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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

14. Vidyananda

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् योगेनात्मविवेकेन द्वैतमिथ्यात्वचिन्तया । ब्रह्मानन्दं पश्यतोऽथ विद्यानन्दो निरूप्यते ॥१॥ क्रमानुसार पहले तीन अध्यायों में वर्णित योग से या आत्म- विवेक से या फिर द्वैत के मिथ्यापन की चिन्ता करने से, जब कोई ब्रह्मानन्द के साक्षात् दर्शन कर रहा हो, उस समय उसको जो ज्ञानानन्द होता है उसी का निरूपण इस प्रकरण में किया जायगा । विषयानन्दवद् विद्यानन्दो धीवृत्तिरूपकः । दुःखाभावादिरूपेण प्रोक्त एष चतुर्विधः ॥२॥ जिस प्रकार वह विषयानन्द एक प्रकार की बुद्धिवृत्ति है, इसी प्रकार यह 'विद्यानन्द' भी एक प्रकार की बुद्धिवृत्ति ही है । इस विद्यानन्द को दुःखाभाव आदि चार प्रकार का कहते हैं । दुःखाभावश्च कामाप्तिः कृतकृत्योहमित्यसौ । प्राप्तप्राप्योहमित्येव चातुर्विध्यमुदाहृतम् ॥३॥ (१) मुझे कोई भी दुःख नहीं, (२) मेरी सब कामनायें पूर्ण हो गई हैं, (३) मैं कृतकृत्य हो गया हूँ, (४) मुझे जो पाना था सो प्राप्त हो गया है, यों 'विद्यानन्द' चार प्रकार का होता है ।

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५३९

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५३९ ऐहिकं चामुष्मिकं चेत्येवं दुःखं द्विधेरितम् । निवृत्तिमैहिकस्याह बृहदारण्यकं वचः ॥४॥ दुःख दो प्रकार का होता है—एक इस लोक का दूसरा परलोक का । बृहदारण्यक का [अगला] श्लोक ऐहिक [इस लोक के] दुःख की निवृत्ति को कह रहा है। आत्मानं चेद् विजानीयादयमस्मीति पूरुषः । किमिच्छन् ? कस्य कामाय ? शरीरमनुसंज्वरेत् ॥५॥ यदि कोई पुरुष आत्मा को जान जाय कि 'यह तत्त्व मैं हूँ' तो बताओ फिर वह किस वस्तु की चाहना को लेकर और किस के लिए इस शरीर के पीछे [इसके दुःख से] दुःखी होता फिरे ? [जब वह आत्मा को पहचानेगा तब उसे पता चलेगा कि उसके आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु है ही नहीं। इसीलिए वह कुछ भी चाहना छोड़ देगा। जब उसे ज्ञात होगा कि आत्मा ऐसा असंग तत्त्व है उसको किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है बस फिर वह किसी के लिए कुछ भी न चाहेगा ।] जीवात्मा परमात्मा चेत्यात्मा द्विविध ईरितः । चित्तादात्म्यात् त्रिभिर्देहैर्जीवः सन् भोक्तृतां व्रजेत् ॥६॥ 'जीवात्मा' और 'परमात्मा' इन दो तरह का आत्मा कहा जाता है। चैतन्य का 'स्थूल' 'सूक्ष्म' तथा 'कारण' नाम के तीन शरीरों के साथ तदात्म्य [तादात्म्य भ्रम] जब हो जाता है तब चैतन्य ही भोक्ता बन जाता है और वही भोक्ता 'जीव' कहाने लगता है। परात्मा सच्चिदानन्दस्तादात्म्यं नामरूपयोः । गत्वा भोग्यत्वमापन्न स्तद्विवेके तु नोभयम् ॥७॥

आत्मतत्त्व का विवेक [भेद ज्ञान] कर लिया जाता है तब फिर

५४० पञ्चदशी परमात्मा तो सच्चिदानन्दस्वरूप ही है परन्तु वह पर- मात्मा [क्योंकि नामरूप की कल्पना का अधिष्ठान है इसलिए] नामरूप के साथ तादात्म्य को पाकर भोग्य बन जाता है। जब उन तीनों शरीरों से तथा इस नामरूपात्मक जगत् से उस आत्मतत्त्व का विवेक [भेद ज्ञान] कर लिया जाता है तब फिर न तो 'भोक्ता' तत्व ही रहता है और न 'भोग्य' तत्व ही रह जाता है। भोग्यमिच्छन् भोक्तुरर्थे शरीरमनुसंज्वरेत् । ज्वरास्त्रिषु शरीरेषु स्थिता, न त्वात्मनो ज्वराः ॥८॥ यह प्राणी 'भोक्ता' के लिये जब किसी 'भोग्य' पदार्थ को चाहता है तब इसे शरीर के साथ [अनिवार्य रूप से] दुःखी होना ही पड़ता है। ज्वर तो तीनों शरीरों में होते ही रहते हैं। आत्मतत्त्व को तो ज्वर कभी नहीं होते। व्याधयो धातुवैषम्ये स्थूलदेहे स्थिता ज्वराः । कामक्रोधादयः सूक्ष्मे, द्वयोर्बीजं तु कारणे ॥६॥ 'वात' 'पित्त' 'कफ' नाम के धातुओं में जब विषमता आ जाती है तब स्थूल शरीर में व्याधियां उत्पन्न हो जाती हैं। ये ही स्थूल शरीर के 'ज्वर' कहाते हैं। काम क्रोध आदि विकार सूक्ष्म शरीर के 'ज्वर' कहे जाते हैं। परन्तु दोनों प्रकार के ज्वरों का बीज तो कारण शरीर में ही रहता है। अद्वैतानन्दमार्गेण परात्मनि विवेचिते । अपश्यन् वास्तवं भोग्यं किं नामेच्छेत् परात्मवित् ॥१०॥ अद्वैतानन्द नाम के १३वें प्रकरण में कहे हुए प्रकार से जब [माया के कार्य नामरूप में से सच्चिदानन्दस्वरूप] परमात्म-

