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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

[शीर्षक] १०६ पाराशरस्मृतिः [ दशमो-

गधी और सूअर के साथ गमन करने से प्राजापत्य व्रत करना चाहिए। गाय के साथ रमण करने से तीन दिन-रात निरन्तर उपवास करके दक्षिणा में ब्राह्मण को एक गाय देनी चाहिये ॥ १६ ॥ महिष्युष्ट्री-खरीगामी त्वहोरात्रेण शुद्ध्यति । १अमरे समरे वाऽपि दुर्भिक्षे वा जनक्षये ॥१७॥ भैंस, ऊँटनी और गधी के साथ एक बार गमन करने से एक दिन तक उपवास करके वह व्यक्ति शुद्धता पा लेता है। डकैती, युद्ध, अकाल, महामारी, ॥ १७ ॥ वन्दिग्राहे भयार्तो वा सदा स्वस्त्रीं निरीक्षयेत् । चाण्डालैः सह सम्पर्कं या नारी कुरुते ततः ॥१८॥ बलपूर्वक दासीकरण करना, राजा और चोर के डर से सदैव अपनी पत्नी की रक्षा करते रहना। चाण्डालों के साथ रमण करनेवाली स्त्री को चाहिए कि, ॥ १८ ॥ विप्रान् दश वरान् कृत्वा स्वकं दोषं प्रकाशयेत् । आकण्ठसम्मिते कूपे गोमयोदककर्दमे ॥१९॥ वह दश कुलीन ब्राह्मणों के समक्ष अपने किये हुए दोषों को स्वीकार कर ले और किसी कूप या गड्ढे के जल में कण्ठ तक गोबर का कीचड़ बनाकर ॥ १९ ॥ तत्र स्थित्वा निराहारा त्वहोरात्रेण निष्क्रमेत् । स-शिखं वपनं कृत्वा भुञ्जीयाद्यावकौदनम् ॥२०॥ उसमें दिन-रात निराहार रहकर खड़ी रहे। तत्पश्चात् दूसरे दिन उस गढ़े से बाहर आकर समूचे सिर का मुण्डन करा डाले और यव का भात बनाकर भोजन करे ॥ २० ॥ त्रिरात्रमुपवासित्वा त्वेकरात्रं जले वसेत् ।

[पाद-टिप्पणी] १. 'डामरे' इत्यपि पाठः ।

[Header Left]: ऽध्यायः ] [Header Center]: भाषाटीकासहिता [Header Right]: १०७

शङ्खपुष्पीलतामूलं पत्रं वा कुसुमं फलम् ॥२१॥ इसके बाद तीन दिन तक उपवास करके एक दिन-रात जल में खड़ा रहे। फिर सातवें दिन शंखपुष्पी नामक लता के पंचांग (फल, फूल, मूल, पत्ती आदि) में से किसी एक को लेकर ॥२१॥ सुवर्णं १पञ्चगव्यं च क्वाथयित्वा पिबेज्जलम् । एकभक्तं चरेत् पश्चाद्यावत् पुष्पवती भवेत् ॥२२॥ इसके साथ सोना और पंचगव्य मिला ले। फिर उपर्युक्त वस्तुओं को जल में उबालकर उसका काढ़ा तैयार करे और उस काढ़े का पान करे। जब तक पुनः रजस्वला न हो तब तक नियमपूर्वक इस एकभक्त व्रत को करती रहे ॥२२॥ व्रतं चरति तद्यावत्तावत् संवसते बहिः । प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् ॥२३॥ व्रतकाल में घर के बाहर ही निवास करे और प्रायश्चित्त पूरा करके ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए ॥२३॥ गोद्वयं दक्षिणां दद्याच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् । चातुर्वर्ण्यस्य नारीणां कृच्छ्रं चान्द्रायणं स्मृतम् ॥२४॥ तत्पश्चात् दक्षिणास्वरूप ब्राह्मण को दो गायें प्रदान करनी चाहिए। ऐसा महर्षि पाराशर का मत है। यदि स्वेच्छा से चारों वर्ण की स्त्रियाँ चाण्डाल से सहवास करें तो एक कृच्छ्र और एक चान्द्रायण व्रत करने से उनकी शुद्धि हो जाती है ॥२४॥


१. पलमात्रं दुग्धभागं गोमूत्रं तावदिष्यते । घृतं च पलमात्रं स्याद् गोमयं तोलकद्वयम् ॥ दधिप्रसृतमात्रं स्यात् पञ्चगव्यमिदं स्मृतम् । अथवा पञ्चगव्यानां समानो भाग इष्यते ।' योषशकृद् द्विगुणं मूत्रं पयः स्यात्तच्चतुर्गुणम् । घृतं तद् द्विगुणं प्रोक्तं पञ्चगव्ये तथा दधि ॥—गौतमीतन्त्रे

