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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

२३२ पद्मावत । दो० यहू बात तहँ पहुँची, सदा छत्र सुख छाथ । ब्राह्मण एक हारहै ठाढ़ा, कँकन जड़ाऊ हाथ ॥ मयों शाह मन सुनत भिखारी । परदेशी कहँ पूँछ हँकारी ॥ हम पुनि जाना है परदेशा । कौनपन्थै गवनव केहिभेशा ॥ देहलीराज चिन्तमनेँ काढ़ी । यहिजग जैसी दूबकी साढ़ी ॥ सेंतें मिलाय छाँछ के फेरा । मंथ घिवलीन्हमहिउकहँकेरा ॥ यहि देहली कित द्वै द्वै गये । कै कै गर्व खेहँ मिल गये ॥ यहि देहली की रही ढिलाई । साढ़ी काढ ढील जब ताई ॥ रावण लङ्क जार सत्र तापा । रहा न यौवन औ तरुनापा ॥ दो० भीख भिखारी दीजिये, का ब्राह्मण का भाट । अज्ञा भई वोलावहु, धरती धरा ललाटै ॥ राघव चेतन हुत जो निरासा । ततखनेँ वेगेँ वोलावा पासा ॥ शीशेँ नायके दीन्ह अशीशा । चमकत नग कंकन करदीशा ॥ अज्ञा भई सो राघव पाहां । तुइँ मंगनेँ कंकन का वाहां ॥ राघव फेर शीशेँ भुइँ धरा । जुगयुग राज भानु की करा ॥ पद्मिनि सिंहलद्वीप की रानी । रतनसेन चितोरगढ़ आनी ॥ कमलन सैर पूजी तेहि बासा । रूप न पूजी चन्द अकासा ॥ जहां कमल शेशि सूरे न पूजा । केहि सैर देउँ और को दूजा ॥ दो० सो रानी संसार मन, दछना कङ्कन दीन्ह । अप्सरै रूप देखायके, जीव झरोके लीन्ह ॥ सुनि के उतरै शाह मन हँसा । जानहु वीजै चमक परगसा ॥ ४ मेहरबानी १ बोलाना २ राह ३ अन्देशा ४ नरमी ५-८ गरूर ६ धूर ७ जवानी ६ हुक्म १० माथा ११ नाउम्मेद १२ तुरन्त १३ जल्द १४ शिर १५- १७ मांगनेवाला १६ सूर्य १८-२१ बराबरी १६-२२ चाँद २० परीइन्द्र- लोक २३ जवाब २४ विजुली २५ ॥

पद्मावत । २२३ कांच योग जो कंचन१ पावा। मंगन ताहि सुमेरु२ चढ़ावा ॥ नाउँ भिखार जीभ मुख बांची । अबहिंसँभार बातकहु सांची ॥ कहँ अस नारि जगत उपराहीं। जेहिके सरि सूरज शँशि नाहीं ॥ जो पद्मिनि तुइँ मन्दिर मोरे। सातों द्वीप जहां करै जोरे ॥ सप्तद्वीप महँ चुन चुन आनी। सो मोरे सोरहसै रानी ॥ जो उनमहँ देखेसि इक दासी । देख लोन है लोन बिलासी ॥ दो० चहूँखण्ड हौं चकवै, जस रवि तप आकाश । जो पद्मिनि मोरे मंदिर, अप्सर तौ कैलाश ॥ तुम बड़राज छत्रपति भारी। अन ब्राह्मण हौं अहौं भिखारी ॥ चारहुँ खण्ड भीखका बाजाँ। उदय अस्त तुम्ह ऐसो न राजा ॥ धर्मराज औ संतकुल माहां। झूठ जो कहौं जीभ गहि बाहां ॥ कुछ जौ चार सब कुछ उपराहीं। सो यहि चहूँ दीप महँ नाहीं ॥ पद्मिनि अमृत हंस सदूरू१० । सिंहलद्वीप भलाहिं सो मूरू ॥ सातों द्वीप देख हौं आवा। तब राघव चेतन कहवावा ॥ अजहूँ होय न राखौं धोखा । कहौं सो सब नारिन गुणदोखाँ ॥ दो० यहां हस्तिनी सिंहिनी, औ चित्रिनि बनबास । कहौं पद्मिनी पड़ै शिर, भँवर फिरै चहुँपास ॥ खण्ड तैंतीसवां स्त्री वर्णन ॥ पहिले कहौं हस्तिनी नारी। हस्ती की परकीरति१६ सारी ॥ शिर औ पांव सुझै गँय छोटी। उर की खीनं लङ्क की मोटी ॥ कुम्भस्थल गज अमित अमाहीं। गवनै गयन्द ढाल जनु बाहीं ॥ सोना १ नामबड़ाइ २ बराबरी ३ चाँद ४ हाथ ५ चारौंतरफ़ ६ सारी दुनियांका राजा ७ सूर्य ८ पहुँचा ६ लालशेर १० असिल ११ हुक्म १२ ऐब-हुनर १३ कमल १४ हाथी १५ स्वभाव १६ मोटा १७ गर्दन १८ छाती १६ पतली २० कमर २१ नाम हाथी २२ चाल २३ ॥

