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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

२ पद्मावत । कीन्हेसि बनखँडै औजड़मूरी । कीन्हेसि तरवरै तार खजूरी ॥ कीन्हेसि सावजँ आरणें रहें । कीन्हेसि पंख उड़ैं जहँ चहैं ॥ कीन्हेसि बरएँ श्वेतँऔश्यामा । कीन्हेसि भूखनींद विशरामाँ ॥ कीन्हेसि पान फूल बहु भोगू । कीन्हेसि बहुऔषधं बहुरोगू ॥ दो० निमिर्ष न लाग करत वह, सबै कीन्ह पल एक । गगनं अंतरिक्षैं राखा, बाजें खंभ बिन टेक ॥ कीन्हेसि अगरकस्तूरी १२ बीनौं । कीन्हेसि भीमसेनँ औचीनीं ॥ कीन्हेसि नागेंजोमुखविषै बसा । कीन्हेसिमंत्र हरे जेहि डसा ॥ कीन्हेसिअमृतँ जिये जो पाई । कीन्हेसिविषं मीचँ जेहिखाई ॥ कीन्हेसि ऊख मीठ रस भरी । कीन्हेसि करू बेल बहु फरी ॥ कीन्हेसि मधुं लावै लै माखी । कीन्हेसि भँवरपंखैं औपाखी ॥ कीन्हेसिलोवाँ अंदर चांटी २५ । कीन्हेसि बहुततरहहिं घनमांटी ॥ कीन्हेसि राक्षसैं भूत परेता । कीन्हेसि भूकसैं देवदयँता ॥ दो० कीन्हेसि सहसैं अठारह, वरणबरैं उपराज । भुक्तिदिहिस पुनि सबनकहँ, सकलैं साजनासाज ॥ कीन्हेसि मानुषै दिहिसिवड़ाई । कीन्हेसि अन्नभुक्तिँ तहँपाई ॥ कीन्हेसि राजा भोजहि राजू । कीन्हेसिहास्तिँ घोरतहँसाजूँ ॥ कीन्हेसि तेहिकहँ बहुत विरासू । कीन्हेसिकोइठाकुरँ कोइदासूँ ॥ ˙ जंगल १ पेड़ २ जंगलीजानवर ३ जंगल ४ रंग ५ सफ़ैद-सियाह ६ आ- राम ७ इलाज ८ पलकमारने में ६ आसमान १० बीचो बीच ११ नाम जानवर- परिन्द १२ मुश्क १३ क़िस्म काफ़ूर १४-१५-१६ सांप १७ ज़हर १८-२० जिसके पीने से मुरदा ज़िन्दा होजाय १६ मौत २१ शहद २२ उड़्नेवाले जानवर २३ लोंबड़ी २४ चींवटी २५ शैतानकी क़िस्म २६-२७-२८ हज़ार २६ तरह तरह की पैदायश ३० सब ३१ आदमी ३२ रोज़ी ३३ हाथी ३४ सामान ३५ आराम ३६ मालिक ३७ ग़ुलाम ३८ ॥

पद्मावत। ३ कीन्हेसि द्रव्य१ गर्व२ जेहि होई। कीन्हेसि लोभ३ अघाइ न कोई॥ कीन्हेसि जियन४ सदा सब चहा। कीन्हेसि मीच५ न कोई रहा॥ कीन्हेसि सुख औ कोटि अनंदू। कीन्हेसि दुख चिंताँ औ दंदू॥ कीन्हेसि कोइ भिखारी८ कोइ धनी९। कीन्हेसि संपति१०-११-१२ विपत्ति पुनि घनी१३॥ दो० कीन्हेसि कोइ निमरोसी१४, कीन्हेसि कोइ बरियारै। छारहि१५ ते सब कीन्हेसि, पुनि१६ कीन्हेसि सब छार॥ धनपति१७ वही जेहेकेँ संसारू१८। सबै देइ नितँ१९ घट न भँडारू२०॥ जानवंत जगत हस्ति औ चांटी। सब कहँ भुक्ति२६ राति दिन बाँटी॥ ताकर दृष्टि२७ जो सब उपराहीं। मित्रँ शत्रुँ कोइ बिसरै नाहीं॥ पंख पतंग न बिसरे कोई। परगटँ गुप्तँ जहांलग होई॥ भोग भुक्ति३२ बहु भांति३१ उपाई। सबै खवाइ आप नहिं खाई॥ ताकर वही जो खाना पीना। सब कहँ देइ भुक्ति औ चैना॥ सबै आश ताकर हरिखांसा। बहु न काहुकी आश निरासा॥ दो० युग युग देत घटा नहिं, उभय हाथ अस कीन्ह। औ जो दीन्ह जगत महँ, सो सब ताकर दीन्ह॥ आदि३७ एक वरणों सो राजा। औ दिन अंत राज जेहि छाजा॥ सदा सरवदाँ राज सो करै। और जेहि चहै राज तेहि दरै॥ छत्रहि४० अचँत निछत्रहि द्यावा। दूसर नाहिं जो सरवरि पावा॥ दौलत १ गरूर २ लालच ३ जीना ४ मौत ५ खुशी ६ फ़िक्र ७ ग़म ८ गरीब ९ अमीर १० दौलत ११ दुःख १२ बहुत १३ कमज़ोर १४ ज़ोरवाला १५ माटी १६ फिरि १७ दौलतमन्द १८ जिसका १९ हमेशा २० खज़ाना २१ जहांतक २२ दुनिया २३ हाथी २४ चींघटी २५ खुराक २६-३२ निगाह २७ दोस्त २८ दुश्मन २९ ज़ाहिर ३० छिपा ३१ बहुत तरह पैदा किया ३३ उम्मेद ३४ नाउम्मेद ३५ दोनों ३६ सबसे पहिले ३७ वयान करना ३८ अव्वल ना आखिर ३९ हमेशा ४० छत्रधारी ४१ विदून छत्र ४२ बराबरी ४३॥

