भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

॥ ॐ श्रीलक्ष्मीनृसिंहाभ्यां नमः ॥ 1113 महर्षिवेदव्यासप्रणीत श्रीनरसिंहपुराण ( सचित्र, हिन्दी-अनुवादसहित ) गीताप्रेस गोरखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR [SINCE 1923] गीताप्रेस, गोरखपुर In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

ॐ श्रीलक्ष्मीनृसिंहाभ्यां नमः 1113 महर्षिवेदव्यासप्रणीतम् श्रीनरसिंहपुराणम् (श्रीभरद्वाजमुनि और लोमहर्षण सूतजीके संवादरूपमें) मूल संस्कृत हिंदी-अनुवादसहित गीताप्रेस, गोरखपुर

In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

ॐ श्रीलक्ष्मीनृसिंहाभ्यां नमः 1113 महर्षिवेदव्यासप्रणीत श्रीनरसिंहपुराण ( श्रीभरद्वाजमुनि और लोमहर्षण सूतजीके संवादरूपमें ) ( सचित्र, हिन्दी-अनुवादसहित ) त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥ गीताप्रेस, गोरखपुर 1113 Narsingpuran_Section_1_1_FrontIn Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

सं० २०७५ चौदहवाँ पुनर्मुद्रण ३,००० कुल मुद्रण ५२,००० ❖ मूल्य— ₹ १०० ( एक सौ रुपये ) प्रकाशक एवं मुद्रक— गीताप्रेस, गोरखपुर—२७३००५ (गोबिन्दभवन-कार्यालय, कोलकाता का संस्थान) फोन : ( ०५५१ ) २३३४७२१, २३३१२५०, २३३३०३० web : gitapress.org e-mail : booksales@gitapress.org गीताप्रेस प्रकाशन gitapressbookshop.in से online खरीदें। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth3 Narsingpuran_Section_1_1_Back

॥ श्रीहरिः ॥ श्रीनरसिंहपुराणका संक्षिप्त परिचय और निवेदन श्रीनरसिंह पुराण सम्पूर्ण, हिन्दी-अनुवादके साथ आप सभी भगवत्प्रेमी महानुभावोंकी सेवामें प्रस्तुत है। इसके पूर्व यह 'कल्याण' वर्ष ४५—'अग्निपुराण' तथा 'गर्गसंहिता' के उत्तरार्धके साथ (सन् १९७१ ई० के) विशेषाङ्कके रूपमें प्रकाशित हुआ था। इसके महत्त्व, उपयोगिता तथा अत्यधिक माँगको देखते हुए अब यह ग्रन्थाकारमें पुनः प्रकाशित किया गया है। अन्यान्य पुराणोंकी भाँति श्रीनरसिंहपुराण भी भगवान् श्रीवेदव्यासरचित ही माना जाता है। इसमें भी पुराणोंके लक्षणके अनुसार ही सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरितका सुन्दर वर्णन है। भगवान्‌के अवतारोंकी लीला-कथा है, उसमें भगवान् श्रीरामका लीलाचरित प्रधानरूपसे वर्णित है। श्रीमार्कण्डेय मुनिकी मृत्युपर विजय प्राप्त करनेकी सुन्दर कथा है, उसमें 'यमगीता' है। कलियुगके मनुष्योंके लिये बड़ी ही आशाप्रद बातें हैं। इसमें कई ऐसे स्तोत्र-मन्त्रोंका विधान बताया गया है, जिनके अनुष्ठानसे भोग-मोक्षकी सिद्धि प्राप्त हो सकती है। भक्तिके स्वरूप, भक्तोंके लक्षण तथा ध्रुव आदि भक्तोंके सुन्दर चरित्रोंका वर्णन है। इस छोटेसे पुराणमें बहुत ही उपयोगी तथा जाननेयोग्य सामग्री है। आशा है, पाठक-पाठिका इसका पठन-मनन करेंगे तथा इसमें उल्लिखित कल्याणकारी विषयोंको यथारुचि यथावश्यक अपने जीवनमें उतारकर लाभ उठावेंगे। पठतां शृण्वतां नॄणां नरसिंहः प्रसीदति। प्रसन्ने देवदेवेशे सर्वपापक्षयो भवेत्। प्रक्षीणपापबन्धास्ते मुक्तिं यान्ति नरा इति॥ —प्रकाशक 1113 Narsingpuran_Section_1_2_Front

॥ श्रीहरिः ॥ श्रीनरसिंहपुराणकी विषय-सूची

अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या १- प्रयागमें ऋषियोंका समागम; सूतजीके ११- मार्कण्डेयजीद्वारा शेषशायी भगवान्‌का प्रति भरद्वाजजीका प्रश्न; सूतजीद्वारा स्तवन ................................................ ४२ कथारम्भ और सृष्टिक्रमका वर्णन .... ७ १२- यम और यमीका संवाद ....................... ४८ २- ब्रह्मा आदिकी आयु और कालका १३- पतिव्रताकी शक्ति; उसके साथ एक स्वरूप .......................................... १२ ब्रह्मचारीका संवाद; माताकी रक्षा परम ३- ब्रह्माजीद्वारा लोकरचना और नौ प्रकारकी धर्म है, इसका उपदेश.......................... ५१ सृष्टियोंका निरूपण .......................... १४ १४- तीर्थसेवन और आराधनसे भगवान्‌की ४- अनुसर्गके स्रष्टा ................................. १७ प्रसन्नता; 'अनाश्रमी' रहनेसे दोष तथा ५- रुद्र आदि सर्गों और अनुसर्गोंका वर्णन, आश्रमधर्मके पालनसे भगवत्प्राप्तिका दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंकी संततिका कथन ................................................ ५६ विस्तार .......................................... १८ १५- संसारवृक्षका वर्णन तथा इसे नष्ट करनेवाले ६- अगस्त्य तथा वसिष्ठजीके मित्रावरुणके ज्ञानकी महिमा ..................................... ५८ पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेका प्रसङ्ग ....... २३ १६- भगवान् विष्णुके ध्यानसे मोक्षकी प्राप्तिका ७- मार्कण्डेयजीके द्वारा तपस्यापूर्वक श्रीहरिकी प्रतिपादन ........................................... ५९ आराधना; 'मृत्युञ्जय-स्तोत्र' का पाठ १७- अष्टाक्षरमन्त्र और उसका माहात्म्य . ६३ और मृत्युपर विजय प्राप्त करना ..... २७ १८- भगवान् सूर्यद्वारा संज्ञाके गर्भसे मनु, यम ८- मृत्यु और दूतोंको समझाते हुए यमका और यमीकी, छायाके गर्भसे मनु, शनैश्चर उन्हें वैष्णवोंके पास जानेसे रोकना; एवं तपतीकी उत्पत्ति तथा अश्वरूपधारिणी उनके मुँहसे श्रीहरिके नामकी महिमा संज्ञासे अश्विनीकुमारोंका प्रादुर्भाव .... ६६ सुनकर नरकस्थ जीवोंका भगवान्‌को १९- विश्वकर्माद्वारा १०८ नामोंसे भगवान् नमस्कार करके श्रीविष्णुके धाममें सूर्यका स्तवन ...................................... ६८ जाना............................................... ३३ २०- मारुतौंकी उत्पत्ति ................................ ७२ ९- यमाष्टक-यमराजका अपने दूतके प्रति २१- सूर्यवंशका वर्णन .................................. ७३ उपदेश ........................................... ३६ २२- चन्द्रवंशका वर्णन................................... ७४ १०-मार्कण्डेयका विवाह कर, वेदशिराको उत्पन्न २३- चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन ..................... ७६ करके प्रयागमें अक्षयवटके नीचे तप एवं २४- सूर्यवंश-राजा इक्ष्वाकुका भगवत्प्रेम; भगवान्‌की स्तुति करना; फिर उनका भगवद्दर्शनके हेतु तपस्याके लिये आकाशवाणीके अनुसार स्तुति करनेपर प्रस्थान ............................................. ७९ भगवान्‌का उन्हें आशीर्वाद एवं वरदान २५- इक्ष्वाकुकी तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा देना तथा मार्कण्डेयजीका क्षीरसागरमें विष्णुप्रतिमाकी प्राप्ति ............................. ८२ जाकर पुनः उनका दर्शन करना..... ३८ २६- इक्ष्वाकुकी संततिका वर्णन ..................... ८९

In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth | 13 Narsingpuran_Section_1_2_Back

अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या | अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या