३२४ पद्मावत । दृष्टि¹ न आवै आपन पीउ । पुरुष पराये ऊपर जीउ ॥ भोजन बहुत बहुत रतिचाऊ² । अच्छवाई³ सो थोर समाऊ ॥ मधु⁴ जस मन्द बसाय पसेऊ । औ विश्वासै⁵ धरै जसदेऊ ॥ डर औ लाज न एको हिये । रहे जो राखै अंकुश⁶ दिये ॥ दो० गर्जगत चलै चहूँदिश, लायजगत कहँ चोखँ । कही हस्तिनी नारि ये, सब हस्तिनि के दोखँ ॥ दूसर कहौं सिंहिनी नारी । करै बहुत बल अल्प अहारी ॥ उरे⁸ अतिसुअै खीनैं¹² अतिलङ्कौ¹³ । गर्व्व¹⁴ भरी मन धरै न शङ्का ॥ बहुत रोषै¹⁵ चाही पिय हना । आगे घालन काहूँ गिना ॥ अलंकारै अपनी वह भावा । देख न सकै शृंगार परावा ॥ सिंह की चाल चलै डरा¹⁷ ढीली । रोंवां बहुत जांघ औ फीली ॥ मोट मांस रुच भोजन तासू । औ मुख आव विपाएँध वासू ॥ दृष्टि तराहीं हेरै आगे । जन मथवाह रहे शिर लागे ॥ दो० सेजवां मिलत सो स्वामी, लावे उर नख बान । यहि गुण सबै सिंहके, वह सिंहन सुलतान ॥ तीसर कहूँ चित्रिनी नारी । महाचतुर रस प्रेम पियारी ॥ रूप स्वरूप शृंगार सवाई । अप्सरै¹⁸ जैसी रही अच्छवाँई¹⁹ ॥ रोषै²⁰ न जानै हसता मुखी । जहँ अस नारिकन्तै²¹ सो सुखी ॥ अपने पुरुषकी जानै पूजा । एक पुरुष कें जान न दूजा ॥ चन्द्रबदने²² रंगकुमुँदिनी²³ गोरी । चाल सुहाय हंस की जोरी ॥ खीर²⁴ खांड़ कुछ अल्पअहारूँ । पान फूल से बहुत पियारूँ ॥ निगाह १ चाह २ सफ़ाई ३ शहद ४ ख्याल ५ हाथी ६ पियार ७ पेव = थोड़ा ६ खुराक १० छाती ११ चौड़ी १२ वारीक १३ कमर १४ गरूर १५ गुस्सा १६ सूरत १७ नज़र १८ इन्द्रलोककी परी १६ सफ़ाई २० गुस्सा २१ खाविन्द २२ मुँह २३ कोकांयेली २४ दूध २५ थोरी खुराक २६ ॥

। पद्मावत । २२५ पद्मिनि चाहे घाट दुइकरां । और सबै वह गुण निरमराँ ॥ दो० चित्रिनि जैस कुमुदैं रँग, और बासना अंग। पद्मिनि बास चन्दन जस, भँवर फिरहिं तेहि संग ॥ चौथे कहौं पद्मिनी नारी। पद्म गन्ध शशि दईसवँारी ॥ पद्मिनि जात पद्म रँग ओई। पदम बास मधुकर सँग होई ॥ नासुठ लांबी नासुठ छोटी। नासुठ पातर नासुठ मोटी ॥ सोरहों करन रंग है बनी। सो सुलतान पद्मिनी गुनी ॥ दीर्घ चारु बार लघु सोई। शुभ्र चार चहुँ खीनी होई ॥ औशशि वदन देख सब मोहा। चाल मरालै चलत गत सोहा ॥ खीर अहार न कर सुकवारा। पान फूल कें रहै अधारा ॥ दो० मोह किरन मम बूरन, औ सोरहों शृँगार। अब यह भांति बरन के, जस बरनै संसार ॥ प्रथमहिं केश दीर्घ शिर सोहैं। औ दीर्घ अँगुरी कर सोहैं ॥ दीर्घ नयन तीख तहँ देखा। दीर्घ ग्रीव कण्ठ त्रयरेखा ॥ पुनि लघु दशनँ होहिं जनु हीरा। औ लघुकुँच उतंग गम्भीरा ॥ लघु ललाटैं दुइज परकासू। औ नाभी लघु चन्दन बासू ॥ नासिकै खीनैं खड्ग की धारा। खीनलंक जनु केहरि हारा ॥ खीन पेट जानहु नहिं आंता। खीन अधरैं बिद्रुमँ रँगराताँ ॥ शुभ्र कपोलैं देख मुख शोभा। शुभ्र नितम्बैं देख मन लोभा ॥ दो० शुभ्र कलाई अति बनी, शुभ्र जंघ गजचौल । ज्यादा १ दोहिस्सा २ पाकसाफ ३ कोकावेली ४ कमल ५ चाँद ६-१२ भँवर ७ बड़े ८-१६-१७ छोटे ६-१६ मोटा १० पतला ११ हंस १३ पहिले १४ चाल १५ हाथ १८ दांत २० छाती २१ माथा २२ नाक २३ पतली २४ तलघार २५ पतली कमर २६ चीता २७ होठ २८ मूंगा २६ लाल ३० मोटा गाल ३१ चूतर ३२ हाथी की चाल ३३ ॥

२२६ पद्मावत। सोरहशृंगार वरन के, करहि देवता लाल ॥ यहिपद्मिनिचितोर जो आनी। कुंदन कार्या द्वादश बानी॥ कुन्दनकनकें ताहिनहिं वासा। बहुसुगन्धजसकमलविकासाँ॥ कुन्दन कनकेंकठोर सोअङ्गा। वह कोमलरँग पुहुपं सुरङ्गा॥ वह लुइ पवन बृक्ष जेहिलागा। सोइमलयगिरि भयोसभाग॥ काह न मूठ भरी वह देही। अस मूरति केहि दई उरेही॥ सबै पठेतरं चित्र के हारीं। वहक रूपकोइलखी न पारीं॥ कया कपूर हाड़ सब मोती। तेहितेअधिकं दीन्हविधिज्योती॥ दो० सूर्य किरण जस निरमलें, तेहिते अधिक शरीर। सौंहेदृष्टि नहिं जाय कर, नयनहिं आवै नीरें॥ शॅशिमुखजबहिंकहैकछुवाता। उठततन्त सूरज जस रताँ॥ दर्शनैदशनसोकिरणीफूटहिं। सबजगजानिफुलझरी छूटहिं॥ जानहुँशॅशिमहँ वीजेंदेखावा। चौंधपख्यो कुछ कहै न आवा॥ कौंधत रहि जस भादों रैनी। श्यामरैनिजतुचलैउड़ेनी॥ जनु बसन्तऋतु कोकिलबोली। सरस सुनाय सारसरै डोली॥ जनु अमृतहै बचन विकासाँ। कमल जोवास वासधनवासा॥ यहि सर शीश जो नाग बेहेरा। जाय शंख वेनी है परा॥ दो० सबै मनोहरै जायमर, जो देखै तस चोरैँ। पहिले सो दुख बरन के, वरनो वहकशृंगार॥ कितहों रहा कालकर काढ़ा। जाय धौरहेरै तर भा ठाढ़ा॥ कित वह आय झरोखेझांकी। नयनकुरंगिनि चितवनबांकी॥ वदन १ खालिस २ सोना ३-५ खिलना ४-५२ फूल ६ चन्दन ७ बनाना ८ दूती ९ बहुत १० पाकसाफ़ ११ निगाह सामने १२ पानी १३ चाँद १४-१७ लाल १५ दांत १६ बिजुली १८ रात १६ जुगुन् २० तीर २१ उम्मेद २३ चाल २४ महल २५ हिरनी २६ ॥

