न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
१२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायाद- पवर्गः ॥ २ ॥ तत्रात्माद्यपवर्गपर्यन्तं प्रमेये मिथ्याज्ञानमनेकप्रकारकं वर्त्तते । आत्मनि तावत्-नास्तीति । अनात्मनि-आत्मेति । दुःखे-सुखमिति । अनित्ये-नित्यमिति । अत्राणे-त्राणमिति । सभये-निर्भयमिति । जुगुप्सिते-अभिमतमिति । हातव्ये- अप्रतिहातव्यमिति । प्रवृत्तौ-'नास्ति कर्म, नास्ति कर्मफलम्' इति । दोषेषु- 'नायं दोषनिमित्तः संसारः' इति । प्रेत्यभावे-'नास्ति जन्तुर्जीवो वा, सत्त्व आत्मा वा यः प्रेयात्, प्रेत्य च भवेदिति, अनिमित्तं जन्म, अनिमित्तो जन्मोपरम इत्यादि- मान् प्रेत्यभावः, अनन्तश्चेति, नैमित्तिकः सन्नकर्मनिमित्तः प्रेत्यभाव इति, देहे- न्द्रियबुद्धिवेदनासन्तानोच्छेदप्रतिसन्धानाभ्यां निरात्मकः प्रेत्यभावः' इति । अपवर्गे-'भीष्मः खल्वयं सर्वकार्योपरमः, सर्वविप्रयोगेऽपवर्गे बहु भद्रकं लुप्यत इति कथं बुद्धिमान् सर्वसुखोच्छेदमचैतन्यममुपवर्गं रोचयेत्' इति । मिथ्या ज्ञान नष्ट होता है, मिथ्याज्ञान-नाश से दोष नष्ट होते हैं, दोषापाय से प्रवृत्ति नहीं होती, प्रवृत्ति न होने से जन्म नहीं होता, जन्म न होने से दुःख नहीं होता तथा दुःख के न होने से अपवर्ग (स्वतः सिद्ध) हो जाता है ॥ २ ॥ यहाँ आत्मा से अपवर्ग पर्यन्त प्रमेयों में अनेक तरह का मिथ्याज्ञान रहता है, जैसे— आत्मा 'नहीं हैं', ऐसा मिथ्याज्ञान; अनात्म-पदार्थों में 'आत्मा हैं' ऐसा; दुःख में 'सुख' ऐसा; अनित्य ( देहादि ) में 'नित्य' ऐसा; अत्राण ( कलत्र पुत्र गेहादि ) में 'त्राण' ऐसा; सभय ( धन-पुत्र आदि ) में 'निर्भय' ऐसा; जुगुप्सित ( अस्थि, मांस, शोणित, मल, मूत्रादि से युक्त स्वशरीर-परशरीर ) में 'प्रशस्त' ऐसा; हातव्य (जन्म आदि संसार ) में 'अप्रहातव्य' ऐसा; प्रवृत्ति (पुण्य-पापादि अदृष्ट कर्म) में 'कर्म नहीं हैं', 'कर्म स्वर्ग-नर- कादि-फलप्रद नहीं हैं' ऐसा; दोष ( राग, द्वेष, मोह ) में 'यह संसार दोष के कारण नहीं हैं' ऐसा; प्रेत्यभाव (मरकर पुनः जन्म लेना) में 'ऐसा कोई जन्तु (पैदा करनेवाला) या जीव ( पैदा होनेवाला ) नहीं है, तो आत्मा नहीं है जो मरे या मरकर पुनः जन्म ले' ऐसा; 'जन्म में कोई निमित्त ( धर्माधर्मादि ) नहीं है, मोक्ष भी अनिमित्त (तत्त्वज्ञान के बिना ही ) होता है', इसलिये 'यह मरना-जीना आदिमान् और अनन्त हैं', 'यह मरना-जीना स्वभावादिनिमित्तक तो है, पर कर्मनिमित्तक नहीं हैं', यह मरना-जीना, देह, इन्द्रिय, बुद्धि, वेदना ( हर्ष-शोकविषाद ) के उच्छेद, प्रतिसन्धान से रहित ( क्षणिक- विज्ञान-स्वरूप या शून्यरूप ) हैं' ऐसा; मोक्ष के विषय में 'समस्त कार्यों से उपरति निश्चय ही भयानक होगी, सबसे अलग इस अपवर्ग में सभी मनोरञ्जक तथा सुखकर बातें लुप्त हो जायेंगी तो कौन बुद्धिमान् सर्वसुखोच्छेद रूप मोक्ष को चाहेगा'—ऐसा ( मिथ्या ज्ञान होता है ) । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
२. सू० ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् १३ एतस्मान्मिथ्याज्ञानादनुकूलेषु रागः, प्रतिकूलेषु द्वेषः । रागद्वेषाधिकाराच्चाऽसूयेर्ष्यामायालोभादयो दोषा भवन्ति । दोषैः प्रयुक्तः शरीरेण प्रवर्त्तमानो हिंसास्तेयप्रतिषिद्धमैथुनान्य्याचरति, वाचाऽनृतपरुषसूचनाऽ- सम्बद्धानि, मनसा परद्रोहं परद्रव्याभीप्सां नास्तिक्यं चेति । सेयं पापात्मिका प्रवृत्तिरधर्माय । अथ शुभा—शरीरेण दानं परित्राणं परिचरणं च, वाचा सत्यं हितं प्रियं स्वाध्यायं चेति, मनसा दयामस्पृहां श्रद्धां चेति । सेयं धर्माय । अत्र प्रवृत्तिसाधनौ धर्माधर्मौ प्रवृत्तिशब्देनोक्तौ । यथा—अन्नसाधनाः प्राणाः ‘अन्नं वै प्राणिनः प्राणाः’ इति । सेयं प्रवृत्तिः कुत्सितस्याभिपूजितस्य च जन्मनः कारणम् । जन्म पुनः— इस मिथ्याज्ञान से अनुकूल विषय में राग तथा प्रतिकूल विषय में द्वेष होता है । राग द्वेष का विषय बन जाने से असूया ( गुणों में दोषाविष्करण ), ईर्ष्या ( शत्रु की प्रिय वस्तु की हानि की इच्छा ), माया ( दम्भ ), लोभ ( अन्याय से परद्रव्य पाने की इच्छा ) आदि दोष उत्पन्न होते हैं । दोषों के वशीभूत होकर शरीर से चेष्टा करता हुआ हिंसा, स्तेय, प्रतिषिद्ध मैथुन ( परदारागमन ) आदि का आचरण करता है । वाणी से चेष्टा करता हुआ अनृत ( मिथ्या वचन ) परुष ( कठोर = दुःखद वचन ) सूचना ( चुगली करना ) असम्बद्ध ( ऊटपटांग प्रलाप ) आदि का; तथा मनसे चेष्टा करता हुआ परद्रोह ( जिघांसा या अपकार ), परद्रव्य की इच्छा करना, नास्तिक्य ( परलोक नहीं हैं—ऐसी बुद्धि ) का आचरण करता है । यह पापात्मिका प्रवृत्ति अधर्म ( अशुभ ) के लिये होती है । अब शुभ प्रवृत्ति का वर्णन करते हैं—शरीर से चेष्टा करता हुआ वह मन्त्रादिपूर्वक या सामान्यतः दान करता है, परित्राण ( निरीह प्राणियों की रक्षा ), परिचरण ( तीर्था- टन या गुरुसेवा ) करता है । वाणी से चेष्टा करता हुआ सत्य ( यथार्थ ), हित ( उप- कारक ), प्रिय ( प्रीतिकर ) वचन बोलता है । मन से चेष्टा करता हुआ दया ( निःस्वार्थ दुःखप्रहाणेच्छा ), स्वाध्याय ( वेद या पुराण आदि का अध्ययन ) करता है । अस्पृहा ( लोभत्याग ), श्रद्धा ( शास्त्र में दृढ विश्वास ) रखता है । यह शुभ प्रवृत्ति धर्म ( शुभा- दृष्ट ) के लिये होती है । इस सूत्र में प्रवृत्ति के साधन धर्म और अधर्म को ‘प्रवृत्ति’ पद से कह दिया गया है । जैसे—‘अन्नं वै प्राणाः’ इस श्रुति में प्राणों के साधन अन्न को ‘प्राण’ कह दिया गया । यह प्रवृत्ति कुत्सित या प्रशस्त जन्म का कारण होती है। शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि—तीनों के निकाय ( सजातीय कुलों ) से विशिष्ट प्रादुर्भाव को ‘जन्म’ कहते हैं । जन्म होने पर CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० शरीरेन्द्रियबुद्धीनां निकायविशिष्टः प्रादुर्भावः । तस्मिन् सति दुःखम् । तत्पुनः प्रतिकूलवेदनीयम्-बाधना, पीडा, ताप इति । त इमे मिथ्याज्ञानादयो दुःखान्ता धर्मा अविच्छेदेनैव प्रवर्तमानाः-संसार इति । यदा तु तत्त्वज्ञानान्मिथ्याज्ञानमपैति, तदा मिथ्याज्ञानापाये दोषा अपयन्ति, दोषापाये प्रवृत्तिरपैति, प्रवृत्त्यपाये जन्मापैति, जन्मापाये दुःखमपैति, दुःखापाये च आत्यन्तिकोऽपवर्गो निःश्रेयसमिति । तत्त्वज्ञानं तु खलु मिथ्याज्ञानविपर्ययेण व्याख्यातम्। आत्मनि तावत्- अस्तीति, अनात्मनि-अनात्मेति । एवं दुःखे, अनित्ये, अत्राणे, सभये, जुगुप्सिते, हातव्ये च यथाविषयं वेदितव्यम् । प्रवृत्तौ-'अस्ति कर्म अस्ति कर्मफलम्' इति । दोषेषु-'दोषनिमित्तोऽयं संसारः' इति । प्रेत्यभावे खलु-'अस्ति जन्तुर्जीवः, सत्त्वः आत्मा वा यः प्रेत्य भवेदिति, निमित्तवज्जन्म, निमित्तवान् जन्मोपरम इत्यानादिः प्रेत्यभावोऽपवर्गान्त इति, नैमित्तिकः सन् प्रेत्यभावः प्रवृत्तिनिमित्त इति, सात्मकः सन् देहेन्द्रियबुद्धिवेदनासन्तानोच्छेदप्रतिसन्धानाभ्यां प्रवर्त्तते' इति । अपवर्गे-'शान्तः खल्वयं सर्वविप्रयोगः; सर्वोपरमोऽपवर्गः, बहु च कृच्छ्रं घोरं दुःख होता है । वह दुःख प्रतिकूलवेदनीय ( अहित रूप से अनुभवनीय ) होता है । उसे बाधना ( व्यथा ) पीड़ा, ताप भी कहते हैं । ये मिथ्याज्ञान से लेकर दुःखपर्यन्त धर्म अवि- च्छिन्न रूपसे जब प्रवृत्त होते हैं तो इसे ही 'संसार' कहते हैं । और जब तत्त्वज्ञान से मिथ्याज्ञान नष्ट हो जाता है, तब मिथ्याज्ञान के न रहने से दोष नष्ट हो जायेंगे दोषनाश से प्रवृत्ति नहीं होगी, प्रवृत्ति न होने से जन्म नहीं होगा, जन्म न होने से दुःख नहीं होगा तथा दुःख के न होनेपर आत्यन्तिक ( ऐकान्तिक ) अपवर्ग 'निःश्रेयस' ( मोक्ष ) हो जाता है । तत्त्वज्ञान का व्याख्यान मिथ्याज्ञान के व्याख्यान से उलटा किया गया है । जैसे- आत्मा के विषय में 'है' ऐसा, अनात्म पदार्थों में 'अनात्मा' ऐसा । इसी तरह दुःख, अनित्य, .अत्राण, सभय, जुगुप्सित तथा हातव्य के बारे में भी विषय के अनुसार समझना चाहिये । प्रवृत्ति के विषय में-'कर्म हैं', 'कर्मों का फल हैं' ऐसा; दोषों के बारे में 'यह संसार दोषों से उत्पन्न हैं' ऐसा; पुनर्जन्म के बारे में-'है ऐसा जीव या जन्तु सत्त्व या आत्मा, जो मरकर पुनः जन्म ग्रहण करे' ऐसा, 'जन्म की उपरति भी निमित्त कारण- वाली है, अतः यह मरना-जीना प्रवाहरूप से अनादि होते हुए मोक्षपर्यन्त है' ऐसा, 'यह मरना-जीना नैमित्तिक होता हुआ प्रवृत्तिनिमित्तक है' ऐसा; 'सात्मक होता हुआ देह, इन्द्रिय, बुद्धि वेदना की सन्तति ( निरन्तर प्रवाह ) से उच्छेद और प्रतिसन्धान द्वारा प्रवृत्त होता है' ऐसा; अपवर्ग के विषय में-'यह सभी से नाता टूटना बहुत ही शान्त है, सब तरह से छुटकारा पा जाना अपवर्ग है, इससे बहुत ही कठिन और भयानक पाप CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
पापकं लुप्यत इति कथं बुद्धिमान् सर्वदुःखोच्छेदं सर्वदुःखसंविदमपवर्गं न रोचयेदिति । तद्यथा-मधुविषसम्पृक्तान्नमनादेयमिति, एवं सुखं दुःखानुषक्त- मनादेयम्' इति ॥ २ ॥ २. प्रमाणप्रकरणम् [ ३-८ ] त्रिविधा चास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिः—उद्देशः, लक्षणम्, परीक्षा चेति । तत्र नामधेयेन पदार्थमात्रस्याभिधानमुद्देशः । तत्रोद्दिष्टस्य तत्त्वव्यवच्छेदको धर्मो लक्षणम् । लक्षितस्य 'यथालक्षणमुपपद्यते न वा' इति प्रमाणैरवधारणं परीक्षा । तत्रोद्दिष्टस्य प्रविभक्तस्य लक्षणमुच्यते, यथा-प्रमाणानां प्रमेयस्य च । उद्दिष्टस्य लक्षितस्य च विभागवचनम्, यथा छलस्य-'वचनविघातोऽर्थविकल्पोपपत्त्या च्छलम्, तत्त्रिविधम्'-( १. २. ५१-५२ ) इति । अथोद्दिष्टस्य विभागवचनम्— प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि ॥ ३ ॥ अक्षस्याऽक्षस्य प्रतिविषयं वृत्तिः = प्रत्यक्षम् । वृत्तिस्तु-सन्निकर्षः, ज्ञानं वा। यदा सन्निकर्षस्तदा ज्ञानं प्रमितिः, यदा ज्ञानं तदा हानोपादानोपेक्षाबुद्धयः फलम् । विनष्ट हो गये, कौन बुद्धिमान् ऐसे सब दुःखों तथा उनकी अनुभूति से छुटकारा दिलाने- वाले अपवर्ग को न चाहेगा ! जैसे जहर मिला हुआ मीठा भोजन नहीं खाया जाता, वैसे ही दुखानुपक्त सुख भी नहीं चाहा जाता' ॥ २ ॥ उद्देश, लक्षण, परीक्षा—यों तीन प्रकार से इस शास्त्र की प्रवृत्ति होती है। उनमें केवल नाम लेकर पदार्थ का गिनाना 'उद्देश' कहलाता है। उद्दिष्ट ( नाममात्र से गिनाये गये ) का स्वरूपभेदक धर्म 'लक्षण' कहलाता है। लक्षित (स्वरूपभेदक धर्मवान्) का 'यह लक्षणानुसारी है या नहीं'—इसका प्रमाणों से निश्चय करना 'परीक्षा' कहलाती है। यह विभाग पुनः दो प्रकार का है—१. जो उद्दिष्ट तथा प्रविभक्त हैं उनका लक्षण कहा जाता है, जैसे—प्रमाण और प्रमेयों का । २. तथा जो उद्दिष्ट तथा लक्षित हैं उनका विभाग कहा जाता है, जैसे—छल का विभागवचन ( १. २. ५१-५२ )। अब यह उद्दिष्ट का विभागवचन है— प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द-ये चार प्रमाण ( हैं ) ॥ ३ ॥ इन्द्रिय की प्रत्येक विषय को लेकर वृत्ति ही 'प्रत्यक्ष' कहलाती है। संनिकर्ष या प्रमिति ही यहाँ 'वृत्ति' पद का वाच्य है। जब संनिकर्ष होगा तभी ज्ञान होगा, वही प्रमिति है, और तब हान (त्याग), उपादान (ग्रहण) या उपेक्षा बुद्धि रूप फल निष्पन्न होगा ।
१६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० अनुमानम्-मितेन लिङ्गेन लिङ्गिनोऽर्थस्य पश्चान्मानमनुमानम् । उपमानम्-सारूप्यज्ञानम्१, 'यथा गौरेवं गवयः' इति । सारूप्यं२ तु सामान्ययोगः । शब्दः-शब्द्यतेऽनेनार्थ इत्यभिधीयते = ज्ञायते । 'उपलब्धिसाधनानि प्रमाणानि' इति समाख्यानिर्वचनसामर्थ्याद् बोद्धव्यम् । 'प्रमीयतेऽनेन' इति करणार्थाभिधानो हि प्रमाणशब्दः । तद्विशेषसमाख्याया अपि तथैव व्याख्यानम् । किं पुनः प्रमाणानि प्रमेयमभिसम्पप्लवन्ते ? अथ प्रमेयं व्यवतिष्ठन्त इति ? उभयथा दर्शनम्-'अस्त्यात्मा' इत्याप्तोपदेशात् प्रतीयते, तत्रानुमानम्-'इच्छा- द्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्' ( १ १. १० ) इति, प्रत्यक्षम्-युञ्जा- नस्य योगसमाधिजमात्ममनसोः संयोगविशेषादात्मा प्रत्यक्ष इति । अग्निरप्तो- पदेशात् प्रतीयते-'अत्राऽग्निः' इति, प्रत्यासीदता धूमदर्शनेनानुमीयते, प्रत्यासन्नेन अनुमान-व्याप्ति या पक्षधर्मता से प्रमित लिङ्ग ( हेतु ) द्वारा लिङ्गी ( ज्ञाप्य ) अर्थ के पश्चात् ( प्रत्यक्षानन्तर हुए ) मान को 'अनुमान' कहते हैं। उपमान-सादृश्यज्ञान को 'उपमान' कहते हैं। 'जैसी यह गौ है ऐसा ही गवय होता हैं' । सारूप्य से तात्पर्य है सामान्य सादृश्य सम्बन्ध । शब्द-जिस विभक्त्यन्तसमूह से वाक्यार्थबोध होता हो वह 'शब्द' प्रमाण है। प्रमाण उपलब्धि के साधन हैं-यह 'प्रमाण' इस समाख्या ( नाम ) के निर्वचन ( 'प्रमीयतेऽनेन' इस तृतीया समास ) से समझना चाहिए । 'प्रमीयतेऽनेन' (जिसके द्वारा प्रमिति की जाये)-इस व्युत्पत्ति से 'प्रमाण' शब्द करण अर्थ को बतलाता है। तत्तद्विशेष ( प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द ) की समाख्या का भी इसी तरह करणव्युत्पत्ति से व्याख्यान समझना चाहिए । क्या एक एक प्रमेय में कई प्रमाणों का व्यापार होता है ? या एक एक का ही ? १. कई प्रमाण भी देखे जाते हैं। जैसे 'आत्मा हैं' इसमें आप्तोपदेश (शाब्द) प्रमाण है, 'इच्छा द्वेष, सुख दुःख, प्रयत्न, ज्ञान-ये आत्मा के लिंग हैं' (१. १. १०) यह अनुमान प्रमाण भी है, तथा आत्मा में मनोयोगविशेष करनेवाले को योगसमाधिज प्रत्यक्ष भी होता है अतः हम यह मान सकते हैं कि आत्म-मन के सम्बन्धविशेष से आत्मा का प्रत्यक्ष भी होता है। इसी तरह अग्नि के बारे में आप्तादेश (वृद्धोपदेश) से 'यह अग्नि हैं' ऐसा ज्ञान होता है। पर्वत के समीप जानेवाले को धूमदर्शन से अनुमान द्वारा वह्नि- ज्ञान होता है। समीप गये हुए को प्रत्यक्ष भी होता है। २. एक प्रमाण भी देखा जाता १. 'सामीप्यज्ञानम्'-इति पाठ० । २. 'सामीप्यम्'-इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