( ५ ) अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या | अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या २७-चन्द्रवंशका वर्णन........................... ९१ | ४६-परशुरामावतारकी कथा .................. १६८ २८-शान्तनुका चरित्र ........................... ९३ | ४७-श्रीरामावतारकी कथा—श्रीरामके जन्मसे २९-शान्तनुकी संततिका वर्णन ............. ९६ | लेकर विवाहतकके चरित्र ............ १७१ ३०-भूगोल तथा स्वर्गलोकका वर्णन..... ९८ | ४८-श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन ३१-ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका | तथा वनमें राम-भरतकी भेंट ......... १८३ संक्षिप्त वर्णन.................................. १०३ | ४९-श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, ३२-सहस्रानीक-चरित्र; श्रीनृसिंह-पूजनका | सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना; माहात्म्य ...................................... ११५ | शूर्पणखाका अनादर; सीताहरण; ३३-भगवान्‌के मन्दिरमें झाडू देने और | जटायुवध और शबरीको दर्शन देना .. १९६ उसको लीपनेका महान् फल—राजा | ५०-सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद जयध्वजकी कथा ......................... ११६ | और उसकी भर्त्सना; सीताकी खोज ३४-भगवान् विष्णुके पूजनका फल ...... १२३ | और हनुमान्‌का लङ्कागमन.............. २०७ ३५-लक्षहोम और कोटिहोमकी विधि | ५१-हनुमान्‌जीका समुद्र पार करके लङ्कामें तथा फल ................................... १२७ | जाना, सीतासे भेंट और लङ्काका दहन ३६-अवतार-कथाका उपक्रम............... १२९ | करके श्रीरामको समाचार देना ....... २१९ ३७-मत्स्यावतार तथा मधु-कैटभ-वध ... १३० | ५२-श्रीराम आदिका समुद्रतटपर जाना; ३८-कूर्मावतार; समुद्रमन्थन और मोहिनी- | विभीषणकी शरणागति और उन्हें लङ्काके अवतार......................................... १३३ | राज्यकी प्राप्ति; समुद्रका श्रीरामको मार्ग ३९-वाराह-अवतार; हिरण्याक्ष-वध ....... १३७ | देना; पुलद्वारा समुद्र पार करके ४०-नृसिंहावतार; हिरण्यकशिपुकी वरदान- | वानरसेनासहित श्रीरामका सुवेल पर्वतपर प्राप्ति और उससे सताये हुए देवोंद्वारा | पड़ाव डालना; अङ्गदका प्रभाव; भगवान्‌की स्तुति......................... १३८ | लक्ष्मणकी प्रेरणासे श्रीरामका अङ्गदकी ४१-प्रह्वादकी उत्पत्ति और उनकी हरि- | प्रशंसा करना; अङ्गदके वीरोचित उद्गार भक्तिसे हिरण्यकशिपुकी उद्विग्नता..... १४३ | और दौत्यकर्म; वानर वीरोंद्वारा राक्षसोंका ४२-प्रह्लादपर हिरण्यकशिपुका कोप और | संहार; रावणका श्रीरामके द्वारा युद्धमें प्रह्लादका वध करनेके लिये उसके द्वारा | पराजित होना; कुम्भकर्णका वध; अतिकाय किये गये अनेक प्रयत्न .................. १४८ | आदि राक्षस वीरोंका मारा जाना; ४३-प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना; | मेघनादका पराक्रम और वध; रावणकी हिरण्यकशिपुकी आज्ञासे प्रह्लादका समुद्रमें | शक्तिसे मूर्च्छित लक्ष्मणका हनुमान्‌जीके डाला जाना तथा वहीं उन्हें भगवान्‌का | द्वारा पुनर्जीवन; राम-रावण-युद्ध; रावण- प्रत्यक्ष दर्शन होना.......................... १५२ | वध; देवताओंद्वारा श्रीरामकी स्तुति; ४४-नृसिंहका प्रादुर्भाव और हिरण्यकशिपुका | सीताके साथ अयोध्यामें आनेपर वध ............................................. १६० | श्रीरामका राज्याभिषेक और अन्तमें ४५-वामन-अवतारकी कथा.................. १६४ | पुरवासियोंसहित उनका परमधाम गमन २२४

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

( ६ ) अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या ५३-बलराम-श्रीकृष्ण-अवतारके चरित्र... २३४ स्थान ............................................ २६८ ५४-कल्कि-चरित्र और कलि-धर्म....... २४१ ६३-अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका ५५-शुक्राचार्यको भगवान्‌की स्तुतिसे पुनः स्त्रीयोनिसे उद्धार ........................... २७० नेत्रकी प्राप्ति ................................ २४५ ६४-भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका ५६-विष्णुमूर्तिके स्थापनकी विधि ........ २४७ उपाख्यान ..................................... २८२ ५७-भक्तके लक्षण; हारीत-स्मृतिका आरम्भ; ६५-भगवत्सम्बन्धी तीर्थ और उन तीर्थोंसे ब्राह्मणधर्मका वर्णन ........................ २५२ सम्बन्ध रखनेवाले भगवान्‌के नाम... २९२ ५८-क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य ६६-अन्यान्य तीर्थों तथा सह्याद्रि और तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन ... २५४ आमलक ग्रामके तीर्थोंका माहात्म्य ⸱ २९४ ५९-वानप्रस्थ-धर्म ............................. २६४ ६७-मानस-तीर्थ, व्रत तथा इस पुराणका ६०-यति-धर्म .................................... २६५ माहात्म्य ....................................... २९८ ६१-योगसार..................................... २६६ ६८-नरसिंहपुराणके पठन और श्रवणका ६२-श्रीविष्णु-पूजनके वैदिक मन्त्र और फल ............................................. ३०१

पहला अध्याय

ॐ नमो भगवते श्रीनृसिंहाय नमः श्रीनरसिंहपुराण पहला अध्याय प्रयागमें ऋषियोंका समागम; सूतजीके प्रति भरद्वाजजीका प्रश्न; सूतजीद्वारा कथारम्भ और सृष्टिक्रमका वर्णन

॥ श्रीलक्ष्मीनृसिंहाय नमः ॥ श्रीवेदव्यासाय नमः ॥ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ तप्तहाटककेशान्तज्वलत्पावकलोचन । वज्राधिकनखस्पर्श दिव्यसिंह नमोऽस्तु ते॥ २ पान्तु वो नरसिंहस्य नखलाङ्गूलकोटयः। हिरण्यकशिपोर्वक्षःक्षेत्रासृक्कर्दमारुणाः ॥ ३ हिमवद्द्वासिनः सर्वे मुनयो वेदपारगाः। त्रिकालज्ञा महात्मानो नैमिषारण्यवासिनः ॥ ४ येऽर्बुदारण्यनिरताः पुष्करारण्यवासिनः। महेन्द्राद्रिरता ये च ये च विन्ध्यनिवासिनः ॥ ५ धर्मारण्यरता ये च दण्डकारण्यवासिनः। श्रीशैलनिरता ये च कुरुक्षेत्रनिवासिनः॥ ६ कौमारपर्वते ये च ये च पम्पानिवासिनः। एते चान्ये च बहवः सशिष्या मुनयोऽमलाः॥ ७ माघमासे प्रयागं तु स्नातुं तीर्थं समागताः। तत्र स्नात्वा यथान्यायं कृत्वा कर्म जपादिकम् ॥ ८

अन्तर्यामी भगवान् नारायण ( श्रीकृष्ण) उनके सखा नरश्रेष्ठ नर (अर्जुन) तथा इनकी लीला प्रकट करनेवाली सरस्वती देवीको नमस्कार करनेके पश्चात् 'जय' (इतिहास-पुराण)-का पाठ करे ॥ १ ॥ दिव्य सिंह ! तपाये हुए सुवर्णके समान पीले केशोंके भीतर प्रज्वलित अग्निकी भाँति आपके नेत्र देदीप्यमान हो रहे हैं तथा आपके नखोंका स्पर्श वज्रसे भी अधिक कठोर है, इस प्रकार अमित प्रभावशाली आप परमेश्वरको मेरा नमस्कार है। भगवान् नृसिंहके नखरूपी हलके अग्रभाग, जो हिरण्यकशिपु नामक दैत्यके वक्षःस्थलरूपी खेतकी रक्तमयी कीचड़के लगनेसे लाल हो गये हैं, आप लोगोंकी रक्षा करें ॥ २-३ ॥ एक समय हिमालयकी घाटियोंमें रहनेवाले, वेदोंके पारगामी एवं त्रिकालवेत्ता समस्त महात्मा मुनिगण नैमिषारण्य, अर्बुदारण्य और पुष्करारण्यके निवासी मुनि, महेन्द्र पर्वत और विन्ध्यगिरिके निवासी ऋषि, धर्मारण्य, दण्डकारण्य, श्रीशैल और कुरुक्षेत्रमें वास करनेवाले मुनि तथा कुमार पर्वत एवं पम्पासरके निवासी ऋषि—ये तथा अन्य भी बहुत-से शुद्ध हृदयवाले महर्षिगण अपने शिष्योंके साथ माघके महीनेमें स्नान करनेके लिये प्रयाग-तीर्थमें आये ॥ ४-७१/२ ॥ वहाँपर यथोचित रीतिसे स्नान और जप आदि करके

