भारतकोश
संग्रह पर लौटें

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

२२ पञ्चदशी युक्ति से कर लेते हैं तब उस समय उनका आत्मा परब्रह्म ही हो जाता है। जैसे मूंज में से सींक को युक्ति से बाहर निकाल लेते हैं इसी प्रकार आत्मा को भी अन्वयव्यतिरेक नामक युक्ति के सहारे से धीर [ब्रह्मचर्यादिसाधनसम्पन्न अधिकारी] लोग यदि प्रथम कहे हुए तीनों शरीरों में से पृथक् कर लें तो उनका वह आत्मा परब्रह्म ही हो जाता है। फिर तो चिदानन्दरूपी लक्षण उन दोनों में समान ही हो जाता है, फिर उसके ब्रह्म होने में संशय नहीं रहता। परापरात्मनोरेवं युक्त्या संभावितैकता । तत्त्वमस्यादिवाक्यैः सा भागत्यागेन लक्ष्यते ॥४३॥ इस प्रकार 'पर' और 'अपर' आत्मा की एकता को युक्ति से अंगीकार किया गया। उसी एकता को 'तत्त्वमसि' आदि वाक्य भागत्याग लक्षणा से लक्षित कर रहे हैं। यहां तक पर और अपर आत्मा की [जिनको 'परमात्मा' और 'जीवात्मा' भी कहा जाता है] एकता की संभावना [लक्षण की समानता आदि उपायों से ] की गयी है। उसी एकता को 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्य भागत्याग लक्षणा [विरोधी भाग को छोड़कर अविरोधी भाग को लेने वाली लक्षणा ] से स्पष्ट ही लक्षित कर रहे हैं। जगतो यदुपादानं मायामादाय तामसीम् । निमित्तं शुद्धसत्त्वां तामुच्यते ब्रह्म तद्गिरा ॥४४॥ तमःप्रधान माया को लेकर जो जगत् का उपादान हो जाता है, तथा जो शुद्धसत्त्वप्रधान माया को लेकर जगत् का निमित्त

तत्त्वविवेकप्रकरणम् २३ बन जाता है उस ब्रह्म को ही तत्त्वमसि के 'तत्' शब्द से कहा जाता है । सच्चिदानन्दस्वरूप जो ब्रह्म तमोगुण प्रधान माया को लेकर [ उसको उपाधि भाव से स्वीकार करके ] तो इस चराचरात्मक जगत् का उपादान [ अथवा अध्यास का अधिष्ठान ] हो जाता है, तथा विशुद्धसत्त्वप्रधान उसी माया को लेकर [ उसको अपनी उपाधि मानकर ] निमित्त [ किंवा उपादानादि को जाननेवाला कर्त्ता ] हो जाता है, वह निमित्त तथा उपादान उभयरूपी 'ब्रह्म' ही 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों के 'तत्' पद से कहा गया है । घट आदि पदार्थों के जैसे निमित्त और उपादान कारण अलग अलग होते हैं, वैसे जगत् का निमित्त और उपादान पृथक् पृथक् नहीं है । यदा मलिनसत्त्वां तां कामकर्मादिदूषिताम् । आदत्ते तत्परं ब्रह्म त्वंपदेन तदोच्यते ॥४५॥ वही ब्रह्म जिस अवस्था में मलिनसत्त्वप्रधान होने के कारण ही कामकर्मादि से दूषित उस अविद्या नामवाली माया को उपाधिभाव से स्वीकार कर बैठता है तब उसी ब्रह्म को 'त्वं' पद से कहा जाने लगता है । त्रितयीमपि तां मुक्त्वा परस्परविरोधिनीम् । अखण्डं सच्चिदानन्दं महावाक्येन लक्ष्यते ॥४६॥ परस्पर विरुद्ध उस तीन प्रकार की माया को छोड़ देने पर तो तत्त्वमसि आदि महावाक्य अखण्ड सच्चिदानन्द ब्रह्म को लक्षित कर देते हैं । तमःप्रधान, विशुद्धसत्त्वप्रधान और मलिनसत्त्वप्रधान इन तीनों प्रकार की परस्परविरोधिनी उस पूर्वोक्त माया का जब

२४ पञ्चदशी परित्याग कर दिया जाता है, उस समय तत्त्वमसि आदि महा- वाक्य आते हैं और अधिकारी के सामने भेदरहित सच्चिदानन्द ब्रह्म को लक्षित करके चले जाते हैं। अनधिकारी लोग उस समय पागलों की तरह देखते ही रह जाते हैं। सोयमित्यादिवाक्येषु विरोधात्तदिदन्तयोः । त्यागेन भागयोरेक आश्रयो लक्ष्यते यथा ॥४७॥ 'सोयंदेवदत्तः' इत्यादि वाक्यों में 'तत्ता' और 'इदन्ता' का विरोध होने से इन दोनों विरोधी भागों का त्याग करके, इनके आश्रय, एक देवदत्त की लक्षणा जैसे हो जाती है— 'यह वह देवदत्त है' इस वाक्य में 'यह' का मतलब है, इस देश और इस काल का देवदत्त तथा 'वह' का मतलब होता है उस देश तथा उस काल का देवदत्त । यों 'यहपन' और 'वहपन' नाम के धर्मों का विरोध होने से, जब देवदत्त की एकता नहीं हो सकती, तब इन दोनों विरोधी भागों का त्याग करके, देवदत्त रूपी एक आश्रय का बोध जैसे लक्षणा से हो जाता है— मायाविद्ये विहायैवमुपाधी परजीवयोः । अखण्डं सच्चिदानन्दं परं ब्रह्मैव लक्ष्यते ॥४८॥ ठीक इसी प्रकार 'पर' और 'जीव' की जो उपर्युक्त 'माया' तथा 'अविद्या' नाम की उपाधि हैं उन दोनों को छोड़ देने पर अखण्ड [अर्थात् भेदरहित] सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म ही महा- वाक्यों से लक्षित हो जाता है। संविकल्पस्य लक्ष्यत्वे लक्ष्यस्य स्यादवस्तुता । निर्विकल्पस्य लक्ष्यत्वं न दृष्टं न च संभवि ॥४९॥ प्रश्न—जिस तत्व को तुम महावाक्य का लक्ष्य बताते हो, वह