४ पद्मावत । परबतैं^१ ढहिदेखत सबलोगू । चांटहिं^२ करहिहस्तैं^३ सरयोगू ॥ बज्रहि^४ तिनकहिं मार उड़ाई । तिनैं वज्रै करि देइ बड़ाई ॥ ताकर कीन्ह न जानै कोई । करै सोइ जो मन चिन्तन होई ॥ काहू भोगभुक्ति^५ सुख सारा । काहू भूख बहुत दुख मारा ॥ दो० सबै नाशँ^६ वह इस्थिर^७, ऐसो साज जेहिकेर । एक साँजी औ भाजी^८, चहै सवारै^६ फेर ॥ अलखँ^१० अरूप अवरन सो कर्त्ता । वह सबसों सब वह सों बेर्त्ता ॥ प्रकटैं^११ गुप्तैं^१२ सो सर्वव्योपी^१३ । धर्मी चीन्ह न चीन्है पापी ॥ ना वह पूत नहिं पिता न माता । नावहु कुटुँबन कोइसंगनाता ॥ जनौं^१४ न काहि न कोइवैजनौँ^१५ । जहँलगसब ताकी सिरजनौँ^१६ ॥ वै सब कीन्ह जहांलग कोई । वहनहिं कीन्हकाहुकर होई ॥ हति^१७ पहिले औ अबहै सोई । पुनि सो रहै रहै नहिं कोई ॥ और जो होय सो बावर अन्धा । दिन दुइ चारि मरै कर धन्धा ॥ दो० जो वह चहा सो कीन्हेसि, करै जो चाहै कीन्ह । बरजनहारँ^१८ न कोई, सबै चाहि जेउ दीन्ह ॥ बिनंबुंधि^१९ चहिजोकरहोय ज्ञानू । जसपुराणमहिं लिखाबखानू ॥ जीव नाहिं पै जिये गुसाईं । करै^२० नाहीं पै करै सबाई^२१ ॥ जीभ नाहिं पै सबकुछ बोला । तन नाहीं सब ठाहरैं^२२ डोला ॥ श्रवणैं^२३ नाहिं पै सबकुछ सुना । हियौँ^२४ नाहिं पै सबकुछ गुना^२५ ॥ पहाड़ १ चींवटी २ हांथी ३ पत्थर ४-५ रोज़ी ६ नाश होनेवाला ७ क़ायम ८ बनाना और बिगाड़ना ६ जिसको कोई न देखसके १० नज़दीक ११ ज़ाहिर १२ छिपा १३ सब चीज़ में बिराजमान और सब चीज़ उसमें मौजूद १४ पैदा होना १५-१६ पैदायश १७ पहिले था १८ मना करने वाला १६ अक़्ल २० हाथ २१ सब २२ जगह २३ कान २४ दिल २५ ॥

[Page-header] पद्मावत। २ नयनं नाहिं पै सबकुछ देखा । कौनभांति असजाय विशेखा॥ ना कोई है वह की रूपा। नावहरसो कोई आहि अनूपा॥ ना वह ठाउँ न वह बिनठाउँ। रूपरेख बिन निरमले नाउँ ॥ दो० ना वह मिला न बेहरा, ऐसो रहा भरिपूर । दृएवन्तै कहँ नेरे, अंधहि मूरख दूर ॥ और जो दीन्हेसिरतन अमोला। ताकर मर्म न जानै भोला ॥ दीन्हेसिरसना औ रसभोगू। दीन्हेसिदशनजो बिहँसे योगू दीन्हेसिजग देखनकहँ नयनाँ। दीन्हेसि श्रवणैं सुनेकहँ बयनाँ॥ दीन्हेसिकण्ठ बोल जेहिमाहां। दीन्हेसि करपल्लव बरबाहां ॥ दीन्हेसिचरण अनूप चलाहीं। सोजानै जेहि दीन्हेसि नाहीं॥ यौवन मरम जानिपै बूढ़ा। मिला न तरुणा या जग ढूँढ़ा॥ सुख कर मरमै न जानै राजा। दुखीजानि जाकहँ दुख बाजा॥ दो० काया कामरमै जानिपै रोगी, भोगी रहै निचन्तै। सबकर मरम गुसाँई जानै जो घटघट रहै तन्तै॥ अति अपार करताकर करनी। बरणन कोई पावै बरना ॥ सात स्वैरंग जो कागद करै। धरती समंदर मसै भरै ॥ जानवन्त जगसाखा बन ढांखा। जानवन्त कैरौँ रँदै नौँ पंख पांखा॥ जानवन्त खेहँ रहै दुनयाई। मेघैं बूंद औ गगन तंराई ॥ सब लिख नीकी लिख संसारा। लिखि न जायगतिसमुद्रअपारा॥ = आँख १ कौन तरह २ मुक़ाबिल जिसका कोई नहीं ३ जगह ४ पाक साफ़ ५ अलग ६ देखनेवाला ७ नादान ८ ज़वाहिर ६ भेद १० जीभ ११ दांत १२ हँसने के लिये १३ आँख १४ कान १५ आवाज़ १६ हाथ की अंगुली व हथेली १७ पैर १८ जिसकी मिसाल न हो १६ जवानी २०-२२ क़दर २१ भेद २३ २५-२७ बदन २४ बेफ़िक्र २६ ईश्वर २८ जिसका पारावार न हो २६ बयान करना ३० आसमान ३१ ज़मीन ३२ सियाही ३३ बाल ३४ दांत ३५ बालू ३६ माटी ३७ बादल ३८ आसमान ३६ नखत ४० ॥

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यंतरण है:

६ पद्मावत । एतो कीन्ह सबगुण प्रगटो । अबहुँ समुद्र महँ बूंद न घटा ॥ ऐसो जानि मन गर्व न होय । गर्व करे मन बावर सोय ॥ दो० बड़ गुणवंत गुसोई, चही सँवारी बेग । औ असगुणी सँवारी, जो गुणचही अनेक ॥ कीन्हेसि पुरुष⁶ एक निरमरा⁷ । नाम मुहम्मद पूनों करा⁸ ॥ प्रथम⁹ ज्योति बिधितों¹⁰ कीसाजी । औ तेहिप्रीति¹¹ सृष्टि¹² उपराजी ॥ दीपक¹³ लेश जगतै¹⁴ कहिदीन्हा । भानिरमलै¹⁵ जगै¹⁶ मारग¹⁷ चीन्हा ॥ जो न होत अस पुरुष उज्यारा । सूझिनपरत पंथै अँधियारा ॥ दूसरे ठाउँ दीबी लिखी । वही धर्म जो पढ़त सीखी ॥ जेहि न लीन्हजन्म सो नाउँ । ताकहँदीन्ह नरकमहँ ठाउँ ॥ जगैबसीठ²⁰ दईवे²¹ कीन्ही । दुइजगै²² तरानाउँ तेहिलीन्ही ॥ दो० गुण अवगुण²³ बिधि²⁴ पूंछत, होय लेख औजोख²⁵ । तेहिं बिनवब आगे होय, करै जगतै²⁶ करमोख²⁷ ॥ चार मीत²⁸ जो मुहम्मद ठाउँ²⁹ । जेहिकदीन्ह जगै³⁰ निरमलै³¹ नाउँ ॥ अबूबक्र सदीक़ सयाने । पहिले सिदक़दीन वहि आने ॥ पुनि सो उमर खिताब सुहाये । भा जगै अदलै³³ दीन जो आये ॥ पुनि उसमान बड़ पण्डितगुनी । लिखापुराण जो आयत सुनी ॥ चौथे अलीसिंह³⁴ बरियारू³⁵ । सौहिं³⁶ ना कोई रहा जुझारू³⁷ ॥ चार्यो एकमते³⁸ एक बानी । एक पंथ³⁹ औ एक संघांना ॥