In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १

८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १ नत्वा तु माधवं देवं कृत्वा च पितृतर्पणम्। उन्होंने भगवान् वेणीमाधवको नमस्कार किया; फिर पितरोंका दृष्ट्वा तत्र भरद्वाजं पुण्यतीर्थनिवासिनम्॥ ९ तर्पण करके उस पावन तीर्थके निवासी भरद्वाज मुनिका तं पूजयित्वा विधिवत्तेनैव च सुपूजिताः। दर्शन किया। वहाँ उन ऋषियोंने भरद्वाजजीका भलीभाँति आसनेषु विचित्रेषु वृष्यादिषु यथाक्रमम्॥ १० पूजन किया और स्वयं भी भरद्वाजजीके द्वारा पूजित हुए। भरद्वाजेन दत्तेषु आसीनास्ते तपोधनाः। तत्पश्चात् वे सभी तपोधन भरद्वाज मुनिके दिये हुए वृषी* कृष्णाश्रिताः कथाः सर्वे परस्परमथाब्रुवन् ॥ ११ आदि विचित्र आसनोंपर विराजमान हुए और परस्पर भगवान् श्रीकृष्णसे सम्बन्ध रखनेवाली कथाएँ कहने लगे। उन कथान्तेषु ततस्तेषां मुनीनां भावितात्मनाम्। शुद्ध अन्तःकरणवाले मुनियोंकी कथा हो ही रही थी कि आजगाम महातेजास्तत्र सूतो महामतिः ॥ १२ व्यासजीके शिष्य लोमहर्षण नामक सूतजी वहाँ आ पहुँचे। व्यासशिष्यः पुराणज्ञो लोमहर्षणसंज्ञकः। वे अत्यन्त तेजस्वी, परम बुद्धिमान् और पुराणोंके विद्वान् तान् प्रणम्य यथान्यायं स च तैश्चाभिपूजितः ॥ १३ थे। सूतजीने वहाँ बैठे हुए सभी ऋषियोंको यथोचित विधिसे प्रणाम किया और स्वयं भी उनके द्वारा सम्मानित हुए। उपविष्टो यथायोग्यं भरद्वाजमतेन सः। फिर भरद्वाजजीकी अनुमतिसे वे यथायोग्य आसनपर बैठे। व्यासशिष्यं सुखासीनं ततस्तं लोमहर्षणम्। इस प्रकार जब वे सुखपूर्वक विराजमान हुए, तब उस स पप्रच्छ भरद्वाजो मुनीनामग्रतस्तदा॥ १४ समय उन व्यासशिष्य लोमहर्षणजीसे भरद्वाजजीने सभी मुनियोंके समक्ष यह प्रश्न किया ॥ ८-१४॥ भरद्वाज उवाच भरद्वाजजी बोले- सूतजी! पूर्वकालमें शौनकजीके शौनकस्य महासत्रे वाराहाख्या तु संहिता। महान् यज्ञमें हम सभी लोगोंने आपसे 'वाराह-संहिता' त्वत्तः श्रुता पुरा सूत एतैरस्माभिरेव च॥ १५ सुनी थी। अब हम 'नरसिंहपुराण' की संहिता सुनना साम्प्रतं नारसिंहाख्यां त्वत्तः पौराणसंहिताम्। चाहते हैं तथा ये ऋषि लोग भी उसे ही सुननेके लिये श्रोतुमिच्छाम्यहं सूत श्रोतुकामा इमे स्थिताः ॥ १६ यहाँ उपस्थित हैं। अतः महामुने सूतजी! आज प्रातःकाल अतस्त्वां परिपृच्छामि प्रश्नमेतं महामुने। इन महात्मा मुनियोंके समक्ष हम आपसे ये प्रश्न पूछते ऋषीणामग्रतः सूत प्रातर्ह्येषां महात्मनाम् ॥ १७ हैं- 'यह चराचर जगत् कहाँसे उत्पन्न हुआ है? कौन इसकी कुत एतत् समुत्पन्नं केन वा परिपाल्यते। रक्षा करता है? अथवा किसमें इसका लय होता है? कस्मिन् वा लयमध्येति जगदेतच्चराचरम् ॥ १८ महाभाग! इस भूमिकामान क्या है तथा महामते! किं प्रमाणं च वै भूमेर्नृसिंहः केन तुष्यति। भगवान् नृसिंह किस कर्मसे संतुष्ट होते हैं- यह हमें कर्मणा तु महाभाग तन्मे ब्रूहि महामते ॥ १९ बताइये। सृष्टिका आरम्भ कैसे हुआ? उसका अवसान कथं च सृष्टेरादिः स्यादवसानं कथं भवेत्। (अन्त) किस प्रकार होता है? युगोंकी गणना कैसे होती कथं युगस्य गणना किं वा स्यात्तु चतुर्युगम् ॥ २० है? चतुर्युगका स्वरूप क्या है? उन चारों युगोंमें क्या अन्तर होता है? कलियुगमें लोगोंकी क्या अवस्था होती को वा विशेषस्तेष्वत्र का वावस्था कलौ युगे। है? तथा देवतालोग भगवान् नरसिंहकी किस प्रकार कथमाराध्यते देवो नरसिंहोऽप्यमानुषैः ॥ २१ आराधना करते हैं? पुण्यक्षेत्र कौन-कौन हैं? पावन क्षेत्राणि कानि पुण्यानि के च पुण्याः शिलोच्चयाः। पर्वत कौन-से हैं? और मनुष्योंके पापोंको हर लेनेवाली नद्यश्च काः पराः पुण्या नृणां पापहराः शुभाः ॥ २२ परम पावन एवं उत्तम नदियाँ कौन-कौन-सी हैं?

  • व्रतपरायण पुरुषके लिये कुशका बना हुआ एक विशेष प्रकारका आसन। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय १ ] प्रयागमें ऋषियोंका समागम; सूतजीके प्रति भरद्वाजजीका प्रश्न ९ देवादीनां कथं सृष्टिर्मनोर्मन्वन्तरस्य तु। देवताओंकी सृष्टि कैसे हुई? मनु, मन्वन्तर एवं विद्याधर तथा विद्याधरादीनां सृष्टिरादौ कथं भवेत्॥ २३ आदिकी सृष्टि किस प्रकार होती है? कौन-कौन राजा यज्ञ करनेवाले हुए हैं और किस-किसने परम उत्तम यज्वानः के च राजानः के च सिद्धिं परां गताः। सिद्धि प्राप्त की है?' महाभाग! ये सारी बातें आप एतत्सर्वं महाभाग कथयस्व यथाक्रमम्॥ २४ क्रमशः बताइये ॥ १५-२४॥ सूत उवाच सूतजी बोले-तपोधनो! मैं जिन गुरुदेव व्यासजीके व्यासप्रसादाज्जानामि पुराणानि तपोधनाः। प्रसादसे पुराणोंका ज्ञान प्राप्त कर सका हूँ, उनकी भक्तिपूर्वक वन्दना करके आपलोगोंसे नरसिंहपुराणकी तं प्रणम्य प्रवक्ष्यामि पुराणं नारसिंहकम्॥ २५ कथा कहना आरम्भ करता हूँ। जो समस्त देवताओंके पाराशर्यं परमपुरुषं विश्वदेवैकयोनिं एकमात्र कारण और वेदों तथा उनके छहों अङ्गोंद्वारा जाननेयोग्य परम पुरुष विष्णुके स्वरूप हैं; जो विद्यावान्, विद्यावन्तं विपुलमतिदं वेदवेदाङ्गवेद्यम्। विमल बुद्धिदाता, नित्य शान्त, विषयकामनाशून्य और शश्वच्छान्तं शमितविषयं शुद्धतेजो विशालं पापरहित हैं, उन विशुद्ध तेजोमय महात्मा पराशरनन्दन वेदव्यासं विगतशमलं सर्वदाहं नमामि॥ २६ वेदव्यासजीको मैं सदा प्रणाम करता हूँ। उन अमित नमो भगवते तस्मै व्यासायामिततेजसे। तेजस्वी भगवान् व्यासजीको नमस्कार है, जिनकी कृपासे मैं भगवान् वासुदेवकी इस कथाको कह सकूँगा। यस्य प्रसादाद्वक्ष्यामि वासुदेवकथामिमाम्॥ २७ मुनिगण! आपलोगोंने भलीभाँति विचार करके मुझसे सुनिर्णीतो महान् प्रश्नस्त्वया यः परिकीर्तितः। जो महान् प्रश्न पूछे हैं, उनका उत्तर भगवान् विष्णुकी विष्णुप्रसादेन विना वक्तुं केनापि शक्यते ॥ २८ कृपा हुए बिना कौन बतला सकता है? तथापि भरद्वाजजी! भगवान् नरसिंहकी कृपाके बलसे ही आपके प्रश्नोंके तथापि नरसिंहस्य प्रसादादेव तेऽधुना। उत्तरमें अत्यन्त पवित्र नरसिंहपुराणकी कथा आरम्भ प्रवक्ष्यामि महापुण्यं भारद्वाज शृणुष्व मे॥ २९ करता हूँ। आप ध्यानसे सुनें। अपने शिष्योंके साथ जो- जो मुनि यहाँ उपस्थित हैं, वे सब लोग भी सावधान शृण्वन्तु मुनयः सर्वे सशिश्यास्त्वत्र ये स्थिताः। होकर सुनें। मैं सभीको यथावत् रूपसे नरसिंहपुराणकी पुराणं नरसिंहस्य प्रवक्ष्यामि यथातथा॥ ३० कथा सुनाता हूँ॥ २५-३०॥ नारायणादिदं सर्वं समुत्पन्नं चराचरम्। यह समस्त चराचर जगत् भगवान् नारायणसे ही तेनैव पाल्यते सर्वं नरसिंहादिमूर्तिभिः ॥ ३१ उत्पन्न हुआ और वे ही नरसिंहादि रूपोंसे सबका पालन करते हैं। इसी प्रकार अन्तमें यह जगत् उन्हीं ज्योतिःस्वरूप तथैव लीयते चान्ते हरौ ज्योतिःस्वरूपिणि। भगवान् विष्णुमें लीन हो जाता है। भगवान् जिस प्रकार यथैव देवः सृजति तथा वक्ष्यामि तच्छृणु॥ ३२ सृष्टि करते हैं, उसे मैं बतलाता हूँ, आप सुनें। सृष्टिकी कथा पुराणोंमें ही विस्तारके साथ वर्णित है, अतः पुराणानां हि सर्वेषामयं साधारणः स्मृतः। पुराणोंका लक्षण बतानेके लिये यह एक श्लोक साधारणतया श्लोको यस्तं मुने श्रुत्वा निःशेषं त्वं ततः शृणु॥ ३३ सभी पुराणोंमें कहा गया है। मुने! इस श्लोकको पहले सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। सुनकर फिर सारी बातें सुनियेगा। यह श्लोक इस प्रकार है-सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित- वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम्॥ ३४ इन्हीं पाँच लक्षणोंसे युक्त 'पुराण' होता है। आदिसर्ग, आदिसर्गोऽनुसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। अनुसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित-इन सबका वंशानुचरितं चैव वक्ष्याम्यनुसमासतः ॥ ३५ मैं क्रमशः संक्षेपस्वरूपसे वर्णन करता हूँ॥ ३१-३५॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