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १०८ पाराशरस्मृतिः [ दशमो- यथा भूमिस्तथा नारी तस्मात्तां न तु दूषयेत् । बन्दिग्राहेण या भुक्ता हृत्वा बद्ध्वा बलाद् भयात् ॥२५॥ स्त्रियों को धरती के समान ही कहा गया है, इससे उनके दोषों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। जिस स्त्री के साथ बलपूर्वक उसे बाँधकर, दासी बनाकर या उसे भयभीत करके रमण किया गया हो ॥२५॥ कृत्वा सान्तपनं कृच्छ्रं शुद्ध्येत पाराशरोऽब्रवीत् । सकृद्भुक्ता तु या नारी नेच्छन्ती पापकर्मभिः ॥२६॥ तो ऐसी स्त्री सान्तपन कृच्छ्र व्रत के अनुष्ठान से दोषमुक्त हो जाती है। ऐसी बात पाराशर ने कही है। यदि किसी दुरात्मा ने स्त्री की अनिच्छा से केवल एक ही बार सम्भोग किया हो ॥२६॥ प्राजापत्येन शुद्ध्येत ऋतुप्रस्रवणेन च । पतत्यर्द्धं शरीरस्य यस्य भार्या सुरां पिवेत् ॥२७॥ तो वह स्त्री प्राजापत्य व्रत और ऋतुकाल में रजोस्राव होने से ही शुद्धता को प्राप्त हो जाती है। जिस मनुष्य की पत्नी मद्यपान कर ले, तो उस पुरुष के शरीर का आधा अंश दूषित और पतित हो जाता है ॥२७॥ पतिताद्र्धशरीरस्य निष्कृतिर्न विधीयते । गायत्रीं जपमानस्तु कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ॥२८॥ इस प्रकार के पतितों की शुद्धि नहीं हो सकती। उसे गायत्री मन्त्र का जप और कृच्छ्र सान्तपन व्रत का अनुष्ठान करना उचित है ॥२८॥ गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् । एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सान्तपनं स्मृतम् ॥२९॥ एक दिन गोमूत्र, दूसरे दिने गोबर, तीसरे दिन गाय का दूध, चौथे दिन दही, पाँचवें दिन घी, छठे दिन कुशा का जल पीकर और Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १०९ सातवें दिन निर्जल उपवास करने का नाम ही कृच्छ्र-सान्तपन व्रत है ॥२९॥ जारेण जनयेद् गर्भं मृते त्यक्ते गते पतौ । तां त्यजेदपरे राष्ट्रे पतितां पापकारिणीम् ॥३०॥ जो स्त्री अपने पति के मरने, पति द्वारा त्यागे जाने और पति के विदेश गमन करने पर किसी पर-पुरुष द्वारा गर्भाधान कर ले तो उस पतिता नारी को किसी दूसरे राज्य में ले जाकर निर्वासित कर देना चाहिए ॥३०॥ ब्राह्मणो तु यदा गच्छेत् परपुंसा समन्विता । सा तु नष्टा विनिर्दिष्टा न तस्याऽऽगमनं पुनः ॥३१॥ यदि ब्राह्मण की पत्नी किसी पर-पुरुष के साथ चली जाय तो वह नष्टा कहलाती है, उसका पुनः आगमन नहीं होता ॥३१॥ कामान्मोहात्तु या गच्छेत् त्यक्त्वा बन्धून् सुतान् पतिम् । साऽपि नष्टा परे लोके मानुषेषु विशेषतः ॥३२॥ जो स्त्री अपने बन्धु, पुत्र और पति को छोड़कर काम या मोह के वशीभूत होकर किसी अन्य पुरुष के साथ चली जाय तो वह इहलोक तथा परलोक दोनों में नष्टा होती है ॥३२॥ मद-मोहगता नारी क्रोधाद् दण्डादिताडिता । अद्वितीया गता चैव पुनरागमनं भवेत् ॥३३॥ जो स्त्री मतवाली होकर या किसी प्रकार दण्डित होकर क्रोधवश कहीं अन्यत्र चली जाय तो उसका पुनरागमन हो सकता है ॥३३॥ दशमे तु दिने प्राप्ते प्रायश्चित्तं न विद्यते । दशाहं न त्यजेन्नारीं त्यजेन्नष्टश्रुतां तथा ॥३४॥ यदि ऐसी स्त्री को दस दिन तक लगातार बाहर ही रहना पड़े तो उसका प्रायश्चित्त नहीं होता। इसलिए स्त्री का दस दिनों तक परित्याग

११० पराशरस्मृतिः [ दशमो- नहीं करना चाहिए । त्याग कर देने से वह स्त्री स्वयं तो भ्रष्ट हो ही जाती है, साथ-ही-साथ ॥३४॥ भर्ता चैव चरेत् कृच्छ्रं कृच्छ्रार्द्धं चैव बान्धवाः । तेषां भुक्त्वा च पीत्वा च अहोरात्रेण शुद्ध्यति ॥३५॥ उसके पति को भी एक कृच्छ्र और सम्बन्धी को आधा कृच्छ्र व्रत करना पड़ता है । यदि ऐसे व्यक्ति के घर भोजन ग्रहण किया जाय तो रात-दिन उपवास करने से शुद्धि प्राप्त होती है ॥३५॥ ब्राह्मणी तु यदा गच्छेत् परपुंसा विवर्जिता । गत्वा पुंसां शतं याति त्यजेयुस्तां तु गोत्रिणः ॥३६॥ यदि ब्राह्मण की पत्नी घर छोड़कर कहीं अकेली गमन करे और सौ पुरुषों के पास जाकर भी लौट आये तो सगोत्रियों द्वारा ऐसी स्त्री का बहिष्कार किया जाना चाहिए ॥३६॥ पुंसो यदि गृहे गच्छेत्तदशुद्धं गृहं भवेत् । पति-मातृगृहं यच्च जारस्यैव तु तद्गृहम् ॥३७॥ यदि ऐसी स्त्री अपने पति के घर वापस आ जाय तो उसके पति का घर अशुद्ध हो जाता है । पतिगृह या पितृगृह में जाने पर भी वह घर उसके प्रेमी का ही माना जाता है ॥३७॥ उल्लिख्य तद्गृहं पश्चात् पञ्चगव्येन ¹शोधयेत् । त्यजेच्च मृण्मयं पात्रं वस्त्रं काष्ठं च शोधयेत् ॥३८॥ ऐसे घर की शुद्धि के लिए उसकी भूमि की मिट्टी को कुछ खुरच- कर पञ्चगव्य द्वारा लेपन करे । घर में व्यवहृत होनेवाले मिट्टी के पात्रों को हटा दे, वस्त्र तथा काष्ठ को जल से धोकर शुद्ध कर ले ॥३८॥ सम्भाराञ्शोधयेत् सर्वान् गोवालैश्च फलोद्भवान् । ताम्राणि पञ्चगव्येन कांस्यानि दश भस्मभिः ॥३९॥ १. 'सेचयेत्' इति ।