[पाद-टिप्पणियाँ / शब्दार्थ]: ...ज़ाहिर करना १ ग़रूर २-३ ईश्वर ४ जल्द ५ बहुत ६ शख़्स ७ पाक ८ चौदहौं रातिका चांद ६ पहिले १० ईश्वर ११ मुहब्बत १२ दुनिया पैदाकी १३ चिराग़ १४ दुनिया १५ पाक १६ संसार १७ राह १८-१६ जगह २०-२१ दुनियाका क़ासिद २२ दोनों जहान २३ पाप और पुण्य २४ ईश्वर २५ हिसाब २६ दुनिया २७ बन्द से छोड़ना २८ दोस्त २६ जगह ३० दुनिया ३१ पवित्र ३२ संसार ३३ न्याय ३४ शेर ३५ ज़बरदस्त ३६ सामना करनेवाला ३७ लड़नेवाला ३८ एकसलाह ३६ राह ४०॥

॥ पद्मावत ॥ ७ बचनं¹ एक जो सुनायहिं सांचा। वही पुराण दुहूं जगं² बांची॥ दो० जो पुराण बिधि³ पठवा, सोई पढ़ति ग्रंथ⁴। और जो भूली आवत, सो सुन लागे पंथ⁵॥ शेरशाह देहली सुलतानू। चारहुं खंड तपी जस भानू⁷॥ ओही छाज छाति औ पाटा। सब राजैं भुइँधरा लिलाटां॥ जात शूर औ खांडे शूरों। औ बुधवन्त सबै गुण पूरा॥ शूरै³ नवाई नवैं खंड¹⁴। वृहे सातै द्वीप दुनी सब नये॥ तहँलग राज खड्गं¹⁶ करि लीन्हा। इसकंदर ज़ुलकरनयन जो कीन्हा। हाथ सुलेमानें¹⁶ केर अँगूठी। जग कहँ दानं¹ दी न भरि मूठी॥ औ अतिगरू भूमिपति¹ भारी। टेकें भूमि सब सृष्टि सँभारी॥ दो० देहि अशीश मुहम्मद, करहु युग युग राज। वादशाह तुम जगतें के, जगैं तुम्हार मुहताज॥ बरनौं शूरैं²६ भूमिपति राजा। भूमिं²⁷ न भार सहै जो साजा॥ हय मय सयनं चलय जगै पूरी। परबंत टूटि उड़हिं होय धूरी॥ परी रेणुं³² होय रवि³³ हीं ग्रासा। मानुष पेखलेहिं फिरि बासा॥ भुइँ उड़ अन्तरिक्षै³⁶ गई सुतमंडाँ। ऊपर होय छावा महिमंडाँ॥ डोलै गगनें इन्दर डर काँपा। बासुकि जाय पतालहि चाँपा॥ मेरुँ धसमसे समुंद्र सुखाई। बन खंड टूटि खेहँ मिलि जाई॥ अगलहिं कहँ पानी गहि बांटा। पिछलेहिं कहँ नहिं काँदू आँटा॥ 'बात १ दुनिया २ पढ़ना ३ ईश्वर ४ किताब ५ राह ६ तरफ ७ सूर्य्य ८ तख्त ६ माथा १० पठान ११ तलवार बहादुर १२ बहादुर १३ सारी दुनिया १४ मुल्क १५ तलवार १६ नाम बादशाह १७-१८ दुनिया १६ खैरात २० बादशाह २१ जमीन २२ दुनिया २३-२४-२५ तारीफ़ करना २६ बहादुर २७ बादशाह २८ जमीन २६ घोड़े से भरी हुई फ़ौज ३० दुनिया ३१ पहाड़ ३२ धूरि ३३ सूर्य्य ३४ बीच ३५ आसमान ३६-३८ ज़मीन ३७ नाम राजा साँपों का ३६ पहाड़ ४० जंगल ४१ राख ४२ चहला ४३ ॥

८ | पद्मावत। दो० जोगढ़ै¹ नयनहिं काहू, चलतहोय सब चूर। जो वह चढ़ै भूमिपति², शेरशाह जगशूरै³ ॥ अद्लैं⁴ कहौं प्रथम⁵ जसहोय। चाँटाँ⁶ चलत न दुखवैकोय ॥ नौशेखाँ जो आदिल⁸ कहा। शाहअदलैं⁹ सैरे¹० सौहिनरहा ॥ अद्लैं जोकीन्ह उमरै¹³ कीनाई। भई यहां संगरी दुनियाई ॥ परी नाँथै कोई छुवै न पारा। मार्गै¹⁴ मानुषसे उजियारा ॥ गऊ सिंहैं¹⁷ रेंगहिं एक बाटाँ। दोनों पानिपियैं एक घाटा ॥ नीरैक्षीर¹⁸ छानै दरबारा। दूध पानि सब करै निराराँ¹⁹ ॥ धर्म न्याय चलै सँतं²⁰ सांझा। दूवर वैरी एक समैं²¹ राखा ॥ दो० संबै पृथिवी अशीशै, जोरि जोरिकै हाथ। गङ्ग यमुन जौलहि जल, तौलहिं अमरनाथै²² ॥ पुनि रुपैवंत²³ बखौनों²⁴ काहा। जानवन्तजगतंसवेमुखजाहा॥ शेशि²६ चौदहजोदई²७ संवारा। तबहूँ जाहि रूप उजियारा ॥ पापंजाय जो दरशन दीशा। जगँ जुहारके देत अशीशा ॥ जैसो भानुं²⁸ जगै ऊपर तपा। सबै रूप वह आगे छिपा ॥ असभा शूरै पुरुषै³² निरमरौं³³। शूरै जाहि दशआकरै³⁴ करा ॥ सौहिं दृष्टि की हेरै³⁷ न जाई। जेहिदेखा सो रहा शिरनाई ॥ रुपसवाई दिन दिन चढ़ा। बिधि³⁸ सुरूप जगँ³⁹ ऊपरगढा ॥ दो० रूपवन्ते⁴⁰ मनमाथे चन्द्रघाट वह बाढ़ि। क़िला १ टूटना २ वादशाह ३ दुनिया का सूर्य्य ४ न्याय ५ पहिले ६ चाँवटी ७ नाम बादशाह ८ न्याय करनेवाला ६ न्याय १०-१२ बराबर ११ नाम खलीफ़ा १३ नाथना १४ राह १५-१७ शेर १६ दूधपानी १८ अलग १६ सच्चा २० ज़बरदस्त २१ बराबर २२ हमेशाज़िंदा २३ खूबसूरत २४ बयान करना २५ दुनिया २६-२६ चांद २७ ईश्वर २८ सूर्य्य ३० संसार ३१ बहा- दुर ३२-३५ मर्द ३३ पाकसाफ़ ३४ दशगुना ३६ सुधीनिगाह ३७ देखना ३८ ईश्वर ३६ दुनिया ४० खूबसूरत ४१ ॥