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५४१

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५४१ तत्त्व का विवेक कर लिया जाता है [जब उस आत्मतत्त्व को इस सब नामरूपात्मक जगत् से पृथक् पहचान लिया जाता है] जब ज्ञानी को कोई भी सच्चा भोग्य नहीं दीख पड़ता [जब वह इस प्रपंच को मिथ्या मान लेता है] तब बताओ कि वह परात्मा का जानने वाला ज्ञानी कौन से भोग्य की इच्छा करे ? आत्मानन्दोक्तरीत्यास्मिन् जीवात्मन्यवधारिते । भोक्ता नैवास्ति कोऽप्यत्र, शरीरे तु ज्वरः कुतः ॥११॥ आत्मानन्द नाम के १२वें अध्याय में बतायी हुई रीति से जीवात्मा के [असंग कूटस्थ चैतन्य] स्वरूप का निश्चय जब किसी को हो जायगा तब फिर कोई भी भोक्ता [या कामयिता] ही नहीं रहेगा [ विचार की आंच के सामने भोक्तृ भाव जल जायगा] ऐसी अवस्था में इस विचारे जड़ शरीर में ज्वर होगा ही कैसे ? [ इसको ज्वर के होने का पता कैसे चलेगा ? ] पुण्यपापद्वये चिन्ता दुःखमामुष्मिकं भवेत् । प्रथमाध्याय एवोक्तं चिन्ता नैनं तपेदिति ॥१२॥ पुण्य या पाप करने की इच्छा [नीयत] ही पारलौकिक दुःख कहाता है । प्रथमाध्याय में [ ११ वें प्रकरण में ] बताया गया है कि इस ज्ञानी को तो चिन्ता सताती ही नहीं । यथा पुष्करपर्णेऽस्मिन्नपामश्लेषणं तथा । वेदनादूर्ध्वमागामि कर्मणोऽश्लेषणं बुधे ॥१३॥ जैसे इस कमल के पत्ते में पानी का संपर्क नहीं होता इसी प्रकार आत्मज्ञान हो जाने के बाद इस ज्ञानी में आगामी कर्मों का सम्बन्ध नहीं होता ।

५४२ पञ्चदशी उसे नहीं रहती । यही बात तद्यथा पुष्करपर्णे इत्यादि श्रुति में कही गयी है । ] इषीकातृणतूलस्य वह्निदाहः क्षणाद् यथा । तथा संचितकर्मास्य दग्धं भवति वेदनात् ॥१४॥ तद्यथेषीकतूल मग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते (छा. ५-२४-३) इस श्रुति में कहा गया है कि जैसे सर कण्डे या कांस की रूई, आग में एक क्षण में जल जाती है, इसी प्रकार ज्ञानी के [ करोड़ों कल्पों से ] संचित किये हुए कर्म भी ज्ञान [ के माहात्म्य ] से [ तत्क्षण ] दग्ध हो जाते हैं । [ यों उसे संचित कर्मों की चिन्ता भी नहीं रह जाती ] कि इन का क्या बनेगा ? ] यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा ॥१५॥ गीता में भी कहा है कि—हे अर्जुन ! जिस प्रकार प्रदीप्त अग्नि ईंधनों को जला डालती है, इसी प्रकार [ सुलगी हुई ] यह ज्ञानाग्नि भी, तीनों प्रकार के कर्मों [ क्रियमाण आगामी और संचित ] को भस्मसात् कर देती है । यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमांल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥१६॥ गीता में ही यह भी कहा है कि—जिस ज्ञानी को अहंकार युक्त भाव नहीं रहता, [ कि यह मैं करता हूँ मैं करने वाला हूँ ] जिस ज्ञानी की बुद्धि संसार में लिप्त नहीं होती, वह यदि इन सब लोकों को मार भी दे, तो भी वह मारने वाला नहीं समझा जाता और इस कर्म से वह बन्धन में भी नहीं आ सकता ।

