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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

२४४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० सुखदुःखानि धर्माः, नाचेतनस्येति । आरम्भनिवृत्त्योश्च प्रत्यगात्मनि दृष्टत्वात् परत्रानुमानं वेदितव्यमिति ॥ ३४ ॥ अत्र भूतचैतनिकः १ आह— तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेधः ? ॥ ३५ ॥ आरम्भनिवृत्तिलिङ्गाविच्छाद्वेषाविति यस्यारम्भनिवृत्ती तस्येच्छाद्वेषौ तस्य ज्ञानमिति प्राप्तम्—पार्थिवाप्यतैजसवायवीयानां शरीराणारम्भनिवृत्तिदर्शना- दिच्छाद्वेषज्ञानैर्योग इति चैतन्यम् ? ॥ ३५ ॥ परश्वादिष्वारम्भनिवृत्तिदर्शनात् ॥ ३६ ॥ शरीरे चैतन्यनिवृत्तिः। आरम्भनिवृत्तिदर्शनादिच्छाद्वेषज्ञानैर्योग इति प्राप्तं परश्वादेः करणस्यारम्भनिवृत्तिदर्शनाच्चैतन्यमिति । अथ शरीरस्येच्छादिभि- र्योगः, परश्वादेस्तु करणस्यारम्भनिवृत्ती व्यभिचरतः ? न तर्ह्ययं हेतुः 'पार्थिवा- प्यतैजसवायवीयानां शरीराणामारम्भनिवृत्तिदर्शनादिच्छाद्वेषज्ञानैर्योगः' इति । के ही इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःखादि धर्म हैं, अचेतन के नहीं । यों यह प्रवृत्ति- निवृत्ति जीवात्मा में प्रमाण से जान लेने के बाद परमात्मा में भी अनुमान प्रमाण से समझ लेनी चाहिये ॥ ३४ ॥ यहाँ भूतचैतनिक चार्वाक कहता है— इच्छा द्वेष के शरीरनिमित्तिक होने से पार्थिवादि देहों में चैतन्यप्रतिषेध नहीं बनता ? ॥ ३५ ॥ 'इच्छा, द्वेष आरम्भ-निवृत्ति के हेतु हैं'—इस सिद्धान्त से जिसके आरम्भ-निवृत्ति होंगे, उस के इच्छा-द्वेष हैं तथा उसी का ज्ञान होना चाहिये; तब पार्थिव, आप्य, तैजस, वायवीय शरीरों के भी आरम्भ-निवृत्ति देखे जाने से इच्छा द्वेषादि का योग भी उन्हीं के साथ होगा, तब ज्ञान भी उन्हीं को होना चाहिये, तो क्यों न उन शरीरों में ही चैतन्य मान लें ? ॥ ३५ ॥ परशु-आदि में भी आरम्भनिवृत्ति देखे जाने से ॥ ३६ ॥ शरीरों में चैतन्य नहीं मानना चाहिये । यदि चर्वाक यह सिद्धान्त बनायेगा कि 'जिसमें आरम्भ-निवृत्ति देखे जाय उसी का इच्छा द्वेष तथा ज्ञान से सम्बन्ध होगा' तो परशु ( कुठार ) आदि साधनों की भी आरम्भ-निवृत्ति देखे जाने से उसे भी चैतन्य मानना पड़ेगा । यदि कहें कि शरीर का इच्छा-द्वेषादि से ही सम्बन्ध होता है, परश्वादि साधनों की आरम्भ-निवृत्ति तो कहीं-कहीं व्यभिचरित भी देखी जाती है ? तो यह कोई हेतु नहीं बना, तथा इसी परश्वादि दृष्टान्त से आपका यह सिद्धान्त भी व्यभिचरित हो जायेगा कि पार्थिव, आप्य, तैजस, वायवीय शरीरों की आरम्भ-निवृत्ति देखे जाने से उनका इच्छा द्वेष तथा ज्ञान से सम्बन्ध है । १. 'ज्ञानेच्छादीनां पार्थिवमिदं शरीरमेवाधिकरणम्' इति भूतचेतनवादी चार्वाक इत्यर्थः ।

३७. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २४५

३७. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २४५ अयं तर्ह्यन्योऽर्थः—तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेधः। पृथ्वि- व्यादीनां भूतानामारम्भस्तावत्तदसत्स्थावरशरीरेषु तदवयव्यूहलिङ्गः प्रवृत्ति- विशेषः. लोष्टादिषु च लिङ्गाभावात् प्रवृत्तिविशेषाभावो निवृत्तिः, आरम्भ- निवृत्तिलिङ्गाविच्छाद्वेषाविति । पार्थिवाद्येष्वणुषु तद्दर्शनादिच्छाद्वेषयोगः, त- द्योगाज् ज्ञानयोग इति सिद्धं भूतचैतन्यमिति ? कुम्भादिष्वनुपलब्धेरहेतुः¹। कुम्भादिमृदवयवानां व्यूहलिङ्गः प्रवृत्तिविशेष आरम्भः, सिकतादिषु प्रवृत्तिविशेषाभावो निवृत्तिः । न च मृत्सिक्तानामारम्भ- निवृत्तिदर्शनादिच्छाद्वेषप्रयत्नज्ञानैर्योगः, तस्मात् 'तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः' इत्यहेतुरिति ॥ ३६ ॥ नियमानियमौ तु तद्विशेषकौ ॥ ३७ ॥ तयोरिच्छाद्वेषयोर्नियमानियमौ विशेषकौ = भेदकौ। ज्ञस्येच्छाद्वेषनिमित्ते प्रवृत्तिनिवृत्ती, न स्वाश्रये। किं तर्हि ? प्रयोज्याश्रये। तत्र प्रयुज्यमानेषु भूतेषु प्रवृत्तिनिवृत्ती स्तः, न सर्वेष्वित्यनियमोपपत्तिः। यस्य तु ज्ञत्वाद् भूतानामिच्छाद्वेषनिमित्ते आरम्भनिवृत्ती स्वाश्रये तस्य शंका—हमारे सिद्धान्तवाक्य का आपने अर्थ ठीक नहीं समझा । उसका अर्थ यह है—पृथिव्यादि भूतों में उनके अस्थिर स्थावर शरीरों में तदवयव्यूहहेतु से प्रवृत्तिविशेष ज्ञात होता है। तथा लोष्टादिक में वह हेतु न होने से प्रवृत्तिविशेषाभावरूप निवृत्ति ज्ञात होती है। इच्छाद्वेषादिक आरम्भ निवृत्ति हेतु से निर्णीत है। पार्थिवादि अणुओं में वह हेतु देखा जाने से उनसे इच्छाद्वेष का सम्बन्ध तथा उससे ज्ञान का सम्बन्ध है। अतः भूतचैतन्य सिद्ध हो जाता है ? कुम्भादि में उक्त साध्य की अनुपलब्धि होने से वह अहेतु है । कुम्भादि के मृत्तिकावयवों में उनके आकृतिहेतु प्रवृत्तिविशेष 'आरम्भ', तथा सिकता ( बालुका ) में उस प्रवृत्तिविशेष का अभाव ही 'निवृत्ति' कहलाती है। उन मृत्सिक्तादिकों में प्रवृत्ति-निवृत्ति देखी जाने पर भी, इच्छाद्वेषादि या ज्ञान से उनका सम्बन्ध नहीं देखा जाता। अतः 'इच्छा द्वेष आरम्भप्रवृत्तिमित्तक हैं'—यह आपका कहना अहेतुक है ॥ ३६ ॥ नियम तथा अनियम तो उनके भेदक हैं ॥ ३७ ॥ इच्छाद्वेषों के नियम, अनियम तो ज्ञ तथा अज्ञ के भेदक हैं। प्रवृत्ति-निवृत्ति ज्ञाता के इच्छाद्वेषनिमित्तक है। आप उन्हे स्वाश्रय ( ज्ञ के आश्रित ) नहीं कह सकते; वे तो प्रयोज्याश्रय हैं। जो भूत प्रयुज्यमान होंगे, उनमें ही प्रवृत्ति-निवृत्ति होगी, सब में नहीं; अतः नियम नहीं बन सकता। जिस (चार्वाक) के मत में ज्ञाता होने से भूतों की इच्छाद्वेषपत्तिमित्तक प्रवृत्ति-निवृत्ति १. न्यायसूचीनिबन्धे नैतत् सूत्रत्वेन परिगणितम्, नापि वृत्तिकृता व्याख्यातम्, अतो नेदं सूत्रम् ।

२४६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० नियमः स्यात्, यथा-भूतानां गुणान्तरनिमित्ता प्रवृत्तिर्गुणप्रतिबन्धाच्चानिवृ- त्तिर्भूतमात्रे भवति नियमेन; एवं भूतमात्रे ज्ञानेच्छाद्वेषनिमित्ते प्रवृत्तिनिवृत्तौ स्वाश्रये स्याताम् ! न तु भवतः । तस्मात् प्रयोजकाश्रिता ज्ञानेच्छाद्वेषप्रयत्नाः, प्रयोज्याश्रये तु प्रवृत्तिनिवृत्ती इति सिद्धम् । एकशरीरे तु ज्ञातृबहुत्वं निरनुमानम् । भूतचैतनिकस्यैकशरीरे बहूनि भूतानि ज्ञानेच्छाद्वेषप्रयत्नगुणानीति ज्ञातृबहुत्वं प्राप्तम् । ओमिति ब्रुवतः प्रमाणं नास्ति । यथा नानाशरीरेषु नानाज्ञातारो बुद्ध्यादिगुणव्यवस्थानात्, एवमेक- शरीरेऽपि बुद्ध्यादिव्यवस्थानुमानं स्याज्ज्ञातृबहुत्वस्येति । दृष्टश्चान्यगुणनिमित्तः प्रवृत्तिविशेषो भूतानाम्, सोऽनुमानमन्यत्रापि । दृष्टः करणलक्षणेषु भूतेषु परश्वादिषु उपादानलक्षणेषु च मृत्प्रभृतिष्वन्यगुणनिमित्तः प्रवृत्तिविशेषः । सोऽनुमानमन्यत्रापि-त्रसत्स्थावरशरीरेषु तदवयव्यूहलिङ्गः प्रवृत्तिविशेषो भूतानामन्यगुणनिमित्त इति । स च गुणः प्रयत्नसमानाश्रयः संस्कारो धर्माधर्मसमाख्यातः सर्वार्थः, पुरुषार्थाराधनाय प्रयोजको भूतानां

