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पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

कैवल्यपाद-४ १४३

परन्तु यह भ्रम समाधिके द्वारा पुरुषकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जानेपर नष्ट हो जाता है ॥२३॥

**सम्बन्ध—**अब चित्तसे भिन्न द्रष्टा पुरुषकी सत्ताको दृढ़ करने-के लिये दूसरा हेतु बतलाते हैं—

तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात् ॥ २४॥

‘वह (चित्त) असंख्येय वासनाओंसे चित्रित होनेपर भी दूसरेके लिये है; क्योंकि यह संहत्यकारी (मिल-जुलकर कार्य करनेवाला) है।’

**व्याख्या—**जो वस्तु बहुत पदार्थोंसे मिल-जुलकर कार्यमें समर्थ होती है, वह संहत्यकारी कहलाती है—जैसे मकान, भोजन आदि। ऐसी वस्तु अपनेसे भिन्न किसी दूसरेके लिये ही हुआ करती है, अपने लिये नहीं; अतः वह परार्थ कहलाती है। यह चित्त भी सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंके मिश्रणसे उत्पन्न है तथा बाह्य पदार्थ और इन्द्रियोंके संयोगसे उनसे मिल-जुलकर कार्य करनेमें समर्थ होता है; अतः यह अपने लिये नहीं है, द्रष्टा पुरुषके लिये है तथा उसीके भोग और अपवर्गके सम्पादनार्थ यह नाना वासनाओंसे चित्रित है, अपने लिये नहीं।

भाव यह है कि यद्यपि चित्तमें ही सब बाह्य पदार्थोंके चित्र पड़ते हैं और वह अगणित वासनाओंसे रँगा हुआ है तो भी वह स्वयंप्रकाश और द्रष्टा नहीं है; क्योंकि वह बाह्य पदार्थ और इन्द्रिय आदिसे मिल-जुलकर काम करनेवाला है, अतः दूसरेके लिये है ॥२४॥

१४४पातञ्जलयोगदर्शन

**सम्बन्ध—**यहाँतक चित्त और आत्मा—इन दोनोंकी भिन्नता-का युक्तियाँद्वारा प्रतिपादन किया; किन्तु युक्तियोंसे तो आत्माका स्वरूप सामान्य भावसे ही समझमें आता है, उसके स्वरूपका विशेष ज्ञान तो समाधिद्वारा ही हो सकता है। अतः समाधिमें होनेवाले विवेकज्ञानद्वारा जब योगी आत्मस्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कर लेता है, तब उसकी क्या पहचान है, यह बतलाते हैं—

विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः ॥ २५॥

( समाधिर्जनित विवेकज्ञानके द्वारा ) चित्त और आत्माके भेदको प्रत्यक्ष कर लेनेवाले योगीकी आत्मभावविषयक भावना सर्वथा निवृत्त हो जाती है।

**व्याख्या—**अपने स्वरूपको जाननेके लिये जो इस प्रकारके संकल्प होते हैं कि मैं कौन हूँ, कैसा हूँ—इत्यादि, इसका नाम आत्मभावभावना अर्थात् आत्मज्ञानके विषयका चिन्तन है। यह जबतक मनुष्यको आत्माके स्वरूपका ज्ञान नहीं होता, तबतक ऊँचे-से-ऊँचे साधकमें भी विद्यमान रहती है। परंतु जिसने विवेक-ज्ञानद्वारा इस भेदको भलीभाँति समझ लिया है कि शरीर और चित्त आदिसे आत्मा भिन्न है, जिसे अपने स्वरूपका संशयरहित प्रत्यक्ष अनुभव हो गया है, उसकी उपर्युक्त आत्मभावभावना सर्वथा मिट जाती है। यही उसकी पहचान है ॥२५॥

**सम्बन्ध—**उस समय उस योगीके चित्तकी कैसी स्थिति रहती है, यह बतलाते हैं—

कैवल्यपाद-४ १४५

तदा विवेकिनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् ॥ २६ ॥

'उस समय योगीका चित्त विवेकमें झुका हुआ और कैवल्यके अभिमुख हो जाता है।'