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५३

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५३ मातापित्रोर्वधः स्तेयं भ्रूणहत्यान्यदीदृशम् । न मुक्तिं नाशयेत् पापं मुखकान्तिर्न नश्यति ॥१७॥ यही बात कौषीतकी उपनिषत् में यों कही गयी है कि— माता पिता का वध, चोरी, गर्भपात या और ऐसा ही पाप कर्म ज्ञानी की मुक्ति को रोक नहीं सकता। ऐसे ऐसे महाभयंकर पापों से भी ज्ञानी के चेहरे की कान्ति फीकी नहीं पड़ती। दुःखाभाववदेवास्य सर्वकामाप्तिरीरिता । सर्वान् कामानसावाप्त्वा ह्यमृतोऽभवदित्यतः ॥१८॥ ज्ञानी के दुःखाभाव का वर्णन यहां तक किया गया। उसी तरह ज्ञानी को सब कामनाओं की प्राप्ति भी बतायी गयी है। ऐतरेय श्रुति में कहा गया है कि यह ज्ञानी सब कामनाओं को पाकर अमर हो चुका है । जक्षन् क्रीडन् रतिं प्राप्तः स्त्रीभिर्यानैस्तथैतरैः । शरीरं न स्मरेत्, प्राणः कर्मणा जीवयेदसुम् ॥१९॥ [ छान्दोग्य में तो यहां तक कहा है कि ]—खाता, खेलता, स्त्रियों से रमण करता, सवारियों पर बैठता, तथा और भोग्य पदार्थों को भोगता हुआ भी ज्ञानी, इस शरीर को याद तक नहीं करता [ उसे यह मालूम ही नहीं रहता कि यह शरीर क्या कर रहा है ? वह तो निरन्तर आत्मसागर में डूबा रहता है ] उस समय उस का प्राण प्रारब्ध कर्मों के सहारे से उस शरीर को जीवित रखता रहता है । [ जब उस शरीर के प्रारब्ध कर्म समाप्त हो जायेंगे तब वह शरीर तुरन्त ही गिर जायगा ] । सर्वान् कामान् सहाप्नोति नान्यवज्जन्म कर्मभिः । वर्तन्ते श्रोत्रिये भोगा युगपत् क्रमवर्जिताः ॥२०॥

५४४ पञ्चदशी तैत्तिरीय श्रुति में कहा है कि—ज्ञानी लोग संसार की सम्पूर्ण कामनाओं को एक ही साथ पा लेते हैं। दूसरे अज्ञानी लोग जैसे कर्मों को कर करके जन्मपरम्परा में फंसे रहते हैं, वैसे इन [दिखावटी] कर्मों से ज्ञानी को जन्म लेना नहीं पड़ता । अज्ञानी लोग जैसे क्रमानुसार भोगों को भोगा करते हैं श्रोत्रिय को वैसे भोग नहीं होता । उसको तो सब भोग एक ही साथ बिना क्रम के होते हैं । [ इसी प्रकरण के ३४ श्लोक में जाकर यह विषय स्पष्ट हो गया है । ] युवा रूपी च विद्यावान् नीरोगो दृढचित्तवान् । सैन्योपेतः सर्वपृथ्वीं वित्तपूर्णां प्रपालयन् ॥२१॥ सर्वै र्मानुष्यकै र्भोगैः संपन्नस्तृप्तभूमिपः । यमानन्दमवाप्नोति ब्रह्मविच्च तमश्नुते ॥२२॥ जवान हो, रूपवान् हो, विद्यावान् हो, नीरोग हो, स्थिर चित्त हो, भारी सेना हो, धन धान्य से पूर्ण पृथिवी का शासन कर रहा हो, अथवा संक्षेप में यों कहना चाहिए कि मनुष्यों को जितने भी भोग प्राप्त हो सकते हैं वे सभी उसे प्राप्त हों, ऐसे तृप्त भूपति को जो आनन्द मिल सकता है, ब्रह्मज्ञानी पुरुष भी उसी आनन्द को लूटा करता है [ तैत्तिरीय और बृहदारण्यक उपनिषदों में यह बात कही गई है । ] मर्त्यभोगे द्वयोर्नास्ति काम स्तृप्तिस्ततः समा । भोगानिष्कामतैकस्य परस्यापि विवेकतः ॥२३॥ [प्रश्न यह है कि सार्वभौम राजा को विषयों की प्राप्ति होती है, श्रोत्रिय को कोई विषय प्राप्त नहीं होता । फिर भी इन दोनों का आनन्द, एक सा कैसे होता है ? इसी का उत्तर इस