पद्मावत । २२७ बिहँसी शशि तरईं जनुपरीं। कैसो रयनि छूटे फुलझरी ॥ चमक वीजै जस भादौं रैनी। जगत दृष्टि भरही उड़ेनी ॥ काम कटाक्ष दृष्टि विष बसा। नागिन अलकँ पलकमहँ डसा ॥ भौंह धनुष परंत काजल बूड़ी। वह भइ बानुकें हौं भइ ऊँड़ी ॥ मार चली मारतहूँ हँसा। पाछे नाग रहा हौं डसा ॥ दो० काल घाल पीछे रखा, गरुड़ न मन्तर कोय। मोर पीठ वह बैठा, कासों पुकारों रोय ॥ बेनी १२ छोर झोर जो केशा। रैनि होय जगदीपकँ लेशा ॥ शिरहत विषहरैं परी झुइँ बारा। सगरे देश भयो अँधियारा ॥ सकपकाहिं विष भरे पसारे। लहरहिं भर लहकहिं अतिकारे ॥ जानहुँ लोटहिं चढ़े भुअङ्गाँ। वेधी बास मलयगिरि अङ्गा ॥ लरहिं मुरहिं जनु मानहिं केली। नाग चढ़े मालति कै बेली ॥ लहरैं देइ जानहु कालिन्दी। फिर फिर भँवर भये चित बन्दी ॥ चँवर धरत आळी चहुँपासा। भँवर न उड़हिं जो लुब्धे बासा ॥ दो० होय अँधेर घने विवि चमके, जयहिं चीर गहि झांप। केशौ नाग कित देख मैं, सँवरि सँवरि जिय कांप ॥ मांग कनकें जो सेंदुर रेखा। जन बसन्त रातौं जग देखा ॥ गइ पत्रावलि पाटी पारी। और चि चित्रविचित्र सँवारी ॥ भई उरेह पण्डुरैं सब नामा। जनु बकें बिखर रहे घनश्यामां ॥ यमुना मांझ सरस्वती मांगा। दुहुँदिश दिये तरंगने गांगा ॥ चांद १ छोटे नखत २ बिजुली ३-२२ निगाह ४-७ जुगनू ५ तिरछी चितवन ६ बाल ८-२३ पलक ६ तीरअन्दाज़ १० निशाना ११ चोटी १२ रात १३ चिराग़ रोशन १४ सांप १५-१६ चन्दन १७ यमुना १८ दिल फँसाना १६ लपटना २० बादल २१ सोना २४ लाल २५ नाम दाया २६ बहुत अच्छी २७ फूल २८ बगुला २६ बादल सियाह ३० लहर ३१ ॥

२२८ पद्मावत । सेंदुर रेख सो ऊपर राती । बीरबहूंटिन की जस पांती ॥ बेलि देवता भये देख सेंदूरू । पूजी मांग भोर उठ सूरू ॥ भोर सांझ रबि होय जो राताँ । वही देख राताँ भा गाताँ ॥ दो० बेनीकारी पुहुप ते, निकसी यमुना आय । पूजइन्द्र आनन्द सों, सेंदुर शीश चढ़ाय ॥ दुइज ललाट अधिकै मनकरा । शङ्कर देख माथ भुइँ धरा ॥ यहि नित दुइज जगत महँ दीशा । जगत जोहारे देइ अशीशा ॥ शशि जो होयन हिंस रवैर छाजै । होय सो अमावस छिप मन लाजै ॥ तिलक सँवारि जो चन्दन रचे । दुइज माँझ जानहुँ कच वेंचे ॥ शशि पर करवट सारा राहू । नखतहिं अस दीन्ह परदाहू ॥ पारस ज्योति ललाटहिं ओती । दृष्टि जो करै होय तेहि ज्योती ॥ श्री १६ जो रतन मांग बैठारा । जानहु गगन टूट निश तारा ॥ दो० शशि और सूर जो निरमलै, तेहिकी ललाट की रूप । निशि दिन चलहिं न सरवैर पावैं, तपत पहो हि अलूप ॥ भौंहें धनुष श्याम जनु चढ़ा । पनचैं करे मानुष कहँ गढ़ा ॥ चन्द कि मूठ धनुष वहताना । जाकर बीजैं बरनि बियवाना ॥ जासों हेर जाय सो मारी । गिरिवर टरहिं सो भौंहहिं टारी ॥ सेतुबन्ध जे धनुष बिडारा । वहू धनुष भौंहहिं सो हारा ॥ हारा धनुष जो बेधा राहू । और धनुष कोइ गिने न काहू ॥ कित सो धनुष भौंह मैं देखा । लाग बान तित आव न लेखा ॥ लाल १-५-६ कुरबान २ सूर्य ३-४-२२ वदन ७ फूल ८ शिर ६ माथा १० ज्यादा ११ चांद १२-१५-२१ बराबर १३-२५ नामनखत १४ रोशनी १६ पेशानी १७ निगाह १८ टीका १६ आसमान २० साफ़ २३ रात २४ गायब २६ निशाना २७ बिजुली २८ पलक के बाल २६ अर्जुन की कमान ३० ॥