४. सू० प्रमाणप्रकरणम् १७ च प्रत्यक्षत उपलभ्यते । व्यवस्था पुनः—'अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामः' इति । लौकिकस्य स्वर्गे न लिङ्गदर्शनम्, न प्रत्यक्षम् । स्तनयित्नुशब्दे श्रूयमाणे शब्द- हेतोरनुमानम्; तत्र न प्रत्यक्षम्, नागमः । पाणौ प्रत्यक्षत उपलभ्यमाने नानुमानम्, नागम इति । सा चेयं प्रमितिः प्रत्यक्षपरा । जिज्ञासितमर्थमाप्तोपदेशात् प्रतिपद्यमानो लिङ्गदर्शनेनापि बुभुत्सते, लिङ्गदर्शनानुमितं च प्रत्यक्षतो दिदृक्षते, प्रत्यक्षत१ उपलब्धेऽर्थे जिज्ञासा निवर्त्तते । पूर्वोक्तमुदाहरणम्—'अग्निः' इति । प्रमातुः प्रमातव्येऽर्थे१ प्रमाणानां २सम्भवोऽभिसम्प्लवः, असम्भवो३ व्यवस्थेति ॥ ३ ॥ इति त्रिसूत्रीभाष्यम् ( क ) प्रत्यक्षलक्षणम् अथ विभक्तानां लक्षणमिति । इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् ॥ ४ ॥ है, जैसे—'स्वर्ग चाहनेवाला अग्निहोत्र करे' यह शब्द प्रमाण है, यहाँ लौकिकों को अनु- मान और प्रत्यक्ष से ज्ञान नहीं होता । मेघ की गर्जना सुनने पर ध्वनिहेतुक अनुमान ही होता है, न कि प्रत्यक्ष, या शाब्द । हस्तस्थ आमलक के लिए न अनुमान की जरूरत हैं, न शब्द की । प्रमिति में प्रत्यक्ष प्रधान होता है । जिज्ञासित अर्थ को आप्तोपदेश द्वारा समझकर, हेतुदर्शन से समझने की कोशिश करता हैं, उससे समझकर उसे प्रत्यक्ष देखना चाहता है, प्रत्यक्ष देखकर उपलब्ध अर्थ में ( उसकी ) जिज्ञासा निवृत्त हो जाती है । इसे समझने के लिए पहला ही उदाहरण रखिए—'अग्नि' । प्रमाता के प्रमातव्य अर्थ में अनेक प्रमाणों का साङ्कर्य 'अभिसम्प्लव' कहलाता है, तथा उनके असाङ्कर्य को 'व्यवस्था' कहते हैं ॥ ३ ॥ त्रिसूत्री-भाष्यानुवाद समाप्त प्रमाणों का विभाग दिखा दिया, अब उन विभक्तों में से प्रत्येक का लक्षण कर रहे हैं— इन्द्रिय का अर्थ के साथ सम्बन्ध होने से उत्पन्न ज्ञान प्रत्यक्ष कहलाता है, जो कि अशाब्द हो, व्यभिचारशून्य हो तथा विशेष्यविशेषणभावावगाही हो ॥ ४ ॥ १. क्वचिन्नास्ति । २. 'सङ्करः'—इति पाठ० । ३. 'असङ्करः'—इति पाठ० । न्या० द०CC-३. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० इन्द्रियस्यार्थेन सन्निकर्षादुत्पद्यते यज्ज्ञानं तत् प्रत्यक्षम् । न तर्हीदानीमिदं भवति—'आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रिय- मर्थेन' इति ? नेदं कारणावधारणम्—एतावत्प्रत्यक्षं कारणमिति, किन्तु विशिष्ट- कारणवचनमिति । यत्प्रत्यक्षज्ञानस्य विशिष्टकारणं तदुच्यते; यत्तु समानमनु- मानादिज्ञानस्य, न तन्निवर्त्तत इति । मनसस्तर्हीन्द्रियेण संयोगो वक्तव्यः ? भिद्यमानस्य प्रत्यक्षज्ञानस्य ना- भिद्यत इति समानत्वान्नोक्त इति । यावदर्थं वै नामधेयशब्दास्तैरर्थसम्प्रत्ययः, अर्थसम्प्रत्ययाच्च व्यवहारः तत्रेदमिन्द्रियार्थसन्निकर्षादुत्पन्नमर्थज्ञानम् 'रूपम्' इति वा, 'रसः' इत्येवं वा भवति, रूपरसशब्दाश्च विषयनामधेयम्, तेन व्यपदिश्यते ज्ञानम्—'रूपमिति जानीते, रस इति जानीते'; नामधेय शब्देन व्यपदिश्यमानं सत् शाब्दं प्रसज्यते ? अत आह—अव्यपदेश्यमिति । यदिदमनुपयुक्त शब्दार्थसम्बन्धेऽर्थज्ञानम्, न तद् नामधेय शब्देन व्यपदिश्यते । गृहीतेऽपि च शब्दार्थसम्बन्धेऽस्यार्थस्यायं शब्द इन्द्रिय और अर्थ के सम्बन्ध से उत्पन्न ज्ञान को प्रत्यक्ष मानते हैं । तब यह सिद्धान्त सम्भव नहीं है—'आत्मा मन से संयुक्त होता है, मन इन्द्रिय से, इन्द्रिय अर्थ से' ? ऐसा नहीं; क्योंकि हम सभी कारणों का निश्चय नहीं कर रहे कि इतने प्रत्यक्ष में कारण हैं, अपितु विशिष्ट कारण बता रहे हैं । जो प्रत्यक्ष का विशिष्ट कारण है, वह बता दिया गया है; तथा जो सामान्य कारण हैं, जिनका उपयोग अनुमान-आदि ज्ञान में भी होता है, उनका निषेध नहीं किया गया । विशिष्ट कारण ही जब ग्रहण का प्रयोजक है तो मन इन्द्रिय के संयोग को प्रत्यक्ष में कारण कहना चाहिए ? सूत्रकार ने विभक्त किए जा रहे प्रत्यक्ष-लक्षण में एक व्यावर्तक देकर काम चला दिया है, दूसरे कारण ( इन्द्रिय-मनःसंयोग ) के अनुमान में भी घटित होने से वह प्रत्यक्ष का सामान्य व्यावर्तक नही बन सकता । अतः लक्षण में उसे नहीं कहा गया । शङ्का—अर्थ हमेशा हर जगह नामधेय ( संज्ञा ) से सम्पृक्त रहते हैं, ऐसा कोई अर्थ नहीं है जो नामधेय से पृथक् रहता हो, तथा अर्थज्ञान से ही लोकव्यवहार चलता है । उस ( लोकव्यवहार ) में इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से उत्पन्न 'रूप' ऐसा या 'रस' ऐसा ज्ञान होता है, रूप, रस, शब्द आदि विषय के नाम हैं । इससे 'रूप—ऐसा जानता हैं', 'रस—ऐसा जानता है' इस प्रकार यह अभेदात्मक ज्ञान व्यवहृत होता है, परन्तु नामधेय शब्द से व्यवहृत ज्ञान शाब्दज्ञान ( विषयाभिन्न = सविकल्पक ) प्रमाण से सम्बद्ध होता है ? इसलिये प्रत्यक्षलक्षण में व्यावर्तक लगाते हैं—'अव्यपदेश्य' । अगृहीत शब्दार्थ- सम्बन्ध की दशा में जो अर्थज्ञान होता है वह उसका नामधेय शब्द से व्यपदिष्ट नहीं CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