  • प्रयत्नवदिति । है, उसके यहाँ नियम बन सकता है। जैसे भूतसामान्य में गुरुत्वादि गुणान्तरनिमित्तक प्रवृत्ति तथा इसी गुणप्रतिबन्ध से नियमतः भूतमात्र में निवृत्ति देखी जाती है। इसी तरह भूतमात्र में ज्ञानेच्छाद्वेषनिमित्तक प्रवृत्ति-निवृत्ति स्वाश्रय होने से होने लगेगी, जब कि होती नहीं है । अतः यही मानना चाहिये कि ज्ञान, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न प्रयोजक ( ज्ञाता ) के आश्रित हैं, तथा प्रवृत्ति-निवृत्ति प्रयोज्य ( भूतादि ) के आश्रित हैं । एक शरीर में अनेक ज्ञाता किसी भी अनुमान से सिद्ध नहीं किये जा सकते । भूत- चैतन्यवादी के मत में बहुत से भूत ज्ञान, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न गुणवाले हैं, अतः अनेक ज्ञाता होने लगेंगे । यदि वह उनका अनेकत्व स्वीकार करता है तो उसकी इस स्वीकृति में कोई प्रमाण नहीं है । जैसे अनेक शरीरों में बुद्ध्यादिगुणव्यवस्था से अनेक ज्ञाता होते हैं; वैसे ही एक में भी बुद्ध्यादिव्यवस्था से अनेक ज्ञाताओं का अनुमान होने लगेगा । भूतों का अन्यगुणनिमित्तक प्रवृत्तिविशेष देखा गया है, वह अन्यत्र भी अनुमान करा देगा । करणलक्षण परशु-आदि तथा उपादानलक्षण मृदादि भूतों में अन्यगुणनिमित्तक प्रवृत्तिविशेष देखा जाता है, तन्मूलक ही यह अनुमान होता है कि प्राणियों के अस्थिर शरीरों में भूतों का तदवयवव्यूहलिङ्गक प्रवृत्तिविशेष अन्यगुणनिमित्तक ही है । वह गुण प्रयत्नसमानाधिकरण धर्माधर्माख्य संस्कारविशेष ही है । वह पुरुषसम्बद्ध सकलार्थ- प्रयोजक पुरुषार्थ-सम्पादन के लिये भूतों का प्रयोजक है । जैसे पुरुष का प्रयत्न तत्तदर्थ सम्पादन के लिये भूतों को प्रेरणा देता है, उसी तरह तद्गत धर्माधर्मरूप संस्कार भी प्रेरणा देता है ।

·३८. सू० ]· बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् :२४७

·३८. सू० ]· बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् :२४७ आत्मास्तित्वहेतुभिरात्मनित्यत्वहेतुभिश्च भूतचैतन्यप्रतिषेधः कृतो वेदि- तव्यः । 'नेन्द्रियार्थयोस्तद्विनाशेऽपि ज्ञानावस्थानात्' ( ३.२.१८ ) इति च समानः प्रतिषेध इति । क्रियामात्रं क्रियोपरममात्रं चारम्भनिवृत्ती इत्यभिप्रेत्यो- क्तम्-‘तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेधः' ( ३.२.३५ ) । अन्यथा त्विमे आरम्भनिवृत्ती आख्याते, न च तथाविधे पृथिव्यादिषु दृश्येते, तस्मादयु- क्तम्-‘तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेधः' इति ॥ ३७ ॥ भूतेन्द्रियमनसां समानः प्रतिषेधः, मनस्तूदाहरणमात्रम् । यथोक्तहेतुत्वात् पारतन्त्र्यादकृताभ्यागमाच्च न मनसः ॥ ३८ ॥ ‘इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्' (१.१.१०) इत्यतः प्रभृति यथोक्तं संगृह्यते, तेन भूतेन्द्रियमनसां चैतन्यप्रतिषेधः । पारतन्त्र्यात् । परतन्त्राणि भूतेन्द्रियमनांसि धारणप्रेरणव्यूहनक्रियासु प्रय- त्नवशात् प्रवर्तन्ते, चैतन्ये पुनः स्वतन्त्राणि स्युरिति । इसी प्रकार, आत्मास्तित्वसाधक तथा आत्मनित्यत्वसाधक हेतुओं से भी भूतचैतन्य का प्रतिषेध समझना चाहिये । 'इन्द्रिय-अर्थ को बुद्धि नहीं कह सकते; क्योंकि उनके विनाश पर भी ज्ञानस्थिति देखी जाती है' ( ३.२.१८ ) — यह प्रतिषेध भी भूतचैतन्या- भाव का ही समर्थन करता है। क्रिया तथा क्रियोपरममात्र को आरम्भ-निवृत्ति समझ कर पूर्वपक्षी ने कह दिया था कि 'तल्लिङ्ग होने से इच्छाद्वेष का पार्थिवादि में प्रतिषेध नहीं बनता' ( ३.२.३५ ) । अन्यथा हमारे मत में हितप्राप्ति तथा अहितपरिहार के लिये चेष्टा ( प्रयत्न ) विशेष आरम्भ-निवृत्ति कहलाते हैं। इस लक्षणवाले आरम्भ तथा निवृत्ति भूतों में दिखायी नहीं देते । अतः यह कहना असमीचीन ही है कि 'तल्लिङ्ग होने से पार्थिवादि में प्रतिषेध नहीं बनता' ॥ ३७ ॥ बुद्धि के आश्रितत्व के वारे में भूत, इन्द्रिय तथा मन का प्रतिषेध समान ही है; मन तो एक उदाहरणमात्र है । यथोक्त हेतुओं से, पारतन्त्र्य से, तथा अकृताभ्यागम दोष से बुद्धि मन का ( गुण नहीं हो सकती ) ॥ ३८ ॥ 'यथोक्त' का तात्पर्य 'इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख, ज्ञान को ही आत्मा का हेतु समझें' ( १. १. १० ) इत्यादि सूत्र से है। उक्त हेतुओं से भूत, इन्द्रिय, तथा मन का चैतन्य प्रतिषिद्ध समझना चाहिए । पारतन्त्र्य हेतु से भी इनमें चैतन्य का प्रतिषेध समझें । भूत, इन्द्रिय तथा मन परतन्त्र हैं, वे किसी अन्य के प्रयत्न से धारण, प्रेरण तथा व्यूहन ( संग्रह ) क्रियाओं में प्रवृत्त होते हैं। इनको चैतन्य मानने पर ये स्वतन्त्र होने लगेंगे ।

२४८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० अकृताभ्यागमाच्च । 'प्रवृत्तिर्वाग्बुद्धिशरीरारम्भः' (१.१.१७) इति चैतन्ये भूतेन्द्रियमनसां परकृतं कर्म पुरुषेणोपभुज्यत इति स्यात् । अचैतन्ये तु तत्सा- धनस्य स्वकृतकर्मफलोपभोगः पुरुषस्येत्युपपद्यत इति ॥ ३८ ॥ अथायं सिद्धोपसङ्ग्रहः— परिशेषाद्यथोक्तहेतूपपत्तेश्च ॥ ३९ ॥ आत्मगुणो ज्ञानमिति प्रकृतम् । परिशेषो नाम 'प्रसक्तप्रतिषेधे अन्यत्रा- प्रसङ्गाच्छिष्यमाणे सम्प्रत्ययः' ( १.१.५ सू० भा० ) । भूतेन्द्रियमनसां प्रतिषेधे द्रव्यान्तरं न प्रसज्यते, शिष्यते चात्मा, तस्य गुणो ज्ञानमिति ज्ञायते । यथोक्तहेतूपपत्तेश्चेति । 'दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणात्' (३.१.१) इत्ये- वमादीनामात्मप्रतिपत्तिहेतूनामप्रतिषेधादिति । परिशेषज्ञापनार्थं प्रकृतस्थापनादिज्ञानार्थं च यथोक्तहेतूपपत्तिवचनमिति । अकृताभ्यागम दोष से भी बुद्धि मन का गुण नहीं है । "वाणी, बुद्धि तथा शरीर से किये जाने वाले कार्यों का आरम्भ 'प्रवृत्ति' कहलाता है" (१. १. १७) यह पहले कह आये हैं, इस स्थिति में शरीरादि को चैतन्य मानने पर चेतन के स्वतन्त्र होने से वे ही कर्ता हो जायेंगे, तब शरीरनाश के बाद परलोक का फलभोग कैसे सम्भव होगा ! अन्यथा दूसरे के कर्म का दूसरा उपभोग करेगा । शरीरादि को अचेतन मानने पर स्वकृत कर्म का फलभोग पुरुष (आत्मा) को उपपन्न होगा, क्योंकि वह नित्य है ॥ ३८ ॥ अब इस समग्र प्रकरण का उपसंहार यह है— परिशेष से तथा यथोक्त हेतुओं द्वारा उपपादन से ॥ ३९ ॥ ज्ञान आत्मा का ही गुण है । 'परिशेष' से तात्पर्य है 'प्रसक्त का निषेध कर दिये जाने पर, अन्यत्र प्रसङ्ग प्राप्त न होने से अवशिष्ट को मान लेना' । यहाँ साधक हेतुओं से भूत, इन्द्रिय तथा मन का बुद्धिगुणत्व प्रतिषिद्ध कर दिया गया, तब द्रव्यान्तर में यह गुण प्रसक्त नहीं हो सकता, अब बाकी बच गया—आत्मा, अतः यह सिद्ध हुआ कि बुद्धि आत्मा का ही गुण है । यथोक्त हेतुओं के उपपादन से भी । 'दर्शन स्पर्शन द्वारा एक ही अर्थ के ग्रहण से' (३. १. १) इत्यादि आत्मप्रतिपादक हेतुओं के, प्रतिपक्षियों द्वारा खण्डित न किये जाने से भी बुद्धि आत्मा का गुण सिद्ध होती है । अथवा—परिशेष-ज्ञापन कराने के लिए सूत्र में 'यथोक्तहेतु' शब्द का प्रयोग है । अर्थात् तृतीयाध्याय-प्रथमाह्निकरोक्त हेतु आत्मा के साधक हैं । अथ च प्रकृत (बुद्धि का आत्मगुणत्व) स्थापनादिज्ञान के लिये 'उपपत्ति' शब्द का प्रयोग है, अर्थात् बुद्धि को आत्मगुण मानने में भी वे हेतु खण्डित नहीं होते । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