तत्त्वविवेकप्रकरणम् २५ सविकल्प है अथवा निर्विकल्प है ? सविकल्प को लक्ष्य मानने में महावाक्य का लक्ष्य ब्रह्म अवस्तु [मिथ्या] हो जायगा [क्यों- कि वेदान्त मत में सविकल्प वस्तु मिथ्या हुआ करती है] अब यदि निर्विकल्प को लक्ष्य कहें सो तो कहीं देखा नहीं गया और न ऐसा सम्भव ही है। [क्योंकि लक्ष्य पदार्थ में रहनेवाला 'लक्ष्यत्व' भी तो एक विकल्प ही है]। विकल्पो निर्विकल्पस्य सविकल्पस्य वा भवेत्। आद्ये व्याहति रन्यत्रानवस्थात्माश्रयादयः ॥५०॥ उत्तर—अच्छा बताओ तुम्हारा यह विकल्प निर्विकल्प के विषय में है ? या सविकल्प के विषय में है ? प्रथम पक्ष में व्याघात दोष आता है [निर्विकल्प पर विकल्प कैसा ?] दूसरे पक्ष में अनवस्था और आत्माश्रय आदि दोष आते हैं। सिद्धान्ती प्रतिबन्दी से उत्तर देता है कि तेरे मत में सविकल्प शब्द का क्या अर्थ है ? 'विकल्पेन सह वर्तते इति सविकल्पः' इस विवरण से दो पदार्थ प्रतीत होते हैं एक तो आधेयविकल्प तथा दूसरा उसका आधार विकल्प। इसमें यह प्रश्न होता है कि तुम्हारे इस विकल्प का जो आधार है वह निर्विकल्प है या सवि- कल्प है ? प्रथमपक्ष तो असम्भव ही है। क्योंकि विकल्प का आधार होते हुए निर्विकल्प तो हो ही नहीं सकता। द्वितीय पक्ष में यह बताओ कि वह किस विकल्प से सविकल्प है, तृतीयान्त पदवाच्य जो प्रथम विकल्प है उसीसे सविकल्प है अथवा किसी दूसरे विकल्प से ? प्रथम पक्ष में आत्माश्रय दोष है। क्योंकि विकल्प का आधार सविकल्प पदार्थ है, विशिष्ट की आधारता विशेषण में भी हुआ करती है। जैसे कि आसन वाले भूतल पर

३६ पञ्चदशी बैठा हुआ पुरुष आसन पर भी बैठा होता है, इसलिये सविकल्प का आधेय जो विकल्प है वह विकल्प का भी आधेय हुआ, तो प्रथम विकल्प और द्वितीय विकल्प दोनों का अभेद होने से अपने में अपने की स्थिति हो गयी और यों आत्माश्रय दोष आगया। इस दोष की निवृत्ति के लिये आधार के विशेषण विकल्प को यदि विकल्पान्तर मानें तो उस पर भी यह प्रश्न हो सकता है कि उस विकल्प का आधार निर्विकल्प है कि सविकल्प है ? प्रथम पक्ष तो असम्भव ही है। द्वितीयपक्ष में द्वितीय विकल्प के आधार का विशेषण विकल्प प्रथम विकल्प है अथवा द्वितीय विकल्प है ? प्रथम पक्ष में अन्योन्याश्रय दोष है क्योंकि, प्रथम विकल्प का आधार द्वितीय विकल्प और द्वितीय का तृतीय और वह तृतीय प्रथम विकल्पस्वरूप है तो अर्थात् यह सिद्ध होगया कि प्रथम विकल्प का आधार द्वितीय विकल्प तथा द्वितीय विक- ल्प का प्रथम विकल्प इसलिये अन्योन्याश्रय दोष है। द्वितीय विकल्प स्वरूप मानें तो आत्माश्रय दोष है। इस दोष की निवृत्ति के लिये तृतीयविकल्प को यदि विकल्पान्तर मानें तो उस पर भी यही प्रश्न हो सकता है कि तृतीय विकल्प का आधार निर्वि- कल्प है अथवा सविकल्प है ? प्रथम पक्ष तो असम्भव ही है। द्वितीय पक्ष में फिर प्रश्न हो सकता है कि चतुर्थ विकल्प प्रथम विकल्पस्वरूप है या विकल्पान्तर है। प्रथम पक्ष में चक्रक दोष है क्योंकि प्रथम विकल्प का आधार द्वितीय विकल्प, द्वितीय का तृतीय, तृतीय का चतुर्थ, चतुर्थ प्रथम स्वरूप है। यों अर्थात् सिद्ध हो गया कि प्रथम का आधार द्वितीय, द्वितीय का तृतीय, तृतीय का प्रथम। इस दोष की निवृत्ति के लिये चतुर्थ विकल्प को यदि विकल्पान्तर मानें तो अनवस्था दोष होगा क्योंकि

