमें विद्यमान है । वह शुद्ध और सम्पूर्ण ज्योतिर्मय पदार्थोंकी ज्योति है और वह है जिसे कि आत्मज्ञानी पुरुष जानते हैं ॥ ९ ॥

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७


हिरण्मये ज्योतिर्मये बुद्धि-विज्ञानप्रकाशे परे कोशे कोश इवासेः, आत्मस्वरूपोपलब्धिस्थानत्वात्; परं तत्सर्वाभ्यन्तरत्वात् तस्मिन् विरजमविद्याद्यशेषदोषरजोमलवर्जितं ब्रह्म सर्वमहत्त्वात् सर्वात्मत्वाच्च । निष्कलं निर्गताः कला यस्मात्तन्निष्कलं निरवयवम् इत्यर्थः ।हिरण्मय—ज्योतिर्मय अर्थात् बुद्धिवृत्तिके प्रकाशरूप परमकोशमें, जो आत्मस्वरूपकी उपलब्धिको स्थान होनेके कारण तलवारके कोश (म्यान) के समान है और सबसे भीतरी होनेके कारण श्रेष्ठ है, उसमें विरज—अविद्यादि सम्पूर्ण दोषरूप मलसे रहित ब्रह्म विराजमान है, जो सबसे बड़ा तथा सर्वरूप होनेके कारण ब्रह्म है। वह निष्कल है; जिससे सब कलाएँ निकल गयी हों उसे निष्कल कहते हैं अर्थात् वह निरवयव है ।
यस्माद्विरजं निष्कलं चातस्तच्छुभ्रं शुद्धं ज्योतिषां सर्वप्रकाशात्मनामग्न्यादीनामपि तज्ज्योतिरवभासकम् । अग्न्यादीनाम् अपि ज्योतिष्टमन्तर्गतब्रह्मात्मचैतन्यज्योतिर्निमित्तमित्यर्थः । तद्धि परं ज्योतिर्यदन्यानवभास्यम् आत्मज्योतिस्तद्यदात्मविद आत्मानं स्वं शब्दादिविषयबुद्धिप्रत्ययसाक्षिणं ये विवेकिनो विदुर्विजानन्ति त आत्मविद-क्योंकि ब्रह्म विरज और निष्कल है इसलिये वह शुभ्र यानी शुद्ध और ज्योतियों—अग्नि आदि सम्पूर्ण प्रकाशमय पदार्थोंका भी ज्योतिः—प्रकाशक है । तात्पर्य यह है कि अग्नि आदिका ज्योतिर्मयत्व भी अपने अन्तर्वर्ती ब्रह्मात्मचैतन्यरूप ज्योतिके ही कारण है । जो किसी अन्यसे प्रकाशित न होनेवाला आत्मज्योति है वही परम ज्योति है, जिसे कि आत्मवेत्ता—जो विवेकी पुरुष आत्मा अर्थात् अपनेको शब्दादि विषय और बुद्धिप्रत्ययोंका साक्षी जानते हैं

७८ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २


स्तद्विदुरात्मप्रत्ययानुसारिणः । यस्मात्परं ज्योतिस्तस्मात्त एव तद्विदुर्नेतरे बाह्यार्थप्रत्ययानुसारिणः ॥ ९ ॥ | वे आत्मानुभवका अनुसरण करनेवाले आत्मज्ञानी पुरुष जानते हैं। क्योंकि वह परम ज्योति है इसलिये उसे वे ही जानते हैं; दूसरे बाह्य प्रतीतियोंका अनुसरण करनेवाले पुरुष नहीं जानते ॥ ९ ॥


कथं तज्ज्योतिषां ज्योतिरित्युच्यते— | वह ज्योतियोंका ज्योति किस प्रकार है ? सो बतलाया जाता है—

ब्रह्मका सर्वप्रकाशकत्व

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १० ॥

वहाँ (उस आत्मस्वरूप ब्रह्ममें) न सूर्य प्रकाशित होता है और न चन्द्रमा या तारे। वहाँ यह बिजली भी नहीं चमकती फिर यह अग्नि किस गिनतीमें है ? उसके प्रकाशित होनेसे ही सब प्रकाशित होता है और यह सब कुछ उसीके प्रकाशसे प्रकाशमान है ॥ १० ॥