तितबानहिं झांझरभा हियां। जो असमार सो कैसें जिया ॥ दो० सोत सोत तन बेधा, रोम रोम सब देह। नसनसमहँझइसोलँहि, हाड़हाड़भये बेहें ॥ नयन चित्र वै रूप चितेरे। कमलपत्रपर मधुकैर फेरे ॥ समुद्रतरंग उलटहिं जनराँती । डोलहिं औ घूमहिं मदमाती ॥ शरदचन्द महँ खञ्जन जोरी। फिरफिरलरहिं अघोर बहोरी॥ चपलं बिलोल डोल वहलागी। थिर्र न रहहिं चंचल बैरागी॥ निरखें अघाहिं न हत्या हंते। फिरफिर श्रवणहिं लागेमेंते ॥ अंगश्वेते मुखश्यामसो ओहीं। तिरछचलहिंखनसूधनहोहीं॥ सुरै नर गन्ध्रब लार्कै फेराहीं। उलटेचलहिंस्वर्गकहँजाहीं ॥ दो० अस वै नयन चक्र दुइ, भँवर समुद्र उलथाहिं । जनु जिव घालहिं डोले, लै आवंहिं लै जाहिं ॥ नासिकँखड्गे हरी धनकीरूँ। योगशृंगार जिता औ बीरू ॥ शशिमुखसोंहै खड्गगहिरामा । रावण सों चाहै संग्रामा ॥ दुहुँ समुद्र महँ जनु रुचि बीरूँ। सेतबन्धै बांधा नलनीलूँ ॥ तिलकफूल असनासिक तासू । औसुगन्धदीन्हींविधि बासू ॥ करनफूल फेरैं उजियारा। जनहुशरदशशि सोहिलबारा॥ सोहिल चाहें फूल वह ऊँचा। धावहिं नखत न जाई पहुँचा ॥ नजनो कैसो फूल वह गढ़ा। विकसैं फूलसबचाहहिंचढ़ा ॥ दो० असवहफूलबासका आगर, भानासकी समुन्द । 'दिल १ सूराख २-३-४ भँवरा ५ लहर ६ लाल ७ पूर्णमासी का चांद ८ ममोला ६ चंचल १० क़ायम ११ देखना १२ कानसे सलाह १३ सफ़ेद १४ देवता १५ आरज़ १६ आसमान १७ नाक १८ तलवार १६ तोता २० सामने २१ पेड़ २२ पुल २३ नामचन्दर २४ ईश्वर २५ ज्यादा २६ खिलना २७ नाक २८ ॥

जेति फूल वह फूलहिं, ते सब भये सुगन्द ॥ अधरै सुरङ्गपान अस खीनीं²। राँती सुरँग अँमी रसभीनी ॥ आछहि बिहँसैंत बोलसो राँती । जनु गुलाल देखै बिहँसाती ॥ माणिकै अधरै दशनै जनुहीरा । बैनैं रिशालखांडमुख बीरा ॥ काढी अधरै डाभसों चीरी । रुधिरैं चुवै जो खावै बीरी ॥ दारे दशनै रसहिं रस कोली । रक्त भरी बहु सुरँग रँगीली ॥ जनु प्रभात रांति रबि¹⁴ रेखा । बिकसैबदनैं कमलजनुदेखा॥ अलकभुवङ्गि नअधरहिं आखों । गहै जो नागिन सो रस चाखा॥ दो० अधरै अधररस प्रेमका, अलकैं सुवंगिन बीच । तब अमृत रस पावै, जब नागिन कहँ खींच ॥ दशनै श्याम पानहिं रँगपाके । विकसंतकमलफूल अतिताके॥ ऐसि चमक मुख भीतर होई । जनु दाड़िमैं औष्यामनकोई ॥ चमकहिं दशनैं बिहँसजो नारी । बीजैं चमकजस निशें अँधियारी॥ श्वेतश्याम अस चमकतदीठी । श्याम हीर दहुँ पांयत बैठी ॥ कैंसो गढ़ी असदशन अमोला । मारै बीज बिहँस जो बोला ॥ रतन बीज रँग मसि²⁶ भइ श्यामा । ओही छात पदारथै नामा ॥ कित वे दशन देख रँगभीने । लैगइ ज्योति नयनभये खीने²⁷ ॥ दो० दशनज्योतिहै नयनमर्ग, हृदयँ मांझ सो पैठ । प्रकटै जगत अँधियारजनु, गुप्तै वही में दीठ ॥ होंठ १-८-११-१७ पतला २ लाल ३-६ अमृत ४ हँसना ५ मूंगा ७ दांत ६-१३ मीठी बोली १० खून १२ भोरके समय लालसूर्य १४ मुँह १५ ज़ुलफ़ों की नागिनी होठों तक पड़ी रहती १६ बाल १८ दांत १६-२२ खिलना २० अनार २१ बिजुली २३ रात २४ सफ़ेद स्याह २५ मिस्सी २६ लाल नाम उसी को सज़ांवार २७ हत २८ राह २६ दिल ३० ज़ाहिर ३१ छिपा ३२ ॥

रसनौं सुनहिजोकहिरसबाता। कोकिलबैनें सुनतमनराताँ॥ अमृत कोप जीभ जनु लांई। पान फूल अस बात सुहाई॥ चातृकें वैन सुनतहो शांती। सुने सो परै प्रेम मधुमाती॥ विरवासूख पात्र जस नीरूँ। सुनत बैन तस पलहिशरीरू॥ बोल सेवात बुन्द जनु परहीं। श्रवनैं सीप सुखमोती भरहीं॥ धनवै बैनै जो प्राण अधारू। भूखे श्रवणहिं दीन्ह अहारू॥ उन्हबैनैंहिंकी काहिनआसा। मोहहिंमिरगबिहँसतेहिश्वासा॥ दो० कण्ठं शारदा मोही, जीभ सरस्वती काहि। इन्द्रचांदरवि देवता, सबै जगत मुखचाहि॥ श्रवनैनसुनहिजो कुन्दनसीपी। पहिरे कुण्डल सिंहलदीपी॥ चाँदसूर्य्यदुहुँदिशिचमकाहीं। नखतहिं भरी निरखें नहिंजाहीं॥ क्षणक्षणैंकरहिंवीजै असकांपी। भ्रमरमेघमहँ रहहिं न झांपी॥ सूख शनीचर दुहुँ दिश मतें। होहिं निरारें न श्रवणहिहुतें॥ कांपतरहहिं बोल जोवैना। श्रवणहिंजनुलागहिंफिरनयना॥ जो जो बात सखिन सोंसुना। दुहुँदिशकरहिंशीश वै धुना॥ खूँट दोउ ध्रुव तैरैं खूटी। जानहु परहिं कचपेंची टूटी॥ दो० वेद पुराण ग्रन्थ जित, सबै सुने सिख लीन्ह। नाँदविनोदरागरसवंदक, श्रवणवहीविधिदीन्ह॥ कमल कपोलैं वही अस छाजे। औरन काहि दई अस साजे॥ पुहुपैं पंग रस अमी सँवारी। सुरँग गेंद नारँग रतनौरी॥ पुनि कपोलैं बायें तिल परा। सोतिलबिरह चिनग के करौँ॥ जीभ १ आवाज़ २-७-६ लाल ३ पपीहा ४ पानी ५ कान ६-८-१२ गला १० सूर्य ११ देखना १३ हरसाइत १४ बिजुली १५ अलग १६ बाली १७ नखत १८ छोटे नखत जो चांद के आसपास होते हैं १६ गाने-बजाने का शौक ईश्वरने दिया २० गाल २१-२४ फूल २२ लाल २३ मानिन्दर२५

