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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

द्वैतविवेकप्रकरणम् १०५

द्वैतविवेकप्रकरणम् १०५ है। इस कारण मनोनिरोध रूपी योग का ही अभ्यास कर डालना चाहिये। इस विचारे ब्रह्मज्ञान से क्या होगा सो बताओ ? [ब्रह्मज्ञान को बन्ध का निवर्तक मानना ठीक बात नहीं है]। तात्कालिकं द्वैतशान्तावप्यागामिजनिक्षयः । ब्रह्मज्ञानं विना न स्यादिति वेदान्तडिण्डिमः ॥३९॥ सुनो, योग से तात्कालिक द्वैत तो शान्त हो सकता है, परन्तु आगामी जन्मों का नाश तो ब्रह्मज्ञान के बिना हो ही नहीं सकता। यह बात 'ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः (श्वे० ५-१३) 'ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति । यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः । तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति।' (श्वे० ६-२०) इत्यादि श्रुतियों में डंके की चोट कही गई है। ये श्रुतियां ब्रह्मज्ञान से बन्ध की निवृत्ति को कहती हैं। अनिवृत्ते ऽपीशसृष्टे द्वैते तस्य मृषात्मताम् । बुद्ध्वा ब्रह्म द्वयं बोद्धुं शक्यं वस्त्वैक्यवादिनः ॥४०॥ एकवस्तुवादी के मत में, ईश्वर का बनाया हुआ द्वैत भले ही बना रहो, उस को तो मिथ्या समझ लेने मात्र से ही अद्वितीय ब्रह्म का बोध हो सकता है। [ईश्वर के बनाये हुए द्वैत की मौजूदगी में ही यदि उस द्वैत को मिथ्या समझ लिया जाय तभी अद्वितीय ब्रह्मतत्त्व जाना जा सकता है। ईश्वर का बनाया हुआ द्वैत न रहेगा तो अद्वितीय ब्रह्मतत्त्व समझ में आ ही नहीं सकेगा। क्योंकि तब उस को जानने का साधन कुछ भी नहीं रहेगा। ईश्वर के द्वैत पर जब हम अपना द्वैत बनाने लगते हैं तब तो यह हमें बांधता है। जब हम इस को हटा कर

१०६ पञ्चदशी इस के मूलाधार को टटोलते हैं तब हमारी दृष्टि ब्रह्मतत्त्व पर जा पड़ती है । यों इस की सत्यता से हम बंधते हैं और इस के नकार से हम छुट जाते हैं। यों ईश्वर का द्वैत तो हमारे बड़े ही काम की वस्तु है] । प्रलये तन्निवृत्तौ तु गुरुशास्त्राद्यभावतः । विरोधिद्वैताभावेपि न शक्यं बोद्धुमद्वयम् ॥४१॥ प्रलय काल में, जब कि द्वैत छिप जाता है, और अद्वैत ज्ञान का विरोधी द्वैत नहीं रह जाता, तब भी अद्वय भाव को जाना नहीं जा सकता । क्योंकि अद्वय भाव को जताने वाले गुरु या शास्त्र उस समय नहीं रहते । जो यह समझा बैठा है कि द्वैत को मिथ्या समझने से अद्वैत ज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता । किन्तु अद्वैत ज्ञान के लिए द्वैत का निवारण कर डालना—द्वैत को मार भगाना—ही अत्या- वश्यक होता है, उसको यों समझाना चाहिये कि—प्रलय- काल में, जब कि तुम्हारे भी मत में द्वैत की निवृत्ति हो जाती है, जब कि विरोधी द्वैत का सर्वथा निवारण हो जाता है, जब कि अद्वैत ज्ञान का विरोध करनेवाला द्वैत शेष ही नहीं रह जाता है, तब ज्ञान के साधन गुरु अथवा शास्त्रादि के न रह जाने के कारण ही से, अद्वय वस्तु का बोध किसी को भी नहीं हो सकता। इसी से कहते हैं कि द्वैत का निवारण करना कोई आवश्यक बात नहीं है । उसको तो मिथ्या समझने से ही साधक का काम चलता है। यों मिथ्या समझने में ईश्वर के द्वैत का उपयोग है ही। अबाधकं साधकं च द्वैतमीश्वरनिर्मितम् । अपनेतुमशक्यं चेत्यास्तां तद् द्विष्यते कुतः ॥४२॥

['द्वैत के रहते रहते अद्वैतज्ञान कैसे हो सकता है' इसका समाधान यह है कि ] ईश्वर का बनाया हुआ द्वैत तो अद्वैत के ज्ञान में बाधा नहीं डालता । उसको ही तो मिथ्या समझने से अद्वैत ज्ञान की उत्पत्ति हुआ करती है । इस कारण वह तो अद्वैत ज्ञान की उत्पत्ति में किसी प्रकार की बाधा नहीं डाल सकता । प्रत्युत गुरुशास्त्रादिरूपी जो द्वैत है वह तो अद्वैत ज्ञान का साधक होता है । इसके अतिरिक्त ईश्वर के बनाये हुए आकाशादि रूप द्वैत को हम क्षुद्र संकल्प वाले लोग हटा भी तो नहीं सकते हैं [क्योंकि वह सत्य संकल्प है । उसका संकल्प हमसे नहीं तोड़ा जा सकता ] इन हेतुओं से उस बिचारे द्वैत को रहने दो, उससे द्वेष मत ठानो । जीवद्वैतं तु शास्त्रीयमशास्त्रीयमिति द्विधा । उपाददीत शास्त्रीयमातत्त्वस्यावबोधनात् ॥४३॥ 'शास्त्रीय' और 'अशास्त्रीय' भेद से जीव का बनाया हुआ द्वैत भी दो प्रकार का होता है । उसमें से तत्व का ज्ञान होने तक शास्त्रीय द्वैत को तो पकड़े ही रहना चाहिये । आत्मब्रह्मविचाराख्यं शास्त्रीयं मानसं जगत् । बुद्धे तत्त्वे तच्च हेयमिति श्रुत्यनुशासनम् ॥४४॥ प्रत्यग्रूप ब्रह्म का विचार या श्रवण आदि जिसको कहते हैं वह शास्त्रीय मानस जगत् [द्वैत ] कहाता है। जब तत्व का [पूरा पूरा] परिज्ञान हो चुके तब तो उस शास्त्रीय द्वैत का परित्याग कर ही डालना चाहिये । यह बात श्रुति ने कही है । साधक लोग तत्व के समझ में आजाने पर भी शास्त्रवासना में उलझे न रहकर ब्रह्माभ्यास को बढ़ाते जायें यही इसका भाव है ।

१०८ पञ्चदशी शास्त्राण्यधीत्य मेधावी अभ्यस्य च पुनः पुनः । परमं ब्रह्म विज्ञाय उल्कावत् तान्यथोत्सृजेत् ॥४५॥ ग्रन्थमभ्यस्य मेधावी ज्ञानविज्ञानतत्परः । पलालमिव धान्यार्थी त्यजेद् ग्रन्थमशेषतः ॥४६॥ तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः । नानुध्यायाद् बहूञ्छब्दान् वाचो विग्लापनं हि तत् ॥४७॥ [ तत्व बोध के बाद शास्त्रीय द्वैत को छोड़ ही देना चाहिये यह बात इन श्रुतियों में कही गयी है ] मेधावी पुरुष शास्त्रों को पढ़े, उनका बार बार अभ्यास करे, जब परब्रह्म को पहचान ले, उसके पश्चात् मार्ग देखकर निकम्मी हुई उल्का के समान उन्हें तुरन्त फेंक दे ॥४५॥ ग्रन्थों का अभ्यास करके जब ज्ञान तथा विज्ञान में तत्पर हो जाय तो फिर मेधावी पुरुष ग्रन्थों का पूर्ण परित्याग इस प्रकार कर दे जैसे धान्यार्थी लोग धान्य निकाल कर पुराल को कहीं भी पड़ा छोड़ देते हैं। [फिर साधकों को ग्रन्थव्यसन में नहीं उलझे रहना चाहिये। ग्रन्थ तो इस मार्ग तक हमें पहुँचा देने के लिए थे। इस परमपद को देखकर भी ग्रन्थों में फँसे रहना तो ऐसा है जैसे पार जाकर नाव पर से कोई उतरना ही न चाहता हो ] ॥४६॥ धीर ब्राह्मण उसी आत्म-तत्व को जान कर अपनी बुद्धि को सदा तदाकार बना डाले। शास्त्रों की खटपट में या बहुत सी बातों की उलझन में फँसा न रह जाय। क्योंकि वह वाणी की कोरी कसरत ही तो है ॥४७॥ तमेवैकं विजानीथ ह्यन्या वाचो विमुञ्चथ । यच्छेद्वाङ् मनसी प्राज्ञ इत्याद्याः श्रुतयः स्फुटाः ॥४८॥

[Header: द्वैतविवेकप्रकरणम् १०९]

[Header: द्वैतविवेकप्रकरणम् १०९]

'तमेवैकं जानथ आत्मान मन्या वाचो विमुञ्चथ अमृतस्यैष सेतुः' [मुण्ड. २-२-५] इस श्रुति में कहा गया है कि उसी एक तत्व को जान लो। उससे भिन्न समस्त वाणियों का परित्याग कर डालो। 'यच्छेद्वाङ् मनसी प्राज्ञः' (कठ १-३-१३) ज्ञानी पुरुष वाणियों को रोककर मन में बन्द कर दे [फिर निरर्थक हो चुके हुए वाग्व्यापार में फँसा न रह जाय]। इत्यादि श्रुतियों में इसी बात का प्रतिपादन स्पष्ट रीति से किया गया है। अशास्त्रीयमपि द्वैतं तीव्रं मन्दमिति द्विधा। कामक्रोधादिकं तीव्रं मनोराज्यं तथेतरत् ॥४९॥ उभयं तत्वबोधात् प्राङ् निवार्यं बोधसिद्धये। शमः समाहितत्वं च साधनेषु श्रुतं यतः ॥५०॥ अशास्त्रीय द्वैत भी 'तीव्र' और 'मन्द' दो प्रकार का होता है। कामक्रोधादि 'तीव्र द्वैत' कहाता है। मनोराज्य को 'मन्दद्वैत' कहते हैं ॥४९॥ ज्ञान की सिद्धि के लिये यह आवश्यक है कि—इन दोनों ही प्रकार के द्वैत का निवारण कर दिया जाय। क्योंकि ब्रह्म- ज्ञान के साधन जो नित्यानित्यवस्तुविवेक आदि हैं, उनमें शान्ति और समाधि दोनों ही सुने जाते हैं। [इसका अभिप्राय यही है कि जब तक शान्ति और समाधान नहीं होगा, तब तक तत्वज्ञान उत्पन्न ही नहीं हो सकेगा। इस कारण तत्वज्ञान से प्रथम प्रथम ही तीव्र और मन्द दोनों प्रकार के द्वैत का परित्याग कर देना चाहिये।] बोधादूर्ध्वं च तद्ध्येयं जीवन्मुक्तिप्रसिद्धये। कामादिक्लेशबन्धेन युक्तस्य नहि मुक्तता ॥५१॥ जब बोध हो चुके तब भी, इन दोनों प्रकार के द्वैतों का, परि-

११० पञ्चदशी त्याग ही रखना चाहिये। नहीं तो जीवन्मुक्ति का मजा हाथ ही नहीं आयगा। क्योंकि कामादि रूपी जो महाक्लेशकारक बन्धन है, जो पुरुष उससे युक्त हो रहा है वह पुरुष मुक्त कैसे हो सकेगा ? [बोध का इतना प्रताप तो होना ही चाहिये कि गीतोक्त दैवी संपत्ति का ज्ञानी में विकास हो जाय। ज्ञान के बाद यदि दैवी- संपत्ति नहीं आयी है तो वह ज्ञान ज्ञान नहीं है ज्ञानाभास है। “नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैन- माप्नुयात्”। जो दुश्चरितों से हटा नहीं है, जो शान्त नहीं है, जो समाधि नहीं करता है, जिसका मन शान्त नहीं हुआ है, वह पुरुष सूखे तत्वज्ञान से इस तत्व को पा नहीं सकता है। कोरे तत्वज्ञान से तो तत्व ज्ञानी स्वयं ही आत्मवंचन करता रहता है और परमार्थ पद को पाने से वंचित रह जाता है।] जीवन्मुक्तिरियं मा भूज्जन्माभावे त्वहं कृती। तर्हि जन्मापि तेऽस्त्वेव स्वर्गमात्रात् कृती भवान्॥५२। “यह जीवन्मुक्ति न मिले तो पड़ी मत मिलो, मैं तो केवल आगामी जन्म न मिलने से ही धन्य हो जाऊँगा” यह विचार दोष- युक्त है, क्योंकि स्वर्ग अर्थात् वैषयिक सुख से धन्यता मान लेने वाले तुम जन्म के बन्धन से छुट नहीं सकोगे। जन्म भी तुम्हारा होगा ही। “जो मैं जन्म-मरण लक्षण संसार से घबरा उठा हूँ, उस मुझे तो विदेह मुक्ति ही चाहिये। मुझे बार बार जन्म लेना न पड़े उसी से मैं कृतकृत्य हो जाऊंगा। इस, बीच की जीवन्मुक्ति से मुझे क्या लेना है? यह मुझे न मिले तो न सही।” ऐसा जिसको भ्रम हो गया हो उससे कहो कि—ऐहिक तुच्छ भोगों के छूटने के डर

द्वैतविवेकप्रकरणम् १११

द्वैतविवेकप्रकरणम् १११ से जब कि तुम जीवन्मुक्ति जैसे पद का त्याग कर रहे हो, तब क्या तुम स्वर्ग सुख के लोभ में फँसकर विदेहमुक्ति को छोड़ नहीं बैठोगे ? यों बार बार तुम्हारा जन्म होता ही रहेगा। क्योंकि तुम तो स्वर्ग मात्र से ही सन्तुष्ट होने वाले प्राणी ठहरे। जो तुम ऐहिक भोगों का लालच भी नहीं छोड़ सकते हो उस तुम्हें मुक्ति का ढोंग छोड़ देना चाहिये । क्षयातिशयदोषेण स्वर्गो हेयो यदा तदा। स्वयं दोषतमात्मायं कामादिः किं न हीयते ॥५३॥ "क्षय की अधिकतारूपी दोष से [अथवा नाश और दूसरे की अधिकता की ईर्षा से] हम स्वर्ग का परित्याग करते हैं" ऐसा यदि कहो तो बताओ फिर सकल पुरुषार्थों के विघातक इस दोषरूप कामादि को ही क्यों नहीं छोड़ देते हो ? [दोषी स्वर्ग को छोड़ने वाले को अत्यन्त दोषी कामादि तो छोड़ ही देने चाहियें ।] तत्त्वं बुद्ध्वापि कामादीन्निःशेषं न जहासि चेत् । यथेष्टाचरणं ते स्यात् कर्मशास्त्रातिलङ्घिनः ॥५४॥ आत्मतत्व को जानकर भी यदि तू पूर्णरूप से कामादि को नहीं छोड़ेगा तो इस का परिणाम यही होगा कि तत्वज्ञानीपने के अभिमान में आकर तू कर्मशास्त्र [कर्तव्य बताने वाले शास्त्र] की आज्ञाओं को टालने लगेगा और यों तू एक यथेष्टाचारी हो जायगा [सो भाई ! यह भला तत्वज्ञान हुआ यों तो तू संसारियों से भी गया बीता हो जायगा। तीर्थ के कव्वों की तरह तू भी ज्ञान का भांड, या राम राम रटने वाला तोता हो जायगा ।] बुद्धाद्वैतस्वतत्वस्य यथेष्टाचरणं यदि । शुनां तत्त्वदृशां चैव को भेदोऽशुचिभक्षणे ॥५५॥

११२ पञ्चदशी सुरेश्वराचार्य ने कहा कि—अद्वैतरूप आत्मतत्व को जान चुका हुआ भी यदि अभी तक यथेष्टाचारी ही है, तो फिर वह अशुचिभक्षणादि गर्हित से गर्हित काम भी करेगा ही। फिर बताओ कि विधि निषेध की आज्ञा न मानने वाले ऐसे तत्व ज्ञानियों में और कुत्तों में क्या भेद रह गया ? 'सर्वे ब्रह्म वदिष्यन्ति संप्राप्ते हि कलौ युगे। तानुत्तिष्ठन्ति मैत्रेय शिश्नो- दरपरायणाः' कलियुग जब आयगा तब ब्रह्म की चर्चा तो बहुतायत से होगी, परन्तु उपस्थ और पेट के गुलाम बनकर करें धरेंगे कुछ भी नहीं। ऐसी शोचनीय अवस्था जिस की है वह ज्ञानी नहीं है वह तो ज्ञानिविदूषक है। ऐसे ज्ञानी से तो अज्ञानी ही अच्छे हैं। क्योंकि वे अपने दोष को स्वीकार तो करते हैं। औषध खाकर जैसे पथ्य न किया जाय ऐसे ही ब्रह्मज्ञानी हो कर यदि व्यवहार शुद्धि नहीं है, यदि दैवी संपत्ति नहीं आयी है, तो इस सूखे ब्रह्मज्ञान से क्या होना है ? प्रत्युत ऐसा ब्रह्मज्ञान घातक हो सकता है (सरकण्डे के फूल पर जैसे फल नहीं लगता इसी प्रकार ऐसे शुष्क ब्रह्मज्ञान रूपी पुष्प पर मुक्तिरूपी फल नहीं लगता) बोधात् पुरा मनोदोषमात्रात् क्लिश्नास्यथाधुना । अशेषलोकनिन्दा चेत्यहो ते बोधवैभवम् ॥५६॥ जब तक तुझे तत्वज्ञान नहीं हुआ था तब तक तो तुझे केवल काम क्रोधादि मनोदोष ही क्लेश पहुँचाया करते थे। परन्तु अब तत्वज्ञान हो जाने पर वे कामादि मनोदोष तो हैं ही, उनके साथ ही साथ अब तेरी सर्वलोकनिन्दा भी होने लगी है [कि देखो तत्वज्ञानी हो कर भी यह बुरे बुरे काम करता है] यों

द्वैतविवेकप्रकरणम् ११३

द्वैतविवेकप्रकरणम् ११३ तुझे दुगना क्लेश अब हो गया है। अरे भाई, तेरा बोधवैभव भी विचित्र ही है [ परमात्मा करे ऐसा बोध किसी को भी न हो।] विड्वराहादितुल्यत्वं मा कांक्षीस्तत्वविद् भवान् । सर्वधीदोषसन्त्यागाल्लोकैः पूज्यस्व देववत् ॥५७॥ (तुम अब तत्वज्ञानी हो गये हो तो मैला खाने वाले सूकरादि अधम प्राणियों के समान होना मत चाहो) किन्तु सब ही दोषों को छोड़ कर देवताओं की तरह पूजो। यदि तुम तत्वज्ञानी हो गये हो—सर्वाधिक उत्कर्ष का कारण ज्ञान यदि तुम्हें प्राप्त हो गया है—तो कामादि को त्याग देने की असमर्थता के कारण, निकृष्ट से निकृष्ट ग्रामसूकर आदि के तुल्य मत हो जाओ। जिन काम क्रोधादि में ग्राम के सूकर आदि अधम प्राणी भी फँस रहे हैं, तत्वज्ञानी होकर तुम उन काम क्रोधादि में मत फँसे रहो। किन्तु कामादि नाम के जितने भी मनोदोष हैं, उन सब को छोड़ कर देवता के समान सब लोगों के पूज्य हो जाओ। तत्वज्ञान का इतना तो दृष्ट फल भी होना ही चाहिये। (तत्वज्ञान की चार बातें मुँह से निकालकर भी यथेष्टाचारी होने से हमारी अपनी ही हानि नहीं होती, प्रत्युत तत्वज्ञान का मार्ग बदनाम होता है) इससे लोगों को घृणा होती है और बहुत से साधक हमारे पापाचार को देखकर इस मार्ग में आने से परहेज़ करने लगते हैं। यों हमारे यथेष्टाचरण से अकल्पित अनन्त हानियाँ होती हैं । काम्यादिदोषदृष्ट्याद्याः कामादित्यागहेतवः । प्रसिद्धा मोक्षशास्त्रेषु तानन्विष्य सुखी भव ॥५८॥

५१४ पञ्चदशी काम्य और द्वेष्य पदार्थों में जो (अनित्यता तथा साति- शयता आदि) दोष भरे पड़े हैं, उन दोषों पर दृष्टि रखना आदि बातें, कामादि के त्याग करने के साधन हैं। ये साधन मोक्ष- शास्त्रों में जहां-तहां कहे गये हैं। उन सब साधनों को वहां से ढूँढ लो [वैसे बनो] और सुखी हो जाओ। त्यज्यतामेष कामादि मनोराज्ये तु का क्षतिः । अशेषदोषबीजत्वात् क्षतिर्भगवतेरिता ॥५९॥ “अनर्थ के कारण इन कामादियों को तो हम त्याज्य मान लेते हैं। परन्तु मनोराज्य तो वैसा नहीं है। सो हम मनोराज्य करते रहें, उस में भला क्या हानि है ?” यह विचार भी ठीक नहीं है क्योंकि—यद्यपि मनोराज्य से साक्षात् तो कोई अनर्थ नहीं होता है, परन्तु परम्परा से तो सम्पूर्ण दोषों का मूलकारण यह मनोराज्य ही है। इस से मनोराज्य से बड़ी हानि होती है यह बात भगवान् कृष्ण ने कही हैं। ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषूपजायते । सङ्गात् संजायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते॥६०॥ जो पुरुष विषयों का ध्यान करता [किंवा मनोराज्य करता] रहता है, वह फिर उन विषयों को अच्छा समझने लगता है [अर्थात् उसे उन विषयों में संग हो जाता है]। संग से कामना की उत्पत्ति होती है [वह फिर उन विषयों को अपने लिये मांगने या चाहने लगता है] उस कामना से क्रोध उत्पन्न हो जाता है। [उस कामना के पूरा होने में जो रुकावट डालता है उस पर क्रोध आता है ] यों मनोराज्य ही तो सम्पूर्ण अनर्थों की जड़ है।

द्वैतविवेकप्रकरणम् ११५

द्वैतविवेकप्रकरणम् ११५ शक्यं जेतुं मनोराज्यं निर्विकल्पसमाधितः । सुसंपादः क्रमात् सोऽपि सविकल्पसमाधिना ॥६१॥ केवल निर्विकल्प समाधि से ही मनोराज्य जीता जा सकता है। वह निर्विकल्प समाधि धीरे धीरे सविकल्प समाधि करते करते प्राप्त हो सकती है। बुद्धतत्त्वेन धीदोषशून्येनैकान्तवासिना । दीर्घं प्रणवमुच्चार्य मनोराज्यं विजीयते ॥६२॥ जिस को आत्मतत्व का ज्ञान हो चुका हो—जिस को आत्मद्रव्य की सूचना सद्गुरु से मिल चुकी हो—बुद्धि के काम क्रोधादि दोषों से जो रहित हो चुका हो, जो विजन देश (हृदय) में रहने लगा हो, ऐसा पुरुष [चार छ आठ दस किंवा बारह मात्रा] लम्बे प्रणव का उच्चारण कर करके मनोराज्य को जीत सकता है । जिते तस्मिन् वृत्तिशून्यं मनस्तिष्ठति मूकवत् । एतत्पदं वसिष्ठेन रामाय बहुधेरितम् ॥६३॥ उस मनोराज्य के जीत लेने पर मन के सकल व्यापार इस प्रकार बन्द हो जाते हैं जैसे कि गूंगा आदमी सम्पूर्ण वाग्व्यव- हार से रहित होकर चुपचाप बैठा होता है। ऐसे शान्त पद का वर्णन वशिष्ठ ने राम के प्रति अनेक प्रकार से किया है । [इस कारण इस दशा को परम पुरुषार्थ मानना चाहिये ] । दृश्यं नास्तीति बोधेन मनसो दृश्यमार्जनम् । संपन्नं चेत्तदुत्पन्ना परा निर्वाणनिर्वृतिः ॥६४॥ 'नेह नानास्ति किंचन'(बृ०४-४-१९) इस श्रुति के अनुसार जब यह ज्ञान हो जाय कि 'दृश्य नहीं है' और इस ज्ञान के

प्रताप से जब मन में से दृश्य का निवारण हो चुका हो [ जब बोधरूपी झाडू से मनरूपी घर में से दृश्यरूपी कूड़े को बुहार डाला हो] तब यह जान लेना चाहिये कि परा निर्वाण निर्वृति किंवा निरतिशय मोक्ष सुख प्राप्त हो चुका है । विचारितमलं शास्त्रं चिरमुद्ग्राहितं मिथः । सन्त्यक्तवासनान्मौनादृते नास्त्युत्तमं पदम् ॥६५॥ अद्वैत शास्त्र को हमने खूब विचार कर देख लिया है, गुरु शिष्यादि संवाद के द्वारा आपस में बहुत दिनों तक एक दूसरे को समझा देखा है, इतना सब करने पर हम तो इसी निश्चय पर पहुँचे हैं कि वासनारहित मौन से उत्तम कोई पद ही नहीं है [तात्पर्य यह है कि कामादि वासनाओं के निकल जाने से मन में जब तूष्णींभाव किंवा मौनावस्था आ जाती है तब इस दशा से उत्तम दशा कोई भी नहीं है] । विक्षिप्यते कदाचिद्धीः कर्मणा भोगदायिना । पुनः समाहिता सा स्यात् तदैवाभ्यासपाटवात् ॥६६॥ [ वृत्तिरहित हुआ भी चित्त प्रारब्ध कर्मों से जब कभी विक्षिप्त होने लगे तब उस का इलाज बताया जाता है कि ] भोगदायी प्रारब्ध कर्म के बल से यदि कभी बुद्धि विक्षिप्त हो जाती हो तो वह बुद्धि प्रबल अभ्यास के सामर्थ्य से फिर भी समाहित हो जाती है । [इस से साधकों को अभ्यास को बढ़ाना चाहिये ] । विक्षेपो यस्य नास्त्यस्य ब्रह्मवित्वं न मन्यते । ब्रह्मैवायमिति प्राहुर्मुनयः पारदर्शिनः ॥६७॥ जिस को कभी विक्षेप ही नहीं होता है उस को तो ब्रह्मवित्

द्वैतविवेकप्रकरणम् ११७

द्वैतविवेकप्रकरणम् ११७ नहीं माना जाता । वेदान्त के पारदर्शी मुनि लोग तो कहते हैं कि वह तो साक्षात् ब्रह्म ही है । [उस महापुरुष को पूर्वाभ्यास- वश गौणरूप से ही 'ब्रह्मवित्' कहा जा सकता है] । दर्शनादर्शने हित्वा स्वयं केवलरूपतः । यस्तिष्ठति स तु ब्रह्मन् ब्रह्म न ब्रह्मवित्स्वयम् ॥६८॥ वशिष्ठ ने भी कहा है कि—ब्रह्म को जानता हूँ या ब्रह्म को नहीं जानता हूँ इन दोनों ही झगड़ों को छोड़ कर जो महा पुरुष स्वयं केवल अद्वितीय चैतन्य रूप से अवस्थित हो बैठता है, अथवा केवल बन जाता है हे ब्रह्मन् ! वह तो साक्षात् ब्रह्म ही है [ऐसे महापुरुष को ब्रह्मज्ञानी कह कर छोटा सा बना देना ठीक नहीं है]। जीवन्मुक्तेः पराकाष्ठा जीवद्वैतविवर्जनात् । लभ्यतेऽसावतोऽत्रेद मीशद्वैताद्विवेचितम् ॥६९॥ उक्त प्रकार की जीवन्मुक्ति की अन्तिम अवस्था किसी को जभी मिल सकती है जब वह जीव के द्वैत [किंवा मनोमय प्रपंच] का परित्याग कर चुका हो । इसी कारण से हमने ईश्वर के बनाये हुए द्वैत से जीव के द्वैत को पृथक् करके मुमुक्षु लोगों को दिखा दिया है । इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितं द्वैतविवेकप्रकरणं समाप्तम्

5. Mahavakya Viveka

ओम्

महावाक्यविवेकप्रकरणम् ॥५॥

येनेक्षते शृणोतीदं जिघ्रति व्याकरोति च । स्वाद्वस्वादू विजानाति तत्प्रज्ञानमुदीरितम् ॥१॥ जिस से देखता है, सुनता है, सूंघता है, बोलता है, स्वादु अस्वादु को जानता है, उसी को 'प्रज्ञान' कहा जाता है । 'प्रज्ञानं ब्रह्म' (ऐत० ५-१) 'अहं ब्रह्मास्मि' (बृ० १-४-१०) 'तत्त्वमसि' (छा० ६-८-७) 'अयमात्मा ब्रह्म' (बृ० २-५-१९) ये चार महावाक्य हैं। जिन से मुमुक्षु को मोक्ष के साधन ब्रह्मात्मै- कता का ज्ञान हो जाता है । इन्हीं चारों वाक्यों के अर्थों का निरूपण इस प्रकरण में किया है । सब से प्रथम ऋक्शाखा के ऐतरेयारण्यक के 'प्रज्ञानं ब्रह्म' इस महावाक्य का अर्थ करते हुए प्रज्ञान शब्द का अर्थ बताया जाता है कि—चक्षु और श्रोत्र के द्वारा बाहर निकली हुई अन्तःकरण की वृत्ति से उपहित जिस चैतन्य से यह संसार रूपादि पदार्थों को देखा करता और शब्दों को सुना करता है, नासिका के द्वारा बाहर निकली हुई अन्तःकरण वृत्ति को उपाधि बनाये हुए जिस चैतन्य से भले बुरे गन्ध सूंघे जाते हैं, वागिन्द्रिय से ढके हुए जिस चैतन्य से शब्द बोले जाते हैं, रसना से निकले हुए अन्तःकरण की वृत्ति को अपनी उपाधि बनाये हुए जिस चैतन्य से स्वादु और

महावाक्यविवेकप्रकरणम् ११९

महावाक्यविवेकप्रकरणम् ११९

अस्वादु रस पहचाने जाते हैं, एवं और भी सकलेन्द्रियों तथा अन्तःकरण की भिन्न भिन्न वृत्तियों से जिस चैतन्य की सूचना तत्वदर्शी को जब तब मिला करती है, उसी चैतन्य को इस महावाक्य में 'प्रज्ञान' कहा गया है। चतुर्मुखेन्द्रदेवेषु मनुष्याश्वगवादिषु । चैतन्यमेकं ब्रह्मातः प्रज्ञानं ब्रह्म मय्यपि ॥२॥ अब ब्रह्म शब्द का अर्थ बताया जाता है [ उत्तम कहाने वाले] चतुर्मुख इन्द्र तथा देवों में [मध्यम कहाने वाले] मनुष्यों में तथा [अधम कहाने वाले ] घोड़े गाय आदि में [ एवं आकाशादि भूतों में] जो एक चैतन्य व्याप्त हो रहा है [जिस से इस जगत् के जन्म स्थिति और प्रलय हो भी रहे हैं और प्रतीत भी हो रहे हैं] वही ब्रह्मतत्व है। क्योंकि सब जगह रहने वाला 'प्रज्ञान' ही 'ब्रह्म' है। इसी से कहता हूँ कि मुझ में भी जो 'प्रज्ञान' है वह भी 'ब्रह्म' ही है [क्योंकि मेरे और उनके 'प्रज्ञान' में कोई भी भेद नहीं है]। परिपूर्णः परात्मास्मिन् देहे विद्याधिकारिणि । बुद्धेः साक्षितया स्थित्वा स्फुरन्नहमितीर्यते ॥३॥ [अब यजुः शाखा की बृहदारण्यक उपनिषद् के 'अहं ब्रह्मास्मि' इस वाक्य के अर्थ को प्रकट करने के लिये इस श्लोक में 'अहं' शब्द का अर्थ बताया जाता है] यों तो सभी देहों में परात्मा परिपूर्ण हो रहा है और वह सभी की बुद्धियों का साक्षी भी है, परन्तु जब किसी अधिकारी देह में परिपूर्ण हुआ वह परमात्मा, बुद्धि के साक्षीरूप में अधिकारी को भासने भी लग पड़ता है तब उसी स्फूर्तियुक्त परात्मा को इस वाक्य में 'अहं' [मैं] कहा गया है।

३२० पञ्चदशी


यद्यपि परात्मतत्व समस्त देशों, सम्पूर्ण कालों, तथा सकल वस्तुओं से अपरिच्छिन्न ही है, परन्तु वह इस मायाकल्पित जगत् में माया की ओढ़नी ओढ़ कर छिप कर बैठ गया है। जब तो वही परमात्मा शमदमादि साधनों से युक्त होने के कारण, ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के योग्य बने हुए, और श्रवण मननादि किये हुए, मनुष्यादि के अधिकारिशरीर में, बुद्धि किंवा सूक्ष्म शरीर का भासक होकर फिर प्रकाशित होने लग पड़ता है— अपनी माया की ओढ़नी को उतार कर फेंक देता है—इस महा- वाक्य का 'अहं' शब्द उसी परात्मा की ओर को इशारा कर रहा है। स्वतः पूर्णः परात्ममात्र ब्रह्मशब्देन वर्णितः । अस्मीत्यैक्यपरामर्श स्तेन ब्रह्म भवाम्यहम् ॥४॥ [अब इसी 'अहं ब्रह्मास्मि' महावाक्य में के ब्रह्म शब्द का अर्थ बताया जाता है] स्वभाव से ही [देशकालादि के परि- च्छेद में न आने वाले] परिपूर्ण परात्मा को इस महावाक्य में 'ब्रह्म' कहा गया है। इसी महावाक्य में जो कि 'अस्मि' [हूँ] पद है, उस से जीव और ब्रह्म की एकता का परामर्श किया गया है। जिस का यही सारांश होता है कि मैं ब्रह्म ही हूँ। [मनुष्यादि देहों की दुर्बलताओं से दब कर मरने वाला—मनु- ष्यादि देहों के परिच्छेद में आकर क़ैदी बना हुआ—इन देहेन्द्रियादिरूपी उपनेत्र की क्षुद्र और संकीर्ण दृष्टि से ही विचार करने वाला—क्षुद्र प्राणी मैं नहीं हूँ]। एकमेवाद्वितीयं सन्नामरूपविवर्जितम् । सृष्टेः पुराधुनाप्यस्य तादृक्त्वं तदितीर्यते ॥५॥

महावाक्यविवेकप्रकरणम् १२१

महावाक्यविवेकप्रकरणम् १२१ [अब सामवेद शाखा के छान्दोग्य उपनिषत् के 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य का अर्थ बताने के लिये पहले 'तत्' पद का लक्ष्य अर्थ बताया जाता है] सृष्टि से पहले जो सजातीय, विजातीय और स्वगत भेद से शून्य, तथा नामरूप से रहित सद्धस्तु 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' इस श्रुति में बतायी गई है, सृष्टि बन जाने के बाद अब भी वह सद्धस्तु वैसी की वैसी ही है, यह बात विचार दृष्टि से ही देखने की है । उस सद्धस्तु में अब भी कोई विकार नहीं आया है 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य का 'तत्' शब्द उसी की ओर को इशारा कर रहा है [तत् शब्द के उस लक्ष्यार्थ तक केवल अधिकारी की ही उदार दृष्टि पहुँच सकती है । जिसका यह देह अन्तिम देह हो,जिसको इस देह के पश्चात् दूसरा देह मिलना ही न हो,उसी को हम अधिकारी देह कहते हैं। सब से पिछले देह को ही विद्याधिकारी देह भी कहा जाता है। ] श्रोतुर्देहेन्द्रियातीतं वस्त्वत्र त्वंपदेरितम् एकता ग्राह्यतेऽसीति तदैक्यमनुभूयताम् ॥६॥ [अब 'तत्त्वमसि' के 'त्वं' पद का लक्ष्यार्थ बताया जाता है] श्रवणादि का अनुष्ठान करके जिसने इस महावाक्य को समझना है, उसके देहेन्द्रियों किंवा तीनों देहों से अलग रहने वाला, उसके तीनों देहों का साक्षी, जो कोई भी पदार्थ है, उसीको इस महा वाक्य का 'त्वं' पद लक्षणा से कह रहा है। इसी वाक्य के 'असि' पद से 'तत्' और 'त्वं' दोनों पदों में रहने वाली एकता का ग्रहण अधिकारी को कराया जाता है। मुमुक्षु लोगों को चाहिये कि उन 'तत्' और 'त्वं' पदार्थों की जो एकता अब प्रमाण- पुष्ट हो चुकी है उसका दिव्यानुभव वे भी ले लें।

३२२ पञ्चदशी स्वप्रकाशापरोक्षत्वमयमित्युक्तितो मतम् । अहंकारादिदेहान्तात् प्रत्यगात्मेति गीयते ॥७॥ [अब क्रमानुगत अथर्ववेद के अयमात्माब्रह्म इस वाक्य के अर्थ का व्याख्यान करते हुए 'अयम्' और 'आत्मा' इन दोनों का जो अभिप्राय है उसको क्रम से दिखाया जाता है] जो तत्व स्वयं प्रकाश होने के कारण ही प्रत्यक्ष हो रहा हो, उसको इस महावाक्य का 'अयम्' शब्द कह रहा है। क्योंकि यह तत्व धर्माधर्मादि के समान सदा परोक्ष रहने वाला नहीं है तथा घटादि के समान दृश्य पदार्थ भी नहीं है । अहंकार से लेकर देहपर्यन्त (अहंकार प्राण मन इन्द्रिय तथा देह का) जो संघात है,उस सभी का अधिष्ठान तथा सभी का साक्षी होने के कारण जो तत्व सभी से प्रत्यक् है, किंवा सभी का आन्तर है, इस महावाक्य में उसी को 'आत्मा' कहा गया है । क्योंकि वह तो सभी के अन्दर व्याप्त रहने वाली वस्तु है । दृश्यमानस्य सर्वस्य जगतस्तत्वमीर्यते । ब्रह्मशब्देन, तद् ब्रह्म स्वप्रकाशात्मरूपकम् ॥८॥ [अब 'अयमात्मा ब्रह्म' इस महावाक्य के ब्रह्म शब्द का जो अर्थ विवक्षित है उसका वर्णन किया जाता है] इस दृश्यमान क्षणभंगुर जगत् का जो सत्य तत्व है, उसी को 'ब्रह्म' शब्द कह रहा है । स्वयंप्रकाश तथा आत्मरूप जो ब्रह्म है वह यह आत्मा ही तो है । सब को सदा प्रत्यक्ष रहने वाले इस आत्मा से भिन्न कोई भी ब्रह्म नामका तत्व नहीं है । आकाशादि जगत्, जो कि दृश्य होने के कारण ही मिथ्या है, इस जगत् का जो अधिष्ठान है—इस जगत् की बाधा हो

महावाक्यविवेकप्रकरणम् १२३

महावाक्यविवेकप्रकरणम् १२३

जाने पर भी जो पारमार्थिक तत्व शेष रह जाता है, जिसको सच्चिदानन्दस्वरूप भी कहा जाता है, वही तो इस वाक्य के 'ब्रह्म' शब्द का अर्थ है । महावाक्य का संपिण्डित अर्थ तो यह हुआ कि—ऐसा जो स्वयं प्रकाश तथा आत्मरूप ब्रह्म है वह यही आत्मा है । इस आत्मा से भिन्न किसी को ब्रह्म समझना भारी भूल है ।

इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितं महावाक्यविवेकप्रकरणं समाम्

6. Chitradipa

ओम् चित्रदीपप्रकरणम् यथा चित्रपटे दृष्टमवस्थानां चतुष्टयम् । परमात्मनि विज्ञेयं तथावस्थाचतुष्टयम् ॥१॥ चित्रयुक्त पट में जैसे [आगे कही हुई] चार अवस्थायें देखी जाती हैं, इसी प्रकार परमात्मा की भी [आगे कही] चार अवस्थायें जाननी चाहियें । 'अध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपंचं प्रपञ्च्यते' क्योंकि आत्मतत्व निष्प्रपंच है, इस कारण उसका सीधा निरूपण तो हो ही नहीं सकता, परन्तु अध्यारोप तथा अपवाद नाम के दो ऐसे सहारे अध्यात्मशास्त्र ने ढूँढ निकाले हैं कि उन से उसका वर्णन शक्य हो गया है । इस न्याय के अनुसार जो जगत् परमात्मा में आरोपित हो रहा है, उसकी स्थिति कैसी है, इस का स्पष्टी- करण इस प्रकरण में किया गया है । इस निरूपण से यह होगा कि इस आरोपित जगत् का निषेध करने में बड़ी सुकरता हो जायगी । यथा धौतो घट्टितश्च लाञ्छितो रञ्जितः पटः । चिदन्तर्यामी सूत्रात्मा विराड् चात्मा तथेर्यते ॥२॥