४. सू० ] प्रमाणप्रकरणम् १९ नामधेयमिति । यदा तु सोऽर्थो गृह्यते, तदा तत् पूर्वस्मादर्थज्ञानान्न विशिष्यते, तत् अर्थविज्ञानं तादृगेव भवति । तस्य त्वर्थज्ञानस्यान्यः समाख्याशब्दो नास्ति, येन प्रतीयमानं व्यवहाराय कल्पेत, न चाप्रतीयमानेन व्यवहारः । तस्माज्ज्ञेय- स्यार्थस्य संज्ञाशब्देनेतिकरणयुक्तेन निर्दिश्यते-'रूपम्' इति ज्ञानम्, 'रसः' इति ज्ञानमिति । तदेवमर्थज्ञानकाले १ स न समाख्याशब्दो व्याप्रियते, व्यवहारकाले तु व्याप्रियते । तस्मादशाब्दमर्थज्ञानमिन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नमिति । ग्रीष्मे मरीचयो भौमेनोष्मणा संसृष्टाः स्पन्दमाना दूरस्थस्य चक्षुषा सन्निकृष्यन्ते, तत्रेन्द्रियार्थसन्निकर्षाद् 'उदकम्' इति ज्ञानमुत्पद्यते, तच्च प्रत्यक्षं प्रसज्यते ? इत्यत आह-अव्यभिचारीति । यद् 'अतस्मिंस्तत्' इति, तद् व्यभिचारि; यत्तु 'तस्मिंस्तत्' इति, तदव्यभिचारि प्रत्यक्षमिति । दूराच्चक्षुषा ह्ययमर्थं पश्यन्नावधारयति-धूम इति वा, रेणुरिति वा; तदेतदिन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नमनवधारणज्ञानं प्रत्यक्षं प्रसज्यते ? इत्यत आह- होता है। शब्दार्थसम्बन्ध के गृहीत होने पर भी 'इस अर्थ का यह शब्द वाचक हैं' ऐसा व्यवहार होता है। जब यह अर्थ गृहीत होता है तो यह ज्ञान पूर्व ज्ञान (जिसमें अर्थ गृहीत नहीं हुआ था) से भिन्न (विशेष) नहीं, वह अर्थ-विज्ञान भी वैसा ही होता है। उस अर्थ-ज्ञान का कोई दूसरा शब्द बोधक नहीं है, जिससे वह प्रतीत होता हुआ व्यव- हार में आवे । अप्रतीत से व्यवहार होता नहीं । इसलिये ज्ञेय अर्थ का संज्ञाशब्द के साथ 'इति' (= ऐसा ) लगाकर निर्देश किया जाता है— 'रूप ऐसा ज्ञान', 'रस ऐसा ज्ञान' । इस प्रकार यही समझिए कि वह समाख्या (अर्थबोधक) शब्द अर्थज्ञानकाल में व्यापृत नहीं होता, परन्तु व्यवहारकाल में व्यापृत हो पाता है। अतः सिद्धान्ततः यह निष्कर्ष निकला कि शब्दरहित अर्थज्ञान ही इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्न होता है। शङ्का—ग्रीष्म काल में पार्थिव उष्णता से मिलकर सूर्य की किरणें चाकचिक्य पैदा करती हुई दूरदेशस्थ पुरुष के नेत्रों के समीप आ जाती हैं, वहाँ इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से जल की भ्रान्ति प्रतीति होती है, वहाँ भी प्रत्यक्ष का व्यवहार होने लगेगा ? अतः लक्षण में व्यावर्तक शब्द लगाया गया है— 'अव्यभिचारि' । जो 'तदभाववान्' में 'तद्' ऐसा ज्ञान 'व्यभिचारि' कहलाता है, तथा जो 'तद्वान्' में 'तत्' ऐसा ज्ञान 'अव्यभिचारि' कहलाता है, वही प्रत्यक्ष है । (मरीचिका में जलप्रतीति प्रत्यक्ष नहीं, अपितु भ्रमप्रतीतिमात्र है ।) शङ्का—पुरुष दूर से अपनी आँखों से देखता हुआ विचार करता है कि 'यह धूम है, या यह धूलि हैं'; क्या यह इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्न संशय-ज्ञान भी प्रत्यक्ष कहलायेगा ? १. ०भानकाले-पा० ।
२० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० व्यवसायात्मकमिति¹ । न चैतन्मन्तव्यम्—आत्ममनःसन्निकर्षजमेवानवधारण- ज्ञानमिति । चक्षुषा ह्ययमर्थं पश्यन्नावधारयति । यथा चेन्द्रियेणोपलब्धमर्थं मनसोपलभते, एवमिन्द्रियेणानवधारयन्मनसा नावधारयति । यच्चैतदिन्द्रिया- नवधारणपूर्वकं मनसाऽनवधारणं तद्विशेषापेक्षं विमर्शमात्रं संशयः, न पूर्वमिति । सर्वत्र प्रत्यक्षविषये ज्ञातुरिन्द्रियेण व्यवसायः, पश्चान्मनसाऽनुव्यवसायः; उप- हतेन्द्रियाणामनुव्यवसायाभावादिति । आत्मादिषु सुखादिषु च प्रत्यक्षलक्षणं वक्तव्यम् अनिन्द्रियार्थसन्निकर्षजं हि तदिति ? इन्द्रियस्य वै सतो मनस इन्द्रियेभ्यः पृथगुपदेशः, धर्मभेदात् । भौतिकानीन्द्रियाणि नियतविषयाणि, सगुणानां चैषामिन्द्रियभाव इति; मनस्त्वभौतिकं सर्वविषयं च, नास्य सगुणस्येन्द्रियभाव इति । सति चेन्द्रियार्थसन्निकर्षे सन्निधिरसन्निधि चास्य युगपज्ज्ञानानुपत्तिकारणं वक्ष्यामः ( १. १. १६ ) इति । मनसश्चेन्द्रियभावात्तन्न वाच्यं लक्षगान्तरमिति । अतः लक्षण में एक और व्यावर्तक शब्द लगाते हैं—'व्यवसायात्मक' । और यह नहीं मान लेना चाहिये कि संशयज्ञान आत्ममनःसन्निकर्षोत्पन्न ही होता है, आंखों से भी प्रमाता विषय को देखता हुआ वहाँ संशय कर सकता है । प्रमाता जैसे इन्द्रिय से उपलब्ध विषय (अर्थ) को मन से ग्रहण करता है, वैसे इन्द्रिय से अर्थ का अवधारण नहीं होता तो मन से भी अवधारण नहीं होगा । इसलिये यह इन्द्रियकृत-संशयपूर्वक मन का संशय एक विशिष्ट संशय है, जिसे हम विमर्शमात्र कह सकते हैं, आपका सोचा हुआ पहले वाला (साधारण) संशय नहीं । प्रत्यक्ष के बारे में सर्वत्र यही देखा जाता है कि पहले ज्ञाता को इन्द्रिय का व्यवसाय होता है, फिर मन से उसका अनुव्यवसाय (ज्ञानानन्तर निश्चयात्मक ज्ञान)। विकलेन्द्रिय पुरुषों में अनुव्यवसाय उपलब्ध न होने से हमें यही पद्धति माननी पड़ेगी। शङ्का—तब तो आत्मा और सुख आदि के बारे में एक और विशिष्ट प्रत्यक्ष लक्षण करना पड़ेगा; क्योंकि उनका ज्ञान इन्द्रियार्थसन्निकर्षज नहीं, अपितु मनःसन्निकर्षज है ? कहते हैं—मन के इन्द्रिय होते हुए भी उसका इन्द्रियों से पृथक् उपदेश धर्मभेद से किया गया है; क्योंकि अन्य भौतिक इन्द्रियाँ तो नियतविषय हैं, वे अपने-अपने गन्धादि गुण से बाह्य गन्धादि का बोध कराती हैं; पर मन ऐसा नहीं है, वह अभौतिक है, सर्व- विषय है । इसको सगुण मान कर इन्द्रियत्व नहीं कहा गया । इन्द्रियार्थ-सन्निकर्ष होने पर भी युगपत् ज्ञान नहीं होता—इसमें हम मन की सन्निधि या असन्निधि को कारण आगे चल कर (१.१.१६) बतायेंगे । मन को इन्द्रिय मानने से आत्मा तथा सुखादि ज्ञान के लिये लक्ष्णान्तर की आवश्यकता नहीं । अन्य तन्त्रों में मन को भी इन्द्रिय माना गया है, १. तथा च 'कल्पनापोढमभ्रान्तम्' इति बौद्धाचार्यैः सम्मतं लक्षणमेव सूत्रभाष्ययो- रपि सम्मतमिति तदक्षरतात्पर्यम् ।
५. सू० ] प्रमाणप्रकरणम् २१ तन्त्रान्तरसमाचाराच्चैतत् प्रत्येयमिति । 'परमतमप्रतिषिद्धमनुमतम्' इति हि तन्त्रयुक्तिः ॥ ४ ॥ व्याख्यातं प्रत्यक्षम् ॥ ० (ख) अनुमानलक्षणम् अथ तत्पूर्वकं२ त्रिविधमनुमानं पूर्ववच्छेषवत्सामान्यतोदृष्टं च ॥ ५ ॥ 'तत्पूर्वकम्' इत्यनेन लिङ्गलिङ्गिनोः सम्बन्धदर्शनं लिङ्गदर्शनं चाभि- सम्बध्यते । लिङ्गलिङ्गिनोः सम्बद्धयोर्दर्शनेन लिङ्गस्मृतिरभिसम्बध्यते । स्मृत्या लिङ्गदर्शनेन चाप्रत्यक्षोऽर्थोऽनुमीयते । पूर्ववदिति-यत्र कारणेन कार्यमनुमीयते, यथा-मेघोन्नत्या 'भविष्यति वृष्टिः' इति । शेषवत् तत्-यत्र कार्येण कारणमनुमीयते, पूर्वोदकविपरीतमूदकं नद्याः पूर्णत्वं शीघ्रत्वं च दृष्ट्वा स्रोतसोऽनुमीयते-'भूता वृष्टिः' इति । सामान्यतो- उसका इस तन्त्र ( न्यायदर्शन ) में खण्डन नहीं किया गया, अतः सूत्रकार को मन का इन्द्रियत्व अभिप्रेत है—ऐसा मान लेना चाहिये; क्योंकि तन्त्रकारों की एक यह भी युक्ति है कि दूसरे मत का यदि हम खण्डन नहीं करते तो वह हमें मान्य है ॥ ४ ॥ प्रत्यक्ष का व्याख्यान कर दिया गया ॥ प्रत्यक्ष का निरूपण करने के बाद अब अनुमान का निरूपण करते हैं— प्रत्यक्षपूर्वक अनुमितिकरण को 'अनुमान' कहते हैं। वह तीन प्रकार का होता है— १. पूर्ववत्, २. शेषवत् तथा ३. सामान्यतोदृष्ट ॥ ५ ॥ यहाँ 'तत्पूर्वक' इस पद से लिङ्ग (हेतु) लिङ्गी ( हेतुमान् ) का सम्बन्ध (व्याप्ति)- दर्शन तथा लिङ्गदर्शन—इन दोनों का भी परामर्श कर लेना चाहिये । सम्बद्ध हेतु लिङ्ग- स्मृति से सम्बद्ध होता है । स्मृति और लिङ्ग-परामर्श व्यापार से अप्रत्यक्ष अर्थ का अनु- मान होता है । पूर्ववत् उसे कहते हैं जहाँ कारण से कार्य का अनुमान हो, जैसे—बादलों के घिर जाने से 'वर्षा होगी' यह अनुमान होता है । शेषवत् उसे कहते हैं जहाँ कार्य से कारण का अनुमान हो, जैसे नदी में पहले के जल से बढ़ा हुआ जल देखकर या नदी को बढ़ी हुई, वेग से बहती हुई देख कर 'वर्षा हुई है' ऐसा अनुमान होता है । सामान्यतोदृष्ट वह कहलाता है जिसे पहले कहीं देखा हो बाद में कहीं देखे तो उसमें गति का अनुमान १. तन्त्रयुक्तिरियं बौद्धनैयायिकचक्रवर्त्तिदिङ्नागकृते 'प्रमाणसमुच्चये' दृश्यते । २. एतत्पदस्य विस्तृतं व्याख्यानं वार्त्तिकेऽनुसन्धेयम् ।