१० श्रीमन्नरसिंहपुराण [ अध्याय १

१० श्रीमन्नरसिंहपुराण [ अध्याय १ आदिसर्गो महांस्तावत् कथयिष्यामि वै द्विजाः। द्विजगण! आदिसर्ग महान् है, अतः पहले मैं यस्मादारभ्य देवानां राज्ञां चरितमेव च॥ ३६ उसीका वर्णन करता हूँ। वहाँसे सृष्टिका वर्णन आरम्भ करनेपर देवताओं और राजाओंके चरित्रोंका तथा ज्ञायते सरहस्यं च परमात्मा सनातनः। सनातन परमात्माके तत्त्वका भी रहस्यसहित ज्ञान हो प्राक्सृष्टेः प्रलयादूर्ध्वं नासीत् किंचिद्द्विजोत्तम॥ ३७ जाता है। द्विजोत्तम! सृष्टिके पहले महाप्रलय होनेके बाद (परब्रह्मके सिवा) कुछ भी शेष नहीं था। उस ब्रह्मसंज्ञमभूदेकं ज्योतिष्मत्सर्वकारणम्। समय एकमात्र 'ब्रह्म' नामक तत्त्व ही विद्यमान था, नित्यं निरञ्जनं शान्तं निर्गुणं नित्यनिर्मलम्॥ ३८ जो परम प्रकाशमय और सबका कारण है। वह नित्य, निरञ्जन, शान्त, निर्गुण एवं सदा ही दोषरहित है। मुमुक्षु आनन्दसागरं स्वच्छं यं काङ्क्षन्ति मुमुक्षवः। पुरुष विशुद्ध आनन्द-महासागर परमेश्वरकी अभिलाषा सर्वज्ञं ज्ञानरूपत्वादनन्तमजमव्ययम्॥ ३९ किया करते हैं। वह ज्ञानस्वरूप होनेके कारण सर्वज्ञ, अनन्त, अजन्मा और अव्यय (अविकारी) है। सृष्टि- सर्गकाले तु सम्प्राप्ते ज्ञात्वाऽसौ ज्ञातृनायकः। रचनाका समय आनेपर उसी ज्ञानीश्वर परब्रह्मने जगत्‌को अन्तर्लीनं विकारं च तत्तत्स्रष्टुमुपचक्रमे॥ ४० अपनेमें लीन जानकर पुनः उसकी सृष्टि आरम्भ की॥ ३६—४०॥ तस्मात् प्रधानमुद्भूतं ततश्चापि महानभूत्। उस ब्रह्मसे प्रधान (मूलप्रकृति)-का आविर्भाव सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्च त्रिधा महान्॥ ४१ हुआ। प्रधानसे महत्तत्त्व प्रकट हुआ। सात्त्विक, राजस और तामस-भेदसे महत्तत्त्व तीन प्रकारका है। महत्तत्त्वसे वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चैव तामसः। वैकारिक (सात्त्विक), तैजस (राजस) और भूतादिरूप त्रिविधोऽयमहंकारो महत्तत्त्वादजायत॥ ४२ (तामस)—इन तीन भेदोंसे युक्त अहंकार उत्पन्न हुआ। जिस प्रकार प्रधानसे महत्तत्त्व आवृत है, उसी प्रकार यथा प्रधानं हि महान् महता स तथाऽऽवृतः। महत्तत्त्वसे अहंकार भी व्याप्त है। तदनन्तर 'भूतादि' भूतादिस्तु विकुर्वाणः शब्दतन्मात्रकं ततः॥ ४३ नामक तामस अहंकारने विकृत होकर शब्दतन्मात्राकी सृष्टि की और उससे 'शब्द' गुणवाला आकाश उत्पन्न ससर्ज शब्दतन्मात्रादाकाशं शब्दलक्षणम्। हुआ। तब उस भूतादिने शब्द गुणवाले आकाशको शब्दमात्रं तथाऽऽकाशं भूतादिः स समावृणोत्॥ ४४ आवृत किया। आकाशने भी विकृत होकर स्पर्शतन्मात्राकी सृष्टि की। उससे बलवान् वायुकी उत्पत्ति हुई। वायुका आकाशस्तु विकुर्वाणः स्पर्शमात्रं ससर्ज ह। गुण स्पर्श माना गया है। फिर शब्द गुणवाले आकाशने बलवानभवद्वायुस्तस्य स्पर्शो गुणो मतः॥ ४५ 'स्पर्श' गुणवाले वायुको आवृत किया। तत्पश्चात् वायुने विकृत होकर रूपतन्मात्राकी सृष्टि की। उससे आकाशं शब्दतन्मात्रं स्पर्शमात्रं तथाऽऽवृणोत्। ज्योतिर्मय अग्निका प्रादुर्भाव हुआ। ज्योतिका गुण 'रूप' ततो वायुर्विकुर्वाणो रूपमात्रं ससर्ज ह॥ ४६ कहा गया है। फिर स्पर्शतन्मात्रारूप वायुने रूपतन्मात्रावाले तेजको आवृत किया। तब तेजने विकृत होकर रस- ज्योतिरुत्पद्यते वायोस्तद्रूपगुणमुच्यते। तन्मात्राकी सृष्टि की। उससे रस गुणवाला जल प्रकट स्पर्शमात्रं तु वै वायू रूपमात्रं समावृणोत्॥ ४७ ज्योतिश्चापि विकुर्वाणं रसमात्रं ससर्ज ह। सम्भवन्ति ततोऽम्भांसि रसाधाराणि तानि तु॥ ४८