पद्मावत । ६ मेदने दरश लुभानी, अस्तुति बिनवै ठाढ़ि ॥ पुनि दातारँ दँई जगँ कीन्हा । अस जगँ दान न काहू दीन्हा ॥ बलि औ बिक्रम दानि बड़ कहे। हातिम करहिं बतागी अहे ॥ शेरशाह सरपोंचै न कोऊ । समुद्र सुमेरु भँडारी दोऊ ॥ दान दाँग बाजै दरबारा । कीरति गई समुन्दर पारा ॥ कंचन परस शेर जगँ भयो । दारिद भाग दशन्तर गयो ॥ जो कोइ जाय एक बेर माँगा । जन्म न होय न भूँखा नाँगा ॥ दश अश्वमेध जगतँ जो कीन्हा । दान पुन्य सरै सौहिं न चीन्हा ॥ दो० ऐसो दानि जगँ उपजौ, शेरशाह सुलतान । ना अस भयो न होय ना, कोई दै अरु दान ॥ तारीफ़ सय्यद अशरफ़ जहांगीर की ॥ सय्यद अशरफ़ पीर पियारा । जेहि मोहि पंथै दीन्ह उजियारा ॥ लेसा हिये प्रेम करि दिया । उठी ज्योति भानिरमलँ हियौँ ॥ मारगँ होत जो अँधेरा सूझा । भा उजेर सब जाना बूझा ॥ खीरसमुंद्र पाप मोर मेला । बोहितँ धर्म लीन्ह कै चेला ॥ उन मोर करँ बूड़ि कै गहा । पायो तीरै घाट जो अहा ॥ जाके ऐसो होय कँधारौँ । तुरत बेगि सो पावै पारा ॥ दस्तगीर गाढ़े कै साथै । वह अवगाहि दीन्ह जेहि हाथे ॥ दो० जहांगीर वयबिटी, निहकलंक जस चाँद । वय मखदूम जगतँ के, हो वह घर की बाँद ॥ १ आदमी १ तारीफ़ २ दान देनेवाला ३-६ ईश्वर ४ दुनिया ५-६-१७-२०-२२-३४ नाम राजा ७-८ नामसखी १० बराबर ११ पहाड़ का नाम १२ नगाड़ा १३ नेकनामी १४ पारसपत्थर १५ बहादुर १६ नाम जगह १८ घोड़ाकी यज्ञ १६ बराबर २१ पैदा हुआ २३ राह २४-२८ दिल २५-२७ पाक २६ नाव २६ हाथ ३० किनारा ३१ मल्लाह ३२ जल्द ३३ ॥

१० पद्मावत। तारीफ़ सय्यद अशरफ़ जहांगीर के बेटे की ॥ उनकर रतन १ एक निरमरा २। हाजी शेख सभा गुण भरा ॥ तेहि घर दुइ दीपक उजियारे। पन्थ ३ दये कहँ दई सँवारे ॥ शेख मुहम्मद पून्यों ४ करा। शेख कमाल जगत ५ निरमरा ६ ॥ दोउ अचल ध्रुव ७ डोलैं नाहीं। मेरु ८ खण्ड न भेवा ९ उपराहीं ॥ दीन्ह रूप अरु ज्योति गुसाईं। कीन्ह खम्भ दुइ जग १० की ताईं ॥ दोउ खम्भ टेके सब मही। दोनों के भार सृष्टि ११ सबरही ॥ जिन दरशन ओ परशन पाया। पाप हरा निरमल १२ भइ कायाँ ॥ दो० मुहम्मद तहां निचिंत पथै, जिन्ह सँग मुरशद पीर। झाहिरी नाव औ खेवकैं, बेगि १५ लागि सो तीर १६ ॥ गुरु मुहदी खेवकैं मैं सेवा। चली उताहल जेहिके खेवा ॥ अगुवा भयो शेख बुरहानू। पंथ १७ लाय म्वहिं दीन्हों ज्ञानू ॥ अलहदाद भल तिन्हकर गुरू। दीन दुनी रोशन सुर्खुरू ॥ सैद मुहम्मद के वै चेला। सिद्धपुरुष संग में जिन खेला ॥ दानयाल गुरु पन्थै लखाई। हजरत ख्वाजा खिजिर तेहिं पाई ॥ भये प्रसन्न वै हजरत ख्वाजे। ऐ मेरे जियैं सय्यद राजे ॥ वै सेवन मैं पाय करेते। अखरी जीभ प्रेम कब बरते ॥ दो० वै सुगुरू हौं चेला, नितैं २३ बिनवों भा चेर। उन हुत देखी पाउँ, दरश गुसाईं २४ केर ॥ एक नयनैं कवि मुहम्मद कने। सोई बिमोहौं जें कवि सुने ॥ १ जवाहिर २ साफ़ २-११ राह ३-१३ चांद ४ संसार ५ पाकसाफ़ ६ नाम सितारा ७ बीहड़ ८ दुनिया जहान ६-१० वदन १२ मंझाह १४ जल्द १५ कि- नारा १६ नाव खेनेवाला १७ राह १८-२१ मर्दकामिल १६ सत्संगत २० खुश २२ हमेशा विनती करना २३ ईश्वर २४ आंखें २५ मोहजाना २६ ॥

An exact line-by-line transcription of the provided page from Padmavat:

पद्मावत । ११ चांद जैसोजगं विधि$^१$ अवतारौ$^२$। दीन्ह कलंककीन्ह उजियारा॥ जग$^३$ सूझा एकै नयनाहां$^४$। उआशूक$^५$ जस नखतनमांहां॥ जौलहि अंबहि$^६$ डाभँ$^७$ नहोय। तौलहिसुगंध$^८$ बसाय न कोय॥ कीन्हि समुद्र जो पानी खारा। तौ अतिभयोअसूझि अपारं॥$^९$ जो सुमेरु$^{१०}$ त्रिशूल बिनाशा। भा कंचनगढ़ै$^{११}$ लाग अकाशा॥ जौलहिघरी कलंकै$^{१२}$ नहिं परा। कांच होय नहिं कंचन$^{१३}$ करा॥ ॥ दो० एकनयनँ जस दरपणं$^{१५}$, औ निरमलं$^{१६}$ तेहिभाव। सब रूपवंत$^{१७}$ पाँउगहि, मुखजोवने$^{१८}$ की चाव॥ चार मीतं$^{१९}$ कवि मुहम्मदपाये। जोरि मिताई$^{२०}$ सर पहुँचाये॥ यूसुफमलिकपंडितवहुज्ञानी। पहिली बात भेद उन जानी॥ पुनि सलारकादम मतिमाहां। खांडे शूर उभानेतं बाहां॥$^{२१}$ मिया सलोनी सिंहंबरयारू$^{२३}$। वीरकहत रणखड़गे$^{२४}$ जुझारू॥ शेखबड़ीवड़िसिद्धि$^{२५}$ बखानों। कें अदेश सिद्धि बड़ बानी॥$^{२६}$ चाखो चतुरदर्शो गुण पढ़े। औसिंहं योगगुसाईं$^{२६}$ गढ़े॥$^{३०}$ वृक्ष$^{३१}$ होय जो चन्दन पासा। चन्दनहोय विविधतेहिवासा॥ दो० मुहम्मद चाखोमीतं$^{३२}$ मिलि, भये जो एकैचित्त। यहजगँ साथ जो बैठे, वहजगै$^{३३}$ बिछुरन कित्त॥ जायसनगर धर्म$^{३४}$ अस्थानू$^{३५}$। तहांजायकवि कीन्ह बखानू॥$^{३६}$ औबिनती$^{३७}$ पंडितनसोभजा। टूटिसँवारे मेरु बहु सजा॥$^{३८}$ दुनिया १ ईश्वर २ पैदा किया ३ संसार ४ आंखें ५ नामसितारा ६ आंब ७ दाग़ ८ खुशबू ६ जिसका किनारा न हो १० नामपहाड़ जिसको महादेवजीने त्रिशूलसे खोदा या ११ सोनेका क़िला १२ दाग़ १३ सोना खालिस १४ आँख १५ आईना १६ पाकसाफ़ १७ खूबसूरत १८ मुंह देखना १६ दोस्त २० दोस्ती २१ तलवार बहादुर २२ बलन्दहाथ २३ शेर ज़बरदस्त २४ तलवार २५ मर्दकामिल २६ मशहूर २७ चौदहों विद्या के जाननेवाले २८ शेर २६ ईश्वर ३० पेड़ ३१ यार ३२ दुनिया ३३-३४ मकान ३५ बयानफरमा ३६ आज़ज़ी ३७ सब तरह आरास्ता ३८॥