४०. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २४९

४०. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २४९ अथवा—उपपत्तेश्चेति हेत्वन्तरमेवेदम्। नित्यः खल्वयमात्मा, यस्मादेकस्मिन् शरीरे धर्मं चरित्वा कायभेदात् स्वर्गे देवेषूपपद्यते, अधर्मं चरित्वा देहभेदाद् नरकेषूपपद्यते इति। उपपत्तिः शरीरान्तरप्राप्तिलक्षणा, सा सति सत्त्वे नित्ये चाश्रयवती, बुद्धिप्रबन्धमात्रे तु निरात्मके निराश्रया नोपपद्यत इति। एक- सत्त्वाधिष्ठानश्चानेकशरीरयोगः संसार उपपद्यते, शरीरप्रबन्धोच्छेदश्चापवर्गो मुक्तिरित्युपपद्यते। बुद्धिसन्ततिमात्रे त्वेकसत्त्वानुपपत्तेर्न कश्चिद्दीर्घमध्वानं संधा- वति, न कश्चिच्छरीरप्रबन्धाद्विमुच्यत इति संसारापवर्गानुपपत्तिरिति। बुद्धि- सन्ततिमात्रे च सत्त्वभेदात् सर्वमिदं प्राणिव्यवहारजातमप्रतिसंहितमव्यावृत्तम- परिनिष्ठितं च स्यात्। ततः स्मरणाभावः, नान्यदृष्टमन्यः स्मरतीति। स्मरणं च खलु पूर्वज्ञातस्य समानेन ज्ञात्रा ग्रहणम्—'अज्ञासिषममुमर्थं ज्ञेयम्'। इति सोऽय- मेको ज्ञाता पूर्वज्ञातमर्थं गृह्णाति, तच्चास्य ग्रहणं स्मरणमिति, तद् बुद्धिप्रबन्ध- मात्रे निरात्मके नोपपद्यते ॥ ३९ ॥ स्मरणं त्वात्मनो ज्ञस्वाभाव्यात् ॥ ४० ॥ उपपद्यते इति। आत्मन एव स्मरणम्, न बुद्धिसन्ततिमात्रस्येति। तुशब्दो- अथवा—'उपपत्ति से'—यह एक पृथक् हेतु ही है। 'यह आत्मा नित्य है, क्योंकि एक शरीर में धर्म का आचरण करके शरीर के विनष्ट होने पर स्वर्ग में देवताओं के बीच शरीरान्तर उपपन्न होता है, अधर्म का आचरण करके देह-नाश के बाद नरक में शरीरा- न्तर उपपन्न होता है।' यहाँ उक्त स्वर्गीय नारकीय शरीरों की प्राप्ति ही आत्मा की 'उपपत्ति' है। वह किसी नित्य सत्त्व (द्रव्य) को ही अपना आधार बना सकती है। बुद्धिसन्तानमात्र मानने पर निरात्मक में आश्रयहीन होकर वह कैसे उपपन्न हो सकेगी ! अनेक शरीर-सम्बन्ध वाला एकसत्त्वाश्रय ही संसार' कहलाता है, शरीरसम्बन्धोच्छेदरूप अपवर्ग 'मोक्ष' कहलाता है। बुद्धिसन्तानमात्र मानने पर एक सत्त्व की उपपत्ति न होने से न कोई लम्बे रास्ते (शरीर से शरीरान्तर) चलेगा, न कोई शरीरसम्बन्ध से मुक्त होगा, यों संसार तथा मोक्ष—दोनों की ही उपपत्ति न बनेगी। तथा बुद्धिसन्तानमात्र मानने पर सत्त्वभेद से यह सारा प्राणियों का व्यवहार असमाप्त, एक दूसरे न जुड़ा हुआ, अव्यापृत तथा अपरिनिष्ठित (अव्यवस्थित) होने लगेगा। तब स्मरणाभाव भी होगा; क्योंकि अन्य दृष्ट का अन्य स्मरण नहीं करता। स्मरण कहते हैं—'एक ज्ञाता को पूर्व ज्ञात का ज्ञान होना' कि 'इस जाने हुए अर्थ को मैं जानता था।' यह एक ही ज्ञाता जिस पूर्व ज्ञात अर्थ को ग्रहण करता है वह ग्रहण 'स्मरण' कहलाता है। वह स्मरण निरात्मक बुद्धिसन्तानमात्र में उपपन्न नहीं होता ॥ ३९ ॥ ज्ञातृस्वभाव होने से आत्मा को स्मरण ॥ ४० ॥ उपपन्न हो सकता है। आत्मा को ही स्मरण होता है, बुद्धिसन्तानमात्र को नहीं।

२५० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आं० ऽवधारणे। कथम् ? ज्ञस्वभावत्वात्। ज्ञ इत्यस्य स्वभावः स्वो धर्मः, अयं खलु 'ज्ञास्यति, जानाति, अज्ञासीत्' इति त्रिकालविषयेणानेकेन ज्ञानेन सम्बध्यते, तच्चास्य त्रिकालविषयं ज्ञानं प्रत्यात्मवेदनीयम्-'ज्ञास्यामि, जानामि, अज्ञासिषम्' इति वर्तते, तद्यस्यायं स्वो धर्मस्तस्य स्मरणम्, न बुद्धिप्रबन्धमात्रस्य निरा- त्मकस्येति ॥ ४० ॥ स्मृतिहेतूनामयौगपद्याद्युगपदस्मरणमित्युक्तम्। अथ केभ्यः स्मृतिरुत्पद्यत इति ? स्मृतिः खलु— प्रणिधाननिबन्धाभ्यासलिङ्गलक्षणसादृश्यपरिग्रहाश्रयाश्रितसम्बन्धानन्तर्य- वियोगैककार्यविरोधातिशयप्राप्तिव्यवधानसुखदुःखेच्छाद्वेषभयार्थित्वक्रियाराग - धर्माधर्मनिमित्तेभ्यः ॥ ४१ ॥ सुस्मूर्षया मनसो धारणं प्रणिधानं सुस्मूर्षितलिङ्गचिन्तनं चार्थस्मृति- कारणम्। निबन्धः खल्वेकग्रन्थोपनयमोऽर्थानाम्, एकग्रन्थोपनताः खल्वर्था अन्योऽ- न्यस्मृतिहेतव आनुपूर्व्येणेतरथा वा भवन्तीति। धारणाशास्त्रकृतो१ वा प्रज्ञा- सूत्र में 'तु' शब्द निश्चयार्थक है। क्यों ? ज्ञस्वभाव ज्ञाता का अपना धर्म है, वह 'जानेगा', 'जानता है', 'जानता था'—इस त्रिकालविषयक अनेक ज्ञान से सम्बद्ध होता है। यह त्रिकालविषयक ज्ञान 'जानूँगा' 'जानता हूँ' 'जानता था'—ऐसा प्रत्यात्म- वेदनीय (प्रतिव्यक्ति को अनुभवसिद्ध) होता है। जिसका यह स्वधर्म है वही स्मरण करता है, न कि निरात्मक बुद्धिसन्तानमात्र ॥ ४० ॥ स्मृतिहेतुओं में यौगपद्य न रहने से युगपद् स्मरण नहीं होता—यह पहले कह आये हैं। यह स्मृति— प्रणिधान, निबन्ध, अभ्यास, लिङ्ग, लक्षण, सादृश्य, परिग्रह, आश्रय, आश्रित, सम्बन्ध, आनन्तर्य, वियोग, एककार्य, विरोध, अतिशय, प्राप्ति, व्यवधान, सुख-दुःख, इच्छा-द्वेष, भय, अर्थित्व, क्रिया, राग, धर्म, अधर्म—इन २५ निमित्तों से होती है ॥४१॥ स्मरण करने की इच्छा से मन को एक में धारण करना, अर्थात् उस सुस्मूर्षा-विषय के अतिरिक्त अन्यत्र गये मन को निवारण करना 'प्रणिधान' कहलाता है। सुस्मूर्षित के चिह्न का चिन्तन भी अर्थ का स्मरण करता है। एक ग्रन्थ में आये हुए अर्थ (विषय), जैसे इसी ग्रन्थ में प्रमाणादि पदार्थ, 'निबन्ध' कहलाते हैं। एक ग्रन्थ में आये हुए पदार्थ अनुक्रम या व्युत्क्रम से अन्योन्यस्मृतिहेतु होते हैं। जैगीषव्यादि महर्षि प्रोक्त 'धारणाशास्त्र', तत्कृत प्रज्ञातवस्तुओं में स्मर्तव्य विषयों का समारोप भी 'निबन्ध' है, १. "धारणाशास्त्रं जैगीषव्यादिप्रोक्तम्, तत्कृतो ज्ञातेष्वेव वस्तुषु नाडीचक्रहृत्पु- ण्डरीककण्ठकूपनासाग्रतालुललाटब्रह्मरन्ध्रादिषु स्मर्त्तव्यानां बीजरूपसंस्थानास्त्राभरणभू- तानां देवतानामुपनिक्षेपः समारोपः। तथा च तत्र देवताः समारोपितास्तत्तदवयवग्रहणात् स्मर्यन्ते इत्यर्थः"—इति तात्पर्यटीकायां वाचस्पतिमिश्राः।