२२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० दृष्टम्—व्रज्यापूर्वकमन्यत्र दृष्टस्यान्यत्र दर्शनमिति, तथा चाऽऽदित्यस्य; तस्मादस्त्यप्रत्यक्षाप्यादित्यस्य व्रज्येति । अथ वा—पूर्ववदिति, यत्र यथापूर्वं प्रत्यक्षभूतयोरन्यतरदर्शनेनान्यतर- स्याप्रत्यक्षस्यानुमानम्, यथा—धूमेनाऽग्निरिति । शेषवन्नाम—परिशेषः, स च प्रसक्तप्रतिषेधेऽन्यत्राप्रसङ्गाच्छिष्यमाणे सम्प्रत्ययः, यथा—'सदनित्यम्' एवमा- दिना द्रव्यगुणकर्मणामविशेषेण सामान्यविशेषसमवायेभ्यो विभक्तस्य शब्दस्य तस्मिन् द्रव्यगुणकर्मगुणसंशये—'न द्रव्यम्, एकद्रव्यत्वात्; न, कर्म, शब्दान्तर- हेतुत्वात्; यस्तु शिष्यते सोऽयम्' इति शब्दस्य गुणत्वप्रतिपत्तिः । सामान्यतोदृष्टं नाम—यत्राप्रत्यक्षे लिङ्गलिङ्गिनोः सम्बन्धे केनचिदर्थेन लिङ्गस्य सामान्याद- प्रत्यक्षो लिङ्गी गम्यते, यथा—इच्छादिभिरात्मा, 'इच्छादयो गुणाः, गुणाश्च द्रव्यसंस्थानाः, तद्यदेषां स्थानं स आत्मा' इति । विभागवचनादेव त्रिविधमिति सिद्धे त्रिविधवचनं महतो महाविषयस्य न्यायस्य लघीयसा सूत्रेणोपदेशात् परं वाक्यलाघवं मन्यमानस्यान्त्यस्मिन् होता है। जैसे—सूर्य को प्रातः पूर्व में देखा गया और सायंकाल पश्चिम में देखा गया तो अनुमान हुआ 'सूर्य में गति है।' 'अथ वा' से उक्त तीनों पदों का अन्य प्रकार से व्याख्यान का उपक्रम करते हैं— पूर्ववत् उसे कहते हैं जहाँ पहले दोनों का प्रत्यक्ष हो चुका हो परन्तु अब लिङ्ग-लिङ्गी में किसी एक को देख कर दूसरे का अनुमान किया जाय, जैसे—धूम से वह्नि का । शेषवत् उसे कहते हैं जो परिशेष ( बाकी बचा ) रह जाये । वह है सम्भाव्यमानों में से कुछ का प्रतिषेध कर देने पर बाकी बचे हुओं में कहीं भी सम्भाव्यमान न होने से उक्त प्रतिषेध के बाद अवशिष्ट का ज्ञान । जैसे—'शब्द सत् है, अनित्य भी है' ऐसा निश्चय हो जाने के बाद सन्देह होता है कि हम शब्द को क्या मानें—द्रव्य, गुण या कर्म ? तब 'शब्द द्रव्य नहीं हैं एक द्रव्य में समवेत होने से', 'शब्द कर्म भी नहीं है, शब्दान्तर का हेतु होने से' इन हेतुओं द्वारा शब्द में द्रव्यत्व तथा कर्मत्व का प्रतिषेध हो गया, बाकी बच गया गुण, अतः वहाँ अनुमान होता है—'शब्द गुण हैं' । सामान्यतोदृष्ट वह होता हैं जहाँ लिङ्ग और लिङ्गी दोनों के ही सम्बन्ध अप्रत्यक्ष हों, परन्तु किसी अर्थविशेष से लिङ्ग के साधारण्य द्वारा लिङ्गी का ज्ञान हो जाये । जैसे—इच्छादि से आत्मा का 'इच्छादि गुण हैं, गुण द्रव्य में रहते हैं, अतः ये इच्छादि जिसमें रहें वही आत्मा हैं'— यह अनुमान । विभाग कर देने से अनुमान का त्रैविध्य ज्ञात हो ही जाता, फिर सूत्र में 'त्रिविधम्' यह पद क्यों दिया ? अतिगम्भीर इस महान् न्यायशास्त्र का छोटे-छोटे सूत्रों से उपदेश करके ही आचार्य ने लाघव कर दिखाया, फिर इन छोटे-छोटे वाक्यों में भी और लाघव CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
६. सू० ] प्रमाणप्रकरणम् २३ वाक्यलाघवेऽनादरः, 'तथा चाऽयम्¹' इत्यम्भूतेन वाक्यविकल्पेन प्रवृत्तः सिद्धान्ते, छले, शब्दादिषु च बहुलं समाचारः शास्त्र इति । सद्विषयं च प्रत्यक्षम्, सदसद्विषयं चानुमानम् । कस्मात् ? त्रैकाल्यग्रहणात्- त्रिकालयुक्ता अर्था अनुमानेन गृह्यन्ते-'भविष्यति' इत्यनुमीयते, 'भवति' इति च, 'अभूत्' इति च । असच्च खल्वतीत मनागतं चेति ॥ ५ ॥ (ग) उपमानलक्षणम् अथोपमानम् । प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम् ॥ ६ ॥ प्रज्ञातेन सामान्यात् प्रज्ञापनीयस्य प्रज्ञापनमुपमानमिति-'यथा गौरेवं गवयः' इति । किं पुनरत्रोपमानेन क्रियते, यदा खल्वयं गवा समानधर्मं प्रतिपद्यते तदा प्रत्यक्षतस्तमर्थं प्रतिपद्यत इति ? समाख्यासम्बन्धप्रतिपत्तिरुप- मानार्थ इत्याह । 'यथा गौरेवं गवयः' इत्युपमाने प्रयुक्ते गवा समानधर्ममर्थ- करना उन्हें अभीष्ट नहीं था, अतः ऐसे लाघव में उनका आदर नहीं है—यह दिखाने के लिये। आचार्य का ऐसा लाघव के प्रति अनादर इस शास्त्र में 'वैसा ही यह हैं' इत्यादि वाक्य-विकल्पों द्वारा सिद्धान्त, छल, शब्द आदि के वर्णन-प्रसंग में भी बहुत जगह देखा जाता है। प्रत्यक्ष केवल वर्तमानविषयक होता है, परन्तु अनुमान वर्तमानविषयक भी होता है, अतीत व अनागत विषयक भी; क्योंकि अनुमान द्वारा त्रैकालिक ज्ञान होता है। तीनों कालों से युक्त अर्थ अनुमान द्वारा ग्रहण किये जा सकते हैं, जैसे 'होगा' यह अनुमान भी हो सकता है, 'है' यह भी हो सकता है, 'था' यह भी। 'असत्' का अनुमान अतीत या अनागत विषयक ही होता है ॥ ५ ॥ इस प्रकार अनुमान का व्याख्यान कर दिया गया ॥ अब उपमान का निरूपण करते हैं— (जिससे) प्रसिद्ध (पूर्वप्रमित गवादि) के साधर्म्य (सादृश्य) ज्ञान से साध्य (गवयादि- पदवाच्य) की सिद्धि हो वह 'उपमान' प्रमाण कहलाता है ॥ ६ ॥ प्रज्ञात (प्रसिद्ध गो-आदि) के सादृश्यज्ञान से प्रज्ञापनीय (गवय-आदि) का ज्ञान जिस प्रमाण से कराया जाये—उसे 'उपमान' कहते हैं। 'जैसी गौ ऐसा ही गवय होता हैं'। प्रमाता जब गो के सदृश गवय को देखता है तो उसे प्रत्यक्ष प्रमाण से ही वह ज्ञान हो जाता है, फिर उपमान प्रमाण यहाँ क्या नई चीज ला देगा ? वाक्यार्थश्रोता समान- धर्म (सादृश्य) को प्रत्यक्ष कर गवय को देखता ही है। किसी एक शब्द की उसके अर्थ में समाख्या का परिचय होना, यही उपमान का प्रयोजन है—ऐसा सूत्रकार का अभिप्राय १. 'चायमस्य'-इति पा० ।