न तत्र तस्मिन्स्वात्मभूते ब्रह्मणि सर्वावभासकोऽपि सूर्यो भाति । तद्ब्रह्म न प्रकाशयति इत्यर्थः । स हि तस्यैव भासा सर्वमन्यदनात्मजातं प्रकाशयति | वहाँ—अपने आत्मस्वरूप ब्रह्ममें सबको प्रकाशित करनेवाला सूर्य भी प्रकाशित नहीं होता अर्थात् वह भी उस ब्रह्मको प्रकाशित नहीं करता । वह (सूर्य) तो उस (ब्रह्म) के प्रकाशसे ही अन्य सब अनात्मपदार्थोंको

खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ७९
इत्यर्थः । न तु तस्य स्वतः प्रकाशनसामर्थ्यम् । तथा न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निरस्मद्गोचरः ।<br><br>किं बहुना; यदिदं जगद्भाति तत्तमेव परमेश्वरं स्वतः भारूपत्वाद्भान्तं दीप्यमानमनुभात्यनुदीप्यते । यथा जलोल्मुकाद्यग्निसंयोगादग्निं दहन्तमनुदहति न स्वतःस्तद्वत्तस्यैव भासा दीप्त्या सर्वमिदं सूर्यादि जगद्विभाति ।<br><br>यत एवं तदेव ब्रह्म भाति च विभाति च कार्यगतेन विविधेन भासातस्तस्य ब्रह्मणो भारूपत्वं स्वतोऽवगम्यते । न हि स्वतोऽविद्यमानं भासनमन्यस्य कर्तुंप्रकाशित करता है, उसमें स्वतः प्रकाश करनेका सामर्थ्य है ही नहीं। इसी प्रकार वहाँ न तो चन्द्रमा या तारे ही प्रकाशित होते हैं और न यह बिजली ही; फिर हमें साक्षात् दिखलायी देनेवाला यह अग्नि तो हो ही कैसे सकता है ?<br><br>अधिक क्या ? यह जो जगत् भासता है वह स्वयं प्रकाशरूप होनेके कारण उस परमेश्वरके प्रकाशित होनेपर उसीके पीछे प्रकाशित—देदीप्यमान हो रहा है। जिस प्रकार अग्निके संयोगसे जल और उल्मुक (अंगारा) आदि अग्निके प्रज्वलित होनेपर उसके कारण जलाने लगते हैं—स्वतः नहीं जलाते उसी प्रकार यह सूर्य आदि सम्पूर्ण जगत् उस (परब्रह्म) के प्रकाश—तेजसे ही प्रकाशित होता है।<br><br>क्योंकि ऐसी बात है, इसलिये वह ब्रह्म ही कार्यगत विचित्र प्रकाशसे विशेषरूपसे प्रकाशित हो रहा है। इससे उस ब्रह्मकी प्रकाशरूपता स्वतः ज्ञात हो जाती है। जिसमें स्वयं प्रकाश नहीं है वह दूसरेको भी प्रकाशित नहीं

८० मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक २

शक्नोति । घटादीनामन्यावभासकत्वाददर्शनाद्भारूपाणां चादित्यादीनां तद्दर्शनात् ॥ १० ॥कर सकता, क्योंकि घटादि पदार्थोंमें दूसरोंको प्रकाशित करना नहीं देखा जाता तथा प्रकाशस्वरूप सूर्य आदिमें वह देखा जाता है ॥ १० ॥

यत्तज्ज्योतिषां ज्योतिर्ब्रह्म तदेव सत्यं सर्वं तद्विकारं वाचारम्भणं विकारो नामधेयमात्रमनृतमितरदित्येतमर्थं विस्तरेण हेतुतः प्रतिपादितं निगमनस्थानीयेन मन्त्रेण पुनरुपसंहरति ।जो ब्रह्म ज्योतियोंका ज्योति है, वही सत्य है तथा सब कुछ उसीका विकार है जो विकार केवल वाणीका आरम्भ और नाममात्र है अतः अन्य सभी मिथ्या है—ऊपर विस्तार और हेतुपूर्वक कहे हुए इस अर्थका इस निगमनस्थानीय मन्त्रसे पुनः उपसंहार करते हैं—

ब्रह्मका सर्वव्यापकत्व

ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण।
अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥११॥

यह अमृत ब्रह्म ही आगे है, ब्रह्म ही पीछे है, ब्रह्म ही दायीं-वायीं ओर है तथा ब्रह्म ही नीचे-ऊपर फैला हुआ है । यह सारा जगत् सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है ॥ ११ ॥