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय १ ] प्रयागमें ऋषियोंका समागम; सूतजीके प्रति भरद्वाजजीका प्रश्न ११ रसमात्राणि चाम्भांसि रूपमात्रं समावृणोत्। हुआ। रूप गुणवाले तेजने रस गुणवाले जलको आवृत विकुर्वाणानि चाम्भांसि गन्धमात्रं ससर्जिरे ॥ ४९ किया। तब जलने विकारको प्राप्त होकर गन्ध- तन्मात्राकी सृष्टि की। उससे यह पृथिवी उत्पन्न हुई तस्माज्जाता मही चेयं सर्वभूतगुणाधिका। जो आकाशादि सभी भूतोंके गुणोंसे युक्त होनेके कारण संघातो जायते तस्मात्तस्य गन्धगुणो मतः ॥ ५० उनसे अधिक गुणवाली है। गन्धतन्मात्रारूप पार्थिवतत्त्वसे ही स्थूल पिण्डकी उत्पत्ति होती है। पृथिवीका गुण तस्मिंस्तस्मिंस्तु तन्मात्रा तेन तन्मात्रता स्मृता। 'गन्ध' है। उन-उन आकाशादि भूतोंमें तन्मात्राएँ हैं तन्मात्राण्यविशेषाणि विशेषाः क्रमशोपराः ॥ ५१ अर्थात् केवल उनके गुण शब्द आदि ही हैं। इसलिये वे तन्मात्रा (गुण) रूप ही कहे गये हैं। तन्मात्राएँ भूततन्मात्रसर्गोऽयमहंकारात्तु तामसात्। अविशेष कही गयी हैं; क्योंकि उनमें 'अमुक तन्मात्रा कीर्तितस्ते समासेन भरद्वाज मया तव ॥ ५२ आकाशकी है और अमुक वायुकी' इसका ज्ञान करानेवाला कोई विशेष भेद (अन्तर) नहीं होता। किंतु तैजसानीन्द्रियाण्याहुर्देवा वैकारिका दश। उन तन्मात्राओंसे प्रकट हुए आकाशादि भूत क्रमशः एकादशं मनश्चात्र कीर्तितं तत्र चिन्तकैः ॥ ५३ विशेष (भेद)-युक्त होते हैं। इसलिये उनकी 'विशेष' संज्ञा है। भरद्वाजजी ! तामस अहंकारसे होनेवाली यह बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चात्र पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च। पञ्चभूतों और तन्मात्राओंकी सृष्टि मैंने आपसे थोड़ेमें तानि वक्ष्यामि तेषां च कर्माणि कुलपावन ॥ ५४ कह दी ॥ ४१-५२ ॥ सृष्टि-तत्त्वपर विचार करनेवाले विद्वानोंने इन्द्रियोंको श्रवणे च दृशौ जिह्वा नासिका त्वक् च पञ्चमी। तैजस अहंकारसे उत्पन्न बतलाया है और उनके अभिमानी शब्दादिज्ञानसिद्ध्यर्थं बुद्धियुक्तानि पञ्च वै ॥ ५५ दस देवताओं तथा ग्यारहवें मनको वैकारिक अहंकारसे उत्पन्न कहा है। कुलको पवित्र करनेवाले भरद्वाजजी ! पायूपस्थे हस्तपादौ वाग् भरद्वाज पञ्चमी। इन इन्द्रियोंमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। विसर्गानन्दशिल्पी च गत्युक्ती कर्म तत्स्मृतम् ॥ ५६ अब मैं उन सम्पूर्ण इन्द्रियों तथा उनके कर्मोंका वर्णन कर रहा हूँ। कान, नेत्र, जिह्वा, नाक और पाँचवीं आकाशवायुतेजांसि सलिलं पृथिवी तथा। त्वचा-ये पाँच 'ज्ञानेन्द्रियाँ' कही गयी हैं, जो शब्द शब्दादिभिर्गुणैर्विप्र संयुक्तान्युत्तरोत्तरैः ॥ ५७ आदि विषयोंका ज्ञान करानेके लिये हैं। तथा पायु (गुदा), उपस्थ (लिङ्ग), हाथ, पाँव और वाक्-इन्द्रिय- नानावीर्याः पृथग्भूतास्ततस्ते संहतिं विना। ये 'कर्मेन्द्रियाँ' कहलाती हैं। विसर्ग (मल-त्याग), नाशक्नुवन् प्रजां स्रष्टुमसमागम्य कृत्स्नशः ॥ ५८ आनन्द (मैथुनजनित सुख), शिल्प (हाथकी कला), गमन और बोलना-ये ही क्रमशः इन कर्मेन्द्रियोंके समेत्यान्योन्यसंयोगं परस्परसमाश्रयात्। पाँच कर्म कहे गये हैं ॥ ५३-५६ ॥ एकसंघातलक्ष्याश्च सम्प्राप्यैक्यमशेषतः ॥ ५९ विप्र ! आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी-ये पाँच भूत क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-इन पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च प्रधानानुग्रहेण च। गुणोंसे उत्तरोत्तर युक्त हैं, अर्थात् आकाशमें एकमात्र महदाद्या विशेषांखास्त्वण्डमुत्पादयन्ति ते ॥ ६० शब्द गुण है, वायुमें शब्द और स्पर्श दो गुण हैं, तेजमें शब्द, स्पर्श और रूप तीन गुण हैं, इसी प्रकार जलमें चार और पृथिवीमें पाँच गुण हैं। ये पञ्चभूत अलग- अलग भिन्न-भिन्न प्रकारकी शक्तियोंसे युक्त हैं। अतः परस्पर पूर्णतया मिले बिना ये सृष्टि-रचना नहीं कर सके। तब एक ही संघातको उत्पन्न करना जिनका लक्ष्य है, उन महत्तत्त्वसे लेकर पञ्चभूतपर्यन्त सभी विकारोंने पुरुषसे अधिष्ठित होनेके कारण परस्पर मिलकर In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २

१२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २ तत्क्रमेण विवृद्धं तु जलबुद्बुद्वत् स्थितम्। भूतेभ्योऽण्डं महाबुद्धे बृहत्तदुदकेशयम्॥ ६१ प्राकृतं ब्रह्मरूपस्य विष्णोः स्थानमनुत्तमम्। तत्राव्यक्तस्वरूपोऽसौ विष्णुर्विश्वेश्वरः प्रभुः ॥ ६२ ब्रह्मस्वरूपमास्थाय स्वयमेव व्यवस्थितः। मेरुश्चोल्बमभूत्तस्य जरायुश्च महीधराः। गर्भोदकं समुद्राश्च तस्याभूवन् महात्मनः॥ ६३ अद्रिद्वीपसमुद्राश्च सज्योतिर्लोकसंग्रहः। तस्मिन्नण्डेऽभवत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ ६४ रजोगुणयुतो देवः स्वयमेव हरिः परः। ब्रह्मरूपं समास्थाय जगत्सृष्टौ प्रवर्तते ॥ ६५ सृष्टं च पात्यनुयुगं यावत्कल्पविकल्पना। नरसिंहादिरूपेण रुद्ररूपेण संहरेत् ॥ ६६ ब्राह्मेण रूपेण सृजत्यनन्तो जगत्समस्तं परिपातुमिच्छन्। रामादिरूपं स तु गृह्य पाति भूत्वाथ रुद्रः प्रकरोति नाशम् ॥ ६७ एक-दूसरेका आश्रय ले, सर्वथा एकरूपताको प्राप्त हो, प्रधानतत्त्वके अनुग्रहसे एक अण्डकी उत्पत्ति की। वह अण्ड क्रमशः बड़ा होकर जलके ऊपर बुलबुलेके समान स्थित हुआ। महाबुद्धे! समस्त भूतोंसे प्रकट हो जलपर स्थित हुआ। वह महान् प्राकृत अण्ड ब्रह्मा (हिरण्यगर्भ)-रूप भगवान् विष्णुका अत्यन्त उत्तम आधार हुआ। उसमें वे अव्यक्तस्वरूप जगदीश्वर भगवान् विष्णु स्वयं ही हिरण्यगर्भरूपसे विराजमान हुए। उस समय सुमेरु पर्वत उन महात्मा भगवान् हिरण्यगर्भका उल्ब (गर्भको ढँकनेवाली झिल्ली) था। अन्यान्य पर्वत जरायुज (गर्भाशय) थे और समुद्र ही गर्भाशयके जल थे॥ ५७–६३॥ पर्वत, द्वीप, समुद्र और ग्रह-ताराओंसहित समस्त लोक तथा देवता, असुर और मनुष्यादि प्राणी सभी उस अण्डसे ही प्रकट हुए हैं। परमेश्वर भगवान् विष्णु स्वयं ही रजोगुणसे युक्त ब्रह्माका स्वरूप धारणकर संसारकी सृष्टिमें प्रवृत्त होते हैं। जबतक कल्पकी सृष्टि रहती है, तबतक वे ही नरसिंहादिरूपसे प्रत्येक युगमें अपने रचे हुए इस जगत्की रक्षा करते हैं और कल्पान्तमें रुद्ररूपसे इसका संहार कर लेते हैं। भगवान् अनन्त स्वयं ही ब्रह्मारूपसे सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं, फिर इसके पालनकी इच्छासे रामादि अवतार धारणकर इसकी रक्षा करते हैं और अन्तमें रुद्ररूप होकर समस्त जगत्का नाश कर देते हैं॥ ६४–६७॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे 'सर्गनिरूपणं' नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सर्गका निरूपण' विषयक पहला अध्याय पूरा हुआ॥ १ ॥ दूसरा अध्याय ब्रह्मा आदिकी आयु और कालका स्वरूप सूत उवाच ब्रह्मा भूत्वा जगत्सृष्टौ नरसिंहः प्रवर्तते। यथा ते कथयिष्यामि भरद्वाज निबोध मे॥ १ नारायणाख्यो भगवान् ब्रह्मलोकपितामहः। उत्पन्नः प्रोच्यते विद्वन् नित्योऽसावुपचारतः ॥ २ निजेन तस्य मानेन आयुर्वर्षशतं स्मृतम्। तत्पराख्यं तदर्धं च परार्धमभिधीयते॥ ३ सूतजी कहते हैं - भरद्वाज ! भगवान् नरसिंह जिस प्रकार ब्रह्मा होकर जगत्की सृष्टिके कार्यमें प्रवृत्त होते हैं, उसका मैं आपसे वर्णन करता हूँ, सुनिये। विद्वन्! 'नारायण' नामसे प्रसिद्ध लोकपितामह भगवान् ब्रह्मा नित्य-सनातन पुरुष हैं, तथापि वे 'उत्पन्न हुए हैं'-ऐसा उपचारसे कहा जाता है। उनके अपने परिमाणसे उनकी आयु सौ वर्षकी बतायी जाती है। उस सौ वर्षका नाम 'पर' है। उसका आधा 'परार्ध' कहलाता है। निष्पाप In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय २ ] ब्रह्मा आदिकी आयु और कालका स्वरूप १३

अध्याय २ ] ब्रह्मा आदिकी आयु और कालका स्वरूप १३ कालस्वरूपं विष्णोश्च यन्मयोक्तं तवानघ। महर्षे! साधुशिरोमणे! मैंने तुमसे भगवान् विष्णुके जिस तेन तस्य निबोध त्वं परिमाणोपपादनम्॥ ४ कालस्वरूपका वर्णन किया था, उसीके द्वारा उस ब्रह्माकी अन्येषां चैव भूतानां चराणामचराश्च ये। तथा दूसरे भी जो पृथ्वी, पर्वत और समुद्र आदि पदार्थ भूभूभृत्सागरादीनामशेषाणां च सत्तम॥ ५ एवं चराचर जीव हैं, उनकी आयुका परिमाण नियत संख्याज्ञानं च ते वच्मि मनुष्याणां निबोध मे। किया जाता है। अब मैं आपसे मनुष्योंकी 'काल-गणना' अष्टादश निमेषास्तु काष्ठैका परिकीर्तिता॥ ६ का ज्ञान बता रहा हूँ, सुनिये॥ १-५१/२॥ काष्ठास्त्रिंशत्कला ज्ञेया कलास्त्रिंशन्मुहूर्तकम्। अठारह निमेषोंकी एक 'काष्ठा' कही गयी है, तीस त्रिंशत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्तैर्मानुषं स्मृतम्॥ ७ काष्ठाओंकी एक 'कला' समझनी चाहिये तथा तीस अहोरात्राणि तावन्ति मासपक्षद्वयात्मकः। कलाओंका एक 'मुहूर्त' होता है। तीस मुहूर्तोंका एक तैः षड्भिरयनं मासैर्द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे॥ ८ मानव 'दिन-रात' माना गया है। उतने ही (तीस ही) अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम्। दिन-रात मिलकर एक 'मास' होता है। इसमें दो पक्ष अयनद्वितयं वर्षं मर्त्यानामिह कीर्तितम्॥ ९ होते हैं। छः महीनोंका एक 'अयन' होता है। अयन नृणां मासः पितॄणां तु अहोरात्रमुदाहृतम्। दो हैं—'दक्षिणायन' और 'उत्तरायण'। दक्षिणायन वस्वादीनामहोरात्रं मानुषो वत्सरः स्मृतः॥ १० देवताओंकी रात्रि है और उत्तरायण दिन। दो अयन दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु युगं त्रेतादिसंज्ञितम्। मिलकर मनुष्योंका एक 'वर्ष' कहा गया है। मनुष्योंका चतुर्युगं द्वादशभिस्तद्विभागं निबोध मे॥ ११ एक मास पितरोंका एक दिन-रात बताया गया है और चत्वारि त्रीणि द्वे चैकं कृतादिषु यथाक्रमम्। मनुष्योंका एक वर्ष वसु आदि देवताओंका एक दिन- दिव्याब्दानां सहस्राणि युगेष्वाहुः पुराविदः॥ १२ रात कहा गया है। देवताओंके बारह हजार वर्षोंका त्रेता तत्प्रमाणैः शतैः संध्या पूर्वा तत्र विधीयते। आदि नामक चतुर्युग होता है। उसका विभाग आपलोग संध्यांशकश्च तत्तुल्यो युगस्यानन्तरो हि सः॥ १३ मुझसे समझ लें॥ ६-११॥ संध्यासंध्यांशयोर्मध्ये यः कालो वर्तते द्विज। पुराण-तत्त्ववेत्ताओंने कृत आदि युगोंका परिमाण युगाख्यः स तु विज्ञेयः कृतत्रेतादिसंज्ञकः॥ १४ क्रमशः चार, तीन, दो और एक हजार दिव्य वर्ष कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्चेति चतुर्युगम्। बतलाया है। ब्रह्मन्! प्रत्येक युगके पूर्व उतने ही सौ प्रोच्यते तत्सहस्रं तु ब्रह्मणो दिवसं द्विज॥ १५ वर्षोंकी 'संध्या' कही गयी है और युगके पीछे उतने ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन् मनवस्तु चतुर्दश। ही परिमाणवाले 'संध्यांश' होते हैं। विप्र! संध्या और भवन्ति परिमाणं च तेषां कालकृतं शृणु॥ १६ संध्यांशके बीचका जो काल है, उसे सत्ययुग और सप्तर्षयस्तु शक्रोऽथ मनुस्तत्सूनवोऽपि ये। त्रेता आदि नामोंसे प्रसिद्ध युग समझना चाहिये। एककालं हि सृज्यन्ते संह्रियन्ते च पूर्ववत्॥ १७ 'सत्ययुग', 'त्रेता', 'द्वापर' और 'कलि'-ये चार युग चतुर्युगानां संख्या च साधिका ह्येकसप्ततिः। मिलकर 'चतुर्युग' कहलाते हैं। द्विज! एक हजार मन्वन्तरं मनोः कालः शक्रादीनामपि द्विज॥ १८ चतुर्युग मिलकर 'ब्रह्माका एक दिन' होता है। ब्रह्मन्! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु होते हैं। उनका कालकृत परिमाण सुनिये। सप्तर्षि, इन्द्र, मनु और मनु-पुत्र— ये पूर्व कल्पानुसार एक ही समय उत्पन्न किये जाते हैं तथा इनका संहार भी एक ही साथ होता है। ब्रह्मन्! इकहत्तर चतुर्युगसे कुछ अधिक काल एक 'मन्वन्तर' कहलाता है। यही मनु तथा इन्द्रादि देवोंका

In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३

१४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३ अष्टौ शतसहस्राणि दिव्याया संख्यया स्मृतः। काल है। इस प्रकार दिव्य वर्ष-गणनाके अनुसार द्विपञ्चाशत्तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि तु ॥ १९ यह मन्वन्तर आठ लाख बावन हजार वर्षोंका समय त्रिंशत्कोट्यस्तु सम्पूर्णाः संख्याताः संख्यया द्विज। कहा गया है। महामुने! द्विजवर! मानवीय वर्ष-गणनाके सप्तषष्टिश्च तथान्यानि नियुतानि महामुने ॥ २० अनुसार पूरे तीस करोड़, सरसठ लाख, बीस हजार विंशतिश्च सहस्राणि कालोऽयमधिकं विना। वर्षोंका काल एक मन्वन्तरका परिमाण है, इससे अधिक मन्वन्तरस्य संख्येयं मानुषैर्वत्सरैर्द्विज ॥ २१ नहीं ॥ १२–२१ ॥ चतुर्दशगुणो ह्येष कालो ब्राह्मामहः स्मृतम्। इस कालका चौदह गुना ब्रह्माका एक दिन होता विश्वस्यादौ सुमनसा सृष्ट्वा देवांस्तथा पितॄन् ॥ २२ है। ब्रह्माजीने विश्व-सृष्टिके आदिकालमें प्रसन्न मनसे देवताओं गन्धर्वान् राक्षसान् यक्षान् पिशाचान् गुह्यकांस्तथा। तथा पितरोंकी सृष्टि करके गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, पिशाच, ऋषीन् विद्याधराँश्चैव मनुष्यांश्च पशूंस्तथा ॥ २३ गुह्यक, ऋषि, विद्याधर, मनुष्य, पशु, पक्षी, स्थावर (वृक्ष, पक्षिणः स्थावरांश्चैव पिपीलिकभुजंगमान् । पर्वत आदि), पिपीलिका (चींटी) और साँपोंकी रचना चातुर्वर्ण्यं तथा सृष्ट्वा नियुज्याध्वरकर्मणि ॥ २४ की है। फिर चारों वर्णोंकी सृष्टि करके वे उन्हें यज्ञकर्ममें पुनर्दिनान्ते त्रैलोक्यमुपसंहृत्य स प्रभुः । नियुक्त करते हैं। तत्पश्चात् दिन बीतनेपर वे अविनाशी शेते चानन्तशयने तावतीं रात्रिमव्ययः ॥ २५ प्रभु त्रिभुवनका उपसंहार करके दिनके ही बराबर तस्यान्तेऽभून्महाकल्पो ब्राह्म इत्यभिविश्रुतः । परिमाणवाली रात्रिमें शेषनागकी शय्यापर सोते हैं। उस यस्मिन् मत्स्यावतारोऽभून्मथनं च महोदधेः ॥ २६ रात्रिके बीतनेपर 'ब्राह्म' नामक विख्यात महाकल्प हुआ, तद्वद्वाराहकल्पश्च तृतीयः परिकल्पितः । जिसमें भगवान्‌का मत्स्यावतार और समुद्र-मन्थन हुआ। यत्र विष्णुः स्वयं प्रीत्या वाराहं वपुराश्रितः । इस ब्राह्म-कल्पके ही समान तीसरा 'वाराह-कल्प' हुआ, उद्धर्तुं वसुधां देवीं स्तूयमानो महर्षिभिः ॥ २७ जिसमें कि भगवती वसुंधरा (पृथ्वी)-का उद्धार करनेके सृष्ट्वा जगद्व्योमचराप्रमेयः लिये साक्षात् भगवान् विष्णुने प्रसन्नतापूर्वक वाराहरूप प्रजाश्च सृष्ट्वा सकलास्तथेशः । धारण किया। उस समय महर्षिगण उनकी स्तुति करते नैमित्तिकाख्ये प्रलये समस्तं थे। स्थलचर और आकाशचारी जीवोंके द्वारा जिनकी इयत्ताको संहृत्य शेते हरिरादिदेवः ॥ २८ जान लेना नितान्त असम्भव है, वे आदिदेव भगवान् विष्णु समस्त प्रजाओंकी सृष्टि कर 'नैमित्तिक प्रलय' में सबका संहार करके शयन करते हैं ॥ २२–२८ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सर्गरचनायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सृष्टिरचनाविषयक' दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥ ────────────────────────── तीसरा अध्याय ब्रह्माजीद्वारा लोकरचना और नौ प्रकारकी सृष्टियोंका निरूपण सूत उवाच सूतजी बोले—महाभाग ! नैमित्तिक प्रलयकालमें तत्र सुप्तस्य देवस्य नाभौ पद्ममभून्महत् । सोये हुए भगवान् नारायणकी नाभिमें एक महान् कमल तस्मिन् पद्मे महाभाग वेदवेदाङ्गपारगः ॥ १ उत्पन्न हुआ। उसीसे वेद-वेदाङ्गोंके पारगामी ब्रह्माजीका ब्रह्मोत्पन्नः स तेनोक्तः प्रजां सृज महामते । प्रादुर्भाव हुआ। तब उनसे भगवान् नारायणने कहा— एवमुक्त्वा तिरोभावं गतो नारायणः प्रभुः ॥ २ 'महामते ! तुम प्रजाकी सृष्टि करो' और यह कहकर वे In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ३ ] ब्रह्माजीद्वारा लोकरचना और नौ प्रकारकी सृष्टियोंका निरूपण १५ तथेत्युक्त्वा स तं देवं विष्णुं ब्रह्माथ चिन्तयन्। अन्तर्धान हो गये। उन भगवान् विष्णुसे 'तथास्तु' आस्ते किंचिज्जगद्बीजं नाध्यगच्छत किंचन ॥ ३ कहकर ब्रह्माजी सोचने लगे—'क्या जगत्की सृष्टिका कोई बीज है?' परंतु बहुत सोचनेपर भी उन्हें किसी तावत्तस्य महान् रोषो ब्रह्मणोऽभून्महात्मनः। बीजका पता न लगा। तब महात्मा ब्रह्माजीको महान् ततो बालः समुत्पन्नस्तस्याङ्के रोषसम्भवः ॥ ४ रोष हुआ। रोष होते ही उनकी गोदमें एक बालक प्रकट हो गया, जो उनके रोषसे ही प्रादुर्भूत हुआ था। स रुदन्वारितस्तेन ब्रह्मणा व्यक्तमूर्तना। उस बालकको रोते देख स्थूल शरीरधारी ब्रह्माजीने उसे नाम मे देहि चेत्युक्तस्तस्य रुद्रेत्यसौ ददौ ॥ ५ रोनेसे मना किया। फिर उसके यह कहनेपर कि 'मेरा नाम रख दीजिये', उन्होंने उसका 'रुद्र' नाम रख तेनासौ विसृजस्वेति प्रोक्तो लोकमिमं पुनः। दिया॥ १—५॥ अशक्तस्तत्र सलिले ममज्ज तपसाऽऽदृतः ॥ ६ इसके बाद ब्रह्माजीने उससे कहा कि 'तुम इस लोककी सृष्टि करो'—यह कहनेपर उस कार्यमें असमर्थ तस्मिन् सलिलमग्ने तु पुनरन्यं प्रजापतिः। होनेके कारण वह सादर तपस्याके लिये जलमें निमग्न ब्रह्मा ससर्ज भूतेशो दक्षिणाङ्गुष्ठतोऽपरम् ॥ ७ हो गया। उसके जलमें निमग्न हो जानेपर भूतनाथ प्रजापति ब्रह्माजीने फिर अपने दाहिने अँगूठेसे 'दक्ष' नामक एक दक्षं वामे ततोऽङ्गुष्ठे तस्य पत्नी व्यजायत। दूसरे पुत्रको उत्पन्न किया, तत्पश्चात् बायें अँगूठेसे उसकी स तस्यां जनयामास मनुं स्वायम्भुवं प्रभुः ॥ ८ पत्नी प्रकट हुई। प्रभु दक्षने उस स्त्रीसे स्वायम्भुव मनुको जन्म दिया। तब ब्रह्माजीने उसी मनुसे प्रजाओंकी सृष्टि तस्मात् सम्भाविता सृष्टिः प्रजानां ब्रह्मणा तदा। बढ़ायी। मुनिवर! वसुधाकी सृष्टि करनेवाले उस विधाताकी इत्येवं कथिता सृष्टिर्मया ते मुनिसत्तम। सृष्टि-रचनाका यह क्रम मैंने आपसे वर्णन किया। अब सृजतो जगतीं तस्य किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ९ आप और क्या सुनना चाहते हैं?॥ ६—९॥ भरद्वाज उवाच संक्षेपेण तदाऽऽख्यातं त्वया मे लोमहर्षण। भरद्वाजजी बोले—लोमहर्षणजी! आपने यह सब विस्तरेण पुनर्ब्रूहि आदिसर्गं महामते ॥ १० वृत्तान्त मुझसे पहले संक्षेपसे कहा है। महामते! अब आप विस्तारके साथ आदिसर्गका वर्णन कीजिये॥ १०॥ सूत उवाच सूतजी बोले—पिछले कल्पका अन्त होनेपर रात्रिमें तथैव कल्पावसाने निशासुप्तोत्थितः प्रभुः। सोकर उठनेके बाद सत्त्वगुणके उद्रेकसे युक्त सत्त्वोद्रिक्तस्तदा ब्रह्मा शून्यं लोकमवैक्षत ॥ ११ (नारायणस्वरूप) भगवान् ब्रह्माजीने उस समय सम्पूर्ण लोकको शून्यमय देखा। वे ब्रह्मस्वरूपी भगवान् नारायण नारायणः परोऽचिन्त्यः पूर्वेषामपि पूर्वजः। सबसे परे हैं, अचिन्त्य हैं, पूर्वजोंके भी पूर्वज हैं, ब्रह्मस्वरूपी भगवानादिः सर्वसम्भवः ॥ १२ अनादि हैं और सबकी उत्पत्तिके कारण हैं। इस जगत्की उत्पत्तिके कारणभूत उन ब्रह्मस्वरूप नारायणदेवके विषयमें इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति। पुराणवेत्ता विद्वान् यह श्लोक कहते हैं—"जल भगवान् ब्रह्मस्वरूपिणं देवं जगतः प्रभवात्मकम् ॥ १३ नर—पुरुषोत्तमसे उत्पन्न है, इसलिये 'नार' कहलाता है। आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः। नार (जल) ही उनका प्रथम अयन (आदि शयन-स्थान) अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥ १४ है, इसलिये वे भगवान् 'नारायण' कहे जाते हैं।" In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

१६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

[शीर्षक] १६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३


[बायाँ स्तम्भ : संस्कृत श्लोक]

सृष्टिं चिन्तयतस्तस्य कल्पादिषु यथा पुरा। अबुद्धिपूर्वकं तस्य प्रादुर्भूतं तमस्तदा॥ १५ तमो मोहो महामोहस्तामिस्रो ह्यन्धसंज्ञितः। अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः॥ १६ पञ्चधाधिष्ठितः सर्गो ध्यायतोऽप्रतिबोधवान्। बहिरन्तोऽप्रकाशश्च संवृतात्मा नगात्मकः। मुख्यसर्गः स विज्ञेयः सर्गसिद्धिविचक्षणैः॥ १७ यत्पुनर्ध्यायस्तस्तस्य ब्रह्मणः समपद्यत। तिर्यक्स्रोतस्ततस्तस्मात् तिर्यग्योनिस्ततः स्मृतः॥ १८ पश्चादयस्ते विख्याता उत्पथग्राहिणश्च ये। तमप्यसाधकं मत्वा तिर्यग्योनिं चतुर्मुखः॥ १९ ऊर्ध्वस्रोतास्तृतीयस्तु सात्त्विकः समवर्तत। तदा तुष्टोऽन्यसर्गं च चिन्तयामास वै प्रभुः॥ २० ततश्चिन्तयतस्तस्य सर्गवृद्धिं प्रजापतेः। अर्वाक्स्रोताः समुत्पन्ना मनुष्याः साधका मताः॥ २१ ते च प्रकाशबहुलास्तमोयुक्ता रजोऽधिकाः। तस्मात्ते दुःखबहुला भूयो भूयश्च कारिणः॥ २२ एते ते कथिताः सर्गा बहवो मुनिसत्तम। प्रथमो महतः सर्गस्तन्मात्राणां द्वितीयकः॥ २३ वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्ग ऐन्द्रियकः स्मृतः। मुख्यसर्गश्चतुर्थस्तु मुख्या वै स्थावराः स्मृताः॥ २४ तिर्यक्स्रोताश्च यः प्रोक्तस्तिर्यग्योनिः स उच्यते। ततोर्ध्वस्रोतसां षष्ठो देवसर्गस्तु स स्मृतः॥ २५ ततोऽर्वाक्स्रोतसां सर्गः सप्तमो मानुषः स्मृतः। अष्टमोऽनुग्रहः सर्गः सात्त्विको य उदाहृतः॥ २६