**व्याख्या—**अज्ञान-अवस्थामें साधारण मनुष्योंका चित्त अज्ञानमें निमग्न और विषयपरायण अर्थात् विषयोंके अभिमुख रहता है। परन्तु जब विवेकज्ञानका उदय हो जाता है, उस समय योगीका चित्त निःसार संसारके विषयोंकी ओर नहीं जाता, उनसे सर्वथा विरक्त हो जाता है और उस विवेकज्ञानमें निरन्तर बहता है तथा कैवल्यके अभिमुख हो जाता है यानी अपने कारणमें विलीन होना आरम्भ कर देता है। क्योंकि चित्तका अपने कारणमें विलीन हो जाना और द्रष्टाका स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाना—यही कैवल्य है (योग० ४।३४) ॥२६॥

**सम्बन्ध—**यदि योगीका चित्त विवेकज्ञानमें झुका हुआ रहता है तथा अपने कारणमें विलीन होने लगता है तो फिर व्युत्थान-अवस्थामें उसकी दूसरी वृत्तियाँ कैसे होती होंगी, इसपर कहते हैं—

तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ॥ २७ ॥

'उस (समाधि) के अन्तरालमें दूसरे पदार्थोंका ज्ञान पूर्वसंस्कारोंसे होता है।'

**व्याख्या—**विवेकज्ञानमें निमग्न हुए चित्तमें व्युत्थान-अवस्थाओंके समय जो अन्य वस्तुओंकी प्रतीतिका व्यवहार देखनेमें आता है, वह दग्धबीजके सदृश विद्यमान पूर्वसंस्कारोंसे देखनेमें आता है ॥२७॥

**सम्बन्ध—**उन संस्कारोंका सर्वथा नाश कब और कैसे होता है, इस जिज्ञासापर कहते हैं—

पा० यो० द० १०—

१४६ पातञ्जलयोगदर्शन

हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ॥२८॥

'इन संस्कारोंका विनाश क्लेशोंकी भाँति कहा गया है।'

**व्याख्या—**दग्ध हुए बीजके सदृश जो सूक्ष्म क्लेश हैं, उनका अभाव जैसे प्रतिप्रसवसे अर्थात् कारणमें कार्यके लयसे बतलाया है (योग० २ । १०), उसी प्रकार इनका भी समझ लेना चाहिये। जबतक किसी भी परिस्थितिमें चित्त वर्तमान है, तबतक संस्कारोंका सर्वथा नाश नहीं होता, उनका नाश तो चित्तके अपने कारण गुणोंमें विलीन होनेपर उसके साथ ही होता है। परन्तु भूने हुए बीजके सदृश ज्ञानरूप अग्निसे जलाये हुए संस्कार विद्यमान रहकर भी पुनर्जन्मके हेतु नहीं बन सकते। अतः उनके कारण होनेवाला पदार्थोंका ज्ञान नये संस्कारोंका उत्पादक नहीं है ॥२८॥

**सम्बन्ध—**विवेकज्ञान प्राप्त होनेके बाद क्या होता है, इस जिज्ञासापर कहते हैं—

प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्याते-

र्धर्ममेघः समाधिः ॥२९॥

'जिस योगीका विवेकज्ञानकी महिमामें भी वैराग्य हो जाता है, उसका विवेकज्ञान सर्वथा प्रकाशमान रहनेके कारण उसको धर्ममेघ समाधि प्राप्त हो जाती है।'

**व्याख्या—**जब विवेकज्ञान उदय होता है, तब योगीके चित्तमें अत्यन्त स्वच्छता आ जाती है। अतः उसमें विलक्षण शक्ति आ जाती है, उस समय योगी सर्वज्ञ हो जाता है (योग० ३ । ४९)।

कैवल्यपाद-४ [१४७]