[Header] ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५४५

[Header] ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५४५ श्लोक में दिया है] सार्वभौम राजा और श्रोत्रिय इन दोनों को ही मर्त्यभोगों की इच्छा नहीं रहती, इस कारण इन दोनों को एक सी ही तृप्ति होती है। भेद केवल इतना ही है कि सार्व- भौम राजा तो भोग चुकने पर निष्काम हुआ है। दूसरा श्रोत्रिय तो विवेक के प्रताप से [बिना भोगे ही] निष्काम हो जाता है। यों इन दोनों को एक सी ही तृप्ति हो जाती है। श्रोत्रियत्वाद् वेदशास्त्रैर्भोगदोषानवेक्षते । राजा बृहद्रथो दोषांस्तान् गाथाभिरुदाहरत् ॥२४॥ देहदोषांश्चित्तदोषान् भोग्यदोषाननेकशः । श्रोत्रिय होने के कारण, वेद शास्त्रों के द्वारा, वह भोगों के दोषों को देखता रहता है [इस कारण विवेक के प्रताप से वह निष्काम हो जाता है] बृहद्रथ राजा ने मैत्रायणी शाखा में गाथाओं के द्वारा विषय के दोषों का वर्णन किया है [उसमें देह, चित्त तथा भोग्य के दोषों का विस्तारपूर्वक वर्णन आया है] शुना वान्ते पायसे नो कामस्तद्वद्विवेकिनः ॥२५॥ कुत्ते से वमन की हुई खीर को खान का विचार भी जैसे कोई नहीं करता, इसी प्रकार विवेकी पुरुष को दोषयुक्त भोगों की कामना ही नहीं होती । निष्क्रामत्वे समेऽप्यत्र राज्ञः साधनसंचये । दुःखमासीद् भाविनाशादतिभीरनुवर्तते ॥२६॥ [श्रोत्रिय की महिमा सार्वभौम राजों से ऊँची है] यद्यपि श्रोत्रिय और राजा दोनों ही समान रूप से निष्काम हुए प्रतीत होते हैं, परन्तु राजा को तो साधनों को इकट्ठा करने में पहले भी [काफी] दुःख हुआ था 'आगामी में तो ये सब भोग नष्ट

गन्धर्वानन्द आशास्ति राज्ञो, नास्ति विवेकिनः ॥२७॥

५५६ पञ्चदशी हो ही जायँगे' इस विचार के आने पर तो राजा को बड़ा ही भय होता रहता है । नोभयं श्रोत्रियस्यात स्तदानन्दोऽधिकोऽन्यतः । गन्धर्वानन्द आशास्ति राज्ञो, नास्ति विवेकिनः ॥२७॥ श्रोत्रिय को तो ये दोनों ही नहीं होते—न तो उसे साधन संचय करने का दुःख ही होता है और न आगामी में उनके नाश होने का डर ही रहता है। इस कारण श्रोत्रिय का आनन्द सार्वभौम राजा से अधिक होता है । [श्रोत्रिय में एक और भी अधिकता होती है कि] राजा तो अपने से ऊपरले गन्धर्वा- नन्द के पाने की आशा किया करता है । विवेकी को तो ऐसी कोई भी दुराशा नहीं होती । अस्मिन् कल्पे मनुष्यः सन् पुण्यपाकविशेषतः । गन्धर्वत्वं समापन्नो मर्त्यगन्धर्व उच्यते ॥२८॥ इस कल्प में पहले मनुष्य था, किन्तु किसी पुण्य के फल से उसे गन्धर्वभाव मिल गया तो उसको 'मर्त्यगन्धर्व'कहते हैं । पूर्वकल्पे कृतात् पुण्यात् कल्पादावेव चेद् भवेत् । गन्धर्वत्वं तादृशोऽत्र देवगन्धर्व उच्यते ॥२९॥ पूर्व कल्प में किये हुए पुण्यों से कल्प के प्रारम्भ में ही जो गन्धर्व बन जाते हैं उनको 'देवगन्धर्व' कहा जाता है। अग्निष्वात्तादयो लोके पितरश्चिरवासिनः । कल्पादावेव देवत्वं गता आजानदेवताः ॥३०॥ अस्मिन् कल्पेऽश्वमेधादि कर्म कृत्वा महत्पदम् । अवाप्याजानदेवैर्याः पूज्यास्ताः कर्मदेवताः ॥३१॥ 'अग्निष्वात्ता' आदि को लोक में 'चिरवासी पितर' माना

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५४७

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५४७ जाता है। जो कल्प के प्रारम्भ में ही देव बन गये थे वे 'आजान देवता' कहे जाते हैं ॥३०॥ जो तो इसी कल्प में अश्वमेध आदि कर्म करके महापद को पाकर आजानदेवों के भी पूज्य हो जाते हैं वे 'कर्मदेवता' होते हैं। यमाग्निमुख्या देवाः स्युर्जाताविन्द्रबृहस्पती । प्रजापतिर्विराट् प्रोक्तो ब्रह्मा सूत्रात्मनामकः ॥३२॥ यम अग्नि आदि 'देवता' कहाते हैं। इन्द्र और बृहस्पति भी प्रसिद्ध ही हैं। प्रजापति को विराट् कहते हैं। ब्रह्मा को सूत्रात्मा माना गया है। सार्वभौमादिसूत्रान्ता उत्तरोत्तरकामिनः । अवाङ्मनसगम्योऽयमात्मानन्दस्ततः परः ॥३३॥ सार्वभौम राजा से लेकर सूत्रात्मा तक सब के सब अपने से ऊपर के पद की कामना किया करते हैं। परन्तु यह जो आत्मानन्द है यह तो मन और वाणी से अगम्य है। यही कारण है कि वह इन सब से ऊँचा है [विवेकी पुरुष को किसी की भी कामना नहीं रहती, इससे उसका दर्जा सब से ऊँचा हो जाता है।] तैस्तैः काम्येषु सर्वेषु सुखेषु श्रोत्रियो यतः । निःस्पृहस्तेन सर्वेषा मानन्दाः सन्ति तस्य ते ॥३४॥ उन उनके कमनीय सभी सुखों की ओर से श्रोत्रिय पुरुष तो निःस्पृह बना रहता है। यही कारण है कि—उन सब को मिल कर जितना आनन्द आता है उतना अकेले श्रोत्रिय को निःस्पृह होने से ही मिल जाता है। वे लोग उन उन कामनाओं को पूरा करके भी तो कुछ