ब्रह्मैवोक्तलक्षणमिदं यत्पुरस्तादग्रे ब्रह्मैवाविद्यादृष्टीनां प्रत्यवभासमानं तथा पश्चाद्ब्रह्म तथा दक्षिणतश्च तथोत्तरेण तथैवाध-यह जो अविद्यामयी दृष्टिवालोंको सामने दिखायी दे रहा है वह उपर्युक्त लक्षणोंवाला ब्रह्म ही है । इसी प्रकार पीछे भी ब्रह्म है, दायीं और बायीं ओर भी ब्रह्म है तथा
खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ८१

स्तादूर्ध्वं च सर्वतोऽन्यदिव कार्या-नीचे-ऊपर सभी ओर कार्यरूपसे
कारेण प्रसृतं प्रगतं नामरूपवद्नामरूपविशिष्ट होकर फैला हुआ
अवभासमानम् । किं बहुना ब्रह्मैववह ब्रह्म ही अन्य पदार्थोंके समान
इदं विश्वं समस्तमिदं जगद्वरिष्ठंभास रहा है । अधिक क्या ? यह
वरतमम् । अब्रह्मप्रत्ययः सर्वो-विश्व अर्थात् सारा जगत् श्रेष्ठतम
ऽविद्यामात्रो रज्ज्वामिव सर्प-ब्रह्म ही है । यह सम्पूर्ण अब्रह्मरूप
प्रत्ययः । ब्रह्मैवैकं परमार्थसत्यम्प्रतीति रज्जुमें सर्पप्रतीतिके समान
इति वेदानुशासनम् ॥ ११ ॥अविद्यामात्र ही है । एकमात्र ब्रह्म
ही परमार्थ सत्य है—यह वेदका
उपदेश है ॥ ११ ॥

इत्यथर्ववेदीयमुण्डकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयमुण्डके द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥


समाप्तमिदं द्वितीयं मुण्डकम् ।

तृतीय मुण्डक (प्रथम खण्ड) - द्वा सुपर्णा व सत्यमेव जयते

तृतीय मुण्डक

प्रथम खण्ड

प्रकारान्तरसे ब्रह्मनिरूपण

परा विद्योक्ता यया तदक्षरं पुरुषाख्यं सत्यमधिगम्यते । यदधिगमे हृदयग्रन्थ्यादिसंसारकारणस्यात्यन्तिकविनाशः स्यात् । तद्दर्शनोपायश्च योगो धनुराद्युपादानकल्पनयोक्तः । अथेदानीं तत्सहकारीणि सत्यादिसाधनानि वक्तव्यानीति तदर्थमुत्तरारम्भः । प्राधान्येन तत्त्वनिर्धारणं च प्रकारान्तरेण क्रियते अत्यन्तदुरवगाह्यत्वात्कृतमपि । तत्र सूत्रभूतो मन्त्रः परमार्थवस्त्ववधारणार्थमुपन्यस्यते—जिससे उस अक्षर पुरुषसंज्ञक सत्यका ज्ञान होता है उस परा विद्याका वर्णन किया गया, जिसका ज्ञान होनेपर हृदयग्रन्थि आदि संसारके कारणका आत्यन्तिक नाश हो जाता है । तथा धनुर्ग्रहण आदिकी कल्पनासे उसके साक्षात्कारके उपाय योगका भी उल्लेख किया गया । अब उसके सहकारी सत्यादि साधनोंका वर्णन करना है; इसीके लिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है । यद्यपि ऊपर तत्त्वका निश्चय किया जा चुका है तो भी अत्यन्त दुर्बोध होनेके कारण उसका प्रधानतासे दूसरी तरह फिर निश्चय किया जाता है । अतः परमार्थवस्तुको समझनेके लिये पहले इस सूत्रभूत मन्त्रका उपन्यास (उल्लेख) करते हैं—

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३


समान वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षी

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य-
नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ १ ॥

साथ-साथ रहनेवाले तथा समान आख्यानवाले दो पक्षी एक ही वृक्षका आश्रय करके रहते हैं । उनमें एक तो स्वादिष्ट (मधुर) पिप्पल (कर्मफल) का भोग करता है और दूसरा भोग न करके केवल देखता रहता है ॥ १ ॥