ऐसी सामर्थ्य प्राप्त होनेपर भी जो योगी उस सामर्थ्यका उपभोग नहीं करता, सर्वज्ञतारूप ऐश्वर्यमें आसक्त नहीं होता, उससे सर्वथा विरक्त हो जाता है, तब उसके विवेकज्ञानमें किसी प्रकारका अन्तराय (विघ्न) नहीं पड़ सकता, वह निरन्तर उदित (प्रकाशमान) रहता है, इसलिये तत्काल ही उस योगीको धर्ममेघ समाधि प्राप्त हो जाती है ॥२९॥

सम्बन्ध—उस धर्ममेघ समाधिसे क्या होता है, इसपर कहते हैं—

ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ॥३०॥

‘उस (धर्ममेघ समाधि) से क्लेश और कर्मोंका सर्वथा नाश हो जाता है ।’

व्याख्या—उक्त प्रकारसे जब योगीकी धर्ममेघ समाधि सिद्ध हो जाती है, तब उस योगीके अविद्यादि पाँचों क्लेश तथा शुक्ल, कृष्ण और मिश्रित—ऐसे तीनों प्रकारके कर्मसंस्कार समूल नष्ट हो जाते हैं । अतः वह योगी जीवन्मुक्त कहलाता है ॥३०॥

सम्बन्ध—उस समय योगीके ज्ञानका क्या स्वरूप रहता है; यह बतलाते हैं—

तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्या-

ज्ज्ञेयमल्पम् ॥३१॥

‘उस समय जिसके सब प्रकारके परदे और मल हट चुके हैं, ऐसा ज्ञान अनन्त (सीमारहित) हो जाता है, इस कारण ज्ञेय पदार्थ अल्प हो जाते हैं ।’

१४८पातञ्जलयोगदर्शन

व्याख्या—विवेक-ज्ञानकी प्राप्तिके पहले ज्ञानको सीमाबद्ध करने-वाले जितने भी अविद्या आदि परदे रहते हैं एवं उसमें जितना भी कर्म-संस्काररूपमें संग्रह किया हुआ मल रहता है, वे सब-के-सब उपर्युक्त धर्ममेघ समाधिमें नष्ट हो जाते हैं। इस कारण योगीका ज्ञान अनन्त—सीमाराहित हो जाता है, तब दुनियाके जितने भी ज्ञेय पदार्थ हैं, वे ऐसे अल्प हो जाते हैं, जिस प्रकार आकाशमें जुगनू (खद्योत); उस समय उस सिद्ध और मुक्त योगीसे कोई भी तत्त्व अज्ञात नहीं रह सकता ॥३१॥

सम्बन्ध—यहाँ यह प्रश्न उठता है कि तीनों गुण परिणामशील हैं, अतः उनका परिणाम अवश्यम्भावी है, फिर वे योगीके लिये पुनर्जन्म देनेवाले क्यों नहीं होते, इसपर कहते हैं—

ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम् ॥३२॥

'उसके बाद अपने कामको पूरा कर चुकनेवाले गुणोंके परिणामक्रमकी (परिणामसम्बन्धी सिलसिलेकी) समाप्ति हो जाती है।'

व्याख्या—जब योगीको धर्ममेघ समाधिकी प्राप्ति हो जाती है, तब उसके लिये गुणोंका कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता, उनका काम, जो पुरुषको भोग और अपवर्ग देना है, पूरा हो जाता है; इस कारण उनका जो निरन्तर परिवर्तन होते रहनारूप परिणामक्रम है, वह उस योगीके लिये समाप्त हो जाता है। अतः वे भावी शरीरका निर्माण नहीं कर सकते ॥३२॥

कैवल्यपाद-४ १४९

सम्बन्ध—प्रसङ्गवश क्रमका स्वरूप बतलाते हैं—

क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः ॥३३॥

‘जो क्षणोंका प्रतियोगी है और परिणामके अन्तमें जिसका स्वरूप समझमें आता है, वह क्रम है।’