४१. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २५१

४१. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २५१ तेषु वस्तुषु स्मर्तव्यानामुपनिःक्षेपो निबन्ध इति। अभ्यासस्तु समाने विषये ज्ञाना- नामभ्यावृत्तिः, अभ्यासजनितः संस्कार आत्मगुणोऽभ्यासशब्देनोच्यते, स च स्मृति- हेतुः समान इति । लिङ्गं पुनः संयोगि समवाय्येकार्थसमवायि विरोधि चेति । यथा—धूमोऽग्नेः, गोर्विषाणम्, पाणिः पादस्य, रूपं स्पर्शस्य, अभूतं भूतस्येति । लक्षणं पश्ववयवस्थं गोत्रस्य स्मृतिहेतुः—विदानामिदम्, गर्गाणामिदमिति । सादृश्यं चित्रगतं प्रतिरूपकं देवदत्तस्येत्येवमादि । परिग्रहात्—स्वेन वा स्वामी, स्वामिना वा स्वं स्मर्यते । आश्रयाद्—ग्रामण्या तदधीनं संस्मरति । आश्रितात्- तदधीनेन ग्रामण्यमिति । सम्बन्धात्—अन्तेवासिना युक्तं गुरुं स्मरति, ऋत्विजा याज्यमिति । आनन्तर्यादिति करणीयेष्वर्थेषु । वियोगाद्—येन विप्रयुज्यते तद्वियोगप्रतिसंवेदी भृशं स्मरति । एककार्यात्—कर्त्रन्तरदर्शनात् कर्त्रन्तरे स्मृतिः । विरोधात्—विजिगीषमाणयोरन्यतरदर्शनादन्यतरः स्मर्यते । अतिश- याद्—येनातिशय उत्पादितः । प्राप्तेः—यतोऽनेन किञ्चित्प्राप्तमाप्तव्यं वा भवति तमभीक्ष्णं स्मरति। व्यवधानात्—कोशादिभिरसिप्रभृतीनि स्मर्यन्ते, सुखदुःखाभ्यां तद्धेतुः स्मर्यते । इच्छाद्वेषाभ्यां यमिच्छति यं च द्वेष्टि तं स्मरति । भयाद्—यतो बिभेति । अर्थित्वाद्—येनार्थी भोजनेनाच्छादनेन वा । क्रिया—रथेन रथकारं वह स्मृतिहेतु होता है । समान विषयों में ज्ञान को वार वार दुहराने को 'अभ्यास' कहते हैं। अभ्यासजनित संस्कार जो कि आत्मगुण है, 'अभ्यास' कहलाता है । वह भी स्मृति- हेतु है। 'लिङ्ग' कहते हैं—संयोगिद्रव्य या समवायी या एक अर्थ में समवेत होता हो, या विरोधी हो । क्रमशः उदाहरण, जैसे—धूम अग्नि का लिङ्ग है, शृंग गौ का, हाथ पैर का या रूप स्पर्श का, तथा अभूत भूत का । 'लक्षण' पश्ववयवस्थ गोत्र (वंश) की स्मृति का हेतु होता है, जैसे 'यह विदों का' 'यह गर्गों का' । 'सादृश्य'—जैसे देवदत्त की चित्रगत प्रति- कृति । 'परिग्रह' स्मृति कहलाता है, जैसे—स्व से स्वामी का, या स्वामी से स्वस्मरण । 'आश्रय' से—ग्रामनेता से उसके अधीन का स्मरण । 'आश्रित' से—उसके अधीन से ग्रामनेता का स्मरण । 'सम्बन्ध' से—अन्तेवासी ( छात्र ) से युक्त गुरु का, या ऋत्विज् से याज्य का स्मरण । 'आनन्तर्य' से भी कर्तव्यविषयक स्मरण होता है । 'वियोग' से—जिससे वियुक्त हुआ जाता है, वह वियोगप्रतिसंवेदी अत्यधिक याद आता है । 'एककार्य' से—अन्यकर्ता के दर्शन से अन्यकर्ता की स्मृति होती है । 'विरोध' से—विजय के इच्छुक किन्हीं दो में एक को देखकर दूसरे का स्मरण । 'अतिशय' से—जिसके द्वारा अतिशय उत्पन्न किया गया हो । 'प्राप्ति' से—जिसको जिससे कुछ प्राप्त हो या प्राप्त करना हो वह उसे हमेशा याद करता है। 'व्यवधान' से—जैसे म्यान से तलवार का याद आना या सुख- दुःख से उसके हेतु का स्मरण होना । 'इच्छा' या 'द्वेष' से—जिसकी इच्छा करता है या जिससे द्वेष करता है, उसे हमेशा याद रखता है । 'भय' से—जिससे डरता हो वह भी स्मृत रहता है । 'अर्थित्व' से—जिसकी चाह हो भोजन या वस्त्र से, वह भी हमेशा याद

बुद्धेरुत्पन्नापवर्गित्वपरीक्षाप्रकरणम् [ ४२-४५ ]

२५२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० स्मरति । रागाद्—यस्यां स्त्रियां रक्तो भवति तामभीक्ष्णं स्मरति । धर्मात्— जात्यन्तरस्मरणमिह चाधीतश्रुतावधारणमिति । अधर्मात्—प्रागनुभूतदुःख- साधनं स्मरति । न चैतेषु निमित्तेषु युगपत्संवेदनानि भवन्तीति युगपदस्मरण- मिति । निदर्शनं चेदं स्मृतिहेतूनाम्, न परिसंख्यानमिति ॥ ४१ ॥ बुद्धेरुत्पन्नापवर्गित्वपरीक्षाप्रकरणम् [ ४२-४५ ] अनित्यायां च बुद्धौ उत्पन्नापवर्गित्वात् कालान्तरावस्थानाच्चानित्यानां संशयः—किमुत्पन्नापवर्गािणी बुद्धिः शब्दवत् ? आहोस्वित् कालान्तरावस्थायिनी कुम्भवदिति ? उत्पन्नापवर्गािणीति पक्षः परिगृह्यते । कस्मात् ?— कर्मानवस्थाथिग्रहणात् ॥ ४२ ॥ कर्मणोऽनवस्थायिनो ग्रहणादिति । क्षिप्तस्येषोरापतनात् क्रियासन्तानो गृह्यते, प्रत्यर्थनियमाच्च बुद्धीनां क्रियासन्तानवद् बुद्धिसन्तानोपपत्तिरिति । अवस्थित- ग्रहणे च व्यवधीयमानस्य प्रत्यक्षनिवृत्तेः । अवस्थिते च कुम्भे गृह्यमाणे सन्तानेनैव बुद्धिर्वर्त्तते प्राग् व्यवधानात्, तेन व्यवहिते प्रत्यक्षं ज्ञानं निवर्त्तते । रहता है । 'क्रिया' से—रथ को देखकर उसके निर्माता रथकार का स्मरण । 'राग' से— जैसे जिस स्त्री में जिसका राग हो वह उस स्त्री को हमेशा याद रखता है । 'धर्म से'— जैसे इस जन्म में जात्यन्तर का स्मरण या अधिक श्रुत का अवधारण होता है । 'अधर्म से'—जैसे पहले अनुभव किये दुःख के कारणों को स्मरण करता है । इन हेतुओं के रहने में युगपत्संवेदन नहीं होता, अतः स्मृति युगपत् नहीं हो सकती । स्मृति हेतुओं का यह निदर्शनमात्र है, परिगणन नहीं । अतः उन्मादादि लोकसिद्ध अन्य हेतुओं का भी यहां ग्रहण कर लेना चाहिए ॥ ४१ ॥ अनित्य बुद्धि में उत्पन्नविनाशित्व होने से तथा साथ ही कालान्तरावस्थिति से अनित्यों में संशय होता है कि क्या यह बुद्धि शब्द की तरह उत्पन्नविनाशी है, या कुम्भ की तरह कालान्तरावस्थायी है ? । पहले उत्पन्नविनाशी पक्ष पर विचार करते हैं; क्योंकि— अनवस्थाथी कर्म का ग्रहण होता है ॥ ४२ ॥ जैसे—फेंके गये तीर की भूमिपतनावधिपर्यन्त क्रिया की अनेक धाराएँ गृहीत होती हैं, उसी तरह बुद्धि भी, प्रत्यर्थनियत (अर्थ रहने तक) होने से अनेक क्रियाओं की तरह उपपन्न होती है । अतः यह आशुतरविनाशिनी है । अवस्थित घटादि के ग्रहण में तो यह प्रक्रिया है कि जब तक कोई व्यवधान न आ जाये तब तक वे उपस्थित रहते हैं, जब कोई व्यवधान आ जाता है तो उनका प्रत्यक्ष निवृत्त हो जाता है । बुद्धि तो सन्तत धारा

४३. सू० ] बुद्धेरूत्पन्नापवर्गित्वपरीक्षाप्रकरणम् २५३

४३. सू० ] बुद्धेरूत्पन्नापवर्गित्वपरीक्षाप्रकरणम् २५३ कालान्तरावस्थाने तु बुद्धेर्दृश्यव्यवधानेऽपि प्रत्यक्षमवतिष्ठेतेति । स्मृतिश्चा- लिङ्गं बुद्धयवस्थाने; संस्कारस्य बुद्धिजन्यस्य स्मृतिहेतुत्वात् । यश्च मन्येत—अवतिष्ठते बुद्धिः, दृष्टा हि बुद्धिविषये स्मृतिः, सा च बुद्धाव- नित्यायां कारणाभावान्न स्यादिति ? तदियमलिङ्गम् । कस्मात् ? बुद्धिजो हि संस्कारो गुणान्तरं स्मृतिहेतुः, न बुद्धिरिति । हेत्वभावादयुक्तमिति चेत् ? बुद्धयवस्थानात् प्रत्यक्षत्वे स्मृत्यभावः । यावदवतिष्ठते बुद्धिस्तावदसौ बोद्धव्यार्थः प्रत्यक्षः, प्रत्यक्षे च स्मृतिरनु- पपन्नेति ॥ ४२ ॥ अव्यक्तग्रहणमनवस्थाstatitv... अव्यक्तग्रहणमनवस्थायित्वाद्विद्युत्सम्पाते रूपाव्यक्तग्रहणवत् ॥ ४३ ॥ यद्युत्पन्नापवर्गिणी बुद्धिः; प्राप्तमव्यक्तं बोद्धव्यस्य ग्रहणम्, यथा विद्यु- त्सम्पाते वैद्युतस्य प्रकाशस्यानवस्थानादव्यक्तं रूपग्रहणमिति । व्यक्तं तु द्रव्याणां ग्रहणम्, तस्मादयुक्तमेतदिति ? ॥ ४३ ॥ से घट के अव्यवधान में उत्पन्न होती रहती है । व्यवधान में प्रत्यक्ष भी उत्पन्न नहीं होता । अन्यथा घट की तरह उसको कालान्तरावस्थायी मानने पर बुद्धि का दृश्यव्यव- धान होने पर भी प्रत्यक्ष होना चाहिए । आज देखे हुये घट को दूसरे दिन स्मरण कर लेते हैं—यह स्मृति भी बुद्धि की स्थायिता सिद्ध नहीं कर सकती; क्योंकि स्मृति में बुद्धिजन्य संस्कार हेतु है; न कि साक्षात् बुद्धि । जो यह मानता है कि—'बुद्धि स्थिर है, क्योंकि उसके विषय में स्मृति होती है, यदि बुद्धि अनित्य होती तो कारण न रहने से स्मृतिरूप कार्य कैसे होगा ?' यह मत अहेतुक है; क्योंकि बुद्धिजन्य संस्कार ही स्मृतिहेतु है वह गुणान्तर है; न कि साक्षात् बुद्धि । आप की भी बात हेतु के होने से अयुक्त ही है ? यह नहीं कह सकते; क्योंकि बुद्धि नित्य होने से बराबर प्रत्यक्ष रहेगी, फिर उसकी स्मृति कहाँ बनेगी ! कारण, जब तक बुद्धि रहेगी तब तक वह बोद्धव्यार्थ प्रत्यक्ष रहेगा और प्रत्यक्ष के रहते स्मृति कैसे उत्पन्न होगी ! ॥ ४२ ॥ यदि रूपज्ञान अनवस्थायी होगा तो वह, विद्युत्संपात में क्षणिक अव्यक्त रूपज्ञान की तरह, अव्यक्त ही गृहीत होगा ? ॥ ४३ ॥ यदि उत्पत्तिविनाशिनी बुद्धि है तो संयुक्त बोद्धव्य विषय का ज्ञान भी अव्यक्त ही होगा, जैसे विद्युत्संपात में वैद्युत प्रकाश के अस्थिर होने से रूप का अव्यक्त ज्ञान होता है, जब कि द्रव्यों का ज्ञान व्यक्त होता है । अतः ज्ञान का कालान्तरानवस्थायित्व पक्ष अयुक्त ही है ? ॥ ४३ ॥