प्रायश्चित्तं चरेद् विप्रो ब्राह्मणैरुपपादितम्¹।

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १११ घर में काम आनेवाली और सभी चीजों को शुद्ध कर ले अर्थात् फल से निर्मित वस्तुओं को गोबालों से, ताँबे के पात्र को पंचगव्य से और काँसे आदि के बरतनों को दस बार भस्म लगाकर मलना चाहिए॥३९॥ प्रायश्चित्तं चरेद् विप्रो ब्राह्मणैरुपपादितम्¹। गोद्वयं दक्षिणां दद्यात् प्राजापत्यद्वयं चरेत् ॥४०॥ ब्राह्मण जाति के लोगों को अन्य ब्राह्मणों के कथनानुसार प्रायश्चित्त करना उचित है। दो प्राजापत्य व्रत करने के पश्चात् दक्षिणा में ब्राह्मण को दो गायों का दान करना चाहिए ॥४०॥ इतरेषामहोरात्रं पञ्चगव्येन शोधनम्। उपवासैर्व्रतैः पुण्यैः स्नान-सन्ध्या-ऽर्चनादिभिः॥४१॥ ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य वर्ण के लोग तो एक दिन-रात उपवास करके पंचगव्य द्वारा शुद्धि पा लेते हैं। उपवास, व्रत, पुण्य, स्नान, सन्ध्योपासन और देवपूजन आदि ॥४१॥ जप-होम-दया-दानैः शुद्ध्यन्ते ब्राह्मणादयः। आकाशं वायुरग्निश्च मेध्यं भूमिगतं जलम् ॥४२॥ जप, हवन, दया और दान द्वारा ब्राह्मण वर्ण के व्यक्ति शुद्ध हो जाते हैं। आकाश, वायु, अग्नि, पृथ्वी पर गिरा हुआ शुद्ध और स्वच्छ जल ॥४२॥ न मेदुष्यन्ति² दर्भाश्च यज्ञेषु चमसा यथा॥४३॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे दशमोऽध्यायः॥१०॥ और कुशा कभी दूषित नहीं होता। जिस प्रकार यज्ञ का चमस पात्र (हव्य पात्र) कभी अशुद्ध नहीं होता उसी प्रकार ये भी सर्वदा शुद्ध माने गये हैं ॥४३॥ इस प्रकार पण्डित शिवदत्तमिश्रशास्त्रिकृत 'शिवदत्ती' हिन्दीटीका में पाराशरप्रोक्त धर्मशास्त्र में दसवाँ अध्याय समाप्त ॥१०॥ १. 'रुपपादयेत्' इति। २. 'दुष्यन्ति च' इति। Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

११२ पाराशरस्मृतिः [ एकादशो- ११. एकादशोऽध्यायः अमेध्य-रेतो गोमांसं चाण्डालान्नंमथापि वा । यदि भुक्तं तु विप्रेण कृच्छ्रं चान्द्रायणं चरेत् ॥ १ ॥ जो ब्राह्मण अपनी इच्छा से किसी प्रकार का अग्राह्य पदार्थ, जैसे— मानव-अस्थि, विष्ठा, मूत्र, वीर्य, रज, शव आदि का भक्षण कर ले अथवा गोमांस या चाण्डाल का अन्न ग्रहण करे, तो उसे शुद्धि के निमित्त चान्द्रायण व्रत करना उचित है । और यदि उपर्युक्त वस्तुएँ किसी के द्वारा बलात् या अनिच्छापूर्वक ग्रहण की गयी हों तो ऐसी अवस्था में कृच्छ्रव्रत करना चाहिए ॥ १ ॥ तथैव क्षत्रियो वैश्योऽप्यर्द्ध चान्द्रायणं चरेत् । शूद्रोऽप्येवं यदा भुङ्क्ते प्राजापत्यं समाचरेत् ॥ २ ॥ यदि क्षत्रिय या वैश्य कथित वस्तुओं का भक्षण कर ले तो उसे अर्ध-चान्द्रायण व्रत करना पड़ता है । शूद्र के द्वारा ग्रहण किये जाने पर प्राजापत्य नामक व्रत करना उचित है ॥ २ ॥ पञ्चगव्यं पिबेच्छूद्रो ब्रह्मकूर्चं पिबेद् द्विजः । एक-द्वि-त्रि-चतुर्गा वा सद्याद् विप्राद्यनुक्रमात् ॥ ३ ॥ व्रतकाल में शूद्र को पञ्चगव्य और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—इन तीनों वर्णों को ब्रह्मकूर्च का पान करके क्रमशः एक, दो, तीन और चार गायों का दान करने का विधान कहा गया है ॥ ३ ॥ शूद्रान्नं सूतकान्नं च अभोज्यस्याऽन्नमेव च । शङ्कितं प्रतिषिद्धान्नं पूर्वोच्छिष्टं तथैव च ॥ ४ ॥ शूद्र का अन्न, सूतक का अन्न, ग्रहण के समय का अन्न, भक्षण के अयोग्य मनुष्य का अन्न, सन्दिग्ध अन्न अर्थात् जिसके ग्राह्य-अग्राह्य का निर्णय न हो सके, निषिद्ध अन्न और किसी के भक्षण के पश्चात् बचा हुआ जूठा अन्न, ॥ ४ ॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ११३, यदि भुक्तं तु विप्रेण अज्ञानादापदाऽपि वा । ज्ञात्वा समाचरेत् कृच्छ्रं ब्रह्मकूर्चं तु पावनम् ॥ ५ ॥ जो ब्राह्मण संकट काल में या अनजान में भक्षण कर ले और बाद में उसकी यथार्थता का बोध होने पर उस ब्राह्मण के लिए कृच्छ्र व्रत और ब्रह्मकूर्च का पान शुद्धि के साधन माने गये हैं ॥५॥ बालैर्नकुल-मार्जारैरन्नमुच्छिष्टितं१ यदा । तिल-दर्भोंदकैः प्रोक्ष्य शुद्धयते नाऽत्र संशयः ॥ ६ ॥ जिस परिपक्व अन्न को किसी बालक, नेवले या बिलाव ने जूठा कर दिया हो तो ऐसे अन्न पर तिल और कुशा का जल छिड़कने मात्र से ही वह अन्न पवित्र हो जाता है ॥६॥ शूद्रोऽप्यभोज्यं भुक्त्वाऽन्नं पञ्चगव्येन शुद्ध्यति । क्षत्रियो वाऽपि वैश्यश्च प्राजापत्येन शुद्ध्यति ॥ ७ ॥ यदि किसी शूद्र ने अभोज्य पदार्थ का भक्षण किया हो तो उसके लिए पंचगव्य का पान और ऐसी ही अवस्था के क्षत्रिय या वैश्य के लिए प्राजापत्य व्रत करने का विधान है ॥७॥ एकपङ्क्त्युपविष्टानां विप्राणां सहभोजने । यद्येकोऽपि त्यजेत् पात्रं शेषमन्नं न भोजयेत् ॥ ८ ॥ ब्राह्मणों की मण्डली की कतार में बैठकर भोजन करनेवाला कोई व्यक्ति यदि भोजन छोड़कर उठ जाय तो उस कतार के सभी ब्राह्मणों को भोजन का परित्याग कर देना चाहिए । क्योंकि इसके बाद किया जानेवाला भोजन जूठा माना जाता है ॥८॥ मोहाद् भुञ्जीत यस्तत्र पङ्क्तावुच्छिष्टभोजने । प्रायश्चित्तं चरेद् विप्रः कृच्छ्रं सान्तपनं तथा ॥ ९ ॥ १. '-मुच्छेषितं' इति । २. 'तदा' इति । ८