व्याख्या—कोई भी वस्तु जब किसी एक रूपसे दूसरे रूपमें बदलती है या एक रूपमें रहती हुई भी पुरानी होती चली जाती है, तब वह उसका परिणाम किसी एक दिनमें, एक घड़ीमें या एक पलकमें नहीं हो जाता; उसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है, परंतु जाननेमें नहीं आता। उस वस्तुका दूसरा परिणाम पूर्ण होनेसे यह अनुमानद्वारा जाना जाता है कि यह एक साथ नहीं बदली है, क्रमसे बदलती रही है (योग० ३। १५ और ५२ की टीकामें भी क्रमका वर्णन आया है)। इस प्रकार क्रमका ज्ञान परिणामके अन्तमें होनेसे उसे यहाँ ‘परिणामापरान्तनिर्ग्राह्य’ कहा है और प्रत्येक क्षणसे इसका सम्बन्ध है। एक क्षणके बाद दूसरा क्षण, उसके बाद तीसरा क्षण—इस तरह क्षणोंके प्रवाहमें जो पूर्वापरका ज्ञापक (जनानेमें निमित्त) है, उसीको ‘क्रम’ कहते हैं। अतः इसको क्षणप्रतियोगी कहा गया है। क्षणप्रतियोगीका शब्दार्थ यह भी किया जा सकता है कि जो क्षणोंका प्रतियोगी यानी विभाजक (विभाग करनेवाला) है, वह क्रम है ॥३३॥

सम्बन्ध—पहले बत्तीसवें सूत्रमें गुणोंके परिणामक्रमकी समाप्ति-को कैवल्य नाम दिया गया है, उक्त कैवल्यके स्वरूपका प्रतिपादन करके इस शास्त्रकी समाप्ति करते हैं—

१५०पातञ्जलयोगदर्शन

पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति ॥३४॥

'जिनका पुरुषके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रहा, ऐसे गुणोंका अपने कारणमें विलीन हो जाना कैवल्य है अथवा (यों कहिये कि) द्रष्टाका अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाना (कैवल्य) है।'

व्याख्या—गुणोंकी प्रवृत्ति पुरुषके भोग और अपवर्गके सम्पादन करनेके लिये है। इसी कामको पूरा करनेके लिये वे बुद्धि, अहंकार, तन्मात्रा, मन, इन्द्रियाँ और शब्दादि विषयोंके आकारमें परिणत होते हैं। जिस पुरुषके लिये वे गुण भोग भुगताकर अपवर्ग (मुक्ति) सम्पादन कर देते हैं, उसके लिये उनका कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता; तब वे अपने प्रयोजनको पूरा कर चुकनेवाले कार्य और कारणरूपमें विभक्त हुए गुण प्रतिलोमपरिणामको प्राप्त होकर अपने कारणमें विलीन हो जाते हैं। यही गुणोंका कैवल्य अर्थात् पुरुषसे अलग हो जाना है; और उन गुणोंके साथ पुरुषका जो अनादिसिद्ध अविद्याकृत संयोग था, उसका अभाव हो जानेपर अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित हो जाना, यह पुरुषका कैवल्य अर्थात् प्रकृतिसे सर्वथा अलग हो जाना है ॥३४॥

५. योगदर्शन वर्णानुक्रमणिका (परिशिष्ट)

श्रीहरिः

योगदर्शनकी वर्णानुक्रमणिका

पादसूत्रपृष्ठ
[ अ ]
अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम्४१२१३४
अथ योगानुशासनम्१११
अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या२५४४
अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः१११९
अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः२३९७२
अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा११०८
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः११२९
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः२३४२
अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्२४४३
अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्२३७७१
अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः२३५७०
अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः२३०६५
[ ई ]
ईश्वरप्रणिधानाद्वा१२३१९

( १५२ )

पादसूत्रपृष्ठ
[ उ ]
उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च३३९१०९
[ ऋ ]
ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ...१४८३७
[ ए ]
एकसमये चोभयानवधारणम् ...४२०१३९
एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता१४४३५
एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः३१३९०
[ क ]
कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः ...३३०१०४
कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् ...४७१३०
क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ...३१५९४
कायरूपसंयमात्तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुःप्रकाशा-संप्रयोगेऽन्तर्धानम् ...३२१९९
कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाकाशगमनम् ...३४२११२
कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ...२४३७४
कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् ...३३११०४
कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्२२२५९
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः१२४२०
क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ...२१२४९
क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ...३५२१२८
क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः४३३१४९