१३२ पद्मावत । जो तिल देख जाय जर सोई । बायें दृष्टि काह जन होई ॥ जानहुँ भँवर पद्म पर टूटा । जीव दीन्ह औ वहीं न छूटा ॥ देखत तिल नयनहिं गा काढ़े । और न सूझे सो तिल छांढ़े ॥ तेहिपर अलकैं मंजरी डोला । छुवैसोनागिन सुरंग कपोलों ॥ दो० रक्षा करै मयूर वह, नागिन हियें पर लोट । केहिरेजर्ग कोउछुइसकै, दुइपरर्वतकी ओट ॥ ग्रीवैं मयूर केर जस ठाढ़ी । कोड़े११ फेर कँडेरें१२ काढ़ी ॥ धनि वह ग्रीव का बरनो करा । बांक तुरंगैं जान गहि धरा ॥ घरन परेवों ग्रीव उठावा । चहै बोल तमचोरै सुनावा ॥ ग्रीव सुराही के अस भये । अमी पियाला कारन नये ॥ पुनि तेहि ठांवे परी त्रयरेखाँ । तेहिसो ठांउँ होय जो देखा ॥ कनक तार सोने की करा । साज कमल तेहि ऊपर धरा ॥ सूर्य किरनहतग्रीवैं निरमैली । देइ पैगें जात हियें चली ॥ दो० नागिन चढ़ी कमलपर, चढ़के बैठ कमंठ । करैं पसार जो कालकहँ, सो लागै वह कंठ ॥ कनकदंडै दुइ बनी कलाई । डांडी फेर कमल जनु लाई ॥ चँदन गाभकी भुजा सँवारी । जन सो बेल कमल पौनारी ॥ तेहि डांडी सँग कमल हतोरी । एक कमल की दोनों जोरी ॥ सहजहिं जानहुँ मेहँदी रची । मुक्ताहल लीन्हे जनु घुंघुची ॥ करपल्लवैं जो हथोरिन साथा । वै सब रक्त भरीं तेहिं हाथा ॥ निगाह १ कमल २ बाल ३ लालगाल ४ निगहवानी ५ मोर ६ छाती ७ दुनिया ८ तथा छाती ६ गर्दन १०-२० खराद ११ खरादी १२ घोड़ा १३ कबूतर १४ चिड़िया १५ जगह १६-१८ तीन लकीर १७ सोना १६ साफ़ २१ क़दम २२ दिल २३ जान से गुज़र जाय २४ सोने की दण्डी २५ नाल २६ मोती २७ अंगुली २८ ॥

पद्मावत । ३३३ देखत हियो काढ जिव लेई । हिया काढ के जान न देई ॥ कनकें अँगूठी औ नग जड़ी । वह हत्यारिन नखतैंहिं भरी ॥ दो० जैसी भुजा कलाई, तेहि विधि जाय न भाख । कङ्कन हाथ होय जेहि, तेहि दर्पन का साख ॥ हियोँथार कुचें कनककचूरां । जानहुँ दोउ श्रीफलँ जूरा ॥ एक पार्टै वे दोनों राजा । श्यामछत्र दूनहुँ शिर छाजा ॥ जानहु दुइलडू इकसाथा । जग भा लडू चढ़ै न हाथा ॥ पातर पेट आहि जनु पूरी । पान अधार फूल अस गोरी ॥ रोमावलि तेहि ऊपर झूमा । जानँहुँ दोउ शाम औ रूमा ॥ अलकें भुअंगिनितहिपरलोटा । हियेँ करएकखेल दुइ गोटा ॥ बानेँ पुकार उठे कुचँ दोऊ । नाग शरन वह पाव न कोऊ ॥ दो० कैसहिं नवहिं न नाये, यौवन गर्व्व उठान । जो पहिले कर्र लावे, सो पावै रँत मान ॥ भृंगै लंकें जनु भांझनलागा । दुइखंडनलिनेंमां भज नु तागा ॥ जब फिर चलै देख वह पाछे । अप्सरें इन्द्रकेर जनु कौंछे ॥ जोह चलै मन भा पछताऊ । अबहूँ दृष्टि लाग वह भाऊ ॥ वही गवन छिप अप्सर गई । भई अलोपे ना परगटै भई ॥ हंस लजाय समुद्र कहँ खेली । हँस्ती लाज धूर शिर मेली ॥ जगत में स्त्री देखी मोहूँ । उदय अस्त नारि ना कहूँ ॥ महिमण्डल तौ ऐसौ न कोई । ब्रह्मण्डल जोहोय तो होई ॥


दिल १ सोना २ तयां नाग ३ सोना ४ छाती ५-१३-१५ सोनेकी कटोरी ६ नारियल ७ तख्त तंग दुनिया ६ नाममुल्क १० चाल ११ नागिन १२ तीर १४ गरूर १६ हाथ १७ सुर्खे १८ गंभीरी १६ कमर २० कोका- बेली २१ परी २२ सारीपहिने २३ निगाह २४ गायब २५ ज़ाहिर २६ हाथी २७ स्वर्गलोक २८ ॥

२३४ पद्मावत । दो० बरनों नारि जहां लग, दृष्टि झरोखें आय । और जो अहै अदृष्टिधन, सो मोहिं वरनिन जाय ॥ काधन कहौं जैसो सुकुमारा । फूलके छुये होय बिकरारा ॥ पखुरी काढैं फूलत सेती । सोई डांसी सोरै सपेती ॥ फूल समूचा रहै जो पांवा । व्याकुल होय नींदन हिं आवा ॥ सहै न क्षीरैं खांड़ औ घीव । पान अधार रहै तन जीव ॥ नस पानन की काढैं हेरी । अधरनं गड़ै फांस वहकेरी ॥ मकरिक तार ताहिकर चीरू । सोपहिरे जरजाय शरीरू ॥ पालँग पांव कि आछे पाटी । नेतें बिछाय चलै जो बाटी ॥ दो० कहां नयन जो राखौं, पलक न लाऊँ ओट । प्रेमक लुब्धौं पावै, काहि सो बड़ का छोट ॥ जो राघव धन वरन सुनाई । सुना शाह मुरछा गत आई ॥ जनु मूरति वह परगट भई । दरश देखाय ताहि छिपगई ॥ जो जो मंदिर पद्मिनी लेखे । सुना सोकमल कुमुदें जो देखे ॥ होय मालती धैन चित पैठी । और पुहुपें कोइ आव न दीठी ॥ मन होय भँवर भयो वैरागा । कमल छांड़ि चित और न लागा॥ चांदकी रङ्ग सूर्य्य जस राता । और नखत सो पूँछन बाता ॥ तब आलि अलाउद्दीन जगसूरू । लेऊँ नारि चित्तौर कै चूरू ॥ दो० जो वह मालति मानसर, अलिर्न मँ लीन्हीं जात । चित्तौर महँ जो पद्मिनी, फेरवही कहु बात ॥ ये जगसूरै कहूँ तुम पाहां । और पांच नग चितौर माहां ॥ नज़र १ नज़र में नहीं २ विछाना ३ बिछौना ४ दूध ५ होंठ ६ कपड़ा ७ बदन ८ तख्त ९ ज़ेरअन्दाज़ १० आशिक़ ११ ज़ाहिर १२ कोंकावेली १३ पद्मावत १४ फूल १५ लाल १६ भँवर १७-१६ सूर्य्य १८-२१ ताम्बुल २० ॥