हेतूपादानात् प्रतिषेद्धव्याभ्यनुज्ञा ॥ ४४ ॥

२५४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० हेतूपादानात् प्रतिषेद्धव्याभ्यनुज्ञा ॥ ४४ ॥ 'उत्पन्नापवर्गिणी बुद्धिः' इति प्रतिषेद्धव्यम्, तदेवाभ्यनुज्ञायते-'विद्युत्सम्पाते रूपाव्यक्तग्रहणवत्' इति । यत्राव्यक्तग्रहणं तत्रोत्पन्नापवर्गिणी बुद्धिरिति । ग्रहणे हेतुविकल्पाद् ग्रहणविकल्पः, न बुद्धिविकल्पात् । यदिदं क्वचिदव्यक्तं क्वचिद्व्यक्तं ग्रहणमयं विकल्पः, ग्रहणहेतुविकल्पात् । यत्रानवस्थितो ग्रहणहेतुः तत्राव्यक्तं ग्रहणम्, यत्रावस्थितस्तत्र व्यक्तम्, न तु बुद्धे- रवस्थानानवस्थानाभ्यामिति । कस्मात् ? अर्थग्रहणं हि बुद्धिः, यत्र तदर्थग्रहण- मव्यक्तं व्यक्तं वा बुद्धिः सेति । विशेषाग्रहणे च सामान्यग्रहणमात्रमव्यक्तग्रह- णम्, तत्र विषयान्तरे बुद्धयन्तरानुत्पत्तिः, निमित्ताभावात् । यत्र समानधर्म- युक्तश्च धर्मी गृह्यते विशेषधर्मयुक्तश्च, तद्व्यक्तं ग्रहणम् । यत्र तु विशेषेष्वगृह्य- माणे सामान्यग्रहणमात्रम्, तदव्यक्तं ग्रहणम् । समानधर्मयोगाच्च विशिष्टधर्म- योगो विषयान्तरम्, तत्र यत्तु ग्रहणं न भवति तद्ग्रहणनिमित्ताभावाद्, न बुद्धेर- नवस्थानादिति । यथाविषयं च ग्रहणं व्यक्तमेव । प्रत्यर्थनियतत्वाच्च बुद्धीनाम्-सामान्य- विषयं च ग्रहणं स्वविषयं प्रति व्यक्तम्, विशेषविषयं च ग्रहणं स्वविषयं प्रति हेतूपादान द्वारा प्रतिषेध्य की स्वीकृति देने से ॥ ४४ ॥ यहाँ 'बुद्धि उत्पाद-विनाशिनी है'—यह प्रतिषेध्य है, उसीको आप 'विद्युत्सम्पात में रूप के अव्यक्त ज्ञान की तरह' ऐसा उदाहरण देकर स्वीकृत कर रहे हैं ! जहाँ अव्यक्त ज्ञान होगा वहाँ बुद्धि के उत्पाद-विनाश मानने ही पड़ेंगे । ज्ञान के हेतुविकल्प से ज्ञानविकल्प है, न कि ज्ञानविकल्प से । यह जो कहीं अव्यक्त तथा कहीं व्यक्त ज्ञान होता है, वहाँ ज्ञानसम्बन्धी हेतुविकल्प कारण है। जहाँ ज्ञानहेतु कारण अस्थिर है, वहाँ अव्यक्त ज्ञान होगा, जहाँ ज्ञानहेतु कारण स्थिर है, वहाँ व्यक्त ज्ञान होगा । ज्ञान की स्थिति से कोई मतलब नहीं; क्योंकि अर्थ-ज्ञान ही बुद्धि है । अर्थ का व्यक्त या अव्यक्त ज्ञान हो वह सब 'बुद्धि' है । विशेष ज्ञान न होने पर सामान्य ज्ञानमात्र को 'अव्यक्त ज्ञान' कहते हैं । वहाँ निमित्त कारण न होने से विषयान्तरं की बुद्धि की उत्पत्ति नहीं होती । जहाँ तुल्यधर्मा तथा विशेषधर्मा धर्मी गृहीत होता है, वह 'व्यक्त-ज्ञान' तथा जहाँ विशेष के अगृहीत होने पर सामान्य ज्ञानमात्र होता है वह 'अव्यक्त ज्ञान' कहलाता है । समानधर्म से युक्त होते हुए विशेष धर्म का सम्बन्ध होना 'विषयान्तर' कहलाता है । वहाँ जो ज्ञान नहीं होता वह ज्ञानहेतु के न होने से नहीं हो पाता, न कि बुद्धि के अनवस्थान से । जिसका विषय जैसा है उसका वैसा ही ज्ञान 'व्यक्त ज्ञान' कहलाता है । प्रत्येक ज्ञान के अपने अपने अर्थ में नियत होने से सामान्यविषयक ज्ञान अपने विषय के प्रति

पादित कर चुके हैं ॥ ४४ ॥

४५. सू० ] बुद्धेरुत्पन्नापवर्गित्वपरीक्षाप्रकरणम् २५५ व्यक्तम् । प्रत्यर्थनियता हि बुद्धयः, तदिदमव्यक्तग्रहणं देशितं क्व विषये बुद्धय- नवस्थानकारितं स्यादिति ! धर्मिणस्तु धर्मभेदे बुद्धिनानात्वस्य भावाभावाभ्यां तदुपपत्तिः । धर्मिणः खल्वर्थस्य समानाश्च धर्माः, विशिष्टाश्च; तेषु प्रत्यर्थनियता नाना- बुद्धयः । ता उभय्यो यदि धर्मिणि वर्तन्ते तदा व्यक्तं ग्रहणं धर्मिणमभिप्रेत्य । यदा तु सामान्यग्रहणमात्रं तदाऽव्यक्तं ग्रहणमिति । एवं धर्मिणमभिप्रेत्य व्यक्ता- व्यक्तयोर्ग्रहणयोरुपपत्तिरिति । न चेदमव्यक्तं ग्रहणं बुद्धेर्बोद्धव्यस्य वाऽनवस्थायित्वादुपपद्यत इति ॥ ४४ ॥ इदं हि न— प्रदीपाचिःसन्तत्यभिव्यक्तग्रहणवत्तद्ग्रहणम् ॥ ४५ ॥ अनवस्थायित्वेऽपि बुद्धेस्तेषां द्रव्याणां ग्रहणं व्यक्तं प्रतिपत्तव्यम् । कथम् ? प्रदीपाचिःसन्तत्यभिव्यक्तग्रहणवत् । प्रदीपाचिषां सन्तत्या वर्तमानानां ग्रहणा- 'व्यक्त' है, इसी तरह विशेषविषयक ज्ञान अपने प्रति 'व्यक्त' है बुद्धियाँ प्रत्येक विषय- ज्ञान में नियत हैं । तो बुद्धि के अनवस्थान के कारण यह अव्यक्त ज्ञान प्रख्यात होता हुआ किस विषय में होगा ! धर्मी में धर्मभेद होने से बुद्धि-नानात्व के होने या न होने से व्यक्त तथा अव्यक्त की उपपत्ति होती है । धर्मी अर्थ के सामान्य तथा विशेष—दोनों ही धर्म होते हैं, उनमें बुद्धियाँ प्रत्यर्थ- नियत होने से अनेकविध हैं। यदि धर्मिविषयक वे दोनों प्रकार की बुद्धि रहती हैं तो धर्मी के अभिप्राय से व्यक्त ज्ञान होता है, तथा जब सामान्य ज्ञानमात्र होता है उसे अव्यक्त ज्ञान कहते हैं । इस प्रकार धर्मी को लेकर व्यक्ताव्यक्त ज्ञान का उत्पादन हो सकता है, उससे ज्ञान की अवस्थितता या अनवस्थितता सिद्ध नहीं होती । एक बात और, यह अव्यक्त ज्ञान बुद्धि या बोद्धव्य विषय की अनवस्थायिता के कारण नहीं, अपितु ज्ञान के प्रत्यर्थनियतत्व के कारण होता है; जो कि हम अभी प्रति- पादित कर चुके हैं ॥ ४४ ॥ पूर्वपक्षी के मत से बुद्धचनवस्थायित्व अधर्मिता अहेतु है—ऐसा मानना उचित नहीं; क्योंकि— प्रदीप की प्रभासन्तति द्वारा अभिव्यक्त ज्ञान की तरह उस द्रव्य का व्यक्त ज्ञान होता है ॥ ४५ ॥ बुद्धि को उत्पादविनाशी मानने पर भी द्रव्यों का ज्ञान व्यक्त मानना चाहिये । कैसे ? प्रदीप की किरण सन्तानों से अभिव्यक्त ज्ञान की तरह । दीपक की किरणसन्तति का ज्ञान तथा ज्ञेय विषय—दोनों ही अनवस्थायी है; उसी तरह बुद्धियों के प्रत्यर्थ- CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