( १५३ )

पादसूत्रपृष्ठ
क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता-<br>समापत्तिः ...१४१३१

[ ग ]

ग्रहणस्वरूपास्मितानव्यार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः३४७११७

[ च ]

चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ...३२७१०३
चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसंकरश्च४२११४०
चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम्४२२१४१

[ ज ]

जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः ...४११२५
जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयो-<br>रेकरूपत्वात् ...४९१३१
जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्२३१६६
जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः३५३१२३
जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् ...४२१२८

[ त ]

तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ...४२७१४५
तज्जपस्तदर्थभावनम् ...१२८२२
तज्जयात्प्रज्ञालोकः ...३५८५
तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ...१५०३८
ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम्४३२१४८
ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ...४३०१४७

( १५४ )

पादसूत्रपृष्ठ
ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ...२५५८२
ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः३१२८९
ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च१२९२३
ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते३३६१०७
ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम्४८१३१
ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ...२५२८१
ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसंपत्तद्धर्मानभिघातश्च३४५११४
ततो द्वन्द्वानभिघातः ...२४८७७
ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च३४८११८
तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ...११६१२
तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ...१३२२६
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ...३२८३
तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ...११३१०
तत्र ध्यानजमनाशयम् ...४६१३०
तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ...१२५२०
तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः१४२३३
तदर्थ एव दृश्यस्याऽऽत्मा ...२२१५९
तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ...३८८६
तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम्२२५६१
तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात्४२४१४३
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ...१३२
तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् ...४२६१४५
तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम्४३११४७
तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम्४१७१३७
तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः३३८४
तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ...३५०१२०

( १५५ )

पादसूत्रपृष्ठ
तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः२१४०
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः२४९७७
तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ...३१०८८
तस्य भूमिषु विनियोगः ...३६८५
तस्य वाचकः प्रणवः ...१२७२१
तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ...२२७६३
तस्य हेतुरविद्या ...२२४६१
तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः१५१३९
ता एव सबीजः समाधिः ...१४६३६
तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम्३५४१२३
तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् ...४१०१३२
तीव्रसंवेगानामासन्नः ...१२११७
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ...२१०४८
ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ...२१४५०
ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ...४१३१३४
ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ...३३७१०८
त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ...३७८५
त्रयमेकत्र संयमः ...३४८४

[ द ]

पादसूत्रपृष्ठ
द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ...२२०५८
द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ...२१७५५
द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ...४२३१४१
दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः१३१२५
दुःखानुशयी द्वेषः ...२८४७
दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ...२६४६
दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्११५१२

( १५६ )

पाद सूत्र पृष्ठ देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ... ३ १ ८३

[ ध ]

धारणासु च योग्यता मनसः ... २ ५३ ८१ ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः ... २ ११ ४९ ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ... ३ २८ १०३

[ न ]

न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ४ १६ १३६ न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् ... ३ २० ९९ न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात् ... ४ १९ १३८ नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् ... ३ २९ १०३ निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत् ४ ३ १२८ निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ... ४ ४ १२९ निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः ... १ ४७ ३७

[ प ]

परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ... १ ४० ३० परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः २ १५ ५१ परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ... ३ १६ ९६ परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम् ... ४ १४ १३५ पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति ... ४ ३४ १५० पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ... १ २६ २१ प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् २ १८ ५६ प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ... १ ३४ २७ प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ... १ ७ ३

( १५७ )

पादसूत्रपृष्ठ
प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम्३१९९८
प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः१६३
प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम्२४७७६
प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम्४५१२९
प्रवृत्त्यालोकन्यासात्सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम्३२५१०२
प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः४२९१४६
प्रातिभाद्वा सर्वम्३३३१०५

[ ब ]

पादसूत्रपृष्ठ
बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः३३८१०८
ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः२३८७२
बलेषु हस्तिबलादीनि३२४१०१
बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः३४३११२
बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः२५०७८
बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः२५१८०