पद्मावत । २३५ एक हंस है पंख अमोला। मोती चुनै पदारथे बोला ॥ दूसर नग जो अमृत बसा। सब बिष हरै जहांलग डसा ॥ तीसर पाहनपरस बखाना। लोहछुये होय कञ्चन बाना ॥ चौथ अहै सांदूर अहेरी। जेहि बन हस्ति धरै सब घेरी ॥ पांचों है सो तहां लागना। राजपंख पंखी गरजना ॥ हरनिरोझ कोइ बाचन भागा। जैस शचान तैस उड़भागा ॥ दो० नग अमोल अस पांचों, मान समुद्र वह दीन्ह । इसकन्दर नहिं पाई, जोरे समुद्र धस लीन्ह ॥ पान दीन्ह राघव पहिरावा। दश गजमत्त घोर सो पावा॥ अरु दूसरि कङ्कन की जोरी। रतनजोलागवह तीसकरोरी॥ लाख दिनारे देवाई जेवों। दारिद हरा समुद्रकी सेवों ॥ हों जेहि दिवसै पद्मिनी पाऊँ । तोहि राघव चित्तौर बैठाऊँ ॥ पहिले कर पांचों नग मूठी। सोनगलेउँजोकनकें अँगूठी ॥ सुरजा वीर पुरुप बरयारू। नाजनै नाग सिंह असवारू॥ दीन्हपत्रिलिख बेगैं चलावा। चित्तौरगढ़ राजापहँ आवा ॥ दो० राजैं पत्रि बँचावा, किरपा लिखी अनेक । सिंहलकी जो पद्मिनी, पठैदेव तेहि बेग ॥ खण्डचौंतीसवां लड़ाई राजा और बादशाह ॥ सुन अस लिखा उठाजर राजा। जौं नौदैवतड़प घनै गाजौं ॥ का मोहिं सिंह देखावस आई। कहौं तो शार्दूलै धरखाई ॥


पाद-टिप्पणी (Footnotes): लाल १ पारसपत्थर २ सोना-३ शेरसुर्ख ४-२३ हाथी ५ सीमुर्ग ६ नाम जानवर ७ शिकरा ८ खिलअत ६ हाथीमस्त १० अशरफ़ी ११ दक्षिणा १२ ख़िदमत १३ दिन १४ राजपर बैठाऊँ १५ सोना १६ ज़बरदस्त १७ कोड़ा १८ जल्द १६ मेहरबानी २० बादल २१ बिजली २२ ॥

२३६ पदमावत । भलहिंजोशाहभूमिपति भारी । मांग न कोऊपुरुपकी नारी ॥ जो सो चक्रवे ताकहँ राजू । मन्दिरै एकअपनकहँ सांजू ॥ अपसरैं जहां इन्द्र पै आवै । और जो सुनै न देखै पावै ॥ कंसका राजजिता जो गोपी । कान्हेन दीन्ह काहुँकहँगोपी ॥ को म्वहिंते अस शूर अगारा । चढ़ै स्वर्ग घुसपरै पतारा ॥ दो० का तोहिं जीव मराऊं, सकत आनका दोष । जोतसईभैनसमुद्रजल, सोझुझाय कितओस ॥ राजा अस न होहु रिसरातौं । सुनहुन जूड़ नजरकहुबाता ॥ मैं हों यहां मरे कहँ आवा । बादशाह अस जानपठावा ॥ जोतोहिभारनऔरहिलीन्हा। पुनिसोकाले उतरैबहिदीन्हा॥ बादशाह कहँ ऐस न बोलू । चढ़े तौ परै जगत महँ डोलू ॥ सूरैहि चढ़त लांग नहिं वारा । दहक आग तेहि स्वर्गपतारा ॥ परबत उड़हिं सूरैके फूकें । यहिगढ क्षारैहोइ यक झोंकें ॥ धसै सुमेरुँ समुद्र गा पाटा । भूमी डोल शेष फण फाटा ॥ दो० तासों कौन लड़ाई, बैठ न चितौर खास । ऊपर लेहु चंदेरी, का पश्मिन इक दास ॥ जो पै धेरनि जाय घरकेरी । का चितौर का राज चंदेरी ॥ जेईलेई घर कारने कोई । सो घरदेई जो योगी होई ॥ रनथंभोरैं हों नाथ हमीरूँ । कल्पै माथ जे दीन्ह शरीरूँ ॥ होंसो रतनसेन शकबँधी । राहुँ वेध जीते सरवन्धी ॥ ज़मीन का मालिक १ तमाम दुनिया का राजा २ क़िला ३ परी ४ श्रीकृष्णचन्द्र५शूरमा ६ आसमान ७ पाप८ प्यासबुझे६ लाल १० दुश्मन११ अंचाव १२ सूर्य १३ नामराजा १४ धूर १५ नामपहाड़ १६ ज़मीन १७ कौ- रंत १८ जो कोई किसी की औरत लैले १६ नामक़िला २० नामराजा २१ शिरकटाना २२ बदन २३ मशहूर २४ निशानाजीत द्रौपदी व्याही २५ ॥