उन्हें आनन्द मिल ही नहीं सकता। इसके विपरीत विवेकी को

५४८ पञ्चदशी काल के लिए अपने आपको निःस्पृह ही कर लेते हैं और तभी वे आनन्दी होते हैं। उनकी निःस्पृहता उन उन कामनाओं के अधीन [मातहत] होती है। उन उन कामनाओं के पूरा हुए बिना उन्हें आनन्द मिल ही नहीं सकता। इसके विपरीत विवेकी को तो कुछ कामना ही नहीं होती। वह तो सदा ही निःस्पृह बना रहता है, यों वह सदा ही आनन्द लूटा करता है। इसी कारण विवेकी का दर्जा सबसे ऊँचा माना गया है। मनु ने भी कहा है 'यश्चैतान् प्राप्नुयात् सर्वान् यश्चैतान् केवलांस्त्यजेत्' प्रापणात् सर्व- कामानां परित्यागो विशिष्यते' । जो इन सबको पा ले और जो इन को केवल छोड़ ही भरदे, सब कामों को पाने से त्याग की [ मानस त्याग की ] महिमा बहुत अधिक है। सर्वकामाप्तिरेषोक्ता, यद्वा साक्षिचिदात्मना । स्वदेहवत् सर्वदेहेष्वपि भोगानवेक्षते ॥३५॥ ज्ञानी की सर्वकामप्राप्ति की बात यहां तक प्रतिपादित की गयी। अब इसी बात को दूसरी रीति से कहा जाता है कि— जैसे अपने देह में [आनन्दाकार बुद्धि का साक्षी हो कर] आनन्दी होता है, इसी प्रकार सम्पूर्ण प्राणियों के शरीरों में जो जो भोग भोगे जा रहे हैं, उन सबका ही साक्षी होकर उन सब के भोगों को यह अकेला ही भोगने लगता है। इस रीति से भी ज्ञानी को 'सर्वकामाप्ति' हो जाती है। अज्ञस्याप्येतदस्त्येव न तु वृत्तिरबोधतः । यो वेद सोऽश्नुते सर्वान् कामानित्यब्रवीच्छ्रुतिः ॥३६॥ यदि यह कहा जाय कि इस रीति से तो अज्ञानी को भी 'सर्वकामावाप्ति'हो ही जाती है—वह भी तो सबका साक्षी होता

ही है तो उसका उत्तर यह है कि-हां, अज्ञानी को भी 'सर्व- कामावाप्ति' तो होती है परन्तु ज्ञान न होने के कारण उससे उस [विचारे] की तृप्ति नहीं होती [ मैं सब बुद्धियों का साक्षी हूँ ऐसा ज्ञान अज्ञानी को नहीं होता और वह उस तृप्ति से वंचित रह जाता है ] यही बात तैत्तिरीय श्रुति में बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कही है कि— जो इस तत्व को पहचान जानता है उसी की सब कामनायें पूरी हो जाती हैं। न जानने वाले तो केवल न जानने से ही इस महालाभ से वञ्चित ही रह जाते हैं। यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् सोश्नुते सर्वान् कामान् (तै० ब्र० १) । यद्वा सर्वात्मतां स्वस्य साम्ना गायति सर्वदा। अहमन्नं तथान्नादश्चेति साम ह्यधीयते ॥३७॥ ज्ञानी की 'सर्वकामावाप्ति' का तीसरा भी एक प्रकार है कि—वह ज्ञानी अपनी सर्वात्मकता [ सर्वरूपता ] को साम के द्वारा यों गाया करता है। वह प्रत्येक वस्तु को अपना आत्मा समझता है—वह जान जाता है कि मैं ही अन्न हूँ और मैं ही अन्न को खाने वाला भी हूँ । सामवेद में भी कहा है कि— अहमन्नमहमन्नमहमन्नमहमन्नादोहमन्नादोहमन्नादः। (तै० ३-१०) ऊपर के श्लोक में साक्षिभाव से सर्वकामप्राप्ति का वर्णन है इस श्लोक में सर्वात्मभाव से सर्वकामप्राप्ति का प्रतिपादन किया है। दुःखाभावश्च कामाप्तिरुभे ह्येवं निरूपिते। कृतकृत्यत्वमन्यच्च प्राप्तप्राप्यत्वमीक्षताम् ॥३८॥ यहां तक 'दुःखाभाव' और 'कामाप्ति' दोनों का निरूपण किया जा चुका। अब आगे 'कृतकृत्यता' तथा 'प्राप्तप्राप्यता' को भी समझ लो।