२४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० मिन्द्रियार्थसन्निकर्षादुपलभमानः 'अस्य गवयशब्दः संज्ञा' इति संज्ञासंज्ञिसम्बन्धं प्रतिपद्यते इति । 'यथा मुद्गस्तथा मुद्गपर्णी', 'यथा माषस्तथा माषपर्णी' इत्युपमाने प्रयुक्ते उपमानात् संज्ञासंज्ञिसम्बन्धं प्रतिपद्यमानस्तामोषधीं भैषज्याया- ऽऽहरति । एवमन्योऽप्युपमानस्य लोके विषयो बुभुत्सितव्य इति ॥ ६ ॥ (घ) शब्दलक्षणम् अथ शब्दः । आप्तोपदेशः शब्दः१ ॥ ७ ॥ आप्तः खलु साक्षात्कृतधर्मा यथादृष्टस्यार्थस्य चिख्यापयिषया प्रयुक्त उपदेष्टा । साक्षात्करणमर्थस्याऽऽप्तिः, तया प्रवर्त्तत इत्याप्तः । ऋष्यार्यम्लेच्छानां समानं लक्षणम् । तथा च सर्वेषां व्यवहाराः प्रवर्त्तन्त इति । एवमेभिः प्रमाणैर्देवमनुष्यतिरश्चां व्यवहाराः प्रकल्पन्ते, नाऽतोऽन्यथेति ॥७॥ है । अर्थात् 'जैसी गौ वैसा गवय होता है' इस उपमान के प्रयुक्त होने पर समानधर्म (सदृश) अर्थ को इन्द्रियार्थसन्निकर्ष (प्रत्यक्ष) से प्राप्त करता हुआ 'इसकी संज्ञा गवय- शब्द है' ऐसा संज्ञा-संज्ञिसम्बन्ध उपमान प्रमाण से जान लेता है । 'जैसा मूंग वैसी मुद्- गपर्णी' 'जैसा उड़द वैसी माषपर्णी' यह उपमान प्रयुक्त होने पर संज्ञासंज्ञिसम्बन्ध को जानता हुआ उस औषध को दवा के लिये ले आता है । इसी तरह लोक में व्यवहृत अन्य उपमानों को भी समझना चाहिये ॥ ६ ॥ उपमान प्रमाण का व्याख्यान समाप्त ॥ अब शब्द का निरूपण करते हैं— आप्त के उपदेश को 'शब्द' प्रमाण कहते हैं ॥ ७ ॥ साक्षात्कृतधर्मा (जिसने सुदृढ़ प्रमाणों द्वारा अर्थ का निश्चय कर लिया हो), यथा- दृष्ट (सही) अर्थ को बतलाने का इच्छा से प्रवृत्त उपदेष्टा पुरुष 'आप्त' कहलाता है । साक्षात्कृत (अर्थ के प्रत्यक्षज्ञान) के पश्चात् प्रवृत्त पुरुष आप्त कहलाता है । 'आप्त' का यह लक्षण ऋषि (त्रिकालज्ञ), आर्य (निष्पाप साधारण जन) तथा म्लेच्छ (डाकू-लुटेरे)— तीनों में समान रूप से घट सकता है । (लुटेरे भी घोर जंगल में किसी धनिक को लूट कर उस पर दया कर उसे नगर का सही मार्ग बतला देते हैं ।) इसलिये इन सभी के ऐसे शब्दव्यवहार प्रवृत्ति में सहायक होते हैं । इस प्रकार इन (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द) प्रमाणों से ही सभी देवता, मनुष्य व पशु-पक्षियों के समग्र (लौकिक-अलौकिक) व्यवहार चलते हैं, उन व्यवहारों का इनसे भिन्न अन्य कोई साधन नहीं है ॥ ७ ॥ १. बौद्धाचार्यास्तु शब्दोपमानयोर्नातिरिक्तं प्रामाण्यमङ्गीकुर्वन्ति ।
१. सू० ] प्रमेयप्रकरणम् २५ स द्विविधो दृष्टादृष्टार्थत्वात् ॥ ८ ॥ यस्येह दृश्यतेऽर्थः स दृष्टार्थः । यस्याऽमुत्र प्रतीयते सोऽदृष्टार्थः । एवमृषि- लौकिकवाक्यानां विभाग इति । किमर्थं पुनरिदमुच्यते ? स न मन्येत—दृष्टार्थ एवाऽऽप्तोपदेशः प्रमाणम्, अर्थस्यावधारणादिति; अदृष्टार्थोऽपि प्रमाणम्, अर्थस्यानुमानादिति ॥ ८ ॥ इति प्रमाणभाष्यम् ॥ ३. प्रमेयप्रकरणम् [ ९-२२ ] ज्ञातुम् योग्यं किं पुनरनेन प्रमाणेनाऽर्थजातं प्रमातव्यमिति ? तदुच्यते— आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु प्रमेयम् ॥ ९ ॥ तत्राऽऽत्मा सर्वस्य द्रष्टा सर्वस्य भोक्ता सर्वज्ञः सर्वानुभावी । तस्य भोगायतनं शरीरम् । भोगसाधनानीन्द्रियाणि । भोक्तव्या इन्द्रियार्थाः । भोगो बुद्धिः । वह (शब्दप्रमाण) दृष्टार्थ तथा अदृष्टार्थ रूप से दो प्रकार का होता है ॥ ७ ॥ आप्त प्रयोक्ता द्वारा जिस शब्द का इसी लोक में अर्थ देख लिया गया हो वह 'दृष्टार्थ' कहलाता है । जिस अर्थ की परलोक में प्रतीति हो वह 'अदृष्टार्थ' है । इन दोनों से लौकिक वाक्यों और ऋषिवाक्यों (वेदमन्त्र) का विभाजन किया गया है । दृष्टार्थ, अदृष्टार्थ—इस विभाग की क्या आवश्यकता है, सामान्यतः एक शब्दप्रमाण ही क्यों न मान लिया जाये ? साधारण पुरुष इतना ही न समझ लें कि जिसका अर्थ इस लोक में प्रत्यक्ष किया जा सके—ऐसा आप्तोपदेश तो प्रमाण है, पर जिस (स्वर्गकामो यजेत-इत्यादि) का अर्थ इस लोक में प्रत्यक्ष न किया जा सके—वह आप्तोपदेश प्रमाण नहीं; वस्तुतः 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि आप्तोपदेश भी प्रमाण ही है क्योंकि उसके सहारे अदृष्ट अर्थ अनुमित होता है ॥ ८ ॥ प्रमाणभाष्यानुवाद समाप्त ॥ इस प्रमाणसमूह से किस अर्थसमूह (प्रमेयसमूह) का ज्ञान करना चाहिये ? इसके उत्तर में कहते हैं— आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, इन्द्रियार्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दुःख, अपवर्ग—ये १२ प्रमेय (प्रमाणों से जानने योग्य) हैं ॥ ९ ॥ इनमें आत्मा सभी सुख-दुःख-साधनों का द्रष्टा है, सभी सुख-दुःखों का भोक्ता है, सभी सुख-दुःख-साधनों और सुख-दुःखों को जानता है, तथा अनुभव करता है । उस आत्मा का भोगाधिष्ठान शरीर है । इन्द्रियाँ भोग के साधन हैं । इन्द्रियार्थ भोगने योग्य होते हैं । भोग बुद्धि (साक्षात्कार करनेवाली) है । सभी अर्थों को एक साथ उपलब्ध CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
२६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० सर्वार्थोपलब्धौ नेन्द्रियाणि प्रभवन्तीति सर्वविषयमन्तःकरणं मनः। शरीरेन्द्रिया- र्थबुद्धिसुखवेदनानां निर्वृत्तिकारणं प्रवृत्तिः, दोषाश्च ; 'नाऽस्येदं शरीरमपूर्व- मनुत्तरं च, पूर्वशरीराणामादिर्नास्ति उत्तरेषामपवर्गोऽन्तः' इति प्रेत्यभावः । ससाधनसुखदुःखोपभोगः फलम् । दुःखमिति नेदमनुकूलवेदनीयस्य सुखस्य प्रतीतेः प्रत्याख्यानम्, किं तर्हि ? जन्मन एवेदं ससुखसाधनस्य दुःखानुषङ्गात्, दुःखेनाविरोधाद्, विविधबाधनायोगाद् 'दुःखम्' इति समाधिभावनमुपदिश्यते । समाहितो भावयति, भावयन्निर्विविद्यते, निर्विण्णस्य वैराग्यम्, विरक्तस्यापवर्ग इति । जन्ममरणप्रबन्धोच्छेदः सर्वदुःखप्रहाणमपवर्ग इति । अस्त्यन्यदपि द्रव्य- गुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाः प्रमेयम्, तद्भेदेन चापरिसङ्ख्येयम् । अस्य तु तत्त्वज्ञानादपवर्गः, मिथ्याज्ञानात् संसार इत्यत एतदुपदिष्टं विशेषेणेति ॥ ९॥ (क) आत्मलक्षणम् तत्राऽऽत्मा तावत्प्रत्यक्षतो न गृह्यते। स किमाप्तोपदेशमात्रादेव प्रतिपद्यत करने में इन्द्रियाँ समर्थ नहीं हो सकतीं, अतः मन को पृथक् प्रमेय मानना पड़ा । वह सभी (बाह्य-आभ्यन्तर-भेदभिन्न) विषयों का ज्ञान-साधन है। शरीर, इन्द्रिय, इन्द्रियार्थ, बुद्धि, सुख तथा हर्ष भय, शोकादि वेदनाओं के सम्पादनकारण को प्रवृत्ति कहते हैं। उपर्युक्तप्रवृत्तिकारण को दोष कहते हैं। 