२५६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० नवस्थानं ग्राह्यानवस्थानं च, प्रत्यर्थनियतत्वाद् बुद्धीनाम्, यावन्ति प्रदीपार्चींषि तावत्यो बुद्धय इति । दृश्यते चात्र व्यक्तं प्रदीपार्चिषां ग्रहणमिति ॥ ४५ ॥ बुद्धेः शरीरगुणव्यतिरेकपरीक्षाकरणम् [ ४६-५५ ] चेतना शरीरगुणः; सति शरीरे भावात्, असति चाभावादिति ?— द्रव्ये स्वगुणपरगुणोपलब्धेः संशयः ॥ ४६ ॥ सांशयिकः सति भावः। स्वगुणोऽप्सु द्रवत्वमुपलभ्यते, परगुणश्चोष्णता, तेनायं संशयः—किं शरीरगुणश्चेतना शरीरे गृह्यते, अथ द्रव्यान्तरगुण इति ? ॥ ४६ ॥ न शरीरगुणश्चेतना । कस्मात् ? यावच्छरीरभावित्वाद्रूपादीनाम् ॥ ४७ ॥ न रूपादिहीनं शरीरं गृह्यते, चेतनाहीनं तु गृह्यते; यथा—उष्णताहीना आपः, तस्मान्न शरीरगुणश्चेतनेति । संस्कारवदिति चेद् ? न; करणानुच्छेदात् । यथाविधे द्रव्ये संस्कारः, तथाविध एवोपरमो न; तत्र कारणोच्छेदादत्यन्तं नियत होने से जितनी दीपक की किरणें होगी उतनी ही बुद्धियाँ होंगी । प्रदीप की किरणें यद्यपि अस्थिर हैं फिर भी उन से होनेवाला ज्ञान व्यक्त ही गृहीत होता है । अतः 'ज्ञान की अनवस्थायिता से अव्यक्त ज्ञान होता है'—ऐसा आप नहीं कह सकते ॥ ४५ ॥ चेतना शरीर का गुण है; क्योंकि वह शरीर के रहने पर रहती है, न रहने पर नहीं रहती ? द्रव्य में स्वगुण तथा परगुण—दोनों को उपलब्धि से यहां संशय है ॥ ४६ ॥ 'आश्रय के होने पर उसका गुण गृहीत होता है'—इसीसे चेतन विषय में कोई निश्चयात्मक ज्ञान नहीं हो पाता । जैसे जल में द्रवत्व स्वगुण भी उपलब्ध है, उष्णता पर- गुण ( तैजस ) भी है । अतः यह संशय होता है—क्या शरीर में गृहीत होनेवाली चेतना शरीर का गुण है या किसी द्रव्यान्तर का ॥ ४६ ॥ चेतना शरीरगुण नहीं है; क्योंकि रूपादि शरीरपर्यन्त ही रहते हैं ॥ ४७ ॥ शरीर रूपादिहीन गृहीत नहीं हो पाता, जब कि वह चेतनाहीन गृहीत होता देखा जाता है, जैसे उष्णताहीन जल । अतः चेतना शरीरगुण नहीं है । जैसे संस्कार शरीरगुण है, परन्तु वह शरीरपर्यन्त नहीं रहता, उसी तरह चेतना को भी शरीरगुण मान लें ? नहीं मान सकते; क्योंकि वहां कारण का नाश नहीं होने से उसका नाश नहीं होता । द्रव्य की जिस स्थिति में संस्कार होता है उस स्थिति में संस्कार का नाश नहीं होता, वहाँ कारणोच्छेद से संस्कारानुपपत्ति आत्यन्तिक होती है । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

४९. सू० ] बुद्धेः शरीरगुणव्यतिरेकपरीक्षाप्रकरणम् २५७

४९. सू० ] बुद्धेः शरीरगुणव्यतिरेकपरीक्षाप्रकरणम् २५७ संस्कारानुपपत्तिर्भवति । यथाविधे शरीरे चेतना गृह्यते, तथाविध एवात्यन्तोपरम- श्चेतनाया गृह्यते । तस्मात् संस्कारवदित्यसमः समाधिः । अथापि शरीरस्थं चेतनोत्पत्तिकारणं स्याद् ? द्रव्यान्तरस्थं वा ? उभयस्थं वा ? तन्न; नियमहेत्वभावात् । शरीरस्थेन कदाचिच्चेतनोत्पद्यते, कदाचिन्नति नियमे हेतुर्नास्तीति । द्रव्यान्तरस्थेन च शरीर एव चेतनोत्पद्यते, न लोष्टादिषु इत्यत्र न नियमहेतुरस्तीति । उभयस्य निमित्तत्वे शरीरसमानजातीयद्रव्ये चेतना नोत्पद्यते, शरीर एव चोत्पद्यते इति नियमे हेतुर्नास्तीति ॥ ४७ ॥ यच्च मन्येत—सति श्यामादिगुणे द्रव्ये श्यामाद्युपरमो दृष्ट, एवं चेतनोपरमः स्यादिति ? न; पाकजगुणान्तरोत्पत्तेः ॥ ४८ ॥ नात्यन्तं रूपोपरमो द्रव्यस्य, श्यामरूपे निवृत्ते पाकजं गुणान्तरं रक्तं रूपमुत्पद्यते, शरीरे तु चेतनामात्रोपरमोऽत्यन्तमिति ॥ ४८ ॥ अथापि— प्रतिद्वन्द्विसिद्धेः पाकजानामप्रतिषेधः ॥ ४९ ॥ परन्तु जिस स्थिति के शरीर में चेतना गृहीत होती है उसी तरह के शरीर में चेतना का नाश भी देखा जाता है । अतः 'संस्कार की तरह' यह समाधान तुल्य नहीं है । यदि यह कहें कि शरीरस्थ या द्रव्यान्तरस्थ या शरीरस्थ द्रव्यान्तरस्थ—दोनों ही उत्पत्तिकारण हैं ? नियमहेतु न होने से यह नहीं कह सकते; क्योंकि 'शरीरस्थ कारण से कभी चेतना उत्पन्न हो, कभी नहीं'—इस नियम में कोई हेतु नहीं बनता । तथा 'द्रव्यान्तरस्थ कारण से शरीर में चेतना उत्पन्न हो, सिकता-पाषाणादि में नहीं'—इस नियम में भी कोई हेतु नहीं बन सकता । अथ च—उभयस्थ मानने पर, 'शरीरसमानजातीय द्रव्य में चेतना उत्पन्न न हो, केवल शरीर में ही उत्पन्न हो'—इस नियम में भी कोई हेतु नहीं बन पाता ॥ ४७ ॥ और जो ऐसा माना जाय कि 'जैसे श्यामादिगुणवान् द्रव्य में, द्रव्य के रहते हुए भी श्यामादि गुण का नाश हो जाता है, उसी तरह शरीर के रहते चेतना का उपरम हो जाता है ?' पाकजगुणान्तरोत्पत्ति के कारण ऐसा नहीं मान सकते ॥ ४८ ॥ द्रव्य का आत्यन्तिक रूपनाश नहीं होता । श्यामरूप के निवृत्त होने पर पाकजन्य गुणान्तर रक्तरूप उत्पन्न होता है, किन्तु शरीर में चेतनामात्र का आत्यन्तिक उपरम हो जाता है । अतः यह दृष्टान्त अनुपपन्न है ॥ ४८ ॥ एक बात और— प्रतिद्वन्द्वी की सिद्धि होने से यहाँ पाकज गुणों वाला प्रतिषेध भी नहीं बनता ॥४९॥ न्या० द० ३८/३७

२५८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० यावत्सु द्रव्येषु पूर्वगुणप्रतिद्वन्द्विसिद्धिस्तावत्सु पाकजोत्पत्तिर्दृश्यते; पूर्वगुणैः सह पाकजानामवस्थानस्याग्रहणात् । न च शरीरे चेतनाप्रतिद्वन्द्विसिद्धौ सहानव- स्थायि गुणान्तरं गृह्यते, येनानुमीयेत तेन चेतनाया विरोधः । तस्मादप्रतिषिद्धा चेतना यावच्छरीरं वर्त्तेत ! न तु वर्त्तते, तस्मान्न शरीरगुणश्चेतना इति ॥ ४९ ॥ २. इतश्च न शरीरगुणश्चेतना; शरीरव्यापित्वात् ॥ ५० ॥ शरीरं शरीरावयवाश्च सर्वे चेतनोत्पत्त्या व्याप्ता इति न क्वचिदनुत्पत्तिश्चे- तनायाः । शरीरवच्छरीरावयवाश्चेतना इति प्राप्तं चेतनबहुत्वम् । तत्र यथा प्रतिशरीरं चेतनबहुत्वं सुखदुःखज्ञानानां व्यवस्था लिङ्गम्, एवमेकशरीरेऽपि स्याद् । न तु भवति, तस्मान्न शरीरगुणश्चेतनेति ॥ ५० ॥ यदुक्तम्—न क्वचिच्छरीरावयवे चेतनाया अनुत्पत्तिरिति ? सा न; केशनखादिष्वनुपलब्धेः ? ॥ ५१ ॥ केशेषु नखादिषु चानुत्पत्तिश्चेतनाया इति अनुपपन्नं शरीरव्यापित्व- मिति ? ॥ ५१ ॥ जितने द्रव्यों में पूर्व गुण विरोधी गुण की उत्पत्ति होती हो उतने ही द्रव्यों में पाकज गुण की उत्पत्ति देखी जाती है; क्योंकि पूर्व गुणों के साथ पाकज गुणों का अवस्थान नहीं देखा जाता । चेतना में ऐसी बात नहीं है; क्योंकि शरीर में चेतनाप्रतिद्वन्द्वी की सिद्धि होती हो—ऐसा गुणान्तर गृहीत नहीं होता, जिस से कि चेतना के विरोध का अनुमान हो । विरोध न होने से चेतना को शरीर के स्थायितापर्यन्त रहना चाहिये, परन्तु रहती नहीं, अतः चेतना शरीरगुण नहीं है ॥ ४९ ॥ २. इस कारण भी चेतना शरीरगुण नहीं है; शरीरव्यापी होने से ॥ ५० ॥ शरीर तथा उसका प्रत्येक अवयव चेतनोत्पत्ति से व्याप्त है, क्योंकि उसमें शरीर के किसी भी भागमें चेतना की अनुत्पत्ति नहीं देखी जाती । तो जब शरीर की तरह शरीरावयव भी चेतन हैं तब आपको अनेक चेतन मानने पड़ेंगे । जैसे प्रत्येक शरीर में चेतन का पार्थक्य सुख-दुःख, ज्ञान आदि का व्यवस्थापक हेतु है, उसी तरह अब एक शरीर में भी चेतनबहुत्व होता हुआ सुखादि का व्यवस्थापक होने लगेगा, होता है नहीं; अतः मानना चाहिये कि चेतना शरीरगुण नहीं है ॥ ५० ॥ शंका—यह जो कहा था कि 'किसी भी शरीरावयव में चेतना का अनुत्पाद नहीं है' ? यह भी नहीं कह सकते; क्योंकि केशनखादि में चेतना उपलब्ध नहीं होती ? ॥ ५१ ॥ केश तथा नखादि में चेतना उपलब्ध नहीं होती, अतः चेतना का शरीरव्यापित्व सिद्ध नहीं होगा ॥ ५१ ॥

