पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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का जो विचार किया गया है, वहां सभी जगह यह परिपाटी रक्खी है कि—उभयात्मक आत्मा से [ वर्णन करना ] प्रारम्भ करके पीछे से कूटस्थ को शेष रख लिया जाता है। [अन्तः- करण उपाधि वाले आत्मा से प्रारम्भ करके, केवल प्रज्ञानरूपी कूटस्थ को शेष रख लिया जाता है। इन सब श्रुतियों के विचार से यही सिद्ध होता है कि जो उभयात्मक भोक्ता है वह तो मिथ्या होता है, तथा जो पारमार्थिक असङ्ग कूटस्थ है वह अभोक्ता ही है]। कूटस्थसत्यतां स्वस्मिन्नध्यस्यात्मविवेकतः। तात्त्विकीं भोक्तृतां मत्वा न कदाचिज्जिहासति ॥२००॥ भोक्ता कहाने वाला यह जब अपने अविवेक के कारण, अपने और कूटस्थ के विवेक को भूल जाता है, तब कूटस्थ की सत्यता का अपने में अध्यास कर लेता है और उस सत्यता के द्वारा अपने भोक्तापन को भी सत्य ही मान बैठता है। बस फिर तो वह कभी भी भोगों को छोड़ना नहीं चाहता। [वह समझता है कि मुझ में भोक्तापन सदा रहता है, मुझे भोगों की ज़रूरत सदा ही रहती है, इस भ्रान्त विचार में आकर अब वह भोगों को छोड़ना नहीं चाहता है]। भोक्ता स्वस्यैव भोगाय पतिजायादिमिच्छति। एष लौकिकवृत्तान्तः श्रुत्या सम्यगनूदितः ॥२०१॥ लोक में जो भोक्ता प्रसिद्ध है, वह अपने ही भोग के लिये पति या पत्नी आदि भोगसामग्री को चाहा करता है। इस लौकिक वृत्तान्त का ही श्रुति ने केवल अनुवाद कर दिया है। उसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि—इन भोगों को कूटस्थ
तृप्तिदीपप्रकरणम् २९५
तृप्तिदीपप्रकरणम् २९५ आत्मा का उपकरण बता दिया जाय। लोक में जो उभयात्मक भोक्ता प्रसिद्ध है ये भोगोपकरण उसी के शेष हैं, इस बात का श्रुति ने अनुवाद भर किया है। इन भोगों को शुद्ध आत्मतत्त्व का शेष सिद्ध करने में श्रुति का अभिप्राय कदापि नहीं है]। भोग्यानां भोक्तृशेषत्वान्माभोग्येष्वनुरज्यत्ताम् । भोक्त्र्येव प्रधानेऽतोऽनुरागं तं विधित्सति ॥२०२॥ भोग्य जो पति पत्नी आदि पदार्थ हैं, वे सब भोक्ता ही के उपकरण हैं [जो भूल से अपने को भोक्ता मान रहा है ये उसी के काम के हैं। जो अपने को भोक्ता नहीं समझता वे भोग उसके किसी भी काम के नहीं हैं ] यह समझ कर भोगों में अनुराग नहीं करना चाहिये। किन्तु अपना अनुराग प्रधानभूत भोक्ता में ही रखना चाहिये, वह श्रुति बस यही बात लोगों को बताना चाहती थी। या प्रीतिरविवेकानां विषयेष्वनपायिनी । त्वामनुस्मरतः सा मे हृदयान्मापसर्पतु ॥२०३॥ जो लोग अविवेकी हैं, जिन्हें आत्मतत्त्व का ज्ञान नहीं है, उनकी विषयों में जैसी दृढ भक्ति होती है विषयों के प्रति वैसी दृढ भक्ति हे लक्ष्मीपते ! तेरा सदा चिन्तन करते हुए मेरे मन में से निकल कर भाग जाय [मेरा मन विषयों की आसक्ति को छोड़ कर सदा तुम्हीं में रहने लगे]। अथवा—अविवेकी लोगों को विषयों में जैसी दृढ प्रीति हो रही है तेरा स्मरण करने वाले मेरे हृदय में से तेरी वैसी दृढ प्रीति कभी भी न जाय [तेरे लिए वैसा दृढ अनुराग मेरे हृदय में सदा ही बना रहे]।
है उस प्रेम को भोक्ता आत्मा में ही समेट कर अब यह विवेकी
२१६ पञ्चदशी इति न्यायेन सर्वस्माद् भोग्य जाताद् विरक्तधीः । उपसंहृत्य तां प्रीतिं भोक्त्र्येव बुभुत्सते ॥२०४॥ ऊपर कहे प्रकार से, पति पत्नी आदि सभी भोग्य पदार्थों से विरक्त होकर, भोग्य पदार्थों में हमारा जो प्रेम बिखरा पड़ा है उस प्रेम को भोक्ता आत्मा में ही समेट कर अब यह विवेकी इसी आत्मतत्व को जानना चाहता है [ कि यह आत्मतत्व कैसा है ? ] स्रक्चन्दनवधूवस्त्रसुवर्णादिषु पामरः । अप्रमत्तो यथा, तद्वन्न प्रमाद्यति भोक्तरि ॥२०५॥ पामर प्राणी जैसे माला, चन्दन, पत्नी, वस्त्र तथा सुवर्ण आदि पदार्थों [के कमाने और उनकी रक्षा करने] में सावधान रहता है,[दिन रात जुटा रहता है—इनके कमाने आदि में दिन- रात एक कर देता है] मुमुक्षु पुरुष की यह पहचान है कि— वह भी इसी तरह, आत्मतत्व के विषय में कभी प्रमाद नहीं करता । वह सदा उसी का चिन्तन करता रहता है । [उस पर इसी प्रकार आत्मतत्व का स्पष्ट दर्शन कर लेने की धुन सवार हो जाती है ] । काव्यनाटकतर्कादिमभ्यस्यति निरन्तरम् । विजिगीषुर्यथा, तद्वन्मुमुक्षुः स्वं विचारयेत् ॥२०६॥ विजिगीषु पुरुष जिस प्रकार सदा काव्य, नाटक तथा तर्क आदि का अभ्यास किया करता है, मुमुक्षु लोग भी ऐसी ही लगन से सदा अपने आत्मा का विचार किया करें । जपयागोपासनादि कुरुते श्रद्धया यथा । स्वर्गादिवाञ्छया, तद्वच्छ्रद्दध्यात् स्वे मुमुक्षया ॥२०७॥
तृप्तिदीपप्रकरणम् २१७
तृप्तिदीपप्रकरणम् २१७ जिस प्रकार वैदिक लोग, स्वर्ग आदि की इच्छा को लेकर उसके साधन जप याग या उपासना आदि को श्रद्धापूर्वक किया करते हैं, इसी प्रकार मुमुक्षु लोग भी, केवल मोक्ष की अभि- लाषा को लेकर, अपने आत्मा पर ही विश्वास करें [विषयों पर श्रद्धा करना छोड़ दें]। चित्तैकाग्र्यं यथा योगी महायासेन साधयेत् । अणिमादिप्रेप्सयैवं विविच्यात् स्वं मुमुक्षया ॥२०८॥ जिस प्रकार योगी लोग, अणिमा आदि ऐश्वर्य पाने के लिए, बड़े भारी प्रयत्न से चित्त को एकाग्र किया करते हैं, इसी प्रकार प्रत्येक समझदार आदमी मोक्ष की इच्छा को लेकर, सदा ही अपने आत्मा का विवेक किया करे [इस अपने आत्मा को देहादियों से पृथक् पहचान ले। इसको देहादियों में रिला मिला न रहने दे]। कौशलानि विवर्धन्ते तेषामभ्यासपाटवात् । यथा तद्वद्विवेकोऽस्याप्यभ्यासाद् विशदायते ॥२०९॥ अभ्यास की पटुता से जैसे इन काव्यादि का अभ्यास करने वाले लोगों की चतुरता उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है, इसी प्रकार अभ्यास करते करते इस मुमुक्षु का विवेक [देहादियों से आत्मा का भेदज्ञान] भी निखरने लगता है। विविञ्चता भोक्तृतत्त्वं जाग्रदादिष्वसंगता । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां साक्षिण्यध्यवसीयते ॥२१०॥ अन्वयव्यतिरेक नाम की युक्ति के सहारे से, जब कोई पुरुष भोक्ता के पारमार्थिक स्वरूप को, भोग्य पदार्थों से पृथक् १९
२१८ पञ्चदशी पहचान लेता है, तब फिर उस पुरुष को जाग्रदादि सभी अव- स्थाओं में साक्षी तत्व के असंगपने का निश्चय हो जाता है। यत्र यद् दृश्यते द्रष्ट्रा जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु । तत्रैव तन्नेतरत्रेत्यनुभूतिर्हि संमता ॥२११॥ यह द्रष्टा, जाग्रत् स्वप्न और सुषुप्ति में क्रम से जिन [स्थूल सूक्ष्म और आनन्द नाम के] भोग्यों को अनुभव किया करता है, वे भोग्य पदार्थ केवल उन ही अवस्थाओं में हुआ करते हैं। [दूसरी अवस्थाओं के आजाने पर वे भोग्य पदार्थ नहीं रहते] परन्तु इन तीनों अवस्थाओं में अनुगत रहने वाला जो इनका द्रष्टा है, वह तो इन सब से पृथक् ही है यह अनुभव तो सभी को सम्मत है। स यत्तत्रेक्षते किंचित्तेनानन्वागतो भवेत् । दृष्ट्वैव पुण्यं पापं चेत्येवं श्रुतिषु डिण्डिमः ॥२१२॥ ‘स यत्तत्र किंचित् पश्यति अनन्वागतस्तेन भवति, असंगोह्ययं पुरुषः सवाएष एतस्मिन् संप्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं पापं च पुनः प्रति- न्यायं प्रतियोन्याद्रवति’ (वृ० ४-३-१५) इस श्रुति में डंके की चोट कहा गया है कि—वह आत्मा उस अवस्था में, जिस किसी भी भोग्य को देखता है, उसके साथ अनुगत नहीं होता—किंवा उससे सम्बद्ध नहीं हो जाता [किन्तु वह वहां के दृश्यों को वहीं छोड़ कर, अकेला ही दूसरी अवस्था में पहुँचता है। वह वहां के पुण्य पाप किंवा सुख दुःखों को देखकर ही चला जाता है। उन्हें अपने साथ नहीं ले जाता।] जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादि प्रपंचं यत् प्रकाशते । तद् ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा सर्वबन्धैः प्रमुच्यते ॥२१३॥
तृप्तिदीपप्रकरणम् २९९