१२ पद्मावत । हौं पण्डितन केर पछलगाँ । कछुकहि चलाँ तबलडीडेगा ॥ हियँ भंडारंग अहे जो पूँजी । खोली जीभ तारकी कूँजी ॥ रतनैं पदारथ बोलें बोला । सुरसैं प्रेममधुँ भरी अमोला ॥ जेहिकी बोल बिरहकी घाया । कहँतेहि भूख कहां तेहिमाया ॥ फेरै भेर्व रहै भा तपाँ । धूर लपेटा मानिकैं छुपा ॥ दो० मुहम्मद कबिजो प्रेमकी, नातन रक्त न मांस । जैं मुखदेखा सो हँसा, सुनि तेहि आये आंस ॥ सैंनैं नवसै सत्ताइस अहै । कथा अरम्भैं वेनकवि कहै ॥ सिंहल दीप पद्मिनी रानी । रतनसेन चित्तौरगढ़ आनी ॥ अलाउद्दीन देहली सुल्तानू । राघव चेतन कीन्ह बखानू ॥ सुना शाह गेंढै छेंका आई । हिन्दू तुरकहि भई लड़ाई ॥ आँदिअन्त जस कथा अहै । लिखि भाषा चौपाई कहै ॥ कबि ब्यास रस कँवला पुरी । दूरहिं नेरे नेरे दूरी ॥ नेरे दूर फल जस कांटा । दूर जो नेरे जस गुड़ चांटों ॥ दो० भँवर आय वनखण्डँ सो, लेइ कमलकी वास । दादुरैं वास न पावै, फूलहिजो आछी पास ॥ सिंहल दीप कथा अब गाऊँ । औ सुपद्मिनी बैंरणि सुनाऊँ ॥ निरमर्ले दरपणँ भांतिबिशेखा । जिन्ह जसरूप सोतैसो देखा ॥ धनिसोद्वीप जिन्ह दीपक बारे। औ सुपद्मिनी जोड़ई २१ सँवारे॥ सात दीप बैंरैणे सब लोगू । एकौ द्वीप न वहिसँर योगू ॥ दया दीन नहिंतस उजियारा । सरनद्वीप सर होय न पारा ॥ ढोलबजायके १ दिल २ ज़वांहिर ३ मीठे मुहब्बतके भरेहुये ४ शराब ५ सूरत बदले हुये ६ तप करनेवाले ७ मोती वगैरह ८ खून ६ शुरूकरना १० नाम भाट ११ बयान करना १२ क़िला १३ अव्वल से आखिर तक १४ चींटी १५ जंगल १६ मेंढ़क १७ तारीफ़ करना १८ साफ़ १६ शीशा की तरह २० ईश्वर २१ बयान २२ बराबर २३॥

पद्मावत। १३ जम्बू दीप कहूँ तस नाईं। लङ्कदीप संरपोच न भाई ॥ दीपगुस सहल आरण परा। दीपमहो सिंहल बाँस हरा ॥ ॥ दो० ॥ सत्र संसार औ पृथिवी, आये सातो दीप। एक दीप नहिं आतिम, सिंहल दीप समीप॥ गन्धर्वसेन सुगन्ध नरेशू। सो राजा वह ताकर देशू ॥ लंका सुना जो रावण राजू। तेहु जाहि बर ताकर साजू ॥ छप्पन कोटकटकै दलसाजा। सबै छत्रपति औ गढ़राजा ॥ सोरह सहसै घोड़ घुड़शारों। श्यार्मकरणजसत्रांक तुपारा ॥ सात सहसै हस्ती सिंहली। ईम कैलासं ऐरापति बली ॥ अश्वपतिक शिर मौर कहावे। गजपतीकै अँकुशगर्जै नावे॥ नरपतीकै कहुँ और नरिन्दू। भूपतीक जगे दूसरइन्दू ॥ दो० ऐसो चकैवे राजा, चेहूँखण्ड भू होय । सबै आय शिरनावहीं, सरबर करी न कोय ॥ जोहि दीप नेरे भा जाय। जनु कैलास तीर भा आय ॥ गहन अंबरोंउ लागचहुँपासा। उठी भूमि हतिलागि प्रकासा॥ तरखेरै सबै मलयँगिरि लाये। भइजगछाहिं र्यनि है आये ॥ मिली सुमेर सुहाई छोहां। जेठ जाड़लागै तेहि माहां ॥ वही छाहिं र्यनि है आवै। हरियर सबै प्रकास देखावै ॥ पन्थकै जो पहुँचे सहि घामू। दुख बिसरे सुखहोय विश्रामू ॥ जिन्ह वह पाई छाहिं अनूपों। फिरि न आय सही यहिधूप॥ बराबर १ राजा २ फौज ३ हजार ४-७ अस्तवल ५ घोड़े की जात ६ हाथी ८ बराबर ६ नाम पहाड़ १० नाम हाथी राजा इन्द्र ११ घोड़े सवार १२ हाथी सवार १३ हाथी १४ राजा १५-१६-१७ दुनिया १८ राजा इन्द्र १६ चक्रवर्त्ती २० तमाम दुनिया २१ बराबर २२ नाम पहाड़ २३ गुंजान २४ बाग २५ ज़मीन २६ पेड़ २७ चन्दन २८ रात्रि २६-३१ पहाड़ ३० मुसाफ़िर ३२ आराम ३३ बेमिसाल ३४ ॥