११४ पाराशरस्मृतिः [ एकादशो- यदि मोहवश कोई ब्राह्मण उस जूठी पंक्ति में भोजन कर ही ले तो कृच्छ्र-सान्तपन व्रत करने से उसका प्रायश्चित्त दूर हो जाता है ॥९॥ पीयूषं श्वेत - लशुनं वृन्ताकफल - गृञ्जने । पलाण्डुं ¹वृक्षनिर्यास देवस्वं कवकानि च ॥१०॥ यदि कोई ब्राह्मण अपनी अज्ञानता के कारण तुरन्त की ब्यायी हुई गौ का दूध, सफेद लहसुन, सफेद रंग का बैगन, गाजर, प्याज, गोंद, देवसमर्पित वस्तु, कुकुरमुत्ता, ॥१०॥ उष्ट्रीक्षीरमविक्षीरमज्ञानाद् भुञ्जते² द्विजः³ । त्रिरात्रमुपवासेन पञ्चगव्येन शुद्धयति ॥११॥ ऊँटनी का दूध या भेड़ी का दूध पान कर ले तो उसे तीन दिन उपवास करके पंचगव्य पान करना आवश्यक है ॥११॥ मण्डूकं भक्षयित्वा तु मूषिकामांसमेव च । ज्ञात्वा विप्रस्त्वहोरात्रं यवकान्नेन शुद्धयति ॥१२॥ यदि कोई जान-बूझकर मेढक या चूहे का मांस भक्षण करे तो उसे शुद्धि के निमित्त एक दिन जव का बनाया हुआ भात खाना चाहिए ॥१२॥ क्षत्रियश्चाऽपि वैश्यश्च क्रियावन्तौ शुचिव्रतौ । तद्गृहे⁴ तु द्विजैर्भोज्यं हव्य-कव्येषु नित्यशः ॥१३॥ अपने धर्म में तत्पर सदाचारी क्षत्रिय या वैश्य के घर देवता या पितृ कार्य में आमन्त्रित ब्राह्मण को निःसंकोच भोजन करना चाहिए ॥१३॥ ⁵घृतं तैलं तथा क्षीरं गुडं स्नेहेन पाचितम् । १. 'वृक्षनिर्यासान्' 'पलाण्डुवृक्षनिर्यासान् देवस्वकवनानि च' इति च । २. 'पिबते' इति । ३. 'द्विजाः' इति । ४. 'तद्गृहेषु' इति । ५. 'घृतं क्षीरं तथा तैलं गूढं तैलेन पाचितम्' इत्यपि पाठः क्वचित्पुस्तके दृश्यते ।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ११५ गत्वा नदीतटे विप्रो भुञ्जीयाच्छूद्रभोजनम्¹ ॥१४॥ ब्राह्मण को शूद्र के घर का दूध, गुड़, तेल तथा घृतनिर्मित पदार्थ किसी जलाशय या नदी के तट पर ले जाकर भक्षण करना चाहिए, परन्तु उसके घर में बैठकर भोजन नहीं करना चाहिए ॥१४॥ मद्य-मांसरतं नित्यं नीचकर्म-प्रवर्तकम् । तं शूद्रं वर्जयेद् विप्रःश्वपाकमिव दूरतः ॥१५॥ मद्य-मांस का क्रय-विक्रय या चर्मच्छेदन आदि निषिद्ध कर्म करने- वाले शूद्र का ब्राह्मण द्वारा परित्याग किया जाना चाहिए ॥१५॥ द्विज-शुश्रूषणरतान् मद्य-मांस-विवर्जितान् । स्वकर्मणि² रतान्नित्यं न ताँ³ञ्छूद्रान् त्यजेद् द्विजः ॥१६॥ विप्रसेवी, मद्य-मांस से रहित और अपने कर्म में निरत रहनेवाले शूद्र का ब्राह्मण को परित्याग नहीं करना चाहिए ॥१६॥ अज्ञानाद् भुञ्जते विप्राः सूतके मृतकेऽपि वा । प्रायश्चित्तं कथं⁴ तेषां वर्णे वर्णे विनिर्दिशेत् ॥१७॥ सूतक या मृतक के घर में अनजाने ही यदि कोई ब्राह्मण भोजन कर ले तो उस ब्राह्मण को विभिन्न वर्णों के घर में भोजन करने का अलग-अलग ढंग से प्रायश्चित्त करना पड़ता है ॥१७॥ गायत्र्यष्टसहस्रेण शुद्धिः स्याच्छूद्रसूतके । वैश्ये पञ्चसहस्रेण त्रिसहस्रेण क्षत्रिये ॥१८॥ सूतक में शूद्र के घर भोजन करने से आठ हजार, वैश्य के घर भोजन करने से पाँच हजार और क्षत्रिय के घर भोजन करने पर तीन हजार गायत्री मन्त्र जप करने से उस ब्राह्मण का दोष दूर हो जाता है ॥१८॥ १. 'च्छूद्रभाजने' इति । 'स्वकर्मनिरतान्नित्यं' इति । ३. 'तान् शूद्रान्' इति । ४. 'तत्र' इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ११६ पराशरस्मृतिः [ एकादशो- ब्राह्मणस्य यदा भुङ्क्ते १द्वे सहस्रे तु दापयेत् । अथवा वामदेव्येन २साम्नैवैकेन शुद्ध्यति ॥१९॥ किसी ब्राह्मण के घर सूतक में भोजन करने से दो हजार गायत्री का जाप अथवा 'वामदेव्य' साम अर्थात् 'कया नश्चित्र०' से लेकर तीन मन्त्र का एक पाठ कर लेने से ही शुद्धि हो जाती है ॥१९॥ शुष्कान्नं गोरसं स्नेहं शूद्रवेश्मन ३आहृतम् । पक्वं विप्रगृहे ४भुक्तं भोज्यं तन्मनुरब्रवीत् ॥२०॥ शूद्र के घर का सूखा अन्न, गाय का दूध और घी, तेल आदि ब्राह्मण के घर में पकाकर भक्षण के योग्य होता है। ऐसा मनुजी ने आदेश दिया है ॥२०॥ औपत्कालेषु विप्रेण भुक्तं शूद्रगृहे यदि । मनस्तापेन शुद्ध्येत ६द्रुपदां वा ७जपेच्छतम् ॥२१॥ यदि कोई ब्राह्मण विपत्तिकाल में शूद्र के घर का बना हुआ भोजन कर ले तो मन में पश्चात्ताप कर लेने मात्र से ही उसकी शुद्धि हो जाती है अथवा सौ बार 'द्रुपदादिव०' मन्त्र का पाठ करने से दोष नष्ट हो जाता है ॥२१॥ दास - नापित-गोपाल - कुलमित्राऽर्द्धसीरिणः । एते शूद्रेषु भोज्यान्ना यश्चाऽऽत्मानं निवेदयेत् ॥२२॥ दास, नापित, गोपाल, अपने वंश का मित्र, अर्धसीरी तथा आत्म- समर्पणकारी शूद्र का अन्न भक्षणीय कहा जाता है ॥२२॥ १. 'द्विसहस्रं तु' इति । २. 'साम्ना चैकेन' इति । ३. 'शूद्रवेषेण' इति । ४. 'भुक्ते' इति । ५. 'आपत्काले तु' इति । ६. 'ॐ द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव । पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः ।' ७. 'शतं जपेत्' इति । ८. 'विधीयते' इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ११७ शूद्रकन्यासमुत्पन्नो ब्राह्मणेन तु संस्कृतः । असंस्काराद् भवेद्दासः संस्कारादेव नापितः ॥२३॥ ब्राह्मण द्वारा शूद्र कन्या से उत्पन्न सन्तान का संस्कार कर देने से वह 'नापित' हो जाता है, और संस्कार-विहीन सन्तान 'दास' कहलाता है ॥२३॥ क्षत्रियाच्छूद्रकन्यायां समुत्पन्नस्तु यः सुतः । स गोपाल इति ख्यातो भोज्यो विप्रैर्न संशयः ॥२४॥ क्षत्रिय द्वारा शूद्र कन्या से उत्पन्न सन्तान को 'गोपाल' कहते हैं। ऐसे व्यक्ति का अन्न ब्राह्मण को भक्षण करना उचित है ॥२४॥ वैश्यकन्यासमुद्भूतो ब्राह्मणेन तु संस्कृतः । १सो हर्धाद्धिक इति ज्ञेयो भोज्यो विप्रैर्न संशयः ॥२५॥ ब्राह्मण द्वारा वैश्य कन्या में उत्पन्न सन्तान का संस्कार कर देने से वह सन्तान 'अर्धसोरी' कहलाता है। ऐसे मनुष्य का अन्न ब्राह्मणों के लिए ग्राह्य है ॥२५॥ भाण्डस्थितमभोज्येषु जलं दधि घृतं पयः । अकामतस्तु यो भुङ्क्ते प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ? ॥२६॥ अग्रा‍ह्यों के पात्र में रखे हुए जल, दही, घी या दूध को जो अनजाने में ही ग्रहण कर ले, तो उसका प्रायश्चित्त किस प्रकार से हो सकता है ? ॥२६॥ ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा उपसर्पति । ब्रह्मकूर्चोपवासेन ३योज्या वर्णस्य निष्कृतिः ॥२७॥ १. 'संस्कृतस्तु भवेद्दासो ह्यसंस्कारैस्तु नापितः' इति । 'संस्कारात्तु भवेद्दासः असंस्काराच्च नापितः' इति च पाठा० । २. 'सोत्यर्द्धिक' इति । ३. 'याज्यवर्णस्य' इति ।