तत्त्वविवेकप्रकरणम् २७ चतुर्थ विकल्प के आधार का विशेषण विकल्प यदि विकल्पान्तर है तो उसमें भी इन दोषों का प्रसंग होने से उसके आधार का विशेषण विकल्प भी विकल्पान्तर ही मानना होगा। इस प्रकार अनेक विकल्पों के होने से अनवस्था होगी। कहीं भी जाकर स्थिति नहीं हो सकेगी। इदं गुणक्रियाजातिद्रव्यसम्बन्धवस्तुषु । समं, तेन स्वरूपस्य सर्वमेतदितीष्यताम् ॥५१॥ गुण, क्रिया, जाति, द्रव्य तथा सम्बन्धादि सभी वस्तुओं में यह दोष तुल्य ही है। इसलिये [ऐसे निरर्थक प्रश्न न करके] यही मान लेना चाहिये, कि ये गुण आदि सब स्वरूप में ही रहते हैं। विकल्पतदभावाभ्यामसंस्पृष्टात्मवस्तुनि । विकल्पतत्वलक्ष्यत्वसम्बन्धाद्यास्तु कल्पिताः ॥५२॥ जो आत्मवस्तु विकल्प और विकल्पाभाव दोनों के ही सम्बन्ध से रहित रहती है, उसी आत्मवस्तु में 'सविकल्पकत्व' 'लक्ष्यत्व' 'निर्विकल्पकत्व आदि सब धर्म [उसी तरह] कल्पित कर लिये गये हैं [जैसे कि आकाश आदि सब जगत् उसमें कल्पित कर लिया गया है]। इत्थं वाक्यैस्तदर्थानुसन्धानं श्रवणं भवेत् । युक्त्या सम्भावितत्वानुसन्धानं मननं तु तत् ॥५३॥ इस प्रकार वाक्यों के द्वारा उनके अर्थों का ज्ञान 'श्रवण' कहाता है। युक्ति से उसी अर्थ की सम्भावना का ज्ञान 'मनन' कहा जाता है। 'जगतो यदुपादानम्' [४४] इत्यादि श्लोकों से प्रतिपादित रीति से 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों की सहायता से, इन वाक्यों

का जो जीव ब्रह्म की एकता रूपी अर्थ है उसका अनुसन्धान [अन्वेषण] करना ही 'श्रवण' कहाता है। 'शब्दस्पर्शादयो वेद्या' [ तत्त्वविवेक ३ ] इत्यादि से लेकर 'पराग्रात्मनोरैवं युक्त्या संभावितैकता [ तत्त्वविवेक ४३ ] पर्यन्त श्लोकों के कहे प्रकार से श्रवण किये हुए इसी अर्थ के संभावितपने का अनुसन्धान [किंवा श्रवण किये हुए अर्थ की संभावना का मन में बैठाना] 'मनन' कहाता है । ताभ्यां निर्विचिकित्सेऽर्थे चेतसः स्थापितस्य यत् । एकतानत्वमेतद्धि निदिध्यासन मुच्यते ॥५४॥ श्रवण और मनन से जो अर्थ निःसंशय हो चुका है, उसी अर्थ [विषय] में धारण किया हुआ चित्त, जब एकतान हो जाय [जब उस चित्त में उसी विषय की एकाकार वृत्ति का प्रवाह बहने लग पड़े] तब इसी को [योगशास्त्र में] 'निदिध्यासन' नाम से कहा जाता है। ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद् ध्येयैकगोचरम् । निवातदीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते ॥५५॥ क्रम से 'ध्याता' और 'ध्यान' को छोड़ कर, जब चित्त केवल 'ध्येय' को ही विषय कर लेता है, जब चित्त निवात स्थान में रखे हुए दीपक की प्रभा के समान निश्चल हो जाता है तब यही अवस्था 'समाधि' कहाती है। 'निदिध्यासन' में तो 'ध्याता' 'ध्यान' तथा 'ध्येय' ये तीनों ही प्रतीत होते रहते हैं। परन्तु जब अभ्यास के प्रभाव से वही चित्त क्रम से पहले तो 'ध्याता' और पीछे से 'ध्यान' को छोड़ देता है और 'ध्येयैकगोचर' हो जाता है

विषय करने लगता है] और वायुरहित प्रदेश में रक्खे हुए दीपक के प्रकाश के समान निश्चल हो जाता है, तब कहा जाता है कि 'समाधि' हो गयी । वृत्तयस्तु तदानीमज्ञाता अप्यात्मगोचराः । स्मरणादनुमीयन्ते व्युत्थितस्य समुत्थितात् ॥ ५६ ॥ समाधि से उठे हुए पुरुष को जो स्मरण आता है उससे इस बात का अनुमान किया जाता है कि उस समय वृत्तियां ज्ञात तो नहीं होतीं, परन्तु वे आत्मा को विषय किया करती हैं। समाधि अवस्था में जब कि वृत्तियों की उपलब्धि नहीं होती तब 'वह चित्त ध्येयैकगोचर हो रहा है' ऐसा निश्चय होने का कारण तो यह है कि उस समय की आत्मा को विषय करने वाली वृत्तियां यद्यपि समाधि काल में अज्ञात ही रहती हैं, परन्तु जब वह समाधि से उठता है और उसे स्मरण आता है कि 'मैं इतने समय तक समाधि में डूबा रहा' तब इस स्मरण से उन वृत्तियों का अनुमान हो जाता है । वृत्तीनामनुवृत्तिस्तु प्रयत्नात् प्रथमादपि । अदृष्टासकृदभ्याससंस्कारसचिवाद् भवेत् ॥ ५७ ॥ समाधि के समय वृत्तियों की जो अनुवृत्ति होती रहती हैं, वह योगी के समाधि से पहले किये हुए प्रयत्न से, उस के अदृष्ट से तथा उस के बार-बार के समाधि के अभ्यास के संस्कारों से होती रहती है । यद्यपि समाधि के समय वृत्तियों को पैदा करने के लिये कोई प्रयत्न नहीं किया जाता, फिर भी जो ध्येयैकगोचर वृत्तियों का तांता बंधा रहता है, वृत्तियों का वह तांता, समाधि से पूर्वकाल