तृप्तिदीप नाम के प्रकरण में भले प्रकार कर दिया है, तौभी

५५० पंचदशी उभयं तृप्तिदीपे हि सम्यगस्माभिरीरितम् । त एवात्रानुसन्धेयाः श्लोका बुद्धिविशुद्धये ॥३९॥ कृतकृत्यता और प्राप्तप्राप्यता दोनों का ही निरूपण हम ने तृप्तिदीप नाम के प्रकरण में भले प्रकार कर दिया है, तौभी बुद्धि की शुद्धि के लिये उन्हीं श्लोकों को यहां भी समझ लेना चाहिये । ऐहिकामुष्मिकव्रातसिद्धयै मुक्तेश्च सिद्धये । बहुकृत्यं परास्याभूत् तत् सर्वमधुना कृतम् ॥४०॥ जब तक यह अज्ञानी था तब तक [इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट के परिहार के लिये] इस लोक और परलोक के कामों को सिद्ध करने के लिये तथा मुक्ति को पाने के लिये इसको बहुत कुछ करना शेष था, परन्तु अब आत्मज्ञान हो जाने पर [सांसारिक फल की इच्छा न रहने से] इसने वह सब कुछ कर ही सा डाला है । तदेतत् कृतकृत्यत्वं प्रतियोगिपुरःसरम् । अनुसन्दधदेवायंमेवं तृप्यति नित्यशः ॥४१॥ जो चीजें आत्मा की कृतकृत्यता का विरोध किया करती हैं उनके साथ ['कि मैं भी कभी ऐसा ही था'] जब अपनी कृत- कृत्यता को याद करता है तब नीचे लिखे प्रकार से तृप्ति उमड़ पड़ती है । दुःखिनोऽज्ञाः संसरन्तु कामं पुत्राद्यपेक्षया । परमानन्दपूर्णोऽहं संसरामि किमिच्छया ॥४२॥ अनुतिष्ठन्तु कर्माणि परलोकयियासवः । सर्वलोकात्मकः कस्मादनुतिष्ठामि किं कथम् ॥४३॥

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५१

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५१ जो अज्ञानी होने के कारण ही दुःखी हैं, वे पुत्र स्त्री आदि की चाह में फंस कर, संसाररूपी झाड़ में उलझे पड़े रहें। मैं भी कभी ऐसा उलझा पड़ा था परन्तु यह तो बताओ कि परमा- नन्द से परिपूर्ण मैं भला अब कौनसी इच्छा से संसाररूपी चक्कर पर चढ़कर घूमता रहूँ ? ॥४२॥ जिन अज्ञानियों को पर- लोक यात्रा में मज़ा आता हो वे [अपने वहम को पूरा करने के लिये] भले ही कर्म किया करें। परन्तु यह तो बताओ कि जो मैं सर्वलोकस्वरूप हो चुका हूँ वह मैं अब इन कर्मों को किस लिये करूँ और कैसे करूँ ? ॥४३॥ व्याचक्षतां ते शास्त्राणि वेदानध्यापयन्तु वा । येऽत्राधिकारिणो मे तु नाधिकारोऽक्रियत्वतः ॥४४॥ जो अधिकारी हैं वे लोग चाहे शास्त्रों पर टीकायें लिखें या वेदों को पढ़ायें परन्तु मुझ अक्रिय का तो कोई अधिकार ही नहीं रह गया है । निद्राभिक्षे स्नानशौचे नेच्छामि न करोमि च । द्रष्टारश्चेत् कल्पयन्ति किं मे स्यादन्यकल्पनात् ॥४५॥ सोना और भिक्षा स्नान तथा शौच की न मुझ आत्मा को कुछ आवश्यकता है और न मैं यह सब कुछ करता ही हूँ [यह तो सब यह शरीर ही किया करता है] फिर भी यदि देखने वाले संसारी लोग इन सब को मुझ में ही मानते हैं तो वे माना करें । दूसरों के मान लेने से मुझ में क्या हो जायगा ? तृप्तिदीप के २५८ वें श्लोक में इसकी विस्तृत व्याख्या की गई है । गुंजापुंजादि दह्येत नान्यारोपितवन्हिना । नान्यारोपितसंसारधर्मानैवमहं भजे ॥४६॥

५५२ पञ्चदशी दूसरों ने जिन गुंजाओं को अग्नि मान लिया है, वे गुंजा जैसे सचमुच ही जलाने नहीं लगतीं, इसी प्रकार दूसरों के माने हुए संसार के धर्मों को मैं आत्मा भी प्राप्त नहीं होता हूँ। शृण्वन्त्वज्ञाततत्वास्ते जानन् कस्माच्छृणोम्यहम् । मन्यन्तां संशयापन्ना न मन्येऽहमसंशयः ॥४७॥ जिनको तत्व का परिज्ञान आज तक नहीं हो पाया है, वे लोग इस तत्व का श्रवण करें। परन्तु इस तत्व को अच्छी तरह जानता हुआ मैं अब इसे क्यों सुनूँ ? जिनको अभी तक इस तत्व में कोई संशय हो रहा हो वे लोग इस तत्व का मनन भी करें। परन्तु संशय रहित हो चुकने वाला मैं तो अब इस का मनन नहीं करूंगा । विपर्यस्तो निदिध्यासेत् किं ध्यानमविपर्यये ॥ देहात्मत्वविपर्यासं न कदाचिद्भजाम्यहम् ॥४८॥ अहं मनुष्य इत्यादि व्यवहारो विनाप्यमुम् । विपर्यासं चिराभ्यस्तवासनातोऽवकल्पते ॥४९॥ जिसे अभी तक विपरीत ज्ञान हो रहा है उस का निदिध्यासन करना तो ठीक है, परन्तु जब किसी को विपर्यय ही न हो तब ध्यान कैसे होगा ? मुझे तो अब कभी इस देह के आत्मा का विपरीत ज्ञान होता ही नहीं ।४९। मैं जो अब भी कभी कभी यह कह देता हूँ कि मैं मनुष्य हूँ ? सो यह व्यवहार तो अनादि काल से बसी हुई वासनाओं के प्रताप से हो जाता.है। आरब्धकर्मणि क्षीणे व्यवहारो निवर्तते । कर्माक्षये त्वसौ नैव शाम्येद्ध्यानसहस्रतः ॥५०॥ प्रारब्ध कर्मों का क्षय जब होगा तब यह व्यवहार स्वयं