'इसका यह अपूर्व शरीर नहीं हैं, न अनुत्तर शरीर है, पूर्व शरीरों का आदि नहीं है, उत्तर शरीरों का अन्त मोक्ष है'—ऐसा प्रमेय प्रेत्यभाव कहलाता है। साधन (स्रक्चन्दनवनितातथा धूलिताड़न,, निद्रादि) सहित सुख- दुःखों का उपभोग फल कहलाता है। दुःख यह प्रमेय अनुकूलवेदनीय लक्षणवाले सुख का प्रत्याख्यानमात्र नहीं है; किन्तु साधनसहित सुखवाले मुमुक्षु को जन्म से ही दुःखानुषक्त होने से, दुःख से छुटकारा न पाये जाने से, तथा आध्यात्मिकादि विविध बाधनाओं के लगे रहने से 'यह दुःख है' ऐसी समाधि भावना का उपदेश किया गया है। मुमुक्षु समाहितचित्त होकर भावना करता है कि 'सर्वं खल्विदं दुःखम्', भावना करते हुए उसको इस दुःखरूपी संसार से ग्लानि होती है, ग्लानि होते होते वैराग्य हो जाता है, वैराग्य द्वारा वह अपवर्ग ( मोक्ष = जन्ममरणरूपी दुःख से छुटकारा ) पा जाता है। जन्ममरण- प्रवाह का उच्छेद तथा सभी दुःखों का आत्यन्तिक नाश ही 'अपवर्ग' कहलाता है। यों तो (अन्य शास्त्रों में ) प्रमेयों के अन्य भेद भी हैं, जैसे—'द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय'—आदि। उनके अवान्तर भेद से प्रमेय के इतने विभाग हो जाते हैं कि उनकी गणना ही कठिन है। यहाँ सूत्रकार को इतना ही अभीष्ट है कि तत्त्व- ज्ञान से अपवर्ग होता है, और मिथ्याज्ञान से संसार । अतः उन्होंने तदनुकूलतया इस विशेष प्रमेयसमूह का उपदेश कर दिया है ॥ ९ ॥ आत्मा का प्रत्यक्ष से ग्रहण नहीं होता, तो क्या वह केवल आप्तोपदेश (शब्दप्रमाण) CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१०. सू० प्रमेयप्रकरणम् २७ इति ? नेत्युच्यते; अनुमानाच्च प्रतिपत्तव्य इति । कथम् ? इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम् ॥ १० ॥ यज्जातीयस्यार्थस्य सन्निकर्षात् सुखमात्मोपलब्धवान्, तज्जातीयमेवार्थं पश्यन्नुपादातुमिच्छति, सेयमादातुमिच्छा एकस्यानेकार्थदर्शिनो दर्शनप्रति- सन्धानाद्भवन्ती लिङ्गमात्मनः । नियतविषये हि बुद्धिभेदमात्रे न सम्भवति, देहान्तरवदिति । एवमेकस्यानेकार्थदर्शिनो दर्शनप्रतिसन्धानात् दुःखहेतौ द्वेषः । यज्जातीयो- ऽस्यार्थः सुखहेतुः प्रसिद्धस्तज्जातीयमर्थं पश्यन्नादातुम्प्रयतते, सोऽयं प्रयत्न से ही जाना जायेगा ? कहते हैं—नहीं; आप्तोपदेश के बाद अनुमान से भी उस को समझना चाहिये । कैसे ?— इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख दुःख, ज्ञान—ये आत्मा के ज्ञापक लिङ्ग हैं ॥ १० ॥ प्रमाता जिस जातीय अर्थ-सन्निकर्ष से सुख प्राप्त करता है, वैसे ही जातीय अर्थ को पुनः देखकर उसे ग्रहण करने की इच्छा करता है, यह ग्रहण करने की इच्छा ही यतः अनेकार्थद्रष्टा के दर्शनान्तर से एकाश्रयता का सन्धान कराती है अतः किसी एक प्रमेय में दर्शन-प्रतिसन्धान कराती हुई 'आत्मा है'—इसमें हेतु है। [ बात को यों समझें— किसी वस्तु को पुनः पुनः सुखोत्पादक अनुभव करके 'यह वस्तु सुखोत्पादक है, जहाँ यह वस्तु है, वहाँ सुख है'—ऐसा व्याप्तिनिर्धारण करता है। कुछ समय बाद फिर उसी वस्तु को देखकर 'यह पूर्वानुभूत सुखवाली ही वस्तु हैं' ऐसा स्मरण करता है, तब 'यह सुख देगी'—ऐसा निगमन करके उसे ग्रहण करना चाहता है। इस इच्छा से पहले के व्याप्तिज्ञान, स्मृतिज्ञान तथा निगमन का कोई एक प्रतिसन्धाता होना चाहिये जो इच्छा कर सके, अतः इस इच्छा से अनुमान होता है कि ऐसी इच्छा करने वाला कोई आत्मा है। तात्पर्य यह है कि यह जो एक अनुभवितृ, स्मर्त्तृ, अनुमाता तथा एषिता है वही नैयायिकों के मत में 'आत्मा' कहलाता है।] शङ्का—किसी एक ज्ञाता (आत्मा) के न मानने पर भी बुद्ध्यादि के सन्तान (प्रवाह) से भी प्रतिसन्धान-व्यवस्था तो बन ही जायेगी फिर एक अतिरिक्त आत्मा मानने से क्या लाभ ? बुद्धि के प्रतिनियतविषय होने के कारण प्रतिसन्धान-व्यवस्था सम्भव नहीं है, जैसे वर्तमान बुद्ध्यादिकों का देहान्तर में प्रतिसन्धान नहीं हो पाता । इसी तरह एक के ही अनेक अर्थों का साक्षात्कर्ता होने के कारण दर्शनप्रतिसन्धि सम्भव होने से दुःखोत्पादक विषय में द्वेष होता है। इस प्रमाता का जिस तरह का विषय सुखहेतु प्रसिद्ध है, उसी तरह के विषय को ग्रहण करने का प्रयत्न करता है, यह प्रयत्न साक्षात्कर्ता तथा दर्शनप्रतिसन्धिक्कर्ता के एक हुए बिना नहीं हो सकता। बुद्ध्यादिकों की प्रवाह-व्यवस्था उनके नियत होने से
२८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० एकमेनेकार्थदर्शिनं दर्शनप्रतिसन्धातारमन्तरेण न स्यात् । नियतविषये हि बुद्धि- भेदमात्रे न सम्भवति, देहान्तरवदिति । एतेन दुःखहेतौ प्रयत्नो व्याख्यातः । सुखदुःखस्मृत्या चायं तत्साधनमाददानः सुखमुपलभते, दुःखमुपलभते, सुखदुःखे वेदयते । पूर्वोक्त एव हेतुः । बुभुत्समानः खल्वयं विमृशति-किंस्विदिति, विमृशंश्च जानीते—इदमिति, तदिदं ज्ञानं बुभुत्साविमर्शाभ्यामभिन्नकर्तृकं गृह्यमाणमात्मलिङ्गम् । पूर्वोक्त एव हेतुरिति । तत्र देहान्तरवदिति विभज्यते । यथाऽनात्मवादिनो देहान्तरेषु नियत- विषया बुद्धिभेदा न प्रतिसन्धीयन्ते, तथैकदेहविषया अपि न प्रतिसन्धीयेरन्; अविशेषात् । सोऽयमेकसत्त्वस्य समाचारः स्वयं दृष्टस्य स्मरणम्, नान्यदृष्टस्य, नाहष्टस्येति; एवं खलु नानासत्त्वानां समाचारः-अन्यदृष्टमन्यो न स्मरतीति; तदेतदुभयमशक्यमनात्मवादिना व्यवस्थापयितुम् । इत्येवमुपपन्नम्—'अस्त्यात्मा' इति ॥ १० ॥ (ख) शरीरलक्षणम् तस्य भोगाधिष्ठानम्— चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम् ॥ ११ ॥ देहान्तर की तरह हो नहीं सकती । इसी तरह दुःखोत्पादविषयक प्रयत्न का व्याख्यान भी समझना चाहिये । सुख-दुःख-स्मृति से यह प्रमाता उनके साधनों को ग्रहण करता हुआ सुख-दुःख प्राप्त करता है, सुख-दुःख की अनुभूति करता है। इसमें अनुपदोक्त कारण ही समझना चाहिये । जानने की इच्छा करता हुआ विचार करता है कि यह क्या है, विचार करता हुआ जान जाता है कि यह यह है, जब तक इस बुभुत्सा और विमर्श का एक ही कर्ता न होगा तब तक यह ज्ञान नहीं होगा, अतः मानना पड़ेगा कि इन दोनों का एक ही कर्ता 'आत्मा' है। 'देहान्तरवत्' पद की व्याख्या करते हैं । जैसे अनात्मवादी के मत में नियतविषयक बुद्धिभेद का देहान्तर में प्रतिसन्धान नहीं होता, उसी तरह उभयत्र समान स्थिति होने से एकदेह-अनेकदेहविषयक बुद्धिभेद भी प्रतिसन्धि में असमर्थ ही होंगे । जब यह एक प्राणी का स्वभाव है कि वह स्वयम् अनुभूत का ही स्मरण कर सकता है, न कि दूसरे द्वारा अनुभूत या अननुभूत विषय का; तो नाना प्राणियों का भी यही स्वभाव समझना चाहिये कि उनमें दूसरों द्वारा देखे गये का स्मरण दूसरा नहीं कर सकता । ये दोनों ही बातें अनात्मवादी सिद्ध नहीं कर सकते । अतः यह सिद्ध हो गया कि आत्मा है ॥१०॥ उस आत्मा के भोग का आश्रय— चेष्टाश्रय, इन्द्रियाश्रय तथा अर्थाश्रय शरीर है ॥ ११ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१२. सू० ] प्रमेयप्रकरणम् २९ कथं चेष्टाश्रयः ? ईप्सितं जिहासितं वाऽर्थमधिकृत्येप्साजिहासाप्रयुक्तस्य तदुपाय्यानुष्ठानलक्षणा समीहा चेष्टा, सा यत्र वर्तते तच्छरीरम् । कथमिन्द्रियाश्रयः ? यस्यानुग्रहेणानुगृहीतानि उपघाते चोपहतानि स्व- विषयेषु साध्वसाधुषु वर्तन्ते, स एषामाश्रयः, तच्छरीरम् । कथमर्थाश्रयः ? यस्मिन्नायतने इन्द्रियार्थसन्निकर्षादुत्पन्नयोः सुखदुःखयोः प्रतिसंवेदनं प्रवर्तते, स एषामाश्रयः, तच्छरीरमिति ॥ ११ ॥ ( ग ) इन्द्रियलक्षणम् भोगसाधनानि पुनः — घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणीन्द्रियाणि भूतेभ्यः ॥ १२ ॥ जिघ्रत्यनेनेति घ्राणम्, गन्धं गृह्णातीति । रसयत्यनेनेति रसनम्, रसं गृह्णातीति । चष्टेऽनेनेति चक्षुः, रूपं पश्यतीति । स्पृशत्यनेनेति स्पर्शनं त्वक्स्था- नमिन्द्रियं त्वक् तदुपचारः स्थानादिति । शृणोत्यनेनेति श्रोत्रम्, शब्दं गृह्णातीति । एवं समाख्यानिर्वचनसामर्थ्याद् बोध्यम्—स्वविषयग्रहणलक्षणानीन्द्रियाणीति । शरीर चेष्टाश्रय कैसे है ? ईप्सित या जिहासित विषय के लिए उसकी ईप्सा या जिहासा में प्रवृत्त पुरुष का उसके अधिगम के लिये किया गया स्पन्दन ही 'चेष्टा' कह- लाता है, वह जहाँ रहे, वह शरीर है । वह इन्द्रियाश्रय कैसे है ? इन्द्रियाँ जिसके स्वस्थ रहने पर स्वस्थ तथा अस्वस्थ रहने पर अस्वस्थ रहती हुई भले-बुरे कर्मों में प्रवृत्त होती हैं, वह इनका आश्रय है, वही शरीर है । वह अर्थाश्रय कैसे कहलाता है ? जिस अधिष्ठान के रहते इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से उत्पन्न सुख दुःख का प्रतिसंवेदन प्रवृत्त होता है, वह इनका आश्रय (अवच्छेदक) है, वही शरीर है ॥ ११ ॥ अब भोगसाधनों ( इन्द्रियों ) का व्याख्यान किया जा रहा है— १. घ्राण, २. रसन, ३. चक्षु, ४. त्वक्, ५. श्रोत्र—ये भूतप्रकृतिक ( भौतिक ) इन्द्रियाँ हैं ॥ १२ ॥ जिससे सूंघा जाये—वह घ्राणेन्द्रिय है, यह गन्ध का ग्रहण करती है । जिससे स्वाद चखा जाये—वह रसनेन्द्रिय है, यह रस का ग्रहण करती है । जिससे देखा जाये—वह चक्षुरिन्द्रिय है, यह रूप को देखती है । जिससे स्पर्श किया जाये, जिसका स्थान त्वक् है, वह त्वगिन्द्रिय कहलाती है । इस इन्द्रिय का त्वक् स्थान होने से उपचार द्वारा उस स्थान के नाम पर ही इस इन्द्रिय के नाम का व्यवहार किया जाता है। जिससे सुना जाये—वह श्रोत्रे न्द्रिय है, यह शब्द सुनती है । इस प्रकार स्व स्व संज्ञाओं के यौगिक निर्वचन के कारण यह समझना चाहिये कि अपने-अपने विषय का ग्रहण ही इन्द्रियों का इतर-व्यावर्तक लक्षण है । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
३० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. आ० १ आ० भूतेभ्य इति। नानाप्रकृतीनामेषां सतां विषयनियमः, नैकप्रकृतीनाम्। सति च विषयनियमे स्वविषयग्रहणलक्षणत्वं भवतीति ॥ १२ ॥ भूतलक्षणम् कानि पुनरिन्द्रियकारणानि ? पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशमिति भूतानि ॥ १३ ॥ संज्ञाशब्दैः पृथगुपदेशः—विभक्तानां भूतानां सुवचं कार्यं भवि- ष्यतीति ॥ १३ ॥ (घ) अर्थ ( विषय ) लक्षणम् इमे तु खलु— गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणास्तदर्थाः ॥ १४ ॥ पृथिव्यादीनां यथाविनियोगं गुणा इन्द्रियाणां यथाक्रममर्था विषया इति१ ॥ १४ ॥ (ङ) बुद्धिलक्षणम् अचेतनस्य करणस्य बुद्धेर्ज्ञानं वृत्ति चेतनस्याकर्तुरूपलब्धिरिति युक्ति- ‘भूतेभ्यः’ पद में बहुवचन इसलिये है—इन इन्द्रियों को नानाप्रकृतिक मानने पर ही इनमें विषय-नियम बनेगा, एकप्रकृतिक मानने पर नहीं । तथा विषय-नियम होने से ही इनमें स्वविषय-ग्रहण लक्षण घटेगा ॥ १२ ॥ इन इन्द्रियों की प्रकृतियाँ (कारण) क्या हैं ? १. पृथिवी, २. जल, ३. तेज, ४. वायु तथा ५. आकाश—ये ‘भूत’ (इन्द्रियकारण) कहलाते हैं ॥ १३ ॥ विशेष संज्ञाओं से भूतों का पृथक् उपदेश इसलिये किया गया है कि इस प्रकार भेदों से ज्ञात इन भूतों की प्रमिति भली भाँति हो सकेगी ॥ १३ ॥ १. गन्ध, २. रस, ३. रूप, ४. स्पर्श, तथा ५. शब्द—ये पृथिवी आदि भूतों के गुण हैं, उनके विषय (अर्थ) हैं ॥ १४ ॥ पृथिवी आदि पाँचों भूतों का यथासम्बन्ध गुण तथा इन्द्रियों का यथाक्रम विषय समझना चाहिये ॥ १४ ॥ त्रैगुण्य का विकार होने से बुद्धि स्वयम् अचेतन होती हुई भी पुरुषगत चैतन्य की छाया पड़ने के कारण चेतन की तरह आभासित होती है, उस चैतन्याभास से वह स्वयं १. एतद्भाष्यव्याख्याने वार्त्तिकतात्पर्यकारयोरुहापोहैर्विद्यते, तदभिमतव्याख्यानं तु तत्र तत्रैव द्रष्टव्यम् ।
१५ सू० ] प्रमेयप्रकरणम् ३१ विरुद्धमर्थं प्रत्याचक्षाणक इवेदमाह— बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानमित्यनर्थान्तरम् ॥ १५ ॥ नाचेतनस्य करणस्य बुद्धेर्ज्ञानं भवितुमर्हति । तद्धि चेतनं स्यात्, एकश्चायं चेतनो देहेन्द्रियसङ्घातव्यतिरिक्त इति ? प्रमेयलक्षणार्थस्य वाक्य- स्यान्यार्थप्रकाशन'मुपपत्तिसामर्थ्यादिति ॥ १५ ॥ (च) मनोल्क्षणम् स्मृत्यनुमानागमसंशयप्रतिभास्वप्नज्ञानोहाः सुखादिप्रत्यक्षमच्छादयश्च मनसो लिङ्गानि । तेषु सत्स्वयमपि— १ प्रकाशित होती है तथा अचेतन, अकर्ता पुरुष की उपलब्धि प्रकाशित करती है'—ऐसा साङ्ख्यकार का मत है, यहाँ अचेतन बुद्धि का व्यापार ज्ञान तथा वह भी अकर्ता चेतन को उपलब्ध कराना—यह युक्तिविरुद्ध बात है । इसी का खण्डन करते हुए सूत्रकार कहते हैं— बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान—ये अनर्थान्तर (पर्याय) हैं। (इन पर्यायों से जो पदार्थ कहा जाये वह 'बुद्धि' है) ॥१५॥ पुरुषगत चैतन्य के अपरिणामी होने से उसकी छाया बुद्धि में नहीं पड़ सकती, अतः बुद्धि में ही चैतन्य मानना पड़ेगा। यदि ऐसा है तो ज्ञान के प्रति बुद्धि और पुरुष- चेतनद्वय का व्यापार अपेक्षित है, केवल बुद्धि से ज्ञान नहीं होगा; जब कि देहेन्द्रिय- संघात से अतिरिक्त एक ही चेतन माना गया है ? उपपत्तिसामर्थ्य से इस प्रमेयलक्षणार्थक वाक्य (सूत्र) का दूसरे (साङ्ख्यकार) के मत-खण्डन में भी तात्पर्य है। [ पर्याय शब्द कह देने मात्र से लक्षणाभिधान नहीं हुआ—ऐसा कुछ लोग कह सकते हैं, उनको यही उत्तर देना चाहिये कि लोक में दो तरह से पदाभिधान होता है, कुछ पद प्रतिव्यक्ति संकेतित किये जाते हैं, जैसे—पिता अपने पुत्रों का अलग-अलग नामकरण करता है; या अनेक व्यक्ति को सामान्यतः एक नाम दे दिया जाता है, जैसे— गौ आदि । दूसरे प्रकार में अभिधेय के लिए केवल पर्याय से कह देना भी अभिधेय-ज्ञान के लिए पर्याप्त होता है, लक्षणकरण का यह भी प्रयोजन है। प्रकृत में उपलब्धि तथा ज्ञान का अर्थ सर्वप्रसिद्ध है, इसलिये उन्हें बुद्धि का पर्याय कह देने से बुद्धि स्वरूप ज्ञात हो जाता है। इस युक्ति से बुद्धि का लक्षण भी बता दिया गया है ] ॥ १५ ॥ स्मृति, अनुमान, आगम, संशय, प्रतिभा, स्वप्न, ज्ञान, ऊह, सुख-आदि का प्रत्यक्ष, तथा इच्छा-आदि ये मन के लक्षण हैं; इनके साथ-साथ यह भी है कि— १. सांख्यमतनिराकरणरूपम् ।