[Header] ३० पञ्चदशी

में किये हुए प्रयत्न से, योगियों के अशुक्ल कृष्ण नामक कर्म के प्रताप से [जिसको 'अदृष्ट' भी कहते हैं] तथा वार-वार समाधि का अभ्यास करते रहने से उत्पन्न हुए भावना नाम के संस्कार से बंधा रहता है, अर्थात् इन तीन कारणों से आत्माकार वृत्तियों का प्रवाह बहता रहता है, चाहे उस समय उन वृत्तियों को पैदा करने के लिये भले ही कोई प्रयत्न न भी किया जाता हो। यथा दीपो निवातस्थ इत्यादिभिरनेकधा। भगवानिममेवार्थमर्जुनाय न्यरूपयत् ॥ ५८ ॥ 'यथा दीपो निवातस्थः [गीता] इत्यादि श्लोकों के द्वारा अनेक प्रकार से भगवान् ने इसी निर्विकल्प समाधि रूपी अर्थ को अर्जुन के प्रति निरूपण किया है [इससे इस समाधि को अप्रामाणिक समझ लेने का कोई कारण नहीं रहता ] अनादाविह संसारे संचिताः कर्मकोटयः । अनेन विलयं यान्ति शुद्धो धर्मो विवर्धते ॥ ५९ ॥ अनादिकाल से चलते आते हुए इस संसार में, संचित किये हुए जो अनगिनत पुण्यापुण्य कर्मों के ढेर हैं वे इसी समाधि के प्रताप से नष्ट होते हैं तथा इसी समाधि के प्रताप से शुद्ध धर्म वृद्धि को प्राप्त होने लग जाता है [जिससे कि विलास (कार्य) सहित अविद्या को हटाने वाला साक्षात्कार आ धमकता हैं]। धर्ममेघमिमं प्राहुः समाधिं योगवित्तमाः । वर्षत्येष यतो धर्मामृतधाराः सहस्रशः ॥६०॥ योग के मर्मज्ञ लोग, [ जिन को ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है], इस निर्विकल्प समाधि को ही 'धर्ममेघ' अर्थात् धर्म को बरसाने वाला कहते हैं। क्योंकि यह समाधि धर्मरूपी अमृत

तत्त्वविवेकप्रकरणम् ३१ की हज़ारों धारा बरसाने लग पड़ती है [धर्मामृत की मूसलाधार वृष्टि करने लगती है। साधक को अभ्यास करते करते आनन्द में नित्य ही हज़ारों तरह से नवीनता आती जाती है ] अमुना वासनाजाले निःशेषं प्रविलापिते । समूलोन्मूलिते पुण्यपापाख्ये कर्मसंचये ॥६१॥ वाक्यमप्रतिबद्धं सत् प्राक्परोक्षावभासिते । करामलकवद् बोधमपरोक्षं प्रसूयते ॥६२॥ इस समाधि के प्रताप से वासनाजालके सम्पूर्ण नष्ट हो जाने पर,पुण्य पाप नाम के कर्म संचय के समूल उखाड़ दिये जाने पर, ‘तत्त्वमसि’ आदि वाक्य, बे-रोकटोक होकर, जो तत्व अब तक परोक्ष रूप से ज्ञात हो रहा था, उसी तत्व के विषय में, हाथ पर रक्खे आमले की तरह, प्रत्यक्ष ज्ञान को उत्पन्न कर देते हैं। इस समाधि का परम प्रयोजन तो यही है कि इसके प्रताप से अहंकार ममकार तथा कर्तृत्व आदि अभिमान का कारण जो ज्ञान का विरोधी संस्कारसमूह है वह जब निःशेष नष्ट हो जाता है तथा जब पुण्य पाप नाम के कर्मों का ढेर समूल उन्मीलित हो चुकता है तब फिर ऐसा अनुकूल वातावरण उत्पन्न होता है कि ‘तत्त्वमसि’ आदि वाक्यों के अर्थ के समझने में जो सत्कर्म तथा वासना अब तक रुकावट डाल रही थीं, [अर्थ को समझने नहीं देती थीं] वे सब रुकावटें हट जाती हैं। जो तत्व अब तक परोक्ष रूप से प्रकाशित हो रहा था अब उसी तत्व का प्रत्यक्ष ज्ञान ‘तत्त्व- मसि’ आदि वाक्य करा देते हैं। अब ज्ञान का विज्ञान बन जाता है। परोक्षं ब्रह्मविज्ञानं शाब्दं देशिकपूर्वकम् । बुद्धिपूर्वकृतं पापं कृत्स्नं दहति वह्निवत् ॥६३॥

३२ पञ्चदशी गुरु के मुख से प्राप्त हुआ, 'तत्त्वमसि' आदि शब्द प्रमाण से उत्पन्न हुआ जो, परोक्ष ब्रह्मविज्ञान है, वह जानकर किये हुए सम्पूर्ण पापों को अग्नि के समान जला डालता है। यही परोक्ष ज्ञान का फल है। अपरोक्षात्मविज्ञानं शाब्दं देशिकपूर्वकम् । संसारकारणाज्ञानतमसश्चण्डभास्करः ॥६४॥ गुरु-मुख से प्राप्त हुआ, शब्द-प्रमाण से उत्पन्न हुआ, आत्मा का संशय और विपर्यय से रहित यह प्रत्यक्ष ज्ञान ही संसार का कारण जो अज्ञानरूपी अन्धकार है, उसके लिये चण्डभास्कर अर्थात् दोपहर का सूर्य बन जाता है [वाह्यान्धकार को जैसे दोपहर का सूर्य नष्ट कर देता है, इसी प्रकार अज्ञाना- न्धकार को यह अपरोक्ष आत्मा का ज्ञान निवृत्त कर देता है]। इत्थं तत्त्वविवेकं विधाय विधिवन्मनः समाधाय । विगलितसंसृतिबन्धः प्राप्नोति परं पदं नरो न चिरात् ॥६५॥ जब कोई विवेकी मनुष्य इस प्रकार से [ ब्रह्मात्मैकता रूपी ] तत्व का [पाँचों कोशो में से] विवेक कर लेता है और फिर [उसी गम्भीर तत्व में शास्त्रोक्त विधि से ] मन को समाहित कर बैठ जाता है तब [ अपरोक्ष ज्ञान के प्रताप से] उसका संसार-बंधन निवृत्त होजाता है और वह मनुष्य फिर तुरन्त ही परमपद किंवा निरतिशयानन्दरूपी मोक्ष को प्राप्त कर लेता है [ अथवा यों कहो कि वह सत्य ज्ञान तथा आनन्दस्वरूप ब्रह्म ही हो जाता है ] श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितं तत्वविवेकप्रकरणं समाप्तम्.

2. Pancha Mahabhuta Viveka

ओम् पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ( अद्वैतबोध का उपाय ) सदद्वैतं श्रुतं यत्तत् पञ्चभूतविवेकतः । बोद्धुं शक्यं ततो भूतपञ्चकं प्रविविच्यते ॥१॥ श्रुतियों में जिस सत् अद्वैत का प्रतिपादन किया गया है उसको पंचभूत विवेक से ही जान सकते हैं । इससे अब पाँचों भूतों का विवेक किया जाता है । "सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' [ छा. ६-२-१ ] इस श्रुति के द्वारा जगत् की उत्पत्ति से पहले, जगत् के कारण जिस सद्रूप अद्वितीय ब्रह्म की सूचना हमें मिलती है, मन और वाणी का विषय न होने के कारण उस ब्रह्म का सीधा ज्ञान किसी को भी स्वतः नहीं हो सकता । इसलिये उसके कार्य होने से उसकी उपाधि बने हुए पाँचों भूतों का विवेक करके ही हम उसे जान सकते हैं। इसी से अब पाँच भूतों का विवेक किया जाता है। यह पाँचों भूतों का विवेक उस ब्रह्म को जानने का ही उपोद्घात है । शब्दस्पर्शौ रूपरसौ गन्धो भूतगुणा इमे । एकद्वित्रिचतुःपञ्चगुणा व्योमादिषु क्रमात् ॥२॥

३४ पञ्चदशी शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध ये आकाशादि पाँचों भूतों के गुण हैं । इन आकाशादियों में क्रम से एक दो तीन चार तथा पाँच गुण हैं । प्रतिध्वनिर्वियच्छब्दो वायौ वीसीति शब्दनम् । अनुष्णाशीतसंस्पर्शो वह्नौ भुगुभुगुध्वनिः ॥३॥ उष्णः स्पर्शः प्रभारूपं जले बुलबुलध्वनिः । शीतः स्पर्शः शुक्लरूपं रसो माधुर्यमीरितम् ॥४॥ भूमौ कडकडाशब्दः काठिन्यं स्पर्श इष्यते । नीलादिकं चित्ररूपं मधुराम्लादिको रसः ॥५॥ सुरभीतरगन्धौ द्वौ गुणाः सम्यग्विवेचिताः । आकाश में प्रतिध्वनि नाम का शब्द ही एक गुण है । वायु में 'वी सी' ऐसा शब्द तथा अनुष्णाशीत [ न गरम न ठण्डा ] स्पर्श ये दो गुण हैं । वह्नि में 'भुगुभुगु' शब्द, उष्ण स्पर्श तथा भास्वर रूप ये तीन गुण हैं । जल में 'बुलबुल' शब्द, शीतस्पर्श, शुक्लरूप, तथा मधुर रस, ये चार गुण हैं । पृथिवी में 'कडकडा' शब्द, कठिन स्पर्श, नीलादि चित्ररूप, मधुराम्लादि रस, तथा सुरभि असुरभि गन्ध, ये पाँच गुण हैं। यहाँ तक गुणों का विवे- चन समाप्त हुआ । श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा घ्राणं चेन्द्रियपंचकम् ॥६॥ कर्णादिगोलकस्थं तच्छब्दादिग्राहकं क्रमात् । सौक्ष्म्यात् कार्यानुमेयं तत् प्रायो धावेद्बहिर्मुखम् ॥७॥ श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा तथा घ्राण ये पाँच इन्द्रियाँ क्रम से कान आदि छिद्रों में रहती हैं । और शब्दादि गुणों को ग्रहण किया करती हैं। [क्योंकि] वे इन्द्रियाँ

[header] पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ३५ [/header] बनी हैं इसलिये ] इतनी सूक्ष्म हैं कि दिखाई नहीं पड़तीं । केवल [ उनके ] कार्य से ही इन का अनुमान किया जा सकता है। ये इन्द्रियाँ प्रायः करके बहिर्मुख हो जाती हैं और बाह्य विषय समूह में ही दौड़ लगाया करती हैं। कदाचित् पिहिते कर्णे श्रूयते शब्द आन्तरः । प्राणवायौ जाठराग्नौ जलपानेऽन्नभक्षणे ॥८॥ व्यज्यन्ते ह्यान्तराः स्पर्शा मीलने चान्तरं तमः । उद्गारे रसगन्धौ चेत्यक्षाणामान्तरग्रहः ॥९॥ [ पहले श्लोक में जो कि इन्द्रियों को प्रायः बहिर्मुख बताया गया है उस प्रायः का तात्पर्य यह है कि ] कभी कान को बन्द कर लेने पर प्राणवायु तथा पेट की अग्नि का आन्तर शब्द भी सुनाई पड़ा करता है ॥८॥ जल पीते समय तथा अन्न खाते समय अन्दर के स्पर्श भी प्रतीत हुआ करते हैं। उद्गार [ डकार ] आने पर तो अन्दर के रस तथा गन्ध दोनों ही ग्रहण में आते हैं। इस प्रकार इन्द्रियाँ अन्दर के विषयों का ग्रहण भी किया करती हैं। पञ्चोक्त्यादानगमनविसर्गानन्दकाः क्रियाः । कृषिवाणिज्यसेवाद्याः पञ्चस्खन्तर्भवन्ति ते ॥१०॥ वचन, आदान, गमन, विसर्ग तथा आनन्द ये पाँच क्रिया प्रसिद्ध ही हैं। खेती, वाणिज्य तथा सेवा आदि दूसरी क्रियायें भी इन्हीं पाँच क्रियाओं में अन्तर्भूत हो जाती हैं। [इसलिये मुख्य क्रिया पाँच ही हैं ] वाक्पाणिपादपायूपस्थैरक्षैस्तत्तत्क्रियाजनिः । मुखादिगोलकेष्वास्ते तत् कर्मेंन्द्रियपंचकम् ॥११॥

३६ पञ्चदशी वाक्, पाणि, पाद, पायु तथा उपस्थ नाम की इन्द्रियों से उन उन क्रियाओं की उत्पत्ति होती हैं। इन क्रियाओं के द्वारा ही इन कर्मेन्द्रियों का अनुमान होता है। मुख, कर, चरण, गुदा तथा उपस्थ नाम के गोलकों में ये पाँचों कर्मेन्द्रियाँ निवास किये रहती हैं। मनो दशेन्द्रियाध्यक्षं हृत्पद्मगोलके स्थितम् । तच्चान्तःकरणं, बाह्येष्वस्वातन्त्र्याद्दिनेन्द्रियैः ॥१२॥ अक्षैश्चार्थापिंतेष्वेतद् गुणदोषविचारकम् । सत्वंरजस्तमश्चास्य गुणा, विक्रियतं हि तैः ॥१३॥ इन दसों इन्द्रियों का प्रेरक मन तो हृदय के पद्माकार गोलक में रहता है। उसको अन्तःकरण अर्थात् अन्दर की इन्द्रिय कहते हैं। क्योंकि वह इन्द्रियों के बिना बाह्य विषयों में स्वतन्त्र नहीं होता ॥१२॥ इन्द्रियों को जब विषयों में भेज दिया जाता है तब यह मन उन विषयों के गुण दोष का विचार किया करता है [कि यह विषय अच्छा है या बुरा] सत्व, रज तथा तम ये तीनों इस मन के गुण हैं। क्योंकि इन गुणों के कारण यह मन विकार को प्राप्त होता [बदलता] रहता है। [इन तीनों गुणों के कारण वैराग्य काम तथा निद्रा आदि अनेक वृत्तियां उत्पन्न हो जाती हैं और मन को विकृत कर देती हैं] वैराग्यं क्षान्तिरौदार्यमित्याद्याः सत्वसंभवाः । कामक्रोधौ लोभयत्नावित्याद्या रजसोत्थिताः ॥१५॥ आलस्यभ्रान्तितन्द्राद्या विकारास्तमसोत्थिताः । सात्विकैः पुण्यनिष्पत्तिः पापोत्पत्तिश्च राजसैः ॥१६॥ तामसैर्नोभयं किन्तु वृथायुः क्षपणं भवेत् । अत्राहंप्रत्ययी कर्तेत्येवं लोकव्यवस्थितिः ॥१७॥

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ३७

वैराग्य, क्षमा, उदारता इत्यादि मनोविकार सत्व गुण के हैं। काम, क्रोध, लोभ, तथा यत्न आदि विकार रजोगुण से उत्पन्न हो जाते हैं ॥१४॥ आलस्य, भ्रान्ति तथा तन्द्रा आदि विकार तमोगुण से उठा करते हैं। सात्विक विकारों से पुण्य की निष्पत्ति होती है। राजस विकारों से पाप की उत्पत्ति होती है ॥१५॥ तामस विकारों से पुण्य या पाप कुछ भी नहीं होता। किन्तु व्यर्थ ही आयु के दिन कट जाते हैं। इन सब [ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों, प्राणों तथा अन्तःकरणों] में से 'मैं' भाव करने वाले को 'कर्ता' अर्थात् प्रभु [मालिक] कहा जाता है। क्योंकि लोक में भी कार्य करने वाले को ही प्रभु कहा जाता है। स्पष्टशब्दादियुक्तेषु भौतिकत्वमतिस्फुटम् । अक्षादावपि तच्छास्त्रयुक्तिभ्यामवधार्यताम् ॥१७॥ जिन वस्तुओं में शब्दस्पर्शादि गुण स्पष्ट ही दीख रहे हैं वे तो स्पष्ट ही भौतिक हैं। जो इन्द्रियां दृष्टिगोचर नहीं होती हैं, उनके भौतिक होने का निश्चय शास्त्र तथा युक्ति से कर लेना चाहिये। 'अन्नमयं हि सोम्य मनः आपोमयः प्राणः तेजोमयी वाक्' मन अन्न से बना है, प्राण जलमय है, वाणी अग्निमयी है इत्यादि शास्त्र से इन्द्रियों का भौतिक होना सिद्ध होता है। जब हम बहुत दिनों तक नहीं खाते तब मन आदि सभी इन्द्रियां अपना अपना कार्य करने में असमर्थ हो जाती हैं, जब फिर खाने लगते हैं तब फिर हरी-भरी हो जाती हैं, इस युक्ति से भी मन आदि इन्द्रियों का भौतिक होना सिद्ध होता है। एकादशेन्द्रियैर्युक्त्या शास्त्रेणाप्यवगम्यते । यावत्किञ्चिद्भवेदेतदिदंशब्दोदितं जगत् ॥१८॥

३८ पञ्चदशी 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' अद्वितीय ब्रह्म का प्रतिपादन करने वाली इस श्रुति के 'इदं' शब्द का अर्थ इस श्लोक में बताया गया है कि ग्यारह इन्द्रियों से, युक्तियों से, शास्त्रों से तथा अर्था- पत्ति आदि प्रमाण ज्ञानों से, जितना भी कुछ जगत् जाना जाता है, वह सब का सब इस श्रुतिवाक्य के 'इदं' शब्द का ही अर्थ है। इदं सर्वं पुरा सृष्टेरेकमेवाद्वितीयकम् । सदेवासीन्नामरूपे नास्तामित्यारुणेर्वचः ॥१९॥ उद्दालक आरुणि ने (छा०२-१ में) यह बात कही है कि सृष्टि के उत्पन्न होने से पहले यह सब जगत् जो दीख रहा है इस रूप में नहीं था। किन्तु उस समय एक अद्वितीय सद्वस्तु ही थी। उस समय नाम या रूप [आकार] कुछ भी नहीं था। वृक्षस्य स्वगतो भेदः पत्रपुष्पफलादिभिः । वृक्षान्तरात् सजातीयो विजातीयः शिलादितः ॥२०॥ तथा सद्वस्तुनो भेदत्रयं प्राप्तं निवार्यते । ऐक्यावधारणद्वैतप्रतिषेधैस्त्रिभिः क्रमात् ॥२१॥ वृक्ष का 'स्वगतभेद' पत्र फूल फल आदि से होता है। दूसरे वृक्षों से 'सजातीय भेद' रहता है। पत्थर आदि से 'विजातीय भेद' होता है। उसी तरह सद्वस्तु में प्राप्त हुए सजातीय, विजा- तीय तथा स्वगत भेद का निवारण क्रम से ऐक्य, अवधारण, तथा द्वैत का प्रतिषेध करने वाले 'एकम्', 'एव', 'अद्वितीयम्' ये तीनों पद कर रहे हैं। इस श्रुति में जो 'एकम्' 'एव' 'अद्वितीयम्' ये तीन पद हैं वे सद्वस्तु में के तीनों भेदों का निवारण करते हैं। लोक में तीन प्रकार का भेद होता है एक 'स्वगत' दूसरा 'सजातीय' तीसरा

‘विजातीय’। वृक्ष का स्वगत भेद अपने ही पत्ते फूल फल आदियों से होता है। आम्र वृक्ष का सजातीय भेद अपने सजातीय शिंशपा वृक्ष से होता है तथा उसी का विजातीय भेद पत्थर आदि से होता है ॥२०॥ अन्यान्य पदार्थों में पाया जाने वाला इस तरह का एक भी भेद इस सद्वस्तु में नहीं है। इन तीनों तरह के भेद को हटाने के लिये ही इस श्रुति ने ये तीन पद कहे हैं। वस्तुत्व रूपी समानता को देख कर अन्यान्य पदार्थों के समान ही सद्रूप आत्मवस्तु में भी जब स्वगतादि तीनों भेदों की प्रसक्ति होती है तब स्वगत भेद को ‘एकम्’ यह पद हटाता है, सजातीय भेद को ‘एव’ यह पद दूर कर देता है, तथा विजातीय भेद को ‘अद्वितीयम्’ यह तीसरा पद रहने नहीं देता। सतो नावयवाः शङ्क्यास्तदंशस्यानिरूपणात् । नामरूपे न तस्यांशौ तयो रद्याप्यनुद्भवात् ॥२१॥ सद्वस्तु के भी अवयव होते हों, ऐसी शंका मत करना क्योंकि उसके अंश का निरूपण हो ही नहीं सकता। नाम और रूप [आकार] भी उसके अंश नहीं हैं। क्योंकि अभी तक अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति के प्रथम तक, वे नाम रूप उत्पन्न नहीं हो पाये हैं। स्वगत-भेद मान सकने के लिये जिन अवयवों की आवश्य- कता होती है वे अवयव तो सद्वस्तु में होते ही नहीं। क्योंकि उसके अवयवों के स्वरूप का निरूपण—कि वे कैसे हैं—आज तक नहीं हो सका है। यदि नाम रूप को उसके अंश मानो तो जब कि अभी तक सृष्टि ही उत्पन्न नहीं हुई है तब ये सृष्टिकाल में होने वाले नामरूप उस समय की शुद्ध सद्वस्तु के अंश कैसे हो ज़ायेंगे ?

४० पञ्चदशी नामरूपोद्भवस्यैव सृष्टित्वात् सृष्टितः पुरा । न तयोरुद्भवस्तस्मान्निर्शं सद्यथा वियत् ॥२३॥ नाम तथा रूप का उद्भव हो जाना यही तो 'सृष्टि' कहाती है। बस इसी से समझ लो कि सृष्टि से प्रथम नाम और रूप की उत्पत्ति नहीं हुई थी। इस से यही निष्कर्ष निकलता है कि सद्धस्तु आकाश के समान निरवयव पदार्थ ही है -- अर्थात् उसके अन्दर 'स्वगतभेद' को गुंजाइश है ही नहीं। सदन्तरं सजातीयं न वैलक्ष्ण्यवर्जनात् । नामरूपोपाधिभेदं विना नैव सतो भिदा ॥२४॥ विलक्षणता न होने से इस सत् की जाति का दूसरा कोई सत् पदार्थ होता होगा यह भी नहीं माना जाता। नामरूप नाम की उपाधि के भेद के विना सत् पदार्थ में तो भेद है ही नहीं। सत् की जाति का ही दूसरा कोई सत् पदार्थ होता होगा इस बात को कैसे मान लिया जाय ? क्योंकि इस दूसरे सत् पदार्थ में इस सत् पदार्थ से कुछ विलक्षणता तो होती ही नहीं। इस में स्वयं भी कुछ विलक्षणता नहीं होती । जो भी कुछ विलक्षणता देख पड़ती है वह सब नामरूप की उपाधियों के भिन्न भिन्न होने से ही है। सद्धस्तु में स्वभाव से आकाश के समान कोई भी भेद नहीं है । जैसे कि आकाश में स्वतः तो कोई भी भेद नहीं है परन्तु घट मथरूम उपाधियों के भेद से उसमें भेद की भ्रान्त प्रतीति होने लगती है । विजातीयमसत् तच्च न खल्वस्तीति गम्यते । नास्यातः प्रतियोगित्वं विजातीयाद्भिदा कुतः ॥२५॥ सत् का विजातीय जो कोई पदार्थ होगा वह तो असत्

[Header] पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ४१ ही होगा। असत् शब्द ही से यह प्रतीत होता है कि वह पदार्थ है ही नहीं। इस कारण यह असत् पदार्थ तो उसका प्रतियोगी [सम्बन्धी] हो ही नहीं सकता। फिर बताओ कि विजातीय वस्तु से भी सद्वस्तु में भेद कैसे आयेगा ? एकमेवाद्वितीयं सत् सिद्धमत्र तु केचन । विह्वला असदेवेदं पुरासीदित्यवर्णयन् ॥२६॥ इस प्रकार यहां तक यह सिद्ध हो गया कि सत् एक ही अद्वितीय वस्तु है- [उस में स्वगत, सजातीय तथा विजातीय किसी प्रकार का भी भेद नहीं है] परन्तु इस सद्वस्तु के विषय में भी किन्हीं विह्वल [उन्मार्गगामी] पुरुषों ने यह कहा है कि यह सब पहले असत् ही था अर्थात् था ही नहीं। मग्नस्याब्धौ यथाक्षाणि विह्वलानि तथास्य धीः । अखण्डैकरसं श्रुत्वा निःप्रचारा बिभेत्यतः ॥२७॥ समुद्र में डूबे हुए पुरुष की इन्द्रियां जैसे व्याकुल हो (घबरा) जाती हैं, इसी प्रकार इस अविचारशील असद्वादी का मन, अखण्डैकरस वस्तु को सुन कर, निःप्रचार [गतिरहित] होकर डरा करता है। [साकार वस्तु में जैसे मन चक्कर लगाया करता है, समुद्र के समान अखण्ड एकरस वस्तु में वैसा विच- रण करना नहीं मिलता। यही कारण है कि अपनी दुर्वासनावश वे लोग इस सद्वस्तु को सुन कर चौंक उठते हैं।] गौडाचार्या निर्विकल्पे समाधावन्ययोगिनाम् । साकारब्रह्मनिष्ठाना मत्यन्तं भयमूचिरे ॥२८॥ गौडाचार्य ने यह बात कही है कि इस निर्विकल्प समाधि में दूसरे साकार ब्रह्म के उपासक योगियों को बहुत ही भय लगा करता है।