१४ पद्मावत। दो० अस अँबराउँ सघनघन, बरणि न पारौं अन्त। फरी फूली छयों ऋतु, जानहु सदा वसन्त॥ फरे अम्ब अति सघन सुहाये। औ जसफरी औधिक शिरनाये॥ कटहर दार पेड़ सो पाके। बड़हर सो अनूप अतिताके॥ खिरनी पाकर खांड़ अस मीठी। जामुनपाक भँवर अस दीठी॥ तरवर फरे फरे खरहरे। फरे जानि इन्द्रासन परे॥ पुनि महुवा चुव अधिकै मिठासू। मँधु जसमीठ पुहुप जसवासू॥ और खजहजाँ उनकर नाउँ। देखा सब रानी अँवराउँ॥ लागि सबै जस अमृत शाखा। रहै लुभाय सोई जो चाखा॥ दो० लवँग सुपारी जायफल, सब फल फरे अपूर। आस पास घन ईमली, औ घन तार खजूर॥ बसहिं पंखे बोलहिं बहु भाखा। करहिं हुलासैं देखिके शाखा॥ भोरहोत बांसहिं चहि चुँहीं। बोलहिं पांडुकें एके तुहीं॥ सारो सुर्वा जो रहचहिं करहीं। करहिं पखेरूँ और करोरहीं॥ पिव पिवकर जो लाग पपीहा। तुही तुहीकर गड़रूँ केंहा॥ कुहू कुहू कर कोयल राखा। औ बिहँगराजे बोल बहुभाखा॥ दही दही करि महरि पुकारा। हारिल अपनी बोली हारा॥ कुहकहिं मोर सोहावन लागा। होय कराहर बोलहिं कागा॥ दो० जानवन्त पक्षी बनके, फिरि बैठे अँवराउँ²⁰। अपनी अपनी भाषना, लीन्ह दई²¹ करनाउँ॥ पैगें²² पैगें²³ पर कुँवा बावरी। साजी बैठकें औ पावरी²५॥ वारा १-८ बयान २ बहुत ३-४ शहद ५ फूल ६ नाम मेवा ७ गुंजान ८-१० चिड़ियाँ ११ खुशी करना १२ नाम चिड़ियाँ १३-१४ सारस १५ तोता १६ नाम चिड़ियाँ १७-१८ दहियड़ १६ बाग २० ईश्वर २१ क़दम २२-२३ बैठक २४ जीना २५॥

और कुंड बहु ठावहिं ठाऊँ। सर्व तीरथ औ तेहिके नाऊँ ॥ मठ मण्डप चहुँ पास सँवारे। तपी १ जपी २ सब आसन मारे ॥ कोई सुऋषीश्वर कोई संन्यासी। कोई रामयती ६ कोई बिेशवासी ॥ कोई ब्रह्मचर्य पंथ ८ लागे। कोई सो दिगम्बर अचिरैं नागे ॥ कोई सुमहेरवरे योगी ११ यती १२ । कोई एक परखै देवी सती ॥ कोई सरस्वती १७ संत कोई योगी १८। कोई निराशैं पंथ बैठि बियोगी १९॥ दो० सेवरो खेवनों वानप्रस्थी, २१ शिष साधक २२ अवधूत २३। आसन मारे बैठि सब, पांच आत्मा भूत ॥ मानसरोवरै वरणौं २५ काहा। भरा समुद्र अस अति अवगाहा ॥ जल मोती अस निरमले तासू। अमृतबरन कपूरसुबासू ॥ लंकदीपकी शिला अनीई। बांधा सरवर घाट बनाई ॥ खण्ड खण्ड सीढ़ी भुइँ घेरे। उतरहिं चढ़हिं लोग चहुँ फेरे॥ फूला कमल रहा है रातो ३०। सहसैं सहस पखिन ३२ के छाता॥ उलटहिं सीप मोति उतराहीं। चुनहिं हंस औ केलि कराहीं ॥ खनि पतार पानी तहिं काढ़ा। क्षीरसमुद्र निकस तहँ ठाढ़ा ॥ दो० ऊपर पाल चहूँदिशैं, अमृत फल सब रूख। देखि रूप सरवरै का, गई पियास औ भूख ॥ पानि भरी आवहिं पनिहारीं। रूपस्वरूप पद्मिनी नारीं ॥ पद्मगन्ध तिन अङ्ग बसाहीं। भँवर लागि तिन संग फिराहीं ॥ लंकसिंहिनीसारंग ३८ नयनी ३९। हंसगामिनी ४० कोकिलबयनी ४२॥ जगह १-२ तप करनेवाले ३ जप करनेवाले ४ क़िस्म योगियोंकी ५-६ ७-८-१०-११ राह ६ क़िस्म योगी १२-१३-१४-१५-१६-१७-१८-१९ २०-२१-२२-२३ नाम तालाब २४ तारीफ़ २५ बहुत गहिरा २६ साफ़ २७ रंग २८ खुशबू २६ तालाब ३० सुर्ख ३१ हज़ार ३२ चिड़ियाँ ३३ चारोंतरफ़ ३४ नामतालाब ३५ कमलकी खुशबू ३६ बदन ३७ कमर शेरनी की तरह ३८ हिरण ३६ आँख ४० चाल ४१ आवाज़ ४२ ॥

१६ पद्मावत। आवहिंझुण्डसोपांतिहिपांती। गवनें१सुहायसुभांतिहि२ भांती॥ कनक३कलश४मुखचन्ददिपाहीं। रहसकेलिसे आवहिंजाहीं॥ जासों वै हेरें७ चखें नारी। बांके नयन जनुहनहिं कटारी॥ केशॆं मेघवर शिर ता पाहीं। चमकहिंदशनैं१० वीजुं११ कीनाईं॥ दो० माथे कनकॆं१२ गागरी, आवहिं रूप अनूपैं१३। जेहिकी ये पनिहारी, ती रानी केहि रूप॥ तालतलावा बरणि१४न जाहीं। सूझै वारपार कुछ नाहीं॥ फूलीकुमुदि१५केति१६ उजियारो।मानहुँ उये गगनैं महँ तारे॥ उतरहिं मेघ चढ़हिं लै पानी। चमकहिं मच्छवीर्जु कीवानी॥ तैरहिंपंखी१८सुसंगहि संगा। श्वेतें पीतैं२१ राती२२ बहु रंगा॥ चकई चकवा केलि कराहीं। निशौँ विछोहदिनहिंमिलिजाहीं॥ करलहिंसारस करहिं हुलासा। जीवन मरनसुएकहिं पासा॥ कम्पासो२५ डहनकें बकें लेदी२८। रही अपूरमीन२९ जलभेदी॥ दो० नगअमोल तेहितालहि, दिनहिंवरहिं जसदीप। जो मरजिया होयतेहि, सो पावै वह सीप॥ आसपास बहु अमृत बौरी। फरीं अपूर होय रखवारी॥ नारँग नींबूर तुरंज जँभीरा। औ बदाम बहु बेद अँजीरा॥ गुलंगुल तुरंज सदाफर फरे। नारँग अति रौंती रस भरे॥ किसमिस सेव फरे नौ बाता। दाड़िमैं दाख देखि मनराताँ॥ लागि सुहाई हरफारेवरी। उनयरहीं केला की घौरी॥ चलना १ तरह २ सोना ३ घड़ा ४ चमकना ५ खुशी से उछलती कूदती ६ देखना ७ आँख ८-६ बाल १० दाँत ११ त्रिजुली १२-१६ सोना १३ बेमिसाल १४ तारीफ़करना १५ कोकांवली १६ नामनखत १७ आसमान १८ चिड़िया २० सफ़ेद २१ पीली २२ लाल २३ रात्रि २४ नामजानवरपरिन्द मछली पकड़ कर खाजानेवाले २५-२६-२७-२८मछली २६ बागीचा ३०लाल ३१-३३ अनार ३२॥

पद्मावत। १७ फरीतूत कमरख औ ब्योजौँ । राय करौंदा बेर चिरौंजी ॥ सुगन्धराव छुहारा दीठे १। और खजहजाँ २ खाटे मीठे ॥ दो० पानि देहिं खण्डवॉनी ३, कुवहिं खांड़ नहिं भेल । लागी घरी रँहँटकी, सींचहिं अमृत बेल ॥ पुनि फुलवारि लाग चहुँपासा । बृक्षे ४ बेदहिचन्दन झइबासा ॥ बहुत फूल फूली घन बेली । क्यौँड़ा चम्पा गोंद ६ चमेली ॥ सुरंग गुलाल क़दम औ गूजा । सुगंध बकोरी गन्धब पूजा ॥ जाहीजूही बर्गचन लावा । पहुपं ५ सुदरसन लागसुहावा ॥ नागेसर सदबँर्ग ७ हवारी । औ शिंगारहार फुलवारी ॥ सुमन जर्द बहु खिली सेवती । रूपमंजरी और मालती ॥ मोलसिरी बेली औ करना । सबै फूल फूले बहु बरना ॥ दो० तेहि शिर फूल चढ़हिं वै, जेहि माथे मन भाग । आह्नेह सदा सुगन्धबहै, जनु बसंत औ फाग ॥ सिंहलनगर दीख पुनि बसा । धनिराजा अस जाकर दसा ॥ ऊँची पँवरी ८ ऊँच उड़ासाँ ९ । जनु कैलास इन्द्रकर बासा ॥ राउ रंक सब घर घर सुखी । जो देखे सो हँसता मुखी ॥ रचि रचि साजे चन्दन चूरा । मोती अगरे १० मैद करपूरा ॥ सब चौपारहिं चन्दन खँभा । तहिं राजा तब बैठो सभा ॥ जनु सभा देवतहिं की जुरी । परी दृष्टि ११ इन्द्रासन पूरी ॥ सबै गुणी औ पण्डित ज्ञाता । संस्कृते १२ सबके मुख राताँ १३॥ दो० अलखहिं १४ पन्थ सँवारैं, जनु शिवलोक अनूपं १५ । घरघरनारिपद्मिनीमोहहिं, सबअपसरनैं १६ केरुप १७॥ नाम मेवा १ देखना २ खजूर ३ माली ४ पेड़ ५ फूल ६ गेंदा ७ रंगबरंग ८ जीना ९ महल १० केसर ११ निगाह १२ संस्कृत जबानके सब बोलनेवाले १३ लाल १४ ईश्वरकोराह १५ बेमिसाल १६ स्वर्गकी औरतें १७ ॥

१८ पद्मावत। पुनि देखी सिंहलकी बाटो। नवोनिद्धि लक्ष्मी सबहाटोँ ॥ कनकें हाटैं सबकुहकेंहिं लीपी। बैठि महाजन सिंहलद्विपी ॥ रचीहतोड़ाँ रूप न ढारे। चित्र कटावअनेक सँवारे ॥ सोनरूप भल भयो पसारा। धवलैशिरिपोतहिं घरवारा ॥ रतनें पदारथमाणिकैं मोती। हीरालाल सँवारे जोती ॥ औ कपूर बेना कस्तूरी। चन्दन अगर रहा भरिपूरी ॥ जिनयहिहाँटैन लीन्हविसाहाँ। तिनकहँआनहाँट कितलाहाँ॥ दो० कोई करै विसाहना, काहू केर विकाय। कोई चलै लाभ सों, कोई मूर गँवाय ॥ पुनि सुशृंगार हाँटै भलदेखा। किये शृंगार बैठितहँ वेश्याँ ॥ मुख बीरी शिरचीर कुसुम्भी। काननकनकें जड़ाउखुम्भी ॥ हाथबीन पुनि मृगौँ भुलाहीं। नरमोहहिंसुनिपैगँ न जाहीं॥ भौंहधनुष तेहि नयनैँ अँहेरी। मारहिं बाणसान सों हेरी ॥ अलकैं कपोलैँ होलहँसदेहीं। लाय कटाक्ष मारजनु लेहीं ॥ कुचैँ कंचुकैँ जानहिंजगैं सारे। अंचल दीन्ह सुभावहि टारे ॥ केते खेलार हार तेहि पांसा। हाथ झारि उठिचले निरासा ॥ दो० चेटक लाय हरहिं मन, जबलहिहैं गाँठिफेट। सांटै नाट पुनि भई बटराऊँ, ना पहिचान न भेट॥ लैके फूल बैठि फुलहारी । प्रान अपूरव घरे सँवारी ॥ राह १ दुनियाकी दौलत २ बाजार ३-५-१५-१७-२१ सोना ४-२३ केसर ६ दसनी ७ मुसव्वरी ८ बहुत ९ आरास्ता १० चूना ११ जवा- हिर १२ मूंगा १३ मुश्क १४ मोललेना १६ फ़ायदा १८-२० खरीदारी १६ तवायफ़ २२ बाल २४ हिरण २५ कदम २६ आंख २७ शिकारी २८ देखना २६ बाल ३० गाल ३१ छाती ३२ अँगिया ३३ संसार ३४'जादू ३५ मुफ़लिस ३६ मुसाफिर ३७ माली ३८ ॥

पद्मावत। १६ सोंधौ सबे बैठि ले कांधे। भल कपूर खैरी² बांधे ॥ कतहूँ पण्डित पढ़ें पुराना। धर्मपंथ कर करहिं बखानों ॥ कतहूँ कथा कहै कुछ कोई। कतहूँ नाच कूद भल होई ॥ कतहूँ चरहटौ पंखी लावा। कतहूँ पाखंड नाच नचावा ॥ कतहूँ नाद शब्दैं हो भला। कतहूँ नाटक चेटर्क कला ॥ कतहूँ काहु ठगविद्या लाय। कतहूँ मानुष लीन बोराय ॥ दो० उरपंत चोरदूंते गठछोरा, मिलेरहहिं तेहिपांच। जोबहुभांतिसजगैं भाअगमन, गंठै ताकरपैबांच ॥ पुनि आई सिंहल गढ़पासा। कावरणों १४ जनुलाग अकासा॥ तरहिं१५ करहिंवासुकि१६ कीपीठी। ऊपर इन्द्रलोकपर दीठी१७॥ परखोहैं चहुँदिशि सबबांका। कांपैजांघ जायनहिं झांका॥ अगम असूक देखि डरखाये। परै सुसप्तै पतारहिं जाये ॥ नवँ पँवरी२१ बांकी नवखण्डा। नवो जो चढ़े जायब्रह्मण्डा॥ कंचनकोट२२ जड़े नगशीशा। नखतहिंभरीबीजैं पुनिदीशा॥ लङ्काजाहिऊँचगढ़ ताका। निरखि२५ न जाय दृष्टि२६ मनथाका॥ दो० हियैं नसमायदृष्टि२७ नहिं पहुँचै, जानहिंठाढ़सुमेरै२८। कहँलग कहौं उँचाई, कहँलग बरणों३० फेर ॥ ततगढवाणिजैं३१ चलैजगसूरू। नाहिंत होयवाजि३२ रथचूरू ॥ पँवरी३३ नवों वज्र३४ की साजे। सहसैं सहसैं तहँ बैठे पाजे३७॥ हलवाई १ लड्डू २ राह ३ वयान करना ४ बाज़ार ५ गाना ६ आवाज़ ७ करनाटक ८ जादू ९ मकार १० चुगुल ११ होशियार १२ गांठी १३ तारीफ़ १४ जड़ १५ नामसांप १६ देखना १७-२५ खाई १८ चारौंतरफ़ १६ मुश्किल २० सीढ़ी २१ सोनेका क़िला २२ बिजुली २३ क़िला २४ नज़र २६ दिल २७ निगाह २८नामपहाड़ २९ तारीफ़ ३० सौदागर ३१ घोड़ा ३२ मकान ३३ पत्थर ३४ हज़ार ३५-३६ पियादा ३७॥

फिरैं पांच कुतवार सुभँवरी । काँपै पाउँ चापत वे पँवेरी ॥ पँवेरिहिं पँवेरि सिंह गढ़गाढ़े । डरपहिं रायं देखि तहँ ठाढ़े ॥ बहु बनाव वे नाहर गढ़े । जनु गाजहिं नाहहिं शिर चढ़े ॥ टारहिं पूँछ पसारें जीहा । कुंजर डराहिं कि गंजरलीहा ॥ कनक शिलागढ़ सीढ़ी लाई । जगमगाहिं गढ़ ऊपर ताई ॥ दो० नवौखण्ड नवपँवेरी, औतहँ बज्र केवार । चार बसेरे सो चढ़े, सुनै सो उतरै पार ॥ नवँपँवरी पर दसौंदुवारा । तेहिपर बाजिगह बरियारा ॥ घड़ी सो बैठि गिनै घरियारी । भरी मु अपनी अपनी वारी ॥ जोहि घड़ी पूजे वह मारा । घड़ी घड़ी घरियार पुकारा ॥ मरा जो डांड़ै जगतैं सब डांड़ा । का निश्चिन्त माटीकर भांड़ा ॥ तुम तेहि चाक चढ़ेहो कांची । अबहिं न फिरी नथिरह्वै बांची ॥ घड़ी जो भरी घटी तुम आऊँ । का निश्चिन्त सोवे जो बटाऊँ ॥ पहरहि पहरगूजर नितें होई । हिया न सोगा जागन सोई ॥ दो० मुहम्मदज्यों जल भरत, रहँटघड़ी की रीति । घड़ीजो आई ज्यों भरी, ढरी जन्म गा बीति ॥ गढ़परनीर खीर दुइनदी । पानि भरेँ जैसे सुरपदी ॥ और कुण्ड एक मोती चूरू । पानी अमृत कीच कपूरू ॥ वहां का पानी राजा पिया । वृद्धे होय न हिं जबलग जिया ॥ कंचनबृक्ष एक तेहि पासा । जस कल्पतरु इन्द्र कैलासा ॥ महल १-२-३ शेर ४ मर्द ५ शेर ६ हाथी गस्त ७ सोना ८ किला ९ मकान १० पत्थर ११ मुक़ाम १२ सच्चाई १३ नव मकान तथा आंख कान नाक मुंह गुदा लिंग नवइंद्री बदनकी १४ दशवां दरवाज़ा तथा ब्रह्माएड १५ घाटा १६ दुनिया १७ ग़ाफ़िल १८-२१ आदमी १९ उमर २० मुसाफ़िर २२ हमेशा २३ पानी २४ दूध २५ बूढ़ा २६ सोनेकापेड़ २७ नाम दरख्त जो स्वर्गलोक में है २८ ॥

पद्मावत। २१ मूले^१ पतार स्वर्ग^२ वहशाखा। अमरबेलिको पावको चाखा॥ चन्द्रपातै^३ औ फूल तरोंईं। होयउजियार नगर जहँताईं॥ वैफल पावै तप करि कोई। बृद्धखाय नवयौवनै^४ होई॥ दो० राजा भये भिखारी सुनि वह अमृत भोग। जेपावा सो अमर भा, न कुछ व्याधि नहिं रोग॥ गढ़ै^६ पर बसहिं चारै^७ गढ़पती^८। अश्वपँगजंपमुवपं^९ नरंपैती^१०॥ सबकधौरहरे^११ सोने साजा। औ अपने अपने घर राजा॥ रूपवन्ते^१२ धनवन्ते^१३ सभोगी। परसैंपषाणपवँरै^१५ तेहिलागी॥ भोग परसैं सदा सबमाना। दुख चिन्ता कोई नहिं जाना॥ मँदिर मँदिर सबके चौपारी। बैठि कुँवर सबखेलहिं सोरी॥ पांसा ढरहिं खेल भल होई। स्वर्ग वान सरपूंजनं कोई॥ भाटबरन केहिं कीरति^२२ भली। पावहिं हस्तिं^२३ घोड़ सिंहली॥ दो० मँदिर मँदिर सबकी फुलवारी, चोवा चन्दन बास। निशि^२४ दिनरहै वसन्तवहँ, छहऋतुबारहमास॥ पुनि चलि देखा राजदुवारा। मानुषफिरहिं पायनहिंबारों॥ हस्तिं सिंहली बांधे बारैं^२४। जनुसजीव^२५ सबठाढ़ पहारा॥ कवन्योश्वेतै^२८ पीतैं रतनौरे। कवन्योहरे धूमैं असकारे॥ बरनेंबरन गगनैं^३३ जसमेघा। उठहिं गगनैं^३५ बैठिजनुठेघाँ॥ सिंहल के बरने^३७ सिंहले। इकइक चाहसो इकइकबले॥ जड़ १ आसमान २ पत्ता ३ नखत ४ नवजवान ५ हमेशा ६ क़िला ७ घोड़ेका सवार ८ हाथीका सवार ९ ज़मीनका मालिक १० राजा ११ महल १२ खूबसूरत १३ दौलतमन्द १४ नसीबवर १५ पारस पत्थर १६ दरवाज़ा १७-२७ हँसीखुशी १८ चौसर १९ बराबरी २० तारीफ़ २१ नेकनामी २२ हाथी २३-२६ रात्रि २४ दखल २५ जानदार २८ सफ़ेद २९ ज़र्द ३० लाल ३१ धुंवां ३२ रंगबैरंग ३३ आसमान ३४-३५ पहाड़ ३६ बयान करना ३७॥