तृप्तिदीपप्रकरणम् २९९ सत्य ज्ञान आनन्द रूप जो महान् तत्व, जाग्रदादि प्रपंच को प्रकाशित किया करता है, वही ब्रह्मनामक तत्व मैं हूँ। [जन्म, जरा, मृत्यु आदि के बस में आने वाला क्षुद्र प्राणी मैं नहीं हूँ]। श्रुति और अनुभव के कहने से, जब कोई, इस बात को जान या मान लेता है तब फिर वह [कर्ता भोक्ता आदि] सभी बन्धनों से पूर्ण रूप से छुट जाता है। एक एवात्मा मन्तव्यो जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु । स्थानत्रयव्यतीतस्य पुनर्जन्म न विद्यते ॥२१४॥ जाग्रत् स्वप्न या सुषुप्ति तीनों में एक ही आत्मतत्व है, ऐसा जान लेना चाहिये। जब किसी का आत्मा, ज्ञान के प्रताप से इन तीनों अवस्थाओं से ऊपर उठ जाता है, तब फिर उसका पुनर्जन्म कभी भी नहीं हो पाता। [इस शरीर के गिर जाने पर उसे दूसरा शरीर नहीं मिलता।] त्रिषु धामसु यद् भोग्यं भोक्ता भोगश्च यद् भवेत् । तेभ्यो विलक्षणः साक्षी चिन्मात्रोऽहं सदाशिवः ॥२१५॥ जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति नाम के तीनों धामों में, जो तीन तरह के [स्थूल सूक्ष्म तथा आनन्दरूपी] भोग्य हैं, जो तीन तरह के [विश्व तैजस तथा प्राज्ञ नाम के] भोक्ता हैं, तथा इनमें जो नानाविध भोग [अनुभव] होता है, इन सभी से विलक्षण जो एक चिन्मात्र रूप सदा कल्याणस्वरूप साक्षी परमात्मा है, वही तो मैं हूँ। एवं विवेचिते तत्वे विज्ञानमयशब्दितः । चिदाभासो विकारी यो भोक्तृत्वं तस्य शिष्यते ॥२१६॥ ·इस प्रकार आत्मतत्व की विवेचना कर चुकने के बाद
३०० पञ्चदशी [जब कि उसको असंग जान लिया जाता है तब] विकारी होने के कारण विज्ञानमय कहानेवाला जो चिदाभास है वह ही भोक्ता रह जाता है । मायिकोयं चिदाभासः श्रुतेरनुभवादपि । इन्द्रजालं जगत् प्रोक्तं तदन्तःपात्ययं यतः ॥२१७॥ श्रुति और अनुभव इन दोनों का कहना मानें तो यह चिदा- भास तो मायिक [किंवा मिथ्या] है । विद्वान् लोग तो इस सभी जगत् को इन्द्रजाल की तरह मिथ्या मानते हैं । वे कहते हैं कि—क्योंकि यह चिदाभास भी उस जगत् के अन्तर्भूत ही है, इस कारण यह भी मिथ्या ही है । बिलयोप्यस्य सुप्त्यादौ साक्षिणा ह्यनुभूयते । एतादृशं स्वस्वभावं विविनक्ति पुनः पुनः ॥२१८॥ सुषुप्ति या मूर्छा जब आजाती है, तब यह साक्षी [आत्मा] इस चिदाभास के विलय किंवा नाश को अनुभव किया करता है । यों कूटस्थ से अलगाये हुए चिदाभास को मायिक समझ लेने पर यह होता है कि यह चिदाभास अपने ऐसे मिथ्या स्वभाव का स्वयं ही बार बार विवेक करने लगता है । [यह अपनी कमी को—अपने नश्वरपने को पहचान कर अपने मन में इस बात को अनन्त बार दोहराता है, उसको इस जगद्व्यवहार को देख कर हँसी और आश्चर्य दोनों होते हैं] । विविच्य नाशं निश्चित्य पुनर्भोगं न वाञ्छति । मुमूर्षुः शायितो भूमौ विवाहं कोऽभिवाञ्छति ॥२१९॥ विवेक करते करते, अपने नाश का निश्चय जब कर लेता है, तब वह भोगों की इच्छा करना ही छोड़ बैठता है । क्या
भला जिस मुमूर्षु को खाट से भूमि पर उतार लिया गया हो वह कभी भी अपना विवाह कराना चाहेगा ? जिहेति व्यवहर्तुं च भोक्ताहमिति पूर्ववत् । छिन्ननास इव हीतः क्लिश्यन्नारब्धमश्नुते ॥२२०॥ उसकी कुछ ऐसी विचित्र अवस्था हो जाती है कि-यह तो अब पहले की तरह, अपने को भोक्ता कहता हुआ भी शरमाता है। 'अभी तक मेरे प्रारब्ध कर्म समाप्त नहीं हुए' इस दुःख को लिये हुए ही, नाक कटे आदमी के समान लज्जित रह कर अपने प्रारब्ध को भोगा करता है। यदा स्वस्यापि भोक्तृत्वं मन्तुं जिह्वेत्ययं तदा । साक्षिण्यारोपयेदेतदिति कैव कथा वृथा ॥२२१॥ यह चिदाभास जब अपने आपको भी भोक्ता मानता हुआ शरमाने लगता है तब यह बिचारा अपने भोक्तापने के दोष को साक्षी पर लादेगा, ऐसी वृथा शंका तो करनी ही नहीं चाहिए। इत्यभिप्रेत्य भोक्तार माक्षिपत्यविशङ्कया । कस्य कामायेति ततः शरीरानुज्वरो न हि ॥२२२॥ [कूटस्थ या चिदाभास कोई भी पारमार्थिक भोक्ता नहीं है] इसी अभिप्राय को लेकर 'कस्य कामाय' इस श्रुति ने निःशंक होकर भोक्ता का निषेध कर दिया है। ऐसा हो जाने पर फिर उसे इस शरीर के साथ कभी भी सन्तप्त होना नहीं पड़ता । [ऐसा ज्ञानी जब ज्वर से पीड़ित होता है तब उसका विश्लेषण यों करना चाहिए कि-उसके शरीर को ज्वर आता है, वह तटस्थ होकर उस ज्वरित शरीर को देखा करता है। उस दुःखी शरीर के साथ वह दुःखी कभी नहीं होता । कैसा भी कष्ट आ पड़ने
३०२ पञ्चदशी पर वह अपनी तटस्थता को टूटने नहीं देता । यह तटस्थता ही ज्ञानियों का गुप्त धन माना जाता है ] । स्थूलं सूक्ष्मं कारणं च शरीरं त्रिविधं स्मृतम् । अवशं त्रिविधोऽस्त्येव तत्र तत्रोचितो ज्वरः ॥२२३॥ स्थूल सूक्ष्म और कारण तीन प्रकार का शरीर होता है। उन उन शरीरों में तीनों तरह का संताप भी हुआ ही करता है। [उसमें किसी का बस नहीं है कि उस सन्ताप को हटा सके।] वातपित्तश्लेष्मजन्यव्याधयः कोटिशस्तनौ । दुर्गन्धित्वकुरूपत्वदाहभङ्गादयस्तथा ॥२२४॥ इस स्थूल शरीर में वात, पित्त, कफ से उत्पन्न होने वाली, अनन्त बीमारियां, दुर्गन्धि किंवा कुरूप होना, जल जाना, या चोट लग जाना, आदि अनेक ज्वर [उपद्रव] रहते ही हैं। कामक्रोधादयः शान्तिदान्त्याद्या लिङ्गदेहगाः ज्वरा, द्वयेऽपि बाधन्ते प्राप्त्याप्राप्त्या नरं क्रमात्॥२२५॥ काम क्रोधादि तथा शान्ति दान्ति आदि लिङ्ग शरीर के ज्वर हैं। जब काम क्रोधादि आते हैं तब वे सूक्ष्म शरीर को दुःखी करते हैं तथा जब शान्ति आदि नहीं आते तब भी लिङ्ग देह दुःखी होता है। यों ये दोनों, क्रम से पाने और न पाने से दुःखी किया करते हैं। स्वं परं च न वेत्त्यात्मा विनष्ट इव कारणे । आगामिदुःखबीजं चेत्येतदिन्द्रेण दर्शितम् ॥२२६॥ ‘नहि खल्वयमेवं संप्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति, नो एवेमानि भूतानि,विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्रभोग्यं पश्यामि’ (छा० ८-११-२) इस श्रुति में इन्द्र ने अपने प्रजापति गुरु से यह कहा है कि—
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वह न तो अपने आपको ही जानता है और न दूसरे को ही पहचान पाता है। कारण शरीर में पहुँच जाने पर तो यह [अज्ञान के कारण] विनष्ट सा ही हो जाता है, यही अवस्था अगले दिनों में आने वाले दुःखों का कारण भी होती है। एते ज्वराः शरीरेषु त्रिषु स्वाभाविका मताः । वियोगे तु ज्वरैस्तानि शरीराण्येव नासते ॥२२७॥ तीनों शरीरों में प्रतीत होने वाले ये ज्वर शरीरों के साथ ही साथ लगे हुए हैं। ये तो उनमें स्वभाव से ही रहते हैं। इन्हें कोई उनमें से हटा नहीं सकता। स्थूल शरीर रोगी न हों, काम क्रोधादि मन में उत्पन्न न हों, अज्ञान में दुःख रूपी भेड़िये छिपे न बैठे हों, यह कभी होना ही नहीं है। क्योंकि इन ज्वरों का जब इन शरीरों से वियोग हो जाता है तब तो फिर ये शरीर ही नहीं रहने पाते [इसी से कहते हैं कि ये तो स्वाभाविक हैं] तन्तौर्वियुज्येत पटो वालेभ्यः कम्बलो यथा । मृदो घटस्तथा देहो ज्वरेभ्योऽपीति दृश्यताम् ॥२२८॥ तन्तु से यदि वस्त्र वियुक्त हो सकता हो, बालों से यदि कम्बल को पृथक् किया जा सकता हो, मिट्टी से यदि घट को अलग करना सम्भव हो तो यह भी हो सकता है कि ज्वरों से देह को बचाया जा सके [ये शरीर तो विपत्ति के वृक्ष हैं] । चिदाभासे स्वतः कोऽपि ज्वरो नास्ति, यतश्चितः । प्रकाशैकस्वभावत्वमेव दृष्टं न चेतरत् ॥२२९॥ चिदाभास को स्वयं तो कोई भी ज्वर नहीं होता [उसको तो शरीरों के सम्बन्ध के कारण ही ज्वर होते हैं]। विद्वान् साधक जब समाधिभावना में बैठ कर देखते हैं, तब वे चित्
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को केवल प्रकाश स्वभाव वाला ही पाते हैं। [यह चिदाभास
उस चित् का ही प्रतिबिम्ब है इस कारण उसमें भी कोई ज्वर
नहीं होता]।
चिदाभासेऽप्यसंभाव्या ज्वराः, साक्षिणि का कथा।
एवमप्येकतां मेने चिदाभासो ह्यविद्यया ॥२३०॥
यों जब कि चिदाभास में भी ज्वरों का होना असंभव है
तब फिर साक्षी में ज्वर नहीं होते, इसका तो कहना ही क्या ?