द्वा द्वौ सुपर्णा सुपर्णौ शोभनपतनौ सुपर्णौ पक्षिसामान्याद्वा सुपर्णौ सयुजा सयुजौ सहैव सर्वदा युक्तौ सखाया सखायौ समानाख्यानौ समानाभिव्यक्तिकारणावेवंभूतौ सन्तौ समानम् अविशेषोपलब्ध्यधिष्ठानतयैकं वृक्षं वृक्षमिवोच्छेदनसामान्याच्छरीरं[जीव और ईश्वररूप] दो सुपर्ण—सुन्दर पर्णवाले अर्थात् [नियम्य-नियामकभावकी प्राप्तिरूप] शोभन पतनवाले* अथवा पक्षियोंके समान [वृक्षपर निवास तथा फलभोग करनेवाले] होनेसे सुपर्ण—पक्षी तथा संयुज—सर्वदा साथ-साथ ही रहनेवाले और सखा यानी समान आख्यानवाले अर्थात् जिनकी अभिव्यक्तिका कारण समान है ऐसे दो सुपर्ण समान—सामान्यरूपसे [दोनोंकी] उपलब्धिका कारण होनेसे एक ही वृक्ष—वृक्षके समान उच्छेदमें समानता होनेके कारण शरीररूप

* ईश्वर सर्वज्ञ होनेके कारण नियामक है तथा जीव अल्पज्ञ होनेसे नियम्य है । इसलिये उनमें नियम्य-नियामकभावकी प्राप्ति उचित ही है ।

८४ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३ ]


वृक्षं परिषस्वजाते परिष्वक्त-वृक्षपर आलिङ्गन किये हुए हैं,
वन्तौ सुपर्णाविवैकं वृक्षं फलोप-अर्थात् फलोपभोगके लिये पक्षियोंके
भोगार्थम् ।समान एक ही वृक्षपर निवास करते हैं ।
अयं हि वृक्ष ऊर्ध्वमूलोऽवा-अव्यक्तरूप मूलसे उत्पन्न हुआ
क्शाखोऽश्वत्थोऽव्यक्तमूलप्रभवःसम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मफलका आश्रय-
क्षेत्रसंज्ञकः सर्वप्राणिकर्मफला-भूत यह क्षेत्रसंज्ञक अश्वत्थवृक्ष
श्रयस्तं परिष्वक्तौ सुपर्णाविवा-ऊपरको मूल और नीचेकी ओर
विद्याकामकर्मवासनाश्रयलिङ्गो-शाखाओंवाला है । उस वृक्षपर
पाध्यात्मेश्वरौ । तयोः परिष्वक्त-अविद्या, काम, कर्म और वासनाके
योरन्य एकः क्षेत्रज्ञो लिङ्गो-आश्रयभूत लिङ्गदेहरूप उपाधिवाले
पाधिवृक्षमाश्रितः पिप्पलं कर्म-जीव और ईश्वर दो पक्षियोंके समान
निष्पन्नं सुखदुःखलक्षणं फलंआलिङ्गन किये निवास करते हैं ।
स्वाद्वनेकविचित्रवेदनास्वादरूपंइस प्रकार आलिङ्गन करके रहने-
स्वाद्वत्ति भक्षयत्युपभुङ्क्तेऽविवे-वाले उन दोनोंमेंसे एक—
कतः । अनश्नन्नन्य इतर ईश्वरोलिङ्गोपाधिरूप वृक्षको आश्रित
नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः सर्वज्ञःकरनेवाला क्षेत्रज्ञ पिप्पल यानी
सर्वसत्त्वोपाधीरीश्वरो नाश्नाति ।अपने कर्मसे प्राप्त होनेवाला सुख-
प्रेरयिता ह्यसावुभयोर्भोज्य-दुःखरूप फल, जो अनेक प्रकारसे विचित्र अनुभवरूप स्वादके कारण स्वादु है, खाता—भक्षण करता यानी अविवेकवश भोगता है । किन्तु अन्य—दूसरा, जो नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वरूप सर्वज्ञ मायोपाधिक ईश्वर है, उसे ग्रहण न करता हुआ नहीं भोगता । यह तो साक्षित्वरूप सत्तामात्रसे भोक्ता और

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५


भोक्त्रोर्नित्यसाक्षित्वसत्तामात्रेण । स त्वनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति पश्यत्येव केवलम् । दर्शनमात्रं हि तस्य प्रेरयितृत्वं राजवत् ॥१॥भोग्य दोनोंका प्रेरक ही है । अतः वह दूसरा तो फल-भोग न करके केवल देखता ही है—उसका प्रेरकत्व तो राजाके समान केवल दर्शनमात्र ही है ॥ १ ॥

