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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

५० पञ्चदशी कार्यों को उत्पन्न करने वाली सद्वस्तु की ऐसी शक्ति किंवा ऐसे सामर्थ्य को ही तो 'माया' कहते हैं। अग्नि की शक्ति जैसे अग्नि से पृथक् कोई तत्व नहीं होती है, अग्नि की शक्ति को जैसे उस के दाहादि कार्यों को देखकर ही जान सकते हैं ऐसी ही यह माया भी है । कार्यों के उत्पन्न हो जाने से पहले कोई भी कभी शक्ति को पहचान नहीं सकता है । ] न सद्वस्तु सतः शक्ति र्न हि वन्हेः स्वशक्तिता । सद्विलक्षणतायां तु शक्तेः किं तत्त्व मुच्यताम् ॥४८॥ वह सत् की शक्ति, सद्वस्तु ही हो, यह नहीं हो सकता देखते हैं कि वह्नि स्वयं अपनी शक्ति नहीं होती। उसको सत् से विल- क्षण किसी तरह की मानने पर तो शक्ति का स्वरूप बताना चाहिये कि वह कैसा होगा ? [ वह शक्ति यद्यपि कार्यरूपी लिंग से जानी जाती है, परन्तु वह असल में निस्तत्त्वरूप ही है । यह बात इन दो श्लोकों में सिद्ध की गई है । वह शक्ति भी कोई दूसरी सद्वस्तु ही हो, तब तो सत् से भिन्न हो जाने के कारण, उस की शक्ति नहीं हो सकती, क्योंकि देखते हैं कि अग्नि ही अग्नि की शक्ति नहीं होती है । यदि उसको सत् से विलक्षण तत्त्व मानोगे तो शक्ति का स्वरूप बताना चाहिये कि वह कैसा होगा ? ] शून्यत्वमिति चेच्छून्यं मायाकार्यमितीरितम् । न शून्यं नापि सद्यादृक् तादृक् तत्वमिहेष्यताम् ॥४९॥ यदि उस शक्ति का रूप शून्य को बताया जाय तो शून्य तो माया का कार्य ही है । यह बात इसी प्रकरण के चौंतीसवें श्लोक में कही गयी है । इस कारण यही कहना पड़ता है कि वह माया

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५१ न तो शून्य ही है और न सत् ही है। ऐसा कोई सदसद्विलक्षण तत्व अगर तुम समझ सकते हो तो वैसा तत्व ही माया को समझ लो। उस माया का निर्वचन सत् और असत् इन दो शब्दों से नहीं हो सकता है। नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं किंत्वभूत्तमः। सद्योगात्तमसः सत्वं न स्वत स्तन्निषेधनात् ॥५०॥ 'तम आसीत्तमसा गूढमग्रे' इस श्रुति ने भी इस बात का अनु- मोदन किया है। वह कहती है कि 'उस समय न तो सत् ही था' और 'न असत् ही था'। किन्तु बस तम ही तम था। इस सत् का योग हो जाने से ही तो उस तम में सत्ता आ गयी थी। उस तम में स्वतः सत्ता नहीं थी। उसके सत् होने का तो इस श्रुति ने अपने मुख से ही स्पष्ट निषेध कर डाला है। अत एव द्वितीयत्वं शून्यवन्नहि गण्यते। न लोके चैत्रतच्छक्त्यो र्जीवितं लिख्यते पृथक् ॥५१॥ इस सब का फलित यही हुआ कि क्योंकि माया की स्वतः सत्ता [स्वतन्त्र सत्ता] मानी ही नहीं जाती है, इसलिये जैसे शून्य को दूसरा पदार्थ नहीं माना जाता इसी प्रकार माया को भी कोई दूसरा पदार्थ नहीं गिना जाता है। लोक में भी देखते हैं कि चैत्र तथा उसकी शक्ति का पृथक् पृथक् उल्लेख कहीं नहीं किया जाता। [चैत्र और चैत्र की शक्ति को कोई भी दो पदार्थ नहीं गिनता है।] शक्त्याधिक्ये जीवितं चेद् वर्धते तत्र वृद्धिकृत्। न शक्तिः, किन्तु तत्कार्यं युद्धकृष्यादिकं तथा ॥५२॥ शक्ति की अधिकता होती है तो जीवन की वृद्धि पायी जाती

५२ पंचदशी है। इस दृष्टान्त से शक्ति का जीवित [सत्ता] पृथक् मान लेना ठीक नहीं है। क्योंकि शक्ति से किसी के जीवित की वृद्धि नहीं होती है। किन्तु शक्ति के कार्य जो कुश्ती तथा खेती आदि हैं उन से जीवन की वृद्धि हो जाती है। [इसी प्रकार प्रकृत में भी समझ लेना चाहिये कि उस ब्रह्म में उसकी शक्ति के कारण से द्वितीयपन (द्वैतभाव) नहीं आ जाता है।] सर्वथा शक्तिमात्रस्य न पृथग्गणना क्वचित् । शक्तिकार्यं तु नैवास्ति द्वितीयं शङ्क्येत कथम् ॥५३॥ केवल शक्ति की तो पृथक् गणना [गिनती] कहीं होती ही नहीं। यदि यह कहो कि शक्ति के कार्यों से ही उस ब्रह्म में सद्वितीयता [द्वैतभाव] आ जायगी तो उसका उत्तर यह है कि उस समय [सृष्टि की उत्पत्ति से प्रथम] तो शक्ति का कार्य भी कुछ नहीं था। 'फिर [उस समय] द्वितीय [दूसरे] के होने की शंका क्यों करते हो ? प्रलय काल में ब्रह्म और उसकी शक्ति दोनों होते तो हैं, परन्तु किसी की भी शक्ति की गिनती उससे पृथक् नहीं की जाती है। सृष्टि बनने के बाद शक्ति के नाना कार्य हो तो जाते हैं, परन्तु सृष्टि बनने के पीछे के कार्यों से, सृष्टि बनने से प्रथम काल में, द्वितीयपन कैसे आ सकेगा ? न कृत्स्नब्रह्मवृत्तिः सा शक्तिः किन्त्वेकदेशभाक् । घटशक्तिर्यथा भूमौ स्निग्धमृद्येव वर्तते ॥५४॥ ब्रह्म की वह शक्ति सम्पूर्ण ब्रह्म में नहीं रहती है। किन्तु उस ब्रह्म के एक देश में ही रहती है। जिस प्रकार घड़ा मिट्टी से बनता है, परन्तु घट को उत्पन्न करने की शक्ति केवल चिकनी मिट्टी में ही रहती है।

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५३ पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्ति स्वयंप्रभः । इत्येकदेशवृत्तित्वं मायाया वदति श्रुतिः ॥५५॥ 'पादोस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि' [यजुर्वेद ३१] ये सम्पूर्ण भूत इसके एक चतुर्थांश में ही हैं। इसका तीन चौथाई भाग तो अभी भी अमर और स्वयं प्रकाश ही है। यह श्रुति कह रही है कि ब्रह्म की माया ब्रह्म के किसी एक देश में रहती है, सम्पूर्ण में नहीं रहती। विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् । इति कृष्णोऽर्जुनायाह जगतस्त्वेकदेशताम् ॥५६॥ 'विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्' [गीता १०-४२] मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंश से धारण किये हुए हूँ यों कृष्ण भगवान ने भी अर्जुन के प्रति जगत् की एकदेशता . का ही वर्णन किया है। स भूमिं विश्वतो वृत्वा ह्यत्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम् । विकारावर्ति चान्त्रास्ति श्रुतिसूत्रकृतोर्वचः ॥५७॥ 'स भूमिं विश्वतो वृत्वा' [श्वे० ३-१४] यह मन्त्र तथा विकारावर्ति यह वेदान्तसूत्र ब्रह्म के निर्माय स्वरूपको बता रहे हैं। ब्रह्म का निर्माय स्वरूप भी है, इसमें प्रमाण की दर्कार हो तो 'स भूमिं विश्वतो वृत्वा ह्यत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्' उसने समस्त लोक लोकान्तरों को चारों तरफ से लपेट लिया है, फिर भी वह उसके बाहर दशाङ्गुल रह ही गया है' इस श्रुति ने तथा 'विकारावर्ति च तथा हि स्थितिमाह' (ब्रह्मसूत्र ४-४-१९) विकारों में न रहनेवाला नित्य मुक्त भी परमेश्वररूप है। केवल विकारों में रहनेवाला ही परमेश्वररूप नहीं है। क्योंकि वेद ने स्वयं अपने श्रीमुख से

५४ पञ्चदशी इस परमेश्वर की दो रूप की स्थिति का वर्णन किया है कि, 'तावानस्यमहिमाऽतो ज्यायांस्पूच पूरुप:पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि' यह सब उस ब्रह्म की विभूति का विस्तार ही है। वह स्वयं तो इस नामरूपधारी जगत् से बहुत ही बड़ा है। उस ब्रह्म पुरुष में किसी प्रकार का विकार नहीं है। तेज, जल, पृथिवी आदि सब के सब उसके एक चतुर्थांश में ही हैं। इस अमृत पुरुप का तीन चौथाई भाग तो अभी भी अपने प्रकाशशील स्वतःप्रभ आत्मरूप में स्थित है। निरंशेप्यंशमारोप्य कृत्स्नेऽशे वेति पृच्छतः । तद्भाषयोत्तरं ब्रूते श्रुतिः श्रोतृ हितैषिणी ॥५८॥ है तो वह असल में निरंश ही। परन्तु पहले उसमें अंश का आरोप कर लिया गया है और फिर यह पूछा गया है कि शक्ति कृत्स्न [सम्पूर्ण] में रहती है या अंश में रहती है ? श्रोताओं का हित चाहने वाली श्रुति ने, उनकी ही भाषा में उसका उत्तर दे डाला है [इस कारण श्रुति की भाषा में और ब्रह्म के निरंशपने में कोई भी विरोध नहीं है ]। सत्तत्वमाश्रिता शक्तिः कल्पयेत् सति विक्रियाः । वर्णा भित्तिगता भित्तौ चित्रं नानाविधं यथा ॥५९॥ उस सत् तत्व में रहने वाली वह शक्ति, उस सत् में ही विक्रिया अर्थात् कार्यविशेषों को उत्पन्न किया करती है। जैसे कि भीत पर पोते हुए लाल पीले आदि नानाविध रंग नाना- विध चित्र को भित्ति पर ही उत्पन्न किया करते हैं । ' आद्यो विकार आकाशः सोवकाशस्वरूपवान् । आकाशोऽस्तीति सत्तत्वमाकाशेऽप्यनुगच्छति ॥६०॥

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५५ उस शक्ति का सब से पहला विकार ['कार्य] तो आकाश ही होता है। वह अवकाश स्वरूप है। [यह आकाश उस सत् ब्रह्म का कार्य है। इस बात को तो हम इस हेतु से जानते हैं कि] यह सत् तत्व आकाश में भी अनुगत हो रहा है। तभी तो कहा जाता है कि 'आकाशोऽस्ति' अर्थात् आकाश है [यदि आकाश सत् से बना न होता तो 'आकाशोऽस्ति' में आकाश के साथ सत्ता का योग कैसे हो जाता ] एकस्वभावं सत्तत्वमाकाशो द्विस्वभावकः । नावकाशः सति व्योम्नि स चैषोऽपि द्वयं स्थितम् ॥६१॥ सत् तत्व तो एक स्वभाव वाला है। आकाश दो स्वभाव वाला हो गया है। [इसी को विस्तार से यों समझो कि] सद्वस्तु में अवकाश [छेद] कहीं भी नहीं है [वह सर्वत्र ठसाठस भरी हुई है]। उसका तो सत् ही एक स्वभाव है। परन्तु आकाश में तो यह सत्स्वभाव तथा यह अवकाश स्वभाव दोनों ही रहते हैं। यद्वा प्रतिध्वनिर्व्योम्नो गुणो नासौ सतीक्ष्यते । व्योम्नि द्वौ सद्ध्वनी तेन सदेकं, द्विगुणं वियत् ॥६२॥ अथवा इसी विषय को यों समझना चाहिये कि—प्रतिध्वनि आकाश का गुण है। यह प्रतिध्वनि [शब्द] सद्वस्तु में नहीं पायी जाती। परन्तु आकाश में तो सत् तथा शब्द दोनों ही पाये जाते हैं। इससे यही सिद्ध होता है कि सत् तो एक स्वभाव वाला है तथा आकाश दो स्वभाव का है। या शक्तिः कल्पयेद् व्योम सा सद्द्योम्नोरभिन्नताम्। आपाद्य धर्मधर्मित्वं व्यत्ययेनावकल्पयेत् ॥६३॥

५६ पञ्चदशी माया नाम की जो शक्ति, सद्वस्तु में आकाश की कल्पना कर लेती है, वही शक्ति यह भी करती है कि पहले सत् तथा आकाश के अभेद की कल्पना करके फिर उनके धर्मधर्मिभाव को भी उलट-पुलट कर देती है। [यही कारण है कि 'सत् का आकाश' ऐसी प्रतीति के स्थान पर 'आकाश की सत्ता' ऐसी उलटी प्रतीति लोगों को होने लगी है]। सतो व्योमत्वमापन्नं व्योम्नः सत्तां तु लौकिकाः । तार्किकाश्चावगच्छन्ति मायाया उचितं हि तत् ॥६४॥ सत् का ही आकाशभाव होगया है। परन्तु लौकिक और तार्किक लोग उसको 'आकाश की सत्ता' ऐसा उलटा समझ बैठे हैं। यह विपरीत भाव कर देना माया के लिये कोई बड़ी बात नहीं है। वस्तु तत्व का विचार करने पर ज्ञात होता है, कि जैसे मिट्टी घटरूपी होगई है इसी प्रकार सत् ही आकाशभाव को प्राप्त हो गया है। परन्तु लौकिक प्राणी तथा तर्कशास्त्री लोग उसके कितना विरुद्ध समझ बैठे हैं कि वे सत्ता को आकाश का धर्म ही मानने लगे हैं। ऐसा विपरीत दर्शन करा देना माया के लिये उचित ही है। माया से और आशा ही क्या की जा सकती थी ? यद् यथा वर्तते तस्य तथात्वं भाति मानतः । अन्यथात्वं भ्रमेणेति न्यायोऽयं सार्वलौकिकः ॥६५॥ जो [रस्सी आदि] जैसा [रस्सी आदि रूप में] है उसका वैसापन तो प्रमाण से प्रकट हुआ करता है। परन्तु उस [रस्सी] का अन्यथाभाव [सर्परूपता] भ्रान्ति से प्रतीत हुआ करता है।

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५७ यह एक सर्वलोकप्रसिद्ध न्याय है। [इसी से समझ लनो कि माया से विपरीत प्रतीति हो जाती है।] एवं श्रुतिविचारात् प्राग्यथा यद्वस्तु भासते। विचारेण विपर्येति ततस्तच्चिन्त्यतां वियत् ॥६६॥ इस प्रकार यह निश्चय होगया कि श्रुति का विचार करने से पहले पहले जो वस्तु जैसी प्रतीत होती है, वह विचार करने पर वैसी नहीं रह जाती। इसी से उस आकाश का चिन्तन करो कि वह असल में क्या है। उस विपरीतभान की निवृत्ति का उपाय अब बताया जाता है—इस प्रकार श्रुति के अर्थों का विचार न करने तक जो वस्तु [जो सद्रूप ब्रह्म] भ्रान्ति के प्रताप से जैसी [आकाशादि के रूप में] हो गई है, वही वस्तु श्रुति के अर्थ का पर्यालोचन करने पर विपरीत हो जाती है—किंवा आकाशादि भाव को छोड़ कर फिर वही सद्रूप ब्रह्म ही हो जाती है। श्रुति का विचार करने पर ही वस्तु के यथार्थ रूप का परिज्ञान हो सकता है। इसी से कहते हैं कि आकाश का चिन्तन करो। विचार के द्वारा उसके पारमार्थिक रूप को टटोल लो। देखो कि विचार करने पर आकाश का पारमार्थिक रूप क्या सिद्ध होता है। भिन्ने वियत्सती शब्दभेदाद् बुद्धेश्च भेदतः । वाय्वादिष्वनुवृत्तं सन्नतु व्योमेति भेदधीः ॥६७॥ आकाश और सत् भिन्न-भिन्न हैं। क्योंकि इन दोनों के वाचक शब्द भी भिन्न-भिन्न हैं, तथा इन शब्दों से उत्पन्न होने वाली बुद्धियें भी भिन्न-भिन्न होती हैं। देख लो कि सत् वस्तु तो वायु आदि में भी अनुवृत्त हो रही है

५८ पञ्चदशी ‘सत् वायुः’ ‘सत्तेजः’ ‘वायु है’ ‘तेज है’ इत्यादि] परन्तु व्योम [आकाश] की अनुवृत्ति इस तरह कहीं भी नहीं होती। बस यही बुद्धि का भेद कहा जाता है [जिस का कथन इसी श्लोक के दूसरे चरण में किया गया है]। सद्वस्त्वधिकवृत्तित्वाद् धर्मी, व्योम्नस्तु धर्मता । धिया सतः पृथक्कारे ब्रूहि व्योम किमात्मकम् ॥६८॥ अधिक में वृत्ति वाली होने से सद्वस्तु तो धर्मी है तथा अल्पदेशवृत्ति होने से आकाश उसका धर्म माना जाता है। अब तुम बुद्धि की सहायता से सत् को पृथक् करके बताओ कि आकाश का आत्मा [रूप] क्या है ? देखो रूपरसादि सभी में रहने वाला, द्रव्य कहाने वाला पदार्थ, जैसे धर्मी होता है, इसी प्रकार आकाशादि सभी में अनु- वृत्त हुआ सत् ही धर्मी है, तथा रसादि से व्यावृत्त रहने वाला ‘रूप’ जैसे धर्म है इसी प्रकार वायु आदि से व्यावृत्त होने वाला आकाश भी ‘धर्म’ ही है। अब तुम अपनी बुद्धि से आकाश में से सत्ता को तो पृथक् करलो और फिर बताओ कि वह विचारा आकाश किस स्वरूप का रह गया है ? [सत् को बुद्धि से पृथक् करने की बात इसलिये कही है कि वैसे तो सत् किसी वस्तु से पृथक् हो ही नहीं सकता]। अवकाशात्मकं तच्चेदसत्तदिति चिन्त्यताम् । भिन्नं सतो ऽसच्च नेति वक्षि चेद्व्याहतिस्तव ॥६९॥ यदि तुम उस आकाश को [सत्स्वरूप न बता कर] अवकाश रूप बताओ तो [सत् से विलक्षण होने से] उसे असत् ही तो समझना पड़ेगा [क्योंकि सत् से भिन्न असत् ही होता है।]

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५९ यदि यह कहो कि वह सत् से विलक्षण भी है और असत् भी नहीं है तो यह तो तुम्हारी उल्टी बात है [भला इसे कौन मान सकता है ? ] भातीति चेद् भातु नाम भूषणं मायिकस्य तत् । यदसद् भासमानं तन्मिथ्या स्वप्नगजादिवत् ॥७०॥ यदि यह आकाश असत् होता तो प्रतीत भी न होता ! परन्तु यह तो प्रतीत हो रहा है । इसका उत्तर यह है कि यह प्रतीत होता है तो हुआ करो । यह [असत् होने पर भी प्रतीत होना] तो मायवादी का भूषण ही है । देखो जो वस्तु असत् हो [स्वरूप से तो न हो] परन्तु प्रतीत होती हो, वह सुपने के हाथी आदि पदार्थों की तरह मिथ्या होती है । जातिव्यक्ती, देहिदेहौ, गुणद्रव्ये यथा पृथक् । वियत्सतो स्तथैवास्तु पार्थक्यं कोऽत्र विस्मयः ॥७१॥ तुम्हारे [नैयायिक वैशेषिक के] मत में [नियम से सदा साथ दीखने वाले भी] जाति और व्यक्ति, देहधारी और देह तथा गुण और द्रव्य, जैसे पृथक् पृथक् हैं [जैसे ये भिन्न भिन्न हैं] इसी प्रकार [नियम से सदा साथ ही दीखने वाले भी] आकाश और सत् पृथक् पृथक् हैं। इस में विस्मय की कौन सी बात है । बुद्धोपि भेदो नो चित्ते निरूढिं याति चेत्तदा । अनैकाग्रचात् संशयाद्वा रूढ्यभावोऽस्य ते वद ॥७२॥ यदि समझा हुआ भी यह भेद [किसी दुर्बलता के कारण] चित्त में जमता नहीं है, तो बताओ कि उस बात के जी में न बैठने का कारण तुम्हारी अनेकाग्रता है अथवा कोई संशय है।

६० पञ्चदशी अप्रमत्तो भव ध्यानादाद्ये ऽन्यस्मिन् विवेचनम् । कुरु प्रमाणयुक्तिभ्यां, ततो रूढतमो भव ॥७३॥ यदि इस अरूढि का कारण अनेकाग्रता हो, तब तो [प्रत्यय की एकाकारता रूपी] 'ध्यान' की सहायता से अपने मन को सावधान कर लो। यदि कोई संशय रह गया हो तो प्रमाण और युक्ति के द्वारा उस का विवेचन कर डालो। यों दोनों रुकावटों को हटा कर रूढतम हो जाओ। ध्यानान्मानाद्युक्तितोऽपि रूढे भेदे वियत्सतोः । न कदाचिद् वियत्सत्यं सद्वस्तु छिद्रवन्न च ॥७४॥ ध्यान [प्रत्यय की एकतानता] से मान [६७ श्लोक में कहे गये] से तथा ६८ वें श्लोक में कही हुई युक्ति से, जब आकाश और सत् का भेद चित्त में भले प्रकार जम जाय, तब फिर यह आकाश कभी भी सत्य नहीं रहता [फिर तो यह सदा ही मिथ्या भासा करता है] तब यह भी ज्ञात हो जाता है कि सद्वस्तु में छिद्र [अर्थात् आकाश नाम की भी कोई वस्तु] है ही नहीं। ज्ञस्य भाति सदा व्योम निस्तत्त्वोल्लेखपूर्वकम् । सद्वस्त्वपि विभात्यस्य निश्चिद्रत्वपुरःसरम् ॥७५॥ [जिस प्रकार किसी दुष्ट के याद आ जाने पर उसके दुर्गुण याद आ जाते हैं इसी प्रकार] ज्ञानी पुरुष को व्यवहार में जब आकाश की प्रतीति होती है तब उसे आकाश की निस्तत्वता का परिज्ञान भी उस के साथ ही साथ हुआ करता है तथा जब उस ज्ञानी को सद्वस्तु का विभान होता है तभी उसे यह ज्ञान भी साथ ही हो जाता है कि सद्वस्तु में आकाशादि नाम की कोई भी वस्तु नहीं होती।

वासनायां प्रवृद्धायां, वियतसत्यत्ववादिनम् । सन्मात्रबोधमुक्तं च दृष्ट्वा विस्मयते बुधः ॥७६॥ [जो सदा आकाश को मिथ्या भाव से तथा सत् को वस्तु भाव से चिन्तन किया करता है तो इस चिन्तन से यह होता है कि] इस वासना के अत्यन्त बढ़ जाने पर आकाश और सत् के तत्व को समझ लेने वाला वह बुध, फिर जब कभी किसी ऐसे पुरुष को देखता है, जो आकाश को तो सत्य मानता हो और उसे आकाशरहित सद्वस्तु का बोध बिलकुल भी न हो, तब उसे बड़ा ही आश्चर्य होने लग पड़ता है [कि ओहो इसे सर्वभासक, सर्वाधिष्ठान, सर्वाधार, सत् का तो ज्ञान नहीं है, किन्तु यह अपने अज्ञान के कारण, भास्य, अधिष्ठेय किंवा आधेय पदार्थों को ही जान रहा है । एवमाकाशमिथ्यात्वे तत्सत्यत्वे च वासिते । न्यायेनानेन वाय्वादेः सद्वस्तु प्रविविच्यताम् ॥७७॥ इस प्रकार जब आकाश का मिथ्यापन तथा सत् का सत्यपन भले प्रकार जी में बैठ जाय, तब फिर इसी न्याय से वायु आदि शेष भूतों में से भी सद्वस्तु को पृथक् कर लेना चाहिये । सद्वस्तुन्येकदेशस्था माया, तत्रैकदेशगम् । वियत् तत्राप्येकदेशगतो वायुः प्रकल्पितः ॥७८॥ माया सद्वस्तु में उसके किसी एक देश में ही पड़ी हुई है। उस माया के किसी एक देश में यह आकाश रह रहा है । उस आकाश के किसी एक देश में इस वायु की कल्पना हो गयी है [यों इस वायु का भी सत् के साथ परम्परा से सम्बन्ध है। इससे इसका विवेचन भी कर ही डालना चाहिये ।]

६२ पंचदशी शोषस्पर्शौ गतिर्वेगो वायुधर्मा इमे मताः । त्रयः स्वभावाः सन्मायाव्योम्नां ये तेऽपि वायुगाः॥७९॥ शोष तथा स्पर्श, गति तथा वेग ये चार धर्म वायु के अपने धर्म कहाते हैं। [सत्ता, निस्तत्वरूपता तथा शब्द नाम के] जो तीन अन्य स्वभाव वायु में पाये जाते हैं, वे सत्-माया-तथा आकाश के हैं; वे भी वायु में आ गये हैं। वायुरस्तीति सद्भावः सतो वायौ पृथक्कृते । निस्तत्वरूपता मायास्वभावो, व्योमगो ध्वनिः ॥८०॥ 'वायुरस्ति' वायु है इस व्यवहार की कारण जो सद्रूपता है वह सद्वस्तु का धर्म वायु में आ गया है। सद्वस्तु से वायु के पृथक् कर लेने पर जो निस्तत्वरूपता [मिथ्यात्व] शेष रह जाती है वह वायु में दूसरा माया का धर्म है तथा आकाश से आया हुआ शब्द यह तीसरा वायु का धर्म है । सतोऽनुवृत्तिः सर्वत्र व्योम्नो नेति पुरेरितम् । व्योमानुवृत्तिरधुना कथं न व्याहतं वचः ॥८१॥ इसी प्रकरण के ६७ वें श्लोक में कहा है कि सत् की ही सर्वत्र अनुवृत्ति है आकाश की नहीं। अव् उसके विपरीत वायु आदि में आकाश की अनुवृत्ति कर रहे हो, फिर तुम्हारे कथन में व्याघात [किंवा पूर्वोत्तरविरोध] क्योंकर नहीं है ? छिद्रानुवृत्तिर्नेतीति पूर्वोक्तिरधुनात्वियम् । शब्दानुवृत्तिरेवोक्ता वचसो व्याहतिः कुतः ॥८२॥ इसका उत्तर यह है कि पहले [६७ श्लोक में] यह कहा गया था कि छिद्र अर्थात् आकाश की अनुवृत्ति नहीं होती। अब तो केवल शब्द की अनुवृत्ति की बात कही जा रही है । अर्थात्

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६३ अब केवल धर्म की अनुवृत्ति की जा रही है । फिर हमारे वचन में पूर्वोत्तरविरोध कैसे हो ? ननु सद्वस्तुपार्थक्यादसत्वं चेत्तदा कथम् । अव्यक्तमायावैषम्यादमायामयतापि नो ॥८३॥ हे सिद्धान्ती, यह बताओ कि वायु को सद्ब्रह्म से विल- क्षण होने के कारण यदि तुम असत् [किंवा मायामय] मानते हो तो यह वायु तो अव्यक्तरूप माया से भी विलक्षण ही है [क्योंकि यह तो व्यक्त है] फिर इसे अमायाममय [सत्य] भी क्यों नहीं मान लेते हो ? निस्तत्वरूपतैवात्र मायातत्वस्य प्रयोजिका । सा शक्तिकार्ययोस्तुल्या व्यक्ताव्यक्तत्वभेदिनोः ॥८४॥ सिद्धान्ती का उत्तर यह है कि—अव्यक्तता तो मायामय होने का कारण ही नहीं है । किन्तु निस्तत्वता के कारण इस वायु को मायामय किंवा असत् कहा गया है । वह निस्तत्व- रूपता अव्यक्त माया में भी है और माया के कार्य व्यक्त वायु आदि में भी पाई जाती है [माया और माया के कार्यों में, केवल अव्यक्तता और व्यक्तता का ही भेद है । इस कारण इस की मायामयता किसी युक्त्याभास से टलने वाली वस्तु नहीं है ।] सदसत्वविवेकस्य प्रस्तुतत्वात् स चिन्त्यताम् । असतोऽवान्तरो भेद आस्तां तच्चिन्तयात्र किम् ॥८५॥ इस समय सत् और असत् का विवेक ही प्रस्तुत हो रहा है । उसी का विचार हमें करना चाहिये । माया और माया के कार्यरूपी असत् पदार्थों के, जो कि व्यक्तता और अव्य-

६४ पञ्चदशी क्ततारूपी अवान्तर भेद है, उसका प्रकृत में कुछ भी उपयोग नहीं है इसलिये उसका विचार भी कर के क्या करें ? [हम यह इस जगह क्यों बतायें कि यह माया अव्यक्त क्यों है ? तथा उसके कार्य व्यक्त क्यों कर हो गये हैं ?] सद्वस्तु ब्रह्म, शिष्टोंऽशो वायुर्मिथ्या यथा वियत् । वासयित्वा चिरं वायोर्मिथ्यात्वं मरुतं त्यजेत् ॥८६॥ • वायु में जो सदंश [सद्भाग] है वह तो ब्रह्मरूप है । शेष रहा हुआ जो [निस्तत्व आदि] अंश है वही वायु का अपना स्वरूप है । निस्तत्वरूप होने के कारण, यह वायु भी आकाश के समान ही मिथ्या है । इस प्रकार वायु के मिथ्याभाव की वासना चिरकाल तक कर करके, वायु को छोड़ दे [अर्थात् वायु के सत्य होने की बुद्धि का परित्याग कर डाले] उस में से अपनी आस्था को हटा ले । चिन्तयेद् वह्निमप्येवं मरुतो न्यूनवर्तिनम् । ब्रह्माण्डावरणेष्वेषा न्यूनाधिकविचारणा ॥८७॥ वायु से न्यून देश में रहने वाली वह्नि को भी इसी प्रकार से चिन्तन करे और अन्त में उस की भी सत्य बुद्धि का इसी प्रकार परित्याग कर दे । यह न्यूनाधिक का विचार ब्रह्माण्ड के सभी आवरणों में किया जाता है । [लोक में ऐसा विचार नहीं होता । पृथिवी,जल,अग्नि,वायु आदि ब्रह्माण्ड के आवरण कहाते हैं ।] वायोर्दशांशतो न्यूनो वह्निर्वायौ प्रकल्पितः । पुराणोक्तं तारतम्यं दशांशैर्भूतपञ्चके ॥८८॥ अग्नि वायु के दसवें भाग के बराबर है

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६५

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६५ वायु है तो एक भाग अग्नि है] वह वह्नि भी वास्तव पदार्थ नहीं है, वह भी वायु में कल्पित है। पुराणों के कथनानुसार इन पांचों भूतों में १/१० भाग के अनुसार क्रम से न्यूनाधिक भाव है। वह्निरुष्णः प्रकाशात्मा पूर्वानुगतिरत्र च । अस्ति वह्निः स निस्तत्वः शब्दवान् स्पर्शवानपि॥८९॥ वह्नि उष्ण है और प्रकाशस्वरूप है। इस में भी वायु की तरह पूर्वानुगति अर्थात् कारण के धर्मों की अनुगति हो ही रही है। जभी तो कहा जाता है कि वह्नि है। वह निस्तत्व [मिथ्या] है शब्द और स्पर्श भी उस में रहते हैं। सन्मायाव्योमवाय्वंशैर्युक्तस्याग्नेर्निजो गुणः । रूपं, तत्र सतः सर्वमन्यद् बुद्ध्या विविच्यताम्॥९०॥ सत् माया आकाश तथा वायु के अंशों से युक्त जो अग्नि है, उस का अपना गुण तो 'रूप' ही है। उन में से सद्वस्तु को छोड़ कर और जितने भी धर्म हैं वे सब मिथ्या हैं। इस बात का विवेचन [पृथक्करण] बुद्धि के अवष्टम्भ से कर लेना चाहिये। सतो विविक्ते वह्नौ मिथ्यात्वे सति वासिते । आपो दशांशतो न्यूनाः कल्पिता इति चिन्तयेत् ॥९१॥ सत् से वह्नि के विविक्त कर लेने पर और वह्नि के मिथ्यात्व के वासित हो जाने पर फिर यह चिन्तन करना चाहिये कि जल भी वह्नि से दशांश कम है और वह भी कल्पित किंवा मिथ्या ही है । सन्त्यपोऽमूः शून्यतत्त्वाः सशब्दस्पर्शसंयुताः । रूपवत्योऽन्यधर्मानुवृत्त्या स्वीयो रसो गुणः ॥९२॥

६६ पञ्चदशी दूसरों के धर्मों की अनुवृत्ति के कारण कहा जाता है कि 'यह जल है' 'यह शून्यतत्व है' यह शब्द, स्पर्श तथा रूप वाला है। इसका अपना गुण तो केवल 'रस' ही है । सतो विवेचितास्वप्सु तन्मिथ्यात्वे च वासिते । भूमिं दशांशतो न्यूना कल्पिताप्स्विति चिन्तयेत् ॥९३ विवेक और ध्यान से जल के मिथ्यात्व का निश्चय करके फिर यह निश्चय करे कि भूमि भी जल से दस भाग कम है और वह भी जल में कल्पित किंवा मिथ्या ही है । अस्ति भूस्तत्त्वशून्यास्यां शब्दस्पर्शी सरूपकौ । रसश्च परतो गन्धो नैजः, सत्ता विविच्यताम् ॥९४॥ भूमि है, वह निस्तत्व है, इस में शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस ये गुण दूसरों से आये हैं [क्योंकि कारणों के धर्म कार्य में आया करते हैं] । गन्ध इसका निज गुण है । उन सब में से सत्ता का विवेक अथवा पृथक्करण कर डालना चाहिये । पृथक्कृतायां सत्तायां भूमिर्मिथ्याऽवशिष्यते । भूमे दशांशतो न्यूनं ब्रह्माण्डं भूमिमध्यगम् ॥९५॥ सत्ता के पृथक् कर लेने पर भूमि नाम का पदार्थ मिथ्या हो जाता है [अब आगे भौतिक ब्रह्माण्डादियों से सत् का विवेक कैसे करें ? वह दिखाया जाता है कि] भूमिमध्यग अर्थात् आकाश में घूमते रहने वाले भूमि के खण्डों [परमा- णुओं] से बना हुआ यह ब्रह्माण्ड भूमि से दस भाग कम है । ब्रह्माण्डमध्ये तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश । भुवनेषु वसन्त्येषु प्राणिदेहा यथायथम् ॥९६॥

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६७

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६७ उस ब्रह्माण्ड में चौदह भुवन निवास करते हैं। इन भुवनों में ही प्राणियों के देह अपनी अपनी व्यवस्था के अनुकूल निवास कर रहे हैं। ब्रह्माण्डलोकदेहेषु सद्वस्तुनि पृथक्कृते । असन्तोऽण्डादयो भान्तु तद्भानेऽपीह का क्षतिः ॥९७॥ ब्रह्माण्ड लोक तथा देहों में से सद्वस्तु के पृथक् कर लेने पर भी यदि असत् अण्डादियों का भान होता रहे, तो होता रहो। उन का वैसा [ असद्रूप से ] भान होते रहने पर भी फिर कुछ हानि नहीं होती। भूतभौतिकमायानामसत्त्वेऽत्यन्तवासिते । सद्वस्त्वद्वैतमित्येषा धीर्विपर्येति न क्वचित् ॥९८॥ भूत [आकाशादि] भौतिक [ब्रह्मांड आदि] तथा माया [जिस ने इन भूत भौतिकों को बनाया है] के मिथ्यात्व की वासना [विवेक और ध्यान के द्वारा] जब चित्त में दृढ रीति से वासित हो जाय तब फिर 'सद्वस्तु अद्वैत ही है' [वह कभी द्विधाभाव को प्राप्त नहीं होती है, वह वैसी की वैसी ही रहती है] यह बुद्धि कभी भी विपरीत नहीं हो सकती [फिर इस बुद्धि का विघात कभी भी नहीं होता है ।] सदद्वैतात् पृथग्भूते द्वैते भूम्यादिरूपिणि । तत्तदर्थक्रिया लोके यथा दृष्टा तथैव सा ॥९९॥ भूमि आदि रूपधारी यह द्वैत, जब सत् अद्वैत से पृथक् कर लिया जाता है, तब फिर लोक में विशेष विशेष प्रयोजन के लिये जो जो काम जैसे जैसे देखे जाते हैं [जैसे जल से प्यास की शान्ति, भोजन से भूख की निवृत्ति] वे वैसे के वैसे .

ही [स्वप्न की तरह] बने रह सकते हैं [तात्पर्य यह है कि विवेक

६८ पञ्चदशी ही [स्वप्न की तरह] बने रह सकते हैं [तात्पर्य यह है कि विवेक के द्वारा मिथ्यात्व का निश्चय हो जाने पर भी वह विवेक भूमि आदि के स्वरूप का उपमर्दन नहीं कर देता है । इस से व्यवहार के सहसा लुप्त हो जाने का प्रसंग नहीं आता है । विवेक व्यवहार को रोकता नहीं है, विवेक तो केवल सर्वात्म्य को जगाता है । जो काम क्षुद्र देहाभिमान की प्रेरणा से होते थे वे अब सर्वात्म्य की दृष्टि से होने लग पड़ेंगे । यही विवेक हो जाने की पहचान है ।] सांख्यकाणादबौद्धाद्यैर्जगद्भेदो यथा यथा । उत्प्रेक्ष्यते ऽनेकयुक्त्या भवत्वेष तथा तथा ॥१००॥ सांख्य, काणाद तथा बौद्धादि दार्शनिक लोग जिस जिस रीति से जगद्भेद की उत्प्रेक्षा अनेकानेक युक्तियों से करते हैं, यह जगत् वैसा ही रहो [ वैसा वैसा व्यावहारिक भेद तो हम भी मानते ही हैं। इस कारण उन के खण्डन करने का प्रयत्न हम नहीं करते । ] अवज्ञातं सदद्वैतं निःशङ्कैरन्यवादिभिः । एवं का क्षतिरस्माकं तद्द्वैत मवजानताम् ॥१०१॥ प्रमाणसिद्ध सत् अद्वैत की अवज्ञा, अन्य सांख्यादि वादियों ने निःशङ्क होकर की ही है । फिर [ श्रुति युक्ति और अनुभव के बल से चलने वाले ] हम लोग यदि उन के द्वैत की अवज्ञा करते हैं तो इस से हमारी क्या हानि है ? द्वैतावज्ञा सुस्थिता चेदद्वैते धीः स्थिरा भवेत् । स्थैर्ये तस्याः पुमानेष जीवन्मुक्त इतीर्यते ॥१०२॥ [ प्रत्युत उस अवज्ञा से एक महालाभ यह होता है कि ]

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६९

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६९ द्वैत की अवज्ञा जब पूर्ण रूप से स्थित हो जाती है, तब साधक की बुद्धि अद्वैत में स्थिर हो जाती है । इस बुद्धि के स्थिर हो जाने पर फिर यह [ स्थिर बुद्धि वाला ] पुरुष 'जीवन्मुक्त' कहाने लगता है । [अर्थात् जीवन्मुक्ति रूपी प्रयोजन के विद्य- मान होने के कारण यह द्वैतापमान कोई निष्प्रयोजन बात नहीं है । हां, उन लोगों का अद्वैतापमान उन के कल्याण मार्ग का घातक अवश्य ही है ] । एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्म निर्वाणमृच्छति ॥१०३॥ ['जीवन्मुक्ति ही नहीं विदेहमुक्ति भी इसी द्वैतावज्ञा का फल है' यह बात भगवद्गीता (२-७२) में कही गई है ] हे पार्थ, यहां तक ब्रह्मनिष्ठा का वर्णन किया गया। [परमेश्वर की आराधना से शुद्ध अन्तःकरण का] मनुष्य जब इस स्थिति को पा लेता है, तब फिर वह कभी संसारमोह को प्राप्त नहीं होता है । यदि अन्तकाल में भी इस स्थिति में ठहर सके तो वह ब्रह्म में निर्वाण किंवा लय को पा लेता है । [अथवा मरते समय क्षण भर के लिये भी इस स्थिति में ठहर सके तो वह ब्रह्म में निर्वाण किंवा विदेहमुक्ति को पा लेता है, फिर जो पुरुष बचपन से ही इस स्थिति में रहने लगा हो तो उस का कहना ही क्या है ? ] सदद्वैतेऽनृतद्वैते यदन्योन्यैकवीक्षणम् । तस्यान्तकालस्तद्भेदबुद्धिरेव न चेतरः ॥१०४॥ [भगवद्गीता के उपर्युक्त श्लोक में अन्तकाल शब्द से क्या अभिप्राय है सो अब बताया जाता है] 'सद्रूप अद्वैत' तथा 'अनृतरूप द्वैत' में जो अब तक अन्योन्यैकवीक्षण