[ भ ]

पादसूत्रपृष्ठ
भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्११९१५
भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्३२६१०२

[ म ]

पादसूत्रपृष्ठ
मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्३३२१०४
मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः१२२१८
मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्१३३२७
मैत्र्यादिषु बलानि३२३१०१

[ य ]

पादसूत्रपृष्ठ
यथाभिमतध्यानाद्वा१३९३०

( १५८ )

पाद सूत्र पृष्ठ

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयो-
ऽष्टावङ्गानि ... २ २९ ६५
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ... १ २ १
योगाङ्गाननुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिरा विवेकख्यातेः २ २८ ६४

[ र ]

रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसंपत् ... ३ ४६ ११६

[ व ]

वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः ... ४ १५ १३६
वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ... २ ३३ ६८
वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात्संप्रज्ञातः ... १ १७ १३
वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोध-
मोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला
इति प्रतिपक्षभावनम् ... २ ३४ ६९
विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ... १ ८ ५
विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः ... १ १८ १४
विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ... २ २६ ६२
विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः ... ४ २५ १४४
विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ... २ १९ ५७
विशोका वा ज्योतिष्मती ... १ ३६ २८
विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनी १ ३५ २८
वीतरागविषयं वा चित्तम् ... १ ३७ २८
वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ... १ ५ २
वृत्तिसारूप्यमितरत्र ... १ ४ २
व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्ध-
भूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः १ ३० २३

( १५९ )

पाद सूत्र पृष्ठ

व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षण- चित्तान्वयो निरोधपरिणामः ... ३ ९ ८६

[ श ] शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ... १ ९ ७ शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्संकरस्तत्प्रविभाग- संयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम् ... ३ १७ ९६ शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी ... ३ १४ ९३ शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः २ ३२ ६७ शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः ... २ ४० ७३ श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ... १ २० १६ श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ... १ ४९ ३८ श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमाद्दिव्यं श्रोत्रम् ... ३ ४१ १११

[ स ] सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ... २ १३ ५० स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः १ १४ ११ सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ... २ ३६ ७१ सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थात्स्वार्थसंयमात्पुरुषज्ञानम् ... ३ ३५ १०५ सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यम् ... ३ ५५ १२४ सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ... ३ ४९ ११९ सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च २ ४१ ७३ सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वात् ४ १८ १३८ समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ... २ २ ४१ समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ... २ ४५ ७५ समानजयाज्ज्वलनम् ... ३ ४० ११०

( १६० )

पादसूत्रपृष्ठ
संतोषादनुत्तमसुखलाभः ...२४२
संस्कारसाक्षात्करणात्पूर्वजातिज्ञानम् ...३१८
सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः३११
सुखानुशयी रागः ...२७
सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ...१४५
सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्तज्ञान- <br> मरिष्टेभ्यो वा ...३२२
स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात्३५१
स्थिरसुखमासनम् ...२४६
स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद्भूतजयः३४४
स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का१४३
स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा ...१३८
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः२९
स्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः२५४
स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः२२३
स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः ...२४४

[ ह ]

हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ... | ४ | २८ | १४६ हृदये चित्तसंवित् ... | ३ | ३४ | १०५ हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः | ४ | ११ | १३३ हेयं दुःखमनागतम् ... | २ | १६ | ५५