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५३

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५३ बन्द होजायगा। जब तक किसी के कर्म क्षीण नहीं हो जायँगे तब तक तो हज़ार ध्यान करने पर भी यह व्यवहार शान्त नहीं हो सकेगा। तृप्तिदीप के २६३ वें श्लोक में विस्तारपूर्वक व्याख्या की गयी है । विरलत्वं व्यवहृते रिष्टं चेद् ध्यानमस्तु ते । अवाधिकां व्यवहृतिं पश्यन् ध्यायाम्यहं कुतः ॥५१॥ यदि तुम व्यवहार को विरल [कम] करना चाहते हो तो तुम्हारे लिये ध्यान करना ठीक है । परन्तु व्यवहार को अबाधक देखता हुआ मैं भला ध्यान क्यों करूँ ? [ मुझे उसकी आवश्य- कता ही क्या है ? ] विक्षेपो नास्ति यस्मान्मे न समाधिस्ततो मम । विक्षेपो वा समाधिर्वा मनसः स्याद् विकारिणः ॥५२॥ क्योंकि मुझे कोई विक्षेप नहीं होता इसी से मुझे समाधि भी नहीं होती है । देखो कि—विक्षेप और समाधि ये दोनों तो विकारी मन को ही होते हैं । नित्यानुभवरूपस्य को मेऽत्रानुभवः पृथक् । कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्तमित्येव निश्चयः ॥५३॥ जो मैं नित्यानुभव रूप ही हूँ, उस मेरा पृथक् अनुभव क्या होगा ? मुझे तो अब यह निश्चय हो गया है कि जो करना था सो कर डाला और जो पाना था सो पा चुका हूँ । व्यवहारो लौकिको वा शास्त्रीयो वान्यथापि वा । ममाकर्तुरलेपस्य यथारब्धं प्रवर्तताम् ॥५४॥ लौकिक या शास्त्रीय या और किसी तरह का व्यवहार प्रारब्ध के अनुकूल चलता रहे, मैं तो अकर्ता और अलेप ही रहता हूँ ।

५५४ पञ्चदशी अथवा कृतकृत्योऽपि लोकानुग्रहकाम्यया । शास्त्रीयेणैव मार्गेण वर्तेहं का मम क्षतिः ॥५५॥ या फिर मैं तो कृतकृत्य ही हूँ, परन्तु तो भी लोक पर अनु- ग्रह करने की इच्छा से [ उनको उनका मार्ग दिखाने के लिये ] शास्त्रीय मार्ग से ही आचरण करता हूँ। इससे मेरी हानि ही क्या है ? देवार्चनस्नानशौचभिक्षादौ वर्ततां वपुः । तारं जपतु वाक् तद्वत् पठत्वाम्नायमस्तकम् ॥५६॥ विष्णुं ध्यायतु धीर्यद्वा ब्रह्मानन्दे विलीयताम् । साक्ष्यहं किंचिदप्यत्र न कुर्वे नापि कारये ॥५७॥ देवार्चन, स्नान, शौच तथा भिक्षा आदि कार्यों को यह शरीर किया करे। यह वाणी जोर से जपतो रहे या वेदान्तों का पाठ करती रहे। यह बुद्धि चाहे तो विष्णु का ध्यान करे, या ब्रह्मा- नन्द में विलीन हो जाय । परन्तु मैं तो इन में से कुछ भी करता या करवाता नहीं हूँ मैं तो केवल साक्षी हूँ । कृतकृत्यतया तृप्तः प्राप्तप्राप्यतया पुनः । तृप्यन्नेवं स्वमनसा मन्यतेऽसौ निरन्तरम् ॥५८॥ कृतकृत्य होने के कारण जो पहले ही तृप्त हो चुका है, जब वह प्राप्तप्राप्यता से फिर और अधिक तृप्त होता है तब मन ही मन ऐसा विचार किया करता है — धन्योऽहं धन्योऽहं नित्यं स्वात्मानमंजसा वेद्मि । धन्योऽहं धन्योऽहं ब्रह्मानन्दो विभाति मे स्पष्टम् ॥५९॥ मैं धन्य हूँ। क्योंकि अपने नित्य आत्मा को ठीक ठीक

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५५

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५५ समझ गया हूँ। मैं धन्य हूँ क्योंकि अब मुझे ब्रह्मानन्द स्पष्ट दीखने लगा है । धन्योऽहं धन्योऽहं दुःखं सांसारिकं न वीक्षेऽद्य । धन्योऽहं धन्योऽहं स्वस्याज्ञानं पलायितं क्वापि ॥६०॥ मैं धन्य हूँ । क्योंकि आज मैं किसी भी सांसारिक दुःख को नहीं देख रहा हूँ। मैं धन्य हूँ क्योंकि मेरा अज्ञान न मालूम कहां भाग गया है । धन्योऽहं धन्योऽहं कर्तव्यं मे न विद्यते किंचित् । धन्योऽहं धन्योऽहं प्राप्तव्यं सर्वमद्य संपन्नम् ॥६१॥ मैं धन्य हूँ मुझे कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं रहा है । मैं धन्य हूँ क्योंकि जो कुछ मुझे पाना था वहं सभी कुछ आज मेरा सिद्ध हो गया है । धन्योऽहं धन्योऽहं तृप्तिर्मे कोपमा भवेल्लोके । धन्योऽहं धन्योऽहं धन्यो धन्यः पुनः पुनर्धन्यः ॥६२॥ मैं धन्य हूँ बताओ कि संसार में आज मेरे समान तृप्त कौन हैं ? मैं और अधिक कहां तक कहता जाऊँ, बस मैं तो यही कहता हूँ कि मैं धन्य हूँ और अनन्त बार धन्य हूँ । अहो पुण्य महो पुण्यं फलितं फलितं दृढम् । अस्य पुण्यस्य संपत्ते रहो वयमहो वयम् ॥६३॥ ओहो ! आज मेरे कोटि जन्मों के पुण्यों के ढेर ने फलरूप धारण किया है । इस पुण्य संपत्ति के कारण आज मैं कृतकृत्यता की झूल में पड़ा झोटे ले रहा हूँ । अहो शास्त्र महो शास्त्र महो गुरु रहो गुरुः । अहो ज्ञानमहो ज्ञानमहो सुखमहो सुखम् ॥६४॥

५५६ पञ्चदशी जिन शास्त्रों, जिन अध्यात्मदर्शी गुरुओं, जिन ज्ञानों और जिन आनन्दों के कारण से, आज मुझे यह धन्य अवस्था हाथ लगी है, उन सब को अनेक अनेक बार धन्यवाद है [ वे सब के सब आज मुझे मेरा परम पद देकर समुत्तीर्ण हो गये हैं । उनकी महिमा को गाने के लिये मैं शब्दों को कहां से लाऊँ ?] ब्रह्मानन्दाभिधे ग्रन्थे चतुर्थोऽध्याय ईरितः । विद्यानन्द स्तदुत्पत्तिपर्यन्तोऽभ्यास इष्यताम् ॥६५॥ ब्रह्मानन्द नाम के ग्रन्थ में 'विद्यानन्द' नाम का चतुर्थ अध्याय समाप्त हुआ । इस विद्यानन्द की उत्पत्ति जब तक न हो जाय तभी तक ब्रह्माभ्यास करना आवश्यक होता है । [ इसके उत्पन्न हो जाने पर फिर ब्रह्माभ्यास करना शेष नहीं रह जाता ] इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितपंचदश्यां ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम्

15. Vishayananda

ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् अथात्र विषयानन्दो ब्रह्मानन्दांशरूपभाक् । निरूप्यते द्वारभूतस्तदंशत्वं श्रुतिर्जगौ ॥१॥ अब इस ग्रन्थ में ब्रह्मानन्द के ही एक भाग 'विषयानन्द' का निरूपण कर रहे हैं । क्योंकि वह भी ब्रह्मज्ञान का उपयोगी है । श्रुति ने भी अपने मुख से इस विषयानन्द को ब्रह्मानन्द का ही एक भाग कहा है । एषोऽस्य परमानन्दो योऽखण्डैकरसात्मकः । अन्यानि भूतान्येतस्य मात्रामेवोपभुञ्जते ॥२॥ श्रुति ने कहा है कि—जो कि अखण्ड और एकरस आनन्द है वही तो उस ब्रह्म का परमानन्द कहाता है । ये सम्पूर्ण भूत इसी परमानन्द की एक बूंद की किसी छोटी सी मात्रा को ही तो भोग रहे हैं । शान्ता घोरास्तथा मूढा मनसो वृत्तयस्त्रिधा । वैराग्यं क्षान्तिरौदार्य मित्याद्याः शान्तवृत्तयः ॥३॥ तृष्णा स्नेहो रागलोभावित्याद्या घोरवृत्तयः । संमोहो भयमित्याद्याः कथिता मूढवृत्तयः ॥४॥ मन की शान्त घोर तथा मूढ ये तीन तरह की वृत्तियां होती हैं । वैराग्य, क्षमा, उदारता आदि 'शान्त' वृत्तियां कहाती हैं । तृष्णा, स्नेह, राग, तथा लोभ आदि 'घोर' वृत्तियां हैं । संमोह तथा भय आदि 'मूढ' वृत्तियां कही गयी हैं । [ शान्त वृत्तियां सात्विक हैं, घोर वृत्तियां राजस होती हैं, मूढ वृत्तियां तामसी वृत्तियां मानी गयी हैं ] ।