वस्तुस्थिति तो यही है फिर इस चिदाभास ने अपनी अविद्या
[बेसमझी] के कारण [उन शरीरों से] अपनी एकता मान ली
है [और यह अब अपने आपको ही सन्तापशील मान
बैठा है]।
साक्षिसत्यत्वमध्यक्ष्य स्वेनोपेते वपुस्त्रये।
तत्सर्वं वास्तवं स्वस्य स्वरूपमिति मन्यते ॥२३१॥
[एकता मानने की रीति तो यह है कि] उस चिदाभास ने,
अपने से युक्त इन तीनों शरीरों में, साक्षी की सत्यता का
अध्यास किया और फिर पीछे से ज्वरों से जलते हुए उन तीनों
शरीरों को ही, अपना सच्चा रूप समझ लिया। [मानों कोई
दहकती हुई भट्टी में घुस कर उस भट्टी को ही अपना आपा
मान बैठा हो और अन्दर बैठा बैठा जल रहा हो।]
एतस्मिन् भ्रान्तिकारेऽयं शरीरेषु ज्वरत्स्वथ।
स्वयमेव ज्वरामीति मन्यते हि कुटुम्बिवत् ॥२३२॥
इस भ्रान्ति के रहते रहते जब इस चिदाभास के किसी
शरीर को कोई ज्वर होजाता है तब यह कुटुम्बी पुरुष की तरह
अपने आपको ही ज्वरशील मान बैठता है।
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३०५
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३०५ कि यह चिदाभास शरीर के ज्वरों को अपने आत्मा में आरो- पित कर लेता है । ] पुत्रदारेषु तप्यत्सु तपामीति वृथा यथा । मन्यते पुरुषस्तद्वदाभासोऽप्यभिमन्यते ॥ २३३ ॥ पुत्र या पत्नी आदि के सन्तप्त होने पर जैसे कुटुम्बी मनुष्य वृथा ही अपने आपको दुःखी माना करता है, इसी प्रकार यह चिदाभास भी शरीरों के दुःखी होने पर अपने आप को वृथा ही दुःखी मानने लगता है । [शरीर में कोई चोट लग जाय तो यह उस चोट को आत्मा को ही लगी समझता है इत्यादि ] विविच्य भ्रान्तिमुज्झित्वा स्वमप्यगणयन् सदा । चिन्तयन् साक्षिणं कस्माच्छरीर मनुसंज्वरेत् ॥२३४॥ वह चिदाभास कूटस्थ का, अपने आपका, तथा शरीरों का विवेक करके, भ्रान्ति को छोड़ देने के पश्चात्, अपने को भी कुछ न गिनते हुए [कि मैं भी कुछ हूँ ] ज्वरादि से रहित जो साक्षी है, उस का सदा चिन्तन करते करते, इन ज्वर वाले शरीरों के पीछे-पीछे लग कर स्वयं भी क्यों सन्तप्त होता फिरे ? [ यही बात विवेकी की समझ में नहीं आती। सन्तप्त होने का तो कोई सच्चा कारण ही विवेकी को नहीं दीखता । ] अयथावस्तुसर्पादिज्ञानं हेतुः पलायने । रज्जुज्ञानेऽहिधीध्वस्तौ कृतमप्यनुशोचति ॥२३५॥ रज्जु में जो सर्पादि कल्पित कर लिये जाते हैं, उनका ज्ञान ही तो पलायन का कारण होता है। परन्तु जब रज्जु का ज्ञान हो जाता है और सर्पबुद्धि नष्ट हो जाती है,तब तो अपने प्रथम किये
हुए पलायन पर भी पछताना पड़ता है [ कि मैं मूर्ख वृथा ही दौड़ पड़ा था । ] मिथ्याभियोगदोषस्य प्रायश्चित्तप्रसिद्धये । क्षमापयन्निवात्मानं साक्षिणं शरणं गतः ॥२३६॥ [ लोक में जब कोई किसी पर झूठा दोष लगा देता है तब वह उसका यह प्रायश्चित्त करता है कि जिस पर उसने दोष लगाया था, उससे बार बार क्षमा मांगता है। इसी प्रकार] उस चिदाभास ने जो कि साक्षी असङ्ग आत्मा में, भोक्ता आदि धर्मों का आरोप कर रक्खा था [उस असङ्ग आत्मा को वृथा ही कर्ता भोक्ता आदि मान लिया था ] उस पाप का प्रायश्चित्त करने के लिये मानों [ अनादि काल के ] अपने अपराध को क्षमा करवाने के लिये साक्षी आत्मा की शरण में जापड़ा [अर्थात् कहने लगा कि-मैं तो सच्चिदानन्द रूप ही हूँ। मैं तो अब तक इस आत्मतत्व को वृथा ही कर्ता भोक्ता आदि मान रहा था। हे आत्मदेव ! अब मैं ऐसा आत्मद्रोह कभी न करूँगा इत्यादि । ] आवृत्तपापनुत्यर्थं स्नानाद्यावर्त्यते यथा । आवर्तयन्निव ध्यानं सदा साक्षिपरायणः ॥२३७॥ जैसे पापी पुरुष, अपने अभ्यस्त पाप को हटाने के लिये, स्नान आदि प्रायश्चित्त को बार-बार किया करता है, इसी प्रकार इस चिदाभास ने जो साक्षी में चिरकाल तक संसारित्व आदि धर्मों का आरोप कर लिया था, उस दोष को हटाने के लिये ही, ध्यान की आवृत्ति करते हुए पुरुषों की तरह, सदा ही साक्षिपरायण रहने लगता है ।
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३०७
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३०७ उपस्थकुष्ठिनी वेश्या विलासेषु विलज्जते । जानतोऽग्रे तथाऽऽभासः स्वप्रख्यातौ विलज्जते ॥२३८॥ जिस वेश्या को सुजाक जैसा अधम रोग हो गया हो, वह जैसे विलास में लज्जा किया करती है, उसी की तरह यह चिदा- भास भी ज्ञानी के सामने अपने गुणों को कहता हुआ भी शरमाने लगता है। [ अपने आपको 'मैं' कहते हुए उसे लज्जा आती है ] गृहीतो ब्राह्मणो म्लेच्छैः प्रायश्चित्तं चरन् पुनः । म्लेच्छैः संकीर्यते नैव, तथाभासः शरीरकैः ॥२३९॥ जिस ब्राह्मण को म्लेच्छों ने पकड़ लिया हो [ जो म्लेच्छों के साथ खाने पीने लगा हो] वह जब प्रायश्चित्त कर लेता है,तब फिर म्लेच्छों में रिला मिला नहीं रहता [उनसे अलग हो जाता है ।] इसी प्रकार यह चिदाभास उक्त प्रकार का प्रायश्चित करके फिर शरीरों के साथ संकरता को प्राप्त नहीं होता है। यौवराज्ये स्थितो राजपुत्रः साम्राज्यवाञ्छया । राजानुकारी भवति तथा साक्ष्यनुकार्ययम् ॥२४०॥ जो राजपुत्र युवराज बन चुका हो, वह साम्राज्य पाने की इच्छा से राजा का अनुकरण किया करता है [ वह उसी की तरह प्रजारंजन आदि करने लगता है] इसी प्रकार यह चिदा- भास भी आत्मसाम्राज्य को पाने की इच्छा से, सदा साक्षी का ही अनुकरण करने लगता है । यो ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवत्येव इति श्रुतिम् । श्रुत्वा,तदेकचित्तः सन्, ब्रह्म वेत्ति, न चेतरत् ॥२४१॥ इस श्रुति को सुनकर जब कोई पूर्णरूप से तन्निष्ठ
१०८ पञ्चदशी होजाता है, तब वह ब्रह्म को जान जाता है। उस समय ब्रह्म के अतिरिक्त किसी भी पदार्थ का ज्ञान उसे नहीं रहता। [स यो ह वै तत्परमं ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति (मु० ३-२-९) इस श्रुति को सुनकर यह निश्चय होता है कि साक्षी का अनुसरण करना वृथा नहीं जाता]। देवत्वकामा ह्यग्न्यादौ प्रविशन्ति यथा तथा । साक्षित्वेनावशेषाय स्वविनाशं स वाञ्छति ॥२४२॥ [ब्रह्मज्ञान हो जाने से जब ब्रह्मभाव की प्राप्ति होती है तब चिदाभासपना नष्ट हो जाता है। इस पर प्रश्न यह होता है कि वह चिदाभास अपने नाश के लिये प्रयत्न क्यों करता है ? इसी का उत्तर—इस श्लोक में दिया है]—जो मनुष्य देव बनना चाहते हैं, वे जलती अग्नि में या गंगा आदि में प्रवेश कर जाते हैं [और अपना शरीरपात कर देते हैं] इसी प्रकार साक्षीरूप से शेष रह जाने के लिये वह चिदाभास अपना विनाश भी चाह लेता है। [जैसे देवभावरूपी ऊँची श्रेणी को पाने की इच्छा से, उससे अधम मनुष्यशरीर को त्याग दिया जाता है, इसी प्रकार साक्षीरूप को पा जाने के उत्तम फल को देखकर, यह चिदाभास अपने अधम चिदाभासपन को त्याग कर ब्रह्मज्ञान में प्रवृत्त हो जाता है। भले ही उससे उसका चिदाभासपना ही जाता रहता हो।] यावत् स्वदेहदाहं स नरत्वं नैव मुञ्चति । यावदारब्धदेहं स्यान्नाभासत्वविमोचनम् ॥२४३॥ अग्नि में घुसे हुए उस पुरुष का देह जब तक भस्म नहीं हो चुकता, तब तक वह अपने मनुष्यत्व से मुक्त नहीं हो पाता
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३०९
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३०९ [तब तक उसको मनुष्य ही कहा जाता है] इसी प्रकार जब तक यह प्रारब्ध देह बना हुआ है, तब तक चिदाभासता बनी ही रहेगी [प्रारब्ध कर्मों के नष्ट होने तक उसे चिदाभास ही कहना पड़ेगा ।] रज्जुज्ञानेऽपि कम्पादिः शनैरेवोपशाम्यति । पुनर्मन्दान्धकारे सा रज्जुः क्षिप्तोरगी भवेत् ॥२४४॥ रज्जु का ज्ञान हो जाने पर भी जैसे भय या कम्प आदि धीरे धीरे ही शान्त होते हैं, सहसा नहीं। जब तो मन्द अँधेरे में उस रज्जु को फिर फेंक दिया जाता है तब वह फिर सांप सी दीखने लगती है । एवमारब्धभोगोऽपि शनैः शाम्यति नो हठात् । भोगकाले कदाचित्तु मर्त्योहमिति भासते ॥२४५॥ इसी प्रकार अज्ञान चाहे निवृत्त भी हो चुका हो, परन्तु प्रारब्ध भोग तो धीरे धीरे ही शान्त हुआ करता है । वह हठ करने से सहसा शान्त नहीं हो जाता । कभी कभी तो भोग- काल में उसे यह भी विपरीत भास हो ही जाया करता है कि 'मैं मर्त्य हूँ—।' [उसका यह भास ज्ञान होते ही नष्ट नहीं होता, यह भी धीरे धीरे, ही मिटा करता है ।] नैतावतापराधेन तत्वज्ञानं विनश्यति । जीवन्मुक्तिव्रतं नेदं किन्तु वस्तुस्थितिः खलु ॥२४६॥ ['मैं मर्त्य हूँ' ऐसा भान हो जाना यद्यपि ज्ञानी का अपराध समझा जाना चाहिये परन्तु] इतने छोटे से अपराध से तत्व- ज्ञान का नाश नहीं हो जाता है । क्योंकि—यह अपनी मनुष्य बुद्धि को हटा देना रूपी जीवन्मुक्ति नाम का कोई व्रत
३१० पञ्चदशी नियम से करने योग्य काम] नहीं है, जो साधकों को परवश करना पड़ता हो। किन्तु यह तो वस्तुस्थिति ही है कि तत्वज्ञान से भ्रान्तिज्ञान भाग जाता है। तत्वज्ञान का अभ्यास करते करते साधक ने जिन विपरीत भावनाओं को मार भगाया है, वे कभी कभी इस देहादि समु- दाय पर, फिर अधिकार पाने का उद्योग करेंगी ही। वे यदि कभी कभी लौट कर आ जाती हैं तो आया करें। उनको फिर फिर मार भगाना चाहिये। इन भावनाओं को भगाने में कुछ समय भी लगता होता है और प्राणियों के स्वभावानुसार इसका भिन्न-भिन्न क्रम भी होता है। दशमोऽपि शिरस्ताडं रुदन् बुद्ध्वा न रोदिति । शिरोव्रणस्तु मासेन शनैः शाम्यति नो तदा ॥२४७॥ जो दसवां अब तक सिर पीट पीट कर रो रहा था, वही दसवां, ज्ञान हो जाने पर रोना तो तुरन्त रोक देता है, परन्तु सिर पीटने से उसके सिर में जो घाव हो गया था, वह तो कहीं महीनों में जाकर अच्छा हो पाता है। वह तुरन्त अच्छा नहीं होता । दशमामृतिलाभेन जातो हर्षो व्रणव्यथाम् । तिborder धत्ते, मुक्तिलाभस्तथा प्रारब्धदुःखिताम् ॥२४८॥ दसवें के न मरने के लाभ को सुनकर जो हर्ष होता है वह हर्ष घाव की पीडा को भुला देता है। ठीक इसी प्रकार जीवन्मुक्ति भी प्रारब्धदुःखों को ढक लेती है [ जीवन्मुक्ति मिलने पर जो हर्ष होता है, उसके सामने, प्रारब्धदुःखों की कुछ गिनती ही नहीं रह जाती। ऐसी अवस्था में ज्ञान हो जाने
तृप्तिदीपप्रकरणम् ५११
तृप्तिदीपप्रकरणम् ५११ पर चाहे संसार की अनुवृत्ति होती भी रहो तो भी जीवन्मुक्ति को पुरुषार्थ मानना ही पड़ेगा] व्रताभावाद् यदाध्यासस्तदा भूयो विविच्यताम् । रससेवी दिने भुङ्क्ते भूयो भूयो यथा तथा ॥२४९॥ [पहले २४६ श्लोक में कह चुके हैं कि] यह कोई व्रत नहीं है, इस कारण जब जब अध्यास हो जाता हो, तब तब बार बार विचार करना चाहिये । जिस प्रकार रससेवी पुरुष एक ही दिन में, जब जब उसे भूख लगती है तब तब, बार बार खाता है [इसी प्रकार अध्यास की निवृत्ति के लिए बारम्बार विवेक करना चाहिये ।] शमयत्यौषधेनायं दशमः स्वं व्रणं यथा । भोगेन शमयित्वैतत् प्रारब्धं मुच्यते तथा ॥२५०॥ जिस प्रकार वह दसवां पुरुष अपने व्रण को औषध से अच्छा कर लेता है, इसी प्रकार भोग के द्वारा इस प्रारब्ध (कर्म) को शान्त करके ही मुक्त होता है [प्रारब्ध कर्मों का फल ज्ञान से नहीं हटता । उसे तो भोग ही नष्ट कर सकते हैं।] किमिच्छन्निति वाक्योक्तः शोकमोक्ष उदीरितः । आभासस्य ह्यवस्थैषा षष्ठी, तृप्तिस्तु सप्तमी ॥२५१॥ शोकमोक्षरूपी जिस अवस्था को 'किमिच्छन् कस्य कामाय' (बृ ४-४-१२) इस वाक्य में कहा है, चिदाभास की उस छठी अवस्था का वर्णन यहाँ तक किया जा चुका। अब 'तृप्ति' नाम की सातवीं अवस्था का व्याख्यान किया जायगा । साङ्कुशा विषयैस्तृप्तिरियं तृप्तिर्निरङ्कुशा । कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्त मित्येव तृप्यति ॥२५२॥
३१२ पञ्चदशी विषयों के मिलने से प्राणी की जो तृप्ति होती है, वह तृप्ति साङ्कुश [समर्याद] तृप्ति कहाती है [एक विषय के मिलने से जो तृप्ति होती है, दूसरे विषय की कामना, हमें उस तृप्ति का मज़ा पूरी-पूरी तरह लूटने ही नहीं देती। दूसरी कामना उत्पन्न होते ही पहली तृप्ति के टूक-टूक कर डालती है। इसी से विषयों से होने वाली तृप्ति को साङ्कुश (परिमित) तृप्ति कहते हैं] परन्तु यह तृप्ति,जिसका वर्णन अब हम करने लगे हैं, वैसी मामूली तृप्ति नहीं है। यह तो निरंकुश [अमर्याद = अपरिमित] तृप्ति है [क्योंकि यह तृप्ति किसी भी कामना से कुण्ठित (खण्डित) नहीं हो जाती। यह तृप्ति तो नित्य नयी नकोर बनी रहती है] इस तृप्ति को पा लेने वाले के हृदय भवन में तो सदा ही ये शब्द गूँजा करते हैं कि 'जो कुछ मुझे करना था सो मैं कर चुका तथा जो कुछ मुझे पाना था वह मुझे मिल गया।' ऐहिकामुष्मिकव्रातसिद्धयै मुक्तेश्च सिद्धये। बहुकृत्यं पुरास्याभूत् तत् सर्वमधुना कृतम् ॥२५३॥ इस ज्ञानी को जब तक तत्व ज्ञान नहीं हुआ था तब तक इसको इस लोक और परलोक के कामों के तथा मुक्ति की सिद्धि के लिये बहुत कुछ करना शेष था [इष्ट को पाने और अनिष्ट को हटाने के लिये खेती आदि करनी थी। स्वर्गादि के लिये याग उपासना आदि करने थे। ज्ञान की सिद्धि के लिये श्रवणादि करने रहे थे।] परन्तु अब तो [जब कि इसे किसी भी सांसा- रिक फल की इच्छा नहीं रही है और ब्रह्मानन्द का साक्षात्कार हो चुका है] वह सभी कुछ किया सा हो गया
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३१३
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३१३ को पूरा करके जो कुछ होता, वह उन्हें बिना किये ही हो चुका है। इस के पश्चात् अब कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं दीखता।] तदेतत्कृतकृत्यत्वं प्रतियोगिपुरःसरम् । अनुसन्दधदेवाअयमेवं तृप्यति नित्यशः ॥२५४॥ जो बातें आत्मा की कृतकृत्यता का विरोध करती रहती हैं, उनके साथ ही अपनी कृतकृत्यता को याद कर करके,यह ज्ञानी आगे कहे प्रकार से सदा ही तृप्त रहने लगता है। दुःखिनोऽज्ञाः संसरन्तु कामं पुत्राद्यपेक्षया । परमानन्दपूर्णोऽहं संसरामि किमिच्छया ॥२५५॥ पुत्र, पत्नी आदि की मांग में फँसे हुए दुःखी अज्ञानी लोग, भले ही संसार में जकड़े रहें [मैं भी कभी ऐसा ही था] किन्तु अब परमानन्द से परिपूर्ण मैं भला इस संसार में किस इच्छा को लेकर उलझा पड़ा रहूँ ? अनुतिष्ठन्तु कर्माणि परलोकयियासवः । सर्वलोकात्मकैः कस्मादनुतिष्ठामि किं कथम् ॥२५६॥ जिन्हें परलोक जाने की बड़ी इच्छा है, वे भले ही यज्ञादि शुभ कर्म करते फिरें, [मुझ पर भी कभी यही वहम सवार हो रहा था] किन्तु सर्वलोकस्वरूप बना हुआ मैं भला अब उन कर्मों को क्यों करूँ ? और कैसे करूँ ? यह तुम्हीं बताओ ? व्याचक्षतां ते शास्त्राणि वेदानध्यापयन्तु वा । येऽत्राधिकारिणो, मे तु नाधिकारोऽक्रियत्वतः॥२५७॥ जो लोग अधिकारी हैं, उनका यदि जी करता हो तो वे शास्त्रों का व्याख्यान करें,या वेदों को पढ़ायें