| पद्मावत । २३७ हनुमतसरसें भारें जें कांधा । राघवँ सम समुंद्र जें बांधा ॥ बिक्रमें सरस कीन्ह जें शाका । सिंहलदीप लीन्ह जो ताका॥ जो अस लिखा भयो नहिं ओछा । जियत सिंहकी गहि को मोछा॥ दो० द्रब्यलेइ तो मानौं, सेवक करौं गहि पांव । चाहै नारी पद्मिनी, सिंहलदीपहि जांव ॥ बोलन राजा आप जनौई । लीन्ह उदयगिरि और छितौई ॥ सप्तद्बीपे राजा शिर नावहिं । सेना चली पद्मिनी आवहिं ॥ जाकर सेव करै संसारा । सिंहलदीप लेत कित बारा ॥ जनि जाने सियह गांढ़ तोपाहीं । ताकर सबै तोर कुछ नाहीं ॥ जेहि दिन आय गढ़ीको छैकी । सरबसै लेइ हाथ को टेकी ॥ शीशें भार खेहैं के लागे । सो शिरफार होय दुख आगे ॥ सेवाकर जु जियन तोहिं भाई । नाहित फेर माखें होय जाई ॥ दो० जाकर जीव दीन्ह पै, अगमर्न शीशँ जोहारि । तेहि करेंगे सब जानै, काह पुरुष का नारि ॥ तुरुकें जायकहि मरै न धाई । हो ये इसकन्दरँ की नाई ॥ सुन अमृत कजैलिवन धावा । हाथ न चढ़ा रहा पछतावा ॥ औ तेहि दीप पतंगें होय परा । अगनी भाड़ पांव दै जरा ॥ धर्ती लोह स्वर्ग भा तांबा । जीवदीन्ह पहुँचत करै लांबा ॥ यह चितौरगढ़ सोइ पहारू । मूरै उठै होय दहक अँगारू ॥ जैबर इसकन्दरें सरकीन्हीं । समुद्र लियो धसजसवेलीन्हीं ॥ : बराबर १ बोझ २ श्रीरामचन्द्रजी ३ राजा विक्रमादित्य ४ अपनी ता- रीफ़ ५ नाममुल्क ६-७ सातों मुल्क ८ फ़ौज ९ क़िलाको घेरे १० सब ११ रोकना १२ शिर १३-१७ धूल १४ गुस्सांदिली १५ पहिले १६ किया हुआ १८ बादशाह १६ नाम बादशाह २० जहां अमृत है २१ पांखी २२ आसमान २३ हाथ २४ सूर्य २५ जैसे सिकन्दर ने दुःख पाया २६ ॥

२३८ पद्मावत । जो चढ़ै आनीजाय जिताई । तब का भै सो जीत जिताई ॥ दो० महूँ समुझ यहि आगमनै, सजराखा गढ़साज । काल्ह होय जेहि आवन, सोचल आवै आज ॥ शुरजाँ पलट शाहपहँ आवा । देव न मानै बहुत मनावा ॥ आग जु जरै आग पै सूखा । जरत रहे न बुझाये बूझा ॥ ऐसे माथ न नावै देवा । चढ़ै सुलेमाँ मानै सेवा ॥ सुनके अस रातौ सुलतानू । जैसे तपै जेठ कर भानू ॥ सहसँ किरनरोष तस भरा । जेहि दिशि देखै तेहि दिशि जरा ॥ हिन्दू देव काह बरै खाँचा । सरकै न आप आगसों बांचा ॥ यहिजैँग आगजुभरमहिंलीन्हा । सोसँग आग दुहूँ जग कीन्हा ॥ दो० रनथँभोरै जसजरबुझा, चितौर परै सो आग । फेर बुझाये ना बुझै, जरै दिवसै के लाग ॥ लिखी पत्रि चारहुँदिशिधाये । जहाँ तहँ उमरा बेगेँ बुलाये ॥ द्वन्द्वै घाव भा इन्द्र सकाना । डोला मेरु शेष अकुलाना ॥ धर्ती डोल कूँर्म खरभरा । महनामर्थे समुद्र महँ परा ॥ शाह बजाय चढ़ाजगजाना । तीसकोसभा पहिल पयानाँ ॥ चितौर सौहँ बारगह तानी । जहँलगसुना कूचसुलतानी ॥ उठसरवानै गगनै लहि छाई । जानहु राँते मेघ दिखाई ॥ जो जहाँ तहँ सोता असजागा । आयजुहार कटकै सब लागा ॥ दो० हस्ति घोर औ दैरैं पुरुष, जहँ तक बेसरौँ ऊँट । जब बादशाह आयेंगे १ पहिले २ नामपहलवान ३ नामबादशाह ४ लाल ५ सूर्य ६ हज़ार ७ गुस्सा ८ घमण्ड ९ भागना १० दुनियामें आगसे जलाया जायगा ११ नाम क़िला १२ दिन १३ जल्द १४ नामबाजा १५ नामपहाड़ १६ नामराजासाँप १७ कछुवा १८ उलटपलट १६ कूच २० सामने २१ खीमा २२ आसमान २३ लाल २४ फ़ौज २५-२७ हाथी २६ खच्चर २८ ॥

पद्मावत । २३६ जहँ तहँ लीन्ह पलाने, कटकेँ¹ सुरहें² अस छूट ॥ चले सहसबेसक³ सुलतानी । तीपैंतुरंग⁴ बांक कनकानी ॥ पंखेरी चली जो पाँतिहिंपाँती । वरण वरण औ भाँतिहिंभाँती ॥ काँले कुँमेते नील संपेती । खिंगंकुरंगे बीजें²³ दोरें²⁴ कतीती²⁵ ॥ अवलकेँ¹⁶ अबरसे¹⁷ लँखीशिरौंजी । चौधैर चाचसमुँदसबताजी ॥ किरमर्जे²⁰ नुकरों²¹ जरदौ भले । रूपकगनै बोलसरै चले ॥ पँचकल्याने²² संजावै बखानी । महि²६ सायरसबंचुन²⁷आनी ॥ मुशँकी औहिरमँजी²⁹ इराँकी³० । तुरँकी³¹ कहीसुथौरे बुलौँकी ॥ दो० शिर औ पूँछ उठाये, चहुँदिशि श्वास उनाहिं । रोषे³³ भरे जस बावरे, पवन की बाँसेँ उड़ाहिं ॥ लोहे साँरे³५ हस्ति पहिराये । मेघश्याम³६ जनु गरजतआये ॥ मेघहि चाह अधिकै वैकारे । भयो अमूझ देख अँधियारे ॥ जस भादौ निशि³८ आवैदीठी । स्वँग जाय हरके तेहिपीठी ॥ सोरह लख हँस्ती जब चाला । परवत सरस चलै जग हाला ॥ चले गैंड़ माते मद आवहिं । भागहिंहस्ति⁴² गन्धजोपावहिं ॥ ऊपरजाय गगनै शिर घिसा । औ धर्ती तरिकहँ धस मंसा ॥ भा भूचाल चलत गजगानी । जहँ पग धरहिं उठै तहँ पानी ॥ दो० चलत हस्ति जगकाँपा, चाँपा शेष पतार । कूँर्म जे धर्ती ले रहा, बैठ भयो गजभार ॥ चले सो उमर अमीर बखाने । का बरणों जस उनके बाने ॥ फ़ौज १ टीड़ी २ हज़ार कुरसी ३. तेज़ घोड़ा ४ निशान ५ घोड़ों की ज़ात ६ सें २५ तक सब दुनिया २६ घोड़े की ज़ात २७ से ३२ तक गुस्सा ३३ डर ३४ भूल लोहे की ३५ हाथी ३६-४१-४२ कालें बादल ३७ बहुत ३८ रात ३६ आसमान ४०-४३ कछुवा जिसके ऊपर ज़मीन है ४४ ॥