५५. सू० ] बुद्धेः शरीरगुणव्यतिरेकपरीक्षाप्रकरणम् २५९

५५. सू० ] बुद्धेः शरीरगुणव्यतिरेकपरीक्षाप्रकरणम् २५९ त्वक्पर्यन्तत्वाच्छरीरस्य केशनखादिष्वप्रसङ्गः ॥ ५२ ॥ इन्द्रियाश्रयत्वं शरीरलक्षणम् । त्वक्पर्यन्तं जीवमनःसुखदुःखसंवित्त्यायतन- भूतं शरीरम्, तस्मान्न केशादिषु चेतनोत्पद्यते । अर्थकारितस्तु शरीरोपनिबन्धः केशादीनामिति ॥ ५२ ॥ ३. इतश्च न शरीरगुणश्चेतना; शरीरगुणवैधर्म्यात् ॥ ५३ ॥ द्विविधः शरीरगुणः—अप्रत्यक्षश्च गुरुत्वम्, इन्द्रियग्राह्यश्च रूपादिः। विधान्तरं तु चेतना—नाप्रत्यक्षा संवेद्यत्वात्, नेन्द्रियग्राह्या मनोविषयत्वात्। तस्माद् द्रव्या- न्तरगुण इति ॥ ५३ ॥ न; रूपादीनामितरेतरधर्म्यात् ? ॥ ५४ ॥ यथेतरेतरविधर्माणो रूपादयो न शरीरगुणत्वं जहति, एवं रूपादिद्वैधर्म्या- च्चेतना शरीरगुणत्वं न हास्यतीति ? ॥ ५४ ॥ ऐन्द्रियकत्वाद् रूपादीनामप्रतिषेधः ॥ ५५ ॥ केश-नखादि में चेतना क्यों नहीं उपलब्ध होती ? शरीर के त्वक्पर्यन्त माना जाने से केश-नखादि में चेतना नहीं बनती ॥ ५२ ॥ शरीर इन्द्रियाधिष्ठान है। यह शरीर जीव, मन, सुख-दुःख संवित्ति का अधिष्ठान- भूत है, उक्त संवित्ति त्वक्पर्यन्त होती हैं, अतः उतने को ही शरीर माना जाता है, केश नखादि को नहीं । शरीरसंयुक्त होने से केशादि को शरीर कह देते हैं, वस्तुतः वे शरीरा- वयव नहीं हैं ॥ ५२ ॥ ३. इस कारण भी चेतना शरीरगुण नहीं है; क्योंकि ( चेतना ) शरीरगुणों से विलक्षण है ॥ ५३ ॥ शरीरगुण दो प्रकार के हैं—कोई अप्रत्यक्ष अनुमेय हैं, जैसे—गुरुत्वादि; कोई प्रत्यक्ष इन्द्रियग्राह्य हैं, जैसे—रूपादि। चेतना इन दोनों ही प्रकारों से विलक्षण है। वह संवेद्य होने से भी अप्रत्यक्ष नहीं होती, और मनोविषय होने से इन्द्रियग्राह्य नहीं है। अतः चेतना शरीरगुण नहीं, अपितु किसी अन्य द्रव्य का गुण है ॥ ५३ ॥ शरीरगुणों से वैलक्षण्यमात्र चेतना का शरीरावृत्तित्व सिद्ध नहीं करता; क्योंकि रूपादि गुण भी इतरेतरविलक्षण हैं ? ।।५४।। जैसे एक दूसरे से विलक्षण रूप-स्पर्शादि शरीरगुणत्व से च्युत नहीं होते, उसी तरह रूपादि से विलक्षण होने के कारण ही चेतना शरीर-गुणत्व को कैसे छोड़ेगी ? ।। ५४ ।। रूपादिक के ऐन्द्रियक होने से उनमें शरीराश्रयत्व है ॥ ५५ ॥

२६० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० अप्रत्यक्षत्वाच्चेति । यथेतरेतरविधर्माणो रूपादयो न द्वैविध्यमतिवर्तन्ते, तथा रूपादिदैधर्म्याच्चेतना न द्वैविध्यमतिवर्तेत यदि शरीरगुणः स्यादिति ! अतिवर्तते तु, तस्मान्न शरीरगुण इति । भूतेन्द्रियमनसां ज्ञानप्रतिषेधात् सिद्धे सत्यारम्भो विशेषज्ञापनार्थः । बहुधा परीक्ष्यमाणं तत्त्वं सुनिश्चिततरं भवतीति ॥ ५५ ॥ मनःपरीक्षाप्रकरणम् [ ५६-५९ ] परीक्षिता बुद्धिः, मनसः इदानीं परीक्षाक्रमः । तत् किं प्रतिशरीरमेकम्, अनेकं वा ? इति विचारे— ज्ञानायौगपद्यादेकं मनः ॥ ५६ ॥ अस्ति खलु वै ज्ञानायौगपद्यमेकैकस्येन्द्रियस्य यथाविषयम्, करणस्यैकप्रयत्न- निर्वृत्तौ सामर्थ्यान्न तदेकत्वे मनसो लिङ्गम् । यत्तु खल्विदमिन्द्रियान्तराणां विषयान्तरेषु ज्ञानायौगपद्यमिति तल्लिङ्गम् । कस्मात् ? सम्भवति खलु वै बहुषु मनःस्विन्द्रियनःसंयोगयौगपद्यमिति ज्ञानयौगपद्यं स्यात्, न तु भवति । तस्माद्विषये प्रत्ययपर्यायादेकं मनः ॥ ५६ ॥ अप्रत्यक्ष होने से भी । जैसे रूपादि इतरेतरविधर्मी होते हुए भी मुख्य अंश में समानधर्मा ही हैं, क्योंकि पूर्वोक्त (३. २. ५३) द्वैविध्य (अप्रत्यक्षत्व व बहिरिन्द्रिय- ग्राह्यत्व) को वे अतिक्रान्त नहीं करते । उसी तरह चेतना भी यदि शरीर-गुण होती तो उक्त द्वैविध्य को अतिक्रान्त न करती ! जब कि वह अतिक्रान्त करती है, अतः यह सिद्ध है कि वह शरीरगुण नहीं, अपितु द्रव्यान्तरगुण है । भूत, इन्द्रिय तथा मन में ज्ञान का प्रतिषेध हम पीछे (३. २. ३८) कर आये, यों सिद्ध होने पर भी विशेष ज्ञान के लिये फिर से बात को उठाया गया; क्योंकि अनेक तरह से परीक्षित तत्त्व ही सुनिश्चित हुआ करता है ॥ ५५ ॥ बुद्धि की परीक्षा हो चुकी, अब मन की परीक्षा का उपक्रम कर रहे हैं। वह मन प्रत्येक शरीर में एक है, या अनेक ? —ऐसा विचार (संशय) उपस्थित होने पर, कहते हैं— ज्ञानायौगद्य हेतु से मन एक ही है ॥ ५६ ॥ ज्ञान युगपत् उत्पन्न नहीं होते, अपितु क्रमिक ही होते हैं । प्रत्येक इन्द्रिय स्वस्व- विषयक ज्ञान कराने में नियत है, अर्थात् उस-उस इन्द्रिय का एक काल में स्वस्वविषयक एक ही ज्ञान कराने में सामर्थ्य देखा जाता है—ऐसा एकत्व मन की सिद्धि में हेतु नहीं; बल्कि दूसरी इन्द्रियों के विषयान्तरों का ज्ञानायौगपद्य (एक ही ज्ञान) मन की सिद्धि में हेतु है; क्योंकि अनेक मन मानने पर दूसरी इन्द्रियों के साथ भी मनःसंयोग होने से इन्द्रियान्तरज युगपत् अनेक ज्ञान होने लगेंगे । ऐसा होता है नहीं, अतः उस उस विषय का तत्तदिन्द्रियों द्वारा एक ज्ञान होने से 'मन' सिद्ध हो जाता है ॥ ५६ ॥

५८. सू० ] मनःपरीक्षाप्रकरणम् २६१

५८. सू० ] मनःपरीक्षाप्रकरणम् २६१ न; युगपदनेकक्रियोपलब्धेः ? ॥ ५७ ॥ अयं खल्वध्यापकोऽधीते, व्रजति, कमण्डलुं धारयति, पन्थानं पश्यति, शृणो- त्यरण्यान् शब्दान्, बिभेति, व्याललिङ्गानि बुभुत्सते, स्मरति च गन्तव्यं स्थानी- यमिति क्रमस्याग्रहणाद्युगपदेताः क्रिया इति प्राप्तं मनसो बहुत्वमिति ? ॥५७॥ अलातचक्रदर्शनवत् तदुपलब्धिराशुसञ्चारात् ॥ ५८ ॥ आशुसञ्चारादलातस्य भ्रमतो विद्यमानः क्रमो न गृह्यते, क्रमस्याग्रहणा- दविच्छेदबुद्ध्या चक्रवद् बुद्धिर्भवतीति; तथा बुद्धीनां क्रियाणां चाशुवृत्तित्वाद् विद्यमानः क्रमो न गृह्यते, क्रमस्याग्रहणाद् युगपद् क्रिया भवन्तीति अभिमानो भवति । किं पुनः-क्रमस्याग्रहणाद् युगपद् क्रियाभिमानः ? अथ युगपद्भावादेव युग- पदनेकक्रियोपलब्धिरिति ?—नात्र विशेषप्रतिपत्तेः कारणमुच्यते इति ? उक्तम्— इन्द्रियान्तराणां विषयान्तरेषु पर्यायेण बुद्धयो भवन्तीति । तच्चाप्रत्याख्येयम्; शङ्का— एक साथ अनेक क्रियाएँ उपलब्ध होने के कारण आप ऐसा नहीं कह सकते ? ॥ ५७ ॥ जैसे एक ही अध्यापक पढ़ता भी है, चलता भी है, कमण्डलु उठाता है, रास्ता देखता है, जंगल में होने वाले शब्द सुनता है, उनसे डरता है, सांप के निशान को देखना चाहता है, गन्तव्य स्थान का स्मरण करता है—यों इस अध्यापक की इन क्रियाओं में क्रमिक ग्रहण न होने से ये क्रियाएँ एक साथ ही हुईं—ऐसा मानना पड़ेगा, ऐसी स्थिति में मन में अनेकत्वप्रसङ्ग हुआ कि नहीं ? ॥ ५७ ॥ उत्तर— अलातचक्र की तरह, उन क्रियाओं की युगपदुपलब्धि आशुसंचार से हो जाती है ॥५८॥ अति शीघ्र घूमने से घूमते हुए अलात (जलती लकड़ी) में विद्यमान क्रम जैसे ज्ञात नहीं होता, क्रम के अग्रहण से वहाँ अविच्छिन्नत्व बुद्धि होने लगती है; उसी तरह बुद्धि तथा क्रियाओं में अतिशैघ्य होने से उनमें विद्यमान क्रम ज्ञात नहीं हो पाता । क्रम के अज्ञात रहने से वहाँ युगपत् क्रियाएँ हुईं—ऐसा भ्रम होता है । वस्तुतः ये क्रियायें क्रमिक ही हैं । शङ्का— यहाँ क्रम के अग्रहण से युगपत् क्रिया का भ्रम है ? या क्रियाओं के युगपद् होने से वहाँ क्रियायौगपद्य गृहीत होता है ?—इनमें से हम किस बात को उचित समझें; किसी पक्ष में कोई हेतु दीजिये ? उत्तर—कहा तो कि विषयान्तर में इन्द्रियान्तरों का ज्ञान क्रमिक ही होता है, इसके स्वसिद्ध (प्रत्यात्मवेदनीय) होने से । इस सिद्धान्त का आप खण्डन नहीं कर सकते । एक

२६२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० आत्मप्रत्यक्षत्वात् । अथापि दृष्टश्रुतानर्थान् चिन्तयतः क्रमेण बुद्धयो वर्त्तन्ते, न युगपत्-अनेनानुमातव्यमिति । वर्णपदवाक्यबुद्धीनां तदर्थबुद्धीनां चाशुवृत्ति- त्वात्क्रमस्याग्रहणम् । कथम् ? वाक्यस्थेषु खलु वर्णेषूच्चरत्सु प्रतिवर्णं तावच्छ्रवणं भवति, श्रुतं वर्णमेकमनेकं वा पदभावेन प्रतिसन्धत्ते, प्रतिसन्धाय पदं व्यवस्यति, पदव्यवसायेन स्मृत्या पदार्थं प्रतिपद्यते, पदसमूहप्रतिसन्धानाच्च वाक्यं व्यवस्यति, सम्बद्धांश्च पदार्थान् गृहीत्वा वाक्यार्थं प्रतिपद्यते । न चासां क्रमेण वर्त्तमानानां बुद्धीनामाशुवृत्तित्वात् क्रमो गृह्यते, तदेतदनुमानमन्यत्र बुद्धिक्रिया- यौगपद्याभिमानस्येति । न चास्ति मुक्तसंशया युगपदुत्पत्तिर्बुद्धीनाम्, यया मनसां बहुत्वमेक- शरीरेऽनुमीयेत इति ॥ ५८ ॥ यथोक्तहेतुत्वाच्चाणु ॥ ५९ ॥ अणु मन एकं चेति धर्मसमुच्चयः; ज्ञानायौगपद्यात् । महत्त्वे मनसः सर्वे- न्द्रियसंयोगाद् युगपद्विषयग्रहणं स्यादिति ॥ ५९ ॥ अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् [ ६०-७२ ] मनसः खलु भोः ! सेन्द्रियस्य शरीरे वृत्तिलाभः, नान्यत्र शरीरात् । ज्ञातुश्च बात और-दृष्ट या श्रुत अर्थों को विचारती हुई बुद्धि क्रम से ही प्रवृत्त होती है, एक साथ सर्वत्र नहीं, इससे अनुमान होता है कि ज्ञान क्रमिक होते हैं । वर्ण, पद, तथा वाक्य और उनके अर्थ ज्ञानों के क्रम का ग्रहण उनमें आशुवृत्तित्व होने से नहीं हो पाता । कैसे ? वाक्यस्थ वर्णों के उच्चारण करने पर प्रत्येक वर्ण का श्रवण होता है, सुना गया एक या अनेक वर्ण पदरूप से जोड़ा जाता है, जोड़ कर उसे पदरूप से समझा जाता है। पदरूप से समझकर अर्थ की स्मृति से उस पाद का अर्थ समझा जाता है; इसी तरह पदसमूह को याद कर उन्हें वाक्यरूप में समझा जाता है। पदों के सम्बद्ध रूप में अर्थ को याद कर वाक्यार्थ समझा जाता है। इन सभी क्रियाओं तथा बुद्धियों में, अतिशीघ्रता हो जाने से क्रम गृहीत नहीं हो पाता । वस्तुतः हैं तो ये सब क्रमिक ही। इसी तरह अन्यत्र भी क्रिया के बुद्धिगत यौगपद्य-भ्रम के बारे में समझ लें । वस्तुतः उभयवादिसम्मत ज्ञानों की ऐसी कोई संशयरहित युगपद् उत्पत्ति नहीं है, जिससे एक शरीर में मन का अनेकत्व अनुभूत हो सके ॥ ५८ ॥ यथोक्त (ज्ञानायौगपद्य ) हेतु से मन का अणुत्व भी सिद्ध होता है ॥ ५९ ॥ 'मन अणु है तथा एक है' यह धर्मसमुच्चय भी तभी सिद्ध होता है जब हम ज्ञानायौग- पद्य सिद्धान्त मानते हैं । अन्यथा मन के 'महत्' होने पर इसका एक ही समय में अनेक इन्द्रियों के साथ संयोग होकर अनेक ज्ञान उत्पन्न होने लगेंगे । होते हैं नहीं; अतः सिद्ध है कि मन अणु तथा एक है ॥ ५९ ॥ इन्द्रियसहित मन का शरीर में ही रहना मिलता है, शरीर से अन्यत्र नहीं । ज्ञाता

६०. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २६३

६०. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २६३ पुरुषस्य शरीरायतना बुद्ध्यादयो विषयोपभोगो जिहासितहानमीप्सितावाप्तिश्च, सर्वे च शरीराश्रया व्यवहाराः । तत्र खलु विप्रतिपत्तेः संशयः—किमयं पुरुष- कर्मनिमित्तः शरीरसर्गः ? आहोस्विद् भूतमात्रादकर्मनिमित्त इति ?—श्रूयते खल्वत्र विप्रतिपत्तिरिति । तत्रेदं तत्त्वम्— पूर्वकृतफलानुबन्धात् तदुत्पत्तिः ॥ ६० ॥ पूर्वशरीरे या प्रवृत्तिर्वाग्बुद्धिशरीरारम्भलक्षणा तत्पूर्वकं कर्मोक्तम्, तस्य फलं तज्जनितौ धर्माधर्मौ, तत्फलस्यानुबन्ध आत्मसमवेतस्यावस्थानम्, तेन प्रयुक्तेभ्यो भूतेभ्यस्तस्योत्पत्तिः शरीरस्य, न स्वतन्त्रेभ्य इति । यदधिष्ठानोऽय- मात्मा—'अयमहम्' इति मन्यमानो यत्राभियुक्तो यत्रोपभोगतृष्णया विषयमनुप- लभमानो धर्माधर्मौ संस्करोति तदस्य शरीरम् । तेन संस्कारेण धर्माधर्मलक्षणेन भूतसहितेन पतितेऽस्मिन् शरीरे उत्तरं निष्पद्यते, निष्पन्नस्य चास्य पूर्वशरीर- वत् पुरुषार्थक्रिया, पुरुषस्य च पूर्वशरीरवत् प्रवृत्तिरिति कर्मापेक्षेभ्यो भूतेभ्यः शरीरसर्गे सत्येतदुपपद्यते इति । दृष्टा च पुरुषगुणेन प्रयत्नेन प्रयुक्तेभ्यो भूतेभ्यः पुरुषार्थक्रियासमर्थानां द्रव्याणां रथप्रभृतीनामुत्पत्तिः । तयाऽनुमातव्यम्— पुरुष के बुद्ध्यादि गुण, विषयोपभोग—हेय का त्याग और ईप्सित की प्राप्ति—आदि सभी व्यवहार शरीर का ही आश्रय लिये हुए हैं। यहाँ विप्रतिपत्ति होने पर संशय होता है कि क्या यह शरीर पुरुषकर्मनिमित्तक है ? या विना किसी कर्मनिमित्त से भूतों के सम- वाय से हो जाता है ? यहाँ यह विप्रतिपत्ति सुनायी देती है । यद्यपि वास्तविकता यह है— पूर्वजन्मकृत फलानुबन्ध से शरीर की उत्पत्ति होती है ॥ ६० ॥ पूर्व जन्म में शरीर, वाणी या बुद्धि द्वारा किये गये कार्य पूर्वकृत कर्म कहलाते हैं। उससे उत्पन्न हुए धर्म तथा अधर्म उसके फल हैं। उस फल का अनुबन्ध जीव का आत्मा में रहना है। उस अनुबन्ध से प्रयुक्त भूतों द्वारा ही उस जीव की शरीरोत्पत्ति होती है; न कि स्वतन्त्रतया भूतों से । जिसका सहारा लेकर यह आत्मा 'यह मैं हूँ'—ऐसा मानता हुआ सम्बद्ध हो, विषयोपभोग की कामना से विषयों को चाहता हुआ विषयों की उपलब्धि नहीं करता हुआ धर्म तथा अधर्म का संस्कार करता है, स्थिर बनाये रखता है वह 'शरीर' है । इस शरीर के विनष्ट होने पर भूतसहित धर्माधर्मलक्षणक उस संस्कार से दूसरा शरीर बनता है। बनने पर इस दूसरे शरीर की भी पहले की तरह पुरुषार्थ-क्रियाएँ प्रारम्भ होती हैं। पुरुष ( आत्मा ) की भी पहले की तरह प्रवृत्ति होने लगती है। ये उपर्युक्त सब बातें कर्म की अपेक्षा रखनेवाले भूतों से शरीर-सृष्टि होने से ही उपपन्न हो पाती हैं। लोक में भी पुरुषसम्बन्धी प्रयत्न द्वारा प्रयुक्त भूतों से