ईश्वरदर्शनसे जीवकी शोकनिवृत्ति

तत्रैवं सति—अतः ऐसा होनेसे—

समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो-
ऽनीशया शोचति मुह्यमानः ।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य
महिमानमिति वीतशोकः ॥ २ ॥

[ ईश्वरके साथ ] एक ही वृक्षपर रहनेवाला जीव अपने दीन-स्वभावके कारण मोहित होकर शोक करता है । वह जिस समय [ ध्यानद्वारा ] अपनेसे विलक्षण योगिसेवित ईश्वर और उसकी महिमा [ संसार ] को देखता है उस समय शोकरहित हो जाता है ॥ २ ॥

समाने वृक्षे यथोक्ते शरीरे पुरुषो भोक्ता जीवोऽविद्याकाम-कर्मफलरागादिगुरुभाराक्रान्तो-ऽलाबुरिव सामुद्रे जले निमग्नो निश्चयेन देहात्मभावमापन्नोऽयम् एवाहममुष्य पुत्रोऽस्य नप्ता कृशःसमान वृक्षपर यानी पूर्वोक्त शरीरमें अविद्या, कामना, कर्मफल और रागादिके भारी भारसे आक्रान्त होकर समुद्रके जलमें डूबे हुए तूँवेके समान निमग्न—निश्चयपूर्वक देहात्मभावको प्राप्त हुआ यह भोक्ता जीव 'मैं यही हूँ', 'मैं अमुकका पुत्र हूँ', 'इसका नाती हूँ', 'कृश हूँ',

८६ मुण्डकोपनिषद् [ मुण्डक ३


स्थूलो गुणवान्निर्गुणः सुखी दुःखीत्येवंप्रत्ययो नास्त्यन्योऽस्मादिति जायते म्रियते संयुज्यते वियुज्यते च सम्बन्धिबान्धवैः ।<br><br>अतोऽनीशया न कस्यचित् समर्थोऽहं पुत्रो मम विनष्टो मृता मे भार्या किं मे जीवितेनेत्येवं दीनभावोऽनीशा तया शोचति सन्तप्यते मुह्यमानोऽनेकैरनर्थप्रकारैरविवेकतया चिन्तामापद्यमानः।<br><br>स एवं प्रेततिर्यङ्मनुष्यादियोनिष्वाजवं जवीभावमापन्नः कदाचिदनेकजन्मसु शुद्धधर्मसञ्चितनिमित्ततः केनचित्परमकारुणिकेन दर्शितयोगमार्गोऽहिंसासत्यब्रह्मचर्यसर्वत्यागशमदमादिसम्पन्नः समाहितात्मा सन् जुष्टं सेवितमनेकैर्योगाग्मैः'स्थूल हूँ', 'गुणवान् हूँ', 'गुणहीन हूँ', 'सुखी हूँ', 'दुःखी हूँ' इत्यादि प्रकारके प्रत्ययोंवाला होनेसे तथा 'इस देहसे भिन्न और कुछ नहीं है' ऐसा समझनेके कारण उत्पन्न होता, मरता एवं अपने सम्बन्धियोंसे मिलता और बिछुड़ता रहता है।<br><br>अतः अनीशावश—'मैं किसी कार्यके लिये समर्थ नहीं हूँ, मेरा पुत्र नष्ट हो गया और स्त्री भी मर गयी, अब मेरे जीवनसे क्या लाभ है ?'—इस प्रकारके दीनभावको अनीशा कहते हैं, उससे युक्त होकर अविवेकवश अनेकों अनर्थमय प्रकारोंसे मोहित अर्थात् आन्तरिक चिन्ताको प्राप्त हुआ वह शोक यानी सन्ताप करता रहता है।<br><br>इस प्रकार प्रेत, तिर्यक् और मनुष्यादि योनियोंमें निरन्तर लघुताको प्राप्त हुआ वह जिस समय अनेकों जन्मोंमें कभी अपने शुद्ध धर्मके सञ्चयके कारण किसी परम कारुणिक गुरुके द्वारा योगमार्ग दिखलाये जानेपर अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, सर्वत्याग और शम-दमादि-से सम्पन्न तथा समाहितचित्त होकर ध्यान करनेपर अनेकों योगमार्गों और