२४० | पद्मावत । खुरासाने औ चला हरेऊँ । गोरेँ बँगाल रहा नहिं केऊ ॥ रहा न रूमे शामे सुलतांनू । काशमीरेँ ठट्ठौँ मुलतानू ॥ जहँतक बड़बड़ तुरुवा जाती । मांडोवाली अरु गुजरोंती ॥ पटनौ उड़ीसौ के सब चले । लै गजहस्ति जहांगल भले ॥ कमरूँ कामतेँ औ पँड़वैई । देवगढ़ैलेत उदयगिरि १७ आई ॥ चला सो परबत और कर्मेऊँ । घिसर्योनगर जहांगल नाऊँ ॥ दो० उदयअस्तं लहिदेश जो, को जाने तेहिनाउँ । सातोंद्वीप नवो खंड, जुरे आय इक ठाँउँ ॥ धनिसुलतान जेहिक संसारा । वही कटके अस जुरी अपारा ॥ सबै तुर्क शिरताज वखोने । तबल बाज औ बांधे बाने ॥ लाखन मीर बहादुर जंगी । चित्रेँ कमानी तीर खदंगी २६ ॥ जीमा खोल रग सो मैढ़े । लेज़म घाल इराकेँहि चढ़े ॥ चमकै पखँरी सारिसँवारी । दरपण छाँहिअधिक उजियारी ॥ बरण बरण औ पाँतिहिंपाँती । चलीसो सेनाँ भाँतिहिंभाँती ॥ बीहर बीहरे सब की बोली । विधि ३२ यहिकहांकहांसोखोली ॥ दो० योजनैं सत ससकर, इक इक होय पयानैं । अगिलहिंजहांपयानहोय, पछिलहिंतहांमिलान ॥ डोले गढ़ गढ़पति सब कांपे । जीवन पेट हाथ हियेँ चांपे ॥ कांपा रनथंभौरेँ डर डोला । तरवैरेँ गयो भुराय तँबोला ॥ चूनागढ़ै औ चंपा तेरी ४१ । कांपा माँड़ो लेत चँदेरी ४२ ॥ नाम मुल्क १ से १६ तक पूर्व से पश्चिमतक २० सातों मुल्क २१ जगह २२ फ़ौज २३ बयान २४ तसवीर २५ नामतीर २६ मूठ ताँत से मढ़ी २७ घोड़ा २८ निशान २६ ज्यादा ३० फ़ौज ३१ अलग ३२ ईश्वर ३३ कोस३४ कूच ३५ क़िलादार ३६ दिल ३७ नामक़िला ३८ पेंड ३६ नाममुल्क ४० से ४३ तक ॥

पद्मावत। २४१

ग्वालियर गढ़१ महँ परी मथानी। औ कन्धार२ मथा होय पानी॥ कालिंजर३ महँ परा भगाना। भाग उजैगढ़४ रहा न थाना॥ कांपा बांदौ५ नरंदुर्रानी६। डर रुहतासँ विजयगिरिमानी॥ कांप उदयगढ़ देवगढ़८ डेरा। तब सो छिपाय आपकहँ घेरा॥ दो० गढ़ गढ़पति जहँतक सबै, कांप डोल जस पात। काकहँ बोल सौंहँ भा, वादशाह करछात॥ चितौर गढ़ औ कंभलनेरी। साजे दोनों जैसि सुमेरी११॥ दूतन कहाँ आय जहँ राजा। चढ़ा तुर्क१२ आवै देरै१३ साजा॥ सुनि राजा दौड़ाई पाँती। हिन्दूनाउँ जहांगलग जाती॥ चितौर हिन्दुनकर अस्थानौं। शत्रू१५ तुर्कहठ कीन्ह पयानौं॥ आदि समुद्र रहे ना बांधा। मैं हों मेड़ भोरै शिर कांधा॥ पुरवहु साथ तुम्हार बड़ाई। नाहित सबकहँ मार चढ़ाई॥ जौलहि मेड़ रहै सुख साखा। टूटहिं वोर जाय नहिं राखा॥ दो० सती जो जियमहँ सतधरै, जरै न छोड़े साथ। जहँ वीड़ा तहँ चून है, पान सुपारी काथ॥ करत जो रहे शाहकी सेवा। तिनकहँ पुनि असभाव परेवां॥ सब होय एकमते जु सिधारे। वादशाह कहँ आन जुहारे॥ है चितोर हिन्दुन की माता। गाँढ़े परै तजजायै न नाता॥ रतनसेन है जूंन्हरै साजा। हिन्दुन मांफ आहि बड़राजा॥ हिन्दुन केर पतंग कर लेखा। दौर परहिं अग्नी जो देखा॥ कृपाँ करहु तौ करहु समीरों। नाहित हमहिं देहु हँस वीरा॥


नाम मुल्क १ से १० तक सामने ११ नाम पहाड़ १२ बादशाह १३ फ़ौज १४ मकान १५ दुश्मन १६ कूच १७ बोझ १८ दरवाज़ा १६ दूत २० एकसलाह २१ मुश्किल २२ छोड़ना २३ मौत का सामान २४ मेहरबानी २५ माफ़ २६॥