[दायाँ स्तम्भ : हिन्दी अनुवाद]

इस प्रकार कल्पके आदिमें पूर्ववत् सृष्टिका चिन्तन करते समय ब्रह्माजीके बिना जाने ही असावधानता हो जानेके कारण तमोगुणी सृष्टिका प्रादुर्भाव हुआ॥ ११—१५॥ उस समय उन महात्मासे तम (अज्ञान), मोह, महामोह (भोगेच्छा), तामिस्र (क्रोध) और अन्धतामिस्र (अभिनिवेश) नामक पञ्चपर्वा (पाँच प्रकारकी) अविद्या उत्पन्न हुई। फिर सृष्टिके लिये ध्यान करते हुए ब्रह्माजीसे वृक्ष, गुल्म, लता, वीरुध् एवं तृणरूप पाँच प्रकारका स्थावरात्मक सर्ग हुआ, जो बाहर-भीतरसे प्रकाशरहित, अविद्यासे आवृत एवं ज्ञानशून्य था। सर्गसिद्धिके ज्ञाता विद्वान् इसे 'मुख्य सर्ग' समझें; (क्योंकि अचल वस्तुओंको मुख्य कहा गया है।) फिर सृष्टिके लिये ध्यान करनेपर उन ब्रह्माजीसे तिर्यक्- स्रोत नामक सृष्टि हुई। तिरछा चलनेके कारण उसकी 'तिर्यक्' संज्ञा है। उससे उत्पन्न हुआ सर्ग 'तिर्यग्योनि' कहा जाता है। वे विख्यात पशु आदि जो कुमार्गसे चलनेवाले हैं, तिर्यग्योनि कहलाते हैं। चतुर्मुख ब्रह्माजीने उस तिर्यक्स्रोता सर्गको पुरुषार्थका असाधक मानकर जब पुनः सृष्टिके लिये चिन्तन किया, तब उनसे तृतीय 'ऊर्ध्वस्रोता' नामक सर्ग हुआ। यह सत्त्वगुणसे युक्त था (यही 'देवसर्ग' है)। तब भगवान्ने प्रसन्न होकर पुनः अन्य सृष्टिके लिये चिन्तन किया। तदनन्तर सर्गकी वृद्धिके विषयमें चिन्तन करते हुए उन प्रजापतिसे 'अर्वाक्स्रोता' नामक सर्गकी उत्पत्ति हुई। इसीके अन्तर्गत मनुष्य हैं, जो पुरुषार्थके साधक माने गये हैं। इनमें प्रकाश (सत्त्वगुण), और रज—इन दो गुणोंकी अधिकता है और तमोगुण भी है। इसलिये ये अधिकतर दुःखी और अत्यधिक क्रियाशील होते हैं॥ १६—२२॥ मुनिश्रेष्ठ! इन बहुत-से सर्गोंका मैंने आपसे वर्णन किया है। इनमें 'महत्तत्त्व' को पहला सर्ग कहा गया है। दूसरा सर्ग 'तन्मात्राओं' का है। तीसरा वैकारिक सर्ग है, जो 'ऐन्द्रिय' (इन्द्रियसम्बन्धी) कहलाता है। चौथा 'मुख्य' सर्ग है। स्थावर (वृक्ष, तृण, लता आदि) ही 'मुख्य' कहे गये हैं। तिर्यक्स्रोता नामक जो पाँचवाँ सर्ग कहा गया है, वह 'तिर्यग्योनि' कहलाता है। इसके बाद छठा 'ऊर्ध्वस्रोताओं' का सर्ग है। उसे 'देवसर्ग' कहा जाता है। फिर सातवाँ अर्वाक्स्रोताओंका सर्ग है, उसे 'मानव- सर्ग' कहते हैं। आठवाँ 'अनुग्रह-सर्ग' है, जिसे 'सात्त्विक'


[पाद-टिप्पणी] In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ४ ] अनुसर्गके स्रष्टा १७

अध्याय ४ ] अनुसर्गके स्रष्टा १७

नवमो रुद्रसर्गस्तु नव सर्गाः प्रजापतेः । कहा गया है। नवाँ ‘रुद्रसर्ग' है—ये ही नौ सर्ग प्रजापतिसे पञ्चैते वैकृताः सर्गाः प्राकृतास्ते त्रयः स्मृताः । उत्पन्न हुए हैं। इनमें पहलेके तीन 'प्राकृत सर्ग' कहे प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमः स्मृतः ॥ २७ गये हैं। उसके बादवाले पाँच 'वैकृत सर्ग' हैं और नवाँ जो 'कौमार सर्ग' है, वह प्राकृत और वैकृत भी है। इस प्राकृता वैकृताश्चैव जगतो मूलहेतवः । प्रकार सृष्टि-रचनामें प्रवृत्त हुए ब्रह्माजीसे उत्पन्न हुए जो सृजतो ब्रह्मणः सृष्टिमुत्पन्ना ये मयेरिताः ॥ २८ जगत्की उत्पत्तिके मूलकारण प्राकृत और वैकृत सर्ग हैं, उनका मैंने वर्णन किया। सबके आत्मरूपसे जाननेयोग्य तं तं विकारं च परं परेशो अव्यक्तस्वरूप परमात्मा परमेश्वर भगवान् अनन्तदेव मायामधिष्ठाय सृजत्यनन्तः । अपनी मायाका आश्रय लेकर प्रेरित होते हुए-से उन- अव्यक्तरूपी परमात्मसंज्ञः उन विकारोंकी सृष्टि करते हैं ॥ २३—२९ ॥ सम्प्रेर्यमाणो निखिलात्मवेद्यः ॥ २९ । इति श्रीनरसिंहपुराणे सृष्टिरचनाप्रकारोनाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सृष्टिरचनाका प्रकार' नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥

चौथा अध्याय अनुसर्गके स्रष्टा

भरद्वाज उवाच भरद्वाजजी बोले—सूतजी ! अव्यक्त जन्मा ब्रह्माजीसे नवधा सृष्टिरुत्पन्ना ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । जो नौ प्रकारकी सृष्टि हुई, उसका विस्तार किस प्रकार कथं सा ववृधे सूत एतत्कथय मेऽधुना ॥ १ हुआ ? यही इस समय आप हमें बतलाइये ॥ १ ॥ सूत उवाच सूतजी बोले—ब्रह्माजीने पहले जिन मरीचि आदि प्रथमं ब्रह्मणा सृष्टा मरीच्यादय एव च । ऋषियोंको उत्पन्न किया, उनके नाम इस प्रकार हैं— मरीचिरत्रिश्च तथा अङ्गिराः पुलहः क्रतुः ॥ २ मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलह, क्रतु, महातेजस्वी पुलस्त्य, पुलस्त्यश्च महातेजाः प्रचेता भृगुरेव च । प्रचेता, भृगु, नारद और दसवें महाबुद्धिमान् वसिष्ठ हैं। नारदो दशमश्चैव वसिष्ठश्च महामतिः ॥ ३ सनक आदि ऋषि निवृत्तिमार्गमें तत्पर हुए और एकमात्र सनकादयो निवृत्ताख्ये ते च धर्मे नियोजिताः । नारद मुनिको छोड़कर शेष सभी मरीचि आदि मुनि प्रवृत्ताख्ये मरीच्याद्या मुक्त्वैकं नारदं मुनिम् ॥ ४ प्रवृत्तिमार्गमें नियुक्त हुए ॥ २-४ ॥ योऽसौ प्रजापतिस्त्वन्यो दक्षनामाङ्गसम्भवः । ब्रह्माजीके दायें अङ्गसे उत्पन्न जो 'दक्ष' नामक तस्य दौहित्रवंशेन जगदेतच्चराचरम् ॥ ५ दूसरे प्रजापति कहे गये हैं, उनके दौहित्रोंके वंशसे यह देवाश्च दानवाश्चैव गन्धर्वोरगपक्षिणः । चराचर जगत् व्याप्त है। देव, दानव, गन्धर्व, उरग (सर्प) सर्वे दक्षस्य कन्यासु जाताः परमधार्मिकाः ॥ ६ और पक्षी—ये सभी, जो सब-के-सब बड़े धर्मात्मा थे, चतुर्विधानि भूतानि ह्यचराणि चराणि च । दक्षकी कन्याओंसे उत्पन्न हुए। चार प्रकारके चराचर वृद्धिं गतानि तान्येवमनुसर्गोद्भवानि तु ॥ ७ प्राणी अनुसर्गमें उत्पन्न होकर वृद्धिको प्राप्त हुए। अनुसर्गस्य कर्तारो मरीच्याद्या महर्षयः । महाभाग ! पूर्वोक्त मरीचिसे लेकर वसिष्ठतक सभी वसिष्ठान्ता महाभाग ब्रह्मणो मानसोद्भवाः ॥ ८ श्रीब्रह्माजीकी मानस संतान हैं। ये सब अनुसर्गके स्रष्टा हैं।