समाप्त

श्रीहरिः

गीताप्रेस, गोरखपुरकी पुस्तक-सूची

<u>श्रीमद्भगवद्गीता</u><u>तत्त्व-चिन्तामणि (बड़ा)</u>
गीता-तत्त्वविवेचनी सजिल्द ४)भाग १ अजिल्द ॥=)
गीता मझोली ॥=) सजिल्द १),, २—III=) सजिल्द १।)
गीता मोटे अक्षरवाली अर्थ-सहित ॥) सजिल्द III=),, ३—॥≡) सजिल्द १-)
गीता केवल भाषा ।),, ६—१) सजिल्द १।=)
गीता छोटी भाषाटीका =)॥ सजिल्द I)॥<u>तत्त्व-चिन्तामणि (गुटका)</u>
गीता मूल विष्णुसहस्रनाम-सहित -)॥भाग १ ।-)
गीता मूल महीन अक्षर )॥,, ५ ।=)
गीताडायरी सन् १९५१ साधारण जिल्द ॥=)ढाई हजार अनमोल बोल (संत-वाणी) ॥=) स० III=)
प्रश्नोपनिषद् ।≡)कवितावली ॥-)
ऐतरेयोपनिषद् ।=)दोहावली ॥)
श्रीमद्भागवत महापुराणसुखी जीवन ॥)
मूल (गुटका) सजिल्द ३)नैवेद्य ॥)
<u>श्रीरामचरितमानस</u>उपनिषदोंके १४ रत्न ।=)
मझोली भाषाटीका सजि० ३॥)लोक-परलोकका सुधार भाग १ ।=)
मझोली मूल सजिल्द २)लोक-परलोकका सुधार भाग २ ।=)
मानस-शंका-समाधान ॥)रामायण प्रथमा परीक्षा ।=)
विनय-पत्रिका १) सजि० १।=)भक्त नरसिंह मेहता ।=)
गीतावली सटीक १) सजि० १।=)प्रेम-दर्शन ।-)
<u>भक्त-चरित-माला</u>
भक्त बालक ।-)
भक्त नारी ।-)
[ २ ]

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| :--- | :--- | :--- | :--- |
| भक्त-पञ्चरत्न | ।-) | नवधा भक्ति | =) |
| आदर्श भक्त | ।-) | बाल-शिक्षा | =) |
| भक्त-चन्द्रिका | ।-) | रामायण-शिशु-परीक्षा पाठ्य- | |
| भक्त-सप्तरत्न | ।-) | पुस्तक | =) |
| भक्त-कुसुम | ।-) | **भजन-संग्रह** | |
| प्रेमी भक्त | ।-) | प्रथम भाग | =) |
| प्राचीन भक्त | ॥) | द्वितीय भाग | =) |
| भक्त-सौरभ | ।-) | तृतीय भाग | =) |
| भक्त-सरोज | ।=) | चतुर्थ भाग | =) |
| भक्त-सुमन | ।=) | पञ्चम भाग | =) |
| **आदर्श चरित-माला** | | गीताके पदोंकी वर्णानुक्रमसूची | =) |
| भक्तराज हनुमान् | ।-) | स्त्रीधर्म-प्रश्नोत्तरी | -)॥ |
| सत्यप्रेमी हरिश्चन्द्र | ।-) | नारीधर्म | -)॥ |
| प्रेमी भक्त उद्धव | ≡) | गोपी-प्रेम | -)॥ |
| महात्मा विदुर | =)॥ | मनुस्मृति दूसरा अध्याय | -)॥ |
| भक्तराज ध्रुव | ≡) | ध्यानावस्थामें प्रभुसे वार्तालाप | -)॥ |
| विवेक-चूडामणि | ।-) | श्रीविष्णुसहस्रनाम सटीक | -)॥ |
| परमार्थ-पत्रावली भाग १ | ।) | हनुमानबाहुक | -)॥ |
| ” २ | ।) | श्रीसीताके चरित्रसे आदर्श | |
| ” ३ | ॥) | शिक्षा | -)। |
| कल्याण-कुञ्ज | ।) | मनको वशमें करनेके उपाय | -)। |
| महाभारतके आदर्श पात्र | ।) | ईश्वर | -)। |
| आदर्श भ्रातृ-प्रेम | ≡) | मूल रामायण | -)। |
| मानव-धर्म | ≡) | रामायण-मध्यमा-परीक्षा-पाठ्य- | |
| गीता-निबन्धावली | =)॥ | पुस्तक | -)। |
| साधन-पथ | =)॥ | हरेरामभजन १४ माला | ।-) |
| मनन-माला | =)॥ | हरेरामभजन ६४ माला | १) |
| | | शारीरकमीमांसादर्शन | )॥ |
| | | बलिवैश्वदेवविधि | )॥ |