११४ पराशरस्मृतिः [ एकादशो- चारों वर्णों में से सभी लोगों की शुद्धि ब्रह्मकूर्च के पान और उपवास करने से हो जाती है ॥२७॥ शूद्राणां नोपवासः स्याच्छूद्रो दानेन शुद्धयति । ब्रह्मकूर्चमहोरात्रं श्वपाकमपि शोधयेत् ॥२८॥ शूद्रों को उपवास करने का आदेश नहीं दिया गया है । शूद्र केवल दान करने से ही शुद्ध हो जाता है । ब्रह्मकूर्च पान करके रात-दिन रह जाने से चाण्डाल भी शुद्ध हो जाता है ॥२८॥ गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् । निर्दिष्टं पञ्चगव्यं तु१ पवित्रं पापशोधनम् ॥२९॥ पंचगव्य बनाने के लिए गाय का गोबर, गोमूत्र, दूध, दही, घी और कुश के जल का मिश्रण किया जाता है । इसका मिश्रण समस्त पापों का नाशक और अत्यन्त पवित्र कहा गया है ॥२९॥ गोमूत्रं कृष्णवर्णायाः श्वेतायाश्चैव गोमयम् । पयश्च ताम्रवर्णाया रक्ताया गृह्यते दधि ॥३०॥ काली गाय का मूत्र, सफेद गाय का गोबर, ताम्रवर्णी गौ का दूध और लाल रंग की गाय का दही, ॥३०॥ कपिलायाः घृतं ग्राह्य सर्वं कौपिलमेव२ वा । मूत्रमेकपलं दद्यादङ्गुष्ठार्द्धं तु गोमयम् ॥३१॥ कपिला गाय का घृत अथवा उपर्युक्त वर्णित सभी वस्तुएँ कपिला गाय का ही हो । गोमूत्र ४ तोला, आधे अँगूठे के बराबर गोबर, ॥३१॥ क्षीरं सप्तपलं दद्याद् दधि त्रिपलमुच्यते । घृतमेकपलं दद्यात् पलमेकं कुशोदकम् ॥३२॥ दूध २८ तोले, दही १२ तोले, घी ४ तोले और कुशा का जल ४ तोले लेना चाहिए । ३२॥

१. 'च' इति । २. 'कपिल' इति ।

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ११९ 'गायत्र्याऽऽदाय गोमूत्रं गन्धद्वारेति गोमयम् । आँप्यायस्वेति च क्षीरं दधिक्राव्णस्तथा दधि ॥३३॥ गोमूत्र ग्रहण के समय 'ॐ भूर्भुवः स्वः०' गायत्रीमंत्र का पाठ, 'गन्धद्वारां०' मन्त्र से गोबर, 'आप्यायस्व०' मन्त्र से दूध और 'दधि- क्रा०णो०' मन्त्र से दही ग्रहण करना चाहिए ॥३३॥ तेजोऽसि शुक्रमित्याज्यं देवस्य त्वा कुशोदकम् । पञ्चगव्यमृचा पूतं स्थापयेदग्निसन्निधौ । ३४॥ 'तेजोऽसि शुक्रम्०' मन्त्र से घृत और 'देवस्य त्वा०' मन्त्र से कुशोदक ग्रहण करे। उक्त ऋचाओं से शुद्ध किया हुआ पंचगव्य अग्नि के समक्ष स्थापित करना चाहिए ॥३४॥ आँपो हिष्ठेति चाऽलोड्य मा नस्तोकेति मन्थयेत् । सप्त वारांस्तु ये दर्भा अच्छिन्नाग्राः शुकत्विषः ॥३५॥ 'आपो हिष्ठा०' मन्त्र द्वारा उसे हिलोदना और 'मा नस्तोके०' मन्त्र से मंथन किया जाना चाहिए। इसके पश्चात् सात बार अर्थात् १. ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ २. गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥ ३. आप्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम् । भवा वाजस्य सङ्गथे ॥ — ऋ० मं० ९, सूक्त ३१, मन्त्र० ४ ४. दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः । सुरभि नो मुखा करतप्राण आयूंषि तारिषत् ॥ —ऋ० ४,३९,६ ५. तेजोऽसि शुक्रममृतमायुष्पा आयुर्मे पाहि । ६. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामाददे ॥ —शु० य० सं०, अ० २२, म० १ ७. आपो हिष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन । महे रणाय चक्षसे ॥ ऋ. १०,९,१ ८. मा नस्तोके तनये मा न आयौ मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः । वीरान्मा नो रुद्रभामितो वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥—ऋ. १,११४,८ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

१२° पराशरस्मृतिः [ एकादशो- सात अपराधों के निवारक ऐसे कुशों को ग्रहण करें जिनके आगे का भाग कटा-फटा न हो और उनका रंग बिलकुल हरा हो ॥३५॥ एतैरुद्धृत्य होतव्यं पञ्चगव्यं यथाविधि । १'इरावती' २‘इदं विष्णुर्मानस्तोके’३ति४ ५'शंवती ॥३६॥ उपर्युक्त प्रकार की कुशाओं द्वारा पंचगव्य उठाकर विधिपूर्वक हवन करना चाहिए । हवन की ऋचाएं 'इरावती०', 'इदं विष्णु०', 'मानस्तोके०' और 'शंवतीः०' हैं ॥३६। एताभिश्चैव होतव्यं हुतशेषं पिवेद् द्विजः । आलोड्य प्रणवेनैव निर्मन्ध्य प्रणवेन तु ॥३७॥ इन्हीं से हवन करना चाहिए । हवन करने के बाद जो कुछ शेष रह जाय उसे पान करना चाहिए । ब्राह्मण को पान के पूर्व प्रणव पाठ द्वारा उसका आलोडन और मंथन करना उचित है ॥३७॥ उद्धृत्य प्रणवेनैव पिवेच्च प्रणवेन तु । यत्त्वगस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति देहिनाम् ॥३८॥ प्रणव से निकालकर प्रणव द्वारा ही पान करे । मनुष्य की हड्डी और चमड़े में जो कुछ भी पाप समाविष्ट रहता है । ३८॥ ६ब्रह्मकूर्चो दहेत् सर्वं ७प्रदीप्ताग्निरिवेन्धनम् । पवित्रं त्रिषु लोकेषु देवताभिरधिष्ठितम् ॥३९॥ १. इरावती धेनुमती हि भूतं सूयवसिनी मनुषे दशस्या । व्यस्तम्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः ॥ - ऋ० ७,९९,३ २. इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेदा नि दधे पदम् । समूळहमस्य पांसुरे ।-ऋ० १,२२,१७ ३. 'मानस्तोके'—ऋ० १,११४,८ । ४. 'च' इति । ५. शंवतीः पारयन्त्येते तं पृच्छन्ति वचो यया । अभ्यारन्तं यमकेतं य एवेदमिति ब्रवत् । —ऋ० परिशिष्टम् ६. 'ब्रह्मकूर्चं' इति । ७. 'यथैवाग्निरिवेन्धनम्' इति ।

उसे यह ब्रह्मकूर्च सम्पूर्ण रूप से भस्मसात् कर देता है जिस प्रकार धधकती हुई अग्नि ईंधन को जला डालती है। यह त्रैलोक्य में अत्यन्त पुनीत होने के साथ ही साथ देवताओं का निवासस्थल भी है ॥३९॥ वरुणश्च व गोमूत्रे गोमये हव्यवाहनः । दध्नि वायुः समुद्दिष्टः सोमः क्षीरे घृते रविः ॥४०॥ गोमूत्र में वरुण, गोबर में अग्नि, दही में वायु, दूध में चन्द्रमा और घी में सूर्य का निवास माना गया है ॥४०॥ पिबतः पतितं तोयं भोजने मुखनिःसृतम् । अपेयं तद् विजानीयात् पीत्वो चान्द्रायणं चरेत् ॥४१॥ पानी पीने के समय गिरा हुआ पानी या भोजन के समय मुँह से गिरा हुआ अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। यदि ग्रहण ही कर ले तो उसकी शुद्धि के लिए चान्द्रायण व्रत करना चाहिए ॥४१॥ कूपे च पतितं दृष्ट्वा श्व-शृगालौ च मर्कटम् । अस्थि-चर्मादि पतितं पीत्वाऽमेध्या अपो द्विजः ॥४२॥ किसी कूप में यदि कुत्ते, गीदड़, बन्दर की हड्डी या चमड़ा गिरा हुआ दिखाई दे और उस जल को ब्राह्मण पी जाय तो उसे वर्णित प्रकार का प्रायश्चित्त करना उचित है ॥४२॥ नारं तु कुणपं काकं २विड्वराह-खरोष्ट्रकम् । गावयं सौप्रतीकं च मायूरं खड्गकं तथा ॥४३॥ मनुष्य, कौवे, ग्राम-शूकर, गधे, ऊँट, शवर (नील गाय), सुप्रतीक (हाथी), मोर, गैंडा, ॥४३॥ वैयाघ्रमार्क्षं साहं वा कूपे यदि निमज्जति । तडागस्याऽथ दुष्टस्य पीतं स्यादुदकं यदि ॥४४॥ १. 'भुक्त्वा' इति । २. 'विड्वराहं' इति ।

१२२ पराशरस्मृतिः [ एकादशो- व्याघ्र, भालू, सिंह आदि किसी कुएँ या तालाब में गिरकर मर गये हों तो उस दूषित जल को पीने से, ॥४४॥ प्रायश्चित्तं भवेत् पुंसः क्रमेणैतेन सर्वशः । विप्रः शुद्ध्येत् त्रिरात्रेण क्षत्रियस्तु दिनद्वयात् ॥४५॥ ब्राह्मण को तीन दिन और क्षत्रिय को दो दिन तक उपवास करना चाहिए ॥४५॥ एकाहेन तु वैश्यस्तु शूद्रो नक्तेन शुद्ध्यति । परपाकनिवृत्तस्य परपाकरतस्य च ॥४६॥ वैश्य एक दिनके उपवास तथा शूद्र रात्रिमें भोजन करने से ही शुद्धता को प्राप्त हो जाता है। परपाकनिवृत्त और परपाकरत, ।४६॥ अपचस्य च भुक्त्वाऽन्नं द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् । अपचस्य च यद्दानं दातुश्चाऽस्य कुतः फलम् ? ॥४७॥ तथा अपच का अन्न यदि कोई ब्राह्मण ग्रहण करे तो उसे चान्द्रायण व्रत करना चाहिए। अपच को दान करने का कुछ भी फल नहीं होता ॥४७॥ दाता प्रतिग्रहीता च तौ द्वौ निरयगामिनौ । गृहीत्वाऽग्निं समारोप्य पञ्चयज्ञान् निर्वपेत् ॥४८॥ दान देने और ग्रहण करनेवाले दोनों ही नरकगामी होते हैं। जो कोई अग्नि का समारोपण करके भी पंचयज्ञों को नहीं करता ॥४८॥ परपाकनिवृत्तोऽसौ मुनिभिः परिकीर्तितः । पञ्चयज्ञान् स्वयं कृत्वा परान्नेनोपजीवति ॥४९॥ उसे मुनियों ने 'परपाकनिवृत्त' की संज्ञा दी है। जो स्वयं पंचयज्ञों को करके भी किसी दूसरे के अन्न पर निर्भर रहता है ॥४९॥ सततं प्रातरुत्थाय परपाकतस्तु सः । १. 'तु' इति ।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १२३ गृहस्थधर्मो यो विप्रो ददाति परिवर्जितः ॥५०॥ वह प्रातः उठने के बाद सदैव 'परपाक-रत' कहा जाता है। गृहस्थाश्रम में रहनेवाला जो ब्राह्मण दान नहीं करता ॥५०॥ ऋषिभिर्धर्मतत्त्वज्ञैरपचः परिकीर्तितः । युगे युगे तु ये धर्मास्तेषु तेषु च ये द्विजाः ॥५१॥ उस ब्राह्मण को धर्मवेत्ता ऋषियों ने 'अपच' के नाम से घोषित किया है । अन्य युग के जो धर्म हैं और उन युगों के जो ब्राह्मण हैं ॥५१॥ तेषां निन्दा न कर्त्तव्या युगरूपा हि ते द्विजाः । हुङ्कारं ब्राह्मणस्योक्त्वा त्वङ्कारं च गरीयसः ॥५२॥ उनकी निन्दा कभी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वे विप्र युग के प्रतीक हैं। यदि किसी ब्राह्मण को 'हुंकार' और अपने से बड़े लोगों को 'तुकार' शब्द से सम्बोधित करे तो वह ॥५२॥ स्नात्वा तिष्ठन्नहःशेषमभिवाद्य प्रसाद्येत् । ताडयित्वा तृणेनापि कण्ठे बध्वाऽपि वाससा ॥५३॥ दिन के शेष होने तक स्नान करके बैठा रहे और रुष्ट हुए को नमस्कार के द्वारा प्रसन्न करने की चेष्टा करे। तिनके से आघात करने, गले में वस्त्र द्वारा बाँधने ॥५३॥ विवादेनापि निर्जित्य प्रणिपत्य प्रसाद्येत् । अवगूर्य त्वहोरात्रं त्रिरात्रं क्षितिपातने ॥५४॥ या वाद-विवाद में परास्त कर ले तो उन्हें प्रणाम करके प्रसन्न करे। यदि ब्राह्मण को मारने के उद्देश्य से दण्ड उठाये तो एक दिन, भूमि पर धराशायी कर देने पर तीन दिन, ॥५४॥ अतिकृच्छ्रं च रुधिरे कृच्छ्रोऽभ्यन्तरशोणिते । १. 'अवगृह्य' इति ।

[Page Header] १२४ पाराशरस्मृतिः [ द्वादशो-

नवाहमतिकृच्छ्री स्यात् पाणिपूरान्नभोजनः ॥५५॥ प्रहार के द्वारा रक्तपात होने पर अतिकृच्छ्र और चमड़े के अन्दर रक्त जम जाने पर कृच्छ्र व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए । एक मुट्ठी अन्न के द्वारा नव दिन तक व्यतीत करना चाहिए ॥ ५५ ॥ त्रिरात्रमुपवासी स्यादतिकृच्छ्रः स उच्यते । सर्वेषामेव पापानां सङ्करे समुपस्थिते ॥५६॥ इसके पश्चात् तीन दिन तक उपवास करने से कृच्छ्र नामक व्रत पूरा होता है । जब समस्त प्रकार के पापों का एक साथ समन्वय हो जाय तब ॥ ५६ ॥ दशसाहस्रमभ्यस्ता गायत्रीशोधनं परम् ॥५७॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ दस हजार गायत्री मन्त्र का पाठ करने से समस्त पापों का नाश हो जाता है ॥ ५७ ॥ इस प्रकार 'शिवदत्तो' भाषा टीका में पाराशरीय धर्मशास्त्र में ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ॥ ११ ॥

१२. द्वादशोऽध्यायः दुःस्वप्नं यदि पश्येद् वा वान्ते वा क्षुरकर्मणि । मैथुने प्रेतधूमे³ च स्नानमेव विधीयते ॥ १ ॥ किसी प्रकार का खराब स्वप्न देखने, वमन करने, क्षौर-कर्म कराने, मैथुन करने या प्रेतधूम (श्मशान आदि स्थानों का धुआँ) लगने पर स्नान मात्र से ही शुद्धि हो जाती है ॥ १ ॥ १. 'त्रिरात्रमुपवासः' इति । २. 'पश्येत्तु' इति । ३. 'धूम्र' इति ।

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १२५ अज्ञानात् प्राश्य विण्मूत्रं १सुरासंसृष्टमेव च । पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः ॥ २ ॥ अज्ञान के कारण मल-मूत्र या मद्य-मिश्रित पदार्थ आदि खा-पी लेने पर, तीनों वर्णों को पुनः अपना संस्कार करना चाहिए ॥ २ ॥ अजिनं मेखला दण्डो भैक्ष्यचर्या व्रतानि च । निवर्तन्ते द्विजातीनां पुनः संस्कारकर्मणि ॥ ३ ॥ जब विप्रों का पुनः संस्कार किया जाता है तब मृगचर्म, मेखला, दण्ड आदि धारण नहीं करना पड़ता । इसके अतिरिक्त भैक्ष्यचर्या ( भिक्षाचरण ) और व्रतादि कर्म भी नहीं करने पड़ते ॥ ३ ॥ विण्मूत्रभोजो शुद्धयर्थं प्राजापत्यं समाचरेत् । पञ्चगव्यं च कुर्वीत स्नात्वा पीत्वा शुचिर्भवेत् ॥ ४ ॥ मल-मूत्रभक्षी के लिए प्राजापत्य व्रत का विधान है । स्नान के पश्चात् पंचगव्य का पान करने से शुद्धि मिलती है ॥ ४ ॥ जलाऽग्निपतने चैव प्रव्रज्याऽनाशकेषु च । वृथावासितवर्णानां कथं शुद्धिविधीयते ? ॥ ५ ॥ मनुष्य के जल में डूबने, आग में जलने, संन्यास ग्रहण करने, पहाड़ से गिरने, अनशन व्रत करने या आत्महत्या का प्रयास करके बचे रहने पर चारों वर्णों के लोगों की शुद्धि किस प्रकार हो सकती है ? ॥ ५ ॥ प्राजापत्यद्वयेनैव तीर्थाभिगमनेन च । वृषैकादशदानेन वर्णाः शुद्ध्यन्ति ते त्रयः ॥ ६ ॥ दो प्राजापत्य व्रत करके किसी तीर्थस्थान में स्नान करके दस गौ और एक बैल का दान करने से तीनों वर्णों की शुद्धि हो जाती है ॥ ६॥ ब्राह्मणस्य प्रवक्ष्यामि वनं गत्वा चतुष्पथे । १. 'सुरां वा पिवते यदि' इति । २. 'विण्